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अधूरी इबादत भाग~21

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भाग~21 आख़िर बोल पड़ी रूहानी 

 

जानकी के थप्पड़ मारते ही रूहानी की देह जैसे संतुलन खो बैठी। गाल की जलन, कानों की गूंज और माँ के हाथों की बेरुखी….. उसे सब कुछ एक साथ महसूस हो रहा था। 

रूहानी का चेहरा झटक कर एक तरफ मुड़ गया और उसकी आँखों में कुछ बुझ-सा गया। उसका शरीर जैसे लड़खड़ा गया, अंदर से जान निकलती महसूस हुई और वह बगल में खड़े अद्वैत की तरफ झुक गई, जैसे आत्मा ही खिंचकर उसके पास चली गई हो।

वो उस पर केवल गिरी नहीं थी बल्कि वो उसमें समा गई। उसका माथा अद्वैत की कंधे से आकर लगा और हाथ खुद-ब-खुद उसकी बाहों को थामते चले गए, जैसे अगर अब उसने उसे नहीं थामा तो वह चूर-चूर होकर ज़मीन पर बिखर जाएगी।

अद्वैत, जो अब तक भीड़ और तमाशे के बीच सबको समझने में लगा हुआ था, उस एक पल में बदल गया…. उसकी नज़रें जल उठीं, जबड़े भिंच गए, और सीना तन गया जैसे कोई आँधी थामे खड़ा हो। उसने रूहानी को एक झटके में अपने बाहों के घेरे में ले लिया… कस कर, हिफाज़त से, जैसे सारी दुनिया को रोक रहा हो उसके गिरने से।

रूहानी का चेहरा अब भी जानकी की हथेली की गर्मी से जल रहा था। गाल पर उभरा लाल निशान साफ दिख रहा था, जो अंदर के आहत आत्मसम्मान और दिल के दर्द से मिलकर उसके चेहरे को और भी पीला और कमज़ोर बना रहा था। 

उसकी आँखें डबडबाई हुई थीं, पर उसने रोना नहीं चुना। नहीं। वो जानती थी कि अगर आज वह टूटी, अगर आज आँसू बहाए, तो ये समाज और ये परिवार उसके आंसुओं की नमी से उसकी आत्मा को हमेशा के लिए गीला कर देंगे, उसे कमज़ोर और हारा हुआ मान लेंगे।

अद्वैत की आंखें अब सीधी रूहानी की भीगी हुई लाल आखों से टकराईं। उन आँखों में गहरा आक्रोश था और अद्वैत की भी आँखों में एक स्त्री के अपमान को देखकर उपजा गुस्सा था, और एक दर्दनाक अविश्वास भी। 

जैसे वो बिना कुछ कहे उससे पूछ रहा हो…. “क्या वाकई इस घर ने, इस परिवार ने तुम्हें कभी अपनाया था?” उसके चेहरे पर गुस्से और अविश्वास का ऐसा मिश्रण था जिसे शब्दों में बांध पाना मुश्किल था। रूहानी की आंखें अब भी भीगी थीं, पर उनमें भी एक अजीब सी स्पष्टता थी, एक छुपा हुआ दृढ़ संकल्प था…. वो टूट नहीं रही थी, वो बस सहारा ले रही थी।

कुछ क्षण तक दोनों बस एक-दूसरे की आँखों में देखते रहे, जैसे तमाचा दोनों को पड़ा हो… एक को शरीर पर, गालों पर और दूसरे को आत्मा पर, दिल पर। उस एक पल के ठहराव में उन्होंने एक-दूसरे की पीड़ा को महसूस किया, एक-दूसरे की हिम्मत को परखा।

रूहानी के अंदर बरसों का घुटा हुआ दर्द, समाज की बंदिशों से मिली घुटन, परिवार की उम्मीदों का बोझ…. सब कुछ अब शब्दों में फूटने को तैयार था। उसकी साँसे तेज़ हो चुकी थीं, और आवाज़ कांपते हुए भी एक सख्त लकीर लिए हुए आई…. जैसे बरसों का घुटा हुआ दर्द आखिर अब शब्दों में फूट पड़ा हो।

पहले तो रूहानी थोड़ी देर चुप रही… फिर धीरे से बोली, “जिस अनजान ने मेरी जान बचाई… जब आप सब ने मुझे मरने के लिए छोड़ दिया था… उसी के घर में, बिना कुछ जाने, आपने मुझ पर इल्ज़ाम लगा दिए? मेरी बात सुने बिना ही मुझे गुनहगार बना दिया?’

फिर वो अचानक वो अचानक अद्वैत के कंधे से थोड़ा अलग होकर पलटी और लगभग चीखते हुए, सीधे अपने माँ-बाप की तरफ देखकर बोली, “आप दोनों ने ही कहा था न… माँ, पापा, कि मैं इस अनजान आदमी के साथ, उसके घर… उसके कमरे, उसके बिस्तर पर… जाने कितनी रातें गुज़ार चुकी हूँ… समाज में बदनामी कर दी…?” 

उसके शब्द आरोपों का जवाब नहीं, बल्कि उन्हीं आरोपों को पलटकर एक सवाल थे, जो सीधे उनके अंतरात्मा पर चोट कर रहे थे।

“तो अब सुन लीजिए… हाँ! ये अनजान अब कोई और नहीं, मेरा पति है! हाँ, मैंने शादी कर ली है! क़ानूनी रूप से, सामाजिक रूप से और हाँ… मेरी मर्जी से! और आप फिर भी मुझे ही कसूरवार ठहरा रहे हैं? उस बदनामी के लिए जिसे आप पहले ही मेरे मत्थे मढ़ चुके थे?”

उसके शब्द जैसे आंगन की हर ईंट पर हथौड़े की तरह गूंजे। सबकुछ थम गया। जानकी और भानु प्रताप की आँखें हैरत, शर्म और अपमान के मिलेजुले भावों से भर उठीं।

उन्हें उम्मीद नहीं थी कि रूहानी इस तरह पलटकर जवाब देगी। मेहमानों के चेहरों पर एक नई सनसनी फैल गई थी, बातें बंद हो गईं थीं, केवल हवा में तैरती रूहानी की आवाज़ की गूंज बची थी।

लेकिन भानु प्रताप का घमंड और क्रोध अब नियंत्रण से बाहर हो चुका था। उनकी बेटी ने, जिसे वो अपनी संपत्ति मानते थे, उनके ही सामने, भरी महफ़िल में उन्हें चुनौती दी थी। वो गुस्से में थरथराते हुए आगे बढ़े, उनके चेहरे पर खून उतर आया था।

उनकी आँखों में अब बेटी के फैसले के लिए सिर्फ़ गुस्सा नहीं था, उसमें अपमान का, अस्वीकृति का और अपने अधिकार के छिन जाने का ज़हर भर गया था।

“मैं अभी के अभी तेरी जान ले लूंगा!” वो गूंजती, कांपती हुई आवाज़ में चीखे और रूहानी की तरफ झपटे, उनका हाथ उठ चुका था।

लेकिन इससे पहले कि उनका हाथ रूहानी तक पहुँचता, अद्वैत एक पल में बिजली की तेज़ी से उसके सामने आ गया। उसने रूहानी को अपने पीछे किया, उसे अपनी बाँहों के सुरक्षा घेरे में लिया। 

वह गरजते हुए, भानु प्रताप की आँखों में आँखें डालकर बोला, “बहुत कर लिया आपने! बहुत सुन लिया आपकी बेटी ने! अब और नहीं। अगर रूहानी को एक खरोंच भी आई, तो मैं ये भूल जाऊँगा कि आप उसके पिता हैं। मैं सिर्फ़ ये याद रखूंगा कि आपने एक महिला का अपमान किया, उस पर हाथ उठाया और वो भी तब जब उसने सिर्फ़ अपने जीवन का फैसला खुद लिया।”

रूहानी सन्न थी। उसका दिल धड़क नहीं रहा था, जैसे कुछ पल को सब थम गया हो। उसने अद्वैत की तरफ देखा…. वो शख्स जिसे उसने अब तक बस एक ‘समझौता’ माना था… अब सामने खड़ा था, जैसे दीवार बनकर। उसकी आंखों में ग़ुस्सा था, पर वो ग़ुस्सा रूहानी के लिए नहीं था…. रूहानी के लिए वो सिर्फ़ ढाल बन गया था।

उसके भीतर कुछ टूटा भी, और कुछ जुड़ भी गया था।

वो समझ नहीं पा रही थी कि ये वही अद्वैत है जो अब तक चुपचाप अपनी सीमाओं में रहता था? क्या ये वही रिश्ता है, जो बस कुछ कागज़ी शर्तों पर टिका था?

रूहानी के मन में सवाल उठ रहे थे…. “क्या ये सब सच है? क्या कोई यूं भी मेरी तरफ खड़ा हो सकता है? बिना किसी मजबूरी के?”

इन सब के बीच आँगन की हवा जैसे एकाएक भारी हो गई थी, इतनी भारी कि साँस लेना मुश्किल लग रहा था। सबकुछ ठहर गया था। भानु प्रताप का उठा हुआ हाथ हवा में जम गया।

मेहमानों के चेहरे अब सहम और चुप्पी में ढल चुके थे। किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि एक शब्द भी कह सके। अद्वैत की आवाज़ में, उसकी आँखों में जो दृढ़ता थी, वो किसी ने पहले नहीं देखी थी।

भानु प्रताप कुछ पल तक जड़ हो गए। उनका गुस्सा, उनका अधिकार, अद्वैत की आँखों के सामने बौना लग रहा था। वह एक दामाद नहीं, आज एक रक्षक की तरह खड़ा था, जिसने न सिर्फ़ अपनी पत्नी की शारीरिक इज़्ज़त को बल्कि उसकी आत्मा को भी थाम लिया था, उसे टूटने से बचा लिया था।

“आप हमें अपनाएँ या नहीं,” अद्वैत ने अब अपने स्वर को थोड़ा शांत किया, लेकिन उसी तेज़ और दृढ़ लहजे में कहा, “ये आपका फ़ैसला है। लेकिन किसी का आत्मसम्मान इस तरह रौंदा नहीं जा सकता। रूहानी आपकी बेटी है, हाँ। लेकिन अब वो मेरी पत्नी भी है और जब तक मैं ज़िंदा हूँ, कोई उसे दुख नहीं पहुँचा सकता…. चाहे वो इस दुनिया में कोई भी हो। उसका सम्मान मेरा सम्मान है और उसकी सुरक्षा मेरी ज़िम्मेदारी।”

उसकी बातों में केवल शब्द नहीं थे, उनमें एक अटूट वादा था, एक ऐसी सच्चाई थी जो पूरे माहौल में घुलती चली गई, पुरानी रूढ़ियों और अपेक्षाओं की दीवारों से टकराती हुई।

अद्वैत ने पहली बार रूहानी का हाथ थामा…. वो भी सबके सामने, बिना किसी हिचकिचाहट के, जैसे कोई फैसले की मुहर लगा रहा हो। उसकी हथेली में रूहानी की उंगलियाँ थरथरा रही थीं, पर इस बार डर नहीं था, बल्कि एक मौन स्वीकार था… और एक बिन बोले गुहार कि “अब मुझे और टूटा हुआ मत देखना।”

अद्वैत का चेहरा शांत था, लेकिन उसकी आंखों में एक सुलगती हुई आग थी…. जैसे उसने तय कर लिया हो कि अब और नहीं, अब कोई और रूहानी को रुलाने का हक़ नहीं रखता। उसने सबके सामने, उसी आँगन में जहाँ अभी कुछ मिनट पहले रूहानी का आत्मसम्मान रौंदा गया था, उस सन्नाटे को चीरते हुए ठहरी हुई आवाज़ में कहा….

“जब आप अपनी बेटी को सच में, पूरे दिल से अपना लेंगे… तब आइएगा उसे देखने के लिए,” अद्वैत ने कहा, जैसे किसी अदालत में अंतिम शब्द सुनाए जा रहे हों। “अब नहीं। आज से ये मेरी पत्नी है और जब तक आप इसे दोषी मानते रहेंगे, तब तक आप हम दोनों से दूर रहेंगे।”

उसकी आवाज़ में कोई ऊँचा स्वर नहीं था, लेकिन हर लफ्ज़ जैसे पत्थर पर चोट करता जा रहा था। वो झुका नहीं, समझौता नहीं किया, सिर्फ़ एक शर्त रख दी…. सम्मान की।

  1. फिर बिना एक पल गँवाए, उसने रूहानी का हाथ और कस कर थामा और दोनों उस दहलीज़ की तरफ बढ़ चले जहाँ से कुछ देर पहले रूहानी को रोक दिया गया था। पर इस बार कोई रोकने वाला नहीं था, सिर्फ़ पीछे छूटा हुआ सन्नाटा और बहुत सारी निगाहें थीं…. जिनमें कुछ हैरानी थी, कुछ ग्लानि और कुछ वो चुप्पियाँ जो अपनी गलती पहचानने के बावजूद कुछ कह नहीं पातीं।

रूहानी ने पीछे मुड़कर एक बार भी नहीं देखा। उसका चेहरा भावशून्य था, लेकिन उसकी चाल में वो वजन था जो केवल उन लड़कियों को आता है जो आत्मगौरव से जीना सीख चुकी हैं। 

और ये जानते हुए भी कि उनका रिश्ता बस एक कागज़ी समझौता है….. एक ‘कॉन्ट्रैक्ट मैरिज’ जो समाज की आंखों में सिर्फ़ एक दिखावा है…. अद्वैत ने रूहानी का साथ वैसे दिया जैसे किसी सच्चे जीवनसाथी को देना चाहिए।

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क्या रूहानी के माता-पिता इस संघर्ष को खत्म कर पाएंगे, या फिर उनका अहंकार और अस्वीकृति उनके रिश्ते की अंतिम परीक्षा साबित होगा? 

क्या रूहानी का दर्द सच में खत्म होगा, या यह सिर्फ एक और शुरुआत है?

अद्वैत और रूहानी के बीच खड़े इस तूफान में क्या कोई था जो उनका साथ देगा, या ये आंधी दोनों को एक दूसरे से और दूर कर देगी? 

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