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सुदामा ने जो देखा यकीन नहीं हुआ

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

अध्याय 10 — सुदामा ने जो देखा, उसे यकीन नहीं हुआ

 

सुदामा धीरे-धीरे अपने गाँव की तरफ बढ़ रहे थे।

 

उनके मन में कृष्ण की बातें घूम रही थीं।

 

बार-बार उन्हें वही पल याद आ रहा था जब कृष्ण ने उन्हें गले लगाया था।

 

सुदामा के मन में एक अजीब-सी शांति थी।

 

उन्होंने कृष्ण से कुछ नहीं माँगा था।

 

न पैसे की बात की थी, न घर की परेशानी बताई थी।

 

फिर भी कृष्ण ने उन्हें ऐसे अपनाया था जैसे इतने साल कभी बीते ही न हों।

 

सुदामा रास्ते में मुस्कुराते हुए सोच रहे थे,

 

“सच में… मेरा कृष्ण बिल्कुल नहीं बदला।”

 

लेकिन जैसे-जैसे वह अपने गाँव के करीब पहुँचे, उन्हें कुछ अजीब-सा दिखाई देने लगा।

 

दूर से उन्हें एक बड़ा-सा घर दिखाई दे रहा था।

 

सुदामा रुक गए।

 

उन्होंने आँखें छोटी करके उस घर को देखा।

 

“ये यहाँ कब बन गया?”

 

उन्हें समझ नहीं आया।

 

जहाँ उनका छोटा-सा टूटा घर हुआ करता था, वहाँ अब एक सुंदर और बड़ा भवन खड़ा था।

 

आस-पास के रास्ते भी साफ थे।

 

कुछ लोग उस घर के बाहर खड़े थे।

 

सुदामा ने सोचा,

 

“शायद मैं गलत रास्ते पर आ गया हूँ।”

 

वह कुछ कदम पीछे हटे और फिर गाँव की तरफ देखा।

 

पेड़ वही थे।

 

कुएँ की जगह वही थी।

 

वही पुराना रास्ता भी था।

 

सुदामा का दिल तेजी से धड़कने लगा।

 

“नहीं… मैं सही जगह आया हूँ।”

 

वह धीरे-धीरे उस भवन की तरफ बढ़े।

 

जितना पास जाते, उतना ही उनका हैरान होना बढ़ता जाता।

 

मुख्य दरवाजे पर सुंदर नक्काशी थी।

 

आँगन बड़ा था।

 

लेकिन सुदामा की नजर उस जगह पर अटक गई जहाँ कभी उनका छोटा-सा घर हुआ करता था।

 

वही जगह।

 

वही मिट्टी का आँगन।

 

वही पुराना पेड़।

 

लेकिन घर…

 

घर बिल्कुल बदल चुका था।

 

सुदामा के मुँह से बस इतना निकला,

 

“ये कैसे हो सकता है?”

 

तभी अंदर से किसी की आवाज आई।

 

“आप कौन हैं?”

 

सुदामा ने पलटकर देखा।

 

एक आदमी दरवाजे के पास खड़ा था।

 

सुदामा ने पूछा,

 

“भाई, यहाँ पहले एक छोटा-सा घर था। बहुत गरीब परिवार रहता था। उसकी पत्नी और बच्चे…”

 

वह आदमी मुस्कुराया।

 

“आप किसे ढूँढ रहे हैं?”

 

सुदामा ने अपना नाम बताने में भी संकोच किया।

 

“मैं… सुदामा को ढूँढ रहा हूँ।”

 

आदमी ने कुछ पल उन्हें देखा।

 

फिर मुस्कुराकर बोला,

 

“तो फिर आपको कहीं जाने की जरूरत नहीं है।”

 

सुदामा चौंक गए।

 

“क्यों?”

 

उस आदमी ने हाथ जोड़कर कहा,

 

“क्योंकि आप ही सुदामा हैं।”

 

सुदामा की आँखें फैल गईं।

 

“तुम्हें मेरा नाम कैसे पता?”

 

उस आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

बस दरवाजे की तरफ इशारा कर दिया।

 

“अंदर जाइए।”

 

सुदामा का दिल अब और तेज धड़क रहा था।

 

वह धीरे-धीरे अंदर गए।

 

आँगन में कदम रखते ही उन्हें सामने एक स्त्री दिखाई दी।

 

वह उनकी पत्नी थीं।

 

लेकिन सुदामा उन्हें देखकर कुछ पल के लिए पहचान ही नहीं पाए।

 

उनकी पत्नी ने उन्हें देखते ही दौड़कर उनके पास आकर कहा,

 

“आप आ गए!”

 

सुदामा बस उन्हें देखते रह गए।

 

“ये… ये सब क्या है?”

 

उनकी पत्नी की आँखों में आँसू आ गए।

 

“मुझे भी नहीं पता।”

 

“लेकिन हमारा घर…”

 

“घर तो सुबह तक वही था।”

 

सुदामा ने हैरानी से पूछा,

 

“फिर ये सब कैसे हुआ?”

 

उनकी पत्नी ने सिर हिलाया।

 

“मुझे नहीं पता।”

 

वह कुछ देर चुप रहीं।

 

फिर बोलीं,

 

“आज सुबह जब मैं बच्चों के साथ बाहर आई तो हमारा पुराना घर वहाँ था ही नहीं।”

 

“फिर?”

 

“फिर अचानक लोगों ने आकर कहा कि यह घर अब हमारा है।”

 

सुदामा की समझ में कुछ नहीं आ रहा था।

 

उन्होंने पूछा,

 

“किसने दिया?”

 

उनकी पत्नी ने धीरे से कहा,

 

“किसी ने अपना नाम नहीं बताया।”

 

सुदामा की नजरें नीचे हो गईं।

 

उन्हें कृष्ण याद आ गए।

 

वही मुस्कान।

 

वही बातें।

 

वही सवाल—

 

“तुम मेरे पास सिर्फ मिलने आए हो या दिल में कुछ और भी है?”

 

सुदामा की आँखें भर आईं।

 

उन्होंने धीरे से कहा,

 

“कृष्ण…”

 

पत्नी ने पूछा,

 

“क्या कहा आपने?”

 

सुदामा ने उनकी तरफ देखा।

 

“कुछ नहीं।”

 

लेकिन उनके मन में सब साफ हो चुका था।

 

कृष्ण ने बिना उनसे कुछ पूछे सब समझ लिया था।

 

सुदामा अंदर गए।

 

जहाँ पहले मिट्टी का फर्श था, वहाँ अब साफ-सुथरा आँगन था।

 

जहाँ बारिश में पानी टपकता था, वहाँ अब मजबूत छत थी।

 

बच्चों के लिए नए कपड़े रखे थे।

 

घर में अनाज भरा था।

 

लेकिन सुदामा की नजर इन चीजों पर नहीं थी।

 

वह एक कोने में जाकर चुपचाप बैठ गए।

 

उनकी पत्नी उनके पास आईं।

 

“आप खुश नहीं हैं?”

 

सुदामा ने उनकी तरफ देखा।

 

“बहुत खुश हूँ।”

 

“फिर रो क्यों रहे हैं?”

 

सुदामा ने आँसू पोंछते हुए कहा,

 

“क्योंकि मैंने आज समझा कि सच्चा दोस्त वही होता है जो तुम्हारे मुँह से बात निकलने का इंतजार नहीं करता।”

 

पत्नी कुछ समझ नहीं पाईं।

 

सुदामा मुस्कुराए।

 

“कृष्ण ने सब कर दिया।”

 

उनकी पत्नी की आँखें भी नम हो गईं।

 

“आपने उनसे कुछ माँगा था?”

 

सुदामा ने तुरंत सिर हिला दिया।

 

“नहीं।”

 

“फिर?”

 

“बस… चिवड़ा दिया था।”

 

पत्नी हँसते-हँसते रोने लगीं।

 

“इतना-सा चिवड़ा?”

 

सुदामा ने कहा,

 

“हाँ।”

 

फिर कुछ देर दोनों चुप रहे।

 

सुदामा ने अपनी पत्नी से कहा,

 

“तुमने मुझे कृष्ण के पास भेजा था।”

 

“हाँ।”

 

“अगर तुम मुझे नहीं भेजतीं तो?”

 

पत्नी ने मुस्कुराकर कहा,

 

“तो शायद आज भी हम उसी पुराने घर में बैठे होते।”

 

सुदामा ने आसमान की तरफ देखा।

 

उनके चेहरे पर संतोष था।

 

लेकिन तभी उनके छोटे बेटे ने दौड़कर आकर कहा,

 

“पिताजी!”

 

सुदामा ने उसे अपनी गोद में उठा लिया।

 

“क्या हुआ?”

 

बेटे ने उत्साह से कहा,

 

“पिताजी, आज घर में बहुत सारे लोग आए थे।”

 

सुदामा ने पूछा,

 

“कौन लोग?”

 

बेटे ने सिर हिलाया।

 

“पता नहीं। लेकिन जाते समय एक आदमी मुझे एक बात कहकर गया।”

 

सुदामा अचानक गंभीर हो गए।

 

“क्या बात?”

 

बेटे ने कहा,

 

“उसने कहा था कि पिताजी जब वापस आएँ तो उनसे कहना…”

 

वह रुक गया।

 

सुदामा ने पूछा,

 

“क्या कहना?”

 

बेटे ने मासूमियत से कहा,

 

“कृष्ण अपने दोस्त को कभी अकेला नहीं छोड़ते।”

 

सुदामा की आँखों से आँसू निकल पड़े।

 

उन्होंने बेटे को सीने से लगा लिया।

 

अब उन्हें किसी सबूत की जरूरत नहीं थी।

 

वह समझ चुके थे कि यह सब कृष्ण का ही किया हुआ था।

 

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई थी।

 

उसी शाम जब सुदामा अपने नए घर के बाहर बैठे थे, एक अनजान व्यक्ति वहाँ आया।

 

उसने सुदामा के सामने एक छोटी-सी पोटली रखी।

 

सुदामा ने पूछा,

 

“ये क्या है?”

 

उस व्यक्ति ने कहा,

 

“द्वारका से आपके लिए संदेश आया है।”

 

सुदामा का दिल धक से रह गया।

 

“द्वारका से?”

 

उस व्यक्ति ने सिर हिलाया।

 

“हाँ।”

 

सुदामा ने पोटली खोली।

 

उसमें एक छोटी-सी चीज थी।

 

उसे देखते ही सुदामा की आँखें भर आईं।

 

वह वही चीज थी…

 

जो गुरुकुल के दिनों में कृष्ण और सुदामा दोनों के पास हुआ करती थी।

 

सुदामा उसे हाथ में लेकर बस एक ही बात कह पाए—

 

“कृष्ण… तुमने मुझे याद भी रखा।”

 

लेकिन उस छोटी-सी चीज के साथ एक संदेश भी था।

 

और उस संदेश में जो लिखा था…

 

उसे पढ़कर सुदामा के चेहरे की मुस्कान अचानक गायब हो गई।

 

क्रमशः…

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Auther preeti Sharma

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

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