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टैग: रोमांस

  • No love clause

    No love clause

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग 3

     

    राजावत ग्रुप…

     

    दोपहर के करीब डेढ़ बजे…

     

    तेज़ कदमों से चलती हुई वेदा और अपर्णा कंपनी के अंदर दाखिल हुईं। रिसेप्शन पर बैठे कर्मचारियों की नज़र जैसे ही वेदा पर पड़ी, कई लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    “आज पहली बार मिस वेदा लेट हुई हैं…”

     

    “सुना है बॉस सुबह से कई बार पूछ चुके हैं इनके बारे में…”

     

    “अब तो आज किसी की खैर नहीं…”

    धीमी-धीमी फुसफुसाहट पूरे फ्लोर पर फैल गई।

     

    वेदा ने किसी की तरफ ध्यान नहीं दिया। क्योंकि उसका मन अभी भी अस्पताल में, विहान के पास अटका हुआ था। इसलिए आज उसे किसी की फिक्र नहीं थी। 

     

    “तू पहले HR से बात कर ले।” अपर्णा ने धीमे से कहा।

     

    वेदा ने हामी में सिर हिलाया। फिर दोनों सीधे ह्यूमन रिसोर्स डिपार्टमेंट की तरफ बढ़ गईं।

     

     

    करीब बीस मिनट बाद…

     

    HR मैनेजर ने सामने रखी फाइल बंद करते हुए एक लंबी साँस ली।

     

    “मिस वेदा… सबसे पहले तो मुझे आपके भाई के बारे में सुनकर बहुत दुख हुआ।”

     

    वेदा चुपचाप बैठी रही। क्योंकि उसे फिलहाल किसी की हमदर्दी की नहीं एक बहुत बड़ी रकम की जरूरत थी। 

     

    HR मैनेजर श्रुति ने आगे कहा, “मैंने आपकी पूरी फाइल चेक की है।” फिर वेदा की तरफ देखते हुए बोली, “कंपनी की मेडिकल असिस्टेंस पॉलिसी के तहत आपको आर्थिक सहायता मिल सकती है…”

     

    वेदा की आँखों में उम्मीद की एक हल्की-सी किरण चमकी। “कितनी…?”

     

    HR मैनेजर ने बहुत सोचते हुए धीमी आवाज में कहा, “अधिकतम दस लाख रुपये।”

     

    बस… इतना सुनते ही वह उम्मीद भी बुझ गई। दस लाख… जबकि उसे चाहिए थे… एक करोड़ बीस लाख। लगभग दस गुना ज़्यादा। HR मैनेजर ने अफसोस जताते हुए कहा, “काश मैं इससे ज़्यादा कर पाता, लेकिन कंपनी के नियम…”

     

    वेदा ने मुस्कुराने की कोशिश की। “इट्स ओके, मैम!”

     

    उसने फाइल उठाई। “थैंक यू।” कहकर वो धीमे कदमों से चलते हुए बाहर आ गई।

     

     

    कॉरिडोर में आते ही अपर्णा ने उसका चेहरा देखा। उसे बिना पूछे ही जवाब मिल गया था। “नहीं हुआ…?”

     

    वेदा ने बस ना में सिर हिला दिया। “सिर्फ़ दस लाख।”

     

    दोनों कुछ पल खामोश खड़ी रहीं। तभी… “मिस वेदा!”

     

    पीछे से आवाज़ आई, दोनों ने मुड़कर देखा। निशांत तेज़ी से उनकी तरफ आ रहा था। “सर कब से आपको बुला रहे हैं।”

    वेदा का दिल ज़ोर से धड़क उठा। उसे याद आया… वह बिना किसी सूचना के ऑफिस नहीं आई थी।

    “मैं अभी आती हूँ।”

     

    उसने अपने आँसू पोंछे और अग्नि के केबिन की तरफ बढ़ गई।

     

     

    सीईओ केबिन…

     

    वेदा ने दरवाज़े पर दस्तक दी। “May I come in, sir?”

     

    अंदर से ठंडी आवाज़ आई,  “Come.”

     

    वेदा अंदर चली गई। अग्नि अपनी कुर्सी पर बैठा कुछ डॉक्यूमेंट्स देख रहा था।

     

    उसने बिना ऊपर देखे कहा,  “Sit.”

     

    वेदा चुपचाप बैठ गई। करीब दो मिनट तक पूरे कमरे में सिर्फ़ फाइलों के पन्ने पलटने की आवाज़ आती रही। 

     

    फिर… अग्नि ने फाइल बंद की। उसकी बर्फ जैसी नीली आँखें सीधे वेदा पर टिक गईं। “राजावत ग्रुप में काम करते हुए तुम्हें कितने साल हो गए?”

     

    वेदा धीमे से, “तीन साल, सर।”

     

    अग्नि, “और इन तीन सालों में… कभी भी तुमने इतनी बड़ी लापरवाही नहीं की… जितनी बड़ी आज की है। तुम बिना किसी को इनफॉर्म किए ऑफिस से आधे दिन गायब रही। क्या तुमने पहले ऐसा कभी कुछ किया?”

     

    वेदा ने ना में सिर हिलाया, “न… नहीं सर।”

     

    अग्नि, “फिर आज क्या अलग था?”

     

    वेदा कुछ पल चुप रही। वह अपने निजी जीवन को कभी ऑफिस में नहीं लाती थी। लेकिन आज…

     

    मजबूरी उसके आत्मसम्मान से बड़ी हो चुकी थी। “सर… मेरा छोटा भाई अस्पताल में भर्ती है। उसकी हालत अचानक…”

     

    आगे के शब्द उसके गले में अटक गए। अग्नि कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।

     

    फिर पहले जैसी ठंडी आवाज़ में बोला, “Personal life is personal.”

     

    “But office discipline is office discipline. Next time… inform before you disappear.”

     

    वेदा ने धीरे से सिर झुका दिया। “Sorry, sir.”

     

    अग्नि ने इंटरकॉम उठाया। ”निशांत।”

     

    दूसरी तरफ से निशांत की आवाज आई, “Yes, sir.”

     

    अग्नि ने उसे ऑर्डर दिया, “आज की सारी मीटिंग्स पोस्टपोन कर दो। और मिस वेदा को आज आधे दिन की छुट्टी दे दो।”

     

    वेदा ने हैरानी से उसकी तरफ देखा। अभी कुछ सेकंड पहले जो आदमी उसे डाँट रहा था… वही अब उसे छुट्टी दे रहा था।

     

    अग्नि ने फिर फाइल उठाते हुए कहा, “अपने भाई का ध्यान रखो। बाकी काम कल हो जाएगा।”

     

    वेदा कुछ कहना चाहती थी… लेकिन शब्द नहीं मिले।

    “Thank you, sir.”

     

    वह धीरे से बाहर निकल गई। दरवाज़ा बंद होते ही अग्नि ने अपनी कुर्सी की बैक पर सिर टिका दिया।

    उसे नहीं पता था… आख़िर क्यों पहली बार किसी कर्मचारी की निजी परेशानी उसके मन में रह गई थी।

     

     

    उसी शाम,  राजावत मेंशन…

     

    शहर के पोश एरिया में बना राजावत मेंशन, अलग ही रोशनी में नहाया हुआ था। मेंशन के सिटिंग हॉल में इस समय अग्नि के दादा जी, उसकी माँ, चाचा और चाची मौजूद थे।

    तभी मेंशन के पोर्च में अग्नि की कार आकर रूकी और वो तेजी से बाहर निकला और सीधा मेंशन के मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़ गया।

     

    उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं थे।

     

    सीटिंग एरिया में आते ही सबसे पहले उसकी नजर अपने दादा जी विक्रम राजावत पर गई।

    “ आपने मुझे बुलाया दादा जी?” सीना ताने खड़े अग्नि ने कहा।

     

    आवाज सुनकर सबकी नजरें अग्नि पर टिक गई, वहीं अग्नि की नजर सिर्फ और सिर्फ विक्रम जी पर टिकी थी।

     

    “लगता है तुम अपनी तमीज भूल चुके हो।”

    विक्रम राजावत की रौबदार आवाज़ पूरे सिटिंग हॉल में गूँज उठी।

     

    अग्नि के चेहरे पर कोई खास बदलाव नहीं आया। उसने बस एक पल के लिए कमरे में मौजूद बाकी लोगों पर नज़र डाली। उसकी माँ सविता राजावत सोफे पर चुपचाप बैठी थीं। उनके चेहरे पर बेटे को देखकर राहत भी थी और चिंता भी।

     

    दूसरी तरफ उसके चाचा अमित राजावत और चाची सुमित्रा राजावत बैठे थे। उनके साथ उनका बेटा राघव और बेटी रिया भी मौजूद थे।

     

    अग्नि की नजर राघव पर पड़ी। राघव ने तुरंत अपनी नजरें दूसरी तरफ कर लीं। अग्नि सब समझता था।

    उसे इस परिवार में मौजूद हर मुस्कान के पीछे छिपा मतलब पता था।

     

    विक्रम राजावत ने गुस्से में कहा, “हमारे संस्कारों में सबसे पहले बड़ों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।”

     

    अग्नि ने कहा, “ बड़े आशीर्वाद देने के लायक होते तो जरूर लेता।” उसकी ठंडी निगाहे विक्रम जी पर टिकी थी।

     

    विक्रम जी आगे बोले, “ स्टडी में चलो हमें तुमसे एक जरूरी बात करती है।”

     

    क्रमशः….

    कहानी आगे जारी रहेगी।

    देरी के लिए माफी 

    पढ़ते रहिए 

    No love clause 💕

  • No love clause part 2

    No love clause part 2

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग 2

    दिन के करीब बारह बजे…

     

    वेदा अभी भी अस्पताल के कॉरिडोर में बैठी थी। पूरी रात की जागी हुई आँखें लाल हो चुकी थीं।

     

    उसके हाथ में विहान की मेडिकल रिपोर्ट थी और दिमाग में सिर्फ़ एक ही सवाल घूम रहा था, एक करोड़ बीस लाख… आएँगे कहाँ से? उसके पास तो कोई सेविंग तक नहीं है क्योंकि सब पैसे घर के खर्चों में, रेंट के और विहान की दवाइयों में ही लग जाते थे। 

     

    वो गहरी सोच में बैठी थी…तभी उसके सामने एक कॉफी का कप आकर रुका। “पकड़…”

     

    वेदा ने सिर उठाया। “अपर्णा…” उसकी आवाज में नमी थी। 

     

    अगले ही पल वह उठकर अपनी सबसे अच्छी दोस्त के गले लग गई। जो आँसू अब तक उसने खुद में कैद कर रखे थे, वे अपर्णा के कंधे पर सिर रखते ही बह निकले।

     

    अपर्णा ने बिना कुछ कहे उसकी पीठ सहलाई। “सब ठीक हो जाएगा… यार “

     

    वेदा हल्का-सा मुस्कुराई, लेकिन वो मुस्कुराहट ऐसी थी जैसे वो खुद पर हँस रही हो। “झूठ बोलना आज भी नहीं आया तुझे…”

    कहते हुए उसने अपर्णा को देखा।

     

    फिर दोनों कुर्सी पर बैठ गई।  अपर्णा भी फीकी-सी मुस्कुराई। “ झूठ बोलने से तसल्ली तो मिलती है , अगर सच बोल दूँ तो तू और टूट जाएगी… ना यार।” 

    अपर्णा ने वेदा के कंधे को सहलाते हुए कहा। 

     

    उसके बाद दोनों कुछ देर चुप रहीं। फिर अपर्णा ने धीरे से पूछा, “डॉक्टर ने क्या कहा?”

     

    वेदा ने काँपते हाथों से रिपोर्ट उसकी तरफ बढ़ा दी।

    अपर्णा ने जैसे-जैसे रिपोर्ट पढ़ी, उसके चेहरे का रंग उड़ता चला गया।

    “ यार ये तो… खर्चा कितना आएगा?”

    उसने दबी हैरानी भरी आवाज में पूछा।

     

    वेदा काँपते होंठों से, “एक करोड़ बीस लाख…!”

     

    अपर्णा, “ क्या…? एक करोड़ बीस लाख…?”

     

    वेदा ने बस सिर झुका दिया। “मेरे पास सिर्फ़ बीस दिन हैं, अपर्णा।”

     

    “मैंने बैंक में बात की… लोन नहीं मिलेगा। माँ के इलाज में पहले ही सब कुछ बिक चुका है। रिश्तेदार हैं नहीं… और जिन लोगों को जानती हूँ, उनकी पूरी ज़िंदगी की कमाई भी इतनी नहीं होगी कि…”

    कहते हुए उसने अपनी बात अधूरी ही रहने दी। 

     

    अपर्णा कुछ पल सोचती रही। अचानक उसे कुछ याद आया।  “सुन…”

     

    वेदा ने उसकी तरफ उम्मीद भरी नजरों से देखा, “हम HR से बात करते हैं। कंपनी की एम्प्लॉयी मेडिकल लोन पॉलिसी है ना… शायद कोई रास्ता निकल आए।”

     

    अपर्णा की बात सुनकर वेदा को कुछ उम्मीद जागी। उसने अपने आंसू पोंछे और अपर्णा की तरफ देखा। “हाँ… कम्पनी में ये पॉलिसी है तो सही। लेकिन रकम बहुत बड़ी है।”

     

    अपर्णा ने उसे हिम्मत दी, “ कोशिश करके तो देख सकते हैं, वैसे भी तू कोई मामूली पोस्ट पर नहीं है। तू बॉस की सेक्रेटरी है।”

     

    वेदा ने एक गहरी साँस ली और धीरे से बोली, “चल… एक बार कोशिश करके देख लेते हैं। अगर किस्मत ने साथ दिया तो शायद…” 

     

    अपर्णा तुरंत उठ खड़ी हुई। “बस यही हुई ना मेरी शेरनी वाली बात। चल, अब देर मत कर।” 

     

    दोनों अस्पताल से बाहर निकल आईं।

     

    ——–

     

    वहीं दूसरी तरफ अग्नि सिंह राजावत अपनी आलीशान और लग्जरी केबिन में अपनी लेदर की चेयर पर बैठा हुआ था।

    उसकी नजर सामने टेबल पर रखी फाइल पर टिकी थी। 

     

    तभी उसके केबिन का डोर नॉक हुआ।

    और अगले ही पल दरवाजा खुला और अंदर अग्नि का मैनेजर निशांत आया।

     

    उसके हाथ में एक फाइल थी जिसपर उसे अग्नि के अर्जेंट साइन चाहिए थे।

     

    “ सर इस फाइल पर आपके साइन चाहिए।” उसने अग्नि के सामने फाइल रखते हुए कहा।

     

    अग्नि ने फाइल पढ़ी और उसपर अपने साइन कर दिए फिर जैसे ही निशांत जाने लगा, 

    “ वेदा को बोलो मेरे केबिन में आए।”

    अग्नि ने कहा।

     

    (असल में वेदा, अग्नि की कम्पनी में ही जॉब करती है और उसकी ही सेक्रेटरी है।)

     

    ये सुनते ही निशांत के चेहरे पर हल्की सी घबराहट आ गई। क्योंकि उसे पता था कि वेदा आज अभी तक ऑफिस नहीं आई और उसने इसका रीजन भी कुछ नहीं बताया।

     

    निशांत के चेहरे पर आई घबराहट अग्नि की तेज़ नज़रों से छिप नहीं सकी।

    अग्नि ने फाइल से नज़र उठाकर उसकी तरफ देखा। “क्या हुआ?”

     

    निशांत, “स… सर… वो…”

     

    “Speak.” उसने सख्त लहजे में कहा।

     

    निशांत बोला, “सर, मिस वेदा आज अभी तक ऑफिस नहीं आई हैं।”

    यह सुनते ही अग्नि का चेहरा और सख्त हो गया।

     

    “ What…! Nonsense…” उसने तेज आवाज में कहा। “ दोपहर के बारह बजने को आए हैं और तुम मुझे ये अभी बता रहे हो कि वो ऑफिस नहीं आई।”

     

    “ सर मुझे लगा आपको पता होगा क्योंकि वो सुबह सबसे पहले आकर आपको ही रिपोर्टिंग करती है।” निशांत ने कहा।

     

    उसकी बात सुनकर अग्नि को एहसास हुआ कि निशांत सही कह रहा है। वेदा उसकी सेक्रेटरी है और वो सुबह से उसके पास एक बार भी नहीं आई। तभी उसे महसूस हुआ कि सुबह से उसके केबिन में असामान्य-सी खामोशी थी। उसकी रोज़ की ब्रीफिंग भी नहीं हुई थी।

     

    उसने दो फिंगर उठाकर निशांत को जाने का इशारा किया। निशांत तुरंत ही केबिन से बाहर चला गया। 

     

    वहीं अग्नि सोचने लगा कि आखिर ऐसा क्या हुआ जो वेदा ऑफिस नहीं आई और उसने किसी को इनफॉर्म भी नहीं किया।

     

    वो सोच ही रहा था तभी बिना किसी सूचना के उसके केबिन का डोर खुला।

    अग्नि की आंखों में ये देख गुस्सा उतरा ही था तभी उसकी नजर सामने गई जहाँ उसका बचपन का दोस्त शुभम खन्ना खड़ा हुआ था। 

     

    उसे देख अग्नि ने अपनी आँखें बंद कर ली जैसे अपना गुस्सा शांत करने की कोशिश कर रहा हो।

     

    शुभम, “ क्या यार ऐसी सड़ी सी शक्ल बनाकर क्यों बैठा हुआ है?”

    उसने कुर्सी खींचते हुए कहा। और फिर पूरे एटिट्यूड के साथ बैठ गया।

     

    अग्नि ने अपनी नीली आंखों से उसे खा जाने वाली नजरों से देखा और बोला, “ तुझे कोई काम वाम नहीं है क्या ? जो यहाँ टाइम पास करने चला आया।”

     

    शुभम ने आराम से कुर्सी पर पैर चढ़ाते हुए कहा, “काम ही तो है, तभी आया हूँ। वरना तेरी शक्ल देखने का शौक मुझे भी नहीं है।”

     

    अग्नि ने भौंहें चढ़ाईं। “जो कहना है, जल्दी बोल। मेरे पास फालतू बातों के लिए वक्त नहीं है।”

     

    “अरे बाबा… इतना गुस्सा किस बात का? सुबह-सुबह किसने तेरे कॉफी मग में ज़हर मिला दिया?”

     

    अग्नि ने उसे घूरा। “शुभम…”

     

    “ओके… ओके…” शुभम ने दोनों हाथ ऊपर कर दिए। “सीरियस हो जाता हूँ।”

     

    उसने कुछ पल तक अग्नि को गौर से देखा। फिर बोला,

    “अब बता भी दे… बात क्या है? तेरे चेहरे पर साफ़ लिखा है कि अंदर कुछ चल रहा है।”

     

    अग्नि अपनी कुर्सी से उठकर केबिन की काँच की दीवार के सामने जाकर खड़ा हो गया। नीचे भागती हुई मुंबई की सड़कें दिखाई दे रही थीं, लेकिन उसकी नज़र कहीं और ही खोई हुई थी।

     

    कुछ पल की खामोशी के बाद उसने धीमे स्वर में कहा,

     “आज शाम दादाजी ने मुझे राजावत मेंशन बुलाया है।”

     

    शुभम ने सहज भाव से पूछा, “कोई खास बात?”

     

    अग्नि हल्का-सा हँसा, लेकिन उस हँसी में व्यंग्य था। “खास… बहुत खास।”

     

    “मुझे पूरा यकीन है कि आज फिर वही पुराना मुद्दा उठेगा…”

     

    “शादी।”

     

    शुभम ने गहरी साँस छोड़ी। उसे पहले से अंदाज़ा था कि बात आखिर इसी तरफ जाएगी। “तो इस बार क्या सोच रखा है?”

     

    अग्नि की आँखों में ठंडक उतर आई। “जो भी होगा… मेरी शर्तों पर होगा।”

     

    उसने मुड़कर शुभम की तरफ देखा। “मैं किसी रिश्ते में बंधने नहीं जा रहा…”

    “अगर शादी करनी भी पड़ी… तो सिर्फ़ एक समझौता होगी, उससे ज़्यादा कुछ नहीं।”

     

    शुभम ने महसूस किया कि अग्नि के मन में शादी के लिए नफरत पहले से भी गहरी हो चुकी थी।

     

    उसने बात आगे नहीं बढ़ाई। उसे पता था…

     

    अग्नि जब तक खुद न चाहे, उसके दिल की दीवारें कोई नहीं तोड़ सकता।

     

    क्रमशः 

     

    अगर आपको मेरी कहानी पसंद आ रही है तो लाइक जरूर करें।

    और मैं यहां नई हूँ, इसलिए मुझे यहाँ का थोड़ा समझने में प्रॉब्लम हो रही है और कमेंट सेक्शन भी नहीं दिखा 

    अगर हो तो कमेंट भी जरूर कीजिएगा।

    धन्यवाद 🙏🏻

     

  • संग भींगने का क़रार

    संग भींगने का क़रार

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    बरसात की बूंदों में छुपा है प्यार,  

    आज दिलों ने किया संग भींगने का क़रार।  

    तेरे हाथों में मेरा हाथ थामे,  

    सपनों की राहों पर चलें हम साथ‑साथ।  

     

    भीगी ज़ुल्फ़ों में चाँदनी मुस्काए,  

    तेरी आँखों में मेरा चेहरा झलक जाए।  

    हर बूँद बने इज़हार‑ए‑मोहब्बत,  

    हर लम्हा कहे — तू ही मेरी राहत।  

     

    संग भींगना अब इबादत सा लगे,  

    तेरे संग हर मौसम जन्नत सा लगे।  

    ओ मेरी जान, ओ मेरी दास्तान,  

    तेरे बिना अधूरा है मेरा अरमान।

     

    बरसात की पहली बूँद जब ज़मीं पर उतरी,  

    तेरी मुस्कान ने मेरी रूह को छू ली।  

    आज दिलों ने किया संग भींगने का क़रार,  

    हर लम्हा बने इश्क़ का इज़हार।  

     

    तेरे होंठों पर ठहरी हँसी की चमक,  

    मेरे दिल में जगाए मोहब्बत की ललक।  

    भीगी राहों पर चलें हम साथ‑साथ,  

    तेरे कदमों से सजें मेरी हर बात।  

     

    बूँदों की सरगम में गूँजे तेरा नाम,  

    तेरी बाहों में मिले मुझे आराम।  

    संग भींगना अब दुआ सा लगे,  

    तेरे संग हर मौसम जन्नत सा लगे।  

     

    ओ मेरी जान, ओ मेरी रूहानी गीत,  

    तेरे बिना अधूरी है मेरी हर प्रीत।  

    चलो आज वादा करें इस बरसात में,  

    संग भींगते रहेंगे हर मुलाक़ात में।

  • The psycho

    The psycho

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    मुंबई ,

     

    सिंघानिया विला ,

     

     

    सिंघानिया विला में  , आज सुबह से  , ही बहुत ज्यादा चहल पहन थी। 

     

     

     

     

    मिसेज सिंघानिया  अपनी बेटी की तरफ देखते हुए बोली  , तुम खुश तो होना । आखिरकार तुम्हारी शादी  , तुम्हारे पसंद के लड़के से हो रही है ।

     

     

     

     

     

    नियति मुस्कुराते हुए बोली , मॉम मैं बहुत ही ज्यादा खुश हूं ।

    आज फाइनली  , मेरी और राज की शादी हो रही है ।

     

     

     

     

     

    मिसेज सिंघानिया मुस्कुराते हुए बोली  , आखिरकार 3 सालों बाद  , तुम्हें तुम्हारा प्यार मिलने जा रहा है । 

     

     

     

     

    यह सुनकर नियति मुस्कुराने लगी । 

     

     

     

    मिसेज सिंघानिया ने अपनी बेटी की तरफ देखते हुए बोली  , तुम जाओ और जाकर ,  इस शादी जोड़े को पहन लो । 

     

     

     

     

    ये  सुनते ही ,  नियति की नजर बेड  पर गई , जहां एक बहुत खूबसूरत सा  लाल रंग का लहंगा रखा हुआ था । 

     

     

     

     

     

    नियति ने मुस्कुराते हुए  , उस लहंगे को लिया और बाथरूम की तरफ चली गई  ,,

     

     

     

     

     

    वहीं मिसेज  सिंघानिया ने अपने मन में बोली  , पता नहीं मुझे क्यों . . . घबराहट हो रही है । राज और उसकी फैमिली तो  , इस रिश्ते के लिए मान गई है । ।

     

     

     

     

     

    फिर मुझे घबराहट क्यों हो रही है । मेरी बेटी को उसका प्यार मिल रहा है । ये बोलते हुए , मिसेज सिंघानिया बार-बार  , खुद को दिलासा दे रही थी ।

     

     

     

     

     

    करीब 1 घंटे बाद  , 

     

     

     

    नियति अच्छी तरह से तैयार होकर ,  अपने कमरे में बैठी हुई थी । 

     

     

     

     

    वही नियति की सभी सहेलियां  , उसे राज के नाम से परेशान कर रही थी । नियति बहुत ही ज्यादा खुश थी । 

     

     

     

     

    आज फाइनली इतने सालों बाद ,  उसे उसका प्यार मिलते जा रहा है । ।

     

     

     

     

     

    राज से नियति को  स्कूल टाइम से ही प्यार  था और आखिरकार कॉलेज में आते आते  ,, राज ने उसे प्रपोज कर दिया ।।

     

     

     

     

     

    आज नियति की जिंदगी का सबसे खूबसूरत पल था ।  जब राज और वह पूरी तरह से एक हो जाएंगे । ये सोचते हुए ,  नियति शरमा रही थी ।

     

     

     

    गार्डन एरिया 

     

     

     

    मिसेज सिंघानिया ने बारात का स्वागत किया । ।

     

     

     

     

    राज  मुस्कुराते हुए बोला ,  आंटी मेरी दुल्हन कैसी है ।। मिसेज सिंघानिया ने मुस्कुराते हुए बोली ,  थोड़ी देर बाद  , खुद अपनी दुल्हन को देख लेना । 

     

     

     

     

     

    ये  सुनकर राज मुस्कुराते हो जाकर मंडप में बैठ गया । राज बहुत बेसब्री से बार-बार  , इधर-उधर देख रहा था ।।शायद उसे नियति की एक झलक देखने को मिल जाए ।।

     

     

     

     

     

     

     

      राज की फैमिली ने , राज को  रस्मों का नाम देकर ,  3 दिनों से  , नियति का चेहरा भी देखने नहीं दिया ।।

     

     

     

     

     

     

    राज ने खुशी से अपने मन में कहा  , सच में ,  आज मैं बहुत खुश हूं । मेरा प्यार मेरा हो जाएगा । ये  बोलते हुए  , राज मुस्कुराते हुए ,  बस बेसब्री से नियति का इंतजार कर रहा था ।।

     

     

     

     

    पंडित जी ने , मिसेज सिंघानिया की तरफ देखते हुए बोली , दुल्हन को बुलाइए ,, ।।

     

     

     

     

     

     

    ये  सुनकर मिसेज सिंघानिया से ज्यादा , राज बहुत ही ज्यादा खुश था ।  फाइनली वह नियति को देखेगा । ये  सोचते हुए  , राज मुस्कुराते हुए दरवाजे की तरफ देखने लगा ।  जिस तरफ मिसेज सिंघानिया नियति को लाने के लिए गई थी ।

     

     

     

     

     

    करीब 10 मिनट बाद , मिसेज सिंघानिया नियति को लेकर गार्डन एरिया में आ गई  ,, ।।

     

     

     

     

     

    राज ने जैसे ही  , नियति को देखा  , वह देखता ही रह गया ।नियति देखने में बहुत ही ज्यादा खूबसूरत और प्यारी लग रही थी । 

     

     

     

     

     

    नियति मुस्कुराते हुए  , राज के पास बैठ गई  ,

     

     

     

     

     

    राज ने धीरे से उसके कान में कहा  , सच में ,  आज तुम बहुत ही ज्यादा खूबसूरत लग रही हो ।

     

     

     

     

     

     

    यह सुनकर नियति मुस्कुराते हुए बोली ,  तुम भी बहुत ही ज्यादा हैंडसम लग रहे हो । ये बोलते हुए  , दोनों एक दूसरे को मुस्कुरा कर देखने लगे । 

     

     

     

     

     

    तभी पंडित जी ने नियति  और राज की तरफ देखते हुए कहा , आप दोनों जयमाला  के लिए  , खड़े हो जाइए ।।

     

     

     

     

     

    यह सुनकर नियति मुस्कुराते हुए , राज को देखने लगी । 

     

     

     

     

     

    राज खड़ा हो गया और अपने हाथ को नियति की तरफ बढ़ाया ,,

     

     

     

     

    नियति ने राज के हाथ को पकड़ा और उसके बगल में खड़ी हो गई  ,,

     

     

     

     

    दोनों एक दूसरे की आंखों में देख रहे थे ।  वहीं चारों तरफ बस खुशी का माहौल था । 

     

     

     

     

     

    सभी उनके ऊपर फूल बरसा रहे थे । ।

     

     

     

     

     

    राज ने मुस्कुराते हुए कहा ,  आज से हमारी जिंदगी की नई शुरुआत है । My dear love. जल्द ही तुम मेरी wife. बन जाओगी । 

     

     

     

     

     

    यह सुनकर नियति शर्माने लगी ।

     

     

     

     

    राज ने नियति  का हाथ पकड़ा और जैसे ही फेरे के लिए ,  एक कदम चला ही था । । अचानक से वहां पर  , गोलियों की आवाज आने लगी । 

     

     

     

     

     

    नियति और राज इससे पहले कुछ समझ पाते , एक गोली जाकर सीधे राज के सीने पर लग गई  ,

     

     

     

     

    राज सीधे जमीन पर गिर गया ।  नियति बस राज  का नाम चिल्लाते रह गई ,

     

    . . . . . . . . . . To be continue . . . . . . . . . 

    किसकी नजर लगी है । राज और नियति

    की खुशियों को ,

    क्या होने वाला है । राज और नियति के साथ ,

    जानने के लिए  , पढ़ते रहिए ,  मेरी स्टोरी the psycho.

    स्टोरी कैसी लगी कॉमेंट में बताए , 

    स्टोरी को प्रोत्साहन प्रदान करें , मिलते है नेक्स्ट चैप्टर में, आपकी ऑथर शिवानी, 

  • अधूरी मोहब्बत के ‘इंतज़ार का साया

    अधूरी मोहब्बत के ‘इंतज़ार का साया

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    अधूरी मोहब्बत के ‘इंतज़ार का साया

    नयन और आरुषि का मिलना किसी फिल्मी दृश्य से कम नहीं था। पहली मुलाकात दिल्ली विश्वविद्यालय के पुराने आर्ट्स फैकल्टी की कैंटीन में हुई थी, जब पहली बरसात ने जून की तपती गर्मी को अचानक ठंडक में बदल दिया था। आरुषि अपनी किताबों और बिखरे हुए नोट्स को समेटने की हड़बड़ी में थी, और नयन, एक शांत, गंभीर चेहरा लिए, वहीं कोने की मेज पर बैठा उसे देख रहा था।
    “माफ़ करना, मेरा छाता आज धोखा दे गया,” आरुषि ने भीगे बालों से पानी झटकते हुए कहा।
    नयन ने बिना कुछ कहे, अपना जैकेट उसकी ओर बढ़ा दिया। “भीग जाओगी।”
    वह जैकेट, जिसकी महक में मिट्टी की सोंधी खुशबू और उसकी अपनी एक हल्की सी सिगरेट की गंध मिली हुई थी, आरुषि के लिए पहला तोहफ़ा था। वह जैकेट नयन की तरह ही था,  बाहर से रूखा, पर अंदर से बेहद गर्म और सुरक्षा देने वाला।
    धीरे धीरे वह एक छोटी मुलाक़ात कब दोस्ती में बदली और दोस्ती कब इश्क़ की एक गहरी नदी में, उन्हें पता ही नहीं चला। उनका रोमांस किताबों के पन्नों, देर रात की कॉफ़ी और दिल्ली की सर्द रातों में गर्माहट देने वाली लंबी ड्राइव में पनपा। आरुषि को नयन की खामोशियाँ पढ़ना आता था, और नयन को आरुषि की आँखों में छिपे हर सपने को साकार करना था।

    नयन की उंगलियां जब आरुषि के उलझे बालों को सुलझाती थीं, तो उस स्पर्श में सदियों का इकरार होता था। उनका प्रेम सिर्फ शब्दों का मोहताज नहीं था, वह एक-दूसरे की रूह में उतर चुका था। हर चुंबन, हर आलिंगन एक वादा था, हमेशा साथ रहने का।

    एक रात, इंडिया गेट पर, मद्धम रोशनी के बीच, नयन ने आरुषि का हाथ अपने हाथ में लेकर भींच लिया था।
    “तुम मेरी हो, आरुषि। आख़िरी साँस तक।”
    आरुषि ने मुस्कुराते हुए अपनी आँखें बंद कर ली थीं, जैसे उसने ब्रह्मांड के सबसे बड़े सच को स्वीकार कर लिया हो।

    लेकिन हर प्रेम कहानी की तरह उनकी प्रेम कहानी में एक मोड़ आना बाकी था, जो किसी भी प्रेम कहानी को पूरा नहीं होने देता।
    नयन एक मध्यवर्गीय परिवार से था, पर महत्वाकांक्षाएँ पहाड़ जितनी ऊँची थीं। उसके पिता का सपना था कि वह सिविल सर्विसेज़ में जाए। और नयन भी आरुषि के परिवार की तरह तथा अन्य लोंगों की तरह जानता था कि सरकारी नौकरी ही समाज में उनकी प्रेम कहानी को स्वीकार्यता दिला सकती है।
    “एक साल, बस एक साल और, आरुषि,” नयन ने उसे समझाते हुए कहा था, जब आरुषि ने उसे रोज़ मिलने से मना करने पर शिकायत की थी, तो नयन ने लगभग गिड़गिड़ाते हुए बोला, बस इस एक साल के बाद तुम्हें वो सब दूँगा जिसका तुम सपना देखती हो, एक सुरक्षित भविष्य, एक छोटा-सा घर, और हर पल मेरा साथ।

    वह एक साल, इंतज़ार और विरह का है। उनका रोमांस अब फ़ोन कॉल्स, चोरी-छिपे की मुलाक़ातों और ख़त में सिमट गया था।
    परीक्षा की तैयारी चरम पर थी, और तभी किस्मत ने अपना क्रूर खेल खेला। नयन के पिता को अचानक दिल का दौरा पड़ा। परिवार की सारी जमापूंजी इलाज में लग गई, और नयन को अपनी पढ़ाई छोड़कर, परिवार को संभालने के लिए एक छोटी-सी निजी कम्पनी में नौकरी करनी पड़ी।
    टूट गए सारे वादे, बिखर गए सारे सपने।
    कुछ दिनों तक जब आरुषि की बातचीत और कोई संपर्क नयन से नही हुआ,  तो अचानक एक दोपहर, आरुषि, नयन के पुराने कमरे में पहुँची। कमरा खाली था, सिर्फ़ कोने में रखी किताबों पर धूल जमी थी। नयन उसे यह सब बताने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था, उसने बस एक छोटा-सा संदेश छोड़ा था:
    आरुषि, मैं टूट गया हूँ। मैं तुम्हें वो ज़िंदगी नहीं दे सकता जिसका तुम हक़ रखती हो। मेरा प्रेम स्वार्थी नहीं है कि मैं तुम्हें भी अपने साथ इस अंधेरे में खींच लूँ। मुझे भूल जाना। यह हमारे इश्क़ का दर्दनाक अंत है।”

    नयन के उस एकतरफ़ा फ़ैसले ने आरुषि को अंदर तक झकझोर दिया। वह रोई, चिल्लाई, पर नयन का  कुछ भी पता नहीं चला। नयन यह जानता था कि आरुषि के परिवार वाले कभी एक असफल और आर्थिक रूप से टूटे हुए लड़के से उसकी शादी नहीं करेंगे। इसलिए उसने खुद को दूर करके, अपनी मोहब्बत को एक तरह से बलिदान कर दिया था।

    धीरे धीरे देखते देखते कब पांच साल गुज़र गए, किसी को पता भी नही चला।
    आरुषि की शादी एक सफल व्यवसायी से हो चुकी थी। अब उसके पास ऐशो-आराम के लिए सब कुछ था, बंगला, गाड़ी, ऐशो-आराम। पर उसकी आँखों में नयन का इंतज़ार आज भी ज़िंदा था। वह आज भी हर बारिश में नयन के जैकेट की महक खोजती थी।
    उसकी ज़िंदगी में रोमांस था, पर इश्क़ नहीं। उसका पति उसे बहुत प्यार करता था, पर वह स्पर्श, वह जुड़ाव जो नयन की नज़रों में था, उसे वह कहीं नहीं मिला।
    एक रात, बारिश ज़ोरों पर थी। आरुषि अपने बेडरूम की बालकनी में खड़ी थी, आँखें मूँदकर। उसके मन में नयन के साथ बिताई गई हर अंतरंग मुलाक़ात, हर मीठी शरारत घूम रही थी। उसे याद आया, कैसे नयन उसे पहली बार अपने सीने से लगाया था और कैसे उनके होंठ एक कसक भरी चाहत में मिले थे।
    आरुषि ने अपनी आँखें खोलीं और उसकी नज़रों के सामने नयन का चेहरा घूम गया, एक दर्द भरा प्रेम, एक अनसुलझा बंधन। उसके दिल में एक टीस उठी।

    संयोगवश उसी शहर में, नयन ने भी खुद को अपने परिवार के लिए संभाला था। वह एक छोटी-सी प्रिंटिंग प्रेस चलाता था, जो ठीक-ठाक चल जाती थी। वह भी एक खालीपन में जी रहा था। उसका सबसे बड़ा डर था कि वह आरुषि को किसी और के साथ खुश देखेगा। पर जब उसने दूर से आरुषि को एक बार अपनी कार में देखा, तो उसकी आँखों की उदासी ने नयन को बता दिया कि आरुषि अभी भी उसी अधूरी मोहब्बत के पिंजरे में कैद है।
    नयन ने हर शाम एक डायरी लिखी, जिसमें वह आरुषि को अपनी ज़िंदगी के हर पल का हिसाब देता था।
    आज मैंने तुम्हारे पसंदीदा फूल देखे।
    आज चाय बनाते हुए तुम्हारा ख़याल आया।
    आज बारिश हुई, और मुझे तुम्हारा भीगा हुआ चेहरा याद आया।
    यह डायरी, उसके लिए आरुषि से रोज़ बात करने का ज़रिया थी। उसका प्रेम अब भी ज़िंदा था, पर सिर्फ़ कागज़ों पर।

    छठे साल, एक कला प्रदर्शनी में, किस्मत ने उन्हें एक बार फिर मिला दिया।
    आरुषि, अपने पति के साथ, एक पेंटिंग के सामने खड़ी थी, जिसका शीर्षक था, इंतज़ार का साया’। उस पेंटिंग में, एक लड़की दूर क्षितिज को देख रही थी, और उसके साये में एक धुंधला-सा पुरुष का चेहरा छिपा था।
    जब आरुषि ने पलटा, तो उसके सामने नयन खड़ा था। समय थम गया। पाँच सालों का दर्द, विरह, और प्रेम उनकी आँखों में भर आया।
    नयन का शरीर पहले से ज़्यादा थका हुआ लग रहा था, पर उसकी आँखें आज भी वही थीं, गहरी और आरुषि के लिए अटूट प्रेम से भरी।
    “आरुषि…” नयन की आवाज़ काँपी।
    “नयन…” आरुषि ने केवल इतना कहा, और उसके होंठ काँपने लगे।
    आरुषि के पति ने नयन को देखा, पर उन्हें लगा कि वह कोई पुराना सहपाठी है। उन्होंने सम्मानपूर्वक हाथ मिलाया और थोड़ी देर में उन्हें अकेला छोड़ दिया।
    वे दोनों गैलरी के शांत कोने में बैठ गए।
    “तुमने क्यों किया ऐसा, नयन?” आरुषि की आवाज़ में पाँच सालों का दर्द था। “तुमने क्यों मान लिया कि मेरा प्यार इतना कमज़ोर है कि वह तुम्हारी मुश्किलों को नहीं सह पाएगा?”
    नयन ने उदास नज़रों से उसे देखा। “मैं स्वार्थी नहीं बन सकता था, आरुषि। मैं तुम्हें अंधेरे और अभाव की ज़िंदगी नहीं देना चाहता था। मेरा प्रेम आज भी उतना ही सच्चा है, पर मैं तुम्हें यह सब देने के बाद तुम्हारे सपनों को मरते हुए नहीं देख पाता।”
    उस शाम, वे घंटों बातें करते रहे। उन्होंने अपने अधूरे प्रेम के हर मोड़ को छुआ। उनका प्रेम, जो कभी शारीरिक आलिंगनों में व्यक्त होता था, आज सिर्फ़ आत्मिक जुड़ाव में सिमट गया था।
    आरुषि ने नयन का हाथ पकड़ा। वह स्पर्श आज भी उतना ही सुरक्षित और अपनापन देने वाला था।
    “हम अब भी एक-दूसरे से प्यार करते हैं, नयन।”
    नयन की आँखों से आँसू बह निकले। “हाँ, करते हैं। पर अब यह प्यार हमारा नहीं रहा, यह बस एक दर्द भरी याद है।”
    नयन ने अपनी जेब से एक मुड़ी हुई डायरी निकाली। “यह तुम्हारी अमानत है। इसमें हमारे हर अधूरे पल का हिसाब है।”
    “क्या अब हम…?” आरुषि ने हिम्मत करके पूछा।
    नयन ने मुस्कुराने की कोशिश की, पर उसकी मुस्कुराहट में केवल पीड़ा थी।
    “हम हमेशा एक-दूसरे के रहेंगे, आरुषि, पर अब केवल सपनों में। तुम्हारी ज़िंदगी में अब एक सफ़र है जिसे तुम्हें पूरा करना है। और मेरी ज़िंदगी… मेरी ज़िंदगी तो उसी दिन खत्म हो गई थी जब मैंने तुम्हें खोने का फ़ैसला किया था।”
    आरुषि ने वह डायरी ले ली। वह डायरी नहीं थी, वह उनके इश्क़ का मज़ार था।
    नयन उठा। यह उनकी अंतिम, और सबसे दर्द भरी मुलाक़ात थी। उसने आरुषि के माथे को धीरे से छुआ, बिना कोई चुंबन दिए, बिना कोई आलिंगन दिए। यह स्पर्श, किसी भी गहरे शारीरिक मिलन से ज़्यादा पवित्र और गहरा था, क्योंकि इसमें केवल त्याग और निस्वार्थ प्रेम था।
    “ख़ुश रहना, आरुषि। तुम जहाँ हो, ख़ुश रहना।”
    “और तुम?”
    “मैं? मैं हमेशा तुम्हारा हूँ।”
    नयन मुड़ा और भीड़ में कहीं खो गया। आरुषि वहीं खड़ी रही। उसके पास प्रेम की सबसे बड़ी निशानी थी, वह अधूरी डायरी।
    आज भी, आरुषि अपने आलीशान घर में रात की तन्हाई में उस डायरी के पन्ने पढ़ती है। वह जानती है कि उसका पति उसे भौतिक सुख दे सकता है, पर उसकी रूह हमेशा नयन की रहेगी।
    उनकी मोहब्बत अधूरी रही, पर उनका इश्क़ अमर हो गया, एक मीठा, दर्द भरा एहसास जो हर साँस के साथ ज़िंदा रहता है।
    समाप्त
    पढ़ने के लिए धन्यवाद।
    यह कहानी आपको कैसी लगी? आपकी समीक्षा का इंतज़ार रहेगा। यदि आपको यह कहानी छू गई हो, तो मुझे प्रोत्साहन में एक ❤️ या ✨ स्टीकर भेजकर मेरा उत्साहवर्धन ज़रूर करें!

     

  • विडियो सबूत

    विडियो सबूत

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एक फैसला जिसमें सबकी सहमति होती है। जानेंगे इस भाग में उस फैसले की रहस्य चलिए चलें कहानी की ओर…
    ” अब इसके साथ बहस करने का कोई फायदा नहीं है दीदी, अब इसको प्रिंसिपल मैम के पास हीं लेकर चलना चाहिए।”
    राधा सख्त होते हुए कठोर आवाज में बोली थी।
    ” हां इसे अब प्रिंसिपल मैम के पास हीं लेकर चलते हैं। अब वही इसके साथ जो भी करना होगा करेंगे।”
    शीला भी राधा के बात से सहमत होते हुए बोली थी। चार सहेलियों में दो के स्वभाव कड़क, तो दो के सरल व सॉफ्ट जैसा की हम लोगों ने देखा की कैसे रूपा और चांदनी बात बात पे हमेशा एक्शन व अटैक मोड में रहती थी। तो वहीं शीला और राधा का सॉफ्ट व नॉर्मल बिहेवियर रही है। रूपा और चांदनी को अगर फ्री छोड़ दिया जाए, तो वो दोनो कमल के हलक से जान निकाल ले।
    ” इसे ऐसे हीं नहीं छोड़ सकते हैं दीदी, इसने हमलोगों को बहुत हर्ट किया है दीदी।”
    रूपा के पैर रह रह कर फड़फड़ा जाती थी। जिसको रूपा कमल के पीठ और उसके कंधे पर अपनी लात मार कर शांत कर लेती थी।रूपा कमल के रीढ़ के हड्डियों पर अपनी लात की चोट जमाते हुए बोली थी।
    ” हां दीदी, रूपा ठिक कह रही है। इसे हम ऐसे हीं नहीं छोड़ सकते हैं। इसको एक ऐसी सजा दे देते हैं। कि जिसे ये ज़िन्दगी भर याद रखेगा, हमेशा दिमाग में रहेगा की किसी लड़की से पाला पड़ा था। और ये अपने जिवन में कभी भी किसी भी लड़की के तरफ अपनी आंख उठा कर नही देखेगा। और अपनी गंदी नजर किसी लड़की पर डालने से पहले हजार बार सोचेगा।”
    चांदनी अपनी लहजा सख्त रखते हुए सभी को देखकर बोली थी।
    ” मैं तो कहती हूं। इसके हांथ पैर तोड़ देते हैं।”
    रूपा गुस्से में आकर जोर से बोली थी। और कमल को लात मारकर गिरा दी थी। कमल जब हांथ पैर टूटने का बात सुना, तो उसका रूह कांप गया। वो अपने मन में बिना हांथ और बिना पैर के उसके जीवन कैसा होगा इमेजिन करने लगा था। की वो बिना पैर के चल फीर कैसे सकेगा, और बिना हांथ के खाना कैसे खा सकेगा या फीर कोई भी काम कैसे कर सकेगा। यही सब सोच कर उसका मन विचलीत हो रहा था। वो चाह रहा था की जल्द से जल्द यह मेटर उसके जिंदगी से खत्म हो जाए। सबने अपने तरफ से अपनी अपनी बात रख दी थी। अब सबकी नजर शीला पर हीं जा कर रूक गयी थी। क्योंकी फैसला उसे हीं करनी थी। सभी दोस्तों में सबसे बड़ी भी वही थी, और राधा चांदनी रूपा तीनो भी शीला के कोई भी बात या उसके लिए कोई भी फैसले को ना हीं कोई भी मना कर ती थी। और ना हीं कोई भी चुनौती देती थी।शीला जो भी स्टेन्ड लेगी उसे सभी को माननी पड़ेगी। ऐसा नही है की शीला की बात मानना इन सब की मजबूरी थी। बल्की ये सभी के दिल में शीला के लिये इज्जत और सम्मान थे। और विस्वास थे, की हमारी दीदी हमारे लिए कभी कुछ गलत नहीं करेंगे,या कुछ गलत होने देंगे। कोई भी रिश्ता एक दुसरे के इज्जत सम्मान देने विस्वास करने और एक दुसरे के फैसले में साथ देने से हीं रिश्ता सही और सुचारू रूप से चलती है।
    ” अब क्या किया जाए।”
    चांदनी अपनी बात पुरी भी नहीं की थी। की बीच में हीं चांदनी की बात काटते हुए कमल बोला
    ” मुझे माफ करदो।”
    और बोलते हुए चांदनी के पैर पर गीर कर नाक रगड़ने लगा था। जोर जोर से रोने लगा था। कमल के आंखों से आंसू के धार भी बहने लगा था।
    ” ठीक है तो, इसे लेकर प्रिंसिपल मैम के पास चलते हैं।
    शीला सभी के तरफ देखकर बोली थी।
    ” ठीक है दीदी, चलते हैं।”
    एक साथ तीनो सहेली बोलती है। और रूपा कमल को बाल पकर कर घसीटते हुए ले जाने की कोशिश करती है। बल्कि कुछ दूर घसीट भी देती है।
    पर चांदनी और शीला उसे ऐसा नहीं करने के लिए इशारे से रोकती है। और दोनो कमल के एक एक बांह पकर कर खड़ा होने में कमल का मदद करती है। और दोनो साइड से दोनो लड़की उसके दोनो बांह पकड़े हुए आगे बढ़ जाती है। उसके पिछे पिछे राधा और रूपा भी चल पड़ती है। शीला की पलटन मीटिंग हॉल के तरफ चल पड़ी थी। शीला को फैसला लेनी थी वह फैसला वो ले चुकी थी। उसके फैसले में उसके तीनो सहेलियों का भी समर्थन मिल चुकी थी।क्लास रूम से सभी बाहर जा चुके थे।
    मीटिंग हॉल
    मीटिंग हॉल में चहल पहल तेज हो गए थे ! सभी स्टूडेंट्स और सभी टीचर्स भी अपने अपने जगह लेकर बैठ चुके थे। प्रिंसिपल मैम भी स्टेज पर आ चुकी थी। मीटिंग की कार्यवाही भी सुरू हो गयी थी।
    उस में से एक टीचर मंच संचालन कर रहे थे। जिनका नाम था। प्रोफेसर दया नन्द। वे बारी बारी से प्रोफेसरों को माइक से आमंत्रीत कर रहे थे। और जिस प्रोफेसर के नाम वो माइक से अनाउंस करते थे। वो आकर अपना वक्तव्य देते थे।
    ” तो बच्चों, जैसा की आपको बताया गया है। की इस   बार होने वाले भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव हमारे अपने कॉलेज में धूम धाम से मनाया जाएगा। जिसमे तैयारी हम सभी टीचर्स के साथ साथ आप सभी स्टूडेंट्स को भी करनी है।”
    प्रोफेसर दयानन्द मंच से माइक पर बोल रहे थे। यह बात सुनकर नीचे स्टूडेंट के बीच भी काना फूसी स्टार्ट हो गयी थी।
    ” ये क्या बात हुई, इतनी सी बात बताने के लिए इतना बड़ा अरेंजमेंट किया गया है। ये बात तो सभी के क्लास रूम में भी तो बता सकते थे।”
    नीचे बैठे स्टूडेंट में से एक स्टूडेंट बोला था।
    ” हां, इसमें नई बात कौनसी है। कृष्ण जी का तो जन्मोत्सव तो हर साल मनाया जाता है। हमारे कॉलेज में नया क्या बोल दिया इन्होने।”
    एक दुसरे स्टूडेंट ने पहले स्टूडेंट के तरफ देखकर जवाब देते हुए बोला था।
    ” नया बस यही है की, कॉलेज में ईस बार मनाया जायेगा। सुना नही तुमने।”
    पहले स्टूडेंट बोलकर दूसरे स्टूडेंट को देख कर हंसने लगा था। साथ में और भी स्टूडेंट्स भी हंसने लगे थे।
    ” इस बार क्या, हर बार तो मनाया गया है। हमारे कॉलेज में कृष्ण जन्मोत्सव।”
    एक लड़की सभी के तरफ देखते हुए बोली थी।
    ” लेकिन दयानन्द सर ने इस बार बोले हैं। इसका क्या मतलब हो सकता है?”
    एक और लड़की बोल पड़ी थी। सभी लोग तरह तरह के बाते कर रहे थे। इसी बीच मंच से माइक पर अनाउंस होता है।
    ” अब मैं प्रोफेसर भाटी से आग्रह करूंगा। की वो माइक पर आयेंगे और भगवान श्री कृष्ण के जिवन लीला के बारे में हम लोगों को बतायेंगे और मानव जिवन में श्री कृष्ण के उपदेश की क्या भुमिका है।आयेंगे और हमें समझायेंगे। मिस्टर भाटी कॉम ऑन ऑफ द स्टेज। बच्चो जोरदार तालियों से सर का स्वागत करेंगे।”
    प्रोफेसर दयानन्द माइक हांथ मे लिए बोल रहे होते हैं।
    आगे की कहानी पढ़िए अगले भाग में….प्यार एक अहसास

  • 💞💞प्यार का नशा… पार्ट 3💞💞

    💞💞प्यार का नशा… पार्ट 3💞💞

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    कहानी अब आगे,

    वरुणा देवी रिशाल के चेहरे को देखती हैं और पूछती हैं, “रिशाल, क्या हुआ? तुम कहीं और ही लग रहे हो।”

    रिशाल जल्दी से अपने आप को संभालता है और कहता है, “माँ, मीटिंग तो ठीक रही। बस थोड़ा थकान है।”

    वरुणा देवी रिशाल की बात मानती हैं और कहती हैं, “ठीक है, बेटा। तुम आराम करो। 

    लेकिन रिशाल का मन अमानत के साथ ही रहता है। वह सोचता है कि क्या वह अमानत से मिलने के लिए जा सकता है, वह अमानत की मासूमियत और उसकी आँखों में आंसू को याद करता है और उसके लिए अपने दिल में एक अजीब सा हलचल महसूस करता है…:

    वरुणा देवी रिशाल के चेहरे को जब देखती हैं तो उसे लगता है कि वह किसी बात से परेशान है। वह रिशाल के पास जाती हैं और पूछती हैं, “रिशाल, क्या सब ठीक है? तुम्हारे चेहरे पर तनाव दिख रहा है। क्या तुम मुझे कुछ बताना चाहते हो?”

    रिशाल वरुणा देवी की बात सुनता है, लेकिन वह कुछ नहीं बताता। वह जल्दी से एक बहाना बनाता है और कहता है, “माँ, मेरा सर दर्द कर रहा है। मुझे लगता है कि मैं थोड़ा थक गया हूँ। मैं कुछ देर अकेले में आराम करना चाहता हूँ।”

    रिशाल अपने हाथ में रखे हुए अमानत के बाल के टुकड़े को देखता है और सोचता है,

    वरुणा अग्निहोत्री जब अपने बेटे के सर दर्द की बात सुनती है, तो तुरंत घर के नौकर, रामू को आवाज़ लगाती है, “रामू, रामू! जल्दी आओ और मुझे तेल लेकर आओ। रिशाल को सर दर्द हो रहा है।”

    रामू वरुणा देवी की आवाज़ सुनकर जल्दी से आता है और पूछता है, “मैम, कौन सा तेल लाऊं? कोकोनट का या बदाम का?”

    वरुणा देवी कहती हैं, “बदाम का तेल लाओ। और जल्दी करो। रिशाल को आराम करना है ।”

    रामू बदाम का तेल लेकर आता है और वरुणा देवी को देता है। वरुणा देवी तेल को लेकर रिशाल के कमरे में जाती हैं और उसके सर पर तेल से मालिश करने को कहती हैं, 

    वरुणा अग्निहोत्री रिशाल के माथे की मालिश करने के लिए कहती हैं, “बेटा, मैं तुम्हारे माथे की मालिश कर दूँ। इससे तुम्हारा सर दर्द कम होगा।”

    लेकिन रिशाल मना कर देता है, “नहीं, माँ। मैं ठीक हूँ। तुम्हें परेशान नहीं होना चाहिए।”

    वरुणा अग्निहोत्री रिशाल की बात नहीं मानती और कहती हैं, “नहीं, बेटा। तुम्हारी सेहत मेरे लिए सबसे इम्पोर्टेन्ट है। मैं तुम्हारे माथे की मालिश करूँगी।”

    वरुणा अग्निहोत्री रिशाल को अपने पैरों के पास बैठने के लिए कहती हैं और खुद बेड पर बैठ जाती हैं। वह रिशाल के माथे पर तेल लगाती हैं और धीरे-धीरे मालिश करने लगती हैं, 

    रिशाल अपनी माँ की चम्पी से खुश होता है, लेकिन उसका मन अमानत के साथ ही रहता है। वह सोचता है कि क्या वह अमानत से मिलने के लिए जा सकता है, 

    वरुणा अग्निहोत्री रिशाल के माथे की मालिश करती हैं और कहती हैं, “बेटा, तुम्हें आराम करना चाहिए । मैं तुम्हारे लिए खाना भिजवा दूंगी ऊपर ही । तुम्हें कुछ नहीं करना है। बस आराम करो।”

    रिशाल वरुणा देवी की बात मानता है और आराम करने लगता है। लेकिन उसके मन मे अमानत के साथ बीते पल ही रहता है…

    वरुणा अग्निहोत्री की चम्पी धीरे-धीरे रिशाल को भी अच्छा लगने लगता है।

    .. to be continue….

  • 💞💞प्यार का नशा पार्ट 2 💞💞

    💞💞प्यार का नशा पार्ट 2 💞💞

    पढ़ने का समय : 3 मिनट
    • कहानी अब आगे,

    अमानत ने रिशाल की बात सुनी और उसकी आँखों में आंसू आ गए।

     “मुझे माफ कर दीजिए, मैं आपको नहीं जानती थी। मैं सिर्फ अपने भाई के साथ घूमने आई थी, और उसकी साथ खेलते हुए बस गलती से आपसे टकरा गयी मे माफ़ी मांगती हु pls माफ कर दीजिये “

    रिशाल ने अमानत को देखा और उसकी मासूमियत को देखकर उसका गुस्सा थोड़ा कम हो गया । लेकिन फिर भी वो अपने गुस्से को कण्ट्रोल नहीं कर पाया और वो गुस्सा अमानत पर निकल दी उसे काफ़ी कुछ सुना कर |” 

    अमानत ने रिशाल की बात सुनी जिससे उसके आँखों में आंसू आ गए। वह अपने भाई के साथ वहाँ से चली गई, लेकिन रिशाल की बातें उसके दिल में बस गईं…

    रिशाल ने अमानत को वहाँ से जाने दिया और अपनी मीटिंग में चला गया। लेकिन उसका मन अमानत के साथ ही था। वह अमानत की मासूमियत और उसकी आँखों में आंसू देखकर थोड़ा परेशान हो गया था।

    मीटिंग खत्म होने के बाद, रिशाल अपने घर चला गया। लेकिन उसका मन अमानत के बारे में ही सोच रहा था। वह अपनी शर्ट के बटन को देखकर अचानक रुक गया। उसमें एक बाल फंसा हुआ था, जो अमानत का था।

    रिशाल को वो बाल को देख, अमानत की याद आ जाती है और वो उसी मे खो जाता है । वह सोच रहा था कि क्या उसने अमानत के साथ ठीक बर्ताव किया था। उसने अमानत को रुला दिया था, और अब उसे इसका अफसोस हो रहा था।

    रिशाल ने अपनी शर्ट उतारी और उस बाल को अपने हाथ में लिया। वह अमानत के बारे में सोच रहा था, और उसकी मासूमियत को याद कर रहा था।

    तभी एंट्री होती है, 

    वरुणा देवी, रिशाल की माँ, कमरे में आती हैं और रिशाल को अपने हाथ में कुछ पकड़े हुए देखती हैं। वह उसके पास जाती हैं और पूछती हैं,

    वरुणा अग्निहोत्री, “क्या है यह, रिशाल? तुम क्या कर रहे हो?”

    रिशाल जल्दी से उस बाल के टुकड़े को अपने हाथ में छिपा लेता है और कहता है, “कुछ नहीं, माँ। बस एक छोटी सी चीज़।”

    वरुणा देवी को लगता है कि रिशाल कुछ छिपा रहा है, लेकिन वह कुछ नहीं कहतीं। वह रिशाल के चेहरे को देखती हैं और पूछती हैं, “क्या हूआ सब ठीक है न , रिशाल? तुम थोड़े परेशान लग रहे हो।”

    रिशाल वरुणा देवी को देखता है और मुस्कराता है, “हाँ, माँ। सब ठीक है। बस थोड़ा थकान है।”

    वरुणा देवी रिशाल की बात मानती हैं और कहती हैं, “ठीक है, बेटा। तुम आराम करो। मैं तुम्हारे लिए चाय मंगवा देती हूँ।”

    जैसे ही वरुणा देवी जाती हैं, रिशाल अपने हाथ में छिपाए हुए बाल के टुकड़े को देखता है और अमानत के बारे में सोचता है। वह सोचता है कि क्या वह अमानत से मिलने के लिए जा सकता है और उससे माफ़ी मांग सकता है, क्युकी कहीं न कहीं उसने गुस्से मे अमानत को कुछ ज़्यदा ही सुना दिया था और अब RA को उसकी लिए गिलट हो रहा था |” 

    वरुणा देवी रिशाल के लिए चाय लाती है और रिशाल के पास आकर बैठती हैं और पूछती हैं, “आज की मीटिंग कैसी रही, रिशाल? क्या हूआ सब ठीक रहा न ?”

    रिशाल को माँ की मीटिंग की बात सुन जुहू बिच पर हुई इंसिडेंट अमानत की याद आ जाती है और वह उसी में खो जाता है। वह वरुणा देवी की बात को सुनता है, लेकिन उसका मन अमानत के साथ ही रहता है।

    … to be continue….

  • ब्लाइंड डेट से मिला प्यार

    ब्लाइंड डेट से मिला प्यार

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    एपिसोड 1 

    राज होटल में आज मुंबई शहर का सबसे चर्चित ब्लाइंड डेट इवेंट था। शाम के ठीक पाँच बजे होटल का मुख्य हॉल हल्की नीली रोशनी और गहरे साए में डूबा हुआ था। वेटर्स ने अपने चेहरों पर काले मास्क पहन रखे थे और एंट्रेंस पर लंबी लाइन लगी थी। हर गेस्ट का कार्ड चेक किया जा रहा था, फिर उनकी आंखों पर पट्टी बांधकर उन्हें अलग-अलग कमरों की ओर ले जाया जा रहा था। माहौल में हल्का म्यूज़िक और अनजाना सा रोमांच घुला हुआ था।

    उसी लाइन में खड़ी थी आरोही। हाथ में डायमंड वीआईपी पास और दिमाग में अनगिनत सवाल। वह यहां अपनी दोस्त रोशनी की जगह आई थी, बस थोड़ी देर के लिए। वह बार-बार अपने फोन की स्क्रीन देख रही थी, जैसे खुद से ही पूछ रही हो — क्या सच में अंदर जाना चाहिए?

    तभी उसका फोन बजा। स्क्रीन पर रोशनी का नाम चमक रहा था। आरोही ने तुरंत कॉल उठाई और धीमी आवाज में बोली, “कहां है तू? तेरी बारी आने वाली है।” उधर से दर्द भरी आवाज आई, “सॉरी यार, मैं घर से निकलने ही वाली थी कि मेरा पैर मुड़ गया। अभी हॉस्पिटल में हूं। प्लीज तू मेरी जगह चली जा।”

    आरोही ने झुंझलाते हुए कहा, “मुझे इन सब में कोई इंटरेस्ट नहीं है, और वैसे भी मेरे पास बॉयफ्रेंड बनाने का टाइम नहीं है।”

    रोशनी ने लगभग विनती करते हुए कहा, “प्लीज… आखिरी बार। तुझे मेरी कसम।”

    बस यही वो शब्द थे जिन पर आरोही हमेशा हार जाती थी। उसने गहरी सांस ली और कहा, “ठीक है, पर ये आखिरी बार है। तू मुझे हर बार ऐसे ही फंसा लेती है। बता यहां मुझे करना क्या है?”

    रोशनी चहकते हुए बोली,

    “कुछ खास नहीं, बस जैसी तू है वैसे ही रहना। और हां… लड़का मुझे ना कह दे, आगे मैं अपनी मॉम को संभाल लूंगी।”

    कुछ ही देर बाद उसकी बारी आ गई। उसने हल्की सी मुस्कान के साथ अपना पास दिखाया। दो स्टाफ मेंबर्स उसके पास आए, उसकी आंखों पर काली पट्टी बांधी और उसे धीरे-धीरे एक शांत, अंधेरे कमरे तक ले गए। कुर्सी पर बैठाकर पट्टी हटा दी गई। कमरे में हल्की सी पीली रोशनी थी, इतनी कि सामने बैठे शख्स की परछाईं दिखे, चेहरा नहीं।

    कुछ क्षणों तक खामोशी रही। फिर सामने से एक गहरी और संतुलित आवाज आई, “हेलो।”

    आरोही ने भी जवाब दिया, “हाय।”

    शुरुआती बातचीत औपचारिक थी, लेकिन धीरे-धीरे माहौल सहज होने लगा। आरोही का रुखापन भी थोड़ा कम होने लगा। जब उसने पूछा, “आप क्या करते हैं?” तो सामने वाले ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, “बस… बिज़नेस।”

    “अच्छा है,” आरोही ने हंसते हुए कहा, “कम से कम आप अपने बॉस को रोज़ नहीं झेलते होंगे। मेरा बॉस तो… क्या बताऊं, चलता-फिरता टेंशन है। अगर पैसों की जरूरत ना होती तो उसकी कंपनी में एक दिन भी काम ना करती।”

    सामने बैठा शख्स हल्का सा हंसा, “इतना बुरा है?”

    आरोही बातों में इतनी खो गई कि उसने अपनी कंपनी का नाम भी बोल दिया — “AK Industries में काम करना कोई आसान बात नहीं है।”

    जैसे ही ये शब्द उसके मुंह से निकले, सामने बैठे शख्स की उंगलियां कुर्सी के हैंडल पर हल्के से थम गईं। उसकी मुस्कान थोड़ी गहरी हुई, पर उसने अपनी प्रतिक्रिया छुपा ली।

    बातचीत आगे बढ़ती रही। दोनो यहां वहा की बाते कर रहे थे ।

    इवेंट खत्म होने का संकेत मिला तो सामने वाले ने शांत स्वर में पूछा, “क्या हम फिर मिल सकते हैं?”

     लेकिन आरोही ने शांत स्वर में मना करते हुए कहा,

    “मेरा पहले से एक बॉयफ्रेंड है। मैं यहां बस अपनी मॉम की वजह से आई थी… इसलिए शायद हमें आगे नहीं मिलना चाहिए। यही हमारे लिए बेहतर है।”

    वह उठी, दरवाज़ा खोला और बिना पीछे देखे बाहर चली गई।

    कमरे में कुछ पल सन्नाटा रहा। फिर उसी अंधेरे में बैठा वह शख्स हल्के से मुस्कुराया और बहुत धीमी आवाज में बोला, “AK Industries… दिलचस्प।”

     

    उसकी आंखों में अब हल्की सी चमक थी।