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  • अधूरी इबादत भाग~19

    अधूरी इबादत भाग~19

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग ~19 दुल्हन… पर अधूरी

     

    अद्वैत की कार जैसे ही चौहान निवास के बाहर आकर रुकी, उस घर की पुरानी दीवारों पर एक नया तनाव उतर आया था। बाहर की धूप हल्की थी, लेकिन कार के भीतर एक अजीब

     सा बोझ था, जो किसी की आंखों से नहीं, लेकिन हर खामोशी से टपक रहा था।

    बैकसीट पर बैठा यश उतावलेपन से दरवाज़ा खोलते ही झट से बाहर निकला और दौड़ता हुआ फ्रंट सीट पर आ गया। रूहानी की खिड़की के पास आकर वह बच्चों जैसी उत्सुकता से बोला, “जल्दी से आओ न दीदी। मां-पापा तुम्हें शादीशुदा देखकर खुश हो जाएंगे।” उसके चेहरे पर उम्मीद थी, नादानी थी, और वो मासूम यक़ीन था जो हालात की गहराई नहीं समझता।

    रूहानी ने यश की ओर नहीं देखा। उसकी नजरें खुद में उलझी थीं। कार की खिड़की पर झुकी, शीशे में खुद को देखा तो बस एक वरमाला थी उसके गले में। ना मांग में सिंदूर, ना हाथों में चूड़ियाँ, ना कोई वो पहचान जो समाज ‘सहजीवन’ से जोड़ता है। और सच कहें तो चेहरा… चेहरा किसी दुल्हन का नहीं, किसी समझौते से झांकते हुए इंसान का था।

    उसने धीरे से अपना हाथ गले पर रखा, वहां, जहां आमतौर पर एक मंगलसूत्र होना चाहिए था… वो खालीपन उसे बाहर से ज़्यादा भीतर चुभ रहा था।

    अद्वैत, जो ड्राइवर सीट पर बैठा था, एकटक उसे देख रहा था। उसका हाथ रूहानी की हर हरकत को पढ़ रहा था जैसे वो कोई किताब हो जिसे वो कई बार दोहरा चुका हो। उसने समझ लिया था…. रूहानी किस दुविधा में है। वह यह जानता था कि ये सिर्फ एक दिखावटी शादी है, लेकिन दिखावे का यह क्षण अब वास्तविक दुनिया में प्रवेश कर चुका था, जहाँ भावनाएं नकाब नहीं पहनतीं।

    इसलिए अद्वैत ने यश की ओर मुड़कर नरम लेकिन तय स्वर में कहा, “तुम्हारी दीदी तुम्हारे जीजाजी के साथ पहली बार घर आ रही है तो क्या स्वागत नहीं करोगे?”

    यश ने जैसे किसी भूली हुई रस्म को याद करते हुए अपनी दोनों हथेलियों से सिर पीटा, “अरे, जीजाजी, मैं तो भूल ही गया था। जरूर स्वागत होगा। मैं करूंगा ना। आपने बिल्कुल सही कहा। मैं अभी जाता हूं, आप भी दीदी को लेकर जल्दी से आना।” और वो फुर्ती से घर की ओर भाग गया।

    अद्वैत ने उसकी मासूम ऊर्जा पर मुस्कराते हुए कहा, “हां, तुम जाओ, हम दोनों अभी आते हैं।”

    अब कार के भीतर फिर वही सन्नाटा था, पर अब उसमें सवाल थे।

    ——–

    यश के अकेले घर में प्रवेश करते ही उसकी मां जानकी चौहान के चेहरे पर चिंता, शर्म और ग़ुस्से की मिली-जुली रेखाएँ खिंच गई थीं। उसकी आँखों में हज़ार सवाल तैर रहे थे और लहजा ऐसा जैसे किसी ज्वालामुखी ने फूटने की पूरी तैयारी कर ली हो।

    उसने यश की कलाई कसकर पकड़ी और लगभग घसीटते हुए उसे हॉल से दूर कोने की ओर ले गई, जहाँ से भानु प्रताप की नज़रें उन पर न पड़ें।

    उसका स्वर धीमा नहीं था, पर डर और बेचैनी से भरा हुआ था, “सुबह-सुबह ही निकल गया था न तू उस बेशर्म के साथ, तो आने में दोपहर कैसे हो गई? और शॉपिंग का सामान कहां है? खाली हाथ क्यों आया है तू, और वो बेशर्म कहां रह गई?”

    वो जैसे रुकी ही नहीं। उसकी सांसें तेज़ चल रही थीं, होंठ कांप रहे थे और माथे पर पसीने की एक महीन परत थी। “कहीं भाग तो नहीं गई? हाय राम! अब तो हम कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रहे। हॉल में तेरे पापा के दोस्त और उनका पूरा परिवार आया हुआ है। कब से रूहानी से मिलने के लिए बोल रहे हैं, और मैं आधे घंटे से कहे जा रही हूं कि वो अपने भाई के साथ खरीदारी करने गई है। बोल मेरे बेटे, कहां छोड़ आया है उसे?”

    यश ने मां के कंधों को पकड़ कर हल्के से दबाया, जैसे उसकी थरथराहट को थाम लेना चाहता हो। उसकी आवाज़ में वो संयम था जो अक्सर बच्चों में नहीं होता, लेकिन इस वक़्त उसके चेहरे पर एक अलग किस्म की समझदारी झलक रही थी।

    “मुझे बोलने दोगी, तब न मैं कुछ बता पाऊंगा,” उसने माँ की आँखों में देखकर कहा, “तब से तो एक ही सांस में बोले जा रही हो। दीदी मेरे ही साथ थी, बस पीछे से आ रही हैं…”

    ——– 

    इधर, अद्वैत ने जैसे ही कार के ग्लव बॉक्स से वो छोटी सी डिब्बी निकाली और रूहानी की ओर बढ़ाई, उसकी आँखों में एक अजीब सी गहराई थी—जैसे वो जानता हो कि ये क्षण नाटकीय नहीं, पर जरूरी है। “ये लो,” उसने धीमे से कहा, “इसे पहन लो, वरना तुम्हारे मां-पापा को शक हो जाएगा।”

    रूहानी ने कुछ नहीं कहा। बस उसके हाथ से वो डिब्बी ली और धीरे से खोली। उसमें एक छोटा सा फैंसी मंगलसूत्र था—सस्ता, लेकिन अपनी भूमिका में सटीक। उसका दिल थोड़ी देर को जैसे ठहर गया। उसने उस मंगलसूत्र को हथेलियों में रखा और उंगलियों से हल्के हल्के मसलने लगी, जैसे वो धातु नहीं कोई विचार हो—कभी अपना, कभी पराया।

    अद्वैत उसकी उंगलियों के कम्पन और उसके माथे की संकोचभरी सिलवटों को पढ़ रहा था। उसकी नजरें कहीं ठहरी नहीं थीं, पर सब देख रही थीं। वो समझ गया कि ये नाटक उनके लिए बाहरी दुनिया को दिखाने के लिए है, लेकिन रूहानी के भीतर कुछ बहुत गहरा टूटा और जुड़ता जा रहा है।

    “और हां,” उसने एक और डिब्बी बढ़ाते हुए कहा, “इसे मत भूल जाना… मैं यहीं बाहर हूं।”

    इतना कहकर अद्वैत कार से बाहर निकल गया और उसकी तरफ पीठ कर के खड़ा हो गया, जैसे उसे खुद को भी इस दृश्य से अलग रखना हो।

    कार के अंदर अब सिर्फ रूहानी थी और एक अजीब सी चुप्पी। उसने मंगलसूत्र को बिना ज़्यादा सोचे, एक ही झटके में पहन लिया। उसके बाद जब उसने दूसरी डिब्बी खोली, तो उसमें लाल रंग का सिंदूर देखकर उसका दिल एक बार फिर कांप गया। उंगलियां ठिठकीं, आँखें नम हुईं। वो आईने में खुद को देख रही थी….. एक ऐसी स्त्री, जो शादीशुदा दिखने जा रही थी, लेकिन मन के किसी कोने में अभी भी कुछ अधूरा, कुछ अनकहा ज़िंदा था।

    आईने में उसका अक्स बदलता गया। उसे अपना पुराना चेहरा याद आया—वो लड़की जो कुछ साल पहले अपने करियर, अपनी पहचान और एक सच्चे प्रेम के ख्वाब के साथ ज़िंदगी को देखने निकली थी। मगर उस प्रेम ने धोखा दिया था, और करियर अब उस मोड़ पर आ खड़ा हुआ था जहाँ झूठ की परत चढ़ानी पड़ रही थी।

    पर अब वक्त उन बातों का नहीं था। वो जानती थी कि एक परछाईं की तरह अतीत उसके साथ चल सकती है, लेकिन आज जो सामने खड़ा है, उससे नज़रें नहीं चुराई जा सकतीं। उसने एक चुटकी सिंदूर उठाया और अपनी मांग में भर लिया—सिर्फ इसलिए नहीं कि दुनिया देखे, बल्कि इसलिए कि वो खुद उस भूमिका को निभा सके जो उससे उम्मीद की जा रही थी।

    बाहर खड़े अद्वैत की पीठ की तरफ देखते हुए उसने गहरी साँस ली और दरवाज़ा खोल कर कहा, “चलो, मैं तैयार हूं।”

    अद्वैत ने जब उसकी आवाज़ सुनी, तो मुड़कर देखा। उसके हाथ अपने वरमाला को ठीक कर रहे थे, पर निगाहें रूहानी के चेहरे पर जम गईं। एक पल को वो ठिठक गया। सामने खड़ी औरत वही थी जिससे उसने एक समझौता किया था, लेकिन अब उसमें कुछ बदल गया था…. वो सिर्फ रूहानी नहीं रही, उसमें कहीं छुपकर उसकी ‘पत्नी’ भी झलकने लगी थी।

    “तुम…” बस इतना ही कहा अद्वैत ने, उसकी आंखों में एक अबोझ सी चमक थी।_

    रूहानी ने घबरा कर कहा, “क्या हुआ? कुछ ठीक से नहीं है क्या?” वो अपनी वरमाला, मंगलसूत्र और सिंदूर को टटोलने लगी, जैसे कोई बच्चा हो जिसने पहली बार कुछ पहन कर आईने में खुद को देखा हो।

    “नहीं… सब ठीक है…” अद्वैत ने अपनी कल्पना से बाहर आते हुए कहा, “चलो चलते हैं।”

    दोनों घर के मेन गेट के पास पहुँचे। हवा थोड़ी गर्म थी, लेकिन उनके बीच एक अजीब सी ठंडक पसरी हुई थी…. शब्दों की, भावनाओं की, और उन अहसासों की जो ज़ोर से कहे नहीं जा सकते।

    उधर थोड़ी दूरी पर एक नौजवान लड़का…. तनाव और झुंझलाहट से टहलता हुआ…. बेसब्री से बोला, “यश, कहां रह गई रूहानी? मुझसे अब बर्दाश्त नहीं हो रहा।”

    यश ने तुरंत गेट की ओर इशारा किया, “वो रही दीदी…”

    और फिर सब जैसे रुक गया।

    जानकी चौहान, भानु प्रताप और उनके साथ बैठे मेहमान…. सभी की नज़रें एक साथ मेन गेट पर टिक गईं। सबने एक ही पल में देखा…. रूहानी, एक अनजान आदमी के साथ, वरमाला पहने, सिंदूर लगाए, गले में मंगलसूत्र डाले।

    कुछ क्षणों तक बस एक सन्नाटा था। फिर वो सन्नाटा जैसे किसी ने चीख से तोड़ दिया हो। जानकी की आँखों में विश्वास टूटने की दहशत थी, भानु प्रताप की मुट्ठियाँ सख्त हो गई थीं, और मेहमानों की फुसफुसाहटें एक भरी सभा में ज्वालामुखी जैसी गूंज रही थीं।

    ————-

    क्या ये सिर्फ एक दिखावा था, या इस नाटक ने वाकई कुछ बदल दिया था?

    क्या जानकी की आँखों में जो दहशत थी, वो एक माँ का डर था या एक औरत का टूटा हुआ घमंड?

    भानु प्रताप की सख्त मुट्ठियाँ… क्या वो सिर्फ गुस्से की थीं, या किसी पुराने राज़ की दस्तक थी?

    रूहानी के क़दमों ने चौहान निवास में जो तूफ़ान लाया था… क्या अब उससे कोई बच पाएगा?

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    Soul_writer

    लिखकर रूह छूने की कोशिश….. 🥹🥹

  • अबके बरस..💘💘

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    वाराणसी की गलियों में बारिश का अपना ही संगीत होता है—भीगी हुई मिट्टी की खुशबू, मंदिरों की घंटियों में घुलती बूंदों की लय, और गंगा के किनारे बहती ठंडी हवा। उसी शहर में, उसी बारिश के मौसम में, एक अधूरी प्रेम कहानी हर साल जन्म लेती थी… और हर साल अधूरी ही रह जाती थी।

     

    आरव को बारिश से प्यार था, लेकिन उससे भी ज़्यादा उस लड़की से, जो हर बरसात में अचानक उसकी जिंदगी में आ जाती थी—नैना।

     

    पहली बार वह उसे पाँच साल पहले सावन की पहली बारिश में मिला था। आरव अस्सी घाट पर भीगता हुआ खड़ा था, तभी उसने देखा—सफेद सलवार में एक लड़की, हाथों में चूड़ियाँ, बालों से टपकती बूंदें, और चेहरे पर अजीब सी मुस्कान। वह जैसे बारिश को महसूस नहीं कर रही थी, बल्कि बारिश उसके अंदर उतर रही थी।

     

    “तुम भीग क्यों रहे हो?” नैना ने पूछा था।

     

    आरव ने हंसते हुए जवाब दिया था, “क्योंकि बारिश रुकने का इंतजार करना मुझे पसंद नहीं।”

     

    “और मुझे बारिश में खो जाना पसंद है,” उसने कहा था।

     

    उस दिन दोनों घंटों साथ बैठे रहे। बातें खत्म ही नहीं हो रही थीं। जैसे बरसों से एक-दूसरे को जानते हों। लेकिन शाम ढलते-ढलते, जब आरव ने उसका नंबर माँगा, नैना मुस्कुरा कर चली गई। बस इतना कहा—“अगर किस्मत हुई, तो अगले बरस मिलेंगे।”

     

    आरव को लगा था यह बस एक अजीब सी मुलाकात थी, जो खत्म हो गई। लेकिन अगले साल, ठीक उसी दिन, उसी जगह… नैना फिर मिल गई।

     

    “तुम आ गए,” उसने कहा।

     

    “तुम भी,” आरव ने जवाब दिया।

     

    उस दिन भी वही हुआ—लंबी बातें, हंसी, चाय, और फिर विदाई। कोई नंबर नहीं, कोई वादा नहीं। बस एक उम्मीद—“अबके बरस फिर मिलेंगे।”

     

    इस तरह चार साल बीत गए। हर साल सावन में वे मिलते, प्यार थोड़ा और गहरा होता, लेकिन कभी किसी ने इज़हार नहीं किया। जैसे दोनों को डर हो कि इज़हार करते ही यह जादू खत्म हो जाएगा।

     

    लेकिन पाँचवें साल कुछ बदल गया था।

     

    इस बार आरव ने तय कर लिया था—वह नैना को जाने नहीं देगा। वह उसे बताएगा कि वह उससे प्यार करता है, कि वह हर साल सिर्फ उसी के लिए जीता है, कि उसकी जिंदगी अब इन बरसाती मुलाकातों से कहीं ज़्यादा चाहती है।

     

    सावन की पहली बारिश हुई, और आरव अस्सी घाट पर पहले से खड़ा था। दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। हर आती-जाती लड़की में उसे नैना दिख रही थी। लेकिन वह नहीं आई।

     

    घंटे बीत गए। बारिश तेज़ हो गई। घाट खाली होने लगा। आरव का दिल टूटने लगा।

     

    “शायद इस बार किस्मत नहीं थी…” उसने खुद से कहा।

     

    वह जाने ही वाला था कि पीछे से वही आवाज़ आई—“इतनी जल्दी हार मान गए?”

     

    आरव पलटा। नैना थी। भीगी हुई, मुस्कुराती हुई… लेकिन इस बार उसकी आँखों में कुछ अलग था—जैसे कोई दर्द, कोई झिझक।

     

    “तुम आई क्यों नहीं?” आरव ने शिकायत की।

     

    “आई तो हूँ,” उसने धीरे से कहा, “बस थोड़ी देर हो गई।”

     

    दोनों फिर साथ बैठे। लेकिन इस बार बातचीत में वो पुरानी हल्कापन नहीं था। कुछ अनकहा, कुछ अधूरा सा हवा में तैर रहा था।

     

    आखिरकार, आरव ने हिम्मत जुटाई—“नैना, मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ।”

     

    “मत कहो,” उसने तुरंत कहा।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर तुमने कह दिया, तो शायद हम फिर कभी नहीं मिल पाएंगे।”

     

    आरव चुप हो गया। “क्या मतलब?”

     

    नैना ने गहरी सांस ली। “हर साल मैं यहाँ इसलिए आती थी क्योंकि मुझे लगता था कि कुछ चीजें अधूरी ही खूबसूरत होती हैं। अगर हम इन्हें पूरा करने की कोशिश करेंगे, तो ये टूट जाएंगी।”

     

    “लेकिन मैं अधूरा नहीं रहना चाहता,” आरव ने कहा। “मैं तुम्हारे साथ पूरा होना चाहता हूँ।”

     

    नैना की आँखों में आँसू आ गए। “तुम समझ नहीं रहे…”

     

    “तो समझाओ,” आरव ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा। “इस बार मैं तुम्हें ऐसे नहीं जाने दूंगा।”

     

    कुछ पल की खामोशी के बाद, नैना ने कहा—“मैं हर साल इसलिए आती थी क्योंकि मैं खुद से भाग रही थी। मेरी शादी तय हो चुकी थी… पाँच साल पहले ही।”

     

    आरव का दिल जैसे थम गया। “क्या?”

     

    “हाँ,” नैना ने सिर झुका लिया। “मैं हर साल यहाँ आती थी, क्योंकि तुम्हारे साथ वो जिंदगी जी पाती थी, जो मेरी नहीं थी।”

     

    “और अब?” आरव ने कांपती आवाज़ में पूछा।

     

    “अब मेरी शादी अगले महीने है,” उसने कहा।

     

    बारिश और तेज़ हो गई। जैसे आसमान भी इस कहानी का दर्द महसूस कर रहा हो।

     

    आरव ने कुछ देर तक कुछ नहीं कहा। फिर धीरे से बोला—“क्या तुम खुश हो?”

     

    नैना चुप रही।

     

    “सच-सच बताओ,” आरव ने ज़ोर दिया।

     

    उसकी आँखों से आँसू बह निकले। “नहीं।”

     

    “तो फिर ये शादी क्यों?” आरव ने पूछा।

     

    “क्योंकि मैंने कभी हिम्मत नहीं की,” उसने कहा। “मैंने कभी अपने दिल की नहीं सुनी।”

     

    आरव ने उसका हाथ कसकर पकड़ा। “तो अब सुनो। अबके बरस, हम इस कहानी को अधूरा नहीं छोड़ेंगे।”

     

    “लेकिन सब कुछ इतना आसान नहीं है,” नैना ने कहा।

     

    “कुछ भी आसान नहीं होता,” आरव मुस्कुराया, “लेकिन प्यार अगर सच्चा हो, तो रास्ते खुद बन जाते हैं।”

     

    उस रात, दोनों ने बहुत देर तक बातें कीं। डर, उम्मीदें, सपने—सब कुछ सामने रख दिया। और पहली बार, उन्होंने अपने प्यार को नाम दिया।

     

    अगले कुछ दिन कठिन थे। नैना ने अपने परिवार से बात की। आँसू, गुस्सा, सवाल—सब कुछ हुआ। लेकिन इस बार, वह पीछे नहीं हटी।

     

    “मैं अपनी जिंदगी खुद चुनना चाहती हूँ,” उसने दृढ़ता से कहा।

     

    आरव भी उसके साथ खड़ा रहा। हर मुश्किल में, हर डर में।

     

    और फिर, एक दिन… सब बदल गया।

     

    नैना के परिवार ने आखिरकार उसकी बात मान ली। शायद उन्होंने उसकी आँखों में सच्चाई देख ली थी, या शायद उन्होंने समझ लिया था कि प्यार को रोका नहीं जा सकता।

     

    सावन की आखिरी बारिश थी। अस्सी घाट फिर भीग रहा था। लेकिन इस बार, कहानी अलग थी।

     

    नैना लाल साड़ी में थी, और आरव उसके सामने खड़ा था—हाथों में वरमाला।

     

    “तो अबके बरस…?” आरव ने मुस्कुराते हुए पूछा।

     

    “अबके बरस,” नैना ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “हमेशा के लिए।”

     

    दोनों ने एक-दूसरे को वरमाला पहनाई। बारिश उनके चारों ओर नाच रही थी, जैसे आशीर्वाद दे रही हो।

     

    “तुम्हें पता है,” आरव ने धीरे से कहा, “मुझे हमेशा लगता था कि बारिश हमें मिलाने के लिए आती है।”

     

    “और अब?” नैना ने पूछा।

     

    “अब लगता है,” उसने उसका हाथ थामते हुए कहा, “बारिश हमारी कहानी का हिस्सा बन गई है।”

     

    नैना मुस्कुरा दी। “शायद इसलिए, क्योंकि हमने इस बार उसे अधूरा नहीं छोड़ा।”

     

    गंगा के किनारे, बारिश की बूंदों के बीच, दो दिल आखिरकार एक हो गए।

     

    और उस दिन के बाद, हर सावन सिर्फ एक मौसम नहीं रहा—वह उनकी प्रेम कहानी का उत्सव बन गया।

     

    अबके बरस, उन्होंने सिर्फ एक-दूसरे को नहीं पाया… बल्कि अपनी पूरी जिंदगी पा ली।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।