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टैग: प्यार#दर्द#रोमेंस#इमोशनल💘💘

  • No love clause

    No love clause

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    Part 5 

    No love clause 

     

    अग्नि हँस पड़ा। लेकिन उसकी हँसी में खुशी नहीं थी। “ये कोई जवाब नहीं है।”

     

    विक्रम जी चुप रहे। अग्नि ने आगे झुककर कहा,

    “आप जानते हैं कि मैं शादी क्यों नहीं करना चाहता।”

     

    विक्रम जी की आँखों में एक पल के लिए पुराना दर्द उभरा। “जानता हूँ।”

     

    “तो फिर?” अग्नि की आवाज़ थोड़ी ऊँची हो गई।

    “मैंने अपने माता-पिता का रिश्ता अपनी आँखों के सामने टूटते देखा है। मैंने देखा है कि एक शादी किस तरह दो लोगों को एक-दूसरे का दुश्मन बना सकती है। मैंने अपनी माँ को हर रात रोते देखा है।”

     

    विक्रम जी की आँखें झुक गईं। अग्नि ने गहरी साँस ली।

    “और अब आप चाहते हैं कि मैं भी वही गलती करूँ? मैं किसी लड़की की जिंदगी बर्बाद नहीं करना चाहता।”

    कुछ पल तक विक्रम जी उसे देखते रहे।

     

    फिर उन्होंने बहुत धीमे स्वर में कहा, “तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि तुम अपने बाप की तरह खुदगर्ज निकलोगे।”

     

    अग्नि ने तुरंत जवाब दिया, “ क्योंकि मेरी रगो में उस आदमी का खून दौड़ रहा है दादा जी।”

     

    “नहीं! अग्नि!” विक्रम जी के शब्द सख्त थे, “ तुम्हारी रगो में जितना मेरे बेटे का खून है उतना ही तुम्हारी मां मेरी बहू का भी है। और हमारे दिए हुए संस्कार हैं। इसलिए मुझे पूरा यकीन है तुम एक बेहतर जीवन साथी बनोगे।”

     

    अग्नि बोला, “लेकिन दादा जी ये शादी मेरे लिए एक जिम्मेदारी होगी। और मैं वो जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं हूँ।”

     

    विक्रम जी की आँखों में हल्की-सी मुस्कान आई। “फिर भी शादी करोगे?”

     

    अग्नि कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “आपकी शर्त है। आपके पास मुझे मजबूर करने की वजह है। तो ठीक है… मैं शादी करूँगा।”

     

    विक्रम जी ने राहत की साँस ली। लेकिन अग्नि ने तुरंत अपनी बात पूरी की। “मगर मेरी शर्त पर।”

     

    विक्रम जी ने सिर उठाया। “लड़की मैं खुद चुनूँगा और आप उस लड़की के बारे में कोई सवाल नहीं करेंगे।”

     

    विक्रम जी ने कुछ क्षण उसे देखा। फिर बोले, “मंजूर है।”

     

    अग्नि को उनके इतनी आसानी से मान जाने पर थोड़ी हैरानी हुई। “बस?”

     

    विक्रम जी हल्की मुस्कान के साथ, “बस।”

     

    अग्नि, “आपको कोई आपत्ति नहीं होगी?”

     

    विक्रम जी “नहीं।”

     

    अग्नि हैरानी से, “चाहे लड़की कोई भी हो?”

     

    विक्रम जी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “बस वो लड़की तुम्हें इंसान बनाना जानती हो।”

     

    अग्नि की भौंहें सिकुड़ गईं। “मैं कोई बिगड़ा हुआ बच्चा नहीं हूँ।”

     

    विक्रम जी हँस पड़े। “ये बात अपनी माँ को जाकर बताना।”

     

    अग्नि का चेहरा तुरंत बदल गया। उसके चेहरे पर आई हल्की नरमी एक पल में गायब हो गई। “मुझे उनके बारे में बात नहीं करनी।”

     

    विक्रम जी समझ गए। उन्होंने विषय बदल दिया। “ठीक है।”

     

    फिर कुछ पल बाद बोले, “लेकिन एक बात याद रखना।”

    अग्नि ने उनकी तरफ देखा। “तुम्हारे पास बहुत कम समय है।”

     

    अग्नि “मैं जानता हूँ।”

     

    “नहीं…” विक्रम जी ने गंभीरता से कहा, “तुम जितना समझ रहे हो, उससे भी कम।”

     

    अग्नि कुछ पल उन्हें देखता रहा। “आप आखिर कहना क्या चाहते हैं?”

     

    विक्रम जी ने सीधे कोई जवाब नहीं दिया।

    बस इतना कहा, “समय आने पर सब समझ जाओगे।”

     

    अग्नि को उनका जवाब बिल्कुल पसंद नहीं आया।

    वह कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। “ठीक है।”

     

    उसने फाइल मेज पर रखी। “मैं शादी करूँगा।”

     

    फिर उसने विक्रम जी की आँखों में देखते हुए कहा,

    “लेकिन लड़की मैं खुद चुनूँगा।”

     

    विक्रम जी ने सिर हिला दिया। “जैसी तुम्हारी मर्जी।”

     

    अग्नि दरवाजे की तरफ बढ़ा। लेकिन कुछ कदम चलने के बाद रुक गया। उसने पीछे मुड़कर अपने दादा जी को देखा। “दादा जी…”

     

    विक्रम जी, “हूँ?”

     

    अग्नि, “अगर मैं शादी कर भी लूँ…” वह कुछ पल रुका।

    “तो इसका मतलब ये नहीं कि मैं इस घर का हिस्सा बन जाऊँगा।”

     

    विक्रम जी के चेहरे पर हल्की उदासी छा गई। “मुझे पता है।”

     

    अग्नि ने कुछ नहीं कहा। वह दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया। दरवाजा बंद होते ही विक्रम जी अपनी कुर्सी पर पीछे टिक गए।

    उनकी नजर सामने लगी उसी पुरानी तस्वीर पर चली गई।

     

    छोटा-सा अग्नि… उनकी उंगली पकड़े मुस्कुरा रहा था।

    विक्रम जी की आँखों में नमी उतर आई।

    उन्होंने तस्वीर की तरफ देखते हुए बहुत धीमे स्वर में कहा, “तू चाहे जितना दूर भाग ले अग्नि… लेकिन इस बार मैं तुझे अकेला नहीं छोड़ूँगा।”

     

    नीचे… अग्नि सीढ़ियाँ उतरकर हॉल में आया।

    अब वहाँ पहले जैसे भीड़ भाड़ नहीं थी।

    अग्नि ने एक नजर सिटिंग एरिया पर डाली फिर सीधे बाहर की तरफ कदम बढ़ा दिए।

     

    जैसे ही सविता जी की नजर उस पर पड़ी, उनके चेहरे पर उम्मीद जाग गई।

     

    अग्नि सीधे मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा।

    “अग्नि…”

     

    सविता जी की आवाज़ सुनकर उसके कदम रुक गए।

    उसने धीरे से पीछे मुड़कर देखा। सविता जी उसकी तरफ ही आ रही थी। 

     

    उनकी आँखों में एक अजीब-सी उम्मीद थी। “इतने समय बाद तुम यहाँ आए हो…” उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “कम से कम कुछ देर रुककर तो जा सकते हो।”

     

    अग्नि कुछ पल उन्हें देखता रहा। फिर बोला,

    “माँ… आप जानती हैं मुझे यहाँ आना बिल्कुल पसंद नहीं।”

     

    सविता जी की आँखों की चमक थोड़ी कम हो गई, उन्होंने बस सिर हिला दिया, “अगर आप मुझसे मिलना ही चाहती हैं तो मेरे विला आ सकती हैं।”

     

    अग्नि ने बेहद सामान्य स्वर में कहा, “वो घर भी आपका ही है।”

     

    सविता जी के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई। “कुछ ही देर में डिनर का टाइम होने वाला है।”

    उन्होंने उम्मीद भरी नजरों से उसे देखा। “कम से कम डिनर करके जाना।”

     

    अग्नि ने तुरंत कहा, “नहीं।”

     

    सिर्फ़ एक शब्द। फिर वह मुड़ गया। 

     

    “अग्नि…” इस बार उसकी माँ की आवाज़ और धीमी थी।

     

    लेकिन वह नहीं रुका। कुछ ही पलों में मुख्य दरवाजा बंद हो गया। सविता जी वहीं खड़ी रह गईं।

    उनकी आँखों से एक आँसू निकलकर गाल पर आ गया। उन्होंने तुरंत पल्लू से उसे पोंछ लिया।

     

    लेकिन तभी पीछे से सुमित्रा की आवाज़ आई। “कितनी बेकार किस्मत है ना दीदी आपकी।”

     

    सविता जी ने पीछे मुड़कर देखा।।सुमित्रा के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी। “आपको ना पति का प्यार मिला…” वह थोड़ा रुकी। “और ना ही बेटे का।”

     

    सविता जी ने कुछ नहीं कहा। सुमित्रा उनके करीब आई। “इतने साल हो गए, लेकिन अग्नि आज भी आपको माफ नहीं कर पाया।”

     

    सविता जी ने धीमे स्वर में कहा, “वो मुझे माफ करे या ना करे…” उन्होंने दरवाजे की तरफ देखा। “मैं उसकी माँ हूँ। और माँ अपने बच्चे से उम्मीद करना नहीं छोड़ती।”

     

    सुमित्रा के चेहरे पर एक पल के लिए चुप्पी छा गई।

    लेकिन सविता जी की आँखों में उस वक्त सिर्फ़ दर्द नहीं था। 

     

    वहाँ उम्मीद भी थी। बहुत पुरानी… बहुत गहरी… और शायद उतनी ही मजबूत। उधर… राजावत मेंशन से बाहर निकलते ही अग्नि अपनी कार में बैठ गया।

     

    ड्राइवर ने पूछा, “सर, विला?”

     

    अग्नि ने कुछ नहीं कहा। उसकी नजर सामने सड़क पर थी। लेकिन उसके दिमाग में सिर्फ़

    एक ही बात घूम रही थी… शादी।

    कहानी आगे जारी रहेगी।

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  • अधूरी इबादत भाग~52

    अधूरी इबादत भाग~52

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~52 गुलाब जैसा केक

    रूहानी धीरे-धीरे डाइनिंग टेबल की ओर बढ़ी, उसके बाल अभी तक भीगे थे, जैसे उसके भीतर की हलचल अब भी सिमटी हो आँखों के कोनों में। 

    अद्वैत टेबल के पास बैठा था, उसकी आँखों में नींद का कोई नामोनिशान नहीं था, बस एक अजीब सी बेचैनी जो किसी अनकहे इंतज़ार को ओढ़े हुए थी।

    “गुड मॉर्निंग…” उसने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा।

    “गुड मॉर्निंग,” रूहानी ने जवाब दिया, अपनी नज़र उसके चेहरे पर टिकाए रखी। उसने अपना पर्स कुर्सी पर रखा और पूछा, “मीना दिखाई नहीं दे रही?”

    अद्वैत ने अपनी कुहनी टेबल पर टिकाई और गर्दन हल्की सी झुकाकर कहा, “थोड़ी देर पहले ही गई है… अपना काम खत्म करके।”

    रूहानी की आवाज़ में अचानक एक संकोच की परत उभर आई, “उसे ये तो पता था न कि मैं नीचे वाले कमरे में अकेली थी… और तुम….”

    अद्वैत ने उसकी बात बीच में ही थाम ली, उसकी आँखों में एक सच्ची सी तसल्ली थी, “घबराओ मत… मैं मीना के आने से पहले ही जाग गया था। और उसे कह दिया है कि नीचे वाला कमरा और first floor पर मेरा कमरा और स्टडी रूम छोड़कर बाकी सब साफ कर ले। काम आसान रहेगा उसका।”

    उसकी आवाज़ में कोई दावा नहीं था, कोई बचाव नहीं… बस एक खामोश समझ थी, जैसे वो उसकी उलझन को बिना कहे समझ गया हो।

    फिर बिना किसी और शब्द के, वो उठा और किचन की ओर गया। कुछ पल बाद वो एक प्लेट में गरम-गरम चॉकलेट लावा केक लेकर आया… उसकी खुशबू हवा में जैसे किसी भूली हुई याद की तरह घुल गई।

    उसने केक रूहानी के सामने रख दिया, उसकी आँखों में कुछ चमक जैसी थी, वह dining chair पर बैठते हुए बोला, “टेस्ट तो करो… बताओ कैसा बना है?”

    रूहानी कुछ पल उसे देखती रही, उसके शब्दों से ज़्यादा उसकी चुप्पी ने उसे छुआ। जैसे हर परत उस लावा केक की तरह थी, बाहर से सलीकेदार, अंदर से पिघली हुई। 

    रूहानी की नज़रें उस गुलाब की पंखुड़ियों जैसे सजे हुए केक पर टिकी थीं। जैसे हर क्रीम की परत में कोई भूला हुआ एहसास दफ़न था। उसकी साँसें हल्की-हल्की तेज़ हो रही थीं, और आँखें नमी से भरने लगी थीं। उस शांत कमरे में अचानक बहुत कुछ बोलता हुआ सा लग रहा था।

    अद्वैत ने जब देखा कि रूहानी एकटक उस केक को देखे जा रही है, उसके होठ ज़रा भी नहीं हिले, बस पलकों की कोर हल्की सी चमक रही थी, वो समझ गया, ये स्वाद भर का मामला नहीं, ये यादों का कोई भारी झोंका है।

    वो उसके पास जाकर धीरे से उसकी आँखों के सामने उँगलियाँ चटकाया, “कहाँ खो गई हो?”

    रूहानी चौंक सी गई, जैसे किसी पुराने ख्वाब से अचानक बाहर आई हो। “कहीं नहीं… बस… ये केक गुलाब के फूल जैसा क्यों है?”

    अद्वैत कुछ याद करते हुए मुस्कुराया, “ये मेरी माँ का signature style है। जब भी कोई खुशी का पल होता था तो मां जरूर बनाती थी… खैर….. तुम taste तो करो।”

    उसने धीरे से केक काटा और एक छोटा सा टुकड़ा उसकी प्लेट में रख दिया। रूहानी ने उस टुकड़े को चम्मच से उठाया और जैसे ही मुँह में डाला… उसकी पलके अपने आप बंद हो गईं। 

    स्वाद जैसे उसके भीतर किसी भूले हुए आलिंगन की तरह समा गया हो। और फिर… एक गर्म आँसू पलकों से निकलकर गाल पर बह निकला।

    उसे याद आया… उसके पापा का घर, जहाँ बेटी को मीठा और चॉकलेट खाते वक्त भी टोकी जाती थीं। और यहाँ… एक अनजान घर में, बिना कोई रोक, बिना कोई सवाल, ये मीठा जैसे उसके पूरे अस्तित्व को चुपचाप गले लगा रहा था।

    अद्वैत ने तुरंत पानी का गिलास उसकी तरफ बढ़ाया, “क्या हुआ? अच्छा नहीं बना क्या? मीठा कम हो गया या… कुछ ज़्यादा ही कड़वा?”

    रूहानी ने थोड़ा पानी पीते हुए धीमे स्वर में कहा, “नहीं, बहुत अच्छा बना है… तुम्हारी माँ को भी यही पसंद था?”

    अद्वैत की आँखें हल्का सा धुंधला गईं, “मुझे उतना ठीक से याद नहीं… पर जब भी मैं कुछ अचीव करता था, माँ यही केक बनाती थीं… कहती थीं जीत का स्वाद ज़ुबान से पहले दिल में जाना चाहिए।”

    रूहानी हल्के से मुस्कुराई, लेकिन आँखों में एक टीस सी उतर आई, “लेकिन आज तो कोई खुशी का दिन नहीं… आज तो तुम्हारी माँ की बरसी…..”

    उसकी आवाज़ टूट गई। वाक्य अधूरा रह गया।

    और उसी पल, उसकी जेब में रखा मोबाइल काँपने लगा।

    रूहानी ने कॉल उठाया और अपनी वो मासूम, चुलबुली आवाज़ जिसमें हर बार एक नया रंग भरता था, गुनगुनाने लगी, “हैप्पी बर्थडे टू यू… हैप्पी बर्थडे टू यू… माय लवली ब्रदर यशवर्धन…” वो सुर में नहीं थी, फिर भी दिल से थी।

    फोन की दूसरी तरफ यश की आवाज़ आई, थोड़ी नखरे से भरी हुई, “मैं आपसे बहुत नाराज़ हूं दीदी, आपने इस बार मुझे सबसे पहले विश नहीं किया।”

    रूहानी का चेहरा एकदम से उतर गया, जैसे सच में गलती कर दी हो। उसने एक हाथ से कान पकड़कर बोला, “सॉरी यशु… अपनी दीदी को माफ कर दो इस बार, अब से कभी ऐसा नहीं होगा। सच में भूल गई थी… पर अब नहीं भूलूंगी, वादा।”

    वो मुस्कुरा रही थी और मुस्कराहट उसके गालों से झलक रही थी। पर उसे एहसास नहीं था कि उसके सामने बैठा अद्वैत बड़ी देर से उसे ऐसे देख रहा था…. उसकी आंखों में राहत का एक साया था कि रूहानी के चेहरे पर छाई मुस्कुराहट की वजह आखिरकार वो था।

    यश ने कॉल पर ही कहा, “मैंने आपका इंस्टा पोस्ट देखा था… आपके कमबैक के लिए… congratulations didi.”

    रूहानी ने थोड़ी भावुकता में कहा, “Thank you so much Yash.”

    फिर यश की आवाज़ हल्की शरारत से भरी हुई आई, “जीजू हैं आपके बगल में?”

    रूहानी ने एक पल को अद्वैत की ओर देखा, उसने पलके झपकीं और धीमे से कहा, “हां… यहीं हैं।”

    “उन्हें दीजिए ना… उन्हें तो मालूम भी नहीं होगा, आप ही को याद नहीं था तो…” यश ने छेड़ते हुए कहा।

    रूहानी हँसी और बोली, “ठीक है, देती हूं।”

    अद्वैत ने मोबाइल हाथ में लिया और आवाज़ में वही ठहराव रखा जो उसकी आदत बन चुका था, “Happy birthday champ. So, what’s the plan for today?”

    यश ने कहा, “thank you जीजू, अभी तो कोचिंग आया हूं। मम्मी-पापा ने कहा है पढ़ाई पर फोकस करो, 10वीं का बोर्ड है ना इस बार। लेकिन फिर भी छोटी सी पार्टी तो रखी है… और… मैं पूछना चाहता हूं दीदी से… लेकिन मम्मी-पापा के कारण पूछ नहीं पा रहा कि वो आएगी या नहीं।”

    अद्वैत ने मुस्कराकर कहा, “ठीक है, मैं बात करता हूं उससे।”

    कॉल कटते ही सन्नाटा सा छा गया। 

    रूहानी अब टेबल के किनारे रखे केक को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर धीरे-धीरे खा रही थी। उसके चेहरे पर नज़ाकत थी… लेकिन कहीं गहराई में एक हिचक भी छिपी थी।

    अद्वैत कुछ देर तक उसे देखता रहा, फिर उसी नरम आवाज़ में बोला, “है तो आज खुशी का दिन… क्या तुम जाना चाहती हो यश से मिलने?”

    रूहानी के चम्मच की चाल एक पल को रुक गई… उसने अद्वैत को देखा और सोच में पड़ गई।

    ———-

    क्या रूहानी के चेहरे पर फैली वो मुस्कान सिर्फ यश की मासूमियत के लिए थी… या किसी बीती टीस को छिपाने की आख़िरी कोशिश?

    और अद्वैत की आँखों में जो ठहराव था, क्या वो वाक़ई सुकून था… या किसी इंतज़ार की थकी हुई चुप्पी?

    क्या ये सिर्फ एक सुबह थी… या किसी अधूरी कहानी की शुरुआत फिर से हो रही थी?

  • Bound by fate

    Bound by fate

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग 2

    राधे राधे दोस्तों ❤️

     

    ✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️

     

     

    करीब एक घंटे बाद…

     

    गाड़ी एक बड़े और आलीशान विला के सामने आकर रुकी।

     

    गाड़ी की हेडलाइट पड़ते ही सामने खड़ा गार्ड तुरंत चौकन्ना हो गया और उसने विला का बड़ा-सा गेट खोल दिया।

     

    गाड़ी अंदर दाखिल हुई और कुछ ही सेकंड बाद पोर्च में जाकर रुक गई। बारिश अब भी तेज थी। ड्राइवर तुरंत बाहर निकला और उसने पिछली सीट का दरवाजा खोला।

     

    रूद्रांश गाड़ी से बाहर आया। उसकी नजर लड़की पर गई। वह अब भी बेहोश थी। चेहरा हल्का पीला पड़ चुका था। होंठ सूख गए थे और भीगे हुए कपड़े उसके शरीर से चिपके हुए थे।

     

    रूद्रांश ने बिना कुछ सोचे उसे अपनी बाहों में उठा लिया।

     

    तभी पास खड़े एक नौकर ने हैरानी से पूछा, “सर… ये कौन हैं?” क्योंकि आजतक कभी किसी ने रुद्रांश के साथ किसी लड़की को नहीं देखा था। 

     

    रूद्रांश ने उसकी तरफ घूरकर देखा। “फालतू सवाल मत पूछो। जल्दी जाकर दरवाजा खोलो।”

     

    नौकर तुरंत दरवाजा खोलकर एक तरफ हट गया। रूद्रांश लड़की को लेकर अंदर चला गया। विला अंदर से बेहद शानदार था।

     

    ऊंची छतों से लटकते खूबसूरत झूमर, सफेद संगमरमर की चमचमाती फर्श, दीवारों पर लगी महंगी पेंटिंग्स और सलीके से सजाया गया विशाल हॉल…

     

    हर चीज रूद्रांश की हैसियत की कहानी बयां कर रही थी। 

    लेकिन इस वक्त उसे इनमें से किसी चीज की परवाह नहीं थी।

     

    वह सीधे सीढ़ियों से ऊपर गया और एक कमरे का दरवाजा खोलकर लड़की को बेड पर लिटा दिया। पीछे आया नौकर दरवाजे पर ही रुक गया। “साहब… डॉक्टर को बुला दूं?”

     

    रूद्रांश ने लड़की की तरफ देखते हुए कहा, “हां। और जल्दी।”

     

    “जी, साहब।” नौकर तुरंत वहां से चला गया।

     

    कमरे में अब सिर्फ रूद्रांश और वो अनजान लड़की थे। रूद्रांश कुछ पल तक उसे देखता रहा।

     

    उसने अपने गीले बालों पर हाथ फेरा और फिर अपना जैकेट उतारकर पास रखी कुर्सी पर डाल दिया।

     

    उसकी नजर लड़की के चेहरे पर टिक गई। “तुम आखिर हो कौन?”

     

    उसने धीमे से कहा। लेकिन सामने लेटी उस लड़की के पास उसके सवाल का कोई जवाब नहीं था।

     

    या शायद… उस जवाब तक पहुंचने के लिए रूद्रांश को उसकी जिंदगी के कई बंद दरवाजे खोलने पड़ने वाले थे।

     

    और उसे अभी ये अंदाजा भी नहीं था कि जिस लड़की को वह आज रात सिर्फ इंसानियत के नाते अपने घर लेकर आया है… वही लड़की बहुत जल्द उसकी पूरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत…

     

    और सबसे दर्दनाक हिस्सा बनने वाली है। 

     

    फिर उसने कॉरिडोर में रेलिंग के पास खड़े होकर अपने विला में काम कर रही एक फीमेल हाउस हेल्प को आवाज लगाई। “जेनिफ़र!”

     

    आवाज पूरे हॉल में गूंजी। कुछ ही सेकंड में एक अधेड़ उम्र की महिला तेजी से वहां पहुंची।

     

    वो जेनिफ़र थी। पिछले कई सालों से वो रूद्रांश के विला में काम कर रही थी और उसे अच्छी तरह जानती थी।

    “जी, सर?”

     

    रूद्रांश ने कहा, ” जल्दी से मेरे रूम में आओ और उस लड़की के कापड़े चेंज कर दो। “

    जेनिफर तुरंत ऊपर आ गई।

    फिर वह कुछ पल के लिए रुका और क्लोसेट की तरफ बढ़ गया।

     

    उसने वहां से अपना एक ढीला-सा कुर्ता निकाला और जेनिफ़र की तरफ बढ़ा दिया। “ये पहना देना।”

     

    जेनिफ़र ने तुरंत कुर्ता ले लिया। उसकी नजर अब लड़की पर थी। उसके कपड़े पूरी तरह भीगे हुए थे और ठंड की वजह से उसका शरीर हल्का-हल्का कांप रहा था।

    जेनिफ़र ने ध्यान से देखा तो उसकी कलाई पर चोट के गहरे निशान नजर आए।

     

    गर्दन के पास भी खरोंचें थीं। चेहरे पर चोट के हल्के निशान अब पहले से ज्यादा साफ दिखाई दे रहे थे।

    जेनिफ़र के चेहरे पर चिंता उभर आई।

    उसे देखकर साफ लग रहा था कि इस लड़की ने सिर्फ बारिश में रात नहीं बिताई थी…

    बल्कि वो किसी बहुत बुरे दौर से गुजरकर यहां तक पहुंची थी।

     

    जेनिफ़र ने बिना कोई सवाल किए जल्दी से उसके कपड़े बदल दिए और बाहर चली गई।

     

    तब तक रूद्रांश भी अपने कपड़े बदल चुका था। कुछ देर बाद… रूद्रांश कमरे में वापस आया।

    वह बेड के सिरहाने जाकर बैठ गया और सामने लेटी लड़की को गौर से देखने लगा।

     

    अब वह पहले से ज्यादा साफ दिखाई दे रही थी। गोरा रंग… बड़ी-बड़ी आंखें, जिन पर घनी और लंबी पलकें थीं… गुलाबी होंठ… और निचले होंठ के ठीक नीचे एक छोटा-सा तिल।

     

    छोटी-सी नाक, जिसमें एक नन्ही-सी नोज पिन चमक रही थी। वो लड़की किसी मासूम-सी तस्वीर की तरह लग रही थी।

     

    रूद्रांश की नजर कुछ पल उसके चेहरे पर ठहर गई।

    उसे खुद समझ नहीं आया कि वह इस अनजान लड़की को इतनी गौर से क्यों देख रहा था। बाहर बारिश अब धीमी पड़ चुकी थी।

     

    खिड़की के शीशों पर गिरती बूंदों की आवाज कमरे में एक अजीब-सी खामोशी पैदा कर रही थी। कमरे में जल रही हल्की पीली रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी।

    चेहरा बेहद मासूम था…

     

    लेकिन उन बंद आंखों के पीछे जैसे कोई बहुत गहरा राज छिपा हुआ था। कुछ ही देर बाद डॉक्टर भी वहां पहुंच गए।

     

    रूद्रांश तुरंत उठकर एक तरफ हो गया। डॉक्टर ने अपना बैग खोला और लड़की की जांच शुरू कर दी।

    उन्होंने उसकी नब्ज चेक की। फिर उसकी कलाई, गर्दन और चेहरे पर मौजूद चोटों को ध्यान से देखा।

     

    रूद्रांश की गहरी नजरें लगातार डॉक्टर पर टिकी हुई थीं।

    जैसे वह डॉक्टर की हर बात से इस लड़की के बारे में कुछ समझ लेना चाहता हो।

     

    कुछ देर जांच करने के बाद डॉक्टर ने गहरी सांस ली।

    “मिस्टर शेखावत…”

     

    रूद्रांश की नजरें डॉक्टर पर टिक गईं। “क्या हुआ है इसे?”

     

    डॉक्टर ने गंभीर आवाज में कहा, “ऐसा लग रहा है कि इस लड़की के साथ काफी ज्यादती हुई है। इसके शरीर पर कई जगह चोटों के निशान हैं। कुछ चोटें पुरानी हैं और कुछ बिल्कुल ताजा।”

     

    रूद्रांश की आंखों में अचानक गुस्सा उतर आया।

    उसकी उंगलियां धीरे-धीरे मुट्ठी में बदल गईं।

    लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

     

    डॉक्टर ने आगे कहा, “मुझे लगता है कि ये लड़की किसी बहुत बड़े सदमे से गुजरी है। इसी वजह से इसकी हालत ऐसी है।”

     

    रूद्रांश की नजर एक बार फिर लड़की पर चली गई।

    उसका मासूम चेहरा देखकर उसके जबड़े कस गए।

    डॉक्टर कुछ पल रुके और फिर बोले, “और एक बात…”

    रूद्रांश ने उनकी तरफ देखा। “इसे शायद कई घंटों से कुछ भी खाने को नहीं मिला है। शरीर में काफी कमजोरी है। इसी वजह से ये बेहोश हुई होगी।”

     

    डॉक्टर ने अपने बैग से एक इंजेक्शन निकाला। “मैंने इसे इंजेक्शन दे दिया है। उम्मीद है कि सुबह तक इसे होश आ जाएगा।” फिर उन्होंने कुछ दवाइयां निकालकर रूद्रांश की तरफ बढ़ा दीं। “होश में आने के बाद इसे कुछ हल्का और पौष्टिक खाना दीजिएगा। और ये दवाइयां समय पर देनी होंगी।”

     

    रूद्रांश ने बिना कुछ कहे सारी दवाइयां ले लीं।

    डॉक्टर अपना सामान समेटकर कमरे से बाहर चले गए।

    दरवाजा बंद होते ही कमरे में फिर से खामोशी छा गई।

    रूद्रांश धीरे से बेड पर बैठ गया।

    लड़की की सांसें अब पहले से थोड़ी सामान्य थीं।

    उसका चेहरा अभी भी पीला था और माथे पर हल्की शिकन थी।

     

    जैसे नींद में भी कोई बुरा सपना उसका पीछा कर रहा हो।

    रूद्रांश कुछ देर उसे देखता रहा।

    फिर धीमी आवाज में बोला, “आखिर हो कौन तुम?”

     

    कोई जवाब नहीं आया। उसने उसकी तरफ देखते हुए दोबारा कहा, “और किसने तुम्हें इस हालत में पहुंचाया?”

    खामोशी…

     

    बाहर बारिश लगभग थम चुकी थी। रात और गहरी हो गई थी। रूद्रांश ने अपनी जेब से सिगरेट निकाली।

    उसने सिगरेट होंठों के बीच रखी और लाइटर निकालने ही वाला था कि एक पल के लिए उसकी नजर सामने सो रही लड़की पर गई।

     

    कुछ सेकंड तक वह उसे देखता रहा। फिर उसने सिगरेट वापस अपनी जेब में रख ली।

    शायद उसे खुद भी नहीं पता था कि उसने ऐसा क्यों किया।

     

    रूद्रांश उठकर सोफे पर जाकर

    • लेट गया।

    वह इस अनजान लड़की के बारे में सोचता रहा।

    लेकिन कब उसकी आंखें लग गईं…

    उसे खुद पता नहीं चला।

     

    कहानी आगे जारी रहेगी…🙏🏻

  • Bound by fate

    Bound by fate

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग 1

     

    राधे राधे दोस्तों ❤️

     

    ✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️

     

     

     

    दिल्ली, इंडिया

     

    रात के बारह बजे। सर्दियों की वो काली रात बारिश में पूरी तरह डूबी हुई थी। आसमान पर काले बादल छाए थे और तेज बारिश के साथ हल्का-हल्का कोहरा सड़क को अपने आगोश में लिए हुए था।

     

    मौसम ऐसा था कि कोई भी समझदार इंसान अपने घर से बाहर निकलने के बारे में सोचता तक नहीं।

     

    लेकिन… उस सुनसान सड़क के बीचों-बीच एक लड़की चली जा रही थी।

     

    सड़क ज्यादा चौड़ी नहीं थी। दोनों तरफ घना जंगल था, जिसके ऊंचे-ऊंचे पेड़ तेज हवा के साथ झूम रहे थे। बारिश की तेज आवाज़ और हवा की सनसनाहट के अलावा वहां दूर-दूर तक किसी इंसान के होने का कोई निशान नहीं था।

     

    लेकिन उस लड़की को शायद इन चीजों से कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था। वो लगातार चलती जा रही थी।

     

    ना उसे बारिश की परवाह थी… ना ठंड की… और ना ही इस सुनसान रास्ते की।

     

    ऐसा लग रहा था जैसे वो अपनी जिंदगी से ही हार चुकी हो। शायद वो रो भी रही थी। लेकिन बारिश की तेज बूंदें उसके आंसुओं को अपने साथ बहा ले जा रही थीं। करीब से देखने पर उसके चेहरे पर हल्के-हल्के चोट के निशान साफ दिखाई दे रहे थे।

     

    उसने चटक लाल रंग का सूट पहन रखा था। वो बिल्कुल किसी नई-नवेली दुल्हन जैसी लग रही थी। लेकिन उसके कपड़े बारिश में पूरी तरह भीग चुके थे।

     

    उसकी कलाइयों में लाल चूड़ियां थीं, जिनमें से कुछ टूट चुकी थीं। हाथों पर लगी मेहंदी बारिश में फीकी पड़ चुकी थी। मांग में लगा सिंदूर लगभग धुल चुका था, लेकिन उसकी हल्की-सी लालिमा अब भी बाकी थी।

     

    और गले में… एक मंगलसूत्र था, वो लड़की बेहद खूबसूरत थी। लेकिन उस खूबसूरत चेहरे पर इस वक्त सिर्फ दर्द था। बहुत गहरा दर्द, आखिर कौन थी वो?

     

    और इतनी रात को इस सुनसान जंगल वाली सड़क पर अकेली क्यों चल रही थी?

     

    तभी… दूर से आती एक गाड़ी की हेडलाइट ने उसकी आंखों पर तेज रोशनी डाली।

     

    लड़की ने पलटकर भी नहीं देखा। गाड़ी लगातार उसकी तरफ बढ़ती चली आ रही थी।

     

    पों… पों…! ड्राइवर ने जोर-जोर से हॉर्न बजाया।

     

    लेकिन लड़की अपनी जगह से टस से मस नहीं हुई। सड़क इतनी संकरी थी कि गाड़ी को दूसरी तरफ से निकालने की कोई गुंजाइश भी नहीं थी।

     

    ड्राइवर ने आखिरी वक्त पर पूरी ताकत से ब्रेक लगा दिए।

     

    चीईईईईईई…!

     

    टायरों की तेज आवाज के साथ गाड़ी लड़की से कुछ ही इंच की दूरी पर जाकर रुकी। गाड़ी के अंदर अचानक सन्नाटा छा गया।

     

    ड्राइवर ने घबराकर पीछे की सीट की तरफ देखा।

     

    वहां बैठा आदमी पहले से ही उसे घूर रहा था। उसकी आंखों में साफ गुस्सा था।

     

    ड्राइवर सहम गया। “साहब… मेरी कोई गलती नहीं है। सामने अचानक एक लड़की रोड के बीचों-बीच खड़ी हो गई थी। अगर मैं ब्रेक नहीं लगाता तो…”

     

    वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया। पीछे बैठा आदमी झुंझलाकर बोला, “साला… सबको मरने के लिए मेरी कार के सामने ही आना होता है।”

     

    उसने गुस्से में अपनी घड़ी की तरफ देखा और फिर सामने खड़ी लड़की को। “अगर कुछ हो जाता ना, तो कल सुबह हर न्यूज़ चैनल पर एक ही खबर चलती…”

    उसके होंठों पर एक कड़वी मुस्कान आई। “रूद्रांश शेखावत की गाड़ी से लड़की की मौत।”

     

    ड्राइवर ने कुछ नहीं कहा। वह सामने खड़ी लड़की को देखने लगा। हेडलाइट की तेज रोशनी में अब उसका चेहरा साफ नजर आ रहा था।

     

    बारिश लगातार हो रही थी। लेकिन उसकी आंखों में उमड़ रहा दर्द शायद इस बारिश से भी ज्यादा गहरा था।

     

    रूद्रांश ने आखिरकार गुस्से में गाड़ी का दरवाजा खोला और बाहर निकल आया। बारिश की ठंडी बूंदें कुछ ही सेकंड में उसके बालों और कपड़ों को भिगोने लगीं।

     

    उसने इसकी परवाह नहीं की। महंगे जूते कीचड़ में धंस गए, लेकिन उसकी नजरें सामने खड़ी लड़की पर टिकी थीं।

     

    वह उसके पास जाकर रुक गया। “मरना है तो किसी और जगह जाकर मरो।”

    उसकी आवाज में गुस्सा था। “मेरी गाड़ी के सामने नहीं।”

     

    लड़की ने धीरे-धीरे अपना चेहरा उठाया। उसकी आंखें बुरी तरह सूजी हुई थीं, होंठ कांप रहे थे। लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

     

    रूद्रांश ने गौर से उसे देखा। उसके चेहरे पर हल्की चोटों के निशान थे।

     

    भीगे बाल उसके चेहरे से चिपके हुए थे। पलकों पर बारिश की बूंदें ठहरी हुई थीं।

    और उसकी आंखें… जैसे बिल्कुल खाली थीं।

     

    मानो उन आंखों में रोने के लिए भी अब कुछ बाकी नहीं बचा था। रूद्रांश का गुस्सा कुछ कम हुआ।

     

    उसने दोबारा पूछा, “कौन हो तुम?”

    कोई जवाब नहीं। “इस वक्त यहां क्या कर रही हो?”

     

    लड़की ने धीरे से अपनी गर्दन दूसरी तरफ घुमा ली रूद्रांश ने गहरी सांस ली। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर इस लड़की के साथ ऐसा क्या हुआ है।

     

    उसने अपना हाथ उसके कंधे पर रखने की कोशिश की।

    “देखो… अगर तुम्हें कोई परेशानी है, तो”

     

    लड़की ने अचानक उसका हाथ झटक दिया।

    वह एक कदम पीछे हट गई। “मुझे छोड़ दो…”

     

    उसकी आवाज इतनी धीमी थी कि बारिश के शोर में लगभग खो गई। रूद्रांश ने उसकी तरफ देखा।

    लड़की ने कांपती आवाज में दोबारा कहा, “मुझे कहीं नहीं जाना…”

     

    उस एक वाक्य में इतना दर्द था कि कुछ पल के लिए रूद्रांश भी चुप रह गया। उसने लड़की को गौर से देखा।

    लाल दुल्हन का जोड़ा… टूटी हुई चूड़ियां… धुला हुआ सिंदूर… मंगलसूत्र… और चेहरे पर चोटों के निशान।

     

    ये कोई सामान्य मामला नहीं था। रूद्रांश ने आसपास नजर दौड़ाई। चारों तरफ घना जंगल था। इतनी रात को इस सुनसान सड़क पर ये लड़की अकेली थी।

    और शायद किसी बड़ी मुसीबत से भागकर यहां तक पहुंची थी। “तुम्हें जाना तो पड़ेगा।”

     

    इस बार रूद्रांश की आवाज पहले से थोड़ी नरम थी। “लेकिन उससे पहले मुझे ये बताओ कि हुआ क्या है?”

     

    लड़की ने उसकी तरफ देखा। उसकी आंखों में अचानक डर उभर आया। उसने कुछ कहने के लिए होंठ खोले…

     

    लेकिन आवाज नहीं निकली। अगले ही पल उसका शरीर लड़खड़ाया। “अरे…”

     

    रूद्रांश ने झटके से उसे संभाल लिया। लड़की बेहोश हो चुकी थी। “अब ये और बचा था!”

     

    रूद्रांश ने झुंझलाकर कहा, लेकिन उसके हाथों की पकड़ लड़की को संभालने में बेहद सावधान थी।

     

    उसने एक नजर उसके चेहरे पर डाली। इतनी खूबसूरत लड़की… और इस हालत में। उसके चेहरे पर चोटों के निशान देखकर रूद्रांश की भौंहें सिकुड़ गईं।

     

    उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर किसने इसके साथ ऐसा किया होगा। लेकिन यहां खड़े रहना ठीक नहीं था। उसने लड़की को अपनी बाहों में उठाया और गाड़ी की तरफ बढ़ गया। ड्राइवर तुरंत नीचे उतरा और पीछे का दरवाजा खोल दिया।

     

    रूद्रांश ने लड़की को पिछली सीट पर आराम से लिटाया और खुद उसके पास बैठ गया। “गाड़ी स्टार्ट करो।”

     

    “जी, साहब।” ड्राइवर ने तुरंत गाड़ी आगे बढ़ा दी।

    गाड़ी की रफ्तार बढ़ते ही बाहर की बारिश और जंगल पीछे छूटने लगे।

     

    लेकिन रूद्रांश के दिमाग में सवालों का तूफान शुरू हो चुका था। ये लड़की कौन थी? इसके साथ आखिर हुआ क्या था? और वो इस हालत में अकेली वहां क्यों घूम रही थी?

     

    उसकी नजर बार-बार लड़की पर जा रही थी। उसके भीगे बाल चेहरे पर चिपके हुए थे। कलाई पर टूटी हुई लाल चूड़ियों के कुछ टुकड़े अब भी मौजूद थे।

     

    रूद्रांश ने एक पल के लिए उसकी तरफ देखा और फिर नजरें सामने कर लीं। उसे खुद नहीं पता था कि वह इस अनजान लड़की की मदद क्यों कर रहा था।

     

    लेकिन एक बात तय थी… आज रात उसकी जिंदगी में कुछ

    ऐसा आने वाला था, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

     

    कहानी आगे जारी रहेगी। 

    प्लीज आप सब अपना साथ बनाएं रखें।

  • No love clause

    No love clause

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग 3

     

    राजावत ग्रुप…

     

    दोपहर के करीब डेढ़ बजे…

     

    तेज़ कदमों से चलती हुई वेदा और अपर्णा कंपनी के अंदर दाखिल हुईं। रिसेप्शन पर बैठे कर्मचारियों की नज़र जैसे ही वेदा पर पड़ी, कई लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    “आज पहली बार मिस वेदा लेट हुई हैं…”

     

    “सुना है बॉस सुबह से कई बार पूछ चुके हैं इनके बारे में…”

     

    “अब तो आज किसी की खैर नहीं…”

    धीमी-धीमी फुसफुसाहट पूरे फ्लोर पर फैल गई।

     

    वेदा ने किसी की तरफ ध्यान नहीं दिया। क्योंकि उसका मन अभी भी अस्पताल में, विहान के पास अटका हुआ था। इसलिए आज उसे किसी की फिक्र नहीं थी। 

     

    “तू पहले HR से बात कर ले।” अपर्णा ने धीमे से कहा।

     

    वेदा ने हामी में सिर हिलाया। फिर दोनों सीधे ह्यूमन रिसोर्स डिपार्टमेंट की तरफ बढ़ गईं।

     

     

    करीब बीस मिनट बाद…

     

    HR मैनेजर ने सामने रखी फाइल बंद करते हुए एक लंबी साँस ली।

     

    “मिस वेदा… सबसे पहले तो मुझे आपके भाई के बारे में सुनकर बहुत दुख हुआ।”

     

    वेदा चुपचाप बैठी रही। क्योंकि उसे फिलहाल किसी की हमदर्दी की नहीं एक बहुत बड़ी रकम की जरूरत थी। 

     

    HR मैनेजर श्रुति ने आगे कहा, “मैंने आपकी पूरी फाइल चेक की है।” फिर वेदा की तरफ देखते हुए बोली, “कंपनी की मेडिकल असिस्टेंस पॉलिसी के तहत आपको आर्थिक सहायता मिल सकती है…”

     

    वेदा की आँखों में उम्मीद की एक हल्की-सी किरण चमकी। “कितनी…?”

     

    HR मैनेजर ने बहुत सोचते हुए धीमी आवाज में कहा, “अधिकतम दस लाख रुपये।”

     

    बस… इतना सुनते ही वह उम्मीद भी बुझ गई। दस लाख… जबकि उसे चाहिए थे… एक करोड़ बीस लाख। लगभग दस गुना ज़्यादा। HR मैनेजर ने अफसोस जताते हुए कहा, “काश मैं इससे ज़्यादा कर पाता, लेकिन कंपनी के नियम…”

     

    वेदा ने मुस्कुराने की कोशिश की। “इट्स ओके, मैम!”

     

    उसने फाइल उठाई। “थैंक यू।” कहकर वो धीमे कदमों से चलते हुए बाहर आ गई।

     

     

    कॉरिडोर में आते ही अपर्णा ने उसका चेहरा देखा। उसे बिना पूछे ही जवाब मिल गया था। “नहीं हुआ…?”

     

    वेदा ने बस ना में सिर हिला दिया। “सिर्फ़ दस लाख।”

     

    दोनों कुछ पल खामोश खड़ी रहीं। तभी… “मिस वेदा!”

     

    पीछे से आवाज़ आई, दोनों ने मुड़कर देखा। निशांत तेज़ी से उनकी तरफ आ रहा था। “सर कब से आपको बुला रहे हैं।”

    वेदा का दिल ज़ोर से धड़क उठा। उसे याद आया… वह बिना किसी सूचना के ऑफिस नहीं आई थी।

    “मैं अभी आती हूँ।”

     

    उसने अपने आँसू पोंछे और अग्नि के केबिन की तरफ बढ़ गई।

     

     

    सीईओ केबिन…

     

    वेदा ने दरवाज़े पर दस्तक दी। “May I come in, sir?”

     

    अंदर से ठंडी आवाज़ आई,  “Come.”

     

    वेदा अंदर चली गई। अग्नि अपनी कुर्सी पर बैठा कुछ डॉक्यूमेंट्स देख रहा था।

     

    उसने बिना ऊपर देखे कहा,  “Sit.”

     

    वेदा चुपचाप बैठ गई। करीब दो मिनट तक पूरे कमरे में सिर्फ़ फाइलों के पन्ने पलटने की आवाज़ आती रही। 

     

    फिर… अग्नि ने फाइल बंद की। उसकी बर्फ जैसी नीली आँखें सीधे वेदा पर टिक गईं। “राजावत ग्रुप में काम करते हुए तुम्हें कितने साल हो गए?”

     

    वेदा धीमे से, “तीन साल, सर।”

     

    अग्नि, “और इन तीन सालों में… कभी भी तुमने इतनी बड़ी लापरवाही नहीं की… जितनी बड़ी आज की है। तुम बिना किसी को इनफॉर्म किए ऑफिस से आधे दिन गायब रही। क्या तुमने पहले ऐसा कभी कुछ किया?”

     

    वेदा ने ना में सिर हिलाया, “न… नहीं सर।”

     

    अग्नि, “फिर आज क्या अलग था?”

     

    वेदा कुछ पल चुप रही। वह अपने निजी जीवन को कभी ऑफिस में नहीं लाती थी। लेकिन आज…

     

    मजबूरी उसके आत्मसम्मान से बड़ी हो चुकी थी। “सर… मेरा छोटा भाई अस्पताल में भर्ती है। उसकी हालत अचानक…”

     

    आगे के शब्द उसके गले में अटक गए। अग्नि कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।

     

    फिर पहले जैसी ठंडी आवाज़ में बोला, “Personal life is personal.”

     

    “But office discipline is office discipline. Next time… inform before you disappear.”

     

    वेदा ने धीरे से सिर झुका दिया। “Sorry, sir.”

     

    अग्नि ने इंटरकॉम उठाया। ”निशांत।”

     

    दूसरी तरफ से निशांत की आवाज आई, “Yes, sir.”

     

    अग्नि ने उसे ऑर्डर दिया, “आज की सारी मीटिंग्स पोस्टपोन कर दो। और मिस वेदा को आज आधे दिन की छुट्टी दे दो।”

     

    वेदा ने हैरानी से उसकी तरफ देखा। अभी कुछ सेकंड पहले जो आदमी उसे डाँट रहा था… वही अब उसे छुट्टी दे रहा था।

     

    अग्नि ने फिर फाइल उठाते हुए कहा, “अपने भाई का ध्यान रखो। बाकी काम कल हो जाएगा।”

     

    वेदा कुछ कहना चाहती थी… लेकिन शब्द नहीं मिले।

    “Thank you, sir.”

     

    वह धीरे से बाहर निकल गई। दरवाज़ा बंद होते ही अग्नि ने अपनी कुर्सी की बैक पर सिर टिका दिया।

    उसे नहीं पता था… आख़िर क्यों पहली बार किसी कर्मचारी की निजी परेशानी उसके मन में रह गई थी।

     

     

    उसी शाम,  राजावत मेंशन…

     

    शहर के पोश एरिया में बना राजावत मेंशन, अलग ही रोशनी में नहाया हुआ था। मेंशन के सिटिंग हॉल में इस समय अग्नि के दादा जी, उसकी माँ, चाचा और चाची मौजूद थे।

    तभी मेंशन के पोर्च में अग्नि की कार आकर रूकी और वो तेजी से बाहर निकला और सीधा मेंशन के मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़ गया।

     

    उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं थे।

     

    सीटिंग एरिया में आते ही सबसे पहले उसकी नजर अपने दादा जी विक्रम राजावत पर गई।

    “ आपने मुझे बुलाया दादा जी?” सीना ताने खड़े अग्नि ने कहा।

     

    आवाज सुनकर सबकी नजरें अग्नि पर टिक गई, वहीं अग्नि की नजर सिर्फ और सिर्फ विक्रम जी पर टिकी थी।

     

    “लगता है तुम अपनी तमीज भूल चुके हो।”

    विक्रम राजावत की रौबदार आवाज़ पूरे सिटिंग हॉल में गूँज उठी।

     

    अग्नि के चेहरे पर कोई खास बदलाव नहीं आया। उसने बस एक पल के लिए कमरे में मौजूद बाकी लोगों पर नज़र डाली। उसकी माँ सविता राजावत सोफे पर चुपचाप बैठी थीं। उनके चेहरे पर बेटे को देखकर राहत भी थी और चिंता भी।

     

    दूसरी तरफ उसके चाचा अमित राजावत और चाची सुमित्रा राजावत बैठे थे। उनके साथ उनका बेटा राघव और बेटी रिया भी मौजूद थे।

     

    अग्नि की नजर राघव पर पड़ी। राघव ने तुरंत अपनी नजरें दूसरी तरफ कर लीं। अग्नि सब समझता था।

    उसे इस परिवार में मौजूद हर मुस्कान के पीछे छिपा मतलब पता था।

     

    विक्रम राजावत ने गुस्से में कहा, “हमारे संस्कारों में सबसे पहले बड़ों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।”

     

    अग्नि ने कहा, “ बड़े आशीर्वाद देने के लायक होते तो जरूर लेता।” उसकी ठंडी निगाहे विक्रम जी पर टिकी थी।

     

    विक्रम जी आगे बोले, “ स्टडी में चलो हमें तुमसे एक जरूरी बात करती है।”

     

    क्रमशः….

    कहानी आगे जारी रहेगी।

    देरी के लिए माफी 

    पढ़ते रहिए 

    No love clause 💕

  • बेवफाई

    बेवफाई

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    बेवफाई

    Part 1

     

    “कुछ रिश्ते टूटते नहीं हैं… बस उनमें से भरोसा मर जाता है।

    और जब भरोसा मर जाए, तो प्यार कितना भी जिंदा हो… रिश्ता सांस नहीं ले पाता।”

     

    शाम के करीब सात बज रहे थे।

     

    मुंबई की सड़कों पर बारिश अपना पूरा जोर दिखा रही थी। आसमान काले बादलों से घिरा था और सड़क पर दौड़ती गाड़ियों की रोशनी पानी की बूंदों में घुलकर किसी धुंधली तस्वीर जैसी लग रही थी।

     

    रिया माथुर खिड़की के पास खड़ी लगातार घड़ी देख रही थी। उसने हल्के आसमानी रंग की बहुत सी सुंदर साड़ी पहनी हुई थी, चेहरे पर हल्का सा मेकअप, मांग में सिंदूर, गले में मंगलसूत्र। 

     

    आज उसके चेहरे पर महीनों बाद थोड़ी सी खुशी दिखाई दे रही थी।

     

    उसने कमरे को खुद सजाया था। टेबल पर मोमबत्तियां थीं। बीच में आरव का पसंदीदा चॉकलेट केक रखा था, जो उसने खुद अपने हाथों से बनाया था और उसके पास रखा था… एक छोटा-सा गिफ्ट बॉक्स।

     

    रिया ने अपने हाथ में पकड़े फोन की स्क्रीन देखी।

     

    “आरव ❤️” उसने फिर मैसेज किया।

     

    “कितनी देर और? आज जल्दी आना… तुम्हारे लिए एक सरप्राइज है।”

     

    मैसेज भेजने के बाद उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। आज उनकी शादी की तीसरी सालगिरह थी।

     

    तीन साल पहले इसी दिन आरव ने उसका हाथ पकड़कर सात फेरे लिए थे और कहा था, “रिया, जिंदगी चाहे जितनी मुश्किल हो जाए, मैं तुम्हारा हाथ कभी नहीं छोड़ूंगा।”

     

    रिया ने उस दिन उस एक वादे पर अपनी पूरी जिंदगी रख दी थी। और आज…

    वह उसी वादे का जश्न मनाने के लिए उसका इंतजार कर रही थी।

     

    रात के करीब आठ बजे दरवाजे की घंटी बजी।

     

    रिया की आंखें चमक उठीं। “आरव!” उसने धीरे से नाम लिया, और आंखों में चमक लिए, वह दौड़कर दरवाजे तक पहुंची।

     

    लेकिन दरवाजे के बाहर आरव नहीं था। कूरियर वाला खड़ा था। उसे देखकर रिया के चेहरे की चमक पलभर में गायब हो गई। 

     

    “मैडम, आपके नाम का पार्सल।” कुरियर वाले ने एक पैकेट रिया की तरफ बढ़ाते हुए कहा।

    पहले तो रिया को थोड़ी हैरानी हुई, लेकिन फिर उसने पैकेट ले लिया। 

     

    “थैंक यू।” कहकर उसने एक पर्चे में साइन किया और फिर दरवाजा बंद करके अंदर आ गई। 

    वो पैकेट अभी भी उसके हाथ में था।

     

    पहले उसने सोचा आरव को फोन करने के बाद वो पैकेट खोलेगी, लेकिन फिर जाने क्या सोचकर उसने फोन टेबल पर रखना और पैकेट खोलने लगी। 

     

    अंदर एक फाइल थी। रिया ने हैरानी से फाइल खोली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था, “तलाक का समझौता।”

     

    जैसे ही उसने वो शब्द पढ़े, उसकी सांस जैसे वहीं रुक गई। “नहीं…” उसके हाथ कांपने लगे। “ये… ये क्या है?”

     

    फाइल के अंदर आरव के हस्ताक्षर किए हुए कागजात रखे थे। तलाक के कागजात।

     

    रिया ने तुरंत आरव को फोन किया।

     

    एक बार… दो बार… पांच बार… लेकिन सामने से कोई जवाब नहीं।

     

    फिर फोन बंद हो गया। रिया फर्श पर बैठ गई, उसकी दुनिया मानो पलभर में पूरी तरह से उजड़ गई। आंखों के सामने तीन साल की पूरी जिंदगी घूम गई।

     

    पहली मुलाकात। पहली लड़ाई। पहली बारिश।

     

    पहली सालगिरह। आरव का उसे देखकर मुस्कुराना।

     

    और वह रात… जब आरव ने उसके माथे को चूमकर कहा था, “तुम मेरी जिंदगी की सबसे खूबसूरत गलती नहीं, सबसे सही पसंद हो।”

     

    रिया की आंखों से आंसू बह निकले। तभी उसके फोन पर एक नोटिफिकेशन आया।

     

    एक फोटो। रिया की उंगलियां ठिठक गईं। फोटो में आरव था। और उसके साथ एक लड़की। दोनों एक-दूसरे के बेहद करीब खड़े थे। लड़की के चेहरे पर मुस्कान थी। और आरव… उसे उसी तरह देख रहा था, जैसे कभी वह रिया को देखा करता था।

     

    फोटो के नीचे लिखा था, 

    “Finally… together. ❤️”

     

    रिया की आंखें फैल गईं। उसने फोटो को बार-बार देखा। फिर लड़की का चेहरा पहचानते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    मीरा। आरव की ऑफिस पार्टनर।

     

    वही मीरा जिसे लेकर रिया ने कई बार मजाक में कहा था, “तुम दोनों साथ में बहुत अच्छे लगते हो।”

     

    और आरव हर बार हंसकर कहता था, “रिया तुम पागल हो क्या? मेरे लिए सिर्फ तुम हो, मुझे किसी और की जरूरत नहीं है।”

     

    रिया ने उस वक्त उस पर भरोसा किया था। जब कभी आरव उसके साथ बिजनेस ट्रिप पर जाता, लेकिन रिया ने कभी उसपर रत्ती भर शक नहीं किया। 

    लेकिन, आज वही भरोसा उसके सामने टूटकर बिखर चुका था।

     

     

    अगली सुबह रिया सीधे आरव के ऑफिस पहुंची।

     

    रिसेप्शन पर पहुंचते ही उसने पूछा, “आरव कहां है?”

     

    रिसेप्शनिस्ट ने उसे देखकर नजरें झुका लीं। “मैम… सर मीटिंग में हैं।”

     

    “मीटिंग?” रिया हंस पड़ी। वह हंसी जिसमें दर्द था। “उन्हें बुलाइए, कहिए कि मैं मिलना चाहती हूँ।”

     

     

    कुछ मिनट बाद आरव बाहर आया। काली शर्ट, चेहरे पर वही गंभीरता और आंखों में ऐसी ठंडक जैसे रिया उसके लिए कोई अजनबी हो।

     

    रिया उसे देखकर कुछ पल तक बस खड़ी रही। फिर बोली, “तुमने मुझे तलाक के पेपर भेजे?”

     

    आरव चुप रहा। 

     

    “मुझसे एक बार पूछना भी जरूरी नहीं समझा?” रिया ने उसकी आंखों में देखते हुए पूछा। 

     

    आरव ने कठोर शब्दों में कहा, “अब पूछने को बचा ही क्या है?”

     

    रिया का दिल टूट गया। “मतलब?”

     

    आरव ने नजरें फेर लीं। “मैं इस रिश्ते में नहीं रहना चाहता।”

     

    रिया टूटी आवाज में, “क्यों?”

     

    आरव, “बस नहीं रहना चाहता।”

     

    “झूठ!” रिया चीख पड़ी। “तुम मुझसे प्यार करते थे!”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा। “था।”

     

    बस एक शब्द। था। रिया को लगा जैसे किसी ने उसके सीने के बीचोंबीच वार कर दिया हो।

     

    “तो मीरा की वजह से?” आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    रिया की आंखों में आंसू भर आए। “तीन साल का रिश्ता… और तुमने इसे इतनी आसानी से खत्म कर दिया?”

     

    “आसानी से?” आरव की आवाज पहली बार थोड़ी भारी हुई। “तुम्हें लगता है मेरे लिए आसान था?”

     

    “तो फिर मुझे छोड़ क्यों रहे हो?” आरव कुछ कहने ही वाला था कि पीछे से मीरा की आवाज आई, “आरव…”

     

    रिया ने मुड़कर देखा। मीरा वहां खड़ी थी। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। वह सीधे आरव के पास आकर खड़ी हो गई। रिया ने दोनों को देखा।

     

    फिर अपनी आंखों से आंसू पोंछते हुए बोली, “शायद मेरी जगह अब यहां नहीं है।”

     

    वह मुड़ी। लेकिन जाते-जाते उसने आरव की तरफ देखा। “एक बात याद रखना…”

     

    आरव की

    आंखें उससे मिलीं। “जिस इंसान ने तुम्हें सबसे ज्यादा प्यार किया था, उसे तुमने आज खुद से दूर कर दिया है।”

     

    और वह चली गई।

     

    To be continued..

    क्या सच में बिखर कर रह जाएगा आरव और रिया का रिश्ता। या कहानी आगे कुछ नया मोड लेगी जानने के लिए अगला भाग जरूर पढ़े। 

    और कहानी को आपका एक कीमती लाइक जरूर दें

     

  • अधूरी इबादत भाग~21

    अधूरी इबादत भाग~21

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~21 आख़िर बोल पड़ी रूहानी 

     

    जानकी के थप्पड़ मारते ही रूहानी की देह जैसे संतुलन खो बैठी। गाल की जलन, कानों की गूंज और माँ के हाथों की बेरुखी….. उसे सब कुछ एक साथ महसूस हो रहा था। 

    रूहानी का चेहरा झटक कर एक तरफ मुड़ गया और उसकी आँखों में कुछ बुझ-सा गया। उसका शरीर जैसे लड़खड़ा गया, अंदर से जान निकलती महसूस हुई और वह बगल में खड़े अद्वैत की तरफ झुक गई, जैसे आत्मा ही खिंचकर उसके पास चली गई हो।

    वो उस पर केवल गिरी नहीं थी बल्कि वो उसमें समा गई। उसका माथा अद्वैत की कंधे से आकर लगा और हाथ खुद-ब-खुद उसकी बाहों को थामते चले गए, जैसे अगर अब उसने उसे नहीं थामा तो वह चूर-चूर होकर ज़मीन पर बिखर जाएगी।

    अद्वैत, जो अब तक भीड़ और तमाशे के बीच सबको समझने में लगा हुआ था, उस एक पल में बदल गया…. उसकी नज़रें जल उठीं, जबड़े भिंच गए, और सीना तन गया जैसे कोई आँधी थामे खड़ा हो। उसने रूहानी को एक झटके में अपने बाहों के घेरे में ले लिया… कस कर, हिफाज़त से, जैसे सारी दुनिया को रोक रहा हो उसके गिरने से।

    रूहानी का चेहरा अब भी जानकी की हथेली की गर्मी से जल रहा था। गाल पर उभरा लाल निशान साफ दिख रहा था, जो अंदर के आहत आत्मसम्मान और दिल के दर्द से मिलकर उसके चेहरे को और भी पीला और कमज़ोर बना रहा था। 

    उसकी आँखें डबडबाई हुई थीं, पर उसने रोना नहीं चुना। नहीं। वो जानती थी कि अगर आज वह टूटी, अगर आज आँसू बहाए, तो ये समाज और ये परिवार उसके आंसुओं की नमी से उसकी आत्मा को हमेशा के लिए गीला कर देंगे, उसे कमज़ोर और हारा हुआ मान लेंगे।

    अद्वैत की आंखें अब सीधी रूहानी की भीगी हुई लाल आखों से टकराईं। उन आँखों में गहरा आक्रोश था और अद्वैत की भी आँखों में एक स्त्री के अपमान को देखकर उपजा गुस्सा था, और एक दर्दनाक अविश्वास भी। 

    जैसे वो बिना कुछ कहे उससे पूछ रहा हो…. “क्या वाकई इस घर ने, इस परिवार ने तुम्हें कभी अपनाया था?” उसके चेहरे पर गुस्से और अविश्वास का ऐसा मिश्रण था जिसे शब्दों में बांध पाना मुश्किल था। रूहानी की आंखें अब भी भीगी थीं, पर उनमें भी एक अजीब सी स्पष्टता थी, एक छुपा हुआ दृढ़ संकल्प था…. वो टूट नहीं रही थी, वो बस सहारा ले रही थी।

    कुछ क्षण तक दोनों बस एक-दूसरे की आँखों में देखते रहे, जैसे तमाचा दोनों को पड़ा हो… एक को शरीर पर, गालों पर और दूसरे को आत्मा पर, दिल पर। उस एक पल के ठहराव में उन्होंने एक-दूसरे की पीड़ा को महसूस किया, एक-दूसरे की हिम्मत को परखा।

    रूहानी के अंदर बरसों का घुटा हुआ दर्द, समाज की बंदिशों से मिली घुटन, परिवार की उम्मीदों का बोझ…. सब कुछ अब शब्दों में फूटने को तैयार था। उसकी साँसे तेज़ हो चुकी थीं, और आवाज़ कांपते हुए भी एक सख्त लकीर लिए हुए आई…. जैसे बरसों का घुटा हुआ दर्द आखिर अब शब्दों में फूट पड़ा हो।

    पहले तो रूहानी थोड़ी देर चुप रही… फिर धीरे से बोली, “जिस अनजान ने मेरी जान बचाई… जब आप सब ने मुझे मरने के लिए छोड़ दिया था… उसी के घर में, बिना कुछ जाने, आपने मुझ पर इल्ज़ाम लगा दिए? मेरी बात सुने बिना ही मुझे गुनहगार बना दिया?’

    फिर वो अचानक वो अचानक अद्वैत के कंधे से थोड़ा अलग होकर पलटी और लगभग चीखते हुए, सीधे अपने माँ-बाप की तरफ देखकर बोली, “आप दोनों ने ही कहा था न… माँ, पापा, कि मैं इस अनजान आदमी के साथ, उसके घर… उसके कमरे, उसके बिस्तर पर… जाने कितनी रातें गुज़ार चुकी हूँ… समाज में बदनामी कर दी…?” 

    उसके शब्द आरोपों का जवाब नहीं, बल्कि उन्हीं आरोपों को पलटकर एक सवाल थे, जो सीधे उनके अंतरात्मा पर चोट कर रहे थे।

    “तो अब सुन लीजिए… हाँ! ये अनजान अब कोई और नहीं, मेरा पति है! हाँ, मैंने शादी कर ली है! क़ानूनी रूप से, सामाजिक रूप से और हाँ… मेरी मर्जी से! और आप फिर भी मुझे ही कसूरवार ठहरा रहे हैं? उस बदनामी के लिए जिसे आप पहले ही मेरे मत्थे मढ़ चुके थे?”

    उसके शब्द जैसे आंगन की हर ईंट पर हथौड़े की तरह गूंजे। सबकुछ थम गया। जानकी और भानु प्रताप की आँखें हैरत, शर्म और अपमान के मिलेजुले भावों से भर उठीं।

    उन्हें उम्मीद नहीं थी कि रूहानी इस तरह पलटकर जवाब देगी। मेहमानों के चेहरों पर एक नई सनसनी फैल गई थी, बातें बंद हो गईं थीं, केवल हवा में तैरती रूहानी की आवाज़ की गूंज बची थी।

    लेकिन भानु प्रताप का घमंड और क्रोध अब नियंत्रण से बाहर हो चुका था। उनकी बेटी ने, जिसे वो अपनी संपत्ति मानते थे, उनके ही सामने, भरी महफ़िल में उन्हें चुनौती दी थी। वो गुस्से में थरथराते हुए आगे बढ़े, उनके चेहरे पर खून उतर आया था।

    उनकी आँखों में अब बेटी के फैसले के लिए सिर्फ़ गुस्सा नहीं था, उसमें अपमान का, अस्वीकृति का और अपने अधिकार के छिन जाने का ज़हर भर गया था।

    “मैं अभी के अभी तेरी जान ले लूंगा!” वो गूंजती, कांपती हुई आवाज़ में चीखे और रूहानी की तरफ झपटे, उनका हाथ उठ चुका था।

    लेकिन इससे पहले कि उनका हाथ रूहानी तक पहुँचता, अद्वैत एक पल में बिजली की तेज़ी से उसके सामने आ गया। उसने रूहानी को अपने पीछे किया, उसे अपनी बाँहों के सुरक्षा घेरे में लिया। 

    वह गरजते हुए, भानु प्रताप की आँखों में आँखें डालकर बोला, “बहुत कर लिया आपने! बहुत सुन लिया आपकी बेटी ने! अब और नहीं। अगर रूहानी को एक खरोंच भी आई, तो मैं ये भूल जाऊँगा कि आप उसके पिता हैं। मैं सिर्फ़ ये याद रखूंगा कि आपने एक महिला का अपमान किया, उस पर हाथ उठाया और वो भी तब जब उसने सिर्फ़ अपने जीवन का फैसला खुद लिया।”

    रूहानी सन्न थी। उसका दिल धड़क नहीं रहा था, जैसे कुछ पल को सब थम गया हो। उसने अद्वैत की तरफ देखा…. वो शख्स जिसे उसने अब तक बस एक ‘समझौता’ माना था… अब सामने खड़ा था, जैसे दीवार बनकर। उसकी आंखों में ग़ुस्सा था, पर वो ग़ुस्सा रूहानी के लिए नहीं था…. रूहानी के लिए वो सिर्फ़ ढाल बन गया था।

    उसके भीतर कुछ टूटा भी, और कुछ जुड़ भी गया था।

    वो समझ नहीं पा रही थी कि ये वही अद्वैत है जो अब तक चुपचाप अपनी सीमाओं में रहता था? क्या ये वही रिश्ता है, जो बस कुछ कागज़ी शर्तों पर टिका था?

    रूहानी के मन में सवाल उठ रहे थे…. “क्या ये सब सच है? क्या कोई यूं भी मेरी तरफ खड़ा हो सकता है? बिना किसी मजबूरी के?”

    इन सब के बीच आँगन की हवा जैसे एकाएक भारी हो गई थी, इतनी भारी कि साँस लेना मुश्किल लग रहा था। सबकुछ ठहर गया था। भानु प्रताप का उठा हुआ हाथ हवा में जम गया।

    मेहमानों के चेहरे अब सहम और चुप्पी में ढल चुके थे। किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि एक शब्द भी कह सके। अद्वैत की आवाज़ में, उसकी आँखों में जो दृढ़ता थी, वो किसी ने पहले नहीं देखी थी।

    भानु प्रताप कुछ पल तक जड़ हो गए। उनका गुस्सा, उनका अधिकार, अद्वैत की आँखों के सामने बौना लग रहा था। वह एक दामाद नहीं, आज एक रक्षक की तरह खड़ा था, जिसने न सिर्फ़ अपनी पत्नी की शारीरिक इज़्ज़त को बल्कि उसकी आत्मा को भी थाम लिया था, उसे टूटने से बचा लिया था।

    “आप हमें अपनाएँ या नहीं,” अद्वैत ने अब अपने स्वर को थोड़ा शांत किया, लेकिन उसी तेज़ और दृढ़ लहजे में कहा, “ये आपका फ़ैसला है। लेकिन किसी का आत्मसम्मान इस तरह रौंदा नहीं जा सकता। रूहानी आपकी बेटी है, हाँ। लेकिन अब वो मेरी पत्नी भी है और जब तक मैं ज़िंदा हूँ, कोई उसे दुख नहीं पहुँचा सकता…. चाहे वो इस दुनिया में कोई भी हो। उसका सम्मान मेरा सम्मान है और उसकी सुरक्षा मेरी ज़िम्मेदारी।”

    उसकी बातों में केवल शब्द नहीं थे, उनमें एक अटूट वादा था, एक ऐसी सच्चाई थी जो पूरे माहौल में घुलती चली गई, पुरानी रूढ़ियों और अपेक्षाओं की दीवारों से टकराती हुई।

    अद्वैत ने पहली बार रूहानी का हाथ थामा…. वो भी सबके सामने, बिना किसी हिचकिचाहट के, जैसे कोई फैसले की मुहर लगा रहा हो। उसकी हथेली में रूहानी की उंगलियाँ थरथरा रही थीं, पर इस बार डर नहीं था, बल्कि एक मौन स्वीकार था… और एक बिन बोले गुहार कि “अब मुझे और टूटा हुआ मत देखना।”

    अद्वैत का चेहरा शांत था, लेकिन उसकी आंखों में एक सुलगती हुई आग थी…. जैसे उसने तय कर लिया हो कि अब और नहीं, अब कोई और रूहानी को रुलाने का हक़ नहीं रखता। उसने सबके सामने, उसी आँगन में जहाँ अभी कुछ मिनट पहले रूहानी का आत्मसम्मान रौंदा गया था, उस सन्नाटे को चीरते हुए ठहरी हुई आवाज़ में कहा….

    “जब आप अपनी बेटी को सच में, पूरे दिल से अपना लेंगे… तब आइएगा उसे देखने के लिए,” अद्वैत ने कहा, जैसे किसी अदालत में अंतिम शब्द सुनाए जा रहे हों। “अब नहीं। आज से ये मेरी पत्नी है और जब तक आप इसे दोषी मानते रहेंगे, तब तक आप हम दोनों से दूर रहेंगे।”

    उसकी आवाज़ में कोई ऊँचा स्वर नहीं था, लेकिन हर लफ्ज़ जैसे पत्थर पर चोट करता जा रहा था। वो झुका नहीं, समझौता नहीं किया, सिर्फ़ एक शर्त रख दी…. सम्मान की।

    1. फिर बिना एक पल गँवाए, उसने रूहानी का हाथ और कस कर थामा और दोनों उस दहलीज़ की तरफ बढ़ चले जहाँ से कुछ देर पहले रूहानी को रोक दिया गया था। पर इस बार कोई रोकने वाला नहीं था, सिर्फ़ पीछे छूटा हुआ सन्नाटा और बहुत सारी निगाहें थीं…. जिनमें कुछ हैरानी थी, कुछ ग्लानि और कुछ वो चुप्पियाँ जो अपनी गलती पहचानने के बावजूद कुछ कह नहीं पातीं।

    रूहानी ने पीछे मुड़कर एक बार भी नहीं देखा। उसका चेहरा भावशून्य था, लेकिन उसकी चाल में वो वजन था जो केवल उन लड़कियों को आता है जो आत्मगौरव से जीना सीख चुकी हैं। 

    और ये जानते हुए भी कि उनका रिश्ता बस एक कागज़ी समझौता है….. एक ‘कॉन्ट्रैक्ट मैरिज’ जो समाज की आंखों में सिर्फ़ एक दिखावा है…. अद्वैत ने रूहानी का साथ वैसे दिया जैसे किसी सच्चे जीवनसाथी को देना चाहिए।

    ———–

    क्या रूहानी के माता-पिता इस संघर्ष को खत्म कर पाएंगे, या फिर उनका अहंकार और अस्वीकृति उनके रिश्ते की अंतिम परीक्षा साबित होगा? 

    क्या रूहानी का दर्द सच में खत्म होगा, या यह सिर्फ एक और शुरुआत है?

    अद्वैत और रूहानी के बीच खड़े इस तूफान में क्या कोई था जो उनका साथ देगा, या ये आंधी दोनों को एक दूसरे से और दूर कर देगी? 

  • अधूरी इबादत भाग~19

    अधूरी इबादत भाग~19

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग ~19 दुल्हन… पर अधूरी

     

    अद्वैत की कार जैसे ही चौहान निवास के बाहर आकर रुकी, उस घर की पुरानी दीवारों पर एक नया तनाव उतर आया था। बाहर की धूप हल्की थी, लेकिन कार के भीतर एक अजीब

     सा बोझ था, जो किसी की आंखों से नहीं, लेकिन हर खामोशी से टपक रहा था।

    बैकसीट पर बैठा यश उतावलेपन से दरवाज़ा खोलते ही झट से बाहर निकला और दौड़ता हुआ फ्रंट सीट पर आ गया। रूहानी की खिड़की के पास आकर वह बच्चों जैसी उत्सुकता से बोला, “जल्दी से आओ न दीदी। मां-पापा तुम्हें शादीशुदा देखकर खुश हो जाएंगे।” उसके चेहरे पर उम्मीद थी, नादानी थी, और वो मासूम यक़ीन था जो हालात की गहराई नहीं समझता।

    रूहानी ने यश की ओर नहीं देखा। उसकी नजरें खुद में उलझी थीं। कार की खिड़की पर झुकी, शीशे में खुद को देखा तो बस एक वरमाला थी उसके गले में। ना मांग में सिंदूर, ना हाथों में चूड़ियाँ, ना कोई वो पहचान जो समाज ‘सहजीवन’ से जोड़ता है। और सच कहें तो चेहरा… चेहरा किसी दुल्हन का नहीं, किसी समझौते से झांकते हुए इंसान का था।

    उसने धीरे से अपना हाथ गले पर रखा, वहां, जहां आमतौर पर एक मंगलसूत्र होना चाहिए था… वो खालीपन उसे बाहर से ज़्यादा भीतर चुभ रहा था।

    अद्वैत, जो ड्राइवर सीट पर बैठा था, एकटक उसे देख रहा था। उसका हाथ रूहानी की हर हरकत को पढ़ रहा था जैसे वो कोई किताब हो जिसे वो कई बार दोहरा चुका हो। उसने समझ लिया था…. रूहानी किस दुविधा में है। वह यह जानता था कि ये सिर्फ एक दिखावटी शादी है, लेकिन दिखावे का यह क्षण अब वास्तविक दुनिया में प्रवेश कर चुका था, जहाँ भावनाएं नकाब नहीं पहनतीं।

    इसलिए अद्वैत ने यश की ओर मुड़कर नरम लेकिन तय स्वर में कहा, “तुम्हारी दीदी तुम्हारे जीजाजी के साथ पहली बार घर आ रही है तो क्या स्वागत नहीं करोगे?”

    यश ने जैसे किसी भूली हुई रस्म को याद करते हुए अपनी दोनों हथेलियों से सिर पीटा, “अरे, जीजाजी, मैं तो भूल ही गया था। जरूर स्वागत होगा। मैं करूंगा ना। आपने बिल्कुल सही कहा। मैं अभी जाता हूं, आप भी दीदी को लेकर जल्दी से आना।” और वो फुर्ती से घर की ओर भाग गया।

    अद्वैत ने उसकी मासूम ऊर्जा पर मुस्कराते हुए कहा, “हां, तुम जाओ, हम दोनों अभी आते हैं।”

    अब कार के भीतर फिर वही सन्नाटा था, पर अब उसमें सवाल थे।

    ——–

    यश के अकेले घर में प्रवेश करते ही उसकी मां जानकी चौहान के चेहरे पर चिंता, शर्म और ग़ुस्से की मिली-जुली रेखाएँ खिंच गई थीं। उसकी आँखों में हज़ार सवाल तैर रहे थे और लहजा ऐसा जैसे किसी ज्वालामुखी ने फूटने की पूरी तैयारी कर ली हो।

    उसने यश की कलाई कसकर पकड़ी और लगभग घसीटते हुए उसे हॉल से दूर कोने की ओर ले गई, जहाँ से भानु प्रताप की नज़रें उन पर न पड़ें।

    उसका स्वर धीमा नहीं था, पर डर और बेचैनी से भरा हुआ था, “सुबह-सुबह ही निकल गया था न तू उस बेशर्म के साथ, तो आने में दोपहर कैसे हो गई? और शॉपिंग का सामान कहां है? खाली हाथ क्यों आया है तू, और वो बेशर्म कहां रह गई?”

    वो जैसे रुकी ही नहीं। उसकी सांसें तेज़ चल रही थीं, होंठ कांप रहे थे और माथे पर पसीने की एक महीन परत थी। “कहीं भाग तो नहीं गई? हाय राम! अब तो हम कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रहे। हॉल में तेरे पापा के दोस्त और उनका पूरा परिवार आया हुआ है। कब से रूहानी से मिलने के लिए बोल रहे हैं, और मैं आधे घंटे से कहे जा रही हूं कि वो अपने भाई के साथ खरीदारी करने गई है। बोल मेरे बेटे, कहां छोड़ आया है उसे?”

    यश ने मां के कंधों को पकड़ कर हल्के से दबाया, जैसे उसकी थरथराहट को थाम लेना चाहता हो। उसकी आवाज़ में वो संयम था जो अक्सर बच्चों में नहीं होता, लेकिन इस वक़्त उसके चेहरे पर एक अलग किस्म की समझदारी झलक रही थी।

    “मुझे बोलने दोगी, तब न मैं कुछ बता पाऊंगा,” उसने माँ की आँखों में देखकर कहा, “तब से तो एक ही सांस में बोले जा रही हो। दीदी मेरे ही साथ थी, बस पीछे से आ रही हैं…”

    ——– 

    इधर, अद्वैत ने जैसे ही कार के ग्लव बॉक्स से वो छोटी सी डिब्बी निकाली और रूहानी की ओर बढ़ाई, उसकी आँखों में एक अजीब सी गहराई थी—जैसे वो जानता हो कि ये क्षण नाटकीय नहीं, पर जरूरी है। “ये लो,” उसने धीमे से कहा, “इसे पहन लो, वरना तुम्हारे मां-पापा को शक हो जाएगा।”

    रूहानी ने कुछ नहीं कहा। बस उसके हाथ से वो डिब्बी ली और धीरे से खोली। उसमें एक छोटा सा फैंसी मंगलसूत्र था—सस्ता, लेकिन अपनी भूमिका में सटीक। उसका दिल थोड़ी देर को जैसे ठहर गया। उसने उस मंगलसूत्र को हथेलियों में रखा और उंगलियों से हल्के हल्के मसलने लगी, जैसे वो धातु नहीं कोई विचार हो—कभी अपना, कभी पराया।

    अद्वैत उसकी उंगलियों के कम्पन और उसके माथे की संकोचभरी सिलवटों को पढ़ रहा था। उसकी नजरें कहीं ठहरी नहीं थीं, पर सब देख रही थीं। वो समझ गया कि ये नाटक उनके लिए बाहरी दुनिया को दिखाने के लिए है, लेकिन रूहानी के भीतर कुछ बहुत गहरा टूटा और जुड़ता जा रहा है।

    “और हां,” उसने एक और डिब्बी बढ़ाते हुए कहा, “इसे मत भूल जाना… मैं यहीं बाहर हूं।”

    इतना कहकर अद्वैत कार से बाहर निकल गया और उसकी तरफ पीठ कर के खड़ा हो गया, जैसे उसे खुद को भी इस दृश्य से अलग रखना हो।

    कार के अंदर अब सिर्फ रूहानी थी और एक अजीब सी चुप्पी। उसने मंगलसूत्र को बिना ज़्यादा सोचे, एक ही झटके में पहन लिया। उसके बाद जब उसने दूसरी डिब्बी खोली, तो उसमें लाल रंग का सिंदूर देखकर उसका दिल एक बार फिर कांप गया। उंगलियां ठिठकीं, आँखें नम हुईं। वो आईने में खुद को देख रही थी….. एक ऐसी स्त्री, जो शादीशुदा दिखने जा रही थी, लेकिन मन के किसी कोने में अभी भी कुछ अधूरा, कुछ अनकहा ज़िंदा था।

    आईने में उसका अक्स बदलता गया। उसे अपना पुराना चेहरा याद आया—वो लड़की जो कुछ साल पहले अपने करियर, अपनी पहचान और एक सच्चे प्रेम के ख्वाब के साथ ज़िंदगी को देखने निकली थी। मगर उस प्रेम ने धोखा दिया था, और करियर अब उस मोड़ पर आ खड़ा हुआ था जहाँ झूठ की परत चढ़ानी पड़ रही थी।

    पर अब वक्त उन बातों का नहीं था। वो जानती थी कि एक परछाईं की तरह अतीत उसके साथ चल सकती है, लेकिन आज जो सामने खड़ा है, उससे नज़रें नहीं चुराई जा सकतीं। उसने एक चुटकी सिंदूर उठाया और अपनी मांग में भर लिया—सिर्फ इसलिए नहीं कि दुनिया देखे, बल्कि इसलिए कि वो खुद उस भूमिका को निभा सके जो उससे उम्मीद की जा रही थी।

    बाहर खड़े अद्वैत की पीठ की तरफ देखते हुए उसने गहरी साँस ली और दरवाज़ा खोल कर कहा, “चलो, मैं तैयार हूं।”

    अद्वैत ने जब उसकी आवाज़ सुनी, तो मुड़कर देखा। उसके हाथ अपने वरमाला को ठीक कर रहे थे, पर निगाहें रूहानी के चेहरे पर जम गईं। एक पल को वो ठिठक गया। सामने खड़ी औरत वही थी जिससे उसने एक समझौता किया था, लेकिन अब उसमें कुछ बदल गया था…. वो सिर्फ रूहानी नहीं रही, उसमें कहीं छुपकर उसकी ‘पत्नी’ भी झलकने लगी थी।

    “तुम…” बस इतना ही कहा अद्वैत ने, उसकी आंखों में एक अबोझ सी चमक थी।_

    रूहानी ने घबरा कर कहा, “क्या हुआ? कुछ ठीक से नहीं है क्या?” वो अपनी वरमाला, मंगलसूत्र और सिंदूर को टटोलने लगी, जैसे कोई बच्चा हो जिसने पहली बार कुछ पहन कर आईने में खुद को देखा हो।

    “नहीं… सब ठीक है…” अद्वैत ने अपनी कल्पना से बाहर आते हुए कहा, “चलो चलते हैं।”

    दोनों घर के मेन गेट के पास पहुँचे। हवा थोड़ी गर्म थी, लेकिन उनके बीच एक अजीब सी ठंडक पसरी हुई थी…. शब्दों की, भावनाओं की, और उन अहसासों की जो ज़ोर से कहे नहीं जा सकते।

    उधर थोड़ी दूरी पर एक नौजवान लड़का…. तनाव और झुंझलाहट से टहलता हुआ…. बेसब्री से बोला, “यश, कहां रह गई रूहानी? मुझसे अब बर्दाश्त नहीं हो रहा।”

    यश ने तुरंत गेट की ओर इशारा किया, “वो रही दीदी…”

    और फिर सब जैसे रुक गया।

    जानकी चौहान, भानु प्रताप और उनके साथ बैठे मेहमान…. सभी की नज़रें एक साथ मेन गेट पर टिक गईं। सबने एक ही पल में देखा…. रूहानी, एक अनजान आदमी के साथ, वरमाला पहने, सिंदूर लगाए, गले में मंगलसूत्र डाले।

    कुछ क्षणों तक बस एक सन्नाटा था। फिर वो सन्नाटा जैसे किसी ने चीख से तोड़ दिया हो। जानकी की आँखों में विश्वास टूटने की दहशत थी, भानु प्रताप की मुट्ठियाँ सख्त हो गई थीं, और मेहमानों की फुसफुसाहटें एक भरी सभा में ज्वालामुखी जैसी गूंज रही थीं।

    ————-

    क्या ये सिर्फ एक दिखावा था, या इस नाटक ने वाकई कुछ बदल दिया था?

    क्या जानकी की आँखों में जो दहशत थी, वो एक माँ का डर था या एक औरत का टूटा हुआ घमंड?

    भानु प्रताप की सख्त मुट्ठियाँ… क्या वो सिर्फ गुस्से की थीं, या किसी पुराने राज़ की दस्तक थी?

    रूहानी के क़दमों ने चौहान निवास में जो तूफ़ान लाया था… क्या अब उससे कोई बच पाएगा?

  • अधूरी इबादत भाग~7

    अधूरी इबादत भाग~7

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~7 “My Life” कौन?

    रूहानी का मोबाइल टेबल पर वैसे ही पड़ा था, जैसे कोई चुपचाप बम घड़ी हो, जो किसी भी पल फट सकती है। अद्वैत अब भी फर्श पर बैठा था, फर्स्ट ऐड बॉक्स एक तरफ रखा हुआ, उसका ध्यान पूरी तरह रूहानी पर था। उसकी उंगलियाँ अभी तक हवा में ठहरी हुई थीं, जैसे वे अब भी दर्द से कराहते पाँव की ओर बढ़ना चाहती हों, लेकिन रूहानी के शब्दों ने रोक दिया था।

    और तभी… मोबाइल की स्क्रीन पर हल्की रौशनी फूटी और उसमें एक नाम उभरा—“My Life”।

    अद्वैत की नज़र उस स्क्रीन पर जा ठहरी।

    उसके चेहरे की भाव-भंगिमा धीरे-धीरे बदलने लगी। उसकी आँखें थोड़ी सिकुड़ीं, जैसे कुछ गहराई में देखने की कोशिश कर रही हों। अभी तो रूहानी ने कहा था कि उसका इस दुनिया में कोई नहीं है, तो फिर ये “My Life” कौन था? कौन हो सकता था जिसकी पहचान रूहानी ने इतनी आत्मीयता से अपने फोन में दर्ज कर रखी थी?

    एक खामोशी तैरने लगी, जो पल भर में भारी होने लगी।

    रूहानी की नज़र भी मोबाइल की स्क्रीन पर पड़ी, और उसने बिजली की तरह झपट कर फोन उठा लिया। कॉल कट करते हुए उसने मोबाइल अपनी हथेलियों में छिपा लिया जैसे कोई बच्चा चोरी पकड़े जाने पर अपना खिलौना छुपा लेता है।

    वो जानती थी, अद्वैत कुछ पूछ सकता है, उसकी निगाहों में अब भी सवाल थे, शक था, लेकिन उसे मौक़ा दिए बिना रूहानी जल्दी से बोल पड़ी—आवाज़ में एक तरह की बनावटी सहजता थी, पर भीतर कुछ काँप रहा था।

    “तो फिक्स रहा ना, मैं कुछ दिनों के लिए यहाँ रह सकती हूँ ना?” उसने जल्दी से पूछा, जैसे किसी और दिशा में ध्यान मोड़ देना चाहती हो।

    अद्वैत की चेतना उस फोन स्क्रीन पर अटक गई थी, लेकिन रूहानी की बात ने उसे उस विचार से बाहर खींच लिया।

    “हाँ,” अद्वैत ने एक छोटे से विराम के बाद कहा, “यहाँ रसोई से लगा हुआ एक कमरा है, उसमें रह लेना। और खबरदार जो छत पर आने की कोशिश की तो।”

    उसके स्वर में आदेश था, हल्की चेतावनी थी, और कहीं भीतर एक अदृश्य दीवार भी, जो उसने खुद के और रूहानी के बीच खड़ी कर दी थी। शायद वो नहीं चाहता था कि कोई उस छत तक पहुँचे—वो छत जहाँ कई अधूरी कहानियाँ छुपी थीं।

    “वैसे,” अद्वैत ने अब अपना सिर थोड़ा झुकाया, जैसे ज़्यादा सहज होने की कोशिश कर रहा हो, “तुम किराया देने की बात कर रही थी ना, तो क्या करती हो तुम… मतलब क्या प्रोफेशन है तुम्हारा?”

    रूहानी की आँखों में हल्की-सी चमक आ गई। ऐसा लगा जैसे उस प्रश्न ने उसकी पहचान को फिर से छू लिया हो, जैसे एक मुरझाए फूल को हल्की सी धूप मिल गई हो।

    उसने हल्का मुस्कराते हुए कहा, “वो मैं… एक स्ट्रगलिंग ड्रेस डिज़ाइनर हूं।”

    उसकी आवाज़ में हल्की थकान थी, लेकिन उसके शब्दों में उम्मीद का रंग था।

    “फिलहाल तो मेरा काम ठप्प पड़ा हुआ है,” उसने थोड़ी सी सांस ली, “लेकिन मेरे कुछ सेविंग्स हैं, जिसमें से मैं तुम्हें किराया दे दूंगी। कोई दिक्कत नहीं होगी।”

    वो जैसे खुद को साबित करना चाह रही थी। उसके लहज़े में विनम्रता थी, पर साथ ही एक आत्म-सम्मान भी।

    फिर उसने अपने कंधे हल्के से उचकाए, जैसे वो खुद से कह रही हो, “मैं अभी पूरी टूटी नहीं हूँ, अभी कुछ बचा है मुझमें।”

    अद्वैत ने उसकी ओर देखा, उसकी मुस्कान को, उसके टूटे आत्मबल के बीच से झाँकते उस गर्व को। कुछ पल के लिए वो अपनी ज़ुबान से कुछ न कह सका।

    वो देख रहा था उस लड़की को, जो कुछ ही घंटे पहले मौत के किनारे खड़ी थी, और अब अपने हुनर, अपने संघर्ष पर मुस्कुरा रही थी।

    उसके बाद अद्वैत ने अपने हाथ में झाड़ू और डस्टपैन थामा और सावधानी से फर्श पर बिखरे कांच के टुकड़ों को समेटना शुरू किया। हर टुकड़ा जो उसने उठाया, जैसे किसी बीती कहानी का एक टुकड़ा था—चुभता हुआ, चमकता हुआ, खामोश। कमरे में कुछ नहीं बोला जा रहा था, लेकिन हर हरकत में जैसे कई अधूरी आवाज़ें गूँज रही थीं। अद्वैत की उंगलियाँ नुकीले कांच से बचती हुई फुर्ती से चल रही थीं, लेकिन उसका ध्यान अब भी रूहानी पर था, जो अब तक सोफे पर स्थिर बैठी थी।

    रूहानी की साँसें थोड़ी तेज थीं, दर्द तो था, मगर उससे ज़्यादा कुछ और… कोई अंदरूनी हलचल, जो उस लम्हे से बाहर निकलने ही नहीं दे रही थी।

    जब आखिरी टुकड़ा भी डस्टबिन में गिरा, तो अद्वैत वापस रूहानी के पास आया। उसका चेहरा पहले से कुछ शांत था, जैसे उसने खुद से एक लंबी बहस के बाद कोई निर्णय लिया हो। उसने अपना दायाँ हाथ उसकी ओर बढ़ाते हुए सहज स्वर में कहा, “चलो, खाना खाने।”

    रूहानी ने उसकी तरफ देखा। कुछ पल के लिए उसकी आँखें उस हाथ को निहारती रहीं, जैसे किसी अजनबी की पेशकश को परख रही हों। फिर उसने धीरे से अपनी पलकों को कुछ बार झपकाया—धीरे, थमे हुए क्षण में जैसे आँखें कुछ भीगती हुई कहानियाँ पोंछ रही हों। उसके चेहरे पर अब भी दर्द था, मगर वह अद्वैत का हाथ पकड़कर, एक पैर के सहारे, खुद को खींचती हुई उठी और उसके सहारे डाइनिंग टेबल तक पहुँची।

    अद्वैत ने उसे हाथ से थामे रखा, लेकिन उसने कहीं भी उसे छूने की कोशिश नहीं की। उसने रूहानी को सहारा दिया, बिना कोई अनचाहा बोझ बनें। इस दूरी में एक अनकही नज़दीकी थी, जैसे दोनों एक ही पुल पर चल रहे हों, बस अलग-अलग किनारों पर।

    डाइनिंग टेबल के पास पहुँचकर अद्वैत ने कुर्सी खींची और रूहानी को बैठने में मदद की। फिर चुपचाप फ्रिज की ओर बढ़ गया, जैसे वह अपनी भावनाओं को भी वहीं किसी ठंडे कोने में रख आया हो। उसने दो प्लेटें निकालीं, माइक्रोवेव में खाना गर्म किया और फिर दोनों के सामने सादगी से परोस दिया।

    रूहानी चुपचाप उसे देखती रही, उसके हर हावभाव को जैसे किसी पुरानी किताब के पन्नों की तरह पढ़ती रही। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि यही व्यक्ति कुछ घंटे पहले कितना खड़ूस और तटस्थ लग रहा था।

    खाना परोसा गया और दोनों चुपचाप खाने लगे।

    सन्नाटा कमरे की हवा में घुला था, जैसे हर दीवार उसे महसूस कर रही हो। रूहानी को यह खामोशी खलने लगी। वह जो आम तौर पर चुलबुली, बातूनी थी, अब खुद को किसी साए में दबा हुआ महसूस कर रही थी।

    उसने एक कौर मुँह में डालते हुए धीरे से पूछा, “तुम्हें लेखक बनने का बुखार कब चढ़ा था?”

    अद्वैत ने बिना सिर उठाए पहले एक पल रुक कर कौर चबाया, फिर हल्की भौंहें चढ़ाकर उसकी तरफ देखा। आँखें थोड़ी छोटी हो गईं, जैसे बात को समझने की कोशिश कर रहा हो या शायद अंदाज़ा लगाने की, कि यह सवाल मज़ाक में था या जिज्ञासा में।

    रूहानी ने अपनी बात स्पष्ट की, “मीना बता रही थी कि तुम एक प्रसिद्ध लेखक हो।“

    अब अद्वैत का चेहरा थोड़ा सहज हुआ, जैसे उसे अपनी किसी छुपी हुई पहचान को अब स्वीकारना पड़ रहा हो।

    “दूसरी बात यह है कि मैं बहुत छोटे से ही लिखता आ रहा हूँ,” उसने शांत स्वर में कहा।

    “वो….अच्छा…” रूहानी ने हौले से सिर हिलाया। लेकिन तभी उसके दिमाग में एक बात कौंधी। उसने तुरंत पूछ लिया, “तो फिर पहली बात क्या है?”

    अद्वैत ने एकदम से कौर मुँह में डालते हुए कड़क स्वर में कहा, “पहली बात ये है कि खाते हुए बातें करना मुझे पसंद नहीं।”

    रूहानी के होंठ थोड़ा से सिकुड़े, उसने बुदबुदाते हुए कहा, “खड़ूस नहीं तो…”

    उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि शायद अद्वैत ने नहीं सुनी, या शायद जानबूझकर अनसुनी कर दी।

    बाकी खाना चुपचाप ही निपटा। उस खामोशी में कहीं अद्वैत के मन का ठहराव था और रूहानी की बेचैनी। दोनों के भीतर बहुत कुछ उथल-पुथल मचा हुआ था, मगर बाहर सिर्फ सन्नाटा पसरा था।

    खाना खत्म होने के बाद अद्वैत ने प्लेटें उठाईं, बिना एक शब्द कहे, और फिर वापस आकर रूहानी को सहारा देते हुए उसके कमरे तक पहुँचा दिया।

    रूहानी को कमरे के भीतर पहुँचा कर उसने दरवाज़े के पास एक क्षण ठहर कर देखा। कुछ कहने की चाह चेहरे पर तैरती रही, लेकिन होंठ बंद ही रहे। वह मुड़ा और सीढ़ियों की ओर चल दिया—धीमे, शांत कदमों से, जैसे कोई अधूरी बात को पीछे छोड़ता चला गया हो।

    रूहानी कमरे में अकेली रह गई। दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ के साथ ही उसने एक गहरी साँस ली, और अपनी जगह बैठते ही मोबाइल उठाया। उसकी उंगलियाँ काँप रहीं थीं। कुछ पल उसे समझ ही नहीं आया कि वो क्या कर रही है।

    फिर उसने कॉल लॉग खोला, और “My Life” को दोबारा कॉल बैक कर दिया।

    फोन मिलते ही दूसरी तरफ से कोई हल्की आवाज़ आई, लेकिन रूहानी की आँखों में आँसू भर आए। उसका गला रुंध गया। वो फूट पड़ी।

    “किसी को पता तो नहीं है कि तुम मुझे कॉल कर रहे हो ना…” उसकी आवाज़ भारी थी, टूटी हुई।

    ———

    आखिर ये ‘My Life’ कौन था?

    अद्वैत… क्या वाकई वो सिर्फ काँच समेट रहा था, या उन टुकड़ों में रूहानी का कोई और सच भी ढूँढ़ रहा था?

    अब क्या वो दोनों सिर्फ किरायेदार और मकान मालिक रहेंगे, या कोई पुराना ज़ख्म अचानक खुलने वाला है?

     

  • अधूरी इबादत भाग~5

    अधूरी इबादत भाग~5

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग ~5 ज़ख्म जो लिखे नहीं गए

    पुणे की सड़कों पर कार दौड़ रही थी, लेकिन मेरा ज़हन किसी और सफर पर निकला हुआ था—एक ऐसा सफर, जो सड़क पर नहीं, मेरे भीतर चल रहा था। सड़कें लंबी थीं, आसमान खुला और हवा तेज़ थी, मगर मेरे अंदर घुटन थी।  

    सुबह से चला था मैं, लेखकों के एक सम्मेलन में शरीक होने के लिए, जहाँ शब्दों की महफ़िल जमी थी, विचारों की गूँज थी और किस्सों का सैलाब था। मगर अब जब मैं वापस लौट रहा था, मेरी कार की खिड़की से झाँकता शहर तेज़ी से पीछे छूट रहा था और उसके साथ ही वह हलचल भी, जो कुछ देर पहले मेरे भीतर थी।  

    सम्मेलन में कहानियों की बुनावट, भाषा की बारीकियाँ और शब्दों की ताक़त पर कई चर्चाएँ हुईं, लेकिन मेरा मन कहीं और अटका रहा—उन अधूरे क़िस्सों में, जिन्हें मैंने कभी लिखा नहीं, उन भावनाओं में, जिन्हें कभी पूरी तरह अभिव्यक्त नहीं कर पाया।  

    खिड़की से आती हवा मेरे चेहरे को छूकर निकल जाती थी, मगर दिल की तपिश कम नहीं कर पाती थी। शब्दों के उस समंदर से लौटते हुए भी, भीतर कहीं एक सूखापन था। शायद इसलिए कि कुछ सवाल वहाँ भी अनुत्तरित रह गए थे, कुछ कहानियाँ अभी भी अधूरी थीं।

    कल रात की महफ़िल… वही महफ़िल, जहाँ मैं जाना नहीं चाहता था, लेकिन फिर भी मैं उसे मना नहीं कर पाया। 

    क्यों? यही सवाल अब तक ज़हन में गूंज रहा था, मगर जवाब कहीं गहरे दबा पड़ा था। शायद मैं जानता था, पर स्वीकार नहीं करना चाहता था।  

    वहाँ बैठे हर चेहरे पर एक नक़ाब था—सभ्य समाज का, खुलेपन का, उच्च विचारों का, लेकिन उनकी आँखों में वही पुरानी धूर्तता थी, शब्दों में वही कड़वाहट, वही ज़हर।  

    अरे, देखो तो कौन आया है!”

    “इसकी तो माँ भी वही थी न…?”

    “क्या खाक लेखक बनेगा? अपनी माँ की कहानी लिखेगा क्या?” 

    “वैसे, अब इसका कोई है भी? माँ नहीं, बाप नहीं… बीवी भी नहीं रही।”

    हर लफ्ज़ नश्तर की तरह रगों में उतरता चला गया। मैं वहाँ कितनी देर तक रुका, याद नहीं, बस इतना याद है कि हर शब्द मेरी रगों में ज़हर की तरह घुलता जा रहा था।    

    मुझे हमेशा से अपने वजूद पर पछतावा रहा था। मेरी ज़िंदगी एक ऐसा सवाल थी, जिसका जवाब किसी के पास नहीं था।

    मैं नहीं जानता था कि मेरे जन्म को लेकर इतना शोर क्यों था, इतनी घृणा क्यों थी? 

    क्या मैंने अपनी माँ से कहा था कि वो मुझे जन्म दे? 

    क्या मैंने इस दुनिया में आने का चुनाव किया था? नहीं ना …..

    फिर क्यों? क्यों हर बार मुझे ही दोष दिया जाता है?  

    नाजायज़!”  

    एक ऐसा शब्द, जो मेरी रग-रग में उतर चुका था। मेरा पूरा वजूद मानो इसी एक लफ्ज़ में कैद था।  

    कभी-कभी सोचता हूँ, क्या मैं सच में किसी जुर्म का नतीजा था? क्या मैं सच में एक भूल था? मेरे पिता ने मुझे कभी अपनाया नहीं। और मैं भी उन्हें कभी अपना नहीं पाया। लेकिन क्या मैं उनके साथ रहने वाली उस औरत को अपनी माँ का दर्जा दे सकता था? कभी नहीं।  

    और मेरी माँ?  

    वो अब इस दुनिया में नहीं थीं। आत्महत्या कर ली थी उन्होंने। लोग कहते हैं, उन्होंने ज़िंदगी से हार मान ली थी। लेकिन मैं जानता हूँ, ऐसा नहीं था। उन्होंने ज़िंदगी से नहीं, लोगों की नफरत से हार मानी थी। उन्होंने उस समाज से हार मानी थी, जिसने उन्हें कभी स्वीकार ही नहीं किया।  

    कभी-कभी सोचता हूँ, अगर मैं नहीं होता, तो क्या वो ज़िंदा होतीं? क्या सच में मैं उनकी मौत का ज़िम्मेदार था?  

    रातों को जब नींद नहीं आती तो आईने में खुद को देखकर सोचता था – क्या मैं सच में वही हूँ, जैसा लोग कहते हैं? एक अपशगुन? एक मनहूस इंसान?  

    लोगों को लगता है, लेखक हूँ, तो दर्द को समझता हूँ, उसे शब्दों में ढाल लेता हूँ, मगर क्या लेखक का दिल नहीं टूटता? क्या लेखक की आत्मा पर लगे ज़ख्म कम गहरे होते हैं? क्या शब्दों में घुलकर कोई अपने दर्द से बच सकता है? अगर ऐसा होता, तो मैं अब तक खुद को लिखकर ख़त्म कर चुका होता।  

    पर ऐसा नहीं है …. दर्द सिर्फ़ लिखने से नहीं जाता। वो अंदर जड़ें जमा लेता है, साँसों में घुल जाता है, ख़ून में बहता रहता है।  

    लोगों को लगता है, मैं मजबूत हूँ। लेकिन मैं हर दिन, हर पल टूटता हूँ।  

    मेरी पत्नी…  

    उसकी मुस्कान अब भी आँखों में बसी हुई है। उसके स्पर्श की गर्माहट अब भी हथेलियों में ठहरी हुई है। लेकिन लोग कहते हैं, मेरी वजह से उसकी मौत हुई। जैसे मेरी माँ की हुई थी। तो क्या सच में मैं ही दोषी हूँ? क्या सच में मेरी ज़िंदगी किसी शाप से कम नहीं? क्या मैं जहाँ भी जाता हूँ, जो भी मेरे करीब आता है, वो बर्बाद हो जाता है?  

    अगर हाँ, तो फिर मैं अब भी ज़िंदा क्यों हूँ?  

    क्या सिर्फ़ इस दुनिया का तमाशा देखने के लिए?  

    या सिर्फ़ समाज के तानों को सुनने के लिए?  

     

    पीछे किसी ने तेज़ हॉर्न बजाया। मेरी तंद्रा टूटी। सामने सिग्नल हरा हो चुका था, मगर मैं अब भी जड़ था। जैसे मेरे भीतर कोई जाम लग गया हो। 

    मैंने गहरी सांस ली, एक्सीलेटर दबाया, और गाड़ी आगे बढ़ा दी।  

    लेकिन भीतर कुछ अब भी रुका हुआ था—  

    माँ की यादें, पत्नी की परछाइयाँ और वे तमाम आवाज़ें, जो ज़हन में अब भी गूँज रही थीं—

    “मनहूस!”

    “नाजायज़!”

    “इसका कोई नहीं!”  

    क्या सच में मेरा कोई नहीं था?  

    क्या मैं इस पूरी दुनिया में सच में अकेला था?

    और तभी…

    अचानक, उस लड़की का चेहरा ज़हन में कौंध गया।

    वही लड़की, जिसे कल रात मैंने उस पुल से कूदने से रोका था।

    उसकी बेबस आँखें, काँपते होंठ और वो खामोश चीख़, जो मैं अब तक सुन सकता था।

    वो क्यों कूदना चाहती थी? कौन थी वो?

    मैंने उसे बचा तो लिया था, लेकिन वो बेहोश हो गई थी।

    उसके हाथ में बंधे ब्रेसलेट से उसका नाम पता चला था – “रूहानी” मगर बाकी कुछ भी नहीं।

    मेरा दर्द मेरे अंदर था, लेकिन उसका दर्द उसकी आँखों में साफ़ झलक रहा था।

    शायद… मैं उसका जवाब नहीं था, पर क्या वो मेरे सवालों का कोई सिरा थी?

    मैं आज तक बहुत से लोगों को टूटते देखा था। मैं जानता था कि समाज किस तरह किसी को उसके अपने ही जीवन से बेगाना बना देता है। मैं जानता था कि दर्द जब हद से बढ़ जाता है, तो इंसान खुद को मिटा देना चाहता है।

    पर मैं उसे टूटने नहीं देना चाहता था।

    क्यों?

    शायद इसलिए कि उसकी आँखों में मैंने खुद को देखा था। वही खालीपन, वही तन्हाई, वही हताशा, जो बरसों से मेरे साथ थी।

    पता नहीं, वो अब भी मेरे घर में होगी या जा चुकी होगी।

    मुझे नहीं पता कि उसके मन में क्या चल रहा था, ना ही मैं उसके बारे में कुछ जानता था। बस इतना जानता था कि जब मैंने उसे बचाया, तो वो पूरी तरह बेहोश थी। मैं उसे अपने घर ले आया, पर हम एक शब्द भी नहीं बोल पाए क्योंकि रात में वह अपने होश में नहीं थी और सुबह में मैं जल्दबाज़ी में निकल गया। 

    मेरी उंगलियाँ कार के स्टीयरिंग पर कस गईं। मन में एक अजीब-सी घबराहट पसरने लगी। अगर वो अब भी वहाँ हुई, तो क्या मैं उससे कुछ पूछ पाऊँगा?

    और अगर नहीं हुई…

    अगर वो जा चुकी होगी…

    तो फिर?

    एक अनजान-सी बेचैनी ने मेरे अंदर दस्तक दी।

    मैंने गाड़ी की रफ्तार बढ़ा दी।

    सड़कें पीछे छूट रही थीं, मगर दिल में जो हलचल थी, वो तेज़ होती जा रही थी। घर के करीब पहुँचते ही मेरी साँसें थोड़ी तेज़ हो गईं। न जाने क्यों, पर दिल किसी अनहोनी का एहसास करा रहा था।

    जैसे ही मैंने कार रोकी और घर की तरफ देखा। 

    दरवाजा खोलते ही सामने का नज़ारा देख ……….

    ————-

    क्या रूहानी अब भी वहीं थी, या वह कहीं जा चुकी थी—बिना कोई निशान छोड़े?

    कमरे के कोने में एक टूटा हुआ काँच पड़ा था, और फर्श पर पानी फैला हुआ था।

    वो खून के निशान किसके थे?