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No love clause

पढ़ने का समय : 6 मिनट

भाग 3

 

राजावत ग्रुप…

 

दोपहर के करीब डेढ़ बजे…

 

तेज़ कदमों से चलती हुई वेदा और अपर्णा कंपनी के अंदर दाखिल हुईं। रिसेप्शन पर बैठे कर्मचारियों की नज़र जैसे ही वेदा पर पड़ी, कई लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

 

“आज पहली बार मिस वेदा लेट हुई हैं…”

 

“सुना है बॉस सुबह से कई बार पूछ चुके हैं इनके बारे में…”

 

“अब तो आज किसी की खैर नहीं…”

धीमी-धीमी फुसफुसाहट पूरे फ्लोर पर फैल गई।

 

वेदा ने किसी की तरफ ध्यान नहीं दिया। क्योंकि उसका मन अभी भी अस्पताल में, विहान के पास अटका हुआ था। इसलिए आज उसे किसी की फिक्र नहीं थी। 

 

“तू पहले HR से बात कर ले।” अपर्णा ने धीमे से कहा।

 

वेदा ने हामी में सिर हिलाया। फिर दोनों सीधे ह्यूमन रिसोर्स डिपार्टमेंट की तरफ बढ़ गईं।

 

 

करीब बीस मिनट बाद…

 

HR मैनेजर ने सामने रखी फाइल बंद करते हुए एक लंबी साँस ली।

 

“मिस वेदा… सबसे पहले तो मुझे आपके भाई के बारे में सुनकर बहुत दुख हुआ।”

 

वेदा चुपचाप बैठी रही। क्योंकि उसे फिलहाल किसी की हमदर्दी की नहीं एक बहुत बड़ी रकम की जरूरत थी। 

 

HR मैनेजर श्रुति ने आगे कहा, “मैंने आपकी पूरी फाइल चेक की है।” फिर वेदा की तरफ देखते हुए बोली, “कंपनी की मेडिकल असिस्टेंस पॉलिसी के तहत आपको आर्थिक सहायता मिल सकती है…”

 

वेदा की आँखों में उम्मीद की एक हल्की-सी किरण चमकी। “कितनी…?”

 

HR मैनेजर ने बहुत सोचते हुए धीमी आवाज में कहा, “अधिकतम दस लाख रुपये।”

 

बस… इतना सुनते ही वह उम्मीद भी बुझ गई। दस लाख… जबकि उसे चाहिए थे… एक करोड़ बीस लाख। लगभग दस गुना ज़्यादा। HR मैनेजर ने अफसोस जताते हुए कहा, “काश मैं इससे ज़्यादा कर पाता, लेकिन कंपनी के नियम…”

 

वेदा ने मुस्कुराने की कोशिश की। “इट्स ओके, मैम!”

 

उसने फाइल उठाई। “थैंक यू।” कहकर वो धीमे कदमों से चलते हुए बाहर आ गई।

 

 

कॉरिडोर में आते ही अपर्णा ने उसका चेहरा देखा। उसे बिना पूछे ही जवाब मिल गया था। “नहीं हुआ…?”

 

वेदा ने बस ना में सिर हिला दिया। “सिर्फ़ दस लाख।”

 

दोनों कुछ पल खामोश खड़ी रहीं। तभी… “मिस वेदा!”

 

पीछे से आवाज़ आई, दोनों ने मुड़कर देखा। निशांत तेज़ी से उनकी तरफ आ रहा था। “सर कब से आपको बुला रहे हैं।”

वेदा का दिल ज़ोर से धड़क उठा। उसे याद आया… वह बिना किसी सूचना के ऑफिस नहीं आई थी।

“मैं अभी आती हूँ।”

 

उसने अपने आँसू पोंछे और अग्नि के केबिन की तरफ बढ़ गई।

 

 

सीईओ केबिन…

 

वेदा ने दरवाज़े पर दस्तक दी। “May I come in, sir?”

 

अंदर से ठंडी आवाज़ आई,  “Come.”

 

वेदा अंदर चली गई। अग्नि अपनी कुर्सी पर बैठा कुछ डॉक्यूमेंट्स देख रहा था।

 

उसने बिना ऊपर देखे कहा,  “Sit.”

 

वेदा चुपचाप बैठ गई। करीब दो मिनट तक पूरे कमरे में सिर्फ़ फाइलों के पन्ने पलटने की आवाज़ आती रही। 

 

फिर… अग्नि ने फाइल बंद की। उसकी बर्फ जैसी नीली आँखें सीधे वेदा पर टिक गईं। “राजावत ग्रुप में काम करते हुए तुम्हें कितने साल हो गए?”

 

वेदा धीमे से, “तीन साल, सर।”

 

अग्नि, “और इन तीन सालों में… कभी भी तुमने इतनी बड़ी लापरवाही नहीं की… जितनी बड़ी आज की है। तुम बिना किसी को इनफॉर्म किए ऑफिस से आधे दिन गायब रही। क्या तुमने पहले ऐसा कभी कुछ किया?”

 

वेदा ने ना में सिर हिलाया, “न… नहीं सर।”

 

अग्नि, “फिर आज क्या अलग था?”

 

वेदा कुछ पल चुप रही। वह अपने निजी जीवन को कभी ऑफिस में नहीं लाती थी। लेकिन आज…

 

मजबूरी उसके आत्मसम्मान से बड़ी हो चुकी थी। “सर… मेरा छोटा भाई अस्पताल में भर्ती है। उसकी हालत अचानक…”

 

आगे के शब्द उसके गले में अटक गए। अग्नि कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।

 

फिर पहले जैसी ठंडी आवाज़ में बोला, “Personal life is personal.”

 

“But office discipline is office discipline. Next time… inform before you disappear.”

 

वेदा ने धीरे से सिर झुका दिया। “Sorry, sir.”

 

अग्नि ने इंटरकॉम उठाया। ”निशांत।”

 

दूसरी तरफ से निशांत की आवाज आई, “Yes, sir.”

 

अग्नि ने उसे ऑर्डर दिया, “आज की सारी मीटिंग्स पोस्टपोन कर दो। और मिस वेदा को आज आधे दिन की छुट्टी दे दो।”

 

वेदा ने हैरानी से उसकी तरफ देखा। अभी कुछ सेकंड पहले जो आदमी उसे डाँट रहा था… वही अब उसे छुट्टी दे रहा था।

 

अग्नि ने फिर फाइल उठाते हुए कहा, “अपने भाई का ध्यान रखो। बाकी काम कल हो जाएगा।”

 

वेदा कुछ कहना चाहती थी… लेकिन शब्द नहीं मिले।

“Thank you, sir.”

 

वह धीरे से बाहर निकल गई। दरवाज़ा बंद होते ही अग्नि ने अपनी कुर्सी की बैक पर सिर टिका दिया।

उसे नहीं पता था… आख़िर क्यों पहली बार किसी कर्मचारी की निजी परेशानी उसके मन में रह गई थी।

 

 

उसी शाम,  राजावत मेंशन…

 

शहर के पोश एरिया में बना राजावत मेंशन, अलग ही रोशनी में नहाया हुआ था। मेंशन के सिटिंग हॉल में इस समय अग्नि के दादा जी, उसकी माँ, चाचा और चाची मौजूद थे।

तभी मेंशन के पोर्च में अग्नि की कार आकर रूकी और वो तेजी से बाहर निकला और सीधा मेंशन के मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़ गया।

 

उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं थे।

 

सीटिंग एरिया में आते ही सबसे पहले उसकी नजर अपने दादा जी विक्रम राजावत पर गई।

“ आपने मुझे बुलाया दादा जी?” सीना ताने खड़े अग्नि ने कहा।

 

आवाज सुनकर सबकी नजरें अग्नि पर टिक गई, वहीं अग्नि की नजर सिर्फ और सिर्फ विक्रम जी पर टिकी थी।

 

“लगता है तुम अपनी तमीज भूल चुके हो।”

विक्रम राजावत की रौबदार आवाज़ पूरे सिटिंग हॉल में गूँज उठी।

 

अग्नि के चेहरे पर कोई खास बदलाव नहीं आया। उसने बस एक पल के लिए कमरे में मौजूद बाकी लोगों पर नज़र डाली। उसकी माँ सविता राजावत सोफे पर चुपचाप बैठी थीं। उनके चेहरे पर बेटे को देखकर राहत भी थी और चिंता भी।

 

दूसरी तरफ उसके चाचा अमित राजावत और चाची सुमित्रा राजावत बैठे थे। उनके साथ उनका बेटा राघव और बेटी रिया भी मौजूद थे।

 

अग्नि की नजर राघव पर पड़ी। राघव ने तुरंत अपनी नजरें दूसरी तरफ कर लीं। अग्नि सब समझता था।

उसे इस परिवार में मौजूद हर मुस्कान के पीछे छिपा मतलब पता था।

 

विक्रम राजावत ने गुस्से में कहा, “हमारे संस्कारों में सबसे पहले बड़ों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।”

 

अग्नि ने कहा, “ बड़े आशीर्वाद देने के लायक होते तो जरूर लेता।” उसकी ठंडी निगाहे विक्रम जी पर टिकी थी।

 

विक्रम जी आगे बोले, “ स्टडी में चलो हमें तुमसे एक जरूरी बात करती है।”

 

क्रमशः….

कहानी आगे जारी रहेगी।

देरी के लिए माफी 

पढ़ते रहिए 

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