(भाग 9 — यमलार्जुन वृक्षों का उद्धार)
गोकुल में उस दिन की सुबह अब धीरे-धीरे दोपहर की ओर बढ़ रही थी।नंदभवन के आँगन में यशोदा मैया अपने काम में व्यस्त थीं। कुछ देर पहले तक उनके नन्हे कान्हा की शरारतों से पूरा घर गूँज रहा था। मटकी टूट चुकी थी, दही आँगन में फैल चुका था और अंत में यशोदा मैया ने अपने नटखट लाल को एक भारी लकड़ी की ओखली से बाँध दिया था।
मैया को लगा था कि अब कान्हा कुछ देर शांत बैठेंगे।
लेकिन वे यह भूल गई थीं कि उनका कान्हा साधारण बालक नहीं था।
वह तो ऐसा बालक था, जिसके लिए पूरा संसार भी खेल का मैदान था।
कृष्ण ओखली से बँधे हुए चुपचाप बैठे थे।
उनकी छोटी-छोटी आँखें कभी मैया की ओर जातीं, कभी आँगन की ओर और कभी सामने खड़े दो विशाल वृक्षों पर टिक जातीं।
वे दोनों वृक्ष बहुत पुराने थे।
इतने विशाल कि उनकी शाखाएँ दूर-दूर तक फैली हुई थीं।
गोकुल के बच्चों के लिए वे दोनों वृक्ष किसी पहाड़ से कम नहीं थे।
उनके नीचे अक्सर पक्षी बैठते।
गोपियाँ वहाँ से गुजरतीं।
ग्वाल-बाल कभी उनके आसपास खेलते।
लेकिन आज उन वृक्षों के सामने स्वयं नंदलाल खड़े थे।
रस्सी से बँधे हुए।
ओखली पीछे।
और आँखों में शरारत की चमक।
कान्हा ने मन में कुछ ठाना
कृष्ण ने धीरे से ओखली को देखा।
उन्होंने एक बार उसे खींचा।
ओखली थोड़ी-सी आगे सरकी।
कृष्ण मुस्कुराए।
उन्होंने फिर जोर लगाया।
ओखली कुछ और आगे बढ़ी।
अब कृष्ण की आँखों में उत्साह था।
उन्होंने अपने छोटे-छोटे पैरों को जमीन पर जमाया और पूरी शक्ति से आगे बढ़ने लगे।
ओखली उनके पीछे घिसटती जा रही थी।
घुर्र… घुर्र…
मिट्टी पर ओखली के घिसटने की आवाज आने लगी।
पास खेल रहे कुछ बालकों ने यह देखा तो वे दौड़कर कृष्ण के पास आ गए।
श्रीदामा ने पूछा,
“कान्हा, तुम कहाँ जा रहे हो?”
कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,
“वहाँ।”
उन्होंने दोनों वृक्षों की ओर इशारा किया।
सुभल ने आश्चर्य से कहा,
“लेकिन तुम तो बँधे हुए हो!”
कृष्ण ने हँसते हुए कहा,
“बँधा हूँ… लेकिन चल तो सकता हूँ।”
सभी बालक हँस पड़े।
एक बालक बोला,
“यशोदा मैया ने कहा है कि तुम कहीं मत जाना।”
कृष्ण ने मासूम चेहरा बनाकर कहा,
“मैं कहाँ जा रहा हूँ? मैं तो बस खेल रहा हूँ।”
सभी सखा कृष्ण के पीछे-पीछे चलने लगे।
दो विशाल वृक्ष
कृष्ण अब उन दोनों वृक्षों के बिल्कुल पास पहुँच चुके थे।
दोनों वृक्ष इतने पास-पास खड़े थे कि उनके बीच से एक बालक निकल सकता था, लेकिन ओखली थोड़ी चौड़ी थी।
कृष्ण ने वृक्षों को देखा।
फिर ओखली को।
फिर वृक्षों के बीच की जगह को।
उनके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान आई।
उन्होंने सोचा—
“अगर मैं यहाँ से निकल जाऊँ तो?”
कृष्ण धीरे-धीरे आगे बढ़े।
ओखली वृक्षों के बीच फँस गई।
कृष्ण ने पीछे मुड़कर देखा।
ओखली अटक चुकी थी।
सुभल बोला,
“कान्हा! अब क्या करोगे?”
कृष्ण ने कहा,
“अब इसे निकालेंगे।”
उन्होंने रस्सी को पकड़ा।
फिर जोर लगाया।
ओखली नहीं हिली।
कृष्ण ने फिर जोर लगाया।
पेड़ों की जड़ें जैसे हिलने लगीं।
ग्वाल-बालों की आँखें बड़ी हो गईं।
श्रीदामा बोला,
“कान्हा! धीरे!”
लेकिन कृष्ण ने जैसे कुछ और ही ठान लिया था।
उन्होंने फिर अपने छोटे-से शरीर में पूरी शक्ति लगाई।
और तभी—
चर्रर्र…!
एक अजीब-सी आवाज हुई।
वृक्षों की शाखाएँ हिलने लगीं।
पत्ते तेज़ी से काँपने लगे।
पक्षी घबराकर उड़ गए।
ग्वाल-बाल पीछे हट गए।
कृष्ण ने रस्सी खींची।
और अगले ही क्षण—
धड़ाम!!!
दोनों विशाल वृक्ष धरती पर गिर पड़े।
गोकुल की धरती काँप उठी।
धूल का बादल चारों ओर फैल गया।
पक्षी आकाश में उड़ने लगे।
बच्चे डरकर इधर-उधर भागे।
और कुछ ही क्षणों में वहाँ एक अद्भुत दृश्य दिखाई दिया।
जहाँ अभी दो विशाल वृक्ष खड़े थे, वहाँ अब धरती पर उनके तने पड़े थे।
कृष्ण अपनी ओखली के साथ उनके बीच खड़े थे।
उनके चेहरे पर वही प्यारी-सी मुस्कान थी।
गोकुल में मची हलचल
वृक्षों के गिरने की आवाज इतनी तेज थी कि नंदभवन तक पहुँच गई।
यशोदा मैया घबरा गईं।
उन्होंने तुरंत बाहर आकर पूछा,
“यह कैसी आवाज हुई?”
एक गोपी दौड़ती हुई आई।
“मैया! मैया! जल्दी चलिए!”
“क्या हुआ?”
“कान्हा…!”
कृष्ण का नाम सुनते ही यशोदा मैया का हृदय धड़क उठा।
“क्या हुआ मेरे कान्हा को?”
गोपी ने कहा,
“वे उन बड़े वृक्षों के पास थे।”
यशोदा मैया बिना कुछ सोचे दौड़ पड़ीं।
उनके पीछे कई गोपियाँ और गोकुलवासी भी चल पड़े।
जब वे वहाँ पहुँचीं, तो उन्होंने देखा—
दोनों विशाल वृक्ष धरती पर पड़े थे।
और उनके बीच उनका कान्हा ओखली से बँधा हुआ बैठा था।
यशोदा मैया दौड़कर कृष्ण के पास पहुँचीं।
“कान्हा!”
उन्होंने तुरंत उसे अपनी बाँहों में भर लिया।
“बेटा, तुम्हें चोट तो नहीं लगी?”
कृष्ण ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।
“नहीं मैया।”
यशोदा मैया ने उन्हें चारों ओर से देखा।
उनके हाथ देखे।
पैर देखे।
चेहरा देखा।
कहीं कोई चोट नहीं थी।
उन्होंने राहत की साँस ली।
फिर बोलीं,
“तुम यहाँ कैसे आए?”
कृष्ण ने मासूमियत से कहा,
“मैया, मैं तो यहीं बैठा था।”
एक गोपी हँसते हुए बोली,
“मैया, आपका कान्हा यहीं बैठा था… लेकिन वृक्ष स्वयं चलकर गिर गए!”
सब लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
किसी को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर हुआ क्या था।
रहस्य गहरा था
गोकुल के बड़े-बुजुर्ग उन वृक्षों को देखकर हैरान थे।
इतने विशाल वृक्ष…
एक साथ कैसे गिर सकते थे?
वह भी बिना किसी आँधी या तूफान के?
नंदबाबा भी वहाँ पहुँच गए।
उन्होंने वृक्षों को देखा।
फिर कृष्ण को देखा।
फिर पूछा,
“यह कैसे हुआ?”
किसी के पास उत्तर नहीं था।
श्रीदामा आगे आया।
उसने कहा,
“बाबा, कान्हा ओखली खींचते हुए वृक्षों के बीच चला गया था।”
नंदबाबा ने आश्चर्य से पूछा,
“फिर?”
“फिर ओखली अटक गई।”
“और?”
“फिर कान्हा ने उसे खींचा।”
“फिर?”
श्रीदामा ने दोनों हाथ फैलाकर कहा,
“फिर दोनों पेड़ गिर गए!”
गोकुलवासी आश्चर्य से कृष्ण को देखने लगे।
इतना छोटा बालक…
और इतने विशाल वृक्ष?
लेकिन कृष्ण तो बिल्कुल सामान्य बालक की तरह यशोदा मैया की गोद में बैठे थे।
उनके हाथ में अभी भी माखन का थोड़ा-सा निशान लगा था।
उनके बाल बिखरे हुए थे।
चेहरे पर भोली मुस्कान थी।
उन्हें देखकर कोई विश्वास ही नहीं कर सकता था कि कुछ क्षण पहले उनके कारण दो विशाल वृक्ष धरती पर गिर पड़े थे।
वृक्षों से निकले दो दिव्य पुरुष
लेकिन असली रहस्य अभी सामने आना बाकी था।
अचानक वहाँ एक दिव्य प्रकाश फैलने लगा।
गोकुलवासियों ने देखा कि गिरे हुए दोनों वृक्षों के स्थान से दो अत्यंत तेजस्वी पुरुष प्रकट हो रहे हैं।
उनके शरीर से दिव्य प्रकाश निकल रहा था।
वे साधारण मनुष्य नहीं लग रहे थे।
उनके वस्त्र चमक रहे थे।
उनके चेहरे पर तेज था।
सभी गोकुलवासी आश्चर्य से पीछे हट गए।
यशोदा मैया ने कृष्ण को और कसकर अपनी गोद में पकड़ लिया।
लेकिन कृष्ण शांत थे।
दोनों दिव्य पुरुष सीधे कृष्ण के सामने आए।
उन्होंने हाथ जोड़ लिए।
उनकी आँखों में भक्ति और कृतज्ञता थी।
गोकुलवासियों को कुछ समझ नहीं आ रहा था।
वे सोच रहे थे—
“ये कौन हैं?”
तभी उनमें से एक ने कृष्ण के चरणों की ओर झुककर प्रणाम किया।
और बोला,
“प्रभु! आपकी कृपा से आज हमारा उद्धार हुआ।”
यशोदा मैया यह सुनकर और भी आश्चर्यचकित हो गईं।
“प्रभु?”
उन्होंने अपने कान्हा की ओर देखा।
कृष्ण तो उनकी गोद में बैठे थे।
उनके पैरों में धूल लगी थी।
लेकिन वे दिव्य पुरुष उन्हें भगवान कहकर प्रणाम कर रहे थे।
नलकूबर और मणिग्रीव की कथा
वे दोनों दिव्य पुरुष वास्तव में कुबेर के पुत्र नलकूबर और मणिग्रीव थे।
कभी वे अत्यंत धनवान और शक्तिशाली थे।
धन और ऐश्वर्य के कारण उनके भीतर अहंकार आ गया था।
एक बार वे अपनी शक्ति और संपत्ति के मद में इतने डूब गए कि उन्होंने महान ऋषि नारद का भी सम्मान नहीं किया।
ऋषि नारद ने उनके भीतर छिपे अहंकार को देखा।
उन्होंने सोचा—
“इनका अहंकार इनके लिए ही विनाश का कारण बनेगा। इन्हें ऐसा जीवन मिलना चाहिए जिसमें इन्हें अपने कर्मों पर विचार करने का अवसर मिले।”
ऋषि ने उन्हें वृक्ष बनने का शाप दिया।
लेकिन वह शाप वास्तव में उनके लिए वरदान बन गया।
क्योंकि ऋषि नारद ने यह भी कहा था कि जब स्वयं भगवान कृष्ण उन्हें स्पर्श करेंगे, तब उनका उद्धार होगा।
इसलिए वे दोनों लंबे समय तक वृक्ष के रूप में खड़े रहे।
ऋतुएँ बदलती रहीं।
वर्षा आई।
गर्मी आई।
सर्दी आई।
पक्षियों ने उनके ऊपर घोंसले बनाए।
गोकुल के बच्चे उनके नीचे खेलते रहे।
लेकिन वे दोनों प्रतीक्षा करते रहे—
उस क्षण की प्रतीक्षा, जब नंदलाल उनके पास आएँगे।
और आज वह क्षण आ चुका था।
प्रभु के सामने पश्चाताप
नलकूबर ने हाथ जोड़कर कहा,
“हे प्रभु! हमें अपने धन और शक्ति का इतना अहंकार हो गया था कि हम धर्म और विनम्रता को भूल गए थे।”
मणिग्रीव ने कहा,
“ऋषि नारद का शाप हमारे लिए दंड नहीं, कृपा बन गया। उनके कारण हमें आपके दर्शन प्राप्त हुए।”
दोनों ने कृष्ण की ओर देखा।
उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
“हे नंदलाल! आपने हमें इस वृक्ष रूपी बंधन से मुक्त कर दिया। हम आपकी कृपा को कभी नहीं भूलेंगे।”
कृष्ण उन्हें देखकर मुस्कुराए।
उनके छोटे-से चेहरे पर ऐसी करुणा थी, जैसे वे सब कुछ पहले से जानते हों।
फिर दोनों दिव्य पुरुषों ने कृष्ण को प्रणाम किया।
और देखते ही देखते उनका दिव्य प्रकाश आकाश की ओर उठने लगा।
कुछ ही क्षणों में वे दोनों वहाँ से अदृश्य हो गए।
गोकुलवासी स्तब्ध थे
कुछ समय तक कोई कुछ नहीं बोला।
सबके मन में एक ही प्रश्न था—
“हमारे कान्हा आखिर हैं कौन?”
लेकिन यशोदा मैया के लिए उस समय ये प्रश्न महत्वपूर्ण नहीं था।
उनके लिए तो उनका कान्हा केवल उनका बेटा था।
उन्होंने कृष्ण को अपनी गोद में उठाया और बोलीं,
“बस बहुत हो गया! आज के बाद तुम मेरी नजरों से दूर नहीं जाओगे।”
कृष्ण मैया के गले से लग गए।
उन्होंने धीरे से पूछा,
“मैया, अब रस्सी खोलोगी?”
यशोदा मैया ने उनके सिर पर हाथ फेरा।
“हाँ बेटा।”
उन्होंने रस्सी खोल दी।
कृष्ण आज़ाद हो गए।
लेकिन जैसे ही वे जमीन पर उतरे, उनके चेहरे पर फिर वही शरारती मुस्कान लौट आई।
श्रीदामा ने धीरे से कहा,
“कान्हा, आज तो तुमने दो पेड़ गिरा दिए।”
कृष्ण ने हँसकर कहा,
“मैंने नहीं गिराए।”
“तो किसने गिराए?”
कृष्ण ने अपनी आँखें घुमाईं।
“शायद हवा ने।”
सभी ग्वाल-बाल हँस पड़े।
यशोदा मैया ने कृष्ण को फिर अपनी गोद में उठा लिया।
“बस! अब कोई और शरारत नहीं।”
कृष्ण मुस्कुराए।
लेकिन उनके मन में तो अगली लीला पहले ही जन्म ले चुकी थी।
लीला का रहस्य
उस दिन गोकुल में देर तक इसी घटना की चर्चा होती रही।
कोई कहता,
“कृष्ण ने पेड़ गिराए।”
कोई कहता,
“यह कोई दिव्य घटना थी।”
कोई कहता,
“इन वृक्षों में कोई रहस्य जरूर था।”
लेकिन कृष्ण?
वे तो शाम होते-होते अपने सखाओं के साथ फिर खेलने निकल गए।
जैसे कुछ हुआ ही न हो।
उनके लिए यह सब खेल था।
लेकिन भक्तों के लिए यह संदेश था—
अहंकार कितना भी बड़ा क्यों न हो, भगवान की कृपा उसे मिटा सकती है।
और प्रेम की बात तो सबसे अद्भुत थी।
जिस कृष्ण को यशोदा मैया ने रस्सी से बाँध दिया था, वही कृष्ण दो विशाल वृक्षों में बँधी दिव्य आत्माओं को मुक्त करने वाले बन गए।
एक ओर वे अपनी मैया के लिए नन्हे बालक थे।
दूसरी ओर वे समस्त संसार के लिए उद्धारकर्ता।
यही तो नंदलाल की बाल-लीला की अद्भुतता थी।
शाम का समय
सूरज धीरे-धीरे अस्त होने लगा।
गोकुल के आकाश में लालिमा फैल गई।
गायें चरकर वापस लौट रही थीं।
गोपियाँ अपने घरों के बाहर दीप जलाने लगीं।
कृष्ण अपने सखाओं के साथ खेलकर लौटे।
यशोदा मैया द्वार पर खड़ी उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं।
कृष्ण दौड़कर मैया के पास आए।
“मैया!”
यशोदा मैया ने उन्हें अपनी गोद में उठा लिया।
“आ गए मेरे लाल?”
कृष्ण ने सिर हिलाया।
मैया ने पूछा,
“आज फिर कोई शरारत तो नहीं की?”
कृष्ण ने बड़ी मासूमियत से कहा,
“नहीं।”
मैया ने उनकी आँखों में देखा।
फिर मुस्कुराईं।
“तुम्हारी आँखें बता रही हैं कि तुम कुछ सोच रहे हो।”
कृष्ण हँस पड़े।
“मैया, कल बताऊँगा।”
यशोदा मैया ने पूछा,
“क्या?”
कृष्ण ने कोई उत्तर नहीं दिया।
बस मैया के कंधे पर सिर रख दिया।
लेकिन उस रात गोकुल को क्या पता था कि अगले दिन कृष्ण अपने ग्वाल-बाल सखाओं के साथ ऐसी क्रीड़ा करने वाले हैं, जिसमें उनकी हँसी, उनकी बाँसुरी, गायों की घंटियाँ और वृंदावन की हरियाली एक साथ मिलकर ऐसा मधुर दृश्य बनाएँगी, जिसे देखकर देवता भी मोहित हो जाएँगे।
और इसी के साथ नंदलाल की बाल-लीलाएँ एक नए रंग में प्रवेश करने वाली थीं।
अगली कड़ी में—
भाग 10 — ग्वाल-बालों के साथ कृष्ण की क्रीड़ाएँ
जहाँ कान्हा अपने सखाओं के साथ गायों और बछड़ों को लेकर वन की ओर जाएँगे। वहाँ खेल, हँसी, दौड़ और बाल-सुलभ शरारतों के बीच कृष्ण अपने मित्रों के साथ ऐसी मधुर लीला करेंगे कि पूरा वृंदावन आनंद से भर उठेगा।
लेकिन उस वन में एक ऐसी घटना भी होने वाली थी, जो कृष्ण के सखाओं को कुछ समय के लिए भयभीत कर देगी…
आखिर वन में ऐसा क्या होने वाला था?
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