भाग ~5 ज़ख्म जो लिखे नहीं गए
पुणे की सड़कों पर कार दौड़ रही थी, लेकिन मेरा ज़हन किसी और सफर पर निकला हुआ था—एक ऐसा सफर, जो सड़क पर नहीं, मेरे भीतर चल रहा था। सड़कें लंबी थीं, आसमान खुला और हवा तेज़ थी, मगर मेरे अंदर घुटन थी।
सुबह से चला था मैं, लेखकों के एक सम्मेलन में शरीक होने के लिए, जहाँ शब्दों की महफ़िल जमी थी, विचारों की गूँज थी और किस्सों का सैलाब था। मगर अब जब मैं वापस लौट रहा था, मेरी कार की खिड़की से झाँकता शहर तेज़ी से पीछे छूट रहा था और उसके साथ ही वह हलचल भी, जो कुछ देर पहले मेरे भीतर थी।
सम्मेलन में कहानियों की बुनावट, भाषा की बारीकियाँ और शब्दों की ताक़त पर कई चर्चाएँ हुईं, लेकिन मेरा मन कहीं और अटका रहा—उन अधूरे क़िस्सों में, जिन्हें मैंने कभी लिखा नहीं, उन भावनाओं में, जिन्हें कभी पूरी तरह अभिव्यक्त नहीं कर पाया।
खिड़की से आती हवा मेरे चेहरे को छूकर निकल जाती थी, मगर दिल की तपिश कम नहीं कर पाती थी। शब्दों के उस समंदर से लौटते हुए भी, भीतर कहीं एक सूखापन था। शायद इसलिए कि कुछ सवाल वहाँ भी अनुत्तरित रह गए थे, कुछ कहानियाँ अभी भी अधूरी थीं।
कल रात की महफ़िल… वही महफ़िल, जहाँ मैं जाना नहीं चाहता था, लेकिन फिर भी मैं उसे मना नहीं कर पाया।
क्यों? यही सवाल अब तक ज़हन में गूंज रहा था, मगर जवाब कहीं गहरे दबा पड़ा था। शायद मैं जानता था, पर स्वीकार नहीं करना चाहता था।
वहाँ बैठे हर चेहरे पर एक नक़ाब था—सभ्य समाज का, खुलेपन का, उच्च विचारों का, लेकिन उनकी आँखों में वही पुरानी धूर्तता थी, शब्दों में वही कड़वाहट, वही ज़हर।
“अरे, देखो तो कौन आया है!”
“इसकी तो माँ भी वही थी न…?”
“क्या खाक लेखक बनेगा? अपनी माँ की कहानी लिखेगा क्या?”
“वैसे, अब इसका कोई है भी? माँ नहीं, बाप नहीं… बीवी भी नहीं रही।”
हर लफ्ज़ नश्तर की तरह रगों में उतरता चला गया। मैं वहाँ कितनी देर तक रुका, याद नहीं, बस इतना याद है कि हर शब्द मेरी रगों में ज़हर की तरह घुलता जा रहा था।
मुझे हमेशा से अपने वजूद पर पछतावा रहा था। मेरी ज़िंदगी एक ऐसा सवाल थी, जिसका जवाब किसी के पास नहीं था।
मैं नहीं जानता था कि मेरे जन्म को लेकर इतना शोर क्यों था, इतनी घृणा क्यों थी?
क्या मैंने अपनी माँ से कहा था कि वो मुझे जन्म दे?
क्या मैंने इस दुनिया में आने का चुनाव किया था? नहीं ना …..
फिर क्यों? क्यों हर बार मुझे ही दोष दिया जाता है?
“नाजायज़!”
एक ऐसा शब्द, जो मेरी रग-रग में उतर चुका था। मेरा पूरा वजूद मानो इसी एक लफ्ज़ में कैद था।
कभी-कभी सोचता हूँ, क्या मैं सच में किसी जुर्म का नतीजा था? क्या मैं सच में एक भूल था? मेरे पिता ने मुझे कभी अपनाया नहीं। और मैं भी उन्हें कभी अपना नहीं पाया। लेकिन क्या मैं उनके साथ रहने वाली उस औरत को अपनी माँ का दर्जा दे सकता था? कभी नहीं।
और मेरी माँ?
वो अब इस दुनिया में नहीं थीं। आत्महत्या कर ली थी उन्होंने। लोग कहते हैं, उन्होंने ज़िंदगी से हार मान ली थी। लेकिन मैं जानता हूँ, ऐसा नहीं था। उन्होंने ज़िंदगी से नहीं, लोगों की नफरत से हार मानी थी। उन्होंने उस समाज से हार मानी थी, जिसने उन्हें कभी स्वीकार ही नहीं किया।
कभी-कभी सोचता हूँ, अगर मैं नहीं होता, तो क्या वो ज़िंदा होतीं? क्या सच में मैं उनकी मौत का ज़िम्मेदार था?
रातों को जब नींद नहीं आती तो आईने में खुद को देखकर सोचता था – क्या मैं सच में वही हूँ, जैसा लोग कहते हैं? एक अपशगुन? एक मनहूस इंसान?
लोगों को लगता है, लेखक हूँ, तो दर्द को समझता हूँ, उसे शब्दों में ढाल लेता हूँ, मगर क्या लेखक का दिल नहीं टूटता? क्या लेखक की आत्मा पर लगे ज़ख्म कम गहरे होते हैं? क्या शब्दों में घुलकर कोई अपने दर्द से बच सकता है? अगर ऐसा होता, तो मैं अब तक खुद को लिखकर ख़त्म कर चुका होता।
पर ऐसा नहीं है …. दर्द सिर्फ़ लिखने से नहीं जाता। वो अंदर जड़ें जमा लेता है, साँसों में घुल जाता है, ख़ून में बहता रहता है।
लोगों को लगता है, मैं मजबूत हूँ। लेकिन मैं हर दिन, हर पल टूटता हूँ।
मेरी पत्नी…
उसकी मुस्कान अब भी आँखों में बसी हुई है। उसके स्पर्श की गर्माहट अब भी हथेलियों में ठहरी हुई है। लेकिन लोग कहते हैं, मेरी वजह से उसकी मौत हुई। जैसे मेरी माँ की हुई थी। तो क्या सच में मैं ही दोषी हूँ? क्या सच में मेरी ज़िंदगी किसी शाप से कम नहीं? क्या मैं जहाँ भी जाता हूँ, जो भी मेरे करीब आता है, वो बर्बाद हो जाता है?
अगर हाँ, तो फिर मैं अब भी ज़िंदा क्यों हूँ?
क्या सिर्फ़ इस दुनिया का तमाशा देखने के लिए?
या सिर्फ़ समाज के तानों को सुनने के लिए?
पीछे किसी ने तेज़ हॉर्न बजाया। मेरी तंद्रा टूटी। सामने सिग्नल हरा हो चुका था, मगर मैं अब भी जड़ था। जैसे मेरे भीतर कोई जाम लग गया हो।
मैंने गहरी सांस ली, एक्सीलेटर दबाया, और गाड़ी आगे बढ़ा दी।
लेकिन भीतर कुछ अब भी रुका हुआ था—
माँ की यादें, पत्नी की परछाइयाँ और वे तमाम आवाज़ें, जो ज़हन में अब भी गूँज रही थीं—
“मनहूस!”
“नाजायज़!”
“इसका कोई नहीं!”
क्या सच में मेरा कोई नहीं था?
क्या मैं इस पूरी दुनिया में सच में अकेला था?
और तभी…
अचानक, उस लड़की का चेहरा ज़हन में कौंध गया।
वही लड़की, जिसे कल रात मैंने उस पुल से कूदने से रोका था।
उसकी बेबस आँखें, काँपते होंठ और वो खामोश चीख़, जो मैं अब तक सुन सकता था।
वो क्यों कूदना चाहती थी? कौन थी वो?
मैंने उसे बचा तो लिया था, लेकिन वो बेहोश हो गई थी।
उसके हाथ में बंधे ब्रेसलेट से उसका नाम पता चला था – “रूहानी” मगर बाकी कुछ भी नहीं।
मेरा दर्द मेरे अंदर था, लेकिन उसका दर्द उसकी आँखों में साफ़ झलक रहा था।
शायद… मैं उसका जवाब नहीं था, पर क्या वो मेरे सवालों का कोई सिरा थी?
मैं आज तक बहुत से लोगों को टूटते देखा था। मैं जानता था कि समाज किस तरह किसी को उसके अपने ही जीवन से बेगाना बना देता है। मैं जानता था कि दर्द जब हद से बढ़ जाता है, तो इंसान खुद को मिटा देना चाहता है।
पर मैं उसे टूटने नहीं देना चाहता था।
क्यों?
शायद इसलिए कि उसकी आँखों में मैंने खुद को देखा था। वही खालीपन, वही तन्हाई, वही हताशा, जो बरसों से मेरे साथ थी।
पता नहीं, वो अब भी मेरे घर में होगी या जा चुकी होगी।
मुझे नहीं पता कि उसके मन में क्या चल रहा था, ना ही मैं उसके बारे में कुछ जानता था। बस इतना जानता था कि जब मैंने उसे बचाया, तो वो पूरी तरह बेहोश थी। मैं उसे अपने घर ले आया, पर हम एक शब्द भी नहीं बोल पाए क्योंकि रात में वह अपने होश में नहीं थी और सुबह में मैं जल्दबाज़ी में निकल गया।
मेरी उंगलियाँ कार के स्टीयरिंग पर कस गईं। मन में एक अजीब-सी घबराहट पसरने लगी। अगर वो अब भी वहाँ हुई, तो क्या मैं उससे कुछ पूछ पाऊँगा?
और अगर नहीं हुई…
अगर वो जा चुकी होगी…
तो फिर?
एक अनजान-सी बेचैनी ने मेरे अंदर दस्तक दी।
मैंने गाड़ी की रफ्तार बढ़ा दी।
सड़कें पीछे छूट रही थीं, मगर दिल में जो हलचल थी, वो तेज़ होती जा रही थी। घर के करीब पहुँचते ही मेरी साँसें थोड़ी तेज़ हो गईं। न जाने क्यों, पर दिल किसी अनहोनी का एहसास करा रहा था।
जैसे ही मैंने कार रोकी और घर की तरफ देखा।
दरवाजा खोलते ही सामने का नज़ारा देख ……….
————-
क्या रूहानी अब भी वहीं थी, या वह कहीं जा चुकी थी—बिना कोई निशान छोड़े?
कमरे के कोने में एक टूटा हुआ काँच पड़ा था, और फर्श पर पानी फैला हुआ था।
वो खून के निशान किसके थे?

लिखकर रूह छूने की कोशिश…..
🥹🥹


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