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  • Epi – 2 king ka junoon इश्क

    Epi – 2 king ka junoon इश्क

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    एपिसोड – 2 किंग के घर में घुसपैठ

     

    दोनों की नजरें एक-दूसरे से टकरा रही थीं नीचे खड़ी तृप्ति की सांसें तेज चल रही थीं। उसके बाल बिखर चुके थे और भारी लहंगा संभालते-संभालते उसकी हालत खराब हो चुकी थी।

     

    वहीं ऊपर बालकनी में खड़ा आदर्श बिल्कुल शांत था काले रंग की शर्ट की आस्तीन उसकी कोहनी तक मुड़ी हुई थी। चेहरे पर किसी तरह का भाव नहीं था। उसकी आंखें बस सामने खड़ी उस लड़की को देख रही थीं तृप्ति कुछ सेकंड तक उसे देखती रही फिर धीरे से खुद से बोली ये कौन है?”

     

    आदर्श ने नीचे खड़े अपने गार्ड की तरफ देखा ये लड़की यहां कैसे आई उसकी आवाज बहुत शांत थी, लेकिन उसमें ऐसा रौब था कि गार्ड तुरंत सीधा खड़ा हो गया।

     

    “सर हमें नहीं पता। ये अचानक गेट के अंदर भागती हुई आई तभी बाहर से उन आदमियों की आवाज सुनाई दी जो तृप्ति का पीछा कर रहे थे लड़की अंदर गई है तृप्ति की आंखें डर से बड़ी हो गईं उसने पीछे देखा दो आदमी गेट के बाहर खड़े थे तृप्ति तुरंत पलटकर ऊपर आदर्श की तरफ देखने लगी आदर्श अब भी उसे ही देख रहा था।

     

    तृप्ति ने बिना सोचे अपने दोनों हाथ जोड़ दिए प्लीज मुझे बचा लीजिए आदर्श की भौंहें हल्की सी ऊपर उठीं क्यों तृप्ति ने घबराकर कहा क्योंकि वो लोग मुझे पकड़ने आए हैं आदर्श कुछ नहीं बोला।

     

    तृप्ति ने जल्दी से अपनी बात आगे बढ़ाई। देखिए, मैं आपको परेशान नहीं करूंगी। बस थोड़ी देर के लिए छुपा लीजिए। उसके बाद मैं चली जाऊंगी आदर्श की नजर उसके शादी के जोड़े पर गई तुम दुल्हन हो तृप्ति ने अपने लहंगे की तरफ देखा।

     

    हां फिर कुछ सोचकर बोली मतलब थी आदर्श की आंखें सिकुड़ गईं मतलब तृप्ति ने परेशान होकर कहा शादी होने वाली थी मेरी। और और मैं भाग गई।”

     

    आदर्श पहली बार कुछ सेकंड के लिए चुप हो गया उसे समझ नहीं आया कि उसके घर के अंदर घुस आई यह लड़की आखिर चाहती क्या है।

     

    तृप्ति ने उसे चुप देखकर कहा आप ऐसे मुझे देख क्यों रहे हैं? मैंने चोरी नहीं की है आदर्श ने ठंडी आवाज में पूछा तो मेरे घर में घुसा क्या है तृप्ति के पास इसका कोई जवाब नहीं था वह कुछ पल चुप रही।

     

    फिर धीरे से बोली वो गलती हो गई आदर्श ने नीचे अपने गार्ड की तरफ देखा इसे बाहर निकालो तृप्ति की आंखें फैल गईं क्या गार्ड उसकी तरफ बढ़ने लगे।

     

    तृप्ति तुरंत पीछे हट गई नहीं नहीं प्लीज वह जल्दी से आदर्श की तरफ देखने लगी आप मुझे बाहर निकाल देंगे तो वो लोग मुझे पकड़ लेंगे आदर्श की आवाज पहले जैसी ही ठंडी थी वो तुम्हारी समस्या है।”

     

    तृप्ति हाथ जोर कर बोली “लेकिन अभी मैं आपके घर में हूं आदर्श शांत लेकिन सख्त आवाज में कहा यही तुम्हारी सबसे बड़ी गलती है तृप्ति कुछ पल उसे देखती रही। फिर बुदबुदाइ इतना बड़ा घर है, एक लड़की को थोड़ी देर छुपाने से क्या हो जाएगा आदर्श ने उसकी बात सुन ली।

     

    “क्या कहा तृप्ति तुरंत मुस्कुरा दी मैंने कहा आपका घर बहुत अच्छा है आदर्श उसे घूरने लगा तृप्ति ने नजरें झुका लीं उसी समय बाहर खड़े दोनों आदमी गेट पर पहुंच गए।

     

    “लड़की अंदर आई है। हमें उसे लेकर जाना है गार्ड ने उन्हें रोक दिया यह प्राइवेट प्रॉपर्टी है। बिना अनुमति अंदर नहीं आ सकते वह आदमी अकड़कर बोला तुम जानते नहीं हो हम किसके आदमी हैं।”

     

    तभी ऊपर से आदर्श की आवाज आई उन्हें अंदर आने दो गार्ड तुरंत पीछे हट गए दोनों आदमी अंदर आए और पूरे घर में नजर दौड़ाने लगे।

     

    तृप्ति घबरा गई वह इधर-उधर देखने लगी उसे कहीं छुपने की जगह नहीं मिल रही थी तभी आदर्श सीढ़ियों से नीचे आने लगा उसके हर कदम के साथ घर का माहौल और शांत होता जा रहा था।

     

    दोनों आदमी जैसे ही आदर्श के सामने पहुंचे, उनकी आंखों में अचानक डर दिखाई देने लगा उन्होंने आदर्श को पहचान लिया था उनमें से एक ने तुरंत अपना सिर झुका लिया सर हमें पता नहीं था कि ये आपका घर है

     

    आदर्श ने बिना कोई भाव दिखाए पूछा किसे ढूंढ रहे हो, गुंडे डरते हुए कहा एक लड़की को आदर्श संत आवाज में पूछा कौन सी लड़की वह आदमी कुछ बोलने ही वाला था कि उसकी नजर पीछे खड़ी तृप्ति पर चली गई उसका चेहरा खिल उठा यही है वह तृप्ति की तरफ बढ़ने लगा लेकिन अगले ही पल आदर्श ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    घर में सन्नाटा छा गया आदर्श ने उसकी कलाई इतनी मजबूती से पकड़ी कि वह आदमी दर्द से कराह उठा मेरे घर में घुसकर… मेरी इजाजत के बिना किसी को हाथ लगाने की हिम्मत कैसे हुई?”

     

    वह आदमी डरते हुए बोला सर, हम बस अपना काम “बाहर” आदर्श ने सिर्फ एक शब्द कहा गार्ड तुरंत आगे आए और दोनों आदमियों को बाहर ले जाने लगे तृप्ति वहीं खड़ी आदर्श को देख रही थी।

     

    उसकी आंखों में अब डर के साथ-साथ हैरानी भी थी आपने मुझे बचा लिया आदर्श ने उसकी तरफ देखा मैंने तुम्हें नहीं बचाया तृप्ति का चेहरा उतर गया फिर?”

     

    “मैंने उन्हें अपने घर में तमाशा करने से रोका है। तृप्ति कुछ सेकंड उसे देखती रही फिर धीरे से मुस्कुराई मतलब बचाया तो है आदर्श ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    वह ऊपर जाने लगा तृप्ति उसके पीछे चल पड़ी सुनिए आदर्श रुक गया क्या मुझे थोड़ी देर यहां रहने देंगे नहीं थोड़ी देर मतलब बस आज की रात नहीं कुछ घंटे नहीं एक घंटा आदर्श ने पलटकर उसे देखा तृप्ति चुप हो गई फिर धीरे से बोली आधा घंटा आदर्श ने माथे पर हाथ रख लिया।

     

    उसे पहली बार लगा कि इस लड़की को चुप करवाना शायद उसके किसी दुश्मन को हराने से भी ज्यादा मुश्किल होगा।

    तुम्हारा नाम क्या है तृप्ति पूरा नाम तृप्ति शर्मा आदर्श कुछ पल उसे देखता रहा और तुम मेरे घर तक पहुंची कैसे?”

     

    तृप्ति ने पूरी कहानी बतानी शुरू कर दी आज मेरी शादी थी। मुझे शादी नहीं करनी थी। मैं पढ़ना चाहती हूं। लेकिन मेरे पापा ने मेरी बात नहीं मानी। इसलिए मैं घर से भाग गई आदर्श चुपचाप सुनता रहा।

     

    तृप्ति ने आगे कहा फिर कुछ लोग मेरे पीछे पड़ गए। मुझे लगा वो मेरे घरवालों के लोग हैं, लेकिन वो किसी विराज राणा का नाम ले रहे थे। आदर्श का चेहरा अचानक बदल गया उसकी आंखों में एक पल के लिए कठोरता आ गई विराज राणा तृप्ति ने सिर हिलाया हां। वही शायद जिससे मेरी शादी होनी थी आदर्श कुछ सेकंड तक शांत रहा फिर उसने पूछा तुम्हें पता है विराज राणा कौन है

     

    तृप्ति ने मासूमियत से सिर हिलाया नहीं आदर्श ने उसे गौर से देखा तुम्हें अंदाजा भी नहीं कि तुम किस मुसीबत से भागकर यहां आई हो तृप्ति ने धीरे से कहा तो अब क्या करूं आदर्श कुछ बोलता, उससे पहले बाहर से उसका एक आदमी तेजी से अंदर आया। सर

     

    आदर्श ने उसकी तरफ देखा क्या हुआ बाहर विराज राणा के आदमी अभी भी मौजूद हैं तृप्ति की सांस रुक गई आदर्श का चेहरा बिल्कुल शांत था

     

    वह कुछ पल सोचता रहा फिर उसने तृप्ति की तरफ देखा आज रात तुम कहीं नहीं जाओगी। तृप्ति ने राहत की सांस ली लेकिन अगले ही पल आदर्श की अगली बात सुनकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई तुम मेरे कमरे में रहोगी तृप्ति की आंखें पूरी तरह फैल गईं क्या आदर्श बिना कोई जवाब दिए अपने कमरे की तरफ बढ़ गया।

     

    तृप्ति उसके पीछे खड़ी उसे देखती रही। फिर खुद से बोली हे भगवान शादी से भागी थी और अब पता नहीं किस मुसीबत में फंस गई लेकिन तृप्ति को अभी यह नहीं पता था कि जिस आदमी के कमरे में वह आज मजबूरी में जाने वाली थी वही आदमी अगले कुछ घंटों में उसकी पूरी जिंदगी बदलने वाला था।

     

    क्या करेगा आदर्श तृप्ति के साथ, क्या वो तृप्ति की मदद के नाम पर कुछ और करना चाहता है। चलिए आगे जानते हैं। 

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • Epi – 1 King ka junoon इश्क

    Epi – 1 King ka junoon इश्क

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

     

     

    एपिसोड – 1 शादी से फरार

     

    शर्मा हवेली आज दुल्हन की तरह सजी हुई थी। पूरे घर में रोशनी लगी हुई थी। आंगन में फूलों से सजावट की गई थी और घर के बाहर मेहमानों की गाड़ियां लगातार आ-जा रही थीं। घर के अंदर हर तरफ शादी की तैयारियां चल रही थीं।

    लेकिन उसी घर के एक कमरे में बैठी तृप्ति शर्मा का चेहरा बिल्कुल उतरा हुआ था।

     

    तृप्ति लाल रंग के भारी लहंगे में दुल्हन बनी हुई शीशे के सामने बैठी थी। उसके बालों में गजरा लगा हुआ था, माथे पर बड़ी सी बिंदी और मांग में सिंदूर की जगह अभी सिर्फ लाल रंग की मांग थी।

     

    उसने अपने चेहरे को शीशे में देखा और फिर धीरे से अपना सिर पकड़ लिया। तृप्ति बड़बड़ाते हुए कहती है, “हे भगवान! ये क्या हो रहा है मेरे साथ? अभी मेरी जिंदगी शुरू भी नहीं हुई और मेरे पापा ने उसे खत्म करने का पूरा इंतजाम कर दिया।”

     

    वह कुछ पल चुप रहती है फिर शीशे में खुद को देखते हुए कहती है, “तृप्ति शर्मा, तू आज से पढ़ाई करेगी या किसी ऐसे आदमी की पत्नी बनेगी जिसका नाम सुनकर लोग डरते हैं?”

     

    तभी कमरे का दरवाजा खुलता है। तृप्ति की मां अंदर आती हैं। वह तृप्ति को देखकर हल्की सी मुस्कुराती हैं और उसके पास आकर बैठ जाती हैं। “बहुत खूबसूरत लग रही है मेरी बेटी।” तृप्ति तुरंत अपनी मां की तरफ देखती है। “मां, आपको सच में लगता है कि मैं खूबसूरत लग रही हूं?”

     

    मा ने कहा “हां बेटा तू खूबसूरत है तभी तो बोल रही हूं”

    तृप्ति उदास हो गई वो धीरे से कहती है “मुझे तो लग रहा है मैं ऐसी लग रही हूं जैसे किसी ने मुझे लाल रंग के पर्दे में लपेट दिया हो।”

     

    उसकी मां उसकी बात सुनकर हंस देती हैं। लेकिन अगले ही पल तृप्ति का चेहरा फिर गंभीर हो जाता है। “मां, आखिरी बार पूछ रही हूं… क्या आप पापा को रोक नहीं सकतीं?”

     

    उसकी मां चुप हो जाती हैं। तृप्ति की आंखों में बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी। “मैं शादी नहीं करना चाहती मां। मुझे पढ़ना है। मुझे अपनी पढ़ाई पूरी करनी है। मैं अपनी जिंदगी में कुछ बनना चाहती हूं।”

     

    उसकी मां धीरे से उसका हाथ पकड़ती हैं। “बेटा, तेरे पापा ने सब सोच-समझकर फैसला किया है।” तृप्ति हाथ छुड़ाते हुए कहा “लेकिन मेरी जिंदगी के बारे में फैसला करने से पहले मुझसे तो पूछ लेते।”

     

    तृप्ति की आवाज थोड़ी ऊंची हो जाती है। “मुझे उस आदमी के बारे में कुछ नहीं पता। मैंने उसे ठीक से देखा तक नहीं है। सिर्फ इसलिए शादी कर लूं क्योंकि पापा ने रिश्ता तय कर दिया?”

     

    उसकी मां कुछ बोलतीं, उससे पहले बाहर से किसी के आने की आवाज आती है। तृप्ति तुरंत चुप हो जाती है। दरवाजा खुलता है और उसके पिता नीरज जी अंदर आते हैं। तृप्ति उन्हें देखते ही मुंह दूसरी तरफ कर लेती है। उसके पिता उसके पास आकर कहते हैं, “तृप्ति, मेहमान आने शुरू हो गए हैं। कुछ देर में बारात भी पहुंचने वाली है। अब कोई तमाशा मत करना।”

     

    तृप्ति तुरंत उनकी तरफ मुड़ती है। “पापा, मैं तमाशा नहीं कर रही हूं। मैं सिर्फ अपनी जिंदगी के बारे में बोल रही हूं।”

     

    नीरज जी उसकी बात सुनकर कहते हैं “और मैं तुम्हारा पिता हूं। मुझे पता है तुम्हारे लिए क्या सही है।”

     

    तृप्ति की आंखों में आंसू आ जाते हैं। “नहीं पापा आपको पता है कि आपके लिए क्या सही है। मेरे लिए क्या सही है, मेरी जिंदगी का फैसला मुझे करने दीजिए।”

     

    उसके नीरज जी गुस्से में उसकी तरफ देखते हैं। “बहुत हो गया। आज तुम्हारी शादी है और आज के बाद तुम्हें अपने पति के घर जाना है।” तृप्ति कुछ पल उन्हें देखती रहती है।

    फिर धीरे से पूछती है, “अगर मैं शादी नहीं करना चाहूं तो?”

     

    कमरे में अचानक खामोशी छा जाती है। नीरज जी सख्त आवाज में कहते हैं, “तुम्हें शादी करनी ही होगी।” इतना कहकर वह कमरे से बाहर चले जाते हैं। दरवाजा बंद होते ही तृप्ति की आंखों से आंसू निकलने लगते हैं।

     

    उसकी मां उसे समझाने की कोशिश करती हैं, लेकिन तृप्ति कुछ नहीं बोलती। कुछ देर बाद उसकी मां भी बाहर चली जाती हैं। कमरे में अब सिर्फ तृप्ति थी। तृप्ति कुछ देर तक दरवाजे को देखती रहती है। फिर अचानक उसकी नजर खिड़की पर जाती है।

     

    उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान आती है। “शादी नहीं करनी मुझे ?” वह धीरे से कहती है। “लेकिन आप मेरी शादी करवाना चाहते हैं ना पापा तो ठीक है पापा… देखते हैं किसकी शादी करवाते हैं आप।

     

    तृप्ति जल्दी से अपनी अलमारी खोलती है। वह अपना छोटा सा बैग निकालती है और उसमें कुछ कपड़े, पैसे और अपनी जरूरी किताबें रखने लगती है। फिर वह अपनी सबसे पसंदीदा किताब हाथ में लेकर उसे बैग में रखने लगती है।

     

    कुछ देर बाद तृप्ति अपनी शादी का भारी लहंगा थोड़ा संभालती है और खिड़की से नीचे देखती है। नीचे कोई नहीं था। वह धीरे-धीरे खिड़की से बाहर निकलती है और एक पाइप के सहारे नीचे उतरने लगती है। कुछ ही देर में वह घर के पीछे पहुंच जाती है।

     

    तृप्ति अपने लहंगे को संभालते हुए दौड़ने लगती है। कुछ दूर जाकर वह रुकती है और पीछे मुड़कर अपने घर को देखती है। उसकी आंखों में आंसू थे। “माफ करना मां।” वह धीरे से कहती है। “लेकिन मैं अपनी जिंदगी किसी ऐसे इंसान के साथ नहीं बिताना चाहती जिसे मैंने देखा तक नहीं है।”

     

    फिर वह तेजी से वहां से निकल जाती है। उसे नहीं पता था कि उसकी यह छोटी सी भागने की कोशिश उसे ऐसी जगह पहुंचाने वाली थी जहां उसकी जिंदगी हमेशा के लिए बदलने वाली थी। दूसरी तरफ शर्मा हवेली में कुछ देर बाद तृप्ति की मां उसे बुलाने के लिए कमरे में आती हैं। कमरा खाली देखकर उनके होश उड़ जाते हैं। “तृप्ति?” वह पूरे कमरे में देखती हैं। “तृप्ति!” तभी उनकी नजर खुली हुई खिड़की पर जाती है।

     

    वह घबराकर बाहर देखती हैं। कुछ ही मिनटों में पूरे घर में हड़कंप मच जाता है। तृप्ति के पिता को जैसे ही पता चलता है कि तृप्ति घर से भाग गई है, उनका चेहरा गुस्से से लाल हो जाता है। वह तुरंत फोन निकालते हैं।

     

    लेकिन उसी समय एक और फोन बजता है। फोन के दूसरी तरफ से एक आदमी की आवाज आती है। “तृप्ति घर से भाग गई है।” कुछ सेकंड की खामोशी के बाद दूसरी तरफ से भारी आवाज आती है। “क्या कहा?”

     

    ” फोन पर बात करने वाला आदमी आदिल विराज राणा का खास आदमी था “तृप्ति शादी से पहले ही घर से भाग गई।

     

     

    विराज राणा। एशिया की अंधेरी दुनिया का जाना-पहचाना नाम। जिसके नाम से बड़े-बड़े लोग डरते थे। विराज ने तृप्ति से शादी करने का फैसला किया था और आज उसी से शादी थी। लेकिन तृप्ति उसके घर पहुंचने से पहले ही गायब हो चुकी थी।

     

    विराज कुर्सी पर बैठा हुआ था। उसके सामने शराब का गिलास रखा था, लेकिन इस समय उसका पूरा ध्यान फोन पर था। वह धीमी आवाज में पूछता है, “कहां गई है?”

     

    आदिल कहता है “पता नहीं सर। उसके घरवालों को भी नहीं पता।” विराज की आंखों में गुस्सा उतर आता है। “मुझे लड़की चाहिए।”

     

    आदिल कॉल पर कहता है “जी सर।”

     

    “और याद रखना… वो जितनी जल्दी मिल जाए, उतना अच्छा है।” विराज बोल कर कॉल कट कर देता है।

     

    विराज अपने सामने बैठे आदमी की तरफ देखता है।

    “मेरे आदमी पूरे शहर में भेजो।”

     

    उसका असिस्टेंट विक्रम कहता है “सर, अगर वो शहर से बाहर चली गई तो?” विराज हल्का सा मुस्कुराता है। “वो ज्यादा दूर नहीं जा सकती।”

     

    फिर उसकी आवाज सख्त हो जाती है। “लेकिन अगर किसी ने उसे मुझसे पहले ढूंढ लिया… तो उसे जिंदा मत छोड़ना।”

    उधर तृप्ति को कुछ भी पता नहीं था कि उसके पीछे कितने लोग लग चुके हैं।

     

    वह अपनी भारी शादी की ड्रेस संभालते हुए सड़क पर भाग रही थी। कुछ दूर जाकर उसे एक सुनसान सड़क दिखाई दी।

    वह थककर वहां खड़ी हो गई। “हे भगवान… शादी से भागना इतना मुश्किल होता है, ये आज पता चला।”

     

    वह हांफते हुए कहती है। तभी दूर से एक काली गाड़ी तेजी से उसकी तरफ आती दिखाई देती है। तृप्ति पहले तो सामान्य समझकर खड़ी रहती है। लेकिन जैसे ही गाड़ी उसके पास आकर रुकती है, उसके अंदर डर की लहर दौड़ जाती है।

     

    गाड़ी से दो आदमी नीचे उतरते हैं। एक आदमी तृप्ति की तरफ देखकर कहता है, “यही है।” तृप्ति का चेहरा सफेद पड़ जाता है।ब“कौन…?”

     

    वह पीछे हटती है। दूसरा आदमी आगे बढ़ता है। “चलो हमारे साथ।” तृप्ति तुरंत समझ जाती है कि ये लोग उसके घर से नहीं आए हैं। वह पीछे मुड़कर दौड़ पड़ती है। “अरे पकड़ो इसे!”

     

    दोनों आदमी उसके पीछे भागते हैं। तृप्ति अपनी पूरी ताकत से दौड़ रही थी। भारी लहंगा उसके पैरों में बार-बार फंस रहा था। वह पीछे मुड़कर देखती है।

     

    दोनों आदमी उसके बिल्कुल पीछे थे। “हे भगवान! आज तो शादी से बचने के चक्कर में जान से ही जाऊंगी!” वह दौड़ते हुए चिल्लाती है।

     

    सामने सड़क दो हिस्सों में बंट रही थी। तृप्ति बिना सोचे दाईं तरफ मुड़ जाती है। कुछ दूर जाने के बाद उसे सामने एक बहुत बड़ा काला गेट दिखाई देता है। गेट के दोनों तरफ हथियार लिए सिक्योरिटी गार्ड खड़े थे।

     

    तृप्ति एक पल के लिए रुकती है। फिर पीछे देखती है। वे आदमी अब भी उसका पीछा कर रहे थे। तृप्ति बिना कुछ सोचे उस बड़े गेट की तरफ भागती है। “बचाओ!” वह चिल्लाती हुई गेट के अंदर घुस जाती है।

     

    गार्ड उसे रोकने के लिए आगे बढ़ते हैं। तृप्ति हाथ जोड़कर कहती है, “प्लीज मुझे मत रोकिए! मेरे पीछे बहुत बुरे लोग पड़े हैं।” गार्ड एक-दूसरे का चेहरा देखने लगते हैं।

     

    तभी ऊपर खड़ी बालकनी में एक आदमी आकर रुकता है।

     

    काले कपड़े, गंभीर चेहरा और आंखों में ऐसी खामोशी कि सामने वाला खुद डर जाए। वह नीचे खड़ी दुल्हन को देखता है। उसकी नजर तृप्ति पर टिक जाती है। और उसी पल तृप्ति की नजर भी ऊपर उठती है। दोनों की पहली नजर एक-दूसरे से मिलती है।

    तृप्ति को नहीं पता था कि वह किसके घर में घुस चुकी है।

    लेकिन जिस आदमी के सामने पूरी दुनिया सिर झुकाती थी…

    उसकी जिंदगी में आज पहली बार कोई लड़की खुद भागकर उसके घर आई थी। और वो लड़की थी तृप्ति शर्मा।

     

    दोस्तो आपको क्या लगता है तृप्ति किसके घर घुस गई है क्या वो विराज के घर घुस गई है जिसे शादी करने से बचने के लिए भागी थी या कोई और है चलिए जानते हैं आगे।

     

     

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    Lakshmi Kumari

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  • श्री कृष्ण का अवतरण

    श्री कृष्ण का अवतरण

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    Part 5 वो रात जब कान्हा आए 🌙

     

    मथुरा की उस रात में कुछ तो अलग था।

     

    आसमान पर काले बादल इस तरह छाए हुए थे, जैसे पूरी धरती को अपने भीतर समेट लेना चाहते हों। चारों ओर घना अंधकार था। तेज हवाएँ महल की ऊँची दीवारों से टकराकर एक अजीब-सी आवाज पैदा कर रही थीं। यमुना भी जैसे उस रात शांत नहीं थी। उसकी लहरें बार-बार किनारों से टकरा रही थीं।

     

    मथुरा के राजमहल में सब कुछ सामान्य दिखाई दे रहा था, लेकिन उसी महल की एक अंधेरी कोठरी में एक माँ अपने आठवें बच्चे के जन्म की प्रतीक्षा कर रही थी।

     

    वह थीं—देवकी।

    और उनके पास बैठे वसुदेव बार-बार अपनी पत्नी को देखते, फिर उस भारी लोहे के द्वार की ओर देखते, जिसके बाहर कंस के सैनिक पहरा दे रहे थे।

     

    छह बच्चों को अपनी आँखों के सामने खोने के बाद देवकी के भीतर अब भय से भी बड़ी एक थकान थी।

     

    सातवाँ गर्भ भी उनसे छीन लिया गया था, लेकिन उन्हें क्या पता था कि वह बालक रोहिणी की गोद में पल रहा है।

     

    और अब… उनका आठवाँ पुत्र जन्म लेने वाला था।

     

    वही आठवाँ पुत्र, जिसके जन्म से कंस भयभीत था।

     

    कंस ने जिस भविष्यवाणी को मिटाने के लिए वर्षों से निर्दोष बच्चों का रक्त बहाया था, आज उसी भविष्यवाणी का समय निकट आ चुका था।

     

    देवकी ने पीड़ा से आँखें बंद कर लीं। वसुदेव ने उनका हाथ थाम लिया।

     

    उनके पास अपनी पत्नी को दिलासा देने के लिए शब्द नहीं थे। जिस बच्चे के आने की खुशी होनी चाहिए थी, उसके जन्म के साथ मृत्यु का भय खड़ा था।

     

    देवकी के चेहरे पर आँसू थे, लेकिन उन आँसुओं में केवल डर नहीं था एक माँ की ममता भी थी।

     

    वह जानती थीं कि कंस इस बच्चे को भी नहीं छोड़ेगा।

    फिर भी उनके भीतर कहीं एक विश्वास था… शायद इस बार कुछ अलग होगा।

     

    रात गहरी होती चली गई। और फिर आधी रात के समय अचानक उस कारागार में एक अद्भुत प्रकाश फैल गया।

     

    जिस कोठरी में अब तक अंधकार था, वहाँ दिव्य आभा छा गई।

     

    देवकी ने आँखें खोलीं, उनके सामने एक अद्भुत बालक था।

    श्याम वर्ण, कमल जैसे नेत्र। मुख पर ऐसी शांति, जैसी संसार के किसी सामान्य शिशु के चेहरे पर नहीं हो सकती थी।

     

    उसके जन्म के साथ ही जैसे पूरी प्रकृति कुछ क्षणों के लिए ठहर गई।

     

    वसुदेव उस बालक को देखते ही भाव-विभोर हो गए।

    उनके भीतर पिता का प्रेम उमड़ आया, लेकिन उसी के साथ उन्हें वह भविष्यवाणी भी याद थी , यह कोई साधारण बालक नहीं था।

     

    यह वही था, जिसके लिए देवकी ने इतने दुख सहे थे, जिसके लिए वसुदेव ने अपनी असहायता का हर क्षण जिया था।

     

    देवकी ने अपने पुत्र को अपनी बाँहों में भर लिया, उस क्षण उनके चेहरे पर वर्षों बाद ऐसी शांति दिखाई दी, जैसे उनके सारे दुखों को उस छोटे-से चेहरे ने अपने भीतर समेट लिया हो।

     

    उनकी आँखों से आँसू बहते रहे, लेकिन इस बार वे आँसू दुख के नहीं थे।

     

    वे माँ बनने की पूर्णता के आँसू थे।

    कुछ ही क्षणों बाद दिव्य बालक ने अपने माता-पिता को अपने वास्तविक स्वरूप का दर्शन कराया।

     

    देवकी और वसुदेव समझ गए कि उनके सामने स्वयं नारायण हैं।

    लेकिन भगवान का उद्देश्य केवल दर्शन देना नहीं था।

     

    उन्हें गोकुल जाना था। वहीं नंद और यशोदा के घर जन्मी कन्या को लेकर मथुरा लौटना था।

     

    वसुदेव ने जैसे ही अपने पुत्र को उठाने के लिए हाथ बढ़ाया, उसी क्षण कारागार के सारे बंधन टूट गए।

    लोहे की भारी बेड़ियाँ उनके पैरों से अलग हो गईं।

     

    द्वार अपने आप खुल गए। बाहर पहरा दे रहे सैनिक गहरी नींद में सो गए।

    वसुदेव कुछ पल उस खुले द्वार को देखते रहे।

    जिस कारागार से निकलना असंभव था, आज वही उनके लिए मार्ग बन चुका था।

     

    उन्होंने बालक को एक टोकरी में रखा और उसे अपने सिर पर उठा लिया।

     

    देवकी की आँखें अपने पुत्र पर टिकी थीं।

     

    एक माँ के लिए अपने नवजात बच्चे को किसी और के हाथों सौंप देना कितना कठिन होता है, यह केवल वही जान सकती थी।

     

    देवकी जानती थीं कि यह विदाई आवश्यक है।

    फिर भी उनका मन बार-बार कह रहा था, बस एक बार और उसे अपनी बाँहों में भर लूँ।

     

    वसुदेव ने उन्हें आश्वासन भरी दृष्टि से देखा। फिर वह भारी मन से बाहर निकल पड़े। कारागार के बाहर मथुरा सो रही थी।

     

    लेकिन प्रकृति जाग रही थी। बारिश तेज हो चुकी थी।

    वसुदेव बालक को सिर पर उठाए यमुना की ओर बढ़ते रहे।

    हर कदम के साथ पानी बढ़ता जा रहा था। यमुना अपने पूरे उफान पर थी।

    एक ओर नवजात शिशु। दूसरी ओर गहरी नदी।

    और पीछे कंस का भय। लेकिन वसुदेव के कदम नहीं रुके।

     

    वह पानी में उतर गए। धीरे-धीरे पानी उनके घुटनों तक पहुँचा।

    फिर कमर तक। फिर और ऊपर।

    वसुदेव अपने बच्चे को दोनों हाथों से संभाले हुए आगे बढ़ते रहे।

    उनकी चिंता अपने लिए नहीं थी। उनकी आँखों में केवल एक डर था, कहीं उनके नवजात शिशु को कुछ हो न जाए।

     

    उसी समय आकाश में बिजली चमकी, बारिश और तेज हो गई।

    तभी एक अद्भुत घटना हुई। शेषनाग ने अपना विशाल फन फैलाकर बालक के ऊपर छत्र बना दिया।

    तेज बारिश अब उस दिव्य शिशु को छू भी नहीं पा रही थी।

     

    वसुदेव ने एक पल ऊपर देखा। उनके भीतर श्रद्धा और आश्चर्य एक साथ उमड़ पड़े।

    मानो स्वयं प्रकृति उस बालक की रक्षा कर रही हो।

    और तभी यमुना का जल धीरे-धीरे शांत होने लगा।

     

    वसुदेव आगे बढ़ते गए। कुछ ही समय बाद वह नदी पार कर गोकुल की सीमा तक पहुँच गए।

     

    गोकुल उस समय गहरी नींद में था। नंद भवन में भी सब शांत था।

    यशोदा प्रसव के बाद अचेत अवस्था में थीं। वसुदेव धीरे से भीतर पहुँचे।

     

    उन्होंने देखा, यशोदा के पास एक नवजात कन्या थी।

    वसुदेव का हृदय भारी हो गया। उन्होंने अपने पुत्र को अंतिम बार देखा।

    वह छोटा-सा श्याम चेहरा… शांत आँखें… और वह मासूम मुस्कान…

    वसुदेव के हाथ काँप उठे।

     

    जिस पुत्र को पाने के लिए उन्होंने वर्षों तक प्रतीक्षा की थी, उसे अपनी आँखों से दूर करना पड़ रहा था।

    लेकिन यह संसार के कल्याण का मार्ग था।

     

    उन्होंने कान्हा को धीरे से यशोदा के पास सुला दियाऔर वहाँ से उस कन्या को उठाकर वापस मथुरा की ओर चल पड़े।

     

    कुछ ही देर बाद वह फिर उसी कारागार में पहुँच गए।

     

    जैसे ही उन्होंने कन्या को देवकी के पास रखा, कारागार के द्वार अपने आप बंद हो गए।

     

    बेड़ियाँ फिर से उनके पैरों में पड़ गईं, सैनिकों की नींद टूट गई और नवजात कन्या के रोने की आवाज पूरे कारागार में गूँज उठी।

     

    उस रोने की आवाज सुनकर कंस को खबर दी गई, कंस दौड़ता हुआ कारागार में पहुँचा, उसके चेहरे पर भय साफ दिखाई दे रहा था।

     

    वह जिस आठवें पुत्र से डरता था, उसके जन्म की खबर मिल चुकी थी।

     

    लेकिन जब उसने देखा कि देवकी की गोद में पुत्र नहीं, बल्कि एक कन्या है, तो उसके भीतर का भय कुछ क्षणों के लिए उलझन में बदल गया।

     

    फिर भी उसका क्रूर मन नहीं बदला, वह उस बच्ची को उठाने के लिए आगे बढ़ा।

     

    देवकी ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की।

     

    एक माँ अपने बच्चे के लिए पहली बार नहीं, बल्कि आठवीं बार मृत्यु के सामने खड़ी थी।

     

    लेकिन तभी वह कन्या कंस के हाथों से छूटकर आकाश में प्रकट हो गई। दिव्य प्रकाश से पूरा कारागार भर गया।

     

    कंस भय से पीछे हट गया, उसे समझ आ गया, जिससे वह डर रहा था… वह जन्म ले चुका है।

     

    और मथुरा से बहुत दूर, गोकुल में, उसी समय एक नन्हा श्याम बालक अपनी नई माँ की गोद में सो रहा था। बाहर बारिश अब भी हो रही थी।

    लेकिन गोकुल की उस रात में जैसे एक नई सुबह जन्म ले चुकी थी।

     

    यशोदा को अभी पता नहीं था कि उनकी गोद में कौन आया है।

    नंद को अभी पता नहीं था कि उनके घर कौन-सा अतिथि आया है।

     

    गोकुल को अभी पता नहीं था कि उसका कान्हा कौन है।

    लेकिन उस रात से संसार की दिशा बदल चुकी थी। एक कारागार में जन्मा बालक… एक माँ की गोद से दूसरी माँ की गोद तक पहुँचा था।

     

    • और शायद यही भगवान की लीला थी, जिसे संसार ने देवकी का पुत्र समझकर खोजा…

     

    वह यशोदा का कान्हा बनकर पूरे गोकुल के हृदय में बस गया।

     

    समाप्त 

    आगे और कहानियां आती रहेगी।

    प्रेम से कहिए 

    🌺 राधे राधे 🌺

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • No love clause

    No love clause

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    Part 5 

    No love clause 

     

    अग्नि हँस पड़ा। लेकिन उसकी हँसी में खुशी नहीं थी। “ये कोई जवाब नहीं है।”

     

    विक्रम जी चुप रहे। अग्नि ने आगे झुककर कहा,

    “आप जानते हैं कि मैं शादी क्यों नहीं करना चाहता।”

     

    विक्रम जी की आँखों में एक पल के लिए पुराना दर्द उभरा। “जानता हूँ।”

     

    “तो फिर?” अग्नि की आवाज़ थोड़ी ऊँची हो गई।

    “मैंने अपने माता-पिता का रिश्ता अपनी आँखों के सामने टूटते देखा है। मैंने देखा है कि एक शादी किस तरह दो लोगों को एक-दूसरे का दुश्मन बना सकती है। मैंने अपनी माँ को हर रात रोते देखा है।”

     

    विक्रम जी की आँखें झुक गईं। अग्नि ने गहरी साँस ली।

    “और अब आप चाहते हैं कि मैं भी वही गलती करूँ? मैं किसी लड़की की जिंदगी बर्बाद नहीं करना चाहता।”

    कुछ पल तक विक्रम जी उसे देखते रहे।

     

    फिर उन्होंने बहुत धीमे स्वर में कहा, “तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि तुम अपने बाप की तरह खुदगर्ज निकलोगे।”

     

    अग्नि ने तुरंत जवाब दिया, “ क्योंकि मेरी रगो में उस आदमी का खून दौड़ रहा है दादा जी।”

     

    “नहीं! अग्नि!” विक्रम जी के शब्द सख्त थे, “ तुम्हारी रगो में जितना मेरे बेटे का खून है उतना ही तुम्हारी मां मेरी बहू का भी है। और हमारे दिए हुए संस्कार हैं। इसलिए मुझे पूरा यकीन है तुम एक बेहतर जीवन साथी बनोगे।”

     

    अग्नि बोला, “लेकिन दादा जी ये शादी मेरे लिए एक जिम्मेदारी होगी। और मैं वो जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं हूँ।”

     

    विक्रम जी की आँखों में हल्की-सी मुस्कान आई। “फिर भी शादी करोगे?”

     

    अग्नि कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “आपकी शर्त है। आपके पास मुझे मजबूर करने की वजह है। तो ठीक है… मैं शादी करूँगा।”

     

    विक्रम जी ने राहत की साँस ली। लेकिन अग्नि ने तुरंत अपनी बात पूरी की। “मगर मेरी शर्त पर।”

     

    विक्रम जी ने सिर उठाया। “लड़की मैं खुद चुनूँगा और आप उस लड़की के बारे में कोई सवाल नहीं करेंगे।”

     

    विक्रम जी ने कुछ क्षण उसे देखा। फिर बोले, “मंजूर है।”

     

    अग्नि को उनके इतनी आसानी से मान जाने पर थोड़ी हैरानी हुई। “बस?”

     

    विक्रम जी हल्की मुस्कान के साथ, “बस।”

     

    अग्नि, “आपको कोई आपत्ति नहीं होगी?”

     

    विक्रम जी “नहीं।”

     

    अग्नि हैरानी से, “चाहे लड़की कोई भी हो?”

     

    विक्रम जी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “बस वो लड़की तुम्हें इंसान बनाना जानती हो।”

     

    अग्नि की भौंहें सिकुड़ गईं। “मैं कोई बिगड़ा हुआ बच्चा नहीं हूँ।”

     

    विक्रम जी हँस पड़े। “ये बात अपनी माँ को जाकर बताना।”

     

    अग्नि का चेहरा तुरंत बदल गया। उसके चेहरे पर आई हल्की नरमी एक पल में गायब हो गई। “मुझे उनके बारे में बात नहीं करनी।”

     

    विक्रम जी समझ गए। उन्होंने विषय बदल दिया। “ठीक है।”

     

    फिर कुछ पल बाद बोले, “लेकिन एक बात याद रखना।”

    अग्नि ने उनकी तरफ देखा। “तुम्हारे पास बहुत कम समय है।”

     

    अग्नि “मैं जानता हूँ।”

     

    “नहीं…” विक्रम जी ने गंभीरता से कहा, “तुम जितना समझ रहे हो, उससे भी कम।”

     

    अग्नि कुछ पल उन्हें देखता रहा। “आप आखिर कहना क्या चाहते हैं?”

     

    विक्रम जी ने सीधे कोई जवाब नहीं दिया।

    बस इतना कहा, “समय आने पर सब समझ जाओगे।”

     

    अग्नि को उनका जवाब बिल्कुल पसंद नहीं आया।

    वह कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। “ठीक है।”

     

    उसने फाइल मेज पर रखी। “मैं शादी करूँगा।”

     

    फिर उसने विक्रम जी की आँखों में देखते हुए कहा,

    “लेकिन लड़की मैं खुद चुनूँगा।”

     

    विक्रम जी ने सिर हिला दिया। “जैसी तुम्हारी मर्जी।”

     

    अग्नि दरवाजे की तरफ बढ़ा। लेकिन कुछ कदम चलने के बाद रुक गया। उसने पीछे मुड़कर अपने दादा जी को देखा। “दादा जी…”

     

    विक्रम जी, “हूँ?”

     

    अग्नि, “अगर मैं शादी कर भी लूँ…” वह कुछ पल रुका।

    “तो इसका मतलब ये नहीं कि मैं इस घर का हिस्सा बन जाऊँगा।”

     

    विक्रम जी के चेहरे पर हल्की उदासी छा गई। “मुझे पता है।”

     

    अग्नि ने कुछ नहीं कहा। वह दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया। दरवाजा बंद होते ही विक्रम जी अपनी कुर्सी पर पीछे टिक गए।

    उनकी नजर सामने लगी उसी पुरानी तस्वीर पर चली गई।

     

    छोटा-सा अग्नि… उनकी उंगली पकड़े मुस्कुरा रहा था।

    विक्रम जी की आँखों में नमी उतर आई।

    उन्होंने तस्वीर की तरफ देखते हुए बहुत धीमे स्वर में कहा, “तू चाहे जितना दूर भाग ले अग्नि… लेकिन इस बार मैं तुझे अकेला नहीं छोड़ूँगा।”

     

    नीचे… अग्नि सीढ़ियाँ उतरकर हॉल में आया।

    अब वहाँ पहले जैसे भीड़ भाड़ नहीं थी।

    अग्नि ने एक नजर सिटिंग एरिया पर डाली फिर सीधे बाहर की तरफ कदम बढ़ा दिए।

     

    जैसे ही सविता जी की नजर उस पर पड़ी, उनके चेहरे पर उम्मीद जाग गई।

     

    अग्नि सीधे मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा।

    “अग्नि…”

     

    सविता जी की आवाज़ सुनकर उसके कदम रुक गए।

    उसने धीरे से पीछे मुड़कर देखा। सविता जी उसकी तरफ ही आ रही थी। 

     

    उनकी आँखों में एक अजीब-सी उम्मीद थी। “इतने समय बाद तुम यहाँ आए हो…” उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “कम से कम कुछ देर रुककर तो जा सकते हो।”

     

    अग्नि कुछ पल उन्हें देखता रहा। फिर बोला,

    “माँ… आप जानती हैं मुझे यहाँ आना बिल्कुल पसंद नहीं।”

     

    सविता जी की आँखों की चमक थोड़ी कम हो गई, उन्होंने बस सिर हिला दिया, “अगर आप मुझसे मिलना ही चाहती हैं तो मेरे विला आ सकती हैं।”

     

    अग्नि ने बेहद सामान्य स्वर में कहा, “वो घर भी आपका ही है।”

     

    सविता जी के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई। “कुछ ही देर में डिनर का टाइम होने वाला है।”

    उन्होंने उम्मीद भरी नजरों से उसे देखा। “कम से कम डिनर करके जाना।”

     

    अग्नि ने तुरंत कहा, “नहीं।”

     

    सिर्फ़ एक शब्द। फिर वह मुड़ गया। 

     

    “अग्नि…” इस बार उसकी माँ की आवाज़ और धीमी थी।

     

    लेकिन वह नहीं रुका। कुछ ही पलों में मुख्य दरवाजा बंद हो गया। सविता जी वहीं खड़ी रह गईं।

    उनकी आँखों से एक आँसू निकलकर गाल पर आ गया। उन्होंने तुरंत पल्लू से उसे पोंछ लिया।

     

    लेकिन तभी पीछे से सुमित्रा की आवाज़ आई। “कितनी बेकार किस्मत है ना दीदी आपकी।”

     

    सविता जी ने पीछे मुड़कर देखा।।सुमित्रा के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी। “आपको ना पति का प्यार मिला…” वह थोड़ा रुकी। “और ना ही बेटे का।”

     

    सविता जी ने कुछ नहीं कहा। सुमित्रा उनके करीब आई। “इतने साल हो गए, लेकिन अग्नि आज भी आपको माफ नहीं कर पाया।”

     

    सविता जी ने धीमे स्वर में कहा, “वो मुझे माफ करे या ना करे…” उन्होंने दरवाजे की तरफ देखा। “मैं उसकी माँ हूँ। और माँ अपने बच्चे से उम्मीद करना नहीं छोड़ती।”

     

    सुमित्रा के चेहरे पर एक पल के लिए चुप्पी छा गई।

    लेकिन सविता जी की आँखों में उस वक्त सिर्फ़ दर्द नहीं था। 

     

    वहाँ उम्मीद भी थी। बहुत पुरानी… बहुत गहरी… और शायद उतनी ही मजबूत। उधर… राजावत मेंशन से बाहर निकलते ही अग्नि अपनी कार में बैठ गया।

     

    ड्राइवर ने पूछा, “सर, विला?”

     

    अग्नि ने कुछ नहीं कहा। उसकी नजर सामने सड़क पर थी। लेकिन उसके दिमाग में सिर्फ़

    एक ही बात घूम रही थी… शादी।

    कहानी आगे जारी रहेगी।

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • अधूरी इबादत भाग~52

    अधूरी इबादत भाग~52

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~52 गुलाब जैसा केक

    रूहानी धीरे-धीरे डाइनिंग टेबल की ओर बढ़ी, उसके बाल अभी तक भीगे थे, जैसे उसके भीतर की हलचल अब भी सिमटी हो आँखों के कोनों में। 

    अद्वैत टेबल के पास बैठा था, उसकी आँखों में नींद का कोई नामोनिशान नहीं था, बस एक अजीब सी बेचैनी जो किसी अनकहे इंतज़ार को ओढ़े हुए थी।

    “गुड मॉर्निंग…” उसने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा।

    “गुड मॉर्निंग,” रूहानी ने जवाब दिया, अपनी नज़र उसके चेहरे पर टिकाए रखी। उसने अपना पर्स कुर्सी पर रखा और पूछा, “मीना दिखाई नहीं दे रही?”

    अद्वैत ने अपनी कुहनी टेबल पर टिकाई और गर्दन हल्की सी झुकाकर कहा, “थोड़ी देर पहले ही गई है… अपना काम खत्म करके।”

    रूहानी की आवाज़ में अचानक एक संकोच की परत उभर आई, “उसे ये तो पता था न कि मैं नीचे वाले कमरे में अकेली थी… और तुम….”

    अद्वैत ने उसकी बात बीच में ही थाम ली, उसकी आँखों में एक सच्ची सी तसल्ली थी, “घबराओ मत… मैं मीना के आने से पहले ही जाग गया था। और उसे कह दिया है कि नीचे वाला कमरा और first floor पर मेरा कमरा और स्टडी रूम छोड़कर बाकी सब साफ कर ले। काम आसान रहेगा उसका।”

    उसकी आवाज़ में कोई दावा नहीं था, कोई बचाव नहीं… बस एक खामोश समझ थी, जैसे वो उसकी उलझन को बिना कहे समझ गया हो।

    फिर बिना किसी और शब्द के, वो उठा और किचन की ओर गया। कुछ पल बाद वो एक प्लेट में गरम-गरम चॉकलेट लावा केक लेकर आया… उसकी खुशबू हवा में जैसे किसी भूली हुई याद की तरह घुल गई।

    उसने केक रूहानी के सामने रख दिया, उसकी आँखों में कुछ चमक जैसी थी, वह dining chair पर बैठते हुए बोला, “टेस्ट तो करो… बताओ कैसा बना है?”

    रूहानी कुछ पल उसे देखती रही, उसके शब्दों से ज़्यादा उसकी चुप्पी ने उसे छुआ। जैसे हर परत उस लावा केक की तरह थी, बाहर से सलीकेदार, अंदर से पिघली हुई। 

    रूहानी की नज़रें उस गुलाब की पंखुड़ियों जैसे सजे हुए केक पर टिकी थीं। जैसे हर क्रीम की परत में कोई भूला हुआ एहसास दफ़न था। उसकी साँसें हल्की-हल्की तेज़ हो रही थीं, और आँखें नमी से भरने लगी थीं। उस शांत कमरे में अचानक बहुत कुछ बोलता हुआ सा लग रहा था।

    अद्वैत ने जब देखा कि रूहानी एकटक उस केक को देखे जा रही है, उसके होठ ज़रा भी नहीं हिले, बस पलकों की कोर हल्की सी चमक रही थी, वो समझ गया, ये स्वाद भर का मामला नहीं, ये यादों का कोई भारी झोंका है।

    वो उसके पास जाकर धीरे से उसकी आँखों के सामने उँगलियाँ चटकाया, “कहाँ खो गई हो?”

    रूहानी चौंक सी गई, जैसे किसी पुराने ख्वाब से अचानक बाहर आई हो। “कहीं नहीं… बस… ये केक गुलाब के फूल जैसा क्यों है?”

    अद्वैत कुछ याद करते हुए मुस्कुराया, “ये मेरी माँ का signature style है। जब भी कोई खुशी का पल होता था तो मां जरूर बनाती थी… खैर….. तुम taste तो करो।”

    उसने धीरे से केक काटा और एक छोटा सा टुकड़ा उसकी प्लेट में रख दिया। रूहानी ने उस टुकड़े को चम्मच से उठाया और जैसे ही मुँह में डाला… उसकी पलके अपने आप बंद हो गईं। 

    स्वाद जैसे उसके भीतर किसी भूले हुए आलिंगन की तरह समा गया हो। और फिर… एक गर्म आँसू पलकों से निकलकर गाल पर बह निकला।

    उसे याद आया… उसके पापा का घर, जहाँ बेटी को मीठा और चॉकलेट खाते वक्त भी टोकी जाती थीं। और यहाँ… एक अनजान घर में, बिना कोई रोक, बिना कोई सवाल, ये मीठा जैसे उसके पूरे अस्तित्व को चुपचाप गले लगा रहा था।

    अद्वैत ने तुरंत पानी का गिलास उसकी तरफ बढ़ाया, “क्या हुआ? अच्छा नहीं बना क्या? मीठा कम हो गया या… कुछ ज़्यादा ही कड़वा?”

    रूहानी ने थोड़ा पानी पीते हुए धीमे स्वर में कहा, “नहीं, बहुत अच्छा बना है… तुम्हारी माँ को भी यही पसंद था?”

    अद्वैत की आँखें हल्का सा धुंधला गईं, “मुझे उतना ठीक से याद नहीं… पर जब भी मैं कुछ अचीव करता था, माँ यही केक बनाती थीं… कहती थीं जीत का स्वाद ज़ुबान से पहले दिल में जाना चाहिए।”

    रूहानी हल्के से मुस्कुराई, लेकिन आँखों में एक टीस सी उतर आई, “लेकिन आज तो कोई खुशी का दिन नहीं… आज तो तुम्हारी माँ की बरसी…..”

    उसकी आवाज़ टूट गई। वाक्य अधूरा रह गया।

    और उसी पल, उसकी जेब में रखा मोबाइल काँपने लगा।

    रूहानी ने कॉल उठाया और अपनी वो मासूम, चुलबुली आवाज़ जिसमें हर बार एक नया रंग भरता था, गुनगुनाने लगी, “हैप्पी बर्थडे टू यू… हैप्पी बर्थडे टू यू… माय लवली ब्रदर यशवर्धन…” वो सुर में नहीं थी, फिर भी दिल से थी।

    फोन की दूसरी तरफ यश की आवाज़ आई, थोड़ी नखरे से भरी हुई, “मैं आपसे बहुत नाराज़ हूं दीदी, आपने इस बार मुझे सबसे पहले विश नहीं किया।”

    रूहानी का चेहरा एकदम से उतर गया, जैसे सच में गलती कर दी हो। उसने एक हाथ से कान पकड़कर बोला, “सॉरी यशु… अपनी दीदी को माफ कर दो इस बार, अब से कभी ऐसा नहीं होगा। सच में भूल गई थी… पर अब नहीं भूलूंगी, वादा।”

    वो मुस्कुरा रही थी और मुस्कराहट उसके गालों से झलक रही थी। पर उसे एहसास नहीं था कि उसके सामने बैठा अद्वैत बड़ी देर से उसे ऐसे देख रहा था…. उसकी आंखों में राहत का एक साया था कि रूहानी के चेहरे पर छाई मुस्कुराहट की वजह आखिरकार वो था।

    यश ने कॉल पर ही कहा, “मैंने आपका इंस्टा पोस्ट देखा था… आपके कमबैक के लिए… congratulations didi.”

    रूहानी ने थोड़ी भावुकता में कहा, “Thank you so much Yash.”

    फिर यश की आवाज़ हल्की शरारत से भरी हुई आई, “जीजू हैं आपके बगल में?”

    रूहानी ने एक पल को अद्वैत की ओर देखा, उसने पलके झपकीं और धीमे से कहा, “हां… यहीं हैं।”

    “उन्हें दीजिए ना… उन्हें तो मालूम भी नहीं होगा, आप ही को याद नहीं था तो…” यश ने छेड़ते हुए कहा।

    रूहानी हँसी और बोली, “ठीक है, देती हूं।”

    अद्वैत ने मोबाइल हाथ में लिया और आवाज़ में वही ठहराव रखा जो उसकी आदत बन चुका था, “Happy birthday champ. So, what’s the plan for today?”

    यश ने कहा, “thank you जीजू, अभी तो कोचिंग आया हूं। मम्मी-पापा ने कहा है पढ़ाई पर फोकस करो, 10वीं का बोर्ड है ना इस बार। लेकिन फिर भी छोटी सी पार्टी तो रखी है… और… मैं पूछना चाहता हूं दीदी से… लेकिन मम्मी-पापा के कारण पूछ नहीं पा रहा कि वो आएगी या नहीं।”

    अद्वैत ने मुस्कराकर कहा, “ठीक है, मैं बात करता हूं उससे।”

    कॉल कटते ही सन्नाटा सा छा गया। 

    रूहानी अब टेबल के किनारे रखे केक को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर धीरे-धीरे खा रही थी। उसके चेहरे पर नज़ाकत थी… लेकिन कहीं गहराई में एक हिचक भी छिपी थी।

    अद्वैत कुछ देर तक उसे देखता रहा, फिर उसी नरम आवाज़ में बोला, “है तो आज खुशी का दिन… क्या तुम जाना चाहती हो यश से मिलने?”

    रूहानी के चम्मच की चाल एक पल को रुक गई… उसने अद्वैत को देखा और सोच में पड़ गई।

    ———-

    क्या रूहानी के चेहरे पर फैली वो मुस्कान सिर्फ यश की मासूमियत के लिए थी… या किसी बीती टीस को छिपाने की आख़िरी कोशिश?

    और अद्वैत की आँखों में जो ठहराव था, क्या वो वाक़ई सुकून था… या किसी इंतज़ार की थकी हुई चुप्पी?

    क्या ये सिर्फ एक सुबह थी… या किसी अधूरी कहानी की शुरुआत फिर से हो रही थी?

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    Soul_writer

    लिखकर रूह छूने की कोशिश….. 🥹🥹

  • Bound by fate

    Bound by fate

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग 2

    राधे राधे दोस्तों ❤️

     

    ✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️

     

     

    करीब एक घंटे बाद…

     

    गाड़ी एक बड़े और आलीशान विला के सामने आकर रुकी।

     

    गाड़ी की हेडलाइट पड़ते ही सामने खड़ा गार्ड तुरंत चौकन्ना हो गया और उसने विला का बड़ा-सा गेट खोल दिया।

     

    गाड़ी अंदर दाखिल हुई और कुछ ही सेकंड बाद पोर्च में जाकर रुक गई। बारिश अब भी तेज थी। ड्राइवर तुरंत बाहर निकला और उसने पिछली सीट का दरवाजा खोला।

     

    रूद्रांश गाड़ी से बाहर आया। उसकी नजर लड़की पर गई। वह अब भी बेहोश थी। चेहरा हल्का पीला पड़ चुका था। होंठ सूख गए थे और भीगे हुए कपड़े उसके शरीर से चिपके हुए थे।

     

    रूद्रांश ने बिना कुछ सोचे उसे अपनी बाहों में उठा लिया।

     

    तभी पास खड़े एक नौकर ने हैरानी से पूछा, “सर… ये कौन हैं?” क्योंकि आजतक कभी किसी ने रुद्रांश के साथ किसी लड़की को नहीं देखा था। 

     

    रूद्रांश ने उसकी तरफ घूरकर देखा। “फालतू सवाल मत पूछो। जल्दी जाकर दरवाजा खोलो।”

     

    नौकर तुरंत दरवाजा खोलकर एक तरफ हट गया। रूद्रांश लड़की को लेकर अंदर चला गया। विला अंदर से बेहद शानदार था।

     

    ऊंची छतों से लटकते खूबसूरत झूमर, सफेद संगमरमर की चमचमाती फर्श, दीवारों पर लगी महंगी पेंटिंग्स और सलीके से सजाया गया विशाल हॉल…

     

    हर चीज रूद्रांश की हैसियत की कहानी बयां कर रही थी। 

    लेकिन इस वक्त उसे इनमें से किसी चीज की परवाह नहीं थी।

     

    वह सीधे सीढ़ियों से ऊपर गया और एक कमरे का दरवाजा खोलकर लड़की को बेड पर लिटा दिया। पीछे आया नौकर दरवाजे पर ही रुक गया। “साहब… डॉक्टर को बुला दूं?”

     

    रूद्रांश ने लड़की की तरफ देखते हुए कहा, “हां। और जल्दी।”

     

    “जी, साहब।” नौकर तुरंत वहां से चला गया।

     

    कमरे में अब सिर्फ रूद्रांश और वो अनजान लड़की थे। रूद्रांश कुछ पल तक उसे देखता रहा।

     

    उसने अपने गीले बालों पर हाथ फेरा और फिर अपना जैकेट उतारकर पास रखी कुर्सी पर डाल दिया।

     

    उसकी नजर लड़की के चेहरे पर टिक गई। “तुम आखिर हो कौन?”

     

    उसने धीमे से कहा। लेकिन सामने लेटी उस लड़की के पास उसके सवाल का कोई जवाब नहीं था।

     

    या शायद… उस जवाब तक पहुंचने के लिए रूद्रांश को उसकी जिंदगी के कई बंद दरवाजे खोलने पड़ने वाले थे।

     

    और उसे अभी ये अंदाजा भी नहीं था कि जिस लड़की को वह आज रात सिर्फ इंसानियत के नाते अपने घर लेकर आया है… वही लड़की बहुत जल्द उसकी पूरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत…

     

    और सबसे दर्दनाक हिस्सा बनने वाली है। 

     

    फिर उसने कॉरिडोर में रेलिंग के पास खड़े होकर अपने विला में काम कर रही एक फीमेल हाउस हेल्प को आवाज लगाई। “जेनिफ़र!”

     

    आवाज पूरे हॉल में गूंजी। कुछ ही सेकंड में एक अधेड़ उम्र की महिला तेजी से वहां पहुंची।

     

    वो जेनिफ़र थी। पिछले कई सालों से वो रूद्रांश के विला में काम कर रही थी और उसे अच्छी तरह जानती थी।

    “जी, सर?”

     

    रूद्रांश ने कहा, ” जल्दी से मेरे रूम में आओ और उस लड़की के कापड़े चेंज कर दो। “

    जेनिफर तुरंत ऊपर आ गई।

    फिर वह कुछ पल के लिए रुका और क्लोसेट की तरफ बढ़ गया।

     

    उसने वहां से अपना एक ढीला-सा कुर्ता निकाला और जेनिफ़र की तरफ बढ़ा दिया। “ये पहना देना।”

     

    जेनिफ़र ने तुरंत कुर्ता ले लिया। उसकी नजर अब लड़की पर थी। उसके कपड़े पूरी तरह भीगे हुए थे और ठंड की वजह से उसका शरीर हल्का-हल्का कांप रहा था।

    जेनिफ़र ने ध्यान से देखा तो उसकी कलाई पर चोट के गहरे निशान नजर आए।

     

    गर्दन के पास भी खरोंचें थीं। चेहरे पर चोट के हल्के निशान अब पहले से ज्यादा साफ दिखाई दे रहे थे।

    जेनिफ़र के चेहरे पर चिंता उभर आई।

    उसे देखकर साफ लग रहा था कि इस लड़की ने सिर्फ बारिश में रात नहीं बिताई थी…

    बल्कि वो किसी बहुत बुरे दौर से गुजरकर यहां तक पहुंची थी।

     

    जेनिफ़र ने बिना कोई सवाल किए जल्दी से उसके कपड़े बदल दिए और बाहर चली गई।

     

    तब तक रूद्रांश भी अपने कपड़े बदल चुका था। कुछ देर बाद… रूद्रांश कमरे में वापस आया।

    वह बेड के सिरहाने जाकर बैठ गया और सामने लेटी लड़की को गौर से देखने लगा।

     

    अब वह पहले से ज्यादा साफ दिखाई दे रही थी। गोरा रंग… बड़ी-बड़ी आंखें, जिन पर घनी और लंबी पलकें थीं… गुलाबी होंठ… और निचले होंठ के ठीक नीचे एक छोटा-सा तिल।

     

    छोटी-सी नाक, जिसमें एक नन्ही-सी नोज पिन चमक रही थी। वो लड़की किसी मासूम-सी तस्वीर की तरह लग रही थी।

     

    रूद्रांश की नजर कुछ पल उसके चेहरे पर ठहर गई।

    उसे खुद समझ नहीं आया कि वह इस अनजान लड़की को इतनी गौर से क्यों देख रहा था। बाहर बारिश अब धीमी पड़ चुकी थी।

     

    खिड़की के शीशों पर गिरती बूंदों की आवाज कमरे में एक अजीब-सी खामोशी पैदा कर रही थी। कमरे में जल रही हल्की पीली रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी।

    चेहरा बेहद मासूम था…

     

    लेकिन उन बंद आंखों के पीछे जैसे कोई बहुत गहरा राज छिपा हुआ था। कुछ ही देर बाद डॉक्टर भी वहां पहुंच गए।

     

    रूद्रांश तुरंत उठकर एक तरफ हो गया। डॉक्टर ने अपना बैग खोला और लड़की की जांच शुरू कर दी।

    उन्होंने उसकी नब्ज चेक की। फिर उसकी कलाई, गर्दन और चेहरे पर मौजूद चोटों को ध्यान से देखा।

     

    रूद्रांश की गहरी नजरें लगातार डॉक्टर पर टिकी हुई थीं।

    जैसे वह डॉक्टर की हर बात से इस लड़की के बारे में कुछ समझ लेना चाहता हो।

     

    कुछ देर जांच करने के बाद डॉक्टर ने गहरी सांस ली।

    “मिस्टर शेखावत…”

     

    रूद्रांश की नजरें डॉक्टर पर टिक गईं। “क्या हुआ है इसे?”

     

    डॉक्टर ने गंभीर आवाज में कहा, “ऐसा लग रहा है कि इस लड़की के साथ काफी ज्यादती हुई है। इसके शरीर पर कई जगह चोटों के निशान हैं। कुछ चोटें पुरानी हैं और कुछ बिल्कुल ताजा।”

     

    रूद्रांश की आंखों में अचानक गुस्सा उतर आया।

    उसकी उंगलियां धीरे-धीरे मुट्ठी में बदल गईं।

    लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

     

    डॉक्टर ने आगे कहा, “मुझे लगता है कि ये लड़की किसी बहुत बड़े सदमे से गुजरी है। इसी वजह से इसकी हालत ऐसी है।”

     

    रूद्रांश की नजर एक बार फिर लड़की पर चली गई।

    उसका मासूम चेहरा देखकर उसके जबड़े कस गए।

    डॉक्टर कुछ पल रुके और फिर बोले, “और एक बात…”

    रूद्रांश ने उनकी तरफ देखा। “इसे शायद कई घंटों से कुछ भी खाने को नहीं मिला है। शरीर में काफी कमजोरी है। इसी वजह से ये बेहोश हुई होगी।”

     

    डॉक्टर ने अपने बैग से एक इंजेक्शन निकाला। “मैंने इसे इंजेक्शन दे दिया है। उम्मीद है कि सुबह तक इसे होश आ जाएगा।” फिर उन्होंने कुछ दवाइयां निकालकर रूद्रांश की तरफ बढ़ा दीं। “होश में आने के बाद इसे कुछ हल्का और पौष्टिक खाना दीजिएगा। और ये दवाइयां समय पर देनी होंगी।”

     

    रूद्रांश ने बिना कुछ कहे सारी दवाइयां ले लीं।

    डॉक्टर अपना सामान समेटकर कमरे से बाहर चले गए।

    दरवाजा बंद होते ही कमरे में फिर से खामोशी छा गई।

    रूद्रांश धीरे से बेड पर बैठ गया।

    लड़की की सांसें अब पहले से थोड़ी सामान्य थीं।

    उसका चेहरा अभी भी पीला था और माथे पर हल्की शिकन थी।

     

    जैसे नींद में भी कोई बुरा सपना उसका पीछा कर रहा हो।

    रूद्रांश कुछ देर उसे देखता रहा।

    फिर धीमी आवाज में बोला, “आखिर हो कौन तुम?”

     

    कोई जवाब नहीं आया। उसने उसकी तरफ देखते हुए दोबारा कहा, “और किसने तुम्हें इस हालत में पहुंचाया?”

    खामोशी…

     

    बाहर बारिश लगभग थम चुकी थी। रात और गहरी हो गई थी। रूद्रांश ने अपनी जेब से सिगरेट निकाली।

    उसने सिगरेट होंठों के बीच रखी और लाइटर निकालने ही वाला था कि एक पल के लिए उसकी नजर सामने सो रही लड़की पर गई।

     

    कुछ सेकंड तक वह उसे देखता रहा। फिर उसने सिगरेट वापस अपनी जेब में रख ली।

    शायद उसे खुद भी नहीं पता था कि उसने ऐसा क्यों किया।

     

    रूद्रांश उठकर सोफे पर जाकर

    • लेट गया।

    वह इस अनजान लड़की के बारे में सोचता रहा।

    लेकिन कब उसकी आंखें लग गईं…

    उसे खुद पता नहीं चला।

     

    कहानी आगे जारी रहेगी…🙏🏻

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है।

    और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ।

    मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है।

    वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • Bound by fate

    Bound by fate

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग 1

     

    राधे राधे दोस्तों ❤️

     

    ✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️

     

     

     

    दिल्ली, इंडिया

     

    रात के बारह बजे। सर्दियों की वो काली रात बारिश में पूरी तरह डूबी हुई थी। आसमान पर काले बादल छाए थे और तेज बारिश के साथ हल्का-हल्का कोहरा सड़क को अपने आगोश में लिए हुए था।

     

    मौसम ऐसा था कि कोई भी समझदार इंसान अपने घर से बाहर निकलने के बारे में सोचता तक नहीं।

     

    लेकिन… उस सुनसान सड़क के बीचों-बीच एक लड़की चली जा रही थी।

     

    सड़क ज्यादा चौड़ी नहीं थी। दोनों तरफ घना जंगल था, जिसके ऊंचे-ऊंचे पेड़ तेज हवा के साथ झूम रहे थे। बारिश की तेज आवाज़ और हवा की सनसनाहट के अलावा वहां दूर-दूर तक किसी इंसान के होने का कोई निशान नहीं था।

     

    लेकिन उस लड़की को शायद इन चीजों से कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था। वो लगातार चलती जा रही थी।

     

    ना उसे बारिश की परवाह थी… ना ठंड की… और ना ही इस सुनसान रास्ते की।

     

    ऐसा लग रहा था जैसे वो अपनी जिंदगी से ही हार चुकी हो। शायद वो रो भी रही थी। लेकिन बारिश की तेज बूंदें उसके आंसुओं को अपने साथ बहा ले जा रही थीं। करीब से देखने पर उसके चेहरे पर हल्के-हल्के चोट के निशान साफ दिखाई दे रहे थे।

     

    उसने चटक लाल रंग का सूट पहन रखा था। वो बिल्कुल किसी नई-नवेली दुल्हन जैसी लग रही थी। लेकिन उसके कपड़े बारिश में पूरी तरह भीग चुके थे।

     

    उसकी कलाइयों में लाल चूड़ियां थीं, जिनमें से कुछ टूट चुकी थीं। हाथों पर लगी मेहंदी बारिश में फीकी पड़ चुकी थी। मांग में लगा सिंदूर लगभग धुल चुका था, लेकिन उसकी हल्की-सी लालिमा अब भी बाकी थी।

     

    और गले में… एक मंगलसूत्र था, वो लड़की बेहद खूबसूरत थी। लेकिन उस खूबसूरत चेहरे पर इस वक्त सिर्फ दर्द था। बहुत गहरा दर्द, आखिर कौन थी वो?

     

    और इतनी रात को इस सुनसान जंगल वाली सड़क पर अकेली क्यों चल रही थी?

     

    तभी… दूर से आती एक गाड़ी की हेडलाइट ने उसकी आंखों पर तेज रोशनी डाली।

     

    लड़की ने पलटकर भी नहीं देखा। गाड़ी लगातार उसकी तरफ बढ़ती चली आ रही थी।

     

    पों… पों…! ड्राइवर ने जोर-जोर से हॉर्न बजाया।

     

    लेकिन लड़की अपनी जगह से टस से मस नहीं हुई। सड़क इतनी संकरी थी कि गाड़ी को दूसरी तरफ से निकालने की कोई गुंजाइश भी नहीं थी।

     

    ड्राइवर ने आखिरी वक्त पर पूरी ताकत से ब्रेक लगा दिए।

     

    चीईईईईईई…!

     

    टायरों की तेज आवाज के साथ गाड़ी लड़की से कुछ ही इंच की दूरी पर जाकर रुकी। गाड़ी के अंदर अचानक सन्नाटा छा गया।

     

    ड्राइवर ने घबराकर पीछे की सीट की तरफ देखा।

     

    वहां बैठा आदमी पहले से ही उसे घूर रहा था। उसकी आंखों में साफ गुस्सा था।

     

    ड्राइवर सहम गया। “साहब… मेरी कोई गलती नहीं है। सामने अचानक एक लड़की रोड के बीचों-बीच खड़ी हो गई थी। अगर मैं ब्रेक नहीं लगाता तो…”

     

    वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया। पीछे बैठा आदमी झुंझलाकर बोला, “साला… सबको मरने के लिए मेरी कार के सामने ही आना होता है।”

     

    उसने गुस्से में अपनी घड़ी की तरफ देखा और फिर सामने खड़ी लड़की को। “अगर कुछ हो जाता ना, तो कल सुबह हर न्यूज़ चैनल पर एक ही खबर चलती…”

    उसके होंठों पर एक कड़वी मुस्कान आई। “रूद्रांश शेखावत की गाड़ी से लड़की की मौत।”

     

    ड्राइवर ने कुछ नहीं कहा। वह सामने खड़ी लड़की को देखने लगा। हेडलाइट की तेज रोशनी में अब उसका चेहरा साफ नजर आ रहा था।

     

    बारिश लगातार हो रही थी। लेकिन उसकी आंखों में उमड़ रहा दर्द शायद इस बारिश से भी ज्यादा गहरा था।

     

    रूद्रांश ने आखिरकार गुस्से में गाड़ी का दरवाजा खोला और बाहर निकल आया। बारिश की ठंडी बूंदें कुछ ही सेकंड में उसके बालों और कपड़ों को भिगोने लगीं।

     

    उसने इसकी परवाह नहीं की। महंगे जूते कीचड़ में धंस गए, लेकिन उसकी नजरें सामने खड़ी लड़की पर टिकी थीं।

     

    वह उसके पास जाकर रुक गया। “मरना है तो किसी और जगह जाकर मरो।”

    उसकी आवाज में गुस्सा था। “मेरी गाड़ी के सामने नहीं।”

     

    लड़की ने धीरे-धीरे अपना चेहरा उठाया। उसकी आंखें बुरी तरह सूजी हुई थीं, होंठ कांप रहे थे। लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

     

    रूद्रांश ने गौर से उसे देखा। उसके चेहरे पर हल्की चोटों के निशान थे।

     

    भीगे बाल उसके चेहरे से चिपके हुए थे। पलकों पर बारिश की बूंदें ठहरी हुई थीं।

    और उसकी आंखें… जैसे बिल्कुल खाली थीं।

     

    मानो उन आंखों में रोने के लिए भी अब कुछ बाकी नहीं बचा था। रूद्रांश का गुस्सा कुछ कम हुआ।

     

    उसने दोबारा पूछा, “कौन हो तुम?”

    कोई जवाब नहीं। “इस वक्त यहां क्या कर रही हो?”

     

    लड़की ने धीरे से अपनी गर्दन दूसरी तरफ घुमा ली रूद्रांश ने गहरी सांस ली। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर इस लड़की के साथ ऐसा क्या हुआ है।

     

    उसने अपना हाथ उसके कंधे पर रखने की कोशिश की।

    “देखो… अगर तुम्हें कोई परेशानी है, तो”

     

    लड़की ने अचानक उसका हाथ झटक दिया।

    वह एक कदम पीछे हट गई। “मुझे छोड़ दो…”

     

    उसकी आवाज इतनी धीमी थी कि बारिश के शोर में लगभग खो गई। रूद्रांश ने उसकी तरफ देखा।

    लड़की ने कांपती आवाज में दोबारा कहा, “मुझे कहीं नहीं जाना…”

     

    उस एक वाक्य में इतना दर्द था कि कुछ पल के लिए रूद्रांश भी चुप रह गया। उसने लड़की को गौर से देखा।

    लाल दुल्हन का जोड़ा… टूटी हुई चूड़ियां… धुला हुआ सिंदूर… मंगलसूत्र… और चेहरे पर चोटों के निशान।

     

    ये कोई सामान्य मामला नहीं था। रूद्रांश ने आसपास नजर दौड़ाई। चारों तरफ घना जंगल था। इतनी रात को इस सुनसान सड़क पर ये लड़की अकेली थी।

    और शायद किसी बड़ी मुसीबत से भागकर यहां तक पहुंची थी। “तुम्हें जाना तो पड़ेगा।”

     

    इस बार रूद्रांश की आवाज पहले से थोड़ी नरम थी। “लेकिन उससे पहले मुझे ये बताओ कि हुआ क्या है?”

     

    लड़की ने उसकी तरफ देखा। उसकी आंखों में अचानक डर उभर आया। उसने कुछ कहने के लिए होंठ खोले…

     

    लेकिन आवाज नहीं निकली। अगले ही पल उसका शरीर लड़खड़ाया। “अरे…”

     

    रूद्रांश ने झटके से उसे संभाल लिया। लड़की बेहोश हो चुकी थी। “अब ये और बचा था!”

     

    रूद्रांश ने झुंझलाकर कहा, लेकिन उसके हाथों की पकड़ लड़की को संभालने में बेहद सावधान थी।

     

    उसने एक नजर उसके चेहरे पर डाली। इतनी खूबसूरत लड़की… और इस हालत में। उसके चेहरे पर चोटों के निशान देखकर रूद्रांश की भौंहें सिकुड़ गईं।

     

    उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर किसने इसके साथ ऐसा किया होगा। लेकिन यहां खड़े रहना ठीक नहीं था। उसने लड़की को अपनी बाहों में उठाया और गाड़ी की तरफ बढ़ गया। ड्राइवर तुरंत नीचे उतरा और पीछे का दरवाजा खोल दिया।

     

    रूद्रांश ने लड़की को पिछली सीट पर आराम से लिटाया और खुद उसके पास बैठ गया। “गाड़ी स्टार्ट करो।”

     

    “जी, साहब।” ड्राइवर ने तुरंत गाड़ी आगे बढ़ा दी।

    गाड़ी की रफ्तार बढ़ते ही बाहर की बारिश और जंगल पीछे छूटने लगे।

     

    लेकिन रूद्रांश के दिमाग में सवालों का तूफान शुरू हो चुका था। ये लड़की कौन थी? इसके साथ आखिर हुआ क्या था? और वो इस हालत में अकेली वहां क्यों घूम रही थी?

     

    उसकी नजर बार-बार लड़की पर जा रही थी। उसके भीगे बाल चेहरे पर चिपके हुए थे। कलाई पर टूटी हुई लाल चूड़ियों के कुछ टुकड़े अब भी मौजूद थे।

     

    रूद्रांश ने एक पल के लिए उसकी तरफ देखा और फिर नजरें सामने कर लीं। उसे खुद नहीं पता था कि वह इस अनजान लड़की की मदद क्यों कर रहा था।

     

    लेकिन एक बात तय थी… आज रात उसकी जिंदगी में कुछ

    ऐसा आने वाला था, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

     

    कहानी आगे जारी रहेगी। 

    प्लीज आप सब अपना साथ बनाएं रखें।

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है।

    और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ।

    मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है।

    वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • No love clause

    No love clause

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग 3

     

    राजावत ग्रुप…

     

    दोपहर के करीब डेढ़ बजे…

     

    तेज़ कदमों से चलती हुई वेदा और अपर्णा कंपनी के अंदर दाखिल हुईं। रिसेप्शन पर बैठे कर्मचारियों की नज़र जैसे ही वेदा पर पड़ी, कई लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    “आज पहली बार मिस वेदा लेट हुई हैं…”

     

    “सुना है बॉस सुबह से कई बार पूछ चुके हैं इनके बारे में…”

     

    “अब तो आज किसी की खैर नहीं…”

    धीमी-धीमी फुसफुसाहट पूरे फ्लोर पर फैल गई।

     

    वेदा ने किसी की तरफ ध्यान नहीं दिया। क्योंकि उसका मन अभी भी अस्पताल में, विहान के पास अटका हुआ था। इसलिए आज उसे किसी की फिक्र नहीं थी। 

     

    “तू पहले HR से बात कर ले।” अपर्णा ने धीमे से कहा।

     

    वेदा ने हामी में सिर हिलाया। फिर दोनों सीधे ह्यूमन रिसोर्स डिपार्टमेंट की तरफ बढ़ गईं।

     

    …

     

    करीब बीस मिनट बाद…

     

    HR मैनेजर ने सामने रखी फाइल बंद करते हुए एक लंबी साँस ली।

     

    “मिस वेदा… सबसे पहले तो मुझे आपके भाई के बारे में सुनकर बहुत दुख हुआ।”

     

    वेदा चुपचाप बैठी रही। क्योंकि उसे फिलहाल किसी की हमदर्दी की नहीं एक बहुत बड़ी रकम की जरूरत थी। 

     

    HR मैनेजर श्रुति ने आगे कहा, “मैंने आपकी पूरी फाइल चेक की है।” फिर वेदा की तरफ देखते हुए बोली, “कंपनी की मेडिकल असिस्टेंस पॉलिसी के तहत आपको आर्थिक सहायता मिल सकती है…”

     

    वेदा की आँखों में उम्मीद की एक हल्की-सी किरण चमकी। “कितनी…?”

     

    HR मैनेजर ने बहुत सोचते हुए धीमी आवाज में कहा, “अधिकतम दस लाख रुपये।”

     

    बस… इतना सुनते ही वह उम्मीद भी बुझ गई। दस लाख… जबकि उसे चाहिए थे… एक करोड़ बीस लाख। लगभग दस गुना ज़्यादा। HR मैनेजर ने अफसोस जताते हुए कहा, “काश मैं इससे ज़्यादा कर पाता, लेकिन कंपनी के नियम…”

     

    वेदा ने मुस्कुराने की कोशिश की। “इट्स ओके, मैम!”

     

    उसने फाइल उठाई। “थैंक यू।” कहकर वो धीमे कदमों से चलते हुए बाहर आ गई।

     

    …

     

    कॉरिडोर में आते ही अपर्णा ने उसका चेहरा देखा। उसे बिना पूछे ही जवाब मिल गया था। “नहीं हुआ…?”

     

    वेदा ने बस ना में सिर हिला दिया। “सिर्फ़ दस लाख।”

     

    दोनों कुछ पल खामोश खड़ी रहीं। तभी… “मिस वेदा!”

     

    पीछे से आवाज़ आई, दोनों ने मुड़कर देखा। निशांत तेज़ी से उनकी तरफ आ रहा था। “सर कब से आपको बुला रहे हैं।”

    वेदा का दिल ज़ोर से धड़क उठा। उसे याद आया… वह बिना किसी सूचना के ऑफिस नहीं आई थी।

    “मैं अभी आती हूँ।”

     

    उसने अपने आँसू पोंछे और अग्नि के केबिन की तरफ बढ़ गई।

     

    …

     

    सीईओ केबिन…

     

    वेदा ने दरवाज़े पर दस्तक दी। “May I come in, sir?”

     

    अंदर से ठंडी आवाज़ आई,  “Come.”

     

    वेदा अंदर चली गई। अग्नि अपनी कुर्सी पर बैठा कुछ डॉक्यूमेंट्स देख रहा था।

     

    उसने बिना ऊपर देखे कहा,  “Sit.”

     

    वेदा चुपचाप बैठ गई। करीब दो मिनट तक पूरे कमरे में सिर्फ़ फाइलों के पन्ने पलटने की आवाज़ आती रही। 

     

    फिर… अग्नि ने फाइल बंद की। उसकी बर्फ जैसी नीली आँखें सीधे वेदा पर टिक गईं। “राजावत ग्रुप में काम करते हुए तुम्हें कितने साल हो गए?”

     

    वेदा धीमे से, “तीन साल, सर।”

     

    अग्नि, “और इन तीन सालों में… कभी भी तुमने इतनी बड़ी लापरवाही नहीं की… जितनी बड़ी आज की है। तुम बिना किसी को इनफॉर्म किए ऑफिस से आधे दिन गायब रही। क्या तुमने पहले ऐसा कभी कुछ किया?”

     

    वेदा ने ना में सिर हिलाया, “न… नहीं सर।”

     

    अग्नि, “फिर आज क्या अलग था?”

     

    वेदा कुछ पल चुप रही। वह अपने निजी जीवन को कभी ऑफिस में नहीं लाती थी। लेकिन आज…

     

    मजबूरी उसके आत्मसम्मान से बड़ी हो चुकी थी। “सर… मेरा छोटा भाई अस्पताल में भर्ती है। उसकी हालत अचानक…”

     

    आगे के शब्द उसके गले में अटक गए। अग्नि कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।

     

    फिर पहले जैसी ठंडी आवाज़ में बोला, “Personal life is personal.”

     

    “But office discipline is office discipline. Next time… inform before you disappear.”

     

    वेदा ने धीरे से सिर झुका दिया। “Sorry, sir.”

     

    अग्नि ने इंटरकॉम उठाया। ”निशांत।”

     

    दूसरी तरफ से निशांत की आवाज आई, “Yes, sir.”

     

    अग्नि ने उसे ऑर्डर दिया, “आज की सारी मीटिंग्स पोस्टपोन कर दो। और मिस वेदा को आज आधे दिन की छुट्टी दे दो।”

     

    वेदा ने हैरानी से उसकी तरफ देखा। अभी कुछ सेकंड पहले जो आदमी उसे डाँट रहा था… वही अब उसे छुट्टी दे रहा था।

     

    अग्नि ने फिर फाइल उठाते हुए कहा, “अपने भाई का ध्यान रखो। बाकी काम कल हो जाएगा।”

     

    वेदा कुछ कहना चाहती थी… लेकिन शब्द नहीं मिले।

    “Thank you, sir.”

     

    वह धीरे से बाहर निकल गई। दरवाज़ा बंद होते ही अग्नि ने अपनी कुर्सी की बैक पर सिर टिका दिया।

    उसे नहीं पता था… आख़िर क्यों पहली बार किसी कर्मचारी की निजी परेशानी उसके मन में रह गई थी।

     

    …

     

    उसी शाम,  राजावत मेंशन…

     

    शहर के पोश एरिया में बना राजावत मेंशन, अलग ही रोशनी में नहाया हुआ था। मेंशन के सिटिंग हॉल में इस समय अग्नि के दादा जी, उसकी माँ, चाचा और चाची मौजूद थे।

    तभी मेंशन के पोर्च में अग्नि की कार आकर रूकी और वो तेजी से बाहर निकला और सीधा मेंशन के मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़ गया।

     

    उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं थे।

     

    सीटिंग एरिया में आते ही सबसे पहले उसकी नजर अपने दादा जी विक्रम राजावत पर गई।

    “ आपने मुझे बुलाया दादा जी?” सीना ताने खड़े अग्नि ने कहा।

     

    आवाज सुनकर सबकी नजरें अग्नि पर टिक गई, वहीं अग्नि की नजर सिर्फ और सिर्फ विक्रम जी पर टिकी थी।

     

    “लगता है तुम अपनी तमीज भूल चुके हो।”

    विक्रम राजावत की रौबदार आवाज़ पूरे सिटिंग हॉल में गूँज उठी।

     

    अग्नि के चेहरे पर कोई खास बदलाव नहीं आया। उसने बस एक पल के लिए कमरे में मौजूद बाकी लोगों पर नज़र डाली। उसकी माँ सविता राजावत सोफे पर चुपचाप बैठी थीं। उनके चेहरे पर बेटे को देखकर राहत भी थी और चिंता भी।

     

    दूसरी तरफ उसके चाचा अमित राजावत और चाची सुमित्रा राजावत बैठे थे। उनके साथ उनका बेटा राघव और बेटी रिया भी मौजूद थे।

     

    अग्नि की नजर राघव पर पड़ी। राघव ने तुरंत अपनी नजरें दूसरी तरफ कर लीं। अग्नि सब समझता था।

    उसे इस परिवार में मौजूद हर मुस्कान के पीछे छिपा मतलब पता था।

     

    विक्रम राजावत ने गुस्से में कहा, “हमारे संस्कारों में सबसे पहले बड़ों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।”

     

    अग्नि ने कहा, “ बड़े आशीर्वाद देने के लायक होते तो जरूर लेता।” उसकी ठंडी निगाहे विक्रम जी पर टिकी थी।

     

    विक्रम जी आगे बोले, “ स्टडी में चलो हमें तुमसे एक जरूरी बात करती है।”

     

    क्रमशः….

    कहानी आगे जारी रहेगी।

    देरी के लिए माफी 

    पढ़ते रहिए 

    No love clause 💕

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है।

    और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ।

    मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है।

    वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • बेवफाई

    बेवफाई

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    बेवफाई

    Part 1

     

    “कुछ रिश्ते टूटते नहीं हैं… बस उनमें से भरोसा मर जाता है।

    और जब भरोसा मर जाए, तो प्यार कितना भी जिंदा हो… रिश्ता सांस नहीं ले पाता।”

     

    शाम के करीब सात बज रहे थे।

     

    मुंबई की सड़कों पर बारिश अपना पूरा जोर दिखा रही थी। आसमान काले बादलों से घिरा था और सड़क पर दौड़ती गाड़ियों की रोशनी पानी की बूंदों में घुलकर किसी धुंधली तस्वीर जैसी लग रही थी।

     

    रिया माथुर खिड़की के पास खड़ी लगातार घड़ी देख रही थी। उसने हल्के आसमानी रंग की बहुत सी सुंदर साड़ी पहनी हुई थी, चेहरे पर हल्का सा मेकअप, मांग में सिंदूर, गले में मंगलसूत्र। 

     

    आज उसके चेहरे पर महीनों बाद थोड़ी सी खुशी दिखाई दे रही थी।

     

    उसने कमरे को खुद सजाया था। टेबल पर मोमबत्तियां थीं। बीच में आरव का पसंदीदा चॉकलेट केक रखा था, जो उसने खुद अपने हाथों से बनाया था और उसके पास रखा था… एक छोटा-सा गिफ्ट बॉक्स।

     

    रिया ने अपने हाथ में पकड़े फोन की स्क्रीन देखी।

     

    “आरव ❤️” उसने फिर मैसेज किया।

     

    “कितनी देर और? आज जल्दी आना… तुम्हारे लिए एक सरप्राइज है।”

     

    मैसेज भेजने के बाद उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। आज उनकी शादी की तीसरी सालगिरह थी।

     

    तीन साल पहले इसी दिन आरव ने उसका हाथ पकड़कर सात फेरे लिए थे और कहा था, “रिया, जिंदगी चाहे जितनी मुश्किल हो जाए, मैं तुम्हारा हाथ कभी नहीं छोड़ूंगा।”

     

    रिया ने उस दिन उस एक वादे पर अपनी पूरी जिंदगी रख दी थी। और आज…

    वह उसी वादे का जश्न मनाने के लिए उसका इंतजार कर रही थी।

     

    रात के करीब आठ बजे दरवाजे की घंटी बजी।

     

    रिया की आंखें चमक उठीं। “आरव!” उसने धीरे से नाम लिया, और आंखों में चमक लिए, वह दौड़कर दरवाजे तक पहुंची।

     

    लेकिन दरवाजे के बाहर आरव नहीं था। कूरियर वाला खड़ा था। उसे देखकर रिया के चेहरे की चमक पलभर में गायब हो गई। 

     

    “मैडम, आपके नाम का पार्सल।” कुरियर वाले ने एक पैकेट रिया की तरफ बढ़ाते हुए कहा।

    पहले तो रिया को थोड़ी हैरानी हुई, लेकिन फिर उसने पैकेट ले लिया। 

     

    “थैंक यू।” कहकर उसने एक पर्चे में साइन किया और फिर दरवाजा बंद करके अंदर आ गई। 

    वो पैकेट अभी भी उसके हाथ में था।

     

    पहले उसने सोचा आरव को फोन करने के बाद वो पैकेट खोलेगी, लेकिन फिर जाने क्या सोचकर उसने फोन टेबल पर रखना और पैकेट खोलने लगी। 

     

    अंदर एक फाइल थी। रिया ने हैरानी से फाइल खोली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था, “तलाक का समझौता।”

     

    जैसे ही उसने वो शब्द पढ़े, उसकी सांस जैसे वहीं रुक गई। “नहीं…” उसके हाथ कांपने लगे। “ये… ये क्या है?”

     

    फाइल के अंदर आरव के हस्ताक्षर किए हुए कागजात रखे थे। तलाक के कागजात।

     

    रिया ने तुरंत आरव को फोन किया।

     

    एक बार… दो बार… पांच बार… लेकिन सामने से कोई जवाब नहीं।

     

    फिर फोन बंद हो गया। रिया फर्श पर बैठ गई, उसकी दुनिया मानो पलभर में पूरी तरह से उजड़ गई। आंखों के सामने तीन साल की पूरी जिंदगी घूम गई।

     

    पहली मुलाकात। पहली लड़ाई। पहली बारिश।

     

    पहली सालगिरह। आरव का उसे देखकर मुस्कुराना।

     

    और वह रात… जब आरव ने उसके माथे को चूमकर कहा था, “तुम मेरी जिंदगी की सबसे खूबसूरत गलती नहीं, सबसे सही पसंद हो।”

     

    रिया की आंखों से आंसू बह निकले। तभी उसके फोन पर एक नोटिफिकेशन आया।

     

    एक फोटो। रिया की उंगलियां ठिठक गईं। फोटो में आरव था। और उसके साथ एक लड़की। दोनों एक-दूसरे के बेहद करीब खड़े थे। लड़की के चेहरे पर मुस्कान थी। और आरव… उसे उसी तरह देख रहा था, जैसे कभी वह रिया को देखा करता था।

     

    फोटो के नीचे लिखा था, 

    “Finally… together. ❤️”

     

    रिया की आंखें फैल गईं। उसने फोटो को बार-बार देखा। फिर लड़की का चेहरा पहचानते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    मीरा। आरव की ऑफिस पार्टनर।

     

    वही मीरा जिसे लेकर रिया ने कई बार मजाक में कहा था, “तुम दोनों साथ में बहुत अच्छे लगते हो।”

     

    और आरव हर बार हंसकर कहता था, “रिया तुम पागल हो क्या? मेरे लिए सिर्फ तुम हो, मुझे किसी और की जरूरत नहीं है।”

     

    रिया ने उस वक्त उस पर भरोसा किया था। जब कभी आरव उसके साथ बिजनेस ट्रिप पर जाता, लेकिन रिया ने कभी उसपर रत्ती भर शक नहीं किया। 

    लेकिन, आज वही भरोसा उसके सामने टूटकर बिखर चुका था।

     

    —

     

    अगली सुबह रिया सीधे आरव के ऑफिस पहुंची।

     

    रिसेप्शन पर पहुंचते ही उसने पूछा, “आरव कहां है?”

     

    रिसेप्शनिस्ट ने उसे देखकर नजरें झुका लीं। “मैम… सर मीटिंग में हैं।”

     

    “मीटिंग?” रिया हंस पड़ी। वह हंसी जिसमें दर्द था। “उन्हें बुलाइए, कहिए कि मैं मिलना चाहती हूँ।”

     

     

    कुछ मिनट बाद आरव बाहर आया। काली शर्ट, चेहरे पर वही गंभीरता और आंखों में ऐसी ठंडक जैसे रिया उसके लिए कोई अजनबी हो।

     

    रिया उसे देखकर कुछ पल तक बस खड़ी रही। फिर बोली, “तुमने मुझे तलाक के पेपर भेजे?”

     

    आरव चुप रहा। 

     

    “मुझसे एक बार पूछना भी जरूरी नहीं समझा?” रिया ने उसकी आंखों में देखते हुए पूछा। 

     

    आरव ने कठोर शब्दों में कहा, “अब पूछने को बचा ही क्या है?”

     

    रिया का दिल टूट गया। “मतलब?”

     

    आरव ने नजरें फेर लीं। “मैं इस रिश्ते में नहीं रहना चाहता।”

     

    रिया टूटी आवाज में, “क्यों?”

     

    आरव, “बस नहीं रहना चाहता।”

     

    “झूठ!” रिया चीख पड़ी। “तुम मुझसे प्यार करते थे!”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा। “था।”

     

    बस एक शब्द। था। रिया को लगा जैसे किसी ने उसके सीने के बीचोंबीच वार कर दिया हो।

     

    “तो मीरा की वजह से?” आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    रिया की आंखों में आंसू भर आए। “तीन साल का रिश्ता… और तुमने इसे इतनी आसानी से खत्म कर दिया?”

     

    “आसानी से?” आरव की आवाज पहली बार थोड़ी भारी हुई। “तुम्हें लगता है मेरे लिए आसान था?”

     

    “तो फिर मुझे छोड़ क्यों रहे हो?” आरव कुछ कहने ही वाला था कि पीछे से मीरा की आवाज आई, “आरव…”

     

    रिया ने मुड़कर देखा। मीरा वहां खड़ी थी। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। वह सीधे आरव के पास आकर खड़ी हो गई। रिया ने दोनों को देखा।

     

    फिर अपनी आंखों से आंसू पोंछते हुए बोली, “शायद मेरी जगह अब यहां नहीं है।”

     

    वह मुड़ी। लेकिन जाते-जाते उसने आरव की तरफ देखा। “एक बात याद रखना…”

     

    आरव की

    आंखें उससे मिलीं। “जिस इंसान ने तुम्हें सबसे ज्यादा प्यार किया था, उसे तुमने आज खुद से दूर कर दिया है।”

     

    और वह चली गई।

     

    —

    To be continued..

    क्या सच में बिखर कर रह जाएगा आरव और रिया का रिश्ता। या कहानी आगे कुछ नया मोड लेगी जानने के लिए अगला भाग जरूर पढ़े। 

    और कहानी को आपका एक कीमती लाइक जरूर दें

     

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है।

    और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ।

    मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है।

    वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • अधूरी इबादत भाग~21

    अधूरी इबादत भाग~21

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~21 आख़िर बोल पड़ी रूहानी 

     

    जानकी के थप्पड़ मारते ही रूहानी की देह जैसे संतुलन खो बैठी। गाल की जलन, कानों की गूंज और माँ के हाथों की बेरुखी….. उसे सब कुछ एक साथ महसूस हो रहा था। 

    रूहानी का चेहरा झटक कर एक तरफ मुड़ गया और उसकी आँखों में कुछ बुझ-सा गया। उसका शरीर जैसे लड़खड़ा गया, अंदर से जान निकलती महसूस हुई और वह बगल में खड़े अद्वैत की तरफ झुक गई, जैसे आत्मा ही खिंचकर उसके पास चली गई हो।

    वो उस पर केवल गिरी नहीं थी बल्कि वो उसमें समा गई। उसका माथा अद्वैत की कंधे से आकर लगा और हाथ खुद-ब-खुद उसकी बाहों को थामते चले गए, जैसे अगर अब उसने उसे नहीं थामा तो वह चूर-चूर होकर ज़मीन पर बिखर जाएगी।

    अद्वैत, जो अब तक भीड़ और तमाशे के बीच सबको समझने में लगा हुआ था, उस एक पल में बदल गया…. उसकी नज़रें जल उठीं, जबड़े भिंच गए, और सीना तन गया जैसे कोई आँधी थामे खड़ा हो। उसने रूहानी को एक झटके में अपने बाहों के घेरे में ले लिया… कस कर, हिफाज़त से, जैसे सारी दुनिया को रोक रहा हो उसके गिरने से।

    रूहानी का चेहरा अब भी जानकी की हथेली की गर्मी से जल रहा था। गाल पर उभरा लाल निशान साफ दिख रहा था, जो अंदर के आहत आत्मसम्मान और दिल के दर्द से मिलकर उसके चेहरे को और भी पीला और कमज़ोर बना रहा था। 

    उसकी आँखें डबडबाई हुई थीं, पर उसने रोना नहीं चुना। नहीं। वो जानती थी कि अगर आज वह टूटी, अगर आज आँसू बहाए, तो ये समाज और ये परिवार उसके आंसुओं की नमी से उसकी आत्मा को हमेशा के लिए गीला कर देंगे, उसे कमज़ोर और हारा हुआ मान लेंगे।

    अद्वैत की आंखें अब सीधी रूहानी की भीगी हुई लाल आखों से टकराईं। उन आँखों में गहरा आक्रोश था और अद्वैत की भी आँखों में एक स्त्री के अपमान को देखकर उपजा गुस्सा था, और एक दर्दनाक अविश्वास भी। 

    जैसे वो बिना कुछ कहे उससे पूछ रहा हो…. “क्या वाकई इस घर ने, इस परिवार ने तुम्हें कभी अपनाया था?” उसके चेहरे पर गुस्से और अविश्वास का ऐसा मिश्रण था जिसे शब्दों में बांध पाना मुश्किल था। रूहानी की आंखें अब भी भीगी थीं, पर उनमें भी एक अजीब सी स्पष्टता थी, एक छुपा हुआ दृढ़ संकल्प था…. वो टूट नहीं रही थी, वो बस सहारा ले रही थी।

    कुछ क्षण तक दोनों बस एक-दूसरे की आँखों में देखते रहे, जैसे तमाचा दोनों को पड़ा हो… एक को शरीर पर, गालों पर और दूसरे को आत्मा पर, दिल पर। उस एक पल के ठहराव में उन्होंने एक-दूसरे की पीड़ा को महसूस किया, एक-दूसरे की हिम्मत को परखा।

    रूहानी के अंदर बरसों का घुटा हुआ दर्द, समाज की बंदिशों से मिली घुटन, परिवार की उम्मीदों का बोझ…. सब कुछ अब शब्दों में फूटने को तैयार था। उसकी साँसे तेज़ हो चुकी थीं, और आवाज़ कांपते हुए भी एक सख्त लकीर लिए हुए आई…. जैसे बरसों का घुटा हुआ दर्द आखिर अब शब्दों में फूट पड़ा हो।

    पहले तो रूहानी थोड़ी देर चुप रही… फिर धीरे से बोली, “जिस अनजान ने मेरी जान बचाई… जब आप सब ने मुझे मरने के लिए छोड़ दिया था… उसी के घर में, बिना कुछ जाने, आपने मुझ पर इल्ज़ाम लगा दिए? मेरी बात सुने बिना ही मुझे गुनहगार बना दिया?’

    फिर वो अचानक वो अचानक अद्वैत के कंधे से थोड़ा अलग होकर पलटी और लगभग चीखते हुए, सीधे अपने माँ-बाप की तरफ देखकर बोली, “आप दोनों ने ही कहा था न… माँ, पापा, कि मैं इस अनजान आदमी के साथ, उसके घर… उसके कमरे, उसके बिस्तर पर… जाने कितनी रातें गुज़ार चुकी हूँ… समाज में बदनामी कर दी…?” 

    उसके शब्द आरोपों का जवाब नहीं, बल्कि उन्हीं आरोपों को पलटकर एक सवाल थे, जो सीधे उनके अंतरात्मा पर चोट कर रहे थे।

    “तो अब सुन लीजिए… हाँ! ये अनजान अब कोई और नहीं, मेरा पति है! हाँ, मैंने शादी कर ली है! क़ानूनी रूप से, सामाजिक रूप से और हाँ… मेरी मर्जी से! और आप फिर भी मुझे ही कसूरवार ठहरा रहे हैं? उस बदनामी के लिए जिसे आप पहले ही मेरे मत्थे मढ़ चुके थे?”

    उसके शब्द जैसे आंगन की हर ईंट पर हथौड़े की तरह गूंजे। सबकुछ थम गया। जानकी और भानु प्रताप की आँखें हैरत, शर्म और अपमान के मिलेजुले भावों से भर उठीं।

    उन्हें उम्मीद नहीं थी कि रूहानी इस तरह पलटकर जवाब देगी। मेहमानों के चेहरों पर एक नई सनसनी फैल गई थी, बातें बंद हो गईं थीं, केवल हवा में तैरती रूहानी की आवाज़ की गूंज बची थी।

    लेकिन भानु प्रताप का घमंड और क्रोध अब नियंत्रण से बाहर हो चुका था। उनकी बेटी ने, जिसे वो अपनी संपत्ति मानते थे, उनके ही सामने, भरी महफ़िल में उन्हें चुनौती दी थी। वो गुस्से में थरथराते हुए आगे बढ़े, उनके चेहरे पर खून उतर आया था।

    उनकी आँखों में अब बेटी के फैसले के लिए सिर्फ़ गुस्सा नहीं था, उसमें अपमान का, अस्वीकृति का और अपने अधिकार के छिन जाने का ज़हर भर गया था।

    “मैं अभी के अभी तेरी जान ले लूंगा!” वो गूंजती, कांपती हुई आवाज़ में चीखे और रूहानी की तरफ झपटे, उनका हाथ उठ चुका था।

    लेकिन इससे पहले कि उनका हाथ रूहानी तक पहुँचता, अद्वैत एक पल में बिजली की तेज़ी से उसके सामने आ गया। उसने रूहानी को अपने पीछे किया, उसे अपनी बाँहों के सुरक्षा घेरे में लिया। 

    वह गरजते हुए, भानु प्रताप की आँखों में आँखें डालकर बोला, “बहुत कर लिया आपने! बहुत सुन लिया आपकी बेटी ने! अब और नहीं। अगर रूहानी को एक खरोंच भी आई, तो मैं ये भूल जाऊँगा कि आप उसके पिता हैं। मैं सिर्फ़ ये याद रखूंगा कि आपने एक महिला का अपमान किया, उस पर हाथ उठाया और वो भी तब जब उसने सिर्फ़ अपने जीवन का फैसला खुद लिया।”

    रूहानी सन्न थी। उसका दिल धड़क नहीं रहा था, जैसे कुछ पल को सब थम गया हो। उसने अद्वैत की तरफ देखा…. वो शख्स जिसे उसने अब तक बस एक ‘समझौता’ माना था… अब सामने खड़ा था, जैसे दीवार बनकर। उसकी आंखों में ग़ुस्सा था, पर वो ग़ुस्सा रूहानी के लिए नहीं था…. रूहानी के लिए वो सिर्फ़ ढाल बन गया था।

    उसके भीतर कुछ टूटा भी, और कुछ जुड़ भी गया था।

    वो समझ नहीं पा रही थी कि ये वही अद्वैत है जो अब तक चुपचाप अपनी सीमाओं में रहता था? क्या ये वही रिश्ता है, जो बस कुछ कागज़ी शर्तों पर टिका था?

    रूहानी के मन में सवाल उठ रहे थे…. “क्या ये सब सच है? क्या कोई यूं भी मेरी तरफ खड़ा हो सकता है? बिना किसी मजबूरी के?”

    इन सब के बीच आँगन की हवा जैसे एकाएक भारी हो गई थी, इतनी भारी कि साँस लेना मुश्किल लग रहा था। सबकुछ ठहर गया था। भानु प्रताप का उठा हुआ हाथ हवा में जम गया।

    मेहमानों के चेहरे अब सहम और चुप्पी में ढल चुके थे। किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि एक शब्द भी कह सके। अद्वैत की आवाज़ में, उसकी आँखों में जो दृढ़ता थी, वो किसी ने पहले नहीं देखी थी।

    भानु प्रताप कुछ पल तक जड़ हो गए। उनका गुस्सा, उनका अधिकार, अद्वैत की आँखों के सामने बौना लग रहा था। वह एक दामाद नहीं, आज एक रक्षक की तरह खड़ा था, जिसने न सिर्फ़ अपनी पत्नी की शारीरिक इज़्ज़त को बल्कि उसकी आत्मा को भी थाम लिया था, उसे टूटने से बचा लिया था।

    “आप हमें अपनाएँ या नहीं,” अद्वैत ने अब अपने स्वर को थोड़ा शांत किया, लेकिन उसी तेज़ और दृढ़ लहजे में कहा, “ये आपका फ़ैसला है। लेकिन किसी का आत्मसम्मान इस तरह रौंदा नहीं जा सकता। रूहानी आपकी बेटी है, हाँ। लेकिन अब वो मेरी पत्नी भी है और जब तक मैं ज़िंदा हूँ, कोई उसे दुख नहीं पहुँचा सकता…. चाहे वो इस दुनिया में कोई भी हो। उसका सम्मान मेरा सम्मान है और उसकी सुरक्षा मेरी ज़िम्मेदारी।”

    उसकी बातों में केवल शब्द नहीं थे, उनमें एक अटूट वादा था, एक ऐसी सच्चाई थी जो पूरे माहौल में घुलती चली गई, पुरानी रूढ़ियों और अपेक्षाओं की दीवारों से टकराती हुई।

    अद्वैत ने पहली बार रूहानी का हाथ थामा…. वो भी सबके सामने, बिना किसी हिचकिचाहट के, जैसे कोई फैसले की मुहर लगा रहा हो। उसकी हथेली में रूहानी की उंगलियाँ थरथरा रही थीं, पर इस बार डर नहीं था, बल्कि एक मौन स्वीकार था… और एक बिन बोले गुहार कि “अब मुझे और टूटा हुआ मत देखना।”

    अद्वैत का चेहरा शांत था, लेकिन उसकी आंखों में एक सुलगती हुई आग थी…. जैसे उसने तय कर लिया हो कि अब और नहीं, अब कोई और रूहानी को रुलाने का हक़ नहीं रखता। उसने सबके सामने, उसी आँगन में जहाँ अभी कुछ मिनट पहले रूहानी का आत्मसम्मान रौंदा गया था, उस सन्नाटे को चीरते हुए ठहरी हुई आवाज़ में कहा….

    “जब आप अपनी बेटी को सच में, पूरे दिल से अपना लेंगे… तब आइएगा उसे देखने के लिए,” अद्वैत ने कहा, जैसे किसी अदालत में अंतिम शब्द सुनाए जा रहे हों। “अब नहीं। आज से ये मेरी पत्नी है और जब तक आप इसे दोषी मानते रहेंगे, तब तक आप हम दोनों से दूर रहेंगे।”

    उसकी आवाज़ में कोई ऊँचा स्वर नहीं था, लेकिन हर लफ्ज़ जैसे पत्थर पर चोट करता जा रहा था। वो झुका नहीं, समझौता नहीं किया, सिर्फ़ एक शर्त रख दी…. सम्मान की।

    1. फिर बिना एक पल गँवाए, उसने रूहानी का हाथ और कस कर थामा और दोनों उस दहलीज़ की तरफ बढ़ चले जहाँ से कुछ देर पहले रूहानी को रोक दिया गया था। पर इस बार कोई रोकने वाला नहीं था, सिर्फ़ पीछे छूटा हुआ सन्नाटा और बहुत सारी निगाहें थीं…. जिनमें कुछ हैरानी थी, कुछ ग्लानि और कुछ वो चुप्पियाँ जो अपनी गलती पहचानने के बावजूद कुछ कह नहीं पातीं।

    रूहानी ने पीछे मुड़कर एक बार भी नहीं देखा। उसका चेहरा भावशून्य था, लेकिन उसकी चाल में वो वजन था जो केवल उन लड़कियों को आता है जो आत्मगौरव से जीना सीख चुकी हैं। 

    और ये जानते हुए भी कि उनका रिश्ता बस एक कागज़ी समझौता है….. एक ‘कॉन्ट्रैक्ट मैरिज’ जो समाज की आंखों में सिर्फ़ एक दिखावा है…. अद्वैत ने रूहानी का साथ वैसे दिया जैसे किसी सच्चे जीवनसाथी को देना चाहिए।

    ———–

    क्या रूहानी के माता-पिता इस संघर्ष को खत्म कर पाएंगे, या फिर उनका अहंकार और अस्वीकृति उनके रिश्ते की अंतिम परीक्षा साबित होगा? 

    क्या रूहानी का दर्द सच में खत्म होगा, या यह सिर्फ एक और शुरुआत है?

    अद्वैत और रूहानी के बीच खड़े इस तूफान में क्या कोई था जो उनका साथ देगा, या ये आंधी दोनों को एक दूसरे से और दूर कर देगी? 

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    Soul_writer

    लिखकर रूह छूने की कोशिश…..

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