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लेखक: Writer _d Kashyap

  • घुँघरुओं से सरहद तक

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    अध्याय 2 — पहली टक्कर

    गोवा…

    समुद्र की लहरें बार-बार किनारे को छूकर लौट रही थीं। हवा में नमक की हल्की-सी खुशबू घुली थी। पूरे शहर में पर्यटकों की चहल-पहल थी।

    गोवा के सबसे प्रसिद्ध होटलों में से एक, सी ब्रीज़ ग्रैंड, आज कुछ ज़्यादा ही व्यस्त था।

    इसी होटल में दो अलग-अलग दुनिया ठहरने वाली थीं।

    इरा की एंट्री

    “वाह… गोवा सच में इतना खूबसूरत होता है?”

    बस से उतरते ही इरा ने मुस्कुराकर कहा।

    उसके साथ उसकी डांस टीम थी—रिया, निशा, काव्या और कोरियोग्राफर विकास सर।

    रिया ने मज़ाक में कहा, “मैडम, पहले होटल चलते हैं… फिर समुद्र से बातें कर लेना।”

    सब हँस पड़े।

    होटल के रिसेप्शन पर चेक-इन की प्रक्रिया पूरी हुई और सभी अपने-अपने कमरों की ओर बढ़ गए।

    शाम को रिहर्सल थी, इसलिए सबने जल्दी तैयार होने का फैसला किया।

    रुद्र की एंट्री

    उसी समय होटल के बाहर एक टैक्सी आकर रुकी।

    उसमें से पाँच लड़के उतरे।

    सबके कंधों पर बैग थे और चेहरों पर छुट्टियों की खुशी।

    उनमें सबसे आगे था…

    कैप्टन रुद्र।

    साथ में उसके दोस्त—कबीर, आर्यन, विवेक और समीर।

    कबीर ने हँसते हुए कहा, “कैप्टन साहब… यहाँ कोई मिशन नहीं है। थोड़ा मुस्कुरा भी लिया करो।”

    रुद्र मुस्कुराया।

    “आर्मी ने छुट्टी दी है… अक्ल नहीं।”

    सब ज़ोर से हँस पड़े।

    रिसेप्शन पर औपचारिकताएँ पूरी हुईं और वे भी अपने कमरों की ओर बढ़ गए।

    पहली टक्कर

    करीब आधे घंटे बाद…

    इरा अपने कमरे से जल्दी-जल्दी बाहर निकली।

    रिहर्सल के लिए देर हो रही थी।

    उसके हाथ में मोबाइल, एक फाइल और पानी की बोतल थी।

    उसी समय दूसरी तरफ़ से रुद्र भी तेज़ कदमों से आ रहा था।

    वह अपने दोस्तों से बातें करते हुए मोबाइल देख रहा था।

    अचानक…

    धड़ाम!

    दोनों ज़ोर से टकरा गए।

    इरा के हाथ से फाइल और मोबाइल नीचे गिर गए।

    पानी की बोतल लुढ़कती हुई दूर चली गई।

    रुद्र भी एक कदम पीछे हट गया।

    एक पल के लिए दोनों एक-दूसरे को देखते रह गए।

    इरा ने झुँझलाकर कहा, “देखकर नहीं चल सकते क्या?”

    रुद्र ने शांत स्वर में जवाब दिया, “सवाल मुझे भी यही पूछना चाहिए।”

    “मतलब गलती मेरी है?”

    “मैंने ऐसा कब कहा?”

    “तो घूर क्यों रहे हैं?”

    रुद्र ने गहरी साँस ली।

    “मैडम… पहले सामान उठा लीजिए। बहस बाद में कर लेंगे।”

    इरा को लगा जैसे वह उसका मज़ाक उड़ा रहा हो।

    “ज़रूरत नहीं है आपकी सलाह की।”

    वह नीचे झुककर सामान उठाने लगी।

    उसी समय रुद्र भी मोबाइल उठाने के लिए झुका।

    दोनों के हाथ एक साथ मोबाइल पर पहुँचे।

    इरा ने तुरंत मोबाइल खींच लिया।

    “थैंक यू… अब आप जा सकते हैं।”

    रुद्र ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “आपका गुस्सा देखकर लग रहा है कि गोवा की गर्मी भी कम पड़ जाएगी।”

    “और आपको देखकर लग रहा है कि आपको दूसरों को परेशान करने की आदत है।”

    अब रुद्र भी थोड़ा चिढ़ गया।

    “अच्छा… तो सारी गलती मेरी ही है?”

    “बिल्कुल।”

    “ठीक है… फिर माफ़ कीजिएगा। अगली बार आपको देखकर पाँच मीटर पहले ही रास्ता बदल लूँगा।”

    इतना कहकर वह आगे बढ़ गया।

    इरा ने पीछे से धीरे से कहा,

    “घमंडी कहीं का…”

    रुद्र ने भी बिना पीछे देखे बुदबुदाया,

    “ड्रामा क्वीन…”

    दोनों अलग-अलग दिशाओं में चले गए।

    दूसरी मुलाकात

    शाम को इरा की टीम बीच पर रिहर्सल कर रही थी।

    संगीत बज रहा था।

    इरा पूरे ध्यान से स्टेप्स कर रही थी।

    उसी समय रुद्र और उसके दोस्त वहाँ घूमते हुए पहुँच गए।

    समीर ने कहा, “यार… कितना शानदार डांस है।”

    रुद्र ने एक नज़र इरा पर डाली।

    “अरे… ये तो वही होटल वाली मैडम हैं।”

    उधर इरा की नज़र भी रुद्र पर पड़ गई।

    उसने तुरंत नज़रें फेर लीं।

    रिया ने पूछा, “किसे देख रही हो?”

    “किसी घमंडी इंसान को।”

    उसी समय तेज़ हवा चली।

    रिहर्सल के लिए रखा एक हल्का-सा स्पीकर स्टैंड हिलने लगा।

    रुद्र ने दूर से देखा और तुरंत दौड़कर उसे पकड़ लिया, ताकि वह किसी पर न गिरे।

    इरा ने मुड़कर देखा।

    एक पल के लिए उसे लगा कि शायद उसने रुद्र को गलत समझा था…

    लेकिन अगले ही पल रुद्र ने मुस्कुराकर कहा,

    “इस बार भी अगर मैं न पकड़ता, तो शायद इसकी गलती भी मेरी ही होती।”

    इरा ने भौंहें चढ़ाईं।

    “आपको हर बात में मज़ाक करना ज़रूरी लगता है क्या?”

    “नहीं… लेकिन हर बात पर गुस्सा करना भी ज़रूरी नहीं होता।”

    दोनों फिर आमने-सामने खड़े थे।

    दोनों के दोस्त दूर खड़े यह सब देखकर मुस्कुरा रहे थे।

    उन्हें नहीं पता था…

    कि यही छोटी-छोटी नोकझोंक एक दिन ऐसी कहानी की शुरुआत बनेगी, जिसे न इरा भूल पाएगी, न रुद्र।

     

  • घुँघरुओं से सरहद तक

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

     

    अध्याय 1 — दो सपने, दो रास्ते

     

    सुबह की हल्की धूप खिड़की से कमरे में उतर रही थी। पाँच साल की नन्ही इरा आईने के सामने खड़ी थी। उसके छोटे-छोटे पैरों में बंधे घुँघरू हर कदम पर मीठी-सी आवाज़ कर रहे थे।

     

    “एक… दो… तीन… चार…”

     

    समने बैठी उसकी माँ मुस्कुरा रही थीं।

     

    “शाबाश इरा… बस ऐसे ही।”

     

    छोटी-सी इरा हर स्टेप पूरे मन से करती। कई बार गिरती, फिर खुद ही उठकर दोबारा नाचने लगती।

     

    माँ ने उसके माथे का पसीना पोंछते हुए पूछा, “थक गई?”

     

    इरा ने तुरंत सिर हिलाया।

     

    “नहीं… मुझे बड़ा डांसर बनना है।”

     

    उसकी आँखों में उम्र से कहीं बड़े सपने थे।

     

    दिन बीतते गए। इरा स्कूल भी जाती और हर शाम डांस अकादमी भी। बाकी बच्चे छुट्टी के बाद खेलते थे, लेकिन इरा के लिए खेल भी डांस ही था।

     

    वह प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने लगी। कभी जीतती, कभी हारती, लेकिन हारने पर भी उसके चेहरे की मुस्कान नहीं जाती थी।

     

    एक बार जिला स्तरीय प्रतियोगिता में वह दूसरे स्थान पर आई।

     

    सबको लगा कि वह रो पड़ेगी।

     

    लेकिन वह सीधे विजेता लड़की के पास गई, उसे गले लगाया और बोली,

     

    “आज तुमने बहुत अच्छा डांस किया। अगली बार मैं और मेहनत करूँगी।”

     

    उस दिन वहाँ मौजूद निर्णायक भी उसकी इस बात से प्रभावित हुए।

     

    धीरे-धीरे इरा की पहचान सिर्फ़ एक अच्छी डांसर के रूप में नहीं, बल्कि एक अच्छे इंसान के रूप में बनने लगी।

     

     

     

    उधर, शहर के दूसरे कोने में एक लड़का हर सुबह सूरज निकलने से पहले उठ जाता था।

     

    उसका नाम था रुद्र।

     

    जहाँ दूसरे बच्चे क्रिकेट खेलते थे, वहीं रुद्र अपने घर की छत पर दौड़ लगाता, पुश-अप्स करता और तिरंगे को देखकर सलाम करता।

     

    एक दिन उसके पिता ने पूछा,

     

    “इतनी मेहनत क्यों करता है?”

     

    रुद्र ने बिना सोचे जवाब दिया,

     

    “एक दिन मैं सेना की वर्दी पहनूँगा।”

     

    उसकी आवाज़ में ऐसा विश्वास था कि पिता कुछ पल उसे देखते ही रह गए।

     

    रुद्र बचपन से ही निडर था।

     

    किसी को परेशान होते देख वह चुप नहीं बैठता था।

     

    कई बार उसकी यही आदत उसे मुसीबत में भी डाल देती।

     

    स्कूल में एक बार कुछ बड़े लड़के एक छोटे बच्चे को तंग कर रहे थे।

     

    रुद्र अकेला ही उनके सामने खड़ा हो गया।

     

    मारपीट हुई, उसके कपड़े फट गए, लेकिन उसने उस बच्चे को बचा लिया।

     

    घर पहुँचने पर माँ ने डाँटा,

     

    “हर लड़ाई में कूदना ज़रूरी है क्या?”

     

    रुद्र मुस्कुराया।

     

    “अगर कोई गलत कर रहा हो, तो चुप रहना उससे भी बड़ी गलती है।”

     

    समय बीतता गया।

     

    रुद्र ने एनसीसी जॉइन की।

     

    कड़ी मेहनत के बाद उसने एनडीए की परीक्षा पास की।

     

    फिर कठिन प्रशिक्षण के कई महीनों बाद वह भारतीय सेना का हिस्सा बन गया।

     

    उस दिन जब उसने पहली बार वर्दी पहनी, तो उसकी माँ की आँखों में आँसू थे।

     

    रुद्र ने सलाम करते हुए कहा,

     

    “आज मेरा सपना पूरा हुआ है… अब मेरी ज़िंदगी देश के नाम है।”

     

     

     

    इधर इरा भी अब एक जानी-मानी युवा डांसर बन चुकी थी।

     

    उसकी मेहनत रंग ला रही थी।

     

    देश के अलग-अलग शहरों से उसे प्रदर्शन के निमंत्रण मिलने लगे।

     

    एक दिन उसकी टीम को गोवा में होने वाले एक बड़े डांस फेस्टिवल का निमंत्रण मिला।

     

    इरा खुशी से उछल पड़ी।

     

    उसी समय दूसरी तरफ़ रुद्र को भी कई महीनों बाद दस दिनों की छुट्टी मिली।

     

    उसके दोस्तों ने कहा,

     

    “इस बार कहीं घूमने चलते हैं।”

     

    बहुत सोचने के बाद सबने गोवा जाने का फैसला किया।

     

    उन्हें नहीं पता था कि यह छुट्टी सिर्फ़ एक सफ़र नहीं, बल्कि उनकी ज़िंदगी की दिशा बदलने वाली थी।

     

    एक ही शहर…

     

    एक ही होटल…

     

    दो बिल्कुल अलग दुनिया…

     

    और किस्मत ने दोनों के नाम एक ही कहानी में लिख दिए थे।

     

    (अध्याय 1 समाप्त)