(भाग 10 — ग्वाल-बालों के साथ कृष्ण की क्रीड़ाएँ)
यमलार्जुन वृक्षों के उद्धार की अद्भुत घटना को कुछ दिन बीत चुके थे।गोकुल में अभी भी उस दिन की चर्चा होती थी। कोई कहता कि नंदलाल ने अपनी छोटी-सी शक्ति से इतने विशाल वृक्ष गिरा दिए, तो कोई कहता कि उन वृक्षों में कोई दिव्य रहस्य छिपा था।
लेकिन कृष्ण को इन बातों से कोई मतलब नहीं था।
उनके लिए जीवन का हर दिन एक नया खेल था।
सुबह होते ही उनकी आँखों में शरारत की चमक आ जाती।
गायों की घंटियाँ सुनते ही वे आँगन की ओर दौड़ते।
अपने सखाओं की आवाज सुनते ही खेल के लिए निकल पड़ते।
और जब उनकी मधुर हँसी गोकुल की गलियों में गूँजती, तो लगता जैसे स्वयं आनंद ने बालक का रूप धारण कर लिया हो।
उस दिन भी सुबह कुछ ऐसा ही हुआ।
वन जाने की तैयारी
सूरज अभी पूरी तरह ऊपर नहीं आया था।
आकाश पर हल्की सुनहरी आभा थी।
नंदभवन के बाहर गायें और बछड़े खड़े थे।
ग्वाल-बाल एक-एक करके वहाँ इकट्ठे होने लगे।
श्रीदामा ने आवाज लगाई,
“कान्हा! जल्दी आओ!”
सुभल भी बोला,
“आज बहुत दूर तक जाएँगे।”
कृष्ण घर के भीतर से दौड़ते हुए बाहर आए।
उनके हाथ में छोटी-सी बाँसुरी थी।
कमर पर पीतांबर बँधा था।
बालों में मोरपंख सजा था।
चेहरे पर वही प्यारी मुस्कान थी।
यशोदा मैया ने उन्हें देखते ही कहा,
“कान्हा, इतनी सुबह कहाँ जाने की तैयारी है?”
कृष्ण ने कहा,
“मैया, हम गायों को चराने वन में जाएँगे।”
यशोदा मैया ने थोड़ा चिंतित होकर कहा,
“बहुत दूर मत जाना।”
“नहीं जाऊँगा।”
“अपने सखाओं से दूर मत होना।”
“नहीं होऊँगा।”
“और किसी शरारत में मत पड़ना।”
कृष्ण ने तुरंत मैया की ओर देखकर कहा,
“मैया, मैं तो कभी शरारत करता ही नहीं।”
यशोदा मैया हँस पड़ीं।
“अच्छा! अब तुम मुझे भी अपनी बातों से बहकाने लगे?”
कृष्ण दौड़कर मैया से लिपट गए।
मैया ने उनके माथे पर हाथ फेरा।
“सावधान रहना बेटा।”
कृष्ण ने सिर हिलाया।
फिर अपने सखाओं के साथ चल पड़े।
गोकुल से वृंदावन की ओर
ग्वाल-बालों का छोटा-सा समूह गायों और बछड़ों के साथ आगे बढ़ रहा था।
किसी के हाथ में बाँसुरी थी।
किसी के हाथ में छोटी लकड़ी।
कोई रास्ते में पत्थर उछाल रहा था।
कोई गायों को नाम लेकर पुकार रहा था।
और सबसे आगे कृष्ण चल रहे थे।
उनके पीछे-पीछे उनकी गायें चल रही थीं।
कृष्ण कभी पीछे मुड़कर देखते और कहते,
“सब साथ चलो!”
श्रीदामा बोला,
“कान्हा, आज हम नदी के पास चलेंगे।”
सुभल बोला,
“नदी के पास जाकर खेलेंगे।”
कृष्ण ने कहा,
“हाँ! और फिर देखते हैं कौन सबसे तेज दौड़ सकता है।”
एक बालक बोला,
“मैं तुमसे तेज दौड़ूँगा।”
कृष्ण हँस पड़े।
“पहले पकड़कर तो दिखाओ।”
और बस!
दौड़ शुरू हो गई।
कुछ बच्चे आगे।
कुछ पीछे।
गायें इधर-उधर।
बछड़े उछलते-कूदते।
और कृष्ण सबके बीच हँसते हुए दौड़ रहे थे।
वन की सुंदरता
कुछ दूर जाकर वे एक सुंदर वन में पहुँचे।
चारों ओर हरियाली थी।
ऊँचे-ऊँचे वृक्ष।
लताओं से ढकी डालियाँ।
रंग-बिरंगे फूल।
भौरों की गुनगुनाहट।
पक्षियों का मधुर कलरव।
ठंडी हवा।
और पास ही बहती यमुना की निर्मल धारा।
कृष्ण ने चारों ओर देखा।
उनकी आँखों में प्रसन्नता भर गई।
उन्होंने कहा,
“देखो सखाओं! कितना सुंदर है हमारा वन।”
श्रीदामा बोला,
“हाँ कान्हा! यहाँ तो मन करता है कि हम रोज आएँ।”
कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,
“तो रोज आना।”
सभी बच्चे हँस पड़े।
खेलों की शुरुआत
गायें घास चरने लगीं।
बछड़े इधर-उधर दौड़ने लगे।
ग्वाल-बालों ने अपना खेल शुरू कर दिया।
कभी वे एक-दूसरे के पीछे दौड़ते।
कभी पेड़ की छाया में बैठकर बातें करते।
कभी गेंद की तरह मिट्टी का गोला बनाकर खेलते।
कभी कोई अपनी बाँसुरी बजाता और बाकी बच्चे उसकी नकल करते।
कृष्ण सबके साथ ऐसे घुल-मिल जाते जैसे वे उनके मित्र ही नहीं, बल्कि उनके बीच के सबसे साधारण बालक हों।
एक दिन श्रीदामा ने कहा,
“कान्हा, आज हम देखते हैं कि कौन सबसे ऊँचे पेड़ तक चढ़ सकता है।”
कृष्ण ने कहा,
“ठीक है।”
सब बच्चे पेड़ की ओर दौड़े।
कोई एक शाखा तक पहुँचा।
कोई दूसरी तक।
कृष्ण तो देखते ही देखते ऊपर पहुँच गए।
श्रीदामा ने नीचे से कहा,
“कान्हा! तुम तो बहुत तेज हो।”
कृष्ण हँसे।
“अभी तो खेल शुरू हुआ है।”
वे ऊपर से कुछ पत्ते तोड़कर नीचे फेंकने लगे।
सभी बच्चे उन्हें पकड़ने लगे।
फिर किसी ने कहा,
“अब देखते हैं कौन सबसे पहले नीचे उतरता है!”
सब नीचे उतरने लगे।
कुछ फिसले।
कुछ हँसे।
और कुछ गिरते-गिरते बच गए।
कृष्ण सबसे पहले नीचे पहुँच गए।
सभी बोले,
“कान्हा जीत गए!”
कृष्ण हँसकर बोले,
“जीत तो हम सबकी हुई।”
भोजन का समय
दोपहर होने लगी।
सूरज थोड़ा तेज हो गया।
गायें छाया में बैठ गईं।
ग्वाल-बाल भी एक बड़े वृक्ष के नीचे बैठ गए।
सब अपने-अपने घर से लाया हुआ भोजन निकालने लगे।
किसी के पास रोटी थी।
किसी के पास दही।
किसी के पास फल।
किसी के पास गुड़।
कृष्ण ने अपना भोजन खोला।
उनके पास मैया ने प्रेम से माखन और रोटी रखी थी।
श्रीदामा ने पूछा,
“कान्हा, तुम्हारे पास क्या है?”
कृष्ण ने कहा,
“माखन।”
सभी बच्चे तुरंत कृष्ण के पास आ गए।
“हमें भी दो।”
कृष्ण हँस पड़े।
“सबको मिलेगा।”
उन्होंने माखन सबमें बाँटना शुरू कर दिया।
किसी को थोड़ा अधिक।
किसी को थोड़ा कम।
एक बालक बोला,
“कान्हा, मुझे ज्यादा दो।”
कृष्ण ने कहा,
“क्यों?”
“क्योंकि मैं सबसे ज्यादा भूखा हूँ।”
कृष्ण ने उसे थोड़ा और दे दिया।
दूसरा बोला,
“मुझे भी!”
फिर तीसरा।
कुछ ही देर में कृष्ण का अपना माखन लगभग समाप्त हो गया।
श्रीदामा ने पूछा,
“अब तुम क्या खाओगे?”
कृष्ण मुस्कुराए।
“तुम सबके साथ खाऊँगा।”
उन्होंने सबके भोजन में से थोड़ा-थोड़ा लेकर खाना शुरू कर दिया।
सभी मित्र हँसने लगे।
बाँसुरी की मधुर धुन
भोजन के बाद सभी बच्चे कुछ देर विश्राम करने लगे।
गायें भी शांत थीं।
हवा धीरे-धीरे बह रही थी।
कृष्ण ने अपनी बाँसुरी निकाली।
उन्होंने आँखें बंद कीं।
और बाँसुरी पर एक मधुर धुन छेड़ दी।
मधुर… मधुर…
जैसे ही बाँसुरी की धुन वन में फैली, वातावरण बदल गया।
पक्षी चुप हो गए।
जैसे वे भी उस धुन को सुनना चाहते हों।
हवा मानो कुछ क्षणों के लिए ठहर गई।
गायों ने अपना चरना रोक दिया।
बछड़े कृष्ण की ओर देखने लगे।
ग्वाल-बाल मंत्रमुग्ध होकर कृष्ण को देखने लगे।
श्रीदामा ने धीरे से कहा,
“कान्हा, तुम्हारी बाँसुरी में ऐसा क्या है?”
कृष्ण ने हँसकर पूछा,
“क्या?”
“इसे सुनते ही सब शांत हो जाते हैं।”
कृष्ण ने कहा,
“शायद बाँसुरी सबको मित्र बनाना जानती है।”
सुभल बोला,
“नहीं कान्हा। बात बाँसुरी की नहीं, तुम्हारी है।”
कृष्ण मुस्कुराए।
एक नया खेल
थोड़ी देर बाद कृष्ण ने कहा,
“चलो, अब एक खेल खेलते हैं।”
सब तैयार हो गए।
कृष्ण ने कहा,
“हम दो दल बनाएँगे।”
एक दल का नेतृत्व श्रीदामा करेगा।
दूसरे का मैं करूँगा।
फिर दोनों दलों के बीच दौड़ की प्रतियोगिता होगी।
सभी बच्चे उत्साहित हो गए।
“हाँ!”
“चलो!”
“आज देखते हैं कौन जीतता है।”
दौड़ शुरू हुई।
एक ओर श्रीदामा।
दूसरी ओर कृष्ण।
बच्चे उनके पीछे।
कभी कोई आगे निकलता।
कभी कोई पीछे।
कृष्ण जानबूझकर थोड़ा धीमे हो जाते ताकि उनके मित्र आगे निकल जाएँ।
श्रीदामा बोला,
“कान्हा! तुम जानबूझकर हार रहे हो!”
कृष्ण हँस पड़े।
“हारना भी तो एक खेल है।”
अंत में सभी बच्चे एक साथ लक्ष्य तक पहुँचे।
कृष्ण ने कहा,
“देखा! कोई हारा नहीं।”
गायों के साथ कान्हा
खेलते-खेलते कृष्ण को अपनी गायों की चिंता हुई।
वे उठे और उन्हें ढूँढ़ने लगे।
“सुभल, देखो हमारी गायें कहाँ हैं।”
सुभल ने दूर इशारा किया।
“वहाँ हैं।”
कृष्ण उनके पास गए।
एक गाय कृष्ण को देखते ही उनके पास आ गई।
कृष्ण ने उसके सिर पर हाथ फेरा।
“तुम यहाँ हो?”
गाय ने जैसे प्रेम से उनकी ओर देखा।
कृष्ण ने उसके गले को सहलाया।
गाय के बछड़े भी कृष्ण के पास आ गए।
कृष्ण उन्हें पुचकारने लगे।
ग्वाल-बाल यह दृश्य देखकर मुस्कुराने लगे।
श्रीदामा ने कहा,
“कान्हा, तुम्हें गायें बहुत पसंद हैं।”
कृष्ण बोले,
“गायें हमें प्रेम देती हैं। हमें भी उनका ध्यान रखना चाहिए।”
उन्होंने सभी बछड़ों को एक साथ किया।
फिर सबको धीरे-धीरे आगे ले जाने लगे।
वन में अचानक एक विचित्र आवाज
दिन धीरे-धीरे ढलने लगा था।
सूरज पश्चिम की ओर झुकने लगा।
कृष्ण ने कहा,
“अब हमें वापस चलना चाहिए।”
सभी बालक अपनी गायों को इकट्ठा करने लगे।
तभी दूर से एक अजीब-सी आवाज सुनाई दी।
गूँऽऽऽ…
सभी बच्चे रुक गए।
श्रीदामा ने पूछा,
“यह कैसी आवाज है?”
सुभल बोला,
“मुझे नहीं पता।”
कृष्ण ने भी ध्यान से उस दिशा में देखा।
फिर दूसरी आवाज आई।
इस बार कुछ अधिक भारी।
घुर्रर्र…
ग्वाल-बालों के चेहरे पर चिंता आ गई।
एक बालक बोला,
“कहीं कोई जंगली जानवर तो नहीं?”
दूसरा बोला,
“चलो यहाँ से।”
लेकिन कृष्ण शांत थे।
उन्होंने कहा,
“डरो मत। सब मेरे पास रहो।”
सभी बच्चे कृष्ण के पास आ गए।
गायें भी कुछ बेचैन होने लगीं।
कृष्ण ने उनकी ओर देखा।
“डरो मत।”
उनकी आवाज में ऐसा विश्वास था कि बच्चों का डर थोड़ा कम हो गया।
लेकिन तभी झाड़ियों के पीछे कुछ हिला।
पत्तियाँ जोर-जोर से काँपने लगीं।
कृष्ण ने अपने सखाओं को पीछे रहने का संकेत किया।
कुछ क्षणों तक सब शांत रहा।
फिर अचानक झाड़ियों से एक विशाल आकृति बाहर आई।
ग्वाल-बालों की आँखें फैल गईं।
कुछ बच्चे डरकर पीछे हट गए।
किसी ने कृष्ण का हाथ पकड़ लिया।
“कान्हा!”
कृष्ण ने शांत स्वर में कहा,
“मैं हूँ। डरो मत।”
लेकिन वह आकृति धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ रही थी।
उसका रूप भयावह था।
गायें पीछे हटने लगीं।
पक्षी उड़ गए।
वन का वातावरण अचानक बदल गया।
जहाँ कुछ क्षण पहले हँसी गूँज रही थी, वहाँ अब भय का सन्नाटा था।
कृष्ण ने अपने सखाओं की ओर देखा।
“सब यहीं रहो।”
श्रीदामा बोला,
“कान्हा, तुम अकेले मत जाना!”
कृष्ण मुस्कुराए।
“मैं अकेला कहाँ हूँ? तुम सबका प्रेम मेरे साथ है।”
यह कहकर कृष्ण उस रहस्यमयी आकृति की ओर बढ़ने लगे।
उनके कदम छोटे थे।
लेकिन उनके चेहरे पर तनिक भी भय नहीं था।
सभी ग्वाल-बाल साँस रोककर उन्हें देखते रहे।
और तभी…
उस रहस्यमयी जीव ने अपना विशाल मुँह खोल दिया।
ग्वाल-बाल भय से चिल्ला उठे—
“कान्हा!”
कृष्ण उस विशाल आकृति के सामने खड़े थे।
लेकिन किसी को पता नहीं था कि वह कौन था और क्यों उनके मार्ग में आया था।
उस दिन की बाल-क्रीड़ा अब एक ऐसी घटना में बदलने वाली थी, जिसमें कृष्ण की अद्भुत शक्ति फिर से प्रकट होने वाली थी।
अगली कड़ी में—
भाग 11 — कृष्ण ने माटी खाई और दिखाया अद्भुत संसार
कान्हा की बाल-लीलाओं का एक और अद्भुत प्रसंग सामने आएगा। एक दिन खेलते-खेलते कृष्ण के सखाओं ने यशोदा मैया से शिकायत कर दी कि कान्हा ने माटी खा ली है।
यशोदा मैया ने कृष्ण से पूछा—
“कान्हा, तुमने माटी खाई है?”
कृष्ण ने मासूमियत से मना कर दिया।
लेकिन जब मैया ने कहा—
“अच्छा, अपना मुँह खोलो।”
तब जो दृश्य यशोदा मैया की आँखों के सामने प्रकट हुआ, उसे देखकर उनका पूरा संसार जैसे थम गया।
आखिर कृष्ण के छोटे-से मुँह के भीतर ऐसा क्या दिखाई दिया था?
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