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लेखक: Auther preeti Sharma

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Auther preeti Sharma

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

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  • महल के द्वार पर सुदामा

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    अध्याय 8 — महल के द्वार पर सुदामा और कृष्ण तक पहुँची खबर

     

    द्वारका के विशाल महल के सामने सुदामा चुपचाप खड़े थे।

     

    उनकी आँखें महल के ऊँचे द्वार पर टिकी थीं।

     

    वर्षों पहले जिस कृष्ण के साथ उन्होंने गुरुकुल की छोटी सी कुटिया में बैठकर भोजन किया था, आज वही कृष्ण इस विशाल राजमहल में रहते थे।

     

    सुदामा के मन में तरह-तरह के विचार उठ रहे थे।

     

    पहरेदार अब भी उन्हें देख रहा था।

     

    उसने फिर पूछा,

     

    “तुमने कहा कि तुम कृष्ण से मिलने आए हो?”

     

    सुदामा ने सिर झुकाकर कहा,

     

    “हाँ।”

     

    “क्या तुम्हारे पास कोई संदेश है?”

     

    सुदामा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर मुस्कुराकर बोले,

     

    “संदेश?”

     

    पहरेदार ने कहा,

     

    “हाँ। द्वारकाधीश से मिलने हर व्यक्ति सीधे अंदर नहीं जा सकता।”

     

    सुदामा ने अपनी छोटी सी पोटली को हाथ में कसकर पकड़ लिया।

     

    “मेरे पास कोई संदेश नहीं है।”

     

    पहरेदार ने पूछा,

     

    “फिर?”

     

    सुदामा ने धीरे से कहा,

     

    “बस उनसे कहना कि उनका पुराना मित्र सुदामा उनसे मिलने आया है।”

     

    पहरेदार ने एक-दूसरे की ओर देखा।

     

    उनमें से एक को शायद विश्वास नहीं हुआ।

     

    उसने पूछा,

     

    “तुम सच में उनके मित्र हो?”

     

    सुदामा मुस्कुरा दिए।

     

    “यह बात अब वही बता सकते हैं।”

     

    पहरेदार ने कुछ क्षण उन्हें देखा।

     

    सुदामा के कपड़े साधारण थे। पैरों में यात्रा की धूल थी। कंधे पर पुराना थैला था और हाथ में छोटी सी पोटली।

     

    उनका रूप किसी बड़े व्यक्ति जैसा नहीं था।

     

    लेकिन उनकी आँखों में ऐसा अपनापन था, जिसे देखकर पहरेदार भी कुछ पल के लिए चुप हो गया।

     

    आखिरकार उसने कहा,

     

    “ठहरो। मैं भीतर जाकर सूचना देता हूँ।”

     

    पहरेदार अंदर चला गया।

     

    सुदामा वहीं खड़े रहे।

     

    उनका दिल तेजी से धड़क रहा था।

     

    अब तक वह रास्ते भर कृष्ण से मिलने की कल्पना करते आए थे।

     

    लेकिन अब जब वह महल के सामने खड़े थे, तो अचानक उनके मन में संकोच भर गया।

     

    उन्होंने मन ही मन कहा,

     

    “कृष्ण… अगर तुमने मुझे पहचान लिया तो?”

     

    फिर उनके मन में दूसरा विचार आया—

     

    “और अगर नहीं पहचाना तो?”

     

    यह विचार आते ही उनका चेहरा उदास हो गया।

     

    उन्होंने तुरंत स्वयं को समझाया,

     

    “नहीं। वह कृष्ण हैं। मेरे मित्र हैं। वह मुझे जरूर पहचानेंगे।”

     

    उधर महल के भीतर कृष्ण अपने राजकार्य में व्यस्त थे।

     

    उनके सामने कई लोग अपनी समस्याएँ लेकर उपस्थित थे।

     

    कृष्ण सबकी बातें ध्यान से सुन रहे थे।

     

    तभी एक सेवक तेजी से अंदर आया।

     

    उसने हाथ जोड़कर कहा,

     

    “महाराज…”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

     

    “कहो।”

     

    सेवक कुछ पल झिझका।

     

    “महल के द्वार पर एक व्यक्ति आपसे मिलने आया है।”

     

    कृष्ण ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    सेवक ने कहा,

     

    “उन्होंने अपना नाम सुदामा बताया है।”

     

    बस…

     

    इतना सुनना था कि कृष्ण जैसे एक पल के लिए बिल्कुल स्थिर हो गए।

     

    उनके चेहरे पर जो गंभीरता थी, वह अचानक गायब हो गई।

     

    आँखों में एक अलग ही चमक आ गई।

     

    उन्होंने दोबारा पूछा,

     

    “क्या कहा तुमने?”

     

    सेवक ने कहा,

     

    “सुदामा।”

     

    कृष्ण तुरंत अपने आसन से उठ खड़े हुए।

     

    पास बैठे लोग हैरान रह गए।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “मेरा सुदामा?”

     

    सेवक ने सिर झुका दिया।

     

    “जी।”

     

    कृष्ण के चेहरे पर ऐसी मुस्कान आई, जैसी वर्षों से किसी ने नहीं देखी थी।

     

    उन्हें अचानक गुरुकुल का वह छोटा सा आँगन याद आ गया।

     

    उन्हें सुदामा की आवाज याद आई।

     

    वह दिन याद आया जब दोनों एक पेड़ के नीचे बैठे थे।

     

    वह बारिश याद आई, जिसमें दोनों भीगते हुए भी हँस रहे थे।

     

    उन्हें वह विदाई याद आई, जब सुदामा ने पूछा था—

     

    “क्या तुम मुझे पहचानोगे?”

     

    और कृष्ण ने कहा था—

     

    “सच्चे मित्र की पहचान चेहरे से नहीं, दिल से होती है।”

     

    कृष्ण की आँखें नम हो गईं।

     

    उन्होंने बिना एक पल गँवाए कहा,

     

    “उन्हें यहीं लेकर आओ।”

     

    सेवक ने कहा,

     

    “जी महाराज।”

     

    लेकिन कृष्ण तुरंत आगे बढ़े।

     

    “नहीं।”

     

    सब उनकी ओर देखने लगे।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “उन्हें लाने की जरूरत नहीं।”

     

    उन्होंने स्वयं महल के द्वार की ओर कदम बढ़ा दिए।

     

    सेवक और अन्य लोग उनके पीछे चल पड़े।

     

    उधर सुदामा अभी भी महल के बाहर खड़े थे।

     

    उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अंदर से क्या उत्तर आएगा।

     

    कुछ देर बाद उन्होंने देखा कि महल के भीतर से बहुत से लोग उनकी ओर आ रहे हैं।

     

    सुदामा ने सोचा,

     

    “शायद अब मुझे अंदर बुलाया जाएगा।”

     

    लेकिन तभी भीड़ के बीच उन्हें एक परिचित चेहरा दिखाई दिया।

     

    उनके कदम वहीं रुक गए।

     

    वह चेहरा…

     

    वह मुस्कान…

     

    वह आँखें…

     

    सुदामा की साँस जैसे थम गई।

     

    “कृष्ण…”

     

    उनके मुँह से बस इतना ही निकला।

     

    कृष्ण भी उन्हें देखते ही रुक गए।

     

    कुछ पल तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    समय जैसे ठहर गया था।

     

    सुदामा की आँखों में आँसू आ गए।

     

    कृष्ण की आँखें भी नम थीं।

     

    फिर कृष्ण अचानक आगे बढ़े।

     

    उन्होंने सुदामा को अपने गले से लगा लिया।

     

    सुदामा कुछ क्षण तक बिल्कुल शांत रहे।

     

    फिर उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “कृष्ण…”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “सुदामा!”

     

    दोनों कुछ देर तक एक-दूसरे को पकड़े रहे।

     

    वर्षों की दूरी उस एक आलिंगन में समाप्त हो गई।

     

    महल के आसपास खड़े लोग यह दृश्य देखकर स्तब्ध थे।

     

    किसी ने शायद पहली बार देखा था कि उनका राजा किसी साधारण वस्त्र पहने व्यक्ति से इतनी आत्मीयता से मिल रहा है।

     

    कृष्ण ने सुदामा के कंधे पर हाथ रखा।

     

    “तुमने आने में इतनी देर क्यों कर दी?”

     

    सुदामा ने आँसू पोंछते हुए कहा,

     

    “तुमने भी तो कभी बुलाया नहीं।”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “तो क्या मित्रों के बीच बुलावा भेजना पड़ता है?”

     

    सुदामा भी मुस्कुरा दिए।

     

    “मुझे लगा… तुम्हारा जीवन बदल गया होगा।”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा,

     

    “जीवन बदला है, सुदामा। मित्रता नहीं।”

     

    सुदामा की आँखें फिर भर आईं।

     

    कृष्ण ने उन्हें ध्यान से देखा।

     

    “तुम बहुत बदल गए हो।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “तुम भी।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “लेकिन तुम मुझे पहचान गए।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “तुम्हें कैसे नहीं पहचानता?”

     

    कृष्ण ने हँसकर कहा,

     

    “तो फिर गुरुकुल वाली बात सच निकली।”

     

    सुदामा ने पूछा,

     

    “कौन सी?”

     

    “कि सच्चे मित्र की पहचान चेहरे से नहीं होती।”

     

    दोनों हँस पड़े।

     

    कृष्ण ने सुदामा का हाथ पकड़ लिया।

     

    “चलो।”

     

    “कहाँ?”

     

    “अंदर।”

     

    सुदामा अचानक रुक गए।

     

    उन्होंने महल की ओर देखा।

     

    “मैं?”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “हाँ, तुम।”

     

    सुदामा झिझकते हुए बोले,

     

    “कृष्ण, मैं ऐसे ही…”

     

    कृष्ण ने उनकी बात पूरी नहीं होने दी।

     

    “जैसे आए हो, वैसे ही मेरे साथ चलो।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “लेकिन लोग क्या सोचेंगे?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “लोगों को सोचने दो।”

     

    फिर उन्होंने सुदामा का हाथ पकड़ा और स्वयं उन्हें महल के अंदर ले गए।

     

    महल के भीतर कदम रखते ही सुदामा ने चारों ओर देखा।

     

    सब कुछ बहुत भव्य था।

     

    लेकिन कृष्ण के लिए वह सब जैसे कुछ भी नहीं था।

     

    उनके लिए उस समय सबसे कीमती चीज सामने खड़ी थी—

     

    उनका मित्र।

     

    कृष्ण उन्हें एक कक्ष में ले गए।

     

    वहाँ पहुँचकर उन्होंने सुदामा को आसन पर बैठाया।

     

    सुदामा तुरंत उठने लगे।

     

    “नहीं कृष्ण, मैं यहाँ कैसे…”

     

    कृष्ण ने उन्हें बैठाते हुए कहा,

     

    “आज तुम मेरे अतिथि नहीं हो।”

     

    सुदामा ने पूछा,

     

    “तो?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “आज तुम मेरे पुराने मित्र हो। और पुराने मित्रों को औपचारिकता की जरूरत नहीं होती।”

     

    सुदामा बैठ गए।

     

    कृष्ण स्वयं उनके सामने बैठ गए।

     

    दोनों कुछ देर तक एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर कृष्ण ने पूछा,

     

    “बताओ, गुरुकुल के बाद क्या हुआ?”

     

    सुदामा ने हँसते हुए कहा,

     

    “इतने वर्षों की बातें एक साथ कैसे बताऊँ?”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “आज हमारे पास समय ही समय है।”

     

    सुदामा ने अपनी जिंदगी के बारे में बताना शुरू किया।

     

    गाँव।

     

    घर।

     

    परिवार।

     

    बच्चे।

     

    छोटी-छोटी खुशियाँ।

     

    और संघर्ष।

     

    कृष्ण ध्यान से सुनते रहे।

     

    उन्होंने बीच में एक बार भी सुदामा को रोका नहीं।

     

    फिर कृष्ण ने पूछा,

     

    “और तुम्हें मेरी याद आई?”

     

    सुदामा ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “क्या तुम सच में यह पूछ रहे हो?”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “मैं तो बस सुनना चाहता हूँ।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “हर बार जब जीवन कठिन हुआ।”

     

    कृष्ण की मुस्कान कुछ पल के लिए शांत हो गई।

     

    उन्होंने सुदामा की आँखों में देखा।

     

    उन्हें समझ आ गया कि उनके मित्र ने बहुत कुछ सहा है।

     

    लेकिन कृष्ण ने कोई प्रश्न नहीं किया।

     

    उन्होंने बस सुदामा का हाथ पकड़ लिया।

     

    फिर उनकी नजर सुदामा की छोटी सी पोटली पर पड़ी।

     

    कृष्ण ने शरारत से पूछा,

     

    “यह क्या है?”

     

    सुदामा तुरंत पोटली को पीछे करने लगे।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “इतने वर्षों बाद मिले हो और अब भी मुझसे कुछ छिपा रहे हो?”

     

    सुदामा ने हँसते हुए कहा,

     

    “यह बहुत साधारण चीज है।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “मेरे लिए?”

     

    सुदामा चुप हो गए।

     

    कृष्ण ने पोटली की ओर हाथ बढ़ाया।

     

    “मुझे दिखाओ।”

     

    सुदामा झिझकते रहे।

     

    आखिरकार उन्होंने वह छोटी पोटली कृष्ण के हाथ में दे दी।

     

    कृष्ण ने उसे खोला।

     

    अंदर थोड़ा सा चिवड़ा था।

     

    कृष्ण की आँखों में चमक आ गई।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “सुदामा…”

     

    सुदामा शर्माते हुए बोले,

     

    “बहुत थोड़ा है।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “मेरे लिए तो यह संसार की सबसे बड़ी भेंट है।”

     

    उन्होंने चिवड़ा अपने हाथ में लिया।

     

    एक मुट्ठी खाई।

     

    उनके चेहरे पर वही बचपन वाली खुशी थी।

     

    सुदामा उन्हें देखता रहा।

     

    उसकी आँखों से आँसू निकल आए।

     

    कृष्ण ने पूछा,

     

    “रो क्यों रहे हो?”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “क्योंकि मुझे लग रहा है कि इतने वर्षों बाद भी मेरा कृष्ण वैसा ही है।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “और मुझे लग रहा है कि मेरा सुदामा भी वैसा ही है।”

     

    दोनों फिर हँस पड़े।

     

    लेकिन उस मिलन के पीछे सुदामा के मन में एक बात अब भी छिपी थी।

     

    वह कृष्ण से कुछ माँगने नहीं आया था।

     

    लेकिन उसके घर की स्थिति…

     

    उसके परिवार की परेशानी…

     

    सब उसके मन में था।

     

    कृष्ण शायद यह बात समझ चुके थे।

     

    उन्होंने सुदामा की आँखों में देखकर धीरे से पूछा,

     

    “सुदामा, तुम मेरे पास केवल मिलने आए हो… या तुम्हारे मन में कोई और बात भी है?”

     

    सुदामा चुप हो गया।

     

    उसने कृष्ण की ओर देखा।

     

    और पहली बार उसे लगा…

     

    शायद उसे अपने मित्र से कुछ कहने की जरूरत ही नहीं।

     

    कृष्ण पहले से सब समझ चुके थे।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • सुदामा की द्वारिका की ओर यात्रा

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    अध्याय 7 — सुदामा की द्वारका की ओर यात्रा

    सूरज निकलने से पहले ही सुदामा अपने घर से निकल पड़े।

     

    गाँव अभी पूरी तरह जागा भी नहीं था। कहीं-कहीं घरों से धुएँ की पतली लकीरें उठ रही थीं। पक्षियों की आवाज धीरे-धीरे वातावरण में फैल रही थी। सुदामा ने एक बार पीछे मुड़कर अपने छोटे से घर को देखा।

     

    वही मिट्टी की दीवारें।

     

    वही साधारण आँगन।

     

    वही घर, जहाँ उसने जीवन के कितने ही सुख-दुख देखे थे।

     

    दरवाजे पर उसकी पत्नी खड़ी थी।

     

    उसकी आँखों में चिंता भी थी और उम्मीद भी।

     

    सुदामा ने मुस्कुराकर कहा, “मैं जल्द लौटने की कोशिश करूँगा।”

     

    पत्नी ने धीरे से कहा, “रास्ते का ध्यान रखिएगा।”

     

    सुदामा ने सिर हिलाया।

     

    फिर उसकी पत्नी ने उसके हाथ में रखी छोटी सी पोटली को देखा।

     

    उसमें वही थोड़ा सा चिवड़ा था, जो वह कृष्ण के लिए लेकर जा रहा था।

     

    पत्नी ने कहा, “इसे संभालकर रखिएगा।”

     

    सुदामा ने पोटली को अपने सीने से लगाया।

     

    “यह मेरे पास सबसे कीमती चीज है।”

     

    पत्नी मुस्कुराई।

     

    सुदामा ने एक बार फिर अपने घर की ओर देखा और फिर आगे बढ़ गया।

     

    अब उसके सामने एक लंबी यात्रा थी।

     

    द्वारका बहुत दूर थी।

     

    सुदामा ने कभी इतनी लंबी यात्रा अकेले नहीं की थी। लेकिन इस बार उसके मन में एक ऐसी शक्ति थी, जो उसके पैरों को आगे बढ़ाती जा रही थी।

     

    वह शक्ति थी—

     

    अपने मित्र कृष्ण से मिलने की इच्छा।

     

    चलते-चलते उसे गुरुकुल की बातें याद आने लगीं।

     

    उसे याद आया जब वह पहली बार आश्रम पहुँचा था।

     

    वह कितना चुप और संकोची था।

     

    उसे किसी से बात करने की आदत नहीं थी।

     

    तभी कृष्ण उसके पास आए थे और पूछा था—

     

    “तुम नए आए हो?”

     

    सुदामा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    “कृष्ण…” उसने धीरे से कहा।

     

    उसका मन जैसे वर्षों पीछे चला गया।

     

    उसे याद आया कि कृष्ण कैसे छोटी-छोटी बातों में भी खुशी ढूँढ लेते थे।

     

    जब वह परेशान होता, कृष्ण उसे हँसा देते।

     

    जब उसे डर लगता, कृष्ण उसका हाथ पकड़ लेते।

     

    और जब वह स्वयं को दूसरों से छोटा समझता, कृष्ण उसे समझाते—

     

    “मित्रता में कोई बड़ा या छोटा नहीं होता।”

     

    सुदामा की आँखें हल्की नम हो गईं।

     

    वह सोचने लगा—

     

    क्या कृष्ण आज भी वैसे ही होंगे?

     

    फिर उसने स्वयं से कहा—

     

    “कृष्ण बदल भी गए होंगे, तो क्या हुआ? मैं उनसे मिलने जा रहा हूँ।”

     

    रास्ता आसान नहीं था।

     

    दिन चढ़ते ही धूप तेज हो गई।

     

    सुदामा कई कोस तक चलता रहा।

     

    उसके पास यात्रा के लिए अधिक भोजन नहीं था।

     

    कभी वह किसी पेड़ की छाया में बैठ जाता और कुछ देर आराम करता।

     

    फिर उठकर चल पड़ता।

     

    एक दोपहर वह एक छोटे से गाँव के पास पहुँचा।

     

    वहाँ एक कुआँ था।

     

    सुदामा ने पानी पिया और वहीं कुछ देर बैठ गया।

     

    कुछ लोग उसके पास आए।

     

    उनमें से एक व्यक्ति ने पूछा,

     

    “बाबा, आप कहाँ जा रहे हैं?”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “द्वारका।”

     

    वह व्यक्ति हैरान हुआ।

     

    “द्वारका? इतनी दूर?”

     

    सुदामा मुस्कुराया।

     

    “हाँ।”

     

    “वहाँ किससे मिलने जा रहे हैं?”

     

    सुदामा कुछ क्षण चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “अपने मित्र से।”

     

    उस व्यक्ति ने पूछा,

     

    “कौन है आपका मित्र?”

     

    सुदामा ने शांत स्वर में कहा,

     

    “कृष्ण।”

     

    कुछ लोगों ने एक-दूसरे की ओर देखा।

     

    एक व्यक्ति मुस्कुराते हुए बोला,

     

    “हमारे द्वारकाधीश श्री कृष्ण?”

     

    सुदामा ने सिर हिला दिया।

     

    कुछ लोग हँस पड़े।

     

    “आप उनसे मिलने जा रहे हैं?”

     

    सुदामा ने बिना बुरा माने कहा,

     

    “हाँ।”

     

    एक वृद्ध व्यक्ति ने पूछा,

     

    “और वह आपको पहचानेंगे?”

     

    यह प्रश्न सुनकर सुदामा कुछ क्षण चुप हो गया।

     

    फिर उसने कहा,

     

    “यह मुझे नहीं पता।”

     

    लोगों की हँसी धीरे-धीरे शांत हो गई।

     

    सुदामा आगे बोला,

     

    “लेकिन मैं उन्हें पहचानता हूँ।”

     

    उसके शब्दों में इतना विश्वास था कि कोई आगे कुछ नहीं कह पाया।

     

    कुछ देर आराम करने के बाद वह फिर चल पड़ा।

     

    लेकिन अब उसके मन में वही प्रश्न बार-बार आने लगा—

     

    क्या कृष्ण मुझे पहचानेंगे?

     

    उसने अपने साधारण कपड़ों की ओर देखा।

     

    उसके पैरों में धूल लगी हुई थी।

     

    उसके कंधे पर एक पुराना सा थैला था।

     

    उसने सोचा—

     

    “द्वारका के लोग मुझे देखकर क्या सोचेंगे?”

     

    फिर उसने अपनी छोटी पोटली को छुआ।

     

    और उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    “मैं वहाँ किसी को प्रभावित करने नहीं जा रहा।”

     

    उसने मन ही मन कहा,

     

    “मैं अपने मित्र से मिलने जा रहा हूँ।”

     

    यात्रा के कई दिन बीत गए।

     

    सुदामा लगातार आगे बढ़ता रहा।

     

    कभी किसी गाँव में रात बिताता।

     

    कभी किसी पेड़ के नीचे आराम करता।

     

    कभी रास्ते में मिलने वाले लोगों से द्वारका का रास्ता पूछता।

     

    हर दिन उसके पैरों की थकान बढ़ती जाती।

     

    लेकिन हर दिन कृष्ण से मिलने की इच्छा भी और मजबूत होती जाती।

     

    एक शाम वह एक नदी के किनारे बैठा था।

     

    सूरज धीरे-धीरे डूब रहा था।

     

    आकाश का रंग बदल रहा था।

     

    सुदामा ने नदी के पानी में अपना चेहरा देखा।

     

    वह पहले जैसा नहीं था।

     

    बालों में सफेदी आ चुकी थी।

     

    चेहरे पर समय की लकीरें थीं।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “कृष्ण, अगर तुम मुझे देखोगे तो क्या पहचान पाओगे?”

     

    अचानक उसे वर्षों पुरानी बात याद आ गई।

     

    गुरुकुल से विदा होते समय उसने कृष्ण से पूछा था—

     

    “अगर मैं कभी तुम्हारे पास आया तो तुम मुझे पहचानोगे?”

     

    और कृष्ण ने कहा था—

     

    “सच्चे मित्र की पहचान चेहरे से नहीं, दिल से होती है।”

     

    सुदामा की आँखें भर आईं।

     

    उसने सिर उठाकर आसमान की ओर देखा।

     

    “मैं तुम्हें याद दिलाने नहीं आ रहा, कृष्ण,” उसने कहा।

     

    “मैं बस यह देखने आ रहा हूँ कि हमारी मित्रता आज भी वैसी ही है या नहीं।”

     

    अगले दिन यात्रा फिर शुरू हुई।

     

    अब रास्ते में लोग अधिक दिखाई देने लगे।

     

    कुछ व्यापारी द्वारका की ओर जा रहे थे।

     

    सुदामा उनके साथ कुछ दूर तक चलता रहा।

     

    एक व्यापारी ने उससे पूछा,

     

    “आप अकेले कहाँ जा रहे हैं?”

     

    सुदामा ने फिर वही उत्तर दिया,

     

    “द्वारका।”

     

    “काम से?”

     

    “मित्र से मिलने।”

     

    “कौन मित्र?”

     

    “कृष्ण।”

     

    इस बार व्यापारी हँसा नहीं।

     

    उसने सुदामा को ध्यान से देखा।

     

    फिर पूछा,

     

    “क्या आप वास्तव में उन्हें जानते हैं?”

     

    सुदामा ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “एक समय था जब हम दोनों एक-दूसरे को रोज देखते थे।”

     

    व्यापारी कुछ क्षण चुप रहा।

     

    सुदामा की बातों में कोई दिखावा नहीं था।

     

    उसने कहा,

     

    “अगर यह सच है, तो आप बहुत भाग्यशाली हैं।”

     

    सुदामा ने उत्तर दिया,

     

    “सच्चा मित्र मिलना ही सबसे बड़ा सौभाग्य है।”

     

    यात्रा आगे बढ़ती रही।

     

    कुछ दिनों बाद सुदामा पहली बार एक ऊँची जगह पर पहुँचा, जहाँ से दूर तक फैली भूमि दिखाई देती थी।

     

    वह कुछ देर वहीं खड़ा रहा।

     

    एक यात्री ने उसकी ओर इशारा करते हुए कहा,

     

    “वहीं आगे द्वारका है।”

     

    सुदामा की साँस जैसे कुछ क्षणों के लिए रुक गई।

     

    उसने दूर देखा।

     

    उसके सामने वह नगरी थी, जहाँ उसका बचपन का मित्र रहता था।

     

    वर्षों की दूरी।

     

    अनेक यादें।

     

    अनगिनत प्रश्न।

     

    सब जैसे एक ही क्षण में उसके मन में उमड़ आए।

     

    उसके कदम अचानक भारी हो गए।

     

    अब तक वह लगातार कृष्ण से मिलने के लिए चल रहा था।

     

    लेकिन द्वारका को सामने देखकर उसके मन में संकोच लौट आया।

     

    “क्या मैं सचमुच अंदर जा पाऊँगा?”

     

    उसने अपने वस्त्रों की ओर देखा।

     

    फिर उस पोटली को छुआ, जिसमें चिवड़ा रखा था।

     

    उसे लगा जैसे उसकी छोटी सी भेंट उस विशाल नगरी के सामने बहुत साधारण है।

     

    वह कुछ क्षण वहीं खड़ा रहा।

     

    तभी उसके मन में कृष्ण की मुस्कान उभर आई।

     

    और उसे याद आया—

     

    “अगर यादें कम पड़ जाएँ, तो मुझे ढूँढने आ जाना।”

     

    सुदामा ने गहरी साँस ली।

     

    “मैं आ गया हूँ, मित्र।”

     

    वह धीरे-धीरे द्वारका की ओर बढ़ने लगा।

     

    जैसे-जैसे वह नगर के पास पहुँचता गया, उसकी आँखों में आश्चर्य बढ़ता गया।

     

    द्वारका बहुत सुंदर और विशाल थी।

     

    साफ रास्ते।

     

    भव्य भवन।

     

    चारों ओर लोगों की चहल-पहल।

     

    सुदामा ने ऐसा नगर पहले कभी नहीं देखा था।

     

    उसे एक क्षण के लिए लगा जैसे वह किसी दूसरे संसार में आ गया हो।

     

    लेकिन फिर उसने स्वयं को याद दिलाया—

     

    “इस नगर में कहीं मेरा मित्र कृष्ण रहता है।”

     

    वह आगे बढ़ता गया।

     

    लोग उसे देखकर अपने काम में व्यस्त रहते।

     

    किसी को नहीं पता था कि साधारण कपड़ों में चल रहा यह व्यक्ति वर्षों बाद द्वारका के राजा से मिलने आया है।

     

    आखिरकार सुदामा उस स्थान के पास पहुँचा जहाँ कृष्ण का महल था।

     

    महल के ऊँचे द्वार देखकर उसके कदम रुक गए।

     

    उसने कभी इतने बड़े महल की कल्पना भी नहीं की थी।

     

    वह द्वार के बाहर खड़ा होकर भीतर देखने लगा।

     

    अंदर पहरेदार थे।

     

    लोग आते-जाते दिखाई दे रहे थे।

     

    सुदामा ने अपने पुराने वस्त्र ठीक किए।

     

    उसने अपनी पोटली को संभाला।

     

    फिर धीरे-धीरे द्वार की ओर बढ़ा।

     

    लेकिन उसके मन में एक ही प्रश्न था—

     

    क्या इन विशाल द्वारों के पीछे रहने वाला द्वारकाधीश अब भी वही कृष्ण है, जो कभी जंगल में उसके साथ बारिश में भीगा था?

     

    वह पहरेदारों के सामने पहुँच गया।

     

    एक पहरेदार ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।

     

    “कौन हो तुम?”

     

    सुदामा के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।

     

    वर्षों बाद वह क्षण आ ही गया था।

     

    उसने शांत स्वर में कहा—

     

    “मेरा नाम सुदामा है।”

     

    पहरेदार ने पूछा,

     

    “और तुम यहाँ किससे मिलने आए हो?”

     

    सुदामा ने महल की ओर देखा।

     

    उसकी आँखों में वर्षों पुरानी मित्रता की चमक थी।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “मैं अपने मित्र कृष्ण से मिलने आया हूँ।”

     

    पहरेदार कुछ क्षण उसे देखता रहा।

     

    और यहीं से शुरू होने वाला था…

     

    • वर्षों बाद दो मित्रों के मिलन का सबसे भावुक प्रसंग।
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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • सुदामा का संघर्ष और कृष्ण की याद

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

    अध्याय 6 — सुदामा का संघर्ष और कृष्ण की याद

     

    गुरुकुल से विदा हुए कई वर्ष बीत चुके थे।

     

    समय ने कृष्ण और सुदामा दोनों के जीवन को अलग-अलग दिशाओं में पहुँचा दिया था। बचपन में जो दो मित्र एक ही पेड़ के नीचे बैठकर भोजन बाँटते थे, आज उनके जीवन की परिस्थितियाँ बिल्कुल अलग थीं।

     

    सुदामा अपने गाँव में ही रहने लगा था।

     

    उसने अपने गुरुकुल की शिक्षा को कभी भुलाया नहीं। वह बच्चों को पढ़ाता, लोगों को अच्छी बातें समझाता और जो कुछ जानता था, उसे दूसरों के साथ बाँट देता था। गाँव के लोग उसका सम्मान करते थे, क्योंकि सुदामा का मन बहुत साफ था।

     

    लेकिन सम्मान से घर का चूल्हा नहीं जलता।

     

    समय बीतने के साथ सुदामा का जीवन कठिन होता चला गया।

     

    उसके पास धन नहीं था।

     

    एक छोटा सा घर था, जिसकी छत बरसात में कई जगह से टपकती थी। घर में जरूरत की चीजें भी बहुत कम थीं। फिर भी सुदामा ने कभी किसी से शिकायत नहीं की।

     

    वह अक्सर कहता था,

     

    “जिसके पास संतोष है, वह कभी पूरी तरह गरीब नहीं होता।”

     

    लेकिन जीवन की कठिनाइयाँ केवल संतोष से हमेशा आसान नहीं होतीं।

     

    धीरे-धीरे सुदामा का परिवार बढ़ा। घर की जिम्मेदारियाँ भी बढ़ने लगीं। अब केवल अपने लिए नहीं, बल्कि अपने परिवार के लिए भी सोचना पड़ता था।

     

    एक दिन सुदामा की पत्नी ने घर में रखे मिट्टी के बर्तनों को देखा।

     

    एक बर्तन लगभग खाली था।

     

    दूसरे में बस थोड़े से अनाज के दाने बचे थे।

     

    वह कुछ देर तक चुप रही।

     

    सुदामा घर के बाहर बैठा था और बच्चों को कुछ पढ़ा रहा था।

     

    बच्चे चले गए तो वह अंदर आया।

     

    पत्नी ने उसे देखा और पूछा,

     

    “आज बच्चों को क्या पढ़ा रहे थे?”

     

    सुदामा मुस्कुराया।

     

    “सच्चाई और धैर्य के बारे में।”

     

    पत्नी ने धीमी आवाज में कहा,

     

    “और क्या धैर्य से भूख भी शांत हो जाती है?”

     

    सुदामा का चेहरा शांत हो गया।

     

    वह समझ गया कि उसकी पत्नी क्या कहना चाहती है।

     

    कुछ क्षणों तक घर में चुप्पी रही।

     

    फिर सुदामा ने कहा,

     

    “मैं जानता हूँ कि हमारे दिन कठिन चल रहे हैं।”

     

    पत्नी ने तुरंत कहा,

     

    “मैं आपसे शिकायत नहीं कर रही।”

     

    सुदामा ने उसकी ओर देखा।

     

    “तो फिर तुम्हारी आँखों में चिंता क्यों है?”

     

    पत्नी की आँखें भर आईं।

     

    “क्योंकि मैं आपको परेशान देखती हूँ।”

     

    सुदामा कुछ कह नहीं पाया।

     

    वह जानता था कि उसके पास अपनी पत्नी को देने के लिए बहुत कम था।

     

    फिर भी वह हर दिन कोशिश करता था कि उसके चेहरे पर निराशा न दिखाई दे।

     

    पत्नी ने धीरे से कहा,

     

    “आपके गुरुकुल के मित्र कृष्ण…”

     

    सुदामा अचानक शांत हो गया।

     

    कृष्ण का नाम सुनते ही जैसे उसके सामने वर्षों पुरानी यादें आ गईं।

     

    गुरुकुल का आँगन।

     

    पेड़ों के नीचे बैठा कृष्ण।

     

    उनकी मुस्कान।

     

    जंगल की बारिश।

     

    दोनों का साथ भोजन बाँटना।

     

    विदाई के समय कृष्ण का कहना—

     

    “अगर तुम्हें कभी लगे कि तुम अकेले हो, तो यह मत सोचना कि मैं बहुत दूर हूँ।”

     

    सुदामा की आँखें नम हो गईं।

     

    उसकी पत्नी ने पूछा,

     

    “आप उन्हें याद करते हैं?”

     

    सुदामा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

     

    “हर सच्चे मित्र को उसका मित्र याद रहता है।”

     

    पत्नी ने धीरे से कहा,

     

    “तो फिर आप उनसे मिलने क्यों नहीं जाते?”

     

    सुदामा ने तुरंत उसकी ओर देखा।

     

    “कृष्ण से?”

     

    पत्नी ने सिर हिला दिया।

     

    “हाँ।”

     

    सुदामा कुछ क्षण तक चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “इतने वर्षों बाद?”

     

    “तो क्या हुआ?”

     

    “उनका जीवन अब बहुत अलग होगा।”

     

    पत्नी ने पूछा,

     

    “क्या मित्रता परिस्थितियाँ देखकर बदल जाती है?”

     

    सुदामा के पास इस प्रश्न का उत्तर था।

     

    लेकिन वह बोल नहीं पाया।

     

    पत्नी आगे बोली,

     

    “आपने मुझे कितनी बार बताया है कि आपके मित्र कृष्ण आपको अपने बराबर मानते थे। फिर आज आप उनके पास जाने से क्यों डर रहे हैं?”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “मैं उनसे कुछ माँगने नहीं जा सकता।”

     

    पत्नी ने शांत स्वर में कहा,

     

    “किसने कहा कि आपको कुछ माँगना है?”

     

    “लेकिन अगर मैं इस समय उनके पास जाऊँगा, तो उन्हें लगेगा कि मैं किसी जरूरत के कारण आया हूँ।”

     

    पत्नी ने कहा,

     

    “तो क्या जरूरत के समय अपने मित्र से मिलना गलत है?”

     

    सुदामा ने सिर झुका लिया।

     

    उसे कृष्ण से मिलने की इच्छा तो हमेशा से थी।

     

    लेकिन वर्षों की दूरी ने उसके मन में संकोच भर दिया था।

     

    वह सोचने लगा—

     

    क्या कृष्ण मुझे पहचानेंगे?

     

    क्या वे वैसे ही मुस्कुराएँगे?

     

    क्या वे मुझे देखकर खुश होंगे?

     

    फिर उसके मन में एक और विचार आया।

     

    अगर मैं उनके सामने अपने साधारण वस्त्रों में खड़ा हुआ तो?

     

    यह सोचकर सुदामा स्वयं को ही समझाने लगा।

     

    “कृष्ण मेरे मित्र हैं। वह मुझे कभी धन या वस्त्रों से नहीं आँकेंगे।”

     

    लेकिन फिर भी उसका मन उसे रोक रहा था।

     

    उस रात सुदामा देर तक सो नहीं सका।

     

    वह घर के बाहर बैठा आसमान की ओर देख रहा था।

     

    उसे याद आया कि गुरुकुल में भी वह और कृष्ण कई रातों में इसी तरह तारों को देखते थे।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “कृष्ण… क्या तुम्हें भी कभी मेरी याद आती होगी?”

     

    हवा हल्के से चली।

     

    सुदामा के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आ गई।

     

    उसे लगा जैसे वर्षों की दूरी अचानक कम हो गई हो।

     

    अगले दिन भी जीवन वैसे ही चलता रहा।

     

    सुदामा सुबह उठा।

     

    कुछ बच्चों को पढ़ाया।

     

    फिर गाँव के एक वृद्ध व्यक्ति की सहायता की।

     

    शाम को घर लौटा।

     

    लेकिन घर का वातावरण देखकर उसका मन भारी हो गया।

     

    उसकी पत्नी चुप बैठी थी।

     

    बच्चे भी शांत थे।

     

    सुदामा ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    पत्नी ने धीरे से कहा,

     

    “आज घर में जो थोड़ा सा अनाज था, वह भी समाप्त हो गया।”

     

    सुदामा के कदम रुक गए।

     

    उसने चारों ओर देखा।

     

    घर में सचमुच बहुत कम चीजें बची थीं।

     

    उस क्षण उसके मन में दुख आया।

     

    अपने लिए नहीं।

     

    अपने परिवार के लिए।

     

    वह बाहर जाकर बैठ गया।

     

    उसकी पत्नी उसके पास आई।

     

    “आप चिंता मत कीजिए।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “कैसे न करूँ?”

     

    पत्नी ने पहली बार उसके सामने अपनी बात स्पष्ट रूप से रखी।

     

    “कृष्ण से मिलने जाइए।”

     

    सुदामा ने सिर हिलाया।

     

    “मैं उनके पास सहायता माँगने नहीं जाऊँगा।”

     

    पत्नी ने कहा,

     

    “तो सहायता मत माँगिए। बस अपने मित्र से मिल आइए।”

     

    सुदामा ने उसकी ओर देखा।

     

    पत्नी बोली,

     

    “क्या मित्र से मिलने के लिए कोई कारण चाहिए?”

     

    यह बात सुदामा के हृदय में उतर गई।

     

    सच ही तो था।

     

    वह कृष्ण के पास धन माँगने नहीं जाना चाहता था।

     

    उसे बस अपने मित्र से मिलना था।

     

    उसे देखना था।

     

    उनसे बातें करनी थीं।

     

    वर्षों से मन में जमा बातें कहनी थीं।

     

    सुदामा ने धीरे से कहा,

     

    “लेकिन मैं उनके पास खाली हाथ कैसे जाऊँ?”

     

    पत्नी ने कुछ क्षण सोचा।

     

    फिर वह घर के अंदर गई।

     

    वहाँ उसने बहुत खोजा।

     

    कुछ देर बाद वह एक छोटी सी पोटली लेकर आई।

     

    उसमें थोड़ा सा चिवड़ा था।

     

    बहुत साधारण।

     

    बहुत कम।

     

    लेकिन उसके पास देने के लिए वही सबसे कीमती चीज थी।

     

    पत्नी ने पोटली सुदामा की ओर बढ़ाई।

     

    “इसे अपने मित्र के लिए ले जाइए।”

     

    सुदामा ने पोटली को देखा।

     

    उसकी आँखें भर आईं।

     

    उसे गुरुकुल का समय याद आ गया।

     

    जब वह और कृष्ण थोड़े से दाने भी बाँटकर खा लेते थे।

     

    उसने पोटली अपने हाथों में ली।

     

    “यह बहुत कम है।”

     

    पत्नी मुस्कुराई।

     

    “प्रेम में दिया गया थोड़ा भी बहुत होता है।”

     

    सुदामा के मन में जैसे कोई पुरानी आवाज गूँज उठी।

     

    “जो चीज प्रेम से बाँटी जाए, वह कभी कम नहीं होती।”

     

    यह बात कृष्ण ने उससे वर्षों पहले कही थी।

     

    सुदामा ने पोटली को अपने सीने से लगा लिया।

     

    अब उसका मन दृढ़ होने लगा था।

     

    उसने पत्नी से कहा,

     

    “मैं जाऊँगा।”

     

    पत्नी के चेहरे पर हल्की खुशी आ गई।

     

    “सच?”

     

    “हाँ। मैं कृष्ण से मिलने जाऊँगा।”

     

    पत्नी ने कहा,

     

    “और उनसे कहना कि उनका एक पुराना मित्र उन्हें कभी नहीं भूला।”

     

    सुदामा मुस्कुराया।

     

    “मुझे यह कहने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर उनकी मित्रता सच्ची है, तो शायद उन्हें पहले से पता होगा।”

     

    पत्नी ने उसे यात्रा के लिए तैयार होने में सहायता की।

     

    सुदामा के पास पहनने के लिए साधारण वस्त्र थे।

     

    उसने अपनी छोटी सी पोटली संभालकर रखी।

     

    सुबह होते ही उसने अपने परिवार को देखा।

     

    बच्चों के सिर पर हाथ रखा।

     

    पत्नी ने उसके चरण छुए और कहा,

     

    “जल्दी लौट आइए।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “मैं लौटूँगा।”

     

    फिर वह कुछ क्षण रुका।

     

    “लेकिन शायद पहले से अलग होकर।”

     

    पत्नी ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    सुदामा मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि इतने वर्षों बाद मैं अपने बचपन के मित्र से मिलने जा रहा हूँ।”

     

    उसके कदमों में एक अलग ही उत्साह था।

     

    रास्ता लंबा था।

     

    लेकिन इस बार सुदामा को यात्रा की कठिनाई महसूस नहीं हो रही थी।

     

    उसके मन में बस एक ही बात थी—

     

    कृष्ण।

     

    वह चलते-चलते पुराने दिनों को याद करता रहा।

     

    उसे याद आया कि कृष्ण कैसे हर कठिन परिस्थिति में मुस्कुरा देते थे।

     

    कैसे वे उसकी चिंता को हल्का कर देते थे।

     

    कैसे उन्होंने कहा था—

     

    “अगर यादें कम पड़ जाएँ, तो मुझे ढूँढने आ जाना।”

     

    सुदामा ने मुस्कुराकर आसमान की ओर देखा।

     

    “कृष्ण, मैं तुम्हें ढूँढने आ रहा हूँ।”

     

    लेकिन उसे यह नहीं पता था कि वर्षों में कृष्ण का जीवन कितना बदल चुका है।

     

    जिस मित्र के साथ वह कभी जंगल में लकड़ियाँ इकट्ठा करता था…

     

    जिसके साथ वह एक पेड़ के नीचे बैठकर भोजन बाँटता था…

     

    आज वही कृष्ण एक महान राजा के रूप में द्वारका में रहते थे।

     

    सुदामा को नहीं पता था कि द्वारका कैसी होगी।

     

    वहाँ पहुँचने पर उसके साथ कैसा व्यवहार होगा।

     

    क्या महल के द्वारपाल उसे अंदर जाने देंगे?

     

    क्या कोई उसकी बात पर विश्वास करेगा कि वह स्वयं श्री कृष्ण का बचपन का मित्र है?

     

    उसके मन में हल्की चिंता फिर जागी।

     

    लेकिन उसने अपने कपड़ों के भीतर रखी चिवड़े की छोटी सी पोटली को छुआ।

     

    उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    “मैं राजा से मिलने नहीं जा रहा,” उसने मन ही मन कहा।

     

    “मैं अपने मित्र कृष्ण से मिलने जा रहा हूँ।”

     

    और इसी विश्वास के साथ…

     

    सुदामा ने द्वारका की ओर अपनी यात्रा जारी रखी।

     

    लेकिन उसके सामने अभी एक लंबा रास्ता था।

     

    एक ऐसा रास्ता, जहाँ हर कदम के साथ उसके मन में कृष्ण से मिलने की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी।

     

    उधर…

     

    बहुत दूर द्वारका में…

     

    कृष्ण अपने राजकार्य में व्यस्त थे।

     

    लेकिन कौन जानता था कि वर्षों पहले गुरुकुल में उनके साथ बैठकर भोजन बाँटने वाला उनका प्रिय मित्र…

     

    अब उनसे मिलने के लिए चल पड़ा है।

     

    और बहुत जल्द…

     

    दो पुराने मित्रों के बीच वर्षों की दूरी समाप्त होने वाली थी।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • Part 5 गुरुकुल से विदाई

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

    अध्याय 5 — गुरुकुल से विदाई और दो राहों का सफर

     

    समय किसी के लिए नहीं रुकता।

     

    गुरु सांदीपनि के आश्रम में बिताए हुए दिन कब बीत गए, कृष्ण और सुदामा को स्वयं भी पता नहीं चला। कभी जो दोनों बालक पहली बार आश्रम में मिले थे, अब वे युवावस्था की ओर बढ़ चुके थे।

     

    उनके पास यादों का एक पूरा संसार था।

     

    कभी साथ मिलकर नदी से जल लाना, कभी जंगल में लकड़ियाँ इकट्ठा करना, कभी गुरु माता के लिए काम करना, तो कभी रात को देर तक बैठकर जीवन और भविष्य के बारे में बातें करना।

     

    लेकिन अब उन दिनों के समाप्त होने का समय आ गया था।

     

    उस सुबह आश्रम का वातावरण कुछ अलग था।

     

    सभी शिष्य गुरु सांदीपनि के सामने एकत्र हुए थे। कई लोगों के चेहरों पर खुशी थी कि उनकी शिक्षा पूरी होने वाली है, लेकिन कुछ की आँखों में अपने आश्रम को छोड़ने का दुख भी था।

     

    कृष्ण और सुदामा एक-दूसरे के पास बैठे थे।

     

    सुदामा चुप था।

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा और धीरे से कहा, “आज तुम बहुत शांत हो।”

     

    सुदामा ने बिना उनकी ओर देखे कहा, “आज तुम भी बहुत ज्यादा बातें नहीं कर रहे।”

     

    कृष्ण हल्का सा मुस्कुराए।

     

    “तो तुम्हें पता है कि मैं भी समझ रहा हूँ।”

     

    सुदामा ने उनकी ओर देखा।

     

    “क्या?”

     

    “कि तुम्हारे मन में क्या चल रहा है।”

     

    सुदामा ने कुछ नहीं कहा।

     

    तभी गुरु सांदीपनि की आवाज गूँजी।

     

    “मेरे प्रिय शिष्यों।”

     

    सभी शांत हो गए।

     

    गुरु सांदीपनि ने एक-एक करके अपने सामने बैठे शिष्यों को देखा।

     

    “जब तुम इस आश्रम में आए थे, तब तुममें से अधिकांश बच्चे थे। तुम यहाँ ज्ञान पाने आए थे। लेकिन आज मैं तुम्हें देखकर केवल अपने शिष्य नहीं, बल्कि ऐसे मनुष्य देख रहा हूँ जो जीवन की राह पर चलने के लिए तैयार हैं।”

     

    सभी शिष्य ध्यान से उनकी बातें सुन रहे थे।

     

    “याद रखना, शिक्षा का अंत किसी आश्रम से विदा लेने पर नहीं होता। असली शिक्षा तो उसके बाद शुरू होती है, जब जीवन तुम्हारी परीक्षा लेता है।”

     

    सुदामा ने सिर झुका लिया।

     

    गुरु की बातें उसके मन को छू रही थीं।

     

    गुरु आगे बोले, “जीवन में तुम्हें सुख भी मिलेगा और दुख भी। सम्मान भी मिलेगा और अपमान भी। कभी तुम्हारे पास बहुत कुछ होगा और कभी बहुत कम। लेकिन किसी भी परिस्थिति को अपने मन से बड़ा मत होने देना।”

     

    फिर उन्होंने हाथ उठाकर सभी को आशीर्वाद दिया।

     

    “जाओ और अपने ज्ञान से केवल अपना नहीं, दूसरों का जीवन भी बेहतर बनाने का प्रयास करो।”

     

    शिष्यों ने एक साथ गुरु के चरणों में प्रणाम किया।

     

    अब विदाई का समय सचमुच आ चुका था।

     

    सभी शिष्य अपने-अपने सामान को समेटने लगे।

     

    किसी के पास अधिक सामान था, किसी के पास कम।

     

    सुदामा के पास हमेशा की तरह एक छोटा सा कपड़े का थैला था।

     

    वह उसे उठाकर कुछ देर तक देखता रहा।

     

    कृष्ण उसके पास आए।

     

    “चलो?”

     

    सुदामा ने धीरे से कहा, “इतनी जल्दी?”

     

    कृष्ण ने चारों ओर देखा।

     

    “समय जल्दी नहीं जा रहा, सुदामा। हम बस उसे रोक नहीं सकते।”

     

    सुदामा की आँखें नम हो गईं।

     

    “मैंने सोचा था कि यह दिन बहुत दूर है।”

     

    कृष्ण ने कहा, “मैंने भी।”

     

    दोनों कुछ देर तक उसी स्थान को देखते रहे जहाँ उन्होंने अपने जीवन के इतने वर्ष बिताए थे।

     

    फिर गुरु माता उनके पास आईं।

     

    उन्होंने सबसे पहले सुदामा को अपने पास बुलाया।

     

    सुदामा ने उनके चरण छुए।

     

    गुरु माता ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुम हमेशा शांत और सरल रहे हो, पुत्र। जीवन चाहे तुम्हें कितनी भी कठिनाइयाँ दे, अपने मन की सच्चाई मत खोना।”

     

    सुदामा की आँखें भर आईं।

     

    “माता, आपने मुझे माँ जैसा प्रेम दिया।”

     

    गुरु माता मुस्कुराईं।

     

    “तो फिर मुझे भूलना मत।”

     

    सुदामा ने तुरंत कहा, “कभी नहीं।”

     

    फिर कृष्ण उनके चरणों में झुके।

     

    गुरु माता ने उन्हें देखते हुए कहा, “और तुम…”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “मैं क्या, माता?”

     

    गुरु माता ने कहा, “तुम्हारी मुस्कान कभी खत्म नहीं होगी, यह मुझे पता है। लेकिन याद रखना, जहाँ भी जाओ, लोगों के जीवन में वही प्रेम बाँटना जो तुमने इस आश्रम में बाँटा है।”

     

    कृष्ण ने हाथ जोड़कर कहा, “आपका आशीर्वाद हमेशा मेरे साथ रहेगा।”

     

    गुरु माता ने दोनों मित्रों को एक साथ देखा।

     

    उनकी आँखों में भी भावनाएँ थीं।

     

    “तुम दोनों की मित्रता ऐसी ही बनी रहे।”

     

    सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “यह तो बनी ही रहेगी।”

     

    लेकिन अब सबसे कठिन क्षण आने वाला था।

     

    दोनों को अलग-अलग दिशाओं में जाना था।

     

    सुदामा को अपने गाँव लौटना था।

     

    वहीं कृष्ण को अपने परिवार और अपने जीवन की राह की ओर बढ़ना था।

     

    आश्रम से बाहर निकलते ही रास्ता दो दिशाओं में बँट जाता था।

     

    एक रास्ता सुदामा के गाँव की ओर जाता था।

     

    दूसरा रास्ता कृष्ण की यात्रा की ओर।

     

    दोनों धीरे-धीरे उस मोड़ तक पहुँचे।

     

    सुदामा के कदम भारी होते जा रहे थे।

     

    वह बार-बार कुछ कहना चाहता, लेकिन शब्द उसके गले में ही रुक जाते।

     

    आखिरकार वह रुक गया।

     

    कृष्ण भी रुक गए।

     

    दोनों कुछ क्षण तक एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    सुदामा ने धीमी आवाज में कहा, “तो… अब हमें जाना होगा?”

     

    कृष्ण ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    सुदामा की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    उसने जल्दी से अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया।

     

    कृष्ण ने कहा, “सुदामा।”

     

    “हूँ?”

     

    “मुझसे नजरें क्यों चुरा रहे हो?”

     

    सुदामा ने आँसू पोंछते हुए कहा, “मैं नहीं चाहता कि तुम मुझे रोते हुए देखो।”

     

    कृष्ण उसके पास आए।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे हँसते हुए याद रखो।”

     

    कृष्ण की मुस्कान हल्की हो गई।

     

    “मैं तुम्हें वैसे ही याद रखूँगा जैसे तुम हो।”

     

    सुदामा की आँखें फिर भर आईं।

     

    उसने कहा, “कृष्ण, तुम कहाँ जाओगे? तुम्हारा जीवन कैसा होगा? क्या मैं कभी तुम्हें फिर देख पाऊँगा?”

     

    कृष्ण कुछ क्षण शांत रहे।

     

    फिर बोले, “जीवन हमें कहाँ ले जाएगा, यह मैं अभी तुम्हें नहीं बता सकता। लेकिन एक बात जानता हूँ।”

     

    “क्या?”

     

    “अगर तुम्हारे मन में मेरे लिए सच्ची मित्रता रहेगी, तो तुम मुझे कभी खो नहीं सकते।”

     

    सुदामा ने कहा, “लेकिन मैं तुम्हें ढूँढूँगा कहाँ?”

     

    कृष्ण ने अपने हृदय पर हाथ रखा।

     

    “यहाँ।”

     

    सुदामा की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “कृष्ण…”

     

    कृष्ण ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “और जब भी जीवन में तुम्हें लगे कि तुम अकेले हो, तो यह मत सोचना कि मैं बहुत दूर हूँ।”

     

    सुदामा ने कहा, “तुम वादा करो कि अगर मैं तुम्हारे पास कभी आऊँ तो तुम मुझे पहचानोगे।”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा, “क्या तुम सच में सोचते हो कि मैं अपने मित्र को नहीं पहचानूँगा?”

     

    सुदामा चुप हो गया।

     

    कृष्ण ने आगे कहा, “समय हमारे वस्त्र बदल सकता है, हमारे बाल बदल सकता है, हमारे घर और जीवन बदल सकता है। लेकिन सच्चे मित्र की पहचान चेहरे से नहीं, दिल से होती है।”

     

    सुदामा ने कृष्ण का हाथ पकड़ लिया।

     

    “तो फिर एक बात और वादा करो।”

     

    “कहो।”

     

    “हमारी मित्रता कभी नहीं बदलेगी।”

     

    कृष्ण ने उसके हाथ को कसकर पकड़ लिया।

     

    “मित्रता बदलने वाली चीज नहीं होती, सुदामा। अगर वह बदल जाए तो शायद वह सच्ची मित्रता थी ही नहीं।”

     

    दोनों कुछ देर तक चुप रहे।

     

    फिर कृष्ण ने धीरे से कहा, “अब चलो।”

     

    सुदामा का मन नहीं मान रहा था।

     

    लेकिन वह जानता था कि अब रुकना संभव नहीं था।

     

    उसने कृष्ण को गले लगा लिया।

     

    दोनों मित्र कुछ क्षण तक वैसे ही खड़े रहे।

     

    उनके बीच कोई शब्द नहीं थे।

     

    लेकिन उस मौन में वर्षों की यादें थीं।

     

    आश्रम था।

     

    गुरु माता थीं।

     

    जंगल की बारिश थी।

     

    साथ बाँटा हुआ भोजन था।

     

    हँसी थी।

     

    छोटी-छोटी बहसें थीं।

     

    और एक ऐसी मित्रता थी, जिसे दोनों अपने जीवन की सबसे कीमती चीज मानते थे।

     

    कुछ देर बाद दोनों अलग हुए।

     

    सुदामा ने आँसू पोंछे।

     

    “फिर मिलेंगे।”

     

    कृष्ण ने कहा, “जरूर मिलेंगे।”

     

    सुदामा ने एक बार फिर कृष्ण को देखा।

     

    फिर अपने रास्ते पर चल पड़ा।

     

    कृष्ण भी दूसरी दिशा में आगे बढ़ गए।

     

    सुदामा कुछ दूर चला।

     

    लेकिन उसके कदम रुक गए।

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    कृष्ण भी पीछे मुड़कर उसे देख रहे थे।

     

    दोनों मुस्कुराए।

     

    फिर धीरे-धीरे वे अपनी-अपनी राहों पर आगे बढ़ गए।

     

    समय बीतने लगा।

     

    सुदामा अपने गाँव पहुँचा।

     

    उसके माता-पिता उसे देखकर बहुत खुश हुए।

     

    वह पहले से अधिक समझदार हो चुका था।

     

    उसने अपने घर के साधारण जीवन को अपनाया।

     

    वह लोगों को ज्ञान देता, बच्चों को पढ़ाता और अपने जीवन को सरलता से जीने का प्रयास करता।

     

    लेकिन हर शाम…

     

    जब वह अकेला बैठता…

     

    उसे कृष्ण की याद आती।

     

    कभी किसी बात पर मुस्कान आ जाती।

     

    कभी आँखें नम हो जातीं।

     

    वह सोचता—

     

    कृष्ण कहाँ होंगे?

     

    क्या वह मुझे याद करते होंगे?

     

    उधर कृष्ण का जीवन भी तेजी से बदल रहा था।

     

    उनके सामने बड़ी जिम्मेदारियाँ आने वाली थीं।

     

    जीवन उन्हें कई नए संघर्षों की ओर ले जाने वाला था।

     

    लेकिन समय की तेज रफ्तार में भी कुछ रिश्ते पीछे नहीं छूटते।

     

    कृष्ण के मन में भी सुदामा की याद हमेशा बनी रही।

     

    वर्ष बीत गए।

     

    दोनों मित्र अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ते गए।

     

    लेकिन उनके जीवन एक जैसे नहीं थे।

     

    एक ओर कृष्ण का जीवन धीरे-धीरे महान जिम्मेदारियों और राजसी वैभव की ओर बढ़ रहा था।

     

    दूसरी ओर सुदामा का जीवन सादगी और संघर्षों से भरा था।

     

    फिर भी…

     

    एक समय था जब दोनों के बीच कोई अंतर नहीं था।

     

    वे बस दो मित्र थे।

     

    दो बालक।

     

    जो बारिश में भीगते हुए साथ खड़े रहते थे।

     

    जो थोड़ा सा भोजन भी बाँटकर खाते थे।

     

    जो एक-दूसरे के बिना अपने दिन की कल्पना भी नहीं करते थे।

     

    लेकिन अब जीवन उन्हें एक ऐसी दूरी तक ले जा चुका था, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

     

    और बहुत जल्द…

     

    वह समय आने वाला था जब सुदामा का जीवन कठिनाइयों से भर जाएगा।

     

    उसके सामने ऐसी परिस्थितियाँ आएँगी, जब उसे अपने पुराने मित्र कृष्ण की याद पहले से भी अधिक आएगी।

     

    लेकिन क्या सुदामा इतने वर्षों बाद कृष्ण के पास जा पाएगा?

     

    क्या वह अपने पुराने मित्र को वैसे ही पा सकेगा?

     

    या समय और परिस्थितियाँ उनके बीच इतनी दूरी बना चुकी होंगी कि मिलना केवल एक सपना रह जाएगा?

     

    इन सवालों का जवाब अभी भविष्य के पास था।

     

    लेकिन एक बात निश्चित थी—

     

    उनकी मित्रता की कहानी अभी समाप्त नहीं हुई थी।

     

    असल में…

     

    उनकी मित्रता की सबसे बड़ी परीक्षा अब शुरू होने वाली थी।

     

    क्रमशः…

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    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • Part 4 गुरुकुल की अंतिम परीक्षा

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    श्री कृष्ण और सुदामा — अटूट मित्रता की कहानी

    अध्याय 4 — गुरुकुल की अंतिम परीक्षा और बिछड़ने का डर

     

    समय धीरे-धीरे बीत रहा था।

     

    गुरु सांदीपनि के आश्रम में आए हुए कृष्ण और सुदामा को कई वर्ष बीत चुके थे। जो दो बालक पहली बार एक-दूसरे से मिले थे, अब बड़े हो रहे थे। उनकी समझ बढ़ चुकी थी, उनके विचार बदल रहे थे, लेकिन एक चीज बिल्कुल नहीं बदली थी—उनकी मित्रता।

     

    हर सुबह दोनों साथ उठते।

     

    नदी तक जाते।

     

    आश्रम के कार्य करते।

     

    गुरु के सामने बैठकर शिक्षा प्राप्त करते।

     

    और शाम होते ही दिनभर की बातें करते हुए एक-दूसरे के पास बैठ जाते।

     

    लेकिन अब आश्रम का वातावरण थोड़ा बदलने लगा था।

     

    कई शिष्यों की शिक्षा पूरी हो चुकी थी और वे अपने घर लौटने लगे थे।

     

    जब भी कोई शिष्य गुरु सांदीपनि और गुरु माता का आशीर्वाद लेकर आश्रम से विदा होता, सुदामा उसे चुपचाप देखता रहता।

     

    एक दिन कृष्ण ने उससे पूछा, “तुम इतने शांत क्यों हो?”

     

    सुदामा ने कहा, “कुछ नहीं।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “तुम्हारा यह ‘कुछ नहीं’ हमेशा बहुत कुछ होता है।”

     

    सुदामा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “तुम्हें सब पता चल जाता है।”

     

    “क्योंकि तुम मेरे मित्र हो।”

     

    कुछ क्षण दोनों चुप रहे।

     

    फिर सुदामा ने सामने जाते हुए एक शिष्य को देखा और धीरे से कहा, “कृष्ण, एक दिन हमें भी जाना होगा ना?”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

     

    सुदामा आगे बोला, “एक दिन हमारी शिक्षा भी पूरी होगी। फिर तुम अपने घर चले जाओगे और मैं अपने घर।”

     

    कृष्ण ने कुछ क्षण तक कोई उत्तर नहीं दिया।

     

    सुदामा ने कहा, “तुम्हें कभी इस बात का डर नहीं लगता?”

     

    कृष्ण ने शांत स्वर में कहा, “डर लगता है।”

     

    सुदामा ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा।

     

    “तुम्हें?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “मैं भी तुम्हारी तरह ही हूँ।”

     

    सुदामा हँस पड़ा।

     

    “नहीं, तुम मेरी तरह बिल्कुल नहीं हो।”

     

    कृष्ण ने कहा, “ठीक है, लेकिन मित्र को खोने का डर मुझे भी होता है।”

     

    सुदामा का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “तो फिर क्या होगा?”

     

    कृष्ण ने पूछा, “किसका?”

     

    “हमारी मित्रता का।”

     

    कृष्ण ने आसमान की ओर देखते हुए कहा, “क्या तुम रोज सूरज को देखते हो?”

     

    “हाँ।”

     

    “और रात को?”

     

    “नहीं।”

     

    “फिर भी तुम्हें विश्वास होता है कि सुबह सूरज वापस आएगा?”

     

    सुदामा ने कहा, “हाँ।”

     

    कृष्ण बोले, “मित्रता भी ऐसी ही होती है। कभी-कभी जीवन की रात हमें अलग कर देती है, लेकिन सच्चा प्रेम फिर भी मन में बना रहता है।”

     

    सुदामा कुछ देर तक कृष्ण की बात सोचता रहा।

     

    उसने धीरे से कहा, “लेकिन मैं तुम्हें रोज देखना चाहता हूँ।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “तो मेरी यादों को अपने पास रखना।”

     

    “और अगर यादें कम पड़ गईं तो?”

     

    “तो फिर मुझे ढूँढने आ जाना।”

     

    सुदामा ने पहली बार खुलकर हँसते हुए कहा, “तुम्हें ढूँढना आसान होगा?”

     

    कृष्ण ने आँखों में शरारत भरकर कहा, “नहीं, लेकिन तुम मेरे मित्र हो। तुम्हें रास्ता मिल जाएगा।”

     

    दोनों की हँसी आश्रम के शांत वातावरण में फैल गई।

     

    लेकिन सुदामा के मन में बिछड़ने का डर फिर भी कहीं न कहीं बना रहा।

     

    कुछ दिनों बाद गुरु सांदीपनि ने सभी बड़े शिष्यों को अपने पास बुलाया।

     

    उनके चेहरे पर गंभीरता थी।

     

    कृष्ण और सुदामा एक-दूसरे के पास बैठ गए।

     

    गुरु ने कहा, “तुम सभी कई वर्षों से इस आश्रम में शिक्षा प्राप्त कर रहे हो। अब समय आ गया है कि तुम अपनी शिक्षा के अंतिम चरण में प्रवेश करो।”

     

    सभी शिष्य ध्यान से सुनने लगे।

     

    “शिक्षा केवल शास्त्र पढ़ लेने से पूरी नहीं होती। मनुष्य को अपने ज्ञान की परीक्षा जीवन में देनी पड़ती है।”

     

    एक शिष्य ने पूछा, “गुरुदेव, क्या हमें कोई परीक्षा देनी होगी?”

     

    गुरु सांदीपनि ने कहा, “हाँ। लेकिन यह परीक्षा केवल पुस्तकों की नहीं होगी।”

     

    सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    कृष्ण मुस्कुरा रहे थे, जैसे उन्हें पहले से पता हो कि कुछ रोचक होने वाला है।

     

    गुरु सांदीपनि आगे बोले, “तुम सभी को अलग-अलग कार्य दिए जाएँगे। उन कार्यों के माध्यम से मैं देखूँगा कि तुमने यहाँ केवल ज्ञान सीखा है या जीवन को भी समझा है।”

     

    कुछ शिष्यों के चेहरे पर उत्साह था और कुछ चिंतित हो गए।

     

    सुदामा के मन में भी हल्की चिंता थी।

     

    उस रात वह देर तक सो नहीं सका।

     

    कृष्ण ने पूछा, “अब क्या सोच रहे हो?”

     

    सुदामा ने कहा, “परीक्षा के बारे में।”

     

    कृष्ण ने करवट बदलते हुए कहा, “तुम हर आने वाली बात से पहले ही डर क्यों जाते हो?”

     

    “क्योंकि मुझे सब कुछ सही करना है।”

     

    कृष्ण ने कहा, “हर समय सही होने की कोशिश करने वाला व्यक्ति सबसे ज्यादा परेशान रहता है।”

     

    सुदामा ने पूछा, “तो क्या गलतियाँ करनी चाहिए?”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “नहीं, लेकिन गलती के डर से काम करना छोड़ भी नहीं देना चाहिए।”

     

    सुदामा चुप हो गया।

     

    कुछ देर बाद कृष्ण ने कहा, “कल जो होगा, देखा जाएगा। आज आराम करो।”

     

    अगली सुबह सभी शिष्य गुरु सांदीपनि के सामने एकत्र हुए।

     

    गुरु ने एक-एक करके सभी को उनके कार्य बताए।

     

    कुछ को दूर गाँवों में जाकर लोगों की सहायता करनी थी।

     

    कुछ को कठिन विषयों पर अध्ययन करना था।

     

    कुछ को आश्रम की जिम्मेदारियाँ संभालनी थीं।

     

    फिर गुरु ने कृष्ण और सुदामा की ओर देखा।

     

    “तुम दोनों…”

     

    सुदामा का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “तुम दोनों को साथ में एक कार्य करना होगा।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर सुदामा की ओर देखा।

     

    सुदामा के चेहरे पर राहत आ गई।

     

    गुरु ने कहा, “तुम्हें तीन दिनों के लिए आश्रम से दूर एक गाँव जाना होगा। वहाँ के लोग पानी की कमी से परेशान हैं। पास की एक पुरानी जलधारा मिट्टी और पत्थरों से बंद हो गई है।”

     

    सुदामा ध्यान से सुन रहा था।

     

    गुरु ने आगे कहा, “तुम दोनों वहाँ जाकर लोगों की सहायता करोगे। लेकिन याद रखना, तुम्हें यह काम केवल अपनी शक्ति से नहीं, बल्कि लोगों को साथ लेकर करना होगा।”

     

    कृष्ण ने हाथ जोड़कर कहा, “जैसी आज्ञा, गुरुदेव।”

     

    दोनों उसी दिन यात्रा पर निकल पड़े।

     

    रास्ता लंबा था।

     

    कृष्ण पूरे रास्ते बातें करते रहे, लेकिन सुदामा इस बार कुछ ज्यादा ही चुप था।

     

    कुछ समय बाद कृष्ण ने पूछा, “अब क्या हुआ?”

     

    सुदामा ने कहा, “मुझे समझ नहीं आ रहा कि हम इतने बड़े काम को कैसे पूरा करेंगे।”

     

    कृष्ण ने कहा, “पहले गाँव पहुँचते हैं।”

     

    “लेकिन…”

     

    “सुदामा।”

     

    सुदामा चुप हो गया।

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “तुम भविष्य की चिंता करते-करते वर्तमान को थका देते हो।”

     

    सुदामा ने कहा, “और तुम वर्तमान में इतने खुश रहते हो कि कभी भविष्य की चिंता ही नहीं करते।”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “शायद इसीलिए हम मित्र हैं। तुम मुझे सावधान रखते हो और मैं तुम्हें मुस्कुराना सिखाता हूँ।”

     

    दोनों आगे बढ़ते गए।

     

    शाम तक वे उस गाँव में पहुँच गए।

     

    गाँव छोटा था।

     

    वहाँ के लोग परेशान दिखाई दे रहे थे।

     

    एक वृद्ध व्यक्ति ने उन्हें बताया कि पहले गाँव के पास एक छोटी जलधारा बहती थी, लेकिन कई महीनों पहले तेज बारिश और मिट्टी के बहाव से उसका रास्ता बंद हो गया।

     

    अब लोगों को बहुत दूर से पानी लाना पड़ता था।

     

    सुदामा ने जलधारा का रास्ता देखा।

     

    वहाँ बड़े-बड़े पत्थर और मिट्टी जमा थी।

     

    वह चिंतित हो गया।

     

    “यह काम बहुत कठिन है।”

     

    कृष्ण ने कहा, “तो कठिन काम शुरू करते हैं।”

     

    अगली सुबह दोनों गाँव वालों के साथ वहाँ पहुँचे।

     

    कृष्ण ने कहा, “अगर हम सब मिलकर काम करें, तो यह काम जल्दी पूरा हो सकता है।”

     

    कुछ लोग तैयार हो गए।

     

    कुछ ने कहा, “यह बहुत बड़ा काम है।”

     

    कुछ लोग निराश थे।

     

    सुदामा को लगा कि शायद यह कार्य पूरा नहीं होगा।

     

    लेकिन कृष्ण ने हार नहीं मानी।

     

    उन्होंने सबसे पहले स्वयं मिट्टी हटानी शुरू कर दी।

     

    उन्हें देखकर कुछ बच्चे भी आ गए।

     

    फिर कुछ युवक।

     

    फिर धीरे-धीरे गाँव के अन्य लोग भी जुड़ने लगे।

     

    सुदामा ने देखा कि कृष्ण केवल बातें नहीं कर रहे थे।

     

    वह सबसे पहले स्वयं काम कर रहे थे।

     

    सुदामा भी उनके साथ लग गया।

     

    पूरा दिन मिट्टी हटाने में निकल गया।

     

    शाम तक सब थक चुके थे।

     

    लेकिन जलधारा का रास्ता अभी पूरी तरह साफ नहीं हुआ था।

     

    सुदामा ने थके हुए स्वर में कहा, “शायद हमसे नहीं होगा।”

     

    कृष्ण ने कहा, “आज नहीं हुआ तो कल होगा।”

     

    “लेकिन तीन दिन में?”

     

    “तो तीन दिन तक पूरी कोशिश करेंगे।”

     

    दूसरे दिन सुबह सभी फिर जुट गए।

     

    इस बार काम पहले से तेज हुआ।

     

    कृष्ण और सुदामा ने लोगों को अलग-अलग काम बाँट दिए।

     

    कोई मिट्टी हटा रहा था।

     

    कोई पत्थर सरका रहा था।

     

    कोई रास्ता साफ कर रहा था।

     

    दोपहर तक अचानक मिट्टी के नीचे से पानी की एक छोटी धारा दिखाई देने लगी।

     

    सभी लोग उत्साहित हो गए।

     

    “पानी!”

     

    बच्चे खुशी से चिल्लाने लगे।

     

    लेकिन अभी रास्ता पूरी तरह खुला नहीं था।

     

    कृष्ण ने कहा, “रुकना मत।”

     

    सबने फिर काम शुरू कर दिया।

     

    कुछ देर बाद आखिरी बड़ा पत्थर हटाया गया।

     

    और उसके साथ ही पानी तेजी से बहने लगा।

     

    पूरा गाँव खुशी से भर गया।

     

    लोगों ने कृष्ण और सुदामा का धन्यवाद किया।

     

    लेकिन कृष्ण ने कहा, “हम दोनों ने नहीं किया। यह काम आप सबने मिलकर किया है।”

     

    सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    उसे समझ आया कि सच्चा नेतृत्व वही होता है जो दूसरों को अपनी शक्ति का एहसास करा दे।

     

    तीन दिन बाद दोनों आश्रम लौट आए।

     

    गुरु सांदीपनि ने उनसे पूछा, “कार्य पूरा हुआ?”

     

    कृष्ण ने कहा, “हाँ, गुरुदेव।”

     

    सुदामा ने पूरी घटना विस्तार से बताई।

     

    गुरु ध्यान से सुनते रहे।

     

    फिर उन्होंने कहा, “तुम दोनों ने अपनी परीक्षा में बहुत कुछ सीखा है।”

     

    सुदामा ने पूछा, “गुरुदेव, क्या हमारी शिक्षा अब पूरी हो गई?”

     

    गुरु सांदीपनि कुछ क्षण शांत रहे।

     

    फिर उन्होंने कहा, “अभी नहीं… लेकिन वह दिन अब दूर भी नहीं है।”

     

    सुदामा का मन अचानक भारी हो गया।

     

    वही बात…

     

    जिससे वह इतने दिनों से डर रहा था।

     

    गुरुकुल छोड़ना।

     

    कृष्ण से अलग होना।

     

    उस रात वह फिर से चुप बैठा था।

     

    कृष्ण उसके पास आए।

     

    “तुम फिर सोच रहे हो?”

     

    सुदामा ने कहा, “हाँ।”

     

    “बिछड़ने के बारे में?”

     

    सुदामा ने सिर हिला दिया।

     

    कृष्ण उसके पास बैठ गए।

     

    कुछ देर तक दोनों चुप रहे।

     

    फिर सुदामा ने कहा, “कृष्ण, अगर हमारे जीवन की राहें सच में अलग हो गईं तो?”

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा, “तो हमारी राहें अलग होंगी… हम नहीं।”

     

    सुदामा की आँखें भर आईं।

     

    “मुझसे वादा करो कि चाहे कुछ भी हो जाए, तुम मुझे कभी नहीं भूलोगे।”

     

    कृष्ण ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया।

     

    “सुदामा, मित्र को याद रखने के लिए वादा नहीं करना पड़ता। सच्चा मित्र मन में रहता है।”

     

    सुदामा ने कृष्ण का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    उसे नहीं पता था कि आने वाला समय उनकी परीक्षा सचमुच लेने वाला है।

     

    बहुत जल्द…

     

    गुरुकुल की शिक्षा पूरी होने वाली थी।

     

    और उसके बाद…

     

    दोनों मित्रों के सामने जीवन की दो अलग-अलग राहें खड़ी थीं।

     

    लेकिन उस रात…

     

    दोनों ने आसमान में चमकते तारों को देखा।

     

    और मन ही मन एक ही बात महसूस की—

     

    समय चाहे उन्हें कितनी भी दूर ले जाए, उनकी मित्रता की डोर कभी नहीं टूटेगी।

     

    क्रमशः…

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    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • Part 3 गुरु माता की आज्ञा

    पढ़ने का समय : 10 मिनट
    • अध्याय 3 — गुरु माता की आज्ञा और मित्रता की परीक्षा

     

    जंगल में बिताई उस रात के बाद कृष्ण और सुदामा की मित्रता पहले से भी अधिक गहरी हो गई थी।

     

    अब आश्रम के दूसरे शिष्य भी अक्सर उनकी दोस्ती की चर्चा करते थे। सभी जानते थे कि दोनों का स्वभाव अलग है, जीवन अलग है और सोचने का तरीका भी अलग है, लेकिन फिर भी दोनों हमेशा एक-दूसरे के साथ खड़े रहते हैं।

     

    सुदामा शांत था और कृष्ण चंचल।

     

    सुदामा किसी काम को शुरू करने से पहले कई बार सोचता था, जबकि कृष्ण मुस्कुराते हुए सबसे कठिन काम भी कर देते थे।

     

    लेकिन दोनों में एक बात समान थी—वे एक-दूसरे के लिए सच्चे मन से समर्पित थे।

     

    उस सुबह आश्रम में रोज की तरह काम चल रहा था। कुछ शिष्य नदी से जल भरकर ला रहे थे। कुछ पेड़ों के नीचे बैठकर पाठ याद कर रहे थे। कृष्ण और सुदामा आश्रम के आँगन की सफाई कर रहे थे।

     

    कृष्ण झाड़ू चलाते हुए धीरे-धीरे कोई धुन गुनगुना रहे थे।

     

    सुदामा ने कहा, “कृष्ण, तुम कोई काम बिना गाना गाए नहीं कर सकते क्या?”

     

    कृष्ण ने गंभीर चेहरा बनाकर कहा, “कर सकता हूँ।”

     

    सुदामा ने राहत की साँस ली।

     

    लेकिन अगले ही पल कृष्ण ने कहा, “लेकिन फिर काम इतना मजेदार नहीं रहेगा।”

     

    सुदामा मुस्कुरा दिया।

     

    “तुम्हारे लिए हर काम खेल ही है।”

     

    “और तुम्हारे लिए हर काम परीक्षा है।”

     

    “क्योंकि मैं जिम्मेदारी समझता हूँ।”

     

    कृष्ण ने हँसते हुए कहा, “और मैं खुशी समझता हूँ।”

     

    सुदामा ने झाड़ू एक तरफ रखते हुए कहा, “जिम्मेदारी और खुशी दोनों साथ हो सकती हैं।”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

     

    “तो तुम भी धीरे-धीरे मेरी तरह समझदार हो रहे हो।”

     

    “तुम्हारी तरह?”

     

    “हाँ।”

     

    सुदामा हँस पड़ा।

     

    “कृष्ण, तुम कभी-कभी खुद को बहुत महान समझते हो।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “कभी-कभी नहीं, सुदामा। हमेशा।”

     

    दोनों जोर से हँस पड़े।

     

    उसी समय गुरु माता वहाँ आईं।

     

    दोनों तुरंत शांत हो गए और हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हो गए।

     

    गुरु माता ने कहा, “तुम दोनों से एक काम है।”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा, “बताइए माता।”

     

    गुरु माता ने एक कपड़े की छोटी पोटली उनकी ओर बढ़ाई।

     

    “इसमें कुछ भोजन है। जंगल के उस पार रहने वाले एक वृद्ध साधु कई दिनों से अस्वस्थ हैं। मैंने उनके लिए यह भोजन तैयार किया है। तुम दोनों यह उनके पास पहुँचा आओ।”

     

    सुदामा ने पोटली हाथ में ली।

     

    “हम अभी चले जाते हैं, माता।”

     

    गुरु माता ने कहा, “ध्यान रखना, जंगल का रास्ता लंबा है। इस बार देर मत करना।”

     

    कृष्ण ने सुदामा की ओर देखकर आँख दबाई।

     

    सुदामा ने तुरंत कहा, “माता, मैं ध्यान रखूँगा।”

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा, “मतलब तुम मुझ पर ध्यान रखोगे।”

     

    दोनों ने गुरु माता का आशीर्वाद लिया और यात्रा पर निकल पड़े।

     

    सुबह का समय था।

     

    रास्ते में हल्की ठंडी हवा चल रही थी।

     

    सुदामा के हाथ में भोजन की पोटली थी और कृष्ण एक पतली लकड़ी हाथ में घुमाते हुए चल रहे थे।

     

    कुछ दूरी चलने के बाद कृष्ण ने पूछा, “सुदामा, तुम्हें पता है इस पोटली में क्या है?”

     

    सुदामा ने कहा, “नहीं।”

     

    कृष्ण ने कहा, “तो खोलकर देख लेते हैं।”

     

    सुदामा ने तुरंत पोटली को पीछे कर लिया।

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि यह हमारे लिए नहीं है।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “मैं सिर्फ देखने की बात कर रहा हूँ।”

     

    “तुम्हें मैं जानता हूँ।”

     

    कृष्ण ने हैरानी से पूछा, “क्या जानता हो?”

     

    “पहले तुम कहोगे सिर्फ देख लेते हैं, फिर कहोगे सिर्फ थोड़ा सा चख लेते हैं।”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “तुम मुझे गलत समझते हो।”

     

    सुदामा ने कहा, “नहीं, मैं तुम्हें बहुत अच्छी तरह समझता हूँ।”

     

    दोनों आगे बढ़ते रहे।

     

    जंगल में प्रवेश करते ही रास्ता थोड़ा कठिन हो गया।

     

    कुछ जगह पेड़ गिरे हुए थे। कहीं-कहीं घनी झाड़ियाँ थीं।

     

    लेकिन दोनों एक-दूसरे का साथ देते हुए आगे बढ़ते रहे।

     

    कुछ समय बाद कृष्ण ने कहा, “थोड़ी देर आराम कर लें?”

     

    सुदामा ने कहा, “हमारे पास समय कम है।”

     

    “थोड़ा सा आराम करने से समय नहीं रुक जाएगा।”

     

    “और चलते रहने से समय बढ़ भी नहीं जाएगा।”

     

    कृष्ण ने हँसते हुए कहा, “तुम्हारे साथ बहस करना बहुत कठिन है।”

     

    “तो मत किया करो।”

     

    “लेकिन तुम्हारे बिना किससे करूँ?”

     

    सुदामा कुछ कह नहीं पाया।

     

    उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    दोनों एक पेड़ के नीचे बैठ गए।

     

    सुदामा ने पोटली को अपने पास रख दिया।

     

    कृष्ण ने पोटली की ओर देखा।

     

    सुदामा ने तुरंत कहा, “कृष्ण!”

     

    कृष्ण ने दोनों हाथ ऊपर कर दिए।

     

    “मैंने कुछ नहीं किया।”

     

    सुदामा ने कहा, “तुम्हारी आँखें सब बता रही हैं।”

     

    “मेरी आँखें क्या कह रही हैं?”

     

    “कि तुम्हें भूख लगी है।”

     

    कृष्ण कुछ क्षण चुप रहे।

     

    फिर बोले, “थोड़ी सी।”

     

    सुदामा ने अपनी छोटी पोटली निकाली।

     

    उसमें कुछ सूखे दाने थे, जो वह सुबह अपने साथ लेकर आया था।

     

    उसने उन्हें कृष्ण की ओर बढ़ाया।

     

    “लो।”

     

    कृष्ण ने पूछा, “और तुम?”

     

    “हम दोनों बाँटकर खाएँगे।”

     

    कृष्ण ने कुछ दाने लिए और बाकी सुदामा की ओर बढ़ा दिए।

     

    “तुम भी।”

     

    सुदामा ने कहा, “मैंने तुमसे कहा था, ये कम हैं।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “जो चीज मित्र के साथ बाँटी जाए, वह कम नहीं लगती।”

     

    सुदामा को उनकी पुरानी बात याद आ गई।

     

    उसने कहा, “तुम यह बात पहले भी कह चुके हो।”

     

    कृष्ण ने हँसकर कहा, “अच्छी बातें दोहराने में क्या बुराई है?”

     

    कुछ देर बाद दोनों फिर चल पड़े।

     

    दोपहर होते-होते मौसम बदलने लगा।

     

    आसमान में बादल आ गए।

     

    सुदामा ने ऊपर देखा।

     

    “कृष्ण, लगता है बारिश आने वाली है।”

     

    कृष्ण ने कहा, “इस बार हम रास्ता नहीं भूलेंगे।”

     

    सुदामा ने कहा, “इस बार भूलना ही मत।”

     

    लेकिन कुछ ही समय बाद तेज हवा चलने लगी।

     

    पेड़ों की शाखाएँ हिलने लगीं।

     

    सुदामा ने भोजन की पोटली को अपने सीने से लगा लिया।

     

    “हमें जल्दी चलना चाहिए।”

     

    कृष्ण ने कहा, “हाँ।”

     

    दोनों तेज कदमों से आगे बढ़ने लगे।

     

    तभी रास्ते में एक बूढ़े व्यक्ति दिखाई दिए।

     

    वह एक पेड़ के नीचे बैठे थे।

     

    उनके कपड़े गीले हो चुके थे और वह बहुत कमजोर लग रहे थे।

     

    सुदामा तुरंत उनके पास गया।

     

    “बाबा, आप ठीक हैं?”

     

    वृद्ध ने कमजोर आवाज में कहा, “मैं कई घंटों से यहाँ बैठा हूँ। मेरे पैर में चोट लग गई है।”

     

    कृष्ण ने उनके पैर की ओर देखा।

     

    “आप अकेले हैं?”

     

    वृद्ध ने सिर हिला दिया।

     

    सुदामा ने चिंता से कृष्ण की ओर देखा।

     

    “हमें साधु के पास भी पहुँचना है।”

     

    कृष्ण कुछ क्षण चुप रहे।

     

    फिर बोले, “पहले इनकी सहायता करते हैं।”

     

    सुदामा ने कहा, “लेकिन गुरु माता ने भोजन समय पर पहुँचाने को कहा था।”

     

    कृष्ण ने शांत स्वर में कहा, “और अगर किसी जरूरतमंद को हमारे सामने सहायता चाहिए, तो क्या हम उसे छोड़कर आगे बढ़ जाएँ?”

     

    सुदामा चुप हो गया।

     

    उसे कृष्ण की बात सही लगी।

     

    दोनों ने वृद्ध को सहारा देकर सुरक्षित जगह बैठाया।

     

    सुदामा ने अपनी पोटली से थोड़ा पानी उन्हें दिया।

     

    कृष्ण ने आसपास से कुछ पत्ते और लकड़ी लाकर उनके पैर को सहारा दिया।

     

    बारिश शुरू हो चुकी थी।

     

    अब दोनों को चिंता होने लगी कि भोजन की पोटली भीग न जाए।

     

    सुदामा ने उसे अपने कपड़े के अंदर सुरक्षित कर लिया।

     

    कुछ देर बाद वृद्ध ने कहा, “तुम दोनों कौन हो?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “दो मित्र।”

     

    वृद्ध ने पूछा, “और कहाँ जा रहे हो?”

     

    सुदामा ने बताया कि वे गुरु माता के कहने पर भोजन लेकर जा रहे हैं।

     

    वृद्ध ने उनकी ओर ध्यान से देखा।

     

    “तुम दोनों पहले अपने काम पर जा सकते थे।”

     

    कृष्ण ने कहा, “अगर हम ऐसा करते, तो हमारा काम अधूरा रहता।”

     

    वृद्ध की आँखों में चमक आ गई।

     

    उन्होंने कहा, “याद रखना, बेटा। दूसरों के लिए किया गया छोटा सा कार्य भी जीवन की सबसे बड़ी शिक्षा बन सकता है।”

     

    कुछ समय बाद रास्ते से कुछ लोग गुजरे।

     

    कृष्ण और सुदामा ने उनसे वृद्ध की सहायता करने को कहा।

     

    अब दोनों फिर अपने रास्ते पर आगे बढ़े।

     

    लेकिन बारिश तेज हो चुकी थी।

     

    रास्ता कीचड़ से भर गया था।

     

    सुदामा कई बार फिसलते-फिसलते बचा।

     

    कृष्ण ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “धीरे चलो।”

     

    सुदामा ने कहा, “तुमने ही तो जल्दी चलने को कहा था।”

     

    “जल्दी का मतलब उड़ना नहीं होता।”

     

    सुदामा हँस पड़ा।

     

    कठिन रास्ते के बाद आखिरकार दोनों उस स्थान पर पहुँचे जहाँ वृद्ध साधु रहते थे।

     

    साधु एक छोटी सी कुटिया के बाहर बैठे थे।

     

    उन्हें देखकर सुदामा ने राहत की साँस ली।

     

    दोनों ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

     

    “गुरु माता ने आपके लिए भोजन भेजा है।”

     

    साधु ने पोटली स्वीकार की।

     

    उन्होंने दोनों को ध्यान से देखा।

     

    “तुम दोनों बहुत देर से आए हो।”

     

    सुदामा तुरंत परेशान हो गया।

     

    “क्षमा कीजिए, रास्ते में…”

     

    कृष्ण ने कहा, “रास्ते में एक वृद्ध व्यक्ति घायल मिले थे। हम उनकी सहायता करने के लिए रुक गए।”

     

    साधु कुछ देर शांत रहे।

     

    फिर उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    “तो तुम देर से नहीं आए, पुत्रों। तुम सही समय पर पहुँचे।”

     

    सुदामा ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा।

     

    साधु बोले, “जो व्यक्ति दूसरों की पीड़ा देखकर रुकना जानता है, वह जीवन का सबसे बड़ा पाठ सीख चुका होता है।”

     

    सुदामा के मन में खुशी हुई।

     

    लेकिन अब एक नई चिंता थी।

     

    शाम होने लगी थी।

     

    उन्हें वापस आश्रम पहुँचना था।

     

    दोनों जल्दी से वापस चल पड़े।

     

    रास्ते में सुदामा ने कहा, “कृष्ण, अगर गुरु माता हमसे नाराज़ हुईं तो?”

     

    कृष्ण ने कहा, “तो हम सच बता देंगे।”

     

    “और अगर उन्होंने कहा कि हमें पहले अपना काम पूरा करना चाहिए था?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “तो हम उनसे सीखेंगे।”

     

    सुदामा ने कहा, “तुम हर बात को इतना आसान कैसे बना देते हो?”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखकर कहा, “क्योंकि कठिन बातों को कठिन सोचते रहने से वे और कठिन हो जाती हैं।”

     

    दोनों चलते रहे।

     

    रात होने से पहले वे आश्रम पहुँच गए।

     

    गुरु माता उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं।

     

    सुदामा का दिल तेजी से धड़क रहा था।

     

    “माता…”

     

    गुरु माता ने पूछा, “तुम दोनों देर से क्यों आए?”

     

    सुदामा कुछ कहता, उससे पहले कृष्ण ने सारी बात सच-सच बता दी।

     

    गुरु माता ध्यान से सुनती रहीं।

     

    सुदामा सिर झुकाए खड़ा रहा।

     

    कुछ क्षणों तक वहाँ शांति रही।

     

    फिर गुरु माता ने दोनों के सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुम दोनों ने आज वही किया, जो एक सच्चे विद्यार्थी को करना चाहिए।”

     

    सुदामा ने राहत की साँस ली।

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा।

     

    उस रात दोनों आश्रम के बाहर बैठे थे।

     

    आसमान साफ हो चुका था।

     

    तारे चमक रहे थे।

     

    सुदामा ने कहा, “आज अगर तुम न होते तो शायद मैं उस वृद्ध की सहायता किए बिना आगे बढ़ जाता।”

     

    कृष्ण ने कहा, “और अगर तुम न होते, तो शायद मैं उसे अकेले सहारा नहीं दे पाता।”

     

    सुदामा ने पूछा, “तुम हमेशा मुझे अपने बराबर क्यों समझते हो?”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

     

    “क्योंकि मित्रता में बराबरी नहीं समझनी पड़ती, सुदामा। मित्र बस मित्र होता है।”

     

    सुदामा की आँखें नम हो गईं।

     

    उसने धीरे से कहा, “मैं हमेशा तुम्हारा मित्र रहूँगा।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “मैं जानता हूँ।”

     

    दोनों कुछ देर तक शांत बैठे रहे।

     

    उन्हें नहीं पता था कि समय धीरे-धीरे उन्हें उनके जीवन की अलग-अलग राहों की ओर ले जा रहा था।

     

    अभी उनके पास साथ बिताने के लिए कई दिन थे।

     

    कई बातें थीं।

     

    कई यादें थीं।

     

    लेकिन एक दिन ऐसा भी आने वाला था, जब गुरुकुल की शिक्षा पूरी होगी और दोनों को अलग-अलग दिशाओं में जाना पड़ेगा।

     

    और उस दिन…

     

    उनकी मित्रता की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होगी।

     

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  • Part 2 मित्रता की पहली परीक्षा

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    अध्याय 2 — गुरुकुल के दिन और मित्रता की पहली परीक्षा

     

    गुरुकुल में कृष्ण और सुदामा की मित्रता दिन-ब-दिन गहरी होती जा रही थी।

     

    अब ऐसा शायद ही कोई दिन गुजरता, जब दोनों एक साथ न दिखाई दें। सुबह सूरज निकलने से पहले उठना हो, नदी से जल भरकर लाना हो, आश्रम की सफाई करनी हो या गुरु सांदीपनि के सामने बैठकर शिक्षा ग्रहण करनी हो—दोनों हर काम साथ करते थे।

     

    हालाँकि दोनों के स्वभाव बिल्कुल अलग थे।

     

    सुदामा शांत और गंभीर था। वह हर बात को सोच-समझकर करता था। उसे नियमों का पालन करना पसंद था। दूसरी ओर कृष्ण हर काम में मुस्कान ढूँढ लेते थे। उनके भीतर एक अलग ही चंचलता थी। लेकिन जब बात किसी अपने की आती, तो वही चंचल कृष्ण सबसे अधिक गंभीर हो जाते थे।

     

    एक सुबह सुदामा नदी से जल भरकर लौट रहा था। उसके हाथ में मिट्टी का घड़ा था। रास्ता थोड़ा फिसलन भरा था। अचानक उसका पैर एक पत्थर से टकराया और वह संभलते-संभलते जमीन पर गिर गया।

     

    घड़ा उसके हाथ से छूटकर टूट गया।

     

    सुदामा कुछ क्षण वहीं बैठा रह गया।

     

    उसे घड़े के टूटने का दुख कम था, लेकिन उसे डर था कि अब उसे आश्रम लौटकर क्या कहना होगा।

     

    तभी पीछे से कृष्ण की आवाज आई।

     

    “सुदामा!”

     

    सुदामा ने मुड़कर देखा। कृष्ण दौड़ते हुए उसके पास आ रहे थे।

     

    “तुम ठीक तो हो?”

     

    सुदामा ने धीरे से कहा, “हाँ, मैं ठीक हूँ।”

     

    कृष्ण ने टूटे हुए घड़े की ओर देखा।

     

    “और यह?”

     

    “यह ठीक नहीं है,” सुदामा ने उदास होकर कहा।

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    सुदामा ने उन्हें घूरकर देखा।

     

    “तुम्हें हँसी आ रही है?”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा, “नहीं, मुझे तुम्हारा चेहरा देखकर हँसी आ रही है। तुम ऐसे परेशान हो जैसे पूरे आश्रम का जल समाप्त हो गया हो।”

     

    सुदामा ने कहा, “गुरु माता ने मुझे घड़ा संभालकर लाने को कहा था।”

     

    कृष्ण ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “तो चलो, नया घड़ा लेते हैं।”

     

    “लेकिन…”

     

    “लेकिन क्या?”

     

    “अगर किसी ने पूछा कि पुराना घड़ा कैसे टूटा?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “तो सच बता देना।”

     

    सुदामा ने सिर झुका लिया।

     

    “कभी-कभी सच बोलना आसान नहीं होता।”

     

    कृष्ण का चेहरा शांत हो गया।

     

    उन्होंने कहा, “सुदामा, सच बोलने के बाद मिलने वाली डाँट कुछ समय के लिए होती है, लेकिन झूठ बोलने का बोझ मन पर बहुत समय तक रहता है।”

     

    सुदामा ने उनकी ओर देखा।

     

    उसे लगा जैसे कृष्ण उससे उम्र में छोटे नहीं, बल्कि बहुत अधिक समझदार हों।

     

    दोनों वापस आश्रम आए और गुरु माता को सब बता दिया।

     

    गुरु माता ने पहले सुदामा को ध्यान से देखा, फिर कृष्ण को।

     

    “तुम दोनों ने सच बताया, इसलिए मैं नाराज़ नहीं हूँ। अगली बार सावधान रहना।”

     

    सुदामा ने राहत की साँस ली।

     

    आश्रम से बाहर आते ही कृष्ण ने कहा, “देखा? मैंने कहा था ना, सच बोलने से मन हल्का हो जाता है।”

     

    सुदामा मुस्कुराया।

     

    “लेकिन तुमने मुझे पहले ही डराना क्यों शुरू कर दिया था?”

     

    कृष्ण ने हैरानी से पूछा, “मैंने कब डराया?”

     

    “तुम्हारी बातें सुनकर लगता है जैसे तुम सब कुछ पहले से जानते हो।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए और आगे बढ़ गए।

     

    “अगर मैं सब कुछ जानता होता, तो तुम्हारा घड़ा टूटने से पहले तुम्हें रोक देता।”

     

    दोनों हँस पड़े।

     

    उस दिन के बाद सुदामा ने महसूस किया कि कृष्ण केवल उसके मित्र नहीं थे। वह उसके जीवन में एक ऐसे साथी बनते जा रहे थे, जिनसे वह अपनी हर बात कह सकता था।

     

    लेकिन गुरुकुल का जीवन केवल हँसी और खेल का नाम नहीं था।

     

    वहाँ हर दिन कुछ नया सीखना पड़ता था।

     

    एक दिन गुरु सांदीपनि सभी शिष्यों को शिक्षा दे रहे थे।

     

    उन्होंने कहा, “मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान उसका धन, शक्ति या परिवार नहीं होता। उसकी सबसे बड़ी पहचान उसके कर्म होते हैं।”

     

    एक शिष्य ने पूछा, “गुरुदेव, अगर कोई व्यक्ति बहुत गरीब हो, तो क्या लोग उसे हमेशा छोटा समझेंगे?”

     

    सुदामा अचानक चुप हो गया।

     

    उसे लगा जैसे यह प्रश्न उसके अपने मन का हो।

     

    गुरु सांदीपनि ने उत्तर दिया, “गरीबी किसी मनुष्य को छोटा नहीं बनाती। छोटा मनुष्य तब बनता है, जब उसके विचार छोटे हो जाते हैं।”

     

    कृष्ण ने धीरे से सुदामा की ओर देखा।

     

    सुदामा ने नजरें नीचे कर लीं।

     

    पाठ समाप्त होने के बाद कृष्ण उसके पास आए।

     

    “तुम कुछ सोच रहे हो?”

     

    “नहीं।”

     

    “तुम जब भी दुखी होते हो, यही कहते हो।”

     

    सुदामा ने धीमी आवाज में कहा, “कृष्ण, क्या तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगता कि हम दोनों बहुत अलग हैं?”

     

    कृष्ण ने पूछा, “किस बात में?”

     

    सुदामा ने कहा, “तुम्हारे पास सब कुछ है। तुम्हारा परिवार बड़ा है। लोग तुम्हें प्रेम करते हैं। और मैं…”

     

    वह रुक गया।

     

    कृष्ण ने कहा, “और तुम मेरे मित्र हो।”

     

    सुदामा ने उनकी ओर देखा।

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “मित्रता में कौन बड़ा और कौन छोटा होता है?”

     

    सुदामा कुछ नहीं बोला।

     

    कृष्ण आगे बोले, “अगर तुम्हारे पास धन नहीं है, तो इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हारे पास कुछ नहीं है। तुम्हारे पास एक सच्चा मन है, ज्ञान पाने की इच्छा है और अपने मित्र के लिए प्रेम है। क्या यह कम है?”

     

    सुदामा की आँखें नम हो गईं।

     

    उसने धीरे से कहा, “तुम्हारी बातें सुनकर सब आसान लगने लगता है।”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा, “तो फिर तुम रोज मुझसे बातें किया करो।”

     

    दोनों फिर हँस पड़े।

     

    कुछ दिन बाद गुरु माता ने कृष्ण और सुदामा को अपने पास बुलाया।

     

    उनके चेहरे पर चिंता थी।

     

    “आश्रम के लिए कुछ सूखी लकड़ियों की आवश्यकता है। जंगल से लकड़ियाँ लानी होंगी।”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा, “हम दोनों जाएँगे।”

     

    सुदामा ने भी सिर हिला दिया।

     

    गुरु माता ने कहा, “जंगल थोड़ा दूर है। समय पर लौट आना।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “चिंता मत कीजिए, माता।”

     

    सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    उसे पता था कि जब भी कृष्ण कहते हैं कि चिंता मत कीजिए, तब कुछ न कुछ जरूर होने वाला होता है।

     

    दोनों सुबह-सुबह जंगल की ओर निकल पड़े।

     

    रास्ते भर कृष्ण बातें करते रहे।

     

    कभी किसी पक्षी की आवाज की नकल करते, कभी पेड़ पर लगे फलों को देखकर अनुमान लगाते कि कौन सा फल मीठा होगा।

     

    सुदामा ने कहा, “कृष्ण, हम लकड़ियाँ लेने जा रहे हैं या घूमने?”

     

    कृष्ण ने कहा, “दोनों काम साथ-साथ हो सकते हैं।”

     

    “लेकिन गुरु माता ने कहा था कि जल्दी लौटना है।”

     

    “तो जल्दी लौटेंगे।”

     

    “तुम्हारे लिए जल्दी का मतलब क्या है?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “जब तुम परेशान होने लगो।”

     

    सुदामा ने सिर पकड़ लिया।

     

    जंगल पहुँचने के बाद दोनों सूखी लकड़ियाँ इकट्ठा करने लगे।

     

    कुछ ही समय में उनके पास काफी लकड़ियाँ हो गईं।

     

    सुदामा ने कहा, “अब चलें?”

     

    कृष्ण ने कहा, “बस थोड़ी और।”

     

    सुदामा ने कहा, “तुमने यही बात आधा समय पहले भी कही थी।”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    लेकिन तभी आसमान में अचानक काले बादल छा गए।

     

    तेज हवा चलने लगी।

     

    सुदामा ने ऊपर देखा।

     

    “कृष्ण, मुझे लगता है बारिश आने वाली है।”

     

    कुछ ही क्षणों में तेज बारिश शुरू हो गई।

     

    दोनों ने लकड़ियों को एक साथ बाँधा और पेड़ों के बीच सुरक्षित जगह ढूँढने लगे।

     

    लेकिन बारिश इतनी तेज थी कि रास्ता दिखाई देना मुश्किल हो गया।

     

    कुछ समय बाद दोनों को एहसास हुआ कि वे आश्रम का रास्ता भूल चुके हैं।

     

    सुदामा घबरा गया।

     

    “अब क्या होगा?”

     

    कृष्ण ने कहा, “कुछ नहीं होगा।”

     

    “लेकिन हमें रास्ता नहीं पता।”

     

    “तो रास्ता ढूँढेंगे।”

     

    “और अगर रात हो गई?”

     

    “तो सुबह होने तक इंतजार करेंगे।”

     

    “और अगर कोई जंगली जानवर आ गया?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर पूछा, “तुम एक ही बार में इतनी सारी चिंताएँ कहाँ से ढूँढ लेते हो?”

     

    सुदामा ने कहा, “क्योंकि तुम बिल्कुल चिंता नहीं करते।”

     

    कृष्ण कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले, “सुदामा, चिंता और सावधानी में अंतर होता है। सावधान रहना जरूरी है, लेकिन हर समय डरते रहना हमें कमजोर कर देता है।”

     

    बारिश लगातार हो रही थी।

     

    दोनों एक बड़े पेड़ के नीचे खड़े हो गए।

     

    ठंडी हवा चल रही थी।

     

    सुदामा काँपने लगा।

     

    कृष्ण ने अपनी ओर का कपड़ा उसके कंधों पर रख दिया।

     

    सुदामा ने कहा, “नहीं, तुम्हें ठंड लगेगी।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “मित्रता में हिसाब नहीं रखा जाता।”

     

    सुदामा कुछ कह पाता, उससे पहले तेज हवा चली और उनके ऊपर की कुछ सूखी शाखाएँ टूटकर नीचे गिर गईं।

     

    दोनों पीछे हट गए।

     

    अब जंगल और भी डरावना लगने लगा।

     

    सुदामा ने धीरे से कहा, “कृष्ण, मुझे डर लग रहा है।”

     

    कृष्ण ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तो मेरा हाथ मत छोड़ना।”

     

    सुदामा ने कृष्ण का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    धीरे-धीरे शाम होने लगी।

     

    आसमान अंधेरा हो गया।

     

    आश्रम में गुरु सांदीपनि और गुरु माता दोनों चिंतित थे।

     

    “दोनों अभी तक लौटे नहीं,” गुरु माता ने कहा।

     

    गुरु सांदीपनि ने कुछ शिष्यों को बुलाया।

     

    “तुम लोग उन्हें खोजने जाओ।”

     

    उधर जंगल में कृष्ण और सुदामा एक पेड़ के नीचे बैठे थे।

     

    सुदामा ने अपना सिर पेड़ से टिकाया।

     

    “अगर हम आज वापस नहीं पहुँचे तो?”

     

    कृष्ण ने कहा, “हम पहुँचेंगे।”

     

    “तुम्हें इतना विश्वास कैसे है?”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

     

    “क्योंकि मैं अकेला नहीं हूँ। तुम मेरे साथ हो।”

     

    सुदामा की आँखों में हल्की मुस्कान आ गई।

     

    कुछ देर बाद उसने कहा, “और मैं इसलिए नहीं डर रहा क्योंकि तुम मेरे साथ हो।”

     

    कृष्ण ने कहा, “तो फिर हम दोनों ठीक हैं।”

     

    रात बीतती रही।

     

    दोनों ने एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ा।

     

    सुबह होने के कुछ समय बाद आश्रम के शिष्यों की आवाज सुनाई दी।

     

    “कृष्ण! सुदामा!”

     

    सुदामा तुरंत खड़ा हो गया।

     

    “वे हमें ढूँढ रहे हैं!”

     

    कुछ ही समय बाद गुरु सांदीपनि स्वयं वहाँ पहुँच गए।

     

    उन्होंने दोनों को देखा।

     

    “तुम दोनों ठीक हो?”

     

    कृष्ण और सुदामा ने एक साथ सिर हिलाया।

     

    गुरु सांदीपनि ने उन्हें अपने पास बुलाया।

     

    “तुम दोनों पूरी रात यहाँ रहे?”

     

    सुदामा ने कहा, “हाँ, गुरुदेव।”

     

    गुरु ने पूछा, “डर नहीं लगा?”

     

    सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    फिर मुस्कुराकर कहा, “लगा था… लेकिन मैं अकेला नहीं था।”

     

    कृष्ण ने भी सुदामा की ओर देखा।

     

    गुरु सांदीपनि मुस्कुरा दिए।

     

    उस दिन आश्रम लौटते समय सुदामा के मन में एक बात हमेशा के लिए बस गई।

     

    जीवन में कितनी भी कठिन राह क्यों न हो…

     

    अगर साथ में एक सच्चा मित्र हो, तो डर आधा हो जाता है।

     

    लेकिन सुदामा नहीं जानता था कि आने वाले दिनों में उसकी और कृष्ण की मित्रता को एक और बड़ी परीक्षा से गुजरना होगा।

     

    एक ऐसी घटना…

     

    जिसे वर्षों बाद भी सुदामा भूल नहीं पाएगा।

     

    और शायद वही घटना उनके बीच की मित्रता को हमेशा के लिए अमर कर देगी।

     

    क्रमशः…

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • श्री कृष्ण ओर सुदामा की मित्रता की कहानी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    अध्याय 1 — दो मित्रों की पहली मुलाकात

    बहुत समय पहले की बात है। भारत की धरती पर अनेक छोटे-बड़े राज्य बसे हुए थे। उन्हीं दिनों दो ऐसे बालक थे, जिनकी जिंदगी एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थी। एक ओर थे द्वारका के भावी नायक, वसुदेव और देवकी के पुत्र श्री कृष्ण, जिनका बचपन गोकुल और वृंदावन की गलियों में बीता था। दूसरी ओर था एक साधारण ब्राह्मण बालक—सुदामा।

     

    सुदामा का जीवन बहुत साधारण था। उसके पास धन-दौलत नहीं थी, न ही सुंदर वस्त्र और न ही कोई बड़ा घर। लेकिन उसके पास एक बहुत बड़ी चीज थी—ज्ञान पाने की इच्छा और एक सच्चा, निर्मल हृदय।

     

    जब सुदामा थोड़ा बड़ा हुआ तो उसके माता-पिता ने सोचा कि उसे शिक्षा के लिए एक अच्छे गुरु के आश्रम में भेजना चाहिए। उस समय गुरुकुल में शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं होती थी। वहाँ बच्चों को जीवन जीना, मेहनत करना, बड़ों का सम्मान करना और हर परिस्थिति में धैर्य रखना भी सिखाया जाता था।

     

    इसलिए एक दिन सुदामा अपने माता-पिता का आशीर्वाद लेकर गुरु सांदीपनि के आश्रम की ओर चल पड़ा।

     

    उसके पास सामान के नाम पर बहुत कम चीजें थीं। एक छोटा सा कपड़े का थैला, पहनने के लिए साधारण वस्त्र और मन में ज्ञान पाने का सपना।

     

    कई दिनों की यात्रा के बाद वह आश्रम पहुँचा।

     

    आश्रम प्रकृति के बीच बसा हुआ था। वहाँ अनेक बालक शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। कोई जल भर रहा था, कोई लकड़ियाँ ला रहा था और कोई गुरु के सामने बैठकर पाठ सीख रहा था।

     

    सुदामा ने आश्रम में प्रवेश किया और गुरु सांदीपनि के सामने जाकर हाथ जोड़ दिए।

     

    “गुरुदेव, मैं आपके पास शिक्षा प्राप्त करने आया हूँ।”

     

    गुरु सांदीपनि ने उस दुबले-पतले बालक को ध्यान से देखा।

     

    “तुम्हारा नाम क्या है, पुत्र?”

     

    “सुदामा।”

     

    “और तुम शिक्षा क्यों प्राप्त करना चाहते हो?”

     

    सुदामा ने बिना देर किए उत्तर दिया, “ताकि मैं ज्ञानवान बन सकूँ और जीवन में सही मार्ग पर चल सकूँ।”

     

    गुरु सांदीपनि मुस्कुरा दिए।

     

    “ज्ञान केवल पढ़ने से नहीं मिलता, सुदामा। ज्ञान पाने के लिए मन को भी सच्चा रखना पड़ता है।”

     

    सुदामा ने सिर झुका दिया।

     

    “मैं प्रयास करूँगा, गुरुदेव।”

     

    उसी दिन सुदामा को आश्रम में रहने की अनुमति मिल गई।

     

    उस शाम वह अपने नए स्थान को समझने की कोशिश कर रहा था। बहुत से बालक आपस में पहले से मित्र थे। कोई खेल रहा था, कोई बातें कर रहा था। सुदामा थोड़ा संकोची स्वभाव का था। वह चुपचाप एक पेड़ के पास बैठ गया।

     

    तभी उसके पास एक बालक आया।

     

    उसके चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान थी। उसकी आँखों में शरारत भी थी और एक अजीब सी अपनापन भी।

     

    उसने सुदामा के पास बैठते हुए पूछा, “तुम नए आए हो?”

     

    सुदामा ने उसकी ओर देखा।

     

    “हाँ।”

     

    “नाम?”

     

    “सुदामा।”

     

    बालक मुस्कुराया।

     

    “मैं कृष्ण हूँ।”

     

    सुदामा ने आश्चर्य से पूछा, “तुम भी आज ही आए हो?”

     

    कृष्ण ने हँसते हुए कहा, “नहीं, लेकिन हर दिन नया ही लगता है।”

     

    सुदामा को उसका उत्तर समझ नहीं आया, लेकिन वह मुस्कुरा दिया।

     

    कुछ क्षण दोनों चुप रहे।

     

    फिर कृष्ण ने सुदामा के कपड़ों की ओर देखा। वे साधारण और पुराने थे। सुदामा को लगा कि शायद अब यह बालक भी उसका मजाक उड़ाएगा, जैसे कई बच्चे कभी-कभी करते थे।

     

    लेकिन कृष्ण ने कुछ नहीं कहा।

     

    उन्होंने अपने पास रखा फल निकालकर सुदामा की ओर बढ़ाया।

     

    “भूख लगी है?”

     

    सुदामा ने संकोच से कहा, “नहीं।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “अगर तुम्हें नहीं चाहिए तो मैं अकेले खा लूँगा। लेकिन फिर मुझे बहुत बुरा लगेगा।”

     

    सुदामा उनकी बात सुनकर हँस पड़ा।

     

    “तुम अजीब हो।”

     

    “और तुम बहुत चुप रहते हो,” कृष्ण ने तुरंत कहा।

     

    दोनों हँस पड़े।

     

    शायद उसी छोटी सी हँसी के साथ एक ऐसी मित्रता की शुरुआत हुई, जो समय के साथ और गहरी होने वाली थी।

     

    अगले दिन से दोनों का साथ बढ़ने लगा।

     

    सुबह जल्दी उठना, नदी से जल लाना, आश्रम की सफाई करना, गुरु के पास बैठकर शिक्षा लेना—धीरे-धीरे दोनों हर काम साथ करने लगे।

     

    कृष्ण किसी भी काम को बोझ की तरह नहीं लेते थे।

     

    एक दिन गुरु माता ने सभी बालकों से कहा कि आश्रम के लिए जंगल से सूखी लकड़ियाँ लेकर आनी हैं।

     

    कई बालक अपने-अपने साथियों के साथ जंगल की ओर निकल पड़े।

     

    कृष्ण ने सुदामा से कहा, “चलो, हम भी चलते हैं।”

     

    सुदामा ने लकड़ियाँ बाँधने के लिए रस्सी उठाई और दोनों जंगल की ओर चल पड़े।

     

    रास्ते में कृष्ण कभी पेड़ों को देखते, कभी पक्षियों की आवाज सुनते और कभी कोई मजेदार बात कह देते।

     

    सुदामा ने पूछा, “तुम हर समय इतने खुश कैसे रहते हो?”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखकर कहा, “क्योंकि दुख आने से पहले ही अगर हम दुखी हो जाएँ, तो खुशी कब मिलेगी?”

     

    सुदामा कुछ देर तक उस बात को सोचता रहा।

     

    जंगल पहुँचकर दोनों लकड़ियाँ इकट्ठा करने लगे।

     

    कुछ समय बाद अचानक आसमान में बादल घिर आए।

     

    तेज हवा चलने लगी।

     

    सुदामा ने चिंतित होकर कहा, “कृष्ण, हमें जल्दी वापस चलना चाहिए।”

     

    लेकिन देखते ही देखते बारिश शुरू हो गई।

     

    दोनों एक बड़े पेड़ के नीचे खड़े हो गए।

     

    बारिश तेज होती जा रही थी।

     

    सुदामा ने अपने छोटे से कपड़े के थैले को सीने से लगा लिया।

     

    कृष्ण ने पूछा, “उसमें क्या है?”

     

    सुदामा थोड़ा घबरा गया।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    कृष्ण ने शरारत से कहा, “कुछ नहीं है तो इतनी मजबूती से क्यों पकड़ा हुआ है?”

     

    सुदामा चुप रहा।

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “अच्छा, ठीक है। मत बताओ।”

     

    कुछ देर बाद सुदामा ने धीरे से कहा, “मेरी माँ ने रास्ते के लिए थोड़े से चने दिए हैं।”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

     

    “तो हम दोनों मिलकर खाएँगे।”

     

    सुदामा ने कहा, “लेकिन ये बहुत कम हैं।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “जो चीज प्रेम से बाँटी जाए, वह कभी कम नहीं होती।”

     

    सुदामा ने थैले से चने निकाले और दोनों ने उन्हें बाँटकर खा लिया।

     

    उस दिन पहली बार सुदामा ने महसूस किया कि उसके सामने बैठा यह मित्र दूसरे लोगों से अलग है।

     

    कृष्ण ने कभी उससे यह नहीं पूछा कि वह गरीब क्यों है।

     

    कभी उसके कपड़ों पर हँसे नहीं।

     

    कभी यह नहीं कहा कि उसके पास क्या नहीं है।

     

    वह बस उसके साथ रहते थे।

     

    बारिश कम हुई तो दोनों आश्रम लौट आए।

     

    लेकिन आश्रम पहुँचने पर पता चला कि गुरु माता चिंतित थीं।

     

    “तुम दोनों कहाँ रह गए थे?”

     

    सुदामा ने सिर झुका लिया।

     

    “माता, जंगल में बारिश आ गई थी।”

     

    कृष्ण तुरंत बोले, “गलती मेरी है। मैं रास्ते में बातें करता रहा और हमें देर हो गई।”

     

    सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    उसे पता था कि कृष्ण ऐसा क्यों कह रहे हैं।

     

    वह अपने मित्र को डाँट से बचाने की कोशिश कर रहे थे।

     

    सुदामा ने तुरंत कहा, “नहीं, माता। गलती हम दोनों की है।”

     

    गुरु माता ने दोनों को देखा।

     

    फिर मुस्कुराते हुए कहा, “मित्रता में एक-दूसरे का साथ देना अच्छी बात है, लेकिन सच्चाई से दूर नहीं जाना चाहिए।”

     

    दोनों ने सिर झुका दिया।

     

    उस रात सुदामा देर तक सो नहीं सका।

     

    कृष्ण उसके पास ही लेटे हुए थे।

     

    सुदामा ने धीरे से पूछा, “कृष्ण?”

     

    “हूँ?”

     

    “अगर एक दिन हम दोनों अलग हो गए तो?”

     

    कृष्ण कुछ क्षण चुप रहे।

     

    फिर उन्होंने कहा, “सच्चे मित्र पास रहने से मित्र नहीं होते, सुदामा। अगर मन में प्रेम और विश्वास हो, तो दूरी भी मित्रता को अलग नहीं कर सकती।”

     

    सुदामा ने कहा, “लेकिन मैं तुम्हें भूलना नहीं चाहता।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “तो मत भूलना।”

     

    “और तुम?”

     

    “मैं भी नहीं भूलूँगा।”

     

    सुदामा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    उसे नहीं पता था कि आने वाले वर्षों में जीवन दोनों को कितनी दूर ले जाएगा।

     

    उसे यह भी नहीं पता था कि एक दिन यही कृष्ण एक महान राजा के रूप में पहचाने जाएँगे और वह स्वयं कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताएगा।

     

    लेकिन उस समय…

     

    वे दोनों केवल दो बालक थे।

     

    एक साधारण ब्राह्मण पुत्र।

     

    और दूसरा उसका प्यारा मित्र कृष्ण।

     

    अगली सुबह सूर्य की किरणों के साथ दोनों फिर से आश्रम के कार्यों में लग गए।

     

    उन्हें नहीं पता था कि उनकी मित्रता की असली परीक्षा अभी बाकी थी।

     

    कुछ ही समय बाद गुरु सांदीपनि दोनों को एक ऐसा कार्य सौंपने वाले थे, जो उनकी दोस्ती को और गहरा कर देगा।

     

    और उस दिन सुदामा को पहली बार समझ आएगा कि कृष्ण केवल एक अच्छे मित्र ही नहीं…

     

    बल्कि एक ऐसे साथी हैं, जो हर कठिन समय में उसका हाथ थामकर खड़े रहेंगे।

     

    क्रमशः…

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • जिसे मैने पहली बार राखी बांधी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    जिसे मैंने पहली बार राखी बांधी

    अनुष्का को बचपन से रक्षाबंधन का त्योहार बहुत पसंद था।

     

    रक्षाबंधन आने से कई दिन पहले ही वह बाजार जाने की जिद करने लगती थी।

     

    “माँ, इस बार सबसे सुंदर राखी लूंगी।”

     

    माँ मुस्कुराकर कहतीं,

     

    “इतनी तैयारी किसके लिए?”

     

    अनुष्का तुरंत जवाब देती,

     

    “मेरे भाई के लिए।”

     

    उसका बड़ा भाई रवि उससे चार साल बड़ा था।

     

    दोनों बचपन से बहुत करीब थे।

     

    रवि उसे चिढ़ाता था।

     

    उसकी चीजें छिपा देता था।

     

    कभी उसके बाल खींच देता था।

     

    और फिर जब अनुष्का रोती, तो सबसे पहले वही उसे चुप कराता।

     

    रक्षाबंधन के दिन अनुष्का हमेशा कहती,

     

    “भैया, हाथ आगे करो।”

     

    रवि मजाक करता,

     

    “पहले गिफ्ट बताओ।”

     

    अनुष्का गुस्सा होकर कहती,

     

    “पहले राखी।”

     

    रवि हंसकर हाथ आगे कर देता।

     

    सालों तक यही चलता रहा।

     

    लेकिन समय के साथ दोनों बड़े हो गए।

     

    रवि काम के सिलसिले में दूसरे शहर चला गया।

     

    अनुष्का पढ़ाई करने लगी।

     

    फिर भी हर रक्षाबंधन पर दोनों मिलते जरूर थे।

     

    अगर मिलना संभव न होता तो वीडियो कॉल पर बात करते।

     

    रवि हमेशा कहता,

     

    “राखी बांधना जरूरी है, चाहे सामने हो या दूर।”

     

    अनुष्का कहती,

     

    “आपके बिना त्योहार अधूरा लगता है।”

     

    एक साल रक्षाबंधन से कुछ महीने पहले रवि को दूसरे देश में एक बड़ा काम मिल गया।

     

    वह बहुत दूर चला गया।

     

    जाने से पहले उसने अनुष्का से कहा,

     

    “इस बार शायद राखी पर नहीं आ पाऊंगा।”

     

    अनुष्का ने नाराज होकर कहा,

     

    “तो मैं भेज दूंगी।”

     

    रवि हंस पड़ा।

     

    “जरूर भेजना।”

     

    लेकिन उस साल परिस्थितियां ऐसी बनीं कि रवि समय पर बात भी नहीं कर पाया।

     

    उसका काम बहुत व्यस्त था और संपर्क करना मुश्किल हो रहा था।

     

    अनुष्का हर दिन इंतजार करती।

     

    रक्षाबंधन से एक दिन पहले उसने फोन किया।

     

    कॉल नहीं लगी।

     

    उसने संदेश भेजा।

     

    जवाब नहीं आया।

     

    अगले दिन सुबह वह जल्दी उठ गई।

     

    उसने राखी की थाली सजाई।

     

    लेकिन सामने भाई नहीं था।

     

    उसने वीडियो कॉल की कोशिश की।

     

    फिर भी बात नहीं हुई।

     

    अनुष्का की आंखें भर आईं।

     

    माँ ने उसके पास आकर कहा,

     

    “उदास मत हो बेटा, बात हो जाएगी।”

     

    अनुष्का ने कहा,

     

    “माँ, पहली बार ऐसा लग रहा है जैसे रक्षाबंधन है ही नहीं।”

     

    माँ ने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “त्योहार सिर्फ साथ बैठने से नहीं, दिल से भी मनाए जाते हैं।”

     

    अनुष्का ने राखी वापस डिब्बे में रखने के लिए हाथ बढ़ाया।

     

    तभी दरवाजे पर किसी ने आवाज दी।

     

    “मैडम… माफ कीजिए।”

     

    अनुष्का बाहर आई।

     

    सामने एक युवक खड़ा था।

     

    उसके हाथ में एक पर्स था।

     

    “ये शायद आपका है।”

     

    अनुष्का ने देखा।

     

    वह माँ का पर्स था।

     

    “अरे! ये आपको कहां मिला?”

     

    युवक ने बताया कि पर्स रास्ते में गिर गया था और अंदर मिले एक पते के आधार पर वह लौटाने आया था।

     

    माँ ने उसे धन्यवाद दिया।

     

    “अंदर आओ बेटा, कम से कम चाय पीकर जाना।”

     

    युवक ने पहले मना किया।

     

    लेकिन माँ के बार-बार कहने पर वह अंदर आ गया।

     

    उसका नाम आर्यन था।

     

    बातों-बातों में माँ ने कहा,

     

    “आज रक्षाबंधन है, इसलिए बेटी थोड़ी उदास है।”

     

    आर्यन ने अनुष्का की तरफ देखा।

     

    “क्यों?”

     

    अनुष्का ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

     

    “भाई बहुत दूर है।”

     

    आर्यन चुप हो गया।

     

    कुछ देर बाद उसने धीरे से कहा,

     

    “मैं समझ सकता हूं।”

     

    अनुष्का ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “मेरी कोई बहन नहीं है।”

     

    यह सुनकर अनुष्का कुछ पल चुप रही।

     

    माँ ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “तो आज से अनुष्का तुम्हारी बहन।”

     

    आर्यन थोड़ा असहज होकर हंस पड़ा।

     

    “ऐसे रिश्ते बन जाते हैं क्या?”

     

    माँ ने कहा,

     

    “कुछ रिश्ते बनने के लिए सालों की जरूरत नहीं होती।”

     

    अनुष्का चुपचाप राखी की थाली की तरफ देखने लगी।

     

    फिर उसने पूछा,

     

    “आपको राखी बंधवाने में कोई परेशानी तो नहीं?”

     

    आर्यन ने उसकी तरफ देखा।

     

    शायद वह भी पहली बार ऐसा अनुभव कर रहा था।

     

    उसने धीरे से अपना हाथ आगे कर दिया।

     

    “नहीं।”

     

    अनुष्का ने राखी उठाई।

     

    लेकिन राखी बांधने से पहले रुक गई।

     

    उसके मन में आया—

     

    क्या किसी अनजान इंसान को भाई कहना इतना आसान है?

     

    फिर उसने आर्यन की आंखों में देखा।

     

    वह बिल्कुल चुप था।

     

    जैसे उसके मन में भी कोई पुरानी कमी हो।

     

    अनुष्का ने धीरे से राखी बांध दी।

     

    “अब आप मेरे भाई हो।”

     

    आर्यन मुस्कुराया।

     

    “इतनी जल्दी फैसला?”

     

    “हां।”

     

    “और अगर मैं अच्छा भाई नहीं निकला?”

     

    अनुष्का ने कहा,

     

    “तो डांट दूंगी।”

     

    सब हंस पड़े।

     

    आर्यन ने पूछा,

     

    “गिफ्ट क्या चाहिए?”

     

    अनुष्का ने कहा,

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “हर बहन यही बोलती है?”

     

    “नहीं, मुझे सच में कुछ नहीं चाहिए।”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “तो एक वादा।”

     

    “कैसा?”

     

    “जब भी कभी जरूरत हो, मुझे फोन करना।”

     

    अनुष्का ने मजाक में कहा,

     

    “और आप उठाओगे?”

     

    आर्यन हंस पड़ा।

     

    “कोशिश करूंगा।”

     

    उस दिन के बाद दोनों अपने-अपने काम में व्यस्त हो गए।

     

    अनुष्का को लगा शायद यह रिश्ता सिर्फ उसी दिन तक था।

     

    लेकिन शाम को उसके फोन पर एक संदेश आया।

     

    “घर पहुंच गया, बहन।”

     

    अनुष्का मुस्कुराई।

     

    कुछ दिनों बाद—

     

    “पढ़ाई कैसी चल रही है?”

     

    फिर—

     

    “माँ की तबीयत ठीक है?”

     

    फिर—

     

    “कोई परेशानी हो तो बताना।”

     

    धीरे-धीरे दोनों की बातें बढ़ने लगीं।

     

    रवि जब विदेश से वापस आया, तो अनुष्का ने उत्साह से कहा,

     

    “भैया, आपको किसी से मिलवाना है।”

     

    रवि ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    “मेरे दूसरे भाई से।”

     

    रवि हंस पड़ा।

     

    “वाह! मैं कुछ महीने बाहर क्या गया, मेरी जगह भर दी?”

     

    अनुष्का ने कहा,

     

    “जगह कोई नहीं भर सकता।”

     

    फिर वह मुस्कुराई।

     

    “बस दिल बड़ा हो गया।”

     

    जब रवि की मुलाकात आर्यन से हुई तो वह पहले थोड़ा हैरान हुआ।

     

    लेकिन फिर उसने कहा,

     

    “मेरी बहन को परेशान मत करना।”

     

    आर्यन ने हंसते हुए जवाब दिया,

     

    “आपकी बहन पहले से ही मुझे परेशान कर रही है।”

     

    अनुष्का ने दोनों को गुस्से से देखा।

     

    “आप दोनों दोस्त मत बन जाना।”

     

    दोनों भाई हंस पड़े।

     

    अगले साल रक्षाबंधन आया।

     

    इस बार अनुष्का के सामने दो हाथ थे।

     

    एक उसके बचपन के भाई रवि का।

     

    दूसरा उस भाई का, जिसे उसने एक साल पहले पहली बार राखी बांधी थी।

     

    अनुष्का ने पहले रवि को राखी बांधी।

     

    फिर आर्यन की तरफ देखा।

     

    आर्यन ने हाथ आगे करते हुए कहा,

     

    “इस बार भी राखी बांधोगी या रिश्ता खत्म?”

     

    अनुष्का ने तुरंत कहा,

     

    “भाई से रिश्ता खत्म नहीं होता।”

     

    आर्यन मुस्कुराया।

     

    “अच्छा।”

     

    अनुष्का ने उसे राखी बांधी।

     

    माँ दूर खड़ी दोनों को देख रही थीं।

     

    उनकी आंखें नम थीं।

     

    अनुष्का ने कहा,

     

    “माँ, उस दिन अगर पर्स नहीं गिरता तो?”

     

    माँ ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “तो शायद एक रिश्ता नहीं मिलता।”

     

    अनुष्का ने दोनों भाइयों को देखा।

     

    उस दिन उसे समझ आया—

     

    रिश्ते सिर्फ खून से नहीं बनते।

     

    कुछ रिश्ते भरोसे से बनते हैं।

     

    कुछ अपनापन देखकर।

     

    और कुछ रिश्ते…

     

    बस एक राखी के धागे से दिल में जगह बना लेते हैं।

     

    उस साल अनुष्का ने महसूस किया कि उसका रक्षाबंधन पहले से कहीं ज्यादा खास था।

     

    क्योंकि उसके पास सिर्फ एक भाई नहीं था।

     

    उसके पास दो ऐसे लोग थे, जिन्हें वह दिल से अपना कह सकती थी।

     

    रवि ने हंसते हुए कहा,

     

    “अब गिफ्ट किससे पहले लेगी?”

     

    अनुष्का ने कहा,

     

    “दोनों से।”

     

    आर्यन बोला,

     

    “लो, असली बहन अब सामने आई।”

     

    अनुष्का हंस पड़ी।

     

    घर फिर से हंसी से भर गया।

     

    उसने अपनी दोनों भाइयों की कलाई पर बंधी राखियों को देखा।

     

    एक रिश्ता उसे जन्म से मिला था।

     

    दूसरा उसे रक्षाबंधन के दिन मिला था।

     

    लेकिन दोनों में एक बात समान थी—

     

    अपनापन।

     

    और अनुष्का ने उसी दिन मन ही मन सोचा—

     

    कभी-कभी भगवान हमें रिश्ते चुनने का मौका भी देता है।

     

    बस उन्हें पहचानने के लिए…

     

    दिल का दरवाजा खुला होना चाहिए।

     

    उसकी पहली राखी, जो उस साल अधूरी लग रही थी…

     

    आखिर में उसकी जिंदगी की सबसे यादगार राखी बन गई।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • हर साल राखी भेजती रही

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    हर साल राखी भेजती रही, पर भाई ने कभी जवाब नहीं दिया

     

    रक्षाबंधन आने में अभी पांच दिन बाकी थे।

     

    मीरा बाजार में राखियां देख रही थी।

     

    उसकी नजर एक साधारण-सी लाल और सुनहरे धागे वाली राखी पर जाकर रुक गई।

     

    उसने दुकानदार से कहा,

     

    “भैया, ये वाली दे दीजिए।”

     

    दुकानदार ने पूछा,

     

    “बस एक?”

     

    मीरा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

     

    “हां, बस एक ही भाई है।”

     

    राखी हाथ में लेते ही उसकी आंखें नम हो गईं।

     

    पिछले आठ सालों से वह हर रक्षाबंधन पर अपने भाई अभिषेक को राखी भेजती थी।

     

    लेकिन पिछले आठ सालों में अभिषेक ने उसे कभी फोन करके यह नहीं कहा था—

     

    “राखी मिल गई।”

     

    न कोई गिफ्ट।

     

    न कोई वीडियो कॉल।

     

    न कोई लंबी बात।

     

    बस कभी-कभी दो शब्दों का एक संदेश आता था—

     

    “Thanks.”

     

    और कई बार वह भी नहीं।

     

    मीरा के दोस्तों को यह बात समझ नहीं आती थी।

     

    एक दिन उसकी सहेली ने पूछा था,

     

    “जब तुम्हारा भाई इतना दूर-दूर रहता है तो तुम हर साल राखी क्यों भेजती हो?”

     

    मीरा ने कहा था,

     

    “क्योंकि वो मेरा भाई है।”

     

    “लेकिन उसे तो फर्क ही नहीं पड़ता।”

     

    मीरा कुछ सेकंड चुप रही।

     

    फिर बोली,

     

    “शायद पड़ता हो।”

     

    उसकी सहेली हंस पड़ी।

     

    “तुझे खुद नहीं पता।”

     

    मीरा ने जवाब नहीं दिया।

     

    सच तो यह था कि कभी-कभी उसे भी बुरा लगता था।

     

    बहुत बुरा।

     

    बचपन में अभिषेक और मीरा बहुत करीब थे।

     

    अभिषेक उससे छह साल बड़ा था।

     

    जब मीरा छोटी थी, वह उसके पीछे-पीछे घूमती रहती।

     

    “भैया, मुझे भी साइकिल चलानी है।”

     

    “गिर जाएगी।”

     

    “तो आप पकड़ लेना।”

     

    “तू बहुत परेशान करती है।”

     

    फिर भी अभिषेक घंटों उसके पीछे साइकिल पकड़कर दौड़ता रहता।

     

    मीरा को स्कूल में कोई डांट देता तो वह घर आकर सबसे पहले भाई को बताती।

     

    अभिषेक हमेशा कहता,

     

    “रो मत, मैं हूं ना।”

     

    लेकिन समय के साथ सब बदल गया।

     

    अभिषेक पढ़ाई और काम के लिए दूसरे शहर चला गया।

     

    धीरे-धीरे फोन कम हो गए।

     

    फिर बातें कम हो गईं।

     

    और फिर जैसे दोनों की जिंदगी अपनी-अपनी दिशा में चल पड़ी।

     

    फिर भी हर साल मीरा राखी भेजती रही।

     

    इस बार उसने राखी के साथ एक छोटा-सा पत्र भी लिखा।

     

    उसने लिखा—

     

    “भैया, इस बार भी राखी भेज रही हूं। पता नहीं आपको पसंद आएगी या नहीं। हर साल सोचती हूं कि शायद इस बार आप फोन करेंगे। लेकिन अगर नहीं भी किया तो कोई बात नहीं। बस राखी संभालकर रख लेना।”

     

    पत्र लिखते-लिखते उसकी आंखें भर आईं।

     

    फिर उसने आखिरी लाइन लिखी—

     

    “आप चाहे जितने दूर हो जाओ, मेरे लिए हमेशा वही रहोगे जो बचपन में कहते थे—मैं हूं ना।”

     

    उसने लिफाफा बंद कर दिया।

     

    रक्षाबंधन आ गया।

     

    सुबह से ही मीरा का मन बेचैन था।

     

    वह बार-बार मोबाइल देखती।

     

    कोई कॉल नहीं।

     

    दोपहर हुई।

     

    कोई संदेश नहीं।

     

    शाम हो गई।

     

    अब भी कुछ नहीं।

     

    माँ ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    मीरा ने कहा,

     

    “कुछ नहीं।”

     

    माँ ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “अभिषेक का इंतजार कर रही है?”

     

    मीरा ने तुरंत कहा,

     

    “नहीं।”

     

    लेकिन उसकी आंखें सच बता रही थीं।

     

    रात को उसने खुद को समझाया।

     

    “हर साल ऐसा ही होता है। इस बार इतना सोचने की क्या जरूरत है?”

     

    उसने मोबाइल एक तरफ रख दिया।

     

    तभी दरवाजे की घंटी बजी।

     

    मीरा ने सोचा शायद कोई पड़ोसी होगा।

     

    उसने दरवाजा खोला।

     

    और सामने…

     

    अभिषेक खड़ा था।

     

    कुछ सेकंड तक मीरा को विश्वास ही नहीं हुआ।

     

    “भैया?”

     

    अभिषेक हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “अंदर नहीं बुलाएगी?”

     

    मीरा की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “आप… यहां?”

     

    वह कुछ कहे बिना भाई के गले लग गई।

     

    कई सालों की शिकायतें उस एक पल में जैसे बाहर आ गईं।

     

    अभिषेक ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “इतना रोएगी तो पड़ोसी सोचेंगे मैंने कुछ किया है।”

     

    मीरा रोते-रोते हंस पड़ी।

     

    माँ भी बाहर आ गईं।

     

    “अभिषेक!”

     

    वह माँ के पैर छूने लगा।

     

    घर में अचानक खुशी लौट आई।

     

    कुछ देर बाद मीरा ने पूछा,

     

    “लेकिन आप आए कैसे? आपने बताया भी नहीं।”

     

    अभिषेक ने अपना बैग खोला।

     

    उसने अंदर से एक डिब्बा निकाला।

     

    मीरा ने खोला।

     

    और वह हैरान रह गई।

     

    अंदर…

     

    राखियां थीं।

     

    बहुत सारी राखियां।

     

    लाल।

     

    पीली।

     

    हरी।

     

    साधारण।

     

    रंगीन।

     

    पुरानी।

     

    नई।

     

    मीरा ने एक-एक करके उन्हें देखा।

     

    उसकी आंखें भर आईं।

     

    “ये सब…?”

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “तेरी भेजी हुई हैं।”

     

    मीरा ने धीरे से पूछा,

     

    “सभी?”

     

    “एक भी नहीं फेंकी।”

     

    मीरा कुछ बोल नहीं पाई।

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “तू सोचती थी मुझे फर्क नहीं पड़ता?”

     

    मीरा की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “आपने कभी बताया नहीं।”

     

    अभिषेक चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “मुझसे गलतियां हुई हैं।”

     

    मीरा उसकी तरफ देखने लगी।

     

    “जब मैं घर से दूर गया, मुझे लगा काम खत्म करके आराम से बात करूंगा।”

     

    वह हल्का-सा हंसा।

     

    “लेकिन काम कभी खत्म ही नहीं हुआ।”

     

    मीरा चुप रही।

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “हर साल राखी आती थी। मैं उसे खोलता था। बांधता था।”

     

    “फिर फोन क्यों नहीं किया?”

     

    इस सवाल पर अभिषेक की आंखें झुक गईं।

     

    “शायद आदत खराब हो गई।”

     

    मीरा ने कहा,

     

    “एक फोन करने की?”

     

    “हां।”

     

    फिर वह गंभीर होकर बोला,

     

    “हम अक्सर सोचते रहते हैं कि अपनों से बात बाद में कर लेंगे।”

     

    मीरा ध्यान से सुन रही थी।

     

    “लेकिन बाद में करते-करते कई साल निकल जाते हैं।”

     

    उसकी आवाज धीमी हो गई।

     

    “और फिर एक दिन पता चलता है कि अपने हमसे दूर नहीं गए थे… हम खुद उनसे दूर होते गए।”

     

    मीरा की आंखें भर आईं।

     

    अभिषेक ने बैग से एक और चीज निकाली।

     

    वह वही पत्र था जो मीरा ने राखी के साथ भेजा था।

     

    “ये भी मिला।”

     

    मीरा ने शर्म से कहा,

     

    “पढ़ लिया?”

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “कई बार।”

     

    मीरा ने उसकी तरफ देखा।

     

    अभिषेक बोला,

     

    “उस आखिरी लाइन ने मुझे बहुत देर तक सोचने पर मजबूर किया।”

     

    “कौन-सी?”

     

    “मैं हूं ना।”

     

    मीरा चुप हो गई।

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “बचपन में मैं तुझे ये बात कहता था।”

     

    फिर उसने मुस्कुराकर कहा,

     

    “लेकिन बड़ा होकर खुद ही गायब हो गया।”

     

    मीरा की आंखों से फिर आंसू निकल आए।

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “इस बार सोचा कि सिर्फ ‘Thanks’ लिखकर बात खत्म नहीं करूंगा।”

     

    मीरा ने हल्के से कहा,

     

    “तो?”

     

    “इस बार राखी खुद बंधवाने आऊंगा।”

     

    मीरा मुस्कुरा दी।

     

    वह तुरंत अंदर गई और पूजा की थाली लेकर आई।

     

    अभिषेक उसके सामने बैठ गया।

     

    मीरा ने तिलक लगाया।

     

    राखी उठाई।

     

    लेकिन इस बार उसका हाथ कांप नहीं रहा था।

     

    उसने धीरे से भाई की कलाई पर राखी बांध दी।

     

    अभिषेक ने पूछा,

     

    “अब क्या मांगोगी?”

     

    मीरा ने कहा,

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “पक्का?”

     

    “हां।”

     

    “गिफ्ट नहीं चाहिए?”

     

    मीरा ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “लेकिन इस बार मैं गिफ्ट देने के लिए तैयार होकर आया हूं।”

     

    मीरा ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “एक वादा।”

     

    मीरा की आंखें उसकी तरफ उठ गईं।

     

    “कैसा वादा?”

     

    अभिषेक ने अपना मोबाइल निकाला।

     

    उसमें एक नया अलार्म लगा था।

     

    हर रविवार शाम सात बजे।

     

    नाम लिखा था—

     

    “मीरा को फोन करना।”

     

    मीरा हंस पड़ी।

     

    “इसके लिए अलार्म लगाना पड़ेगा?”

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि कुछ रिश्ते इतने जरूरी होते हैं कि उन्हें किस्मत और व्यस्तता के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए।”

     

    मीरा की आंखें नम हो गईं।

     

    “तो हर रविवार फोन करोगे?”

     

    “हां।”

     

    “और अगर भूल गए?”

     

    अभिषेक मुस्कुराया।

     

    “तो अलार्म याद दिला देगा।”

     

    मीरा ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    अभिषेक ने पूछा,

     

    “फिर?”

     

    मीरा ने उसकी राखी की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “ये याद दिलाएगी।”

     

    अभिषेक कुछ सेकंड तक अपनी कलाई को देखता रहा।

     

    फिर उसने कहा,

     

    “पक्का।”

     

    उस रात दोनों बहुत देर तक बातें करते रहे।

     

    बचपन की।

     

    स्कूल की।

     

    पुरानी शरारतों की।

     

    उन दिनों की, जिन्हें दोनों ने अपनी जिंदगी की जल्दी में कहीं पीछे छोड़ दिया था।

     

    सुबह जब अभिषेक वापस जाने लगा, मीरा ने पूछा,

     

    “भैया?”

     

    “हां?”

     

    “अगली राखी पर फिर आओगे?”

     

    अभिषेक मुस्कुराया।

     

    “अगर तू भेजेगी तो।”

     

    मीरा ने कहा,

     

    “नहीं भेजूंगी।”

     

    अभिषेक हैरान हुआ।

     

    “क्यों?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि इस बार मैं खुद आकर बांधूंगी।”

     

    अभिषेक हंस पड़ा।

     

    “फिर ठीक है।”

     

    दोनों कुछ सेकंड तक एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “मीरा।”

     

    “हां?”

     

    “अब भी वही कह सकता हूं।”

     

    मीरा की आंखें नम हो गईं।

     

    “क्या?”

     

    अभिषेक ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मैं हूं ना।”

     

    मीरा मुस्कुरा दी।

     

    और इस बार उसे उन शब्दों पर कोई शक नहीं था।

     

    क्योंकि कभी-कभी प्यार खत्म नहीं होता।

     

    बस लोग उसे जताना भूल जाते हैं।

     

    और कभी-कभी एक छोटी-सी राखी…

     

    सालों की दूरी को याद दिला देती है कि रिश्ता अभी भी वहीं है।

     

    बस किसी एक को…

     

    दरवाजा खोलकर कहना होता है—

     

    “मैं आ गया।”

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं