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नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

पढ़ने का समय : 10 मिनट

 

 

(भाग 8 — यशोदा मैया ने कृष्ण को बाँधा)

 

 

 

 

गोकुल में उस दिन सुबह से ही एक अलग-सी चहल-पहल थी।सूरज की सुनहरी किरणें नंदभवन के आँगन में फैल रही थीं। गायों की घंटियों की मधुर आवाज वातावरण में गूँज रही थी। बछड़े अपनी माताओं के पास उछल-कूद कर रहे थे और गोकुल की गलियों में गोपियाँ अपने-अपने घरों के काम में व्यस्त थीं।

 

लेकिन नंदभवन के भीतर यशोदा मैया एक विशेष काम में लगी हुई थीं।

 

वे स्वयं अपने हाथों से दही मथ रही थीं।

 

मटकी में दही घूम रहा था और मथनी की आवाज पूरे आँगन में मधुर लय पैदा कर रही थी।

 

यशोदा मैया के होंठों पर धीरे-धीरे एक गीत था।

 

वह गीत किसी देवता के लिए नहीं था।

 

वह गीत उनके अपने लाल के लिए था।

 

उनका मन बार-बार उसी नन्हे कान्हा की ओर जा रहा था।

 

वे सोच रही थीं—

 

“मेरा लाल अब कितना बड़ा हो गया है। दिनभर गोकुल में दौड़ता रहता है। कभी किसी के घर से माखन चुरा लाता है, कभी मटकी फोड़ देता है, कभी बंदरों को माखन खिला देता है। न जाने कब सुधरेगा मेरा कान्हा!”

 

यह सोचते-सोचते उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

 

उन्हें क्या पता था कि उनका वही नटखट लाल आज फिर ऐसी लीला करने वाला है, जिसे देखकर पूरा गोकुल हँसेगा और स्वयं यशोदा मैया को उसके पीछे दौड़ना पड़ेगा।

 

कान्हा को भी चाहिए था मैया का प्रेम

 

कृष्ण उस समय आँगन में खेल रहे थे।

 

कभी मिट्टी में अपनी छोटी-सी लकड़ी घुमाते।

 

कभी किसी बछड़े के पीछे भागते।

 

कभी अपने सखाओं को आवाज लगाते।

 

लेकिन थोड़ी ही देर में उन्हें अपनी मैया की याद आने लगी।

 

वे धीरे-धीरे चलकर यशोदा मैया के पास पहुँचे।

 

मैया दही मथने में व्यस्त थीं।

 

कृष्ण ने मैया की ओर देखा।

 

फिर मटकी की ओर देखा।

 

फिर मैया की गोद की ओर।

 

उन्होंने धीरे से कहा,

 

“मैया!”

 

यशोदा मैया ने मुस्कुराकर पूछा,

 

“क्या हुआ मेरे लाल?”

 

कृष्ण ने दोनों हाथ ऊपर कर दिए।

 

“गोद में लो।”

 

यशोदा मैया ने मथनी रोक दी।

 

उन्होंने कृष्ण को अपनी गोद में उठा लिया।

 

कान्हा मैया के गले से लग गए।

 

यशोदा मैया ने उनके बालों को सहलाते हुए पूछा,

 

“क्या हुआ? आज इतनी जल्दी मैया की याद आ गई?”

 

कृष्ण कुछ नहीं बोले।

 

बस मैया से लिपटे रहे।

 

यशोदा मैया ने उनके माथे को चूमा।

 

फिर बोलीं,

 

“अच्छा, बताओ क्या चाहिए?”

 

कृष्ण ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मैया की ओर देखा।

 

“माखन।”

 

यशोदा मैया हँस पड़ीं।

 

“अभी तो दही मथ रही हूँ।”

 

“मुझे अभी चाहिए।”

 

“थोड़ा इंतजार करो।”

 

कृष्ण ने मुँह फुला लिया।

 

“नहीं।”

 

यशोदा मैया ने कहा,

 

“कान्हा, तुम बहुत जिद्दी हो गए हो।”

 

कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

 

“आप मुझे माखन दे दो, मैं जिद नहीं करूँगा।”

 

मैया बोलीं,

 

“अच्छा, पहले बैठो।”

 

कृष्ण मैया की गोद में बैठ गए।

 

लेकिन तभी बाहर से किसी बछड़े की आवाज आई।

 

कृष्ण ने उस ओर देखा।

 

फिर मैया की गोद से उतरने लगे।

 

यशोदा मैया ने कहा,

 

“कहाँ जा रहे हो?”

 

कृष्ण बोले,

 

“बाहर।”

 

“पहले माखन तो खा लो।”

 

कृष्ण फिर बैठ गए।

 

यशोदा मैया ने माखन निकाला और अपने हाथ से कृष्ण को खिलाने लगीं।

 

कृष्ण बड़े आनंद से माखन खाने लगे।

 

लेकिन तभी…

 

चूल्हे पर रखा दूध उबलने लगा।

 

यशोदा मैया ने आवाज सुनी।

 

उन्होंने कृष्ण को नीचे बैठाया और कहा,

 

“बेटा, तुम यहीं बैठो। मैया अभी आती है।”

 

और वे दूध बचाने के लिए रसोई की ओर चली गईं।

 

कान्हा का रूठना

 

कृष्ण ने मैया को जाते हुए देखा।

 

उनके हाथ में अभी माखन लगा था।

 

वे कुछ क्षण चुप रहे।

 

फिर उनके चेहरे पर हल्की-सी नाराजगी दिखाई दी।

 

उन्होंने सोचा—

 

“मैया मुझे छोड़कर दूध बचाने चली गईं!”

 

उनका नन्हा-सा मन अपनी माँ का पूरा ध्यान चाहता था।

 

उन्होंने पास रखी मटकी की ओर देखा।

 

फिर एक छोटी-सी लकड़ी उठाई।

 

और मटकी पर हल्के से प्रहार किया।

 

ठक!

 

मटकी में दरार आ गई।

 

फिर एक और प्रहार।

 

ठक!

 

और मटकी टूट गई।

 

दही और माखन नीचे गिरने लगा।

 

कृष्ण ने चारों ओर देखा।

 

फिर मुस्कुराए।

 

उन्होंने माखन उठाया और खाने लगे।

 

कुछ देर बाद उन्होंने अपने सखाओं को भी बुला लिया।

 

बंदर भी आ गए।

 

अब आँगन में फिर वही पुरानी शरारत शुरू हो गई।

 

यशोदा मैया ने देखा

 

कुछ देर बाद यशोदा मैया वापस आईं।

 

उन्होंने देखा कि जिस मटकी को उन्होंने बड़े प्रेम से तैयार किया था, वह टूटी पड़ी है।

 

दही पूरे फर्श पर फैला हुआ है।

 

और उनका कान्हा?

 

वह पास ही बैठा माखन खा रहा है।

 

यशोदा मैया ने पहले कुछ क्षणों तक उसे देखा।

 

फिर उनकी आँखों में हल्का क्रोध आ गया।

 

“कान्हा!”

 

कृष्ण ने पीछे मुड़कर देखा।

 

मैया को देखते ही समझ गए कि आज स्थिति गंभीर है।

 

उन्होंने तुरंत उठकर भागना शुरू कर दिया।

 

यशोदा मैया बोलीं,

 

“रुको!”

 

लेकिन कृष्ण कहाँ रुकने वाले थे?

 

वे आँगन से बाहर भागे।

 

माँ और पुत्र की दौड़

 

कृष्ण आगे।

 

यशोदा मैया पीछे।

 

कृष्ण कभी दाएँ जाते, कभी बाएँ।

 

कभी किसी खंभे के पीछे छिप जाते।

 

कभी किसी गाय के पीछे।

 

कभी अचानक मुड़कर मैया की ओर देखते और हँस देते।

 

यशोदा मैया उन्हें पकड़ने की कोशिश करतीं, लेकिन कृष्ण फिसलकर निकल जाते।

 

उनके पैरों में बंधी छोटी-छोटी पायल छन-छन कर रही थीं।

 

उनके घुँघराले बाल माथे पर आ गए थे।

 

वे हँसते हुए भाग रहे थे।

 

यशोदा मैया भी दौड़ते-दौड़ते थकने लगीं।

 

लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

 

आखिरकार एक क्षण ऐसा आया जब कृष्ण पीछे हटते-हटते एक कोने में पहुँच गए।

 

अब आगे जाने का रास्ता नहीं था।

 

यशोदा मैया धीरे-धीरे उनके पास पहुँचीं।

 

कृष्ण ने मैया की ओर देखा।

 

उनकी आँखों में अब थोड़ी चिंता थी।

 

मैया ने कहा,

 

“क्यों रे नटखट! बहुत दौड़ा लिया अपनी मैया को?”

 

कृष्ण ने धीरे से सिर झुका लिया।

 

यशोदा मैया ने उन्हें पकड़ लिया।

 

कृष्ण अब मैया की बाँहों में थे।

 

उन्होंने कहा,

 

“मैया, अब नहीं करूँगा।”

 

मैया बोलीं,

 

“हर बार यही कहते हो।”

 

कृष्ण चुप।

 

“फिर वही शरारत करते हो।”

 

कृष्ण ने मैया की ओर देखा।

 

“गलती हो गई।”

 

यशोदा मैया का मन पिघलने लगा।

 

लेकिन आज वे केवल प्यार करके छोड़ देना नहीं चाहती थीं।

 

उन्होंने सोचा—

 

“इसे थोड़ा अनुशासन भी सिखाना होगा।”

 

कृष्ण को बाँधने का विचार

 

आँगन में एक बड़ी-सी लकड़ी की ओखली रखी थी।

 

यशोदा मैया ने सोचा कि कृष्ण को कुछ देर इसी के पास बैठा देती हैं, ताकि वह फिर कोई शरारत न करे।

 

उन्होंने एक रस्सी उठाई।

 

कृष्ण ने रस्सी देखी तो उनकी आँखें बड़ी हो गईं।

 

“मैया, यह क्या है?”

 

“तुम्हें बाँधूँगी।”

 

कृष्ण ने आश्चर्य से पूछा,

 

“मुझे?”

 

“हाँ।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि तुम बहुत शरारत करते हो।”

 

कृष्ण ने तुरंत दोनों हाथ जोड़ दिए।

 

“मैया, नहीं।”

 

यशोदा मैया बोलीं,

 

“आज नहीं छोड़ूँगी।”

 

कृष्ण मैया की ओर देखकर मुस्कुराने लगे।

 

मैया ने रस्सी से उन्हें ओखली के पास बाँधने का प्रयास किया।

 

लेकिन जैसे ही उन्होंने रस्सी बाँधी—

 

वह छोटी पड़ गई।

 

यशोदा मैया ने सोचा—

 

“अरे! यह रस्सी तो छोटी है।”

 

उन्होंने दूसरी रस्सी जोड़ दी।

 

फिर बाँधने लगीं।

 

लेकिन फिर भी रस्सी थोड़ी छोटी पड़ गई।

 

मैया ने तीसरी रस्सी जोड़ी।

 

फिर भी वही स्थिति।

 

यशोदा मैया आश्चर्य में पड़ गईं।

 

उन्होंने कहा,

 

“यह कैसे हो रहा है?”

 

कृष्ण चुपचाप मैया को देखते रहे।

 

उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

 

गोपियाँ भी आ गईं

 

इतने में पास की कुछ गोपियाँ वहाँ आ गईं।

 

उन्होंने देखा कि यशोदा मैया अपने कान्हा को बाँधने की कोशिश कर रही हैं।

 

एक गोपी ने हँसते हुए कहा,

 

“मैया, हमने तो पहले ही कहा था कि आपका कान्हा बहुत नटखट है।”

 

दूसरी बोली,

 

“लेकिन आज तो लगता है रस्सी भी हार गई।”

 

तीसरी बोली,

 

“कान्हा को बाँधना इतना आसान नहीं है।”

 

यशोदा मैया ने कहा,

 

“तुम लोग हँसो मत। जरा मेरी सहायता करो।”

 

गोपियों ने दूसरी रस्सी ला दी।

 

मैया ने उसे जोड़ दिया।

 

फिर कोशिश की।

 

फिर भी रस्सी छोटी।

 

अब यशोदा मैया को थोड़ा आश्चर्य होने लगा।

 

उन्होंने कृष्ण की ओर देखा।

 

“कान्हा, तुम इतने बड़े कब हो गए?”

 

कृष्ण मुस्कुराए।

 

मैया ने फिर प्रयास किया।

 

एक और रस्सी जोड़ी।

 

अब भी वही स्थिति।

 

गोपियाँ आश्चर्य से एक-दूसरे को देखने लगीं।

 

किसी ने कहा,

 

“मैया, यह तो बड़ी अद्भुत बात है।”

 

यशोदा मैया बोलीं,

 

“अद्भुत-वद्भुत कुछ नहीं। मेरा बच्चा है। बस रस्सी छोटी पड़ रही है।”

 

उन्होंने फिर रस्सी बढ़ाई।

 

लेकिन हर बार रस्सी बाँधने पर दो अंगुल की कमी रह जाती।

 

मैया के माथे पर पसीना आने लगा।

 

वे थक चुकी थीं।

 

लेकिन उनके मन में अपने लाल के लिए दृढ़ता थी।

 

वात्सल्य के आगे झुक गए भगवान

 

कृष्ण अपनी मैया को देख रहे थे।

 

वे देख रहे थे कि मैया कितनी मेहनत कर रही हैं।

 

उनके माथे पर पसीने की बूँदें थीं।

 

बाल थोड़े बिखर गए थे।

 

लेकिन वे अपने पुत्र को बाँधने के लिए लगातार प्रयास कर रही थीं।

 

कृष्ण के हृदय में अपनी मैया के प्रति प्रेम उमड़ आया।

 

वे तो स्वयं अनंत थे।

 

जिन्हें कोई बाँध नहीं सकता।

 

लेकिन आज एक माँ का प्रेम उन्हें बाँधने के लिए तैयार था।

 

कृष्ण ने सोचा—

 

“मेरी मैया थक गई हैं। उनका प्रेम ही मेरे लिए सबसे बड़ा बंधन है।”

 

और तभी…

 

जब यशोदा मैया ने फिर से रस्सी बाँधी—

 

इस बार रस्सी पूरी हो गई।

 

मैया ने आश्चर्य से देखा।

 

कृष्ण अब ओखली से बँधे थे।

 

गोपियाँ प्रसन्न हो गईं।

 

यशोदा मैया ने राहत की साँस ली।

 

उन्होंने कृष्ण के माथे से पसीना पोंछा।

 

और बोलीं,

 

“अब बैठो यहाँ। थोड़ी देर शांति से रहो।”

 

कृष्ण ने मैया की ओर देखा।

 

उनके चेहरे पर कोई क्रोध नहीं था।

 

बल्कि एक प्यारी-सी मुस्कान थी।

 

जैसे वे कह रहे हों—

 

“मैया, तुम्हारे प्रेम ने मुझे बाँध लिया।”

 

नाम पड़ा — दामोदर

 

कृष्ण का पेट रस्सी से बँधा था।

 

इसी कारण आगे चलकर उन्हें दामोदर नाम से भी पुकारा गया।

 

लेकिन यह केवल रस्सी का बंधन नहीं था।

 

यह एक माँ के प्रेम का बंधन था।

 

ऐसा प्रेम, जिसके सामने स्वयं भगवान भी अपने अनंत स्वरूप को भूलकर बालक बन जाते हैं।

 

यशोदा मैया अपने काम में वापस चली गईं।

 

उन्हें लगा कि अब कान्हा कुछ देर शांति से बैठेंगे।

 

लेकिन…

 

क्या सचमुच कान्हा इतनी आसानी से शांत बैठने वाले थे?

 

कृष्ण ने ओखली की ओर देखा।

 

फिर सामने की ओर।

 

थोड़ी दूरी पर दो बहुत बड़े वृक्ष खड़े थे।

 

वे ऊँचे थे।

 

बहुत पुराने थे।

 

कृष्ण उन्हें कुछ देर तक देखते रहे।

 

फिर उनकी आँखों में वही पुरानी शरारती चमक लौट आई।

 

उन्होंने ओखली को देखा।

 

फिर वृक्षों को।

 

और धीरे से मुस्कुराए।

 

उन्होंने अपने छोटे-छोटे हाथों से ओखली को खींचने की कोशिश की।

 

ओखली थोड़ी-सी हिली।

 

कृष्ण ने फिर खींचा।

 

ओखली आगे बढ़ी।

 

वे मुस्कुराए।

 

फिर एक बार और जोर लगाया।

 

ओखली घिसटती हुई वृक्षों की ओर बढ़ने लगी।

 

गोकुल में किसी को अंदाजा भी नहीं था कि यह नन्हा-सा बालक अब ऐसी लीला करने वाला है, जिसे देखकर सबकी आँखें आश्चर्य से खुली रह जाएँगी।

 

कृष्ण धीरे-धीरे उन दोनों विशाल वृक्षों के बीच पहुँचने लगे।

 

ओखली पीछे से उनके साथ घिसट रही थी।

 

फिर कृष्ण ने एक बार जोर लगाया।

 

और…

 

धरती काँप उठी।

 

  1. दोनों विशाल वृक्ष हिलने लगे।

 

गोकुलवासियों को समझ ही नहीं आया कि अचानक यह कैसी आवाज हुई।

 

यशोदा मैया भी चौंककर बाहर देखने लगीं।

 

उनकी आँखों के सामने जो दृश्य था, उसे देखकर वे स्तब्ध रह गईं।

 

आखिर उन दोनों विशाल वृक्षों के भीतर ऐसा क्या रहस्य छिपा था?

 

और क्यों नन्हे कान्हा अपनी ओखली को लेकर उन्हीं वृक्षों के बीच जा रहे थे?

 

अगली कड़ी में जानिए—

 

भाग 9 — यमलार्जुन वृक्षों का उद्धार……✍️✍️

 

 

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Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

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