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लेखक: Soul_writer

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लिखकर रूह छूने की कोशिश….. 🥹🥹

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  • अधूरी इबादत भाग~5

    अधूरी इबादत भाग~5

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग ~5 ज़ख्म जो लिखे नहीं गए

    पुणे की सड़कों पर कार दौड़ रही थी, लेकिन मेरा ज़हन किसी और सफर पर निकला हुआ था—एक ऐसा सफर, जो सड़क पर नहीं, मेरे भीतर चल रहा था। सड़कें लंबी थीं, आसमान खुला और हवा तेज़ थी, मगर मेरे अंदर घुटन थी।  

    सुबह से चला था मैं, लेखकों के एक सम्मेलन में शरीक होने के लिए, जहाँ शब्दों की महफ़िल जमी थी, विचारों की गूँज थी और किस्सों का सैलाब था। मगर अब जब मैं वापस लौट रहा था, मेरी कार की खिड़की से झाँकता शहर तेज़ी से पीछे छूट रहा था और उसके साथ ही वह हलचल भी, जो कुछ देर पहले मेरे भीतर थी।  

    सम्मेलन में कहानियों की बुनावट, भाषा की बारीकियाँ और शब्दों की ताक़त पर कई चर्चाएँ हुईं, लेकिन मेरा मन कहीं और अटका रहा—उन अधूरे क़िस्सों में, जिन्हें मैंने कभी लिखा नहीं, उन भावनाओं में, जिन्हें कभी पूरी तरह अभिव्यक्त नहीं कर पाया।  

    खिड़की से आती हवा मेरे चेहरे को छूकर निकल जाती थी, मगर दिल की तपिश कम नहीं कर पाती थी। शब्दों के उस समंदर से लौटते हुए भी, भीतर कहीं एक सूखापन था। शायद इसलिए कि कुछ सवाल वहाँ भी अनुत्तरित रह गए थे, कुछ कहानियाँ अभी भी अधूरी थीं।

    कल रात की महफ़िल… वही महफ़िल, जहाँ मैं जाना नहीं चाहता था, लेकिन फिर भी मैं उसे मना नहीं कर पाया। 

    क्यों? यही सवाल अब तक ज़हन में गूंज रहा था, मगर जवाब कहीं गहरे दबा पड़ा था। शायद मैं जानता था, पर स्वीकार नहीं करना चाहता था।  

    वहाँ बैठे हर चेहरे पर एक नक़ाब था—सभ्य समाज का, खुलेपन का, उच्च विचारों का, लेकिन उनकी आँखों में वही पुरानी धूर्तता थी, शब्दों में वही कड़वाहट, वही ज़हर।  

    अरे, देखो तो कौन आया है!”

    “इसकी तो माँ भी वही थी न…?”

    “क्या खाक लेखक बनेगा? अपनी माँ की कहानी लिखेगा क्या?” 

    “वैसे, अब इसका कोई है भी? माँ नहीं, बाप नहीं… बीवी भी नहीं रही।”

    हर लफ्ज़ नश्तर की तरह रगों में उतरता चला गया। मैं वहाँ कितनी देर तक रुका, याद नहीं, बस इतना याद है कि हर शब्द मेरी रगों में ज़हर की तरह घुलता जा रहा था।    

    मुझे हमेशा से अपने वजूद पर पछतावा रहा था। मेरी ज़िंदगी एक ऐसा सवाल थी, जिसका जवाब किसी के पास नहीं था।

    मैं नहीं जानता था कि मेरे जन्म को लेकर इतना शोर क्यों था, इतनी घृणा क्यों थी? 

    क्या मैंने अपनी माँ से कहा था कि वो मुझे जन्म दे? 

    क्या मैंने इस दुनिया में आने का चुनाव किया था? नहीं ना …..

    फिर क्यों? क्यों हर बार मुझे ही दोष दिया जाता है?  

    नाजायज़!”  

    एक ऐसा शब्द, जो मेरी रग-रग में उतर चुका था। मेरा पूरा वजूद मानो इसी एक लफ्ज़ में कैद था।  

    कभी-कभी सोचता हूँ, क्या मैं सच में किसी जुर्म का नतीजा था? क्या मैं सच में एक भूल था? मेरे पिता ने मुझे कभी अपनाया नहीं। और मैं भी उन्हें कभी अपना नहीं पाया। लेकिन क्या मैं उनके साथ रहने वाली उस औरत को अपनी माँ का दर्जा दे सकता था? कभी नहीं।  

    और मेरी माँ?  

    वो अब इस दुनिया में नहीं थीं। आत्महत्या कर ली थी उन्होंने। लोग कहते हैं, उन्होंने ज़िंदगी से हार मान ली थी। लेकिन मैं जानता हूँ, ऐसा नहीं था। उन्होंने ज़िंदगी से नहीं, लोगों की नफरत से हार मानी थी। उन्होंने उस समाज से हार मानी थी, जिसने उन्हें कभी स्वीकार ही नहीं किया।  

    कभी-कभी सोचता हूँ, अगर मैं नहीं होता, तो क्या वो ज़िंदा होतीं? क्या सच में मैं उनकी मौत का ज़िम्मेदार था?  

    रातों को जब नींद नहीं आती तो आईने में खुद को देखकर सोचता था – क्या मैं सच में वही हूँ, जैसा लोग कहते हैं? एक अपशगुन? एक मनहूस इंसान?  

    लोगों को लगता है, लेखक हूँ, तो दर्द को समझता हूँ, उसे शब्दों में ढाल लेता हूँ, मगर क्या लेखक का दिल नहीं टूटता? क्या लेखक की आत्मा पर लगे ज़ख्म कम गहरे होते हैं? क्या शब्दों में घुलकर कोई अपने दर्द से बच सकता है? अगर ऐसा होता, तो मैं अब तक खुद को लिखकर ख़त्म कर चुका होता।  

    पर ऐसा नहीं है …. दर्द सिर्फ़ लिखने से नहीं जाता। वो अंदर जड़ें जमा लेता है, साँसों में घुल जाता है, ख़ून में बहता रहता है।  

    लोगों को लगता है, मैं मजबूत हूँ। लेकिन मैं हर दिन, हर पल टूटता हूँ।  

    मेरी पत्नी…  

    उसकी मुस्कान अब भी आँखों में बसी हुई है। उसके स्पर्श की गर्माहट अब भी हथेलियों में ठहरी हुई है। लेकिन लोग कहते हैं, मेरी वजह से उसकी मौत हुई। जैसे मेरी माँ की हुई थी। तो क्या सच में मैं ही दोषी हूँ? क्या सच में मेरी ज़िंदगी किसी शाप से कम नहीं? क्या मैं जहाँ भी जाता हूँ, जो भी मेरे करीब आता है, वो बर्बाद हो जाता है?  

    अगर हाँ, तो फिर मैं अब भी ज़िंदा क्यों हूँ?  

    क्या सिर्फ़ इस दुनिया का तमाशा देखने के लिए?  

    या सिर्फ़ समाज के तानों को सुनने के लिए?  

     

    पीछे किसी ने तेज़ हॉर्न बजाया। मेरी तंद्रा टूटी। सामने सिग्नल हरा हो चुका था, मगर मैं अब भी जड़ था। जैसे मेरे भीतर कोई जाम लग गया हो। 

    मैंने गहरी सांस ली, एक्सीलेटर दबाया, और गाड़ी आगे बढ़ा दी।  

    लेकिन भीतर कुछ अब भी रुका हुआ था—  

    माँ की यादें, पत्नी की परछाइयाँ और वे तमाम आवाज़ें, जो ज़हन में अब भी गूँज रही थीं—

    “मनहूस!”

    “नाजायज़!”

    “इसका कोई नहीं!”  

    क्या सच में मेरा कोई नहीं था?  

    क्या मैं इस पूरी दुनिया में सच में अकेला था?

    और तभी…

    अचानक, उस लड़की का चेहरा ज़हन में कौंध गया।

    वही लड़की, जिसे कल रात मैंने उस पुल से कूदने से रोका था।

    उसकी बेबस आँखें, काँपते होंठ और वो खामोश चीख़, जो मैं अब तक सुन सकता था।

    वो क्यों कूदना चाहती थी? कौन थी वो?

    मैंने उसे बचा तो लिया था, लेकिन वो बेहोश हो गई थी।

    उसके हाथ में बंधे ब्रेसलेट से उसका नाम पता चला था – “रूहानी” मगर बाकी कुछ भी नहीं।

    मेरा दर्द मेरे अंदर था, लेकिन उसका दर्द उसकी आँखों में साफ़ झलक रहा था।

    शायद… मैं उसका जवाब नहीं था, पर क्या वो मेरे सवालों का कोई सिरा थी?

    मैं आज तक बहुत से लोगों को टूटते देखा था। मैं जानता था कि समाज किस तरह किसी को उसके अपने ही जीवन से बेगाना बना देता है। मैं जानता था कि दर्द जब हद से बढ़ जाता है, तो इंसान खुद को मिटा देना चाहता है।

    पर मैं उसे टूटने नहीं देना चाहता था।

    क्यों?

    शायद इसलिए कि उसकी आँखों में मैंने खुद को देखा था। वही खालीपन, वही तन्हाई, वही हताशा, जो बरसों से मेरे साथ थी।

    पता नहीं, वो अब भी मेरे घर में होगी या जा चुकी होगी।

    मुझे नहीं पता कि उसके मन में क्या चल रहा था, ना ही मैं उसके बारे में कुछ जानता था। बस इतना जानता था कि जब मैंने उसे बचाया, तो वो पूरी तरह बेहोश थी। मैं उसे अपने घर ले आया, पर हम एक शब्द भी नहीं बोल पाए क्योंकि रात में वह अपने होश में नहीं थी और सुबह में मैं जल्दबाज़ी में निकल गया। 

    मेरी उंगलियाँ कार के स्टीयरिंग पर कस गईं। मन में एक अजीब-सी घबराहट पसरने लगी। अगर वो अब भी वहाँ हुई, तो क्या मैं उससे कुछ पूछ पाऊँगा?

    और अगर नहीं हुई…

    अगर वो जा चुकी होगी…

    तो फिर?

    एक अनजान-सी बेचैनी ने मेरे अंदर दस्तक दी।

    मैंने गाड़ी की रफ्तार बढ़ा दी।

    सड़कें पीछे छूट रही थीं, मगर दिल में जो हलचल थी, वो तेज़ होती जा रही थी। घर के करीब पहुँचते ही मेरी साँसें थोड़ी तेज़ हो गईं। न जाने क्यों, पर दिल किसी अनहोनी का एहसास करा रहा था।

    जैसे ही मैंने कार रोकी और घर की तरफ देखा। 

    दरवाजा खोलते ही सामने का नज़ारा देख ……….

    ————-

    क्या रूहानी अब भी वहीं थी, या वह कहीं जा चुकी थी—बिना कोई निशान छोड़े?

    कमरे के कोने में एक टूटा हुआ काँच पड़ा था, और फर्श पर पानी फैला हुआ था।

    वो खून के निशान किसके थे?

  • अधूरी इबादत भाग~4

    अधूरी इबादत भाग~4

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~4 शब्दों का वार

    रूहानी की नज़र अचानक अपने हाथों पर पड़ी। एक अनजाना अहसास उसके भीतर सिर उठा रहा था। उसे याद आया कि जब वह पुल से गिरने वाली थी, तब उसका मोबाइल उसकी सलवार की जेब में था।  

    लेकिन अब…  

    उसका हाथ अपने आप जेब में चला गया और अगले ही पल उसकी साँसें रुक-सी गईं। मोबाइल वहाँ नहीं था।  

    उसके अंदर एक अजीब-सी बेचैनी दौड़ गई। उसने जल्दी से अपने चारों ओर देखा, लेकिन कोई हलचल नहीं थी। कमरे में वही पुराना सन्नाटा पसरा था, जो पिछले कुछ घंटों से उसकी हमसफ़र बना हुआ था।  

    फिर अचानक, उसकी नज़र सोफे के बगल में रखी साइड टेबल पर गई। वहाँ, उसका मोबाइल रखा हुआ था।  

    एक पल के लिए उसे अपनी ही नज़रों पर यकीन नहीं हुआ। उसने धीमे-धीमे कदम बढ़ाए और मोबाइल की तरफ़ हाथ बढ़ाया। उसकी उंगलियाँ हल्के-हल्के काँप रही थीं।  

    रूहानी ने जैसे ही अपना मोबाइल उठाया, स्क्रीन पर ढेरों नोटिफिकेशन झिलमिला उठे।

    पर रूहानी यह सोच रही थी कि उसका मोबाइल जेब से यहाँ आया कैसे? 

    शायद इस अद्वैत ने ……… 

    उसने फिर अपना सिर झटकाया।

    उसकी आंखें हल्की-सी सिकुड़ गईं, उसने देखा— उसका फोन अभी भी साइलेंट पर था। शायद इसीलिए उसे इतनी देर तक कोई आवाज़ सुनाई नहीं दी थी। लेकिन अब, उस चमकती हुई स्क्रीन के पीछे कुछ ऐसा था, जिसे देखकर उसके अंदर अजीब-सी बेचैनी उठने लगी।  

    उसकी उंगलियां धीमे-धीमे स्क्रीन पर सरक रही थीं। सबसे पहले उसने इंस्टाग्राम खोला और जैसे ही उसकी नज़र अपने नाम पर पड़े #चीटर #धोखेबाज #फेक जैसे शब्दों पर गई, उसके दिल में कुछ टूटने जैसा महसूस हुआ।  

    सैकड़ों, शायद हज़ारों कमेंट्स थे। हर पोस्ट, हर स्टोरी में वही बातें— नफरत, ताने, अपमान। किसी ने उसकी तस्वीरों के नीचे आग उगलते शब्द छोड़े थे, किसी ने उसके कैप्शन्स का मज़ाक उड़ाया था, तो किसी ने सीधे-सीधे उसे दोषी ठहराया था।  

    उसकी आँखें तेजी से स्क्रीन पर दौड़ने लगीं, हर कमेंट को पढ़ने लगीं, लेकिन हर शब्द एक नया ज़हर था, एक नई चोट।  

    “इसने किसी और के डिज़ाइन्स चुराए हैं!”  

    “यह लड़की झूठी है, इसके सारे काम चोरी के हैं!”

    “छोटे शहरों की लड़कियाँ ऐसी ही होती हैं।”  

    “बड़ी आई थी डिज़ाइनर बनने।”

    “इसे ब्लैकलिस्ट कर देना चाहिए!” 

    उसकी पूरी दुनिया, उसकी मेहनत, उसके सपने— सब एक झटके में धूल में मिल चुके थे।  

    उसे यकीन नहीं हो रहा था कि लोग उसके बारे में इतनी नफरत से लिख सकते हैं। जिन लोगों ने कभी उसके डिज़ाइन्स की तारीफ की थी, वही अब उसे घृणा से देख रहे थे।    

    रूहानी ने कंपकंपाते हाथों से मोबाइल को कसकर पकड़ लिया। उसकी आँखें स्क्रीन पर टिकी थीं, लेकिन शब्द धुंधले होते जा रहे थे। सांसें तेज़ हो गई थीं, उंगलियाँ काँप रही थीं, और दिल एक अजीब-सी बेचैनी के साथ धड़क रहा था।  

    उसने धीरे-से स्क्रीन ऊपर स्क्रॉल किया, जहां किसी ने उसकी एक पुरानी तस्वीर पोस्ट करके उसके नाम के आगे ‘फ्रॉड’ लिख दिया था।  

    यह सब जो हो रहा था? इससे उसकी आंखों के आगे अंधेरा सा छाने लगा। ऐसा लगा जैसे वह किसी बहुत ऊंचे पुल से नीचे गिर रही हो— वही पुल, जहां वह कल रात खड़ी थी।  

    रूहानी ने एक लंबी, कांपती हुई साँस ली। गला सूख गया था। उसने जल्दी से अपना इंस्टाग्राम इनबॉक्स खोला।  

    वह उस एक अकाउंट पर गई, जो उसके लिए सबसे ज़्यादा मायने रखता था।  

    उसने उंगलियों से स्क्रीन पर उस नाम को छुआ— वही नाम, जिसने कभी उसके ख्वाबों को पंख दिए थे।  

    लेकिन वहाँ… कुछ नहीं था। 

    आखिरी मैसेज दो दिन पुराना था।  

    कहीं कोई सन्देश नहीं, कोई समर्थन नहीं, कोई आवाज़ नहीं।  

    वही शख्स, जिससे उसने सबसे ज्यादा उम्मीद की थी, जिसने उसे इस इंडस्ट्री में आगे बढ़ने की हिम्मत दी थी, जिसने कहा था कि वह उसके टैलेंट पर भरोसा करता था – वही अब खामोश था।  

    उसने एक बार फिर उस शख्स के कमेंट्स ढूँढने की कोशिश की, शायद उसने कहीं कुछ कहा हो, शायद कहीं उसके पक्ष में कोई सफाई दी हो…  

    लेकिन नहीं।  

    कोई शब्द नहीं, कोई बचाव नहीं, कोई सफाई नहीं।  

    बस एक भारी खामोशी।  

    उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। उसने मोबाइल को कसकर पकड़ लिया, जैसे वह उसे और तकलीफ़ न दे सके, लेकिन उसका दिमाग इन सब बातो से पीछे नहीं हट पा रहा था।  

    उसे वह सभी बातें याद आने लगी, जब वह घंटों तक अपने डिज़ाइन्स पर मेहनत करती थी, जब वह खुद को पूरी तरह झोंक देती थी, जब वह बस यह सोचती थी कि एक दिन उसका नाम होगा, उसकी पहचान होगी।  

    और अब? 

    अब उसका नाम कीचड़ में घसीटा जा रहा था।  

    “लोग ऐसा कैसे कर सकते हैं?”

    “कैसे इतनी आसानी से उसकी पूरी मेहनत को झूठ कह सकते हैं?”

    “और वो…? उसने कुछ क्यों नहीं कहा?”

    उसकी साँस भारी हो गई। आँसू उसकी आँखों के कोरों तक आ चुके थे, लेकिन वह उन्हें बहने नहीं देना चाहती थी। वह टूटने नहीं देना चाहती थी खुद को, लेकिन सच तो यह था कि वह पहले ही टूट चुकी थी।  

    उसने फोन को टेबल पर पटक दिया और अपने बालों में उंगलियाँ फिराने लगी। 

    उसे तरह-तरह की आवाज़ें सुनाई देने लगी। वो एक जानी-पहचानी आवाज़ थी, एक ऐसी आवाज़ जिसने बचपन से उसके दिल में घाव किए थे।  

    “मैंने समझाया था ना कि लड़कियों को सिर्फ़ घर के काम करने चाहिए?” 

    “बहुत उड़ने की कोशिश कर रही थी!”  

    “परायों के साथ कंधे से कंधा मिलाने चली थी, अब भुगत!”

    “मुँह काला हो गया ना? यही अंजाम होता है लड़कियों का!”

    रूहानी ने घबराकर अपनी हथेलियों से कानों को दबा लिया।  

    लेकिन आवाज़ें और तेज़ हो गईं।  

    एक पल वो आवाज़ें बाहर से आ रही थीं, अगले ही पल वो उसके अंदर गूंजने लगीं।  

    वह चाह रही थी कि इस कमरे से भाग जाए। कहीं दूर, जहां ये सब नहीं पहुंचे, जहां ये नाम, ये आवाज़ें, ये ताने उसका पीछा न करें।  

    जहाँ उसे कोई नाम से ना पुकारे।  

    जहाँ कोई उसे पहचानता ना हो।  

    लेकिन वह भागकर भी कहां जाती? अब कोई ठिकाना नहीं बचा था। अब उसका कोई अपना नहीं था।  

    वह अपने घुटनों को समेटकर बैठ गई, सिर झुका लिया और गहरी सांस लेने की कोशिश करने लगी, लेकिन अंदर कोई सुनामी उठ चुकी थी।  

    “मैंने इतना भरोसा किया… इतनी उम्मीदें रखीं… और बदले में यह मिला?”

    कमरे की खामोशी अब बोझ बन चुकी थी। घड़ी की टिक-टिक, हवा की सरसराहट— सब कुछ उसके अंदर की बेचैनी को और बढ़ा रहे थे।  

    उसने उठकर पानी का गिलास उठाया, लेकिन हाथ इतने कांप रहे थे कि गिलास हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिर गया।  

    छन्न ……

    कांच के टुकड़े फर्श पर बिखर गए।  

    रूहानी ने नीचे देखा। 

    कांच के बिखरे हुए टुकड़े…  

    वैसे ही जैसे उसके सपने।  

    वैसे ही जैसे उसका भरोसा।  

    वैसे ही जैसे वह खुद।  

    इस पूरी दुनिया में, इस पूरे शहर में, इस पूरे घर में—  

    कोई नहीं था।  

    वह अचानक से उठी और उन कांच के टुकड़ों पर चलने लगी। उसकी नंगे पाँव एड़ी से लेकर उंगलियों तक काँच चुभने लगा, पर दर्द का अहसास मर चुका था। पैरों के नीचे हल्की-सी गर्माहट महसूस हुई— खून की।

    वह एक कदम और बढ़ाने ही वाली थी कि किसी ने उसे पीछे खींच लिया।

    एक झटके से।

    इतनी तेज़ी से कि उसका संतुलन बिगड़ गया और वह किसी की बाहों में समा गई। उसकी सांसें थम गईं।

    वह हाथ अब भी उसकी बाहों को जकड़े हुए थे, जैसे उसे गिरने से बचा रहे हों।

    वह आँखें बंद किए हुए थी, लेकिन महसूस कर सकती थी— किसी की गर्म साँसें उसके करीब थीं।

    लेकिन कौन?

    —————-

    अगर कमरे में सिर्फ़ वही थी, तो फिर वो बाहें किसकी थीं, जो उसे थामे हुए थीं?

    क्या यह वही था, जिससे उसने सबसे ज़्यादा उम्मीदें रखी थीं—या कोई और?

    अगर कोई था, तो वह कौन था—कोई अपना, कोई अजनबी… या कोई ऐसा, जिसका यहाँ होना नामुमकिन था?

  • अधूरी इबादत भाग~3

    अधूरी इबादत भाग~3

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~3 रूहानी की उलझन

    मीना की बात सुनकर रूहानी की जिज्ञासा और भी बढ़ गई। वह उत्सुकता से पूछ बैठी, “वैसे तुम्हारे सर का क्या नाम है?”

    मीना, जो अब अपने काम में व्यस्त हो चुकी थी, मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “अद्वैत अवस्थी।”  

    रूहानी ने अगला सवाल किया, “क्या करते हैं वे?”

    मीना के चेहरे पर सम्मान झलक उठा। उसने झाड़ू लगाना छोड़कर सीधा होकर गर्व से कहा, “अरे, हमारे सर बहुत बड़े लेखक हैं! बहुत नाम कमाया है उन्होंने!”

    लेकिन रूहानी के लिए यह सब नया था। उसने कभी किताबों में दिलचस्पी नहीं ली थी, पढ़ने का शौक उसमें कभी जागा ही नहीं था, न ही किसी लेखक के बारे में ज्यादा सुना था। जब स्कूल में थी, तब भी सिर्फ़ उतना ही पढ़ती थी, जितना ज़रूरी था। साहित्य, कविताएँ, उपन्यास – इन सबसे उसका कभी कोई जुड़ाव नहीं रहा।

    लेकिन इस समय, मीना की बातों से ज़्यादा, उसे अद्वैत अवस्थी को लेकर खुद में बढ़ती जिज्ञासा महसूस हो रही थी।

    कैसा होगा वो इंसान जो इतनी कहानियाँ लिखता है? 

    क्या वो अपनी कहानियों में खुद को छुपा लेता होगा या फिर उनमें अपनी कोई सच्चाई बयां करता होगा?

    मीना ने हैरानी से पूछा, “लेकिन आप मुझसे सर के बारे में इतना क्यों पूछ रही हो? कल उनसे बात नहीं कर पाई थी क्या?”  

    रूहानी ने गहरी साँस ली। उसकी उंगलियाँ मेज़ के किनारे को हल्के-हल्के सहला रही थीं, “नहीं… कल मैं बेहोश हो गई थी और जब सुबह होश आया, तो तुम्हारे सर यहाँ नहीं थे।”

    मीना को यह सुनकर हल्की हैरानी हुई, लेकिन बातचीत का सिलसिला उसे अच्छा लग रहा था। उसने रुचि लेते हुए कहा, “सर तो अपने काम के चलते ज़्यादातर बाहर ही रहते हैं। कभी कोई नई किताब प्रकाशित करनी होती है, तो कभी किसी बड़े लेखक से मिलने जाना पड़ता है। मगर जब भी यहाँ होते हैं, तो बस अपने कमरे में ही बंद रहते हैं, लिखने में डूबे रहते हैं।”

    रूहानी खिड़की के बाहर देखने लगी। 

    एक प्रसिद्ध लेखक… और यहाँ इस सूने घर में एक अजीब से अकेलेपन में रहता है। ये घर उसे अपनी ओर खींच रहा था, जैसे यहाँ की हर दीवार में कोई अनकही दास्तान क़ैद थी।

    मीना अब अपनी सफाई का काम लगभग पूरा कर चुकी थी। उसने टेबल पर कपड़ा मारा और एक हल्की मुस्कान के साथ बोली, “मैं तो तब से यहाँ हूँ, जब सर शादी करके आए थे। शादी के एक साल बाद ही मैडम दुनिया छोड़कर चली गईं।”

    रूहानी को यह सुनकर अजीब-सा महसूस हुआ। उसने अद्वैत अवस्थी के चेहरे को याद करने की कोशिश की— वो खाली, गहरी आँखें, जिसमें दर्द की परतें बिछी हुई थीं। 

    क्या उस दर्द की वजह उसकी पत्नी की मौत थी? 

    या कोई और ज़ख्म भी था, जो उसने किसी से साझा नहीं किया?

    मीना की आवाज़ में हल्की उदासी आ गई, मगर जब उसने कहा, “मैडम ने ही मुझे यहाँ काम करने के लिए चुना था,” तो उसके चेहरे पर गर्व की चमक आ गई। शायद वो खुद को इस घर का एक हिस्सा मानने लगी थी, जैसे उसकी पहचान अद्वैत अवस्थी और उनकी पत्नी से जुड़ी हो।

    रूहानी भी उसकी बातों में थोड़ी देर के लिए खो गई। एक लेखक, जो अपनी पत्नी को शादी के साल भर बाद ही खो चुका था। उस दर्द का अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता था।

    किसी की ज़िंदगी में इतना बड़ा बदलाव सिर्फ़ साल भर में कैसे आ सकता है? 

    कोई इतना अकेला कैसे हो सकता है कि सालों तक किसी से बात न करे? 

    या फिर वो भी उन्हीं लोगों में से था, जो सिर्फ़ दिखावे की शादी करते हैं?

    विचारों में डूबी रूहानी अचानक चौंकी, जब मीना ने उसके सामने चुटकी बजाई, “कहाँ खो गईं आप?”

    रूहानी चौंक गई। उसने अपनी पलकों को झपकाया और हल्का मुस्कुरा दिया, “नहीं, बस ऐसे ही…”

    मीना भी मुस्कुराई, “अच्छा, बाकी बातें कल करेंगे। मुझे अभी घर जाना है, नहीं तो मेरे बच्चे मुझे खोजने लगेंगे।”

    रूहानी ने अनायास ही पूछ लिया, “तुम्हारी शादी कब हुई?”

    मीना ने हड़बड़ी में कपड़े ठीक करते हुए कहा, “अरे, वो सब फिर कभी। अभी तो मुझे जाना होगा, बच्चे राह देख रहे होंगे।”

    इतना कहकर वह तेजी से बर्तन समेटने लगी। उसने चाय और नाश्ता रूहानी के सामने रखते हुए कहा, “ये खा लीजिएगा, मैडम। और सर के इंतजार मत कीजिएगा, उनका कोई ठिकाना नहीं। कभी आधी रात को आते हैं, तो कभी अगली सुबह तक।”

    रूहानी ने चुपचाप सिर हिला दिया। मीना ने एक अंतिम मुस्कान दी और दरवाज़ा बंद करके चली गई।

    अब फिर वही खामोशी।

    कमरे की हर चीज़ वैसी ही थी, लेकिन अब ये खामोशी और गहरी हो गई थी। रूहानी ने चाय का कप उठाया, लेकिन पीने का मन नहीं था। वह सोफे पर बैठी रही, अपनी ही उलझनों में घिरी हुई।

    उसकी आँखें दीवार पर टंगी घड़ी पर चली गईं।

    टिक… टिक… टिक…

    समय धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था, मगर इस घर के भीतर सब कुछ रुका हुआ महसूस हो रहा था।

    उसका मन कह रहा था कि उसे यहाँ नहीं होना चाहिए था। उसे वापस जाना चाहिए। लेकिन वापस कहाँ?

    उसकी ज़िंदगी में पीछे मुड़कर देखने के लिए अब कुछ भी नहीं था। ना कोई घर, ना कोई ऐसा जिसे वह अपना कह सके। 

    एक अजनबी ने उसे बचाया और अब वह उसी अजनबी के घर में बैठी थी, उसके बारे में सोचते हुए।

    उसे महसूस हो रहा था कि यह जगह उसे खींच रही थी, लेकिन क्यों? वह खुद नहीं समझ पा रही थी।

    बाहर से हवा का हल्का झोंका आया और पर्दे धीरे-धीरे हिलने लगे। उस हवा में एक ठंडक थी, जो उसकी रूह तक महसूस हो रही थी।

    वह उठी और धीरे-धीरे हॉल में चहलकदमी करने लगी। उसकी नज़र किताबों की शेल्फ़ पर पड़ी।

    उसने धीरे से एक किताब उठाई। उस किताब के कवर पर लेखक का नाम लिखा था, लेकिन उसकी आँखें सिर्फ़ उन मोटे अक्षरों को देख रही थीं—”अद्वैत अवस्थी”

     

    उसने उंगलियों से नाम को छुआ। उसकी लिखी हुई किताबें…

    उसने किताब के पन्ने पलटने शुरू किए। उसकी नज़र एक पंक्ति पर ठहर गई—  

    “कुछ जख़्म ऐसे होते हैं, जिन्हें वक़्त नहीं भरता, बस इन्सान उनके साथ जीना सीख जाता है।” 

    उसका दिल एक पल के लिए ठहर गया।

    यह कैसा संयोग था कि उस इंसान की किताब में उसे खुद का अक्स मिल रहा था, जिसने उसे मौत के करीब से बचाया था?  

    पन्ने आगे बढ़ते गए और हर शब्द जैसे किसी भूली हुई वेदना को फिर से उभार रहा था—  

    “कभी-कभी हम अपनी तकलीफ़ें किसी से बाँटते नहीं, क्योंकि हमें डर होता है कि कोई समझेगा ही नहीं। लेकिन सच तो यह है कि कुछ दर्द ऐसे होते हैं, जिन्हें सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है, बाँटा नहीं जा सकता।”

    रूहानी को महसूस हुआ कि उसकी आँखें हल्की-सी नम हो गई थीं।

    क्या अद्वैत अवस्थी ने अपनी कहानियों में खुद को छुपा लिया था?  

    या फिर वो अपनी किसी सच्चाई को इन शब्दों के पीछे किसी अनकही टीस की तरह छोड़ गया था?  

    उसने किताब धीरे से बंद कर दी, फिर धीरे से वापस शेल्फ़ में रख दी लेकिन वो पंक्तियाँ अब भी उसके दिल के भीतर गूंज रही थीं।  

    वह खिड़की के पास गई और पर्दा थोड़ा हटाया।

    वह सोचने लगी— क्या उसे भी अकेलेपन से डर लगता होगा?

    या फिर उसने इस अकेलेपन को ही अपनी ज़िंदगी बना लिया है?

    उसके मन में कई सवाल थे, लेकिन जवाब कहीं नहीं थे।

    कमरे में घड़ी की टिक-टिक जारी थी।

    वह धीरे-धीरे सोफे पर बैठ गई, अपने घुटनों को समेटते हुए।

    उसकी आँखों में हल्की नमी थी, लेकिन उसे खुद नहीं पता था कि यह किसलिए थी।

    क्या अपने लिए? या उस अजनबी के लिए, जो अब उसके सवालों के घेरे में था?

    क्या वह सच में किसी ऐसी कहानी का हिस्सा बनने जा रही थी, जिसके अंत से वह अनजान थी?

    —————-

    उसने धीरे-धीरे अपनी जगह से उठकर इधर-उधर नजर दौड़ाई। कहीं कुछ तो था जो उसे बेचैन कर रहा था। तभी अचानक उसे अहसास हुआ— उसका मोबाइल!  

    वो तेजी से अपना फोन ढूंढने लगी। नोटिफिकेशन लाइट टिमटिमा रही थी… लेकिन ये संदेश किसके थे?  

  • अधूरी इबादत भाग~2

    अधूरी इबादत भाग~2

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~2 सवालों से भरा अजनबी घर

    सूरज की हल्की किरणें खिड़की के झीने पर्दों से छनकर कमरे में फैल रही थीं। हल्की हवा में पर्दे हौले-हौले हिल रहे थे, जैसे किसी अदृश्य हाथ ने उन्हें छू लिया हो। धूप की पतली रेखाओं के बीच, हवा में तैरते धूल के महीन कण, किसी भूली-बिसरी याद की तरह दिख रहे थे। रूहानी की पलकें भारी थीं। ऐसा लग रहा था जैसे उसकी आत्मा किसी गहरे कुएं में डूब गई हो।

    उसकी सांसें धीमी थीं, जैसे उसका भीतर से सारा जोश कहीं खो गया हो। उसने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। पहली चीज़ जो उसकी धुंधली दृष्टि में आई, वो थी छत पर घूमता हुआ पंखा। उसकी ब्लेड धीमी चाल में गोल-गोल घूम रही थीं, जैसे वक़्त खुद भी थम जाना चाहता हो।

    रूहानी ने अपना सिर घुमाया, कमरे का जायज़ा लिया। यह कोई होटल का कमरा नहीं था, ना ही अस्पताल का—बल्कि यह एक घर का हॉल था। एक ऐसा घर, जो बड़ा तो नहीं था, लेकिन उसमें एक अजीब-सी शांति पसरी हुई थी। दीवारें हल्के रंग की थीं, लेकिन उन पर हल्की उदासी का साया था। एक तरफ़ लकड़ी की बुकशेल्फ़ थी, जिसमें किताबें करीने से सजी हुई थीं। उन किताबों को देखकर ही अंदाजा लगाया जा सकता था कि यहाँ का मालिक कोई आम इंसान नहीं, बल्कि अपने ही ख्यालों में खोया रहने वाला कोई शख्स होगा।

    रूहानी ने माथे पर हाथ फेरा। उसे हल्का दर्द महसूस हो रहा था। और फिर… वो पल दिमाग़ में बिजली की तरह कौंधा।

    पुल…

    वो ठंडी हवा…

    उसका लड़खड़ाते हुए रेलिंग पर चढ़ना…

    फिर अचानक कोई उसे खींचता है… एक जोड़ी मजबूत बाहें…

    “कौन था वो?”

    वो बुदबुदाई।

    उसने धीरे से अपना हाथ सोफे से हटाया और पैर नीचे रखे। फर्श पर पैर रखते ही लकड़ी के ठंडेपन का एहसास हुआ। पूरा घर नीरव था, मगर यह खामोशी कानों में अजीब-सा सन्नाटा भर रही थी। एक सन्नाटा, जो कानों में सन्नाटे की तरह गूंज रही थी।

    हॉल से दाएँ एक छोटा-सा कॉरिडोर था। रूहानी ने धीरे-धीरे कदम बढ़ाए।

    कॉरिडोर संकरा था, मगर साफ़-सुथरा। दीवारों पर पुरानी तस्वीरें टंगी थीं—धुंधली और मोनोक्रोम—जैसे किसी बीते हुए अतीत की परछाइयाँ कैद हों। एक कोने में लकड़ी की एक छोटी-सी मूर्ति रखी थी। वह किसी औरत की आकृति थी—गर्दन झुकी हुई, आँखों में कोई गहरी उदासी। रूहानी ने हाथ बढ़ाकर उसे छुआ और उसकी उंगलियों के नीचे, लकड़ी की सतह पर न जाने क्यों ठंडापन नहीं, बल्कि एक हल्की-सी सिहरन महसूस हुई।

    उसने तुरंत हाथ पीछे खींच लिया।

    रूहानी आगे बढ़ी। पूरा घर शांत था, मानो दीवारों ने सदियों से कोई आवाज़ नहीं सुनी हो। उसे घर बड़ा नहीं लगा, मगर इसमें एक गहरा खालीपन था, जो उसकी रूह तक महसूस हो रहा था।

    वो हॉल में लौट आई। वहाँ एक कोने में डाइनिंग टेबल रखी थी और दूसरी तरफ़ सोफे और सेंटर टेबल। दीवार पर एक बड़ी-सी घड़ी टंगी थी, जिसकी सूइयाँ बिल्कुल धीमे-धीमे खिसक रही थीं। टिक-टिक की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज रही थी, जैसे कोई अदृश्य ताकत हर गुजरते पल को दर्ज कर रही हो।

    फिर उसकी नज़र ऊपर की तरफ़ गई—सीढ़ियाँ।

    वो धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।

    ऊपर पहुँचते ही उसने देखा कि दो दरवाज़े बंद थे। एक दरवाजे पर हल्की धूल की परत जमी थी, जैसे वहां बहुत समय से कोई गया ही न हो। उसे एक अजीब-सी अनुभूति हुई। वो दरवाज़े कुछ छुपा रहे थे।

    वह नीचे आकर हॉल के सोफे पर धीरे से बैठ गई, उसकी उंगलियां आपस में उलझ रही थीं। 

    घर में कोई नहीं था। न जाने क्यों उसे ऐसा लग रहा था कि वह किसी अजनबी जगह पर नहीं, बल्कि कहीं बहुत गहरे दर्द के बीच बैठी थी।

    तभी दरवाज़े पर खटखटाहट हुई।

    रूहानी का दिल धक् से रह गया। उसके अंदर डर जागने लगा। इस अजनबी के घर पर पता नहीं कौन आ जाए।

    दरवाज़ा खुला और एक साधारण सी औरत अंदर आई—हाथ में थैला पकड़े, चेहरे पर थोड़ी थकान। मगर जैसे ही उसकी नज़र रूहानी पर पड़ी, वो एकदम से चौंक गई।

    “अरे…!”

    “आप कौन हैं?” वह जोर से चीखी।

    रूहानी भी घबरा गई, मगर खुद को संभालते हुए बोली, “वो… मैं…” उसकी आवाज़ लड़खड़ा गई।

    “आप यहाँ आईं कैसे?” औरत अभी भी सहमी हुई थी।

    “मैं…” रूहानी को समझ नहीं आया कि क्या कहे। “वो… कल… एक्सीडेंट…”

    “एक्सीडेंट?” औरत के चेहरे पर संदेह उभर आया।

    “हाँ… वो इंसान… जिन्होंने मुझे बचाया था ….”

    औरत ने कुछ पल उसे ध्यान से देखा, फिर सहज होकर बोली, “ओह… अच्छा… सर ने आपको बचाया है?”

    रूहानी ने सिर हिलाया।

    “तुम कौन हो?” रूहानी ने पूछा।

    “मैं यहाँ की मेड हूँ। दो साल से काम कर रही हूँ। सफाई, खाना बनाना… बस यही।”

    “तुम्हारा नाम क्या है?”

    “मीना,” औरत ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।

    “और… वो तुम्हारे सर… वो कहाँ हैं?”

    “सर तो सुबह-सुबह निकल गए होंगे। वैसे आपका नाम क्या है?”

    रूहानी चुप हो गई।

    फिर धीरे से कहा, “रूहानी।”

    मीना ने थोड़ी देर तक उसे घूरा। फिर अचानक बोली,

    “बुरा मत मानिएगा, मैडम… मगर मैंने यहाँ पिछले एक साल में किसी औरत को आते नहीं देखा। खासकर सर की पत्नी के जाने के बाद तो बिल्कुल नहीं…”

    रूहानी के भीतर भूचाल आ गया।

    “उनकी पत्नी?”

    “हाँ… सर की पत्नी का तो पिछले साल ही देहांत हो गया था। बहुत ही अच्छी और शांत स्वभाव की थीं। उनके जाने के बाद से सर बिल्कुल बदल गए हैं… ना किसी से बात करते हैं, ना किसी को घर पर बुलाते हैं…”

    रूहानी की आँखें धीरे-धीरे चौड़ी हो गईं।

    “मर… गईं?” उसके होठों पर बस यही शब्द फिसले।

    मीना ने हल्की सहानुभूति जताते हुए सिर हिलाया, “बहुत मुश्किल वक़्त था उनके लिए।”

    रूहानी का मन डगमगाने लगा।

    उस आदमी की आँखों का खालीपन…

    उसकी उदासी…

    और अब ये सुनना कि उसकी पत्नी इस दुनिया में नहीं रही…

    सब कुछ किसी उलझे हुए रहस्य की तरह लगने लगा।

    रूहानी की साँसें तेज़ हो रही थीं। उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी ऐसी कहानी का हिस्सा बन गई है, जिसमें न चाहते हुए भी उसे शामिल होना पड़ रहा है।

    “मैडम… आप ठीक हैं?” मीना की आवाज़ ने उसे चौंका दिया।

    “हाँ… हाँ, मैं ठीक हूँ…” रूहानी ने खुद को संभालते हुए कहा।

    मगर उसकी आँखों में सवालों का सैलाब उमड़ रहा था —

    वो कौन था?

    उसकी आँखों में वो खालीपन क्यों था?

    क्या ये घर सिर्फ़ ईंट और पत्थरों का बना था, या इसमें कोई अनकहा दर्द दफ़न था?

    उसके दिल में इस अजनबी शख्स को लेकर एक अजीब-सा खिंचाव महसूस हो रहा था — ऐसा खिंचाव जो डर के साथ-साथ किसी अनकही कहानी को जानने की बेचैनी से भरा हुआ था।

    उसका मन कह रहा था—यह कहानी सिर्फ़ उसकी नहीं थी। वह किसी और की जिंदगी के ऐसे पन्ने में दाखिल हो गई थी, जहां से वापस लौटना अब शायद उसके बस में नहीं था।

    ——–

    दरवाज़े के पीछे आखिर क्या था, जिसे वक़्त की धूल ने ढक रखा था?

    उस आदमी की आँखों का खालीपन… क्या वो सिर्फ़ ग़म था, या किसी छुपे हुए राज़ की परछाई?

    इस घर की खामोशी में कोई अनसुनी दास्तान थी, मगर क्या रूहानी उसे सुनने के लिए तैयार थी?

  • अधूरी इबादत

    अधूरी इबादत

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     भाग~1 अद्वैत और वो अनजान लड़की

    ————

    रात अपने सन्नाटे में डूबी थी। सड़कों पर दूर-दूर तक वीरानी पसरी थी, बस कभी-कभी किसी गाड़ी के गुजरने की हल्की सी आवाज़ उस खामोशी को तोड़ देती थी। अद्वैत अपनी कार चलाते हुए ख्यालों में गुम था। उसका मन उस रात किसी उलझन में था, जैसे कोई अधूरी बात ज़हन के किसी कोने में अटकी हो, बार-बार लौटकर उसे बेचैन कर रही हो।

    उसके भीतर का तूफान उससे कहीं ज़्यादा शोर मचा रहा था, जितना बाहर की खामोशी में मुमकिन था। उसकी आंखें सड़क पर थीं, मगर दिमाग कहीं और भटक रहा था। अतीत की परछाइयाँ उसकी सोच पर हावी थीं — कुछ बातें जिन्हें वह भुला देना चाहता था, मगर वे हर बार नए ज़ख्म खोल जाती थीं।

    उसकी उंगलियां स्टीयरिंग पर कसकर जकड़ी हुई थीं, जैसे अगर उसने अपनी पकड़ ढीली की तो उसके भीतर का दर्द अचानक उबल पड़ेगा। सड़क किनारे जलती स्ट्रीट लाइट्स उसकी कार की खिड़की पर छोटे-छोटे प्रतिबिंब बनाती और फिर ग़ायब हो जातीं, ठीक वैसे ही जैसे उसकी ज़िन्दगी के वो पल, जो कभी चमकदार थे, मगर अब सिर्फ धुंधली यादों के अक्स बनकर रह गए थे।

    हवा ठंडी थी, लेकिन उसके माथे पर पसीने की हल्की बूँदें थीं। ना जाने क्यों, उसके दिल में एक अनजानी बेचैनी दौड़ रही थी — बिना वजह, बिना नाम की।  

    तभी उसकी नज़र सामने पुल पर पड़ी। वहाँ एक लड़की खड़ी थी….. 

    सफ़ेद सलवार-कुर्ते में लिपटी, उसके बाल हवा में बेतरतीब लहरा रहे थे। उसके कंधे झुके हुए थे, जैसे उसकी आत्मा ही उसका भार संभालने से इनकार कर रही हो। उसकी नज़रें नीचे गहरी खाई में टिकी थीं — एक भयावह खालीपन, जिसमें गिरने के बाद शायद कुछ भी बाकी न रहे।

    उसकी चाल में ठहराव नहीं था, वो बस किसी खयाल में डूबी आगे बढ़ती जा रही थी — सीधा पुल के किनारे की तरफ। अद्वैत ने हैरानी से उसकी तरफ देखा। लड़की का चेहरा आधा छुपा था, मगर उसके कंधे पर बिखरे बाल और काँपती देह साफ दिख रही थी। 

    अद्वैत के भीतर कुछ धड़क उठा। उसके मन में अजीब-सी बैचेनी थी।

    “ये क्या कर रही है?” उसने खुद से कहा और बिना सोचे समझे तेज़ी से ब्रेक पर पैर मारा। टायरों की चीखती आवाज़ सन्नाटे को चीर गई।  

    वो कार से उतरकर लगभग दौड़ते हुए पुल की ओर भागा। लड़की अब पुल की रेलिंग पर खड़ी थी — आगे झुकी हुई, बस एक हल्की हवा के झोंके में गिर जाने को तैयार।  

    “रुको!” अद्वैत की आवाज़ अचानक फट पड़ी, मगर लड़की ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।  

    उसके कदम तेज़ हुए। उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि वह उस लड़की की तरफ़ क्यों खींचा चला जा रहा है — शायद यह डर था कि वो किसी की जान जाते हुए अब नहीं देख पाएगा या फिर कहीं भीतर दबा वो दर्द जो किसी को भी टूटता हुआ देखना और सहन नहीं कर सकता था।

    “रुको, सुनो!” उसने फिर पुकारा।  

    लड़की ने धीरे-से उसकी तरफ देखा — उसकी आँखें सूनी थीं, जैसे भीतर सब कुछ टूट चुका हो। उसके होठों पर कंपन था और चेहरे पर आँसुओं की गीली लकीरें। वो इतनी खोई हुई थी कि उसके कानों तक अद्वैत की आवाज़ ठीक से पहुंच भी नहीं पा रही थी।  

    लड़की ने अपनी आँखें बंद कर लीं और खुद को आगे झुका लिया।  

    अद्वैत ने बिना कुछ सोचे हल्का दौड़कर उसे पीछे खींच लिया। लड़की का हल्का शरीर उसकी बाहों में झूल गया। दोनों का संतुलन बिगड़ा और वे वहीं पुल के फर्श पर गिर पड़े।  

    अद्वैत का सिर हल्का-सा घूम गया था, मगर उसकी बाहों में लड़की का चेहरा था — ठंडा और बेजान-सा, मगर उसकी साँसें अब भी चल रही थीं।  

    उसके भीगे बाल अद्वैत के हाथों में उलझ गए थे। अद्वैत ने उसके चेहरे को गौर से देखा — चेहरा इतना मासूम था कि उसे यकीन ही नहीं हुआ कि यही लड़की अभी कुछ ही पल पहले अपनी जान देने जा रही थी। उसकी आँखें सुर्ख थीं, शायद कई रातों से सोई नहीं थी। उसकी पलकें आधी खुली थीं, बाल बिखरे हुए थे और होंठ सफ़ेद हो चुके थे… मानो उसकी आत्मा धीरे-धीरे उसके जिस्म से अलग हो रही हो। 

    “तुम ठीक हो?” अद्वैत ने उसके चेहरे पर हाथ रखते हुए पूछा, मगर लड़की की पलकें धीरे-धीरे झपकने लगीं।

    “शिट!” अद्वैत फुसफुसाया।।  

    “सुनो….. सुनो!” अद्वैत ने हल्के से उसे झिंझोड़ा, मगर कोई जवाब नहीं आया।  

    उसका मन घबराने लगा। उसे समझ नहीं आया कि क्या करे। आसपास कोई और दिखाई नहीं दे रहा था। वो लड़की को इस हालत में यूँ ही वहाँ नहीं छोड़ सकता था।  

    “अब क्या करूँ?” उसके मन में सवाल घूमने लगे।

    लड़की की हालत देखकर उसे यकीन हो गया कि उसे उसकी देखभाल की ज़रूरत है। बिना ज्यादा सोचे, थोड़ा हिचकिचाते हुए उसने लड़की को अपनी बाहों में उठाया और उसे कार में ले आया। उसके कपड़े बर्फ जैसे ठंडे हो चुके थे। अद्वैत ने अपना जैकेट उसके ऊपर डाल दिया और गाड़ी स्टार्ट कर दी।  

    रास्ते भर उसके मन में सवालों का सैलाब उमड़ रहा था — “ये लड़की कौन है? इसके साथ ऐसा क्या हुआ होगा? और किस बात ने उसे इतना तोड़ दिया था कि ख़ुदकुशी ही उसे आखिरी रास्ता लगी?”

    लड़की का चेहरा कार की रोशनी में हल्का-हल्का चमक रहा था — उस चेहरे पर कुछ ऐसा था जो अद्वैत को बेचैन कर रहा था… एक मासूमियत, एक खोखली उदासी….. कुछ ऐसा जिसे देखकर लगता था कि ये लड़की बहुत कुछ सह चुकी है।  

    अपने अपार्टमेंट पर पहुँचकर अद्वैत ने उसे गोद में उठाया और अंदर ले आया। कमरे का अंधेरा उसे आज ज़्यादा ठंडा और सुनसान लगा। उसने लड़की को धीरे-से सोफे पर लिटाया और उसे ढकने के लिए चादर ढूंढने लगा।  

    अपने कमरे से एक अतिरिक्त मुलायम चादर लाकर अद्वैत ने उसे पूरी तरह ढक दिया। तभी अद्वैत का हाथ उसकी ब्रेसलैट से टकराया, जिसमे सुन्दर सी कैलीग्राफी में “रूहानी” नाम लिखा हुआ था। 

     

    “रूहानी” उसने फुसफुसाते हुए दोहराया, मानो कोई मंत्र उच्चारण कर रहा हो।  

    अद्वैत ने धीरे-से उसके हाथों को अपने हाथ में लिया — उसकी उंगलियाँ सख्त और ठंडी थीं। वो उस हाथ को अपने हाथों में मसलने लगा ताकि उसकी ठंडक कुछ कम हो सके।  

    रूहानी की आँखें हल्की-सी खुलीं, मगर वो उसे देख भी नहीं पाई। उसके होंठ हिले, मगर कोई आवाज़ नहीं निकली।  

    “तुम. … ठीक हो?” अद्वैत ने झुककर पूछा।  

    रूहानी के होंठ काँप रहे थे, जैसे किसी डर ने उसकी आवाज़ छीन ली हो।  

    “मैं…. मैं तुम्हें कुछ नहीं कहूँगा,” अद्वैत की आवाज़ में अजीब-सा अपनापन था, जिसे सुनकर लड़की के चेहरे पर हल्की राहत की परछाई उभरी।  

    वो धीरे से पास वाले सोफे पर बैठ गया, उसके चेहरे की ओर देखते हुए।   

    कमरे में सिर्फ दीवार घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी। अद्वैत का दिल अब भी तेजी से धड़क रहा था। 

    आखिर रूहानी के साथ क्या हुआ होगा? उसकी आँखों में जो खालीपन था, उसमें कितनी कहानियाँ दबी थीं… अद्वैत जानना चाहता था, मगर इस वक्त सबसे ज़रूरी था कि वो सुरक्षित रहे।  

    “शायद कल सुबह ही सब कुछ समझ आए…” उसने खुद को दिलासा दिया और अपने कमरे में चले गया सोने के लिए मगर उस रात नींद उसके लिए दूर की चीज़ थी…

    —————

    क्या अद्वैत ने सच में रूहानी को बचा लिया, या वो सिर्फ एक परछाई थी जो उसकी ज़िंदगी में अचानक दाखिल हो गई?

    रूहानी की आँखों में जो डर था, वो किसी एक रात की देन था या एक लंबे अतीत का बोझ?

    क्या अद्वैत सच में जानना चाहता था कि रूहानी की कहानी क्या है, या वो बस उसकी उदासी में खुद को देख रहा था?