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लेखक: आशीष मिश्रा मैथिली

  • अधूरी मोहब्बत के ‘इंतज़ार का साया

    अधूरी मोहब्बत के ‘इंतज़ार का साया

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    अधूरी मोहब्बत के ‘इंतज़ार का साया

    नयन और आरुषि का मिलना किसी फिल्मी दृश्य से कम नहीं था। पहली मुलाकात दिल्ली विश्वविद्यालय के पुराने आर्ट्स फैकल्टी की कैंटीन में हुई थी, जब पहली बरसात ने जून की तपती गर्मी को अचानक ठंडक में बदल दिया था। आरुषि अपनी किताबों और बिखरे हुए नोट्स को समेटने की हड़बड़ी में थी, और नयन, एक शांत, गंभीर चेहरा लिए, वहीं कोने की मेज पर बैठा उसे देख रहा था।
    “माफ़ करना, मेरा छाता आज धोखा दे गया,” आरुषि ने भीगे बालों से पानी झटकते हुए कहा।
    नयन ने बिना कुछ कहे, अपना जैकेट उसकी ओर बढ़ा दिया। “भीग जाओगी।”
    वह जैकेट, जिसकी महक में मिट्टी की सोंधी खुशबू और उसकी अपनी एक हल्की सी सिगरेट की गंध मिली हुई थी, आरुषि के लिए पहला तोहफ़ा था। वह जैकेट नयन की तरह ही था,  बाहर से रूखा, पर अंदर से बेहद गर्म और सुरक्षा देने वाला।
    धीरे धीरे वह एक छोटी मुलाक़ात कब दोस्ती में बदली और दोस्ती कब इश्क़ की एक गहरी नदी में, उन्हें पता ही नहीं चला। उनका रोमांस किताबों के पन्नों, देर रात की कॉफ़ी और दिल्ली की सर्द रातों में गर्माहट देने वाली लंबी ड्राइव में पनपा। आरुषि को नयन की खामोशियाँ पढ़ना आता था, और नयन को आरुषि की आँखों में छिपे हर सपने को साकार करना था।

    नयन की उंगलियां जब आरुषि के उलझे बालों को सुलझाती थीं, तो उस स्पर्श में सदियों का इकरार होता था। उनका प्रेम सिर्फ शब्दों का मोहताज नहीं था, वह एक-दूसरे की रूह में उतर चुका था। हर चुंबन, हर आलिंगन एक वादा था, हमेशा साथ रहने का।

    एक रात, इंडिया गेट पर, मद्धम रोशनी के बीच, नयन ने आरुषि का हाथ अपने हाथ में लेकर भींच लिया था।
    “तुम मेरी हो, आरुषि। आख़िरी साँस तक।”
    आरुषि ने मुस्कुराते हुए अपनी आँखें बंद कर ली थीं, जैसे उसने ब्रह्मांड के सबसे बड़े सच को स्वीकार कर लिया हो।

    लेकिन हर प्रेम कहानी की तरह उनकी प्रेम कहानी में एक मोड़ आना बाकी था, जो किसी भी प्रेम कहानी को पूरा नहीं होने देता।
    नयन एक मध्यवर्गीय परिवार से था, पर महत्वाकांक्षाएँ पहाड़ जितनी ऊँची थीं। उसके पिता का सपना था कि वह सिविल सर्विसेज़ में जाए। और नयन भी आरुषि के परिवार की तरह तथा अन्य लोंगों की तरह जानता था कि सरकारी नौकरी ही समाज में उनकी प्रेम कहानी को स्वीकार्यता दिला सकती है।
    “एक साल, बस एक साल और, आरुषि,” नयन ने उसे समझाते हुए कहा था, जब आरुषि ने उसे रोज़ मिलने से मना करने पर शिकायत की थी, तो नयन ने लगभग गिड़गिड़ाते हुए बोला, बस इस एक साल के बाद तुम्हें वो सब दूँगा जिसका तुम सपना देखती हो, एक सुरक्षित भविष्य, एक छोटा-सा घर, और हर पल मेरा साथ।

    वह एक साल, इंतज़ार और विरह का है। उनका रोमांस अब फ़ोन कॉल्स, चोरी-छिपे की मुलाक़ातों और ख़त में सिमट गया था।
    परीक्षा की तैयारी चरम पर थी, और तभी किस्मत ने अपना क्रूर खेल खेला। नयन के पिता को अचानक दिल का दौरा पड़ा। परिवार की सारी जमापूंजी इलाज में लग गई, और नयन को अपनी पढ़ाई छोड़कर, परिवार को संभालने के लिए एक छोटी-सी निजी कम्पनी में नौकरी करनी पड़ी।
    टूट गए सारे वादे, बिखर गए सारे सपने।
    कुछ दिनों तक जब आरुषि की बातचीत और कोई संपर्क नयन से नही हुआ,  तो अचानक एक दोपहर, आरुषि, नयन के पुराने कमरे में पहुँची। कमरा खाली था, सिर्फ़ कोने में रखी किताबों पर धूल जमी थी। नयन उसे यह सब बताने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था, उसने बस एक छोटा-सा संदेश छोड़ा था:
    आरुषि, मैं टूट गया हूँ। मैं तुम्हें वो ज़िंदगी नहीं दे सकता जिसका तुम हक़ रखती हो। मेरा प्रेम स्वार्थी नहीं है कि मैं तुम्हें भी अपने साथ इस अंधेरे में खींच लूँ। मुझे भूल जाना। यह हमारे इश्क़ का दर्दनाक अंत है।”

    नयन के उस एकतरफ़ा फ़ैसले ने आरुषि को अंदर तक झकझोर दिया। वह रोई, चिल्लाई, पर नयन का  कुछ भी पता नहीं चला। नयन यह जानता था कि आरुषि के परिवार वाले कभी एक असफल और आर्थिक रूप से टूटे हुए लड़के से उसकी शादी नहीं करेंगे। इसलिए उसने खुद को दूर करके, अपनी मोहब्बत को एक तरह से बलिदान कर दिया था।

    धीरे धीरे देखते देखते कब पांच साल गुज़र गए, किसी को पता भी नही चला।
    आरुषि की शादी एक सफल व्यवसायी से हो चुकी थी। अब उसके पास ऐशो-आराम के लिए सब कुछ था, बंगला, गाड़ी, ऐशो-आराम। पर उसकी आँखों में नयन का इंतज़ार आज भी ज़िंदा था। वह आज भी हर बारिश में नयन के जैकेट की महक खोजती थी।
    उसकी ज़िंदगी में रोमांस था, पर इश्क़ नहीं। उसका पति उसे बहुत प्यार करता था, पर वह स्पर्श, वह जुड़ाव जो नयन की नज़रों में था, उसे वह कहीं नहीं मिला।
    एक रात, बारिश ज़ोरों पर थी। आरुषि अपने बेडरूम की बालकनी में खड़ी थी, आँखें मूँदकर। उसके मन में नयन के साथ बिताई गई हर अंतरंग मुलाक़ात, हर मीठी शरारत घूम रही थी। उसे याद आया, कैसे नयन उसे पहली बार अपने सीने से लगाया था और कैसे उनके होंठ एक कसक भरी चाहत में मिले थे।
    आरुषि ने अपनी आँखें खोलीं और उसकी नज़रों के सामने नयन का चेहरा घूम गया, एक दर्द भरा प्रेम, एक अनसुलझा बंधन। उसके दिल में एक टीस उठी।

    संयोगवश उसी शहर में, नयन ने भी खुद को अपने परिवार के लिए संभाला था। वह एक छोटी-सी प्रिंटिंग प्रेस चलाता था, जो ठीक-ठाक चल जाती थी। वह भी एक खालीपन में जी रहा था। उसका सबसे बड़ा डर था कि वह आरुषि को किसी और के साथ खुश देखेगा। पर जब उसने दूर से आरुषि को एक बार अपनी कार में देखा, तो उसकी आँखों की उदासी ने नयन को बता दिया कि आरुषि अभी भी उसी अधूरी मोहब्बत के पिंजरे में कैद है।
    नयन ने हर शाम एक डायरी लिखी, जिसमें वह आरुषि को अपनी ज़िंदगी के हर पल का हिसाब देता था।
    आज मैंने तुम्हारे पसंदीदा फूल देखे।
    आज चाय बनाते हुए तुम्हारा ख़याल आया।
    आज बारिश हुई, और मुझे तुम्हारा भीगा हुआ चेहरा याद आया।
    यह डायरी, उसके लिए आरुषि से रोज़ बात करने का ज़रिया थी। उसका प्रेम अब भी ज़िंदा था, पर सिर्फ़ कागज़ों पर।

    छठे साल, एक कला प्रदर्शनी में, किस्मत ने उन्हें एक बार फिर मिला दिया।
    आरुषि, अपने पति के साथ, एक पेंटिंग के सामने खड़ी थी, जिसका शीर्षक था, इंतज़ार का साया’। उस पेंटिंग में, एक लड़की दूर क्षितिज को देख रही थी, और उसके साये में एक धुंधला-सा पुरुष का चेहरा छिपा था।
    जब आरुषि ने पलटा, तो उसके सामने नयन खड़ा था। समय थम गया। पाँच सालों का दर्द, विरह, और प्रेम उनकी आँखों में भर आया।
    नयन का शरीर पहले से ज़्यादा थका हुआ लग रहा था, पर उसकी आँखें आज भी वही थीं, गहरी और आरुषि के लिए अटूट प्रेम से भरी।
    “आरुषि…” नयन की आवाज़ काँपी।
    “नयन…” आरुषि ने केवल इतना कहा, और उसके होंठ काँपने लगे।
    आरुषि के पति ने नयन को देखा, पर उन्हें लगा कि वह कोई पुराना सहपाठी है। उन्होंने सम्मानपूर्वक हाथ मिलाया और थोड़ी देर में उन्हें अकेला छोड़ दिया।
    वे दोनों गैलरी के शांत कोने में बैठ गए।
    “तुमने क्यों किया ऐसा, नयन?” आरुषि की आवाज़ में पाँच सालों का दर्द था। “तुमने क्यों मान लिया कि मेरा प्यार इतना कमज़ोर है कि वह तुम्हारी मुश्किलों को नहीं सह पाएगा?”
    नयन ने उदास नज़रों से उसे देखा। “मैं स्वार्थी नहीं बन सकता था, आरुषि। मैं तुम्हें अंधेरे और अभाव की ज़िंदगी नहीं देना चाहता था। मेरा प्रेम आज भी उतना ही सच्चा है, पर मैं तुम्हें यह सब देने के बाद तुम्हारे सपनों को मरते हुए नहीं देख पाता।”
    उस शाम, वे घंटों बातें करते रहे। उन्होंने अपने अधूरे प्रेम के हर मोड़ को छुआ। उनका प्रेम, जो कभी शारीरिक आलिंगनों में व्यक्त होता था, आज सिर्फ़ आत्मिक जुड़ाव में सिमट गया था।
    आरुषि ने नयन का हाथ पकड़ा। वह स्पर्श आज भी उतना ही सुरक्षित और अपनापन देने वाला था।
    “हम अब भी एक-दूसरे से प्यार करते हैं, नयन।”
    नयन की आँखों से आँसू बह निकले। “हाँ, करते हैं। पर अब यह प्यार हमारा नहीं रहा, यह बस एक दर्द भरी याद है।”
    नयन ने अपनी जेब से एक मुड़ी हुई डायरी निकाली। “यह तुम्हारी अमानत है। इसमें हमारे हर अधूरे पल का हिसाब है।”
    “क्या अब हम…?” आरुषि ने हिम्मत करके पूछा।
    नयन ने मुस्कुराने की कोशिश की, पर उसकी मुस्कुराहट में केवल पीड़ा थी।
    “हम हमेशा एक-दूसरे के रहेंगे, आरुषि, पर अब केवल सपनों में। तुम्हारी ज़िंदगी में अब एक सफ़र है जिसे तुम्हें पूरा करना है। और मेरी ज़िंदगी… मेरी ज़िंदगी तो उसी दिन खत्म हो गई थी जब मैंने तुम्हें खोने का फ़ैसला किया था।”
    आरुषि ने वह डायरी ले ली। वह डायरी नहीं थी, वह उनके इश्क़ का मज़ार था।
    नयन उठा। यह उनकी अंतिम, और सबसे दर्द भरी मुलाक़ात थी। उसने आरुषि के माथे को धीरे से छुआ, बिना कोई चुंबन दिए, बिना कोई आलिंगन दिए। यह स्पर्श, किसी भी गहरे शारीरिक मिलन से ज़्यादा पवित्र और गहरा था, क्योंकि इसमें केवल त्याग और निस्वार्थ प्रेम था।
    “ख़ुश रहना, आरुषि। तुम जहाँ हो, ख़ुश रहना।”
    “और तुम?”
    “मैं? मैं हमेशा तुम्हारा हूँ।”
    नयन मुड़ा और भीड़ में कहीं खो गया। आरुषि वहीं खड़ी रही। उसके पास प्रेम की सबसे बड़ी निशानी थी, वह अधूरी डायरी।
    आज भी, आरुषि अपने आलीशान घर में रात की तन्हाई में उस डायरी के पन्ने पढ़ती है। वह जानती है कि उसका पति उसे भौतिक सुख दे सकता है, पर उसकी रूह हमेशा नयन की रहेगी।
    उनकी मोहब्बत अधूरी रही, पर उनका इश्क़ अमर हो गया, एक मीठा, दर्द भरा एहसास जो हर साँस के साथ ज़िंदा रहता है।
    समाप्त
    पढ़ने के लिए धन्यवाद।
    यह कहानी आपको कैसी लगी? आपकी समीक्षा का इंतज़ार रहेगा। यदि आपको यह कहानी छू गई हो, तो मुझे प्रोत्साहन में एक ❤️ या ✨ स्टीकर भेजकर मेरा उत्साहवर्धन ज़रूर करें!

     

  • बेवजह की मोहब्बत

    बेवजह की मोहब्बत

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    बेवजह की मोहब्बत

     

    मेरी लाइफ एकदम सॉर्टेड थी। अच्छी जॉब (सीनियर मैनेजर, गुड़गांव), एक प्यारी वाइफ (नेहा) और एक फ्लैट जिसकी ईएमआई (EMI) हर महीने मेरे अकाउंट को खाली करने की कसम खाती थी। मैं 32 साल का था, मैरिड था, और लाइफ की बोरियत को ‘सफलता’ मान चुका था।

    फिर आई रिया। फेसबुक के एक रैंडम ग्रुप पर हमारी बहस हुई,  “क्या चाय कॉफी से बेहतर है?” इस बेवकूफी भरे टॉपिक से शुरू हुई बात कब मैसेंजर से व्हाट्सएप और फिर वॉयस कॉल तक पहुँच गई, पता ही नहीं चला।

    “शादीशुदा होने का मतलब यह नहीं है कि आपका दिल धड़कना बंद कर देता है, बस वह गलत दिशा में धड़कने का रिस्क नहीं लेना चाहता।” पर मेरा दिल उस समय एडवेंचर के मूड में था।

    रिया मुझसे सात साल छोटी थी। बैंगलोर में रहती थी। उसकी आवाज़ में वो जादू था जो गुड़गांव के ट्रैफिक में भी मुझे सुकून देता था।

     

    शुरुआत में   सब ‘फ्रेंडली’ था। लेकिन धीरे-धीरे हमारी बातें ‘गुड मॉर्निंग’ से ‘आई मिस यू’ तक पहुँच गईं। नेहा (मेरी वाइफ) को लगता था कि मैं ऑफिस के कॉल्स पर बिजी हूँ। और एक तरह से मैं बिजी ही था, अपनी दूसरी लाइफ को मैनेज करने में।

    रिया और मेरे बीच घंटों वॉयस कॉल्स होते थे। जब रात को घर के सब लोग सो जाते, मैं बालकनी में जाकर उससे बात करता।

    “तुम शादीशुदा क्यों हो, अर्जुन?” वह अक्सर पूछती।

    “क्योंकि मैं तुमसे पहले नेहा से मिला था। टाइमिंग का खेल है सब,” मैं मज़ाक में कहता।

    लेकिन यह सिर्फ़ मज़ाक नहीं था। हमारे बीच खुलकर रोमांस होने लगा था। चैट पर वो बातें होती थीं जो शायद मैंने नेहा से कभी नहीं की थीं। वॉयस कॉल पर उसकी सांसों की आवाज़ सुनकर मुझे लगता था कि यही ‘सच्चा प्यार’ है। हमने हज़ारों वादे किए। हमने प्लान बनाया कि हम गोवा में मिलेंगे। वह कहती थी, अर्जुन, तुम मेरे सोलमेट हो। मुझे फर्क नहीं पड़ता कि तुम मैरिड हो, मुझे बस तुम चाहिए।”

    मुझे लगा कि रिया वो ‘मिसिंग पीस’ है जो मेरी लाइफ की पहेली को पूरा कर देगी।

     

    सब कुछ परफेक्ट चल रहा था, जैसे किसी बॉलीवुड फिल्म का पहला हाफ। फिर अचानक रिया के मैसेज कम होने लगे।

    “बिजी हूँ,” “काम का प्रेशर है,” “मम्मी पास में हैं”, ये सब बहाने आम हो गए।

    फिर एक हफ्ता ऐसा आया जब उसने मेरा कोई कॉल नहीं उठाया। मैं पागल हो रहा था। गुड़गांव की सड़कों पर कार चलाते हुए मैं बार-बार फोन चेक करता। नेहा को लगा कि ऑफिस में कुछ बड़ा पंगा हुआ है। उसे क्या पता था कि मेरा ‘दिल का ऑफिस’ बंद होने की कगार पर है।

    “प्यार में ‘इंतज़ार’ करना अच्छा लगता है, लेकिन ‘इग्नोर’ होना दुनिया की सबसे गन्दी फीलिंग है।”

    आठ दिन बाद उसका फोन आया। मेरी जान में जान आई।

    “रिया! कहाँ थी तुम? मैं मर रहा था तुम्हारे बिना!”

    दूसरी तरफ से जो आवाज़ आई, वो रिया की तो थी, पर उसमें वो ‘इश्क’ नहीं था।

    “सुनो अर्जुन, मुझे लगता है हमें अब बात नहीं करनी चाहिए,” उसने बहुत ही ठंडे अंदाज़ में कहा।

     

    मैं यह सुनकर सुन्न रह गया। “क्या? क्यों? क्या हुआ?”

    “कुछ नहीं हुआ। बस मुझे रियलाइज हुआ कि यह सब ‘बेवजह’ है। तुम मैरिड हो। तुम्हारा फ्यूचर नेहा के साथ है। मैं अपनी लाइफ में आगे बढ़ना चाहती हूँ,” उसने ऐसे कहा जैसे वह किसी क्लाइंट को प्रेजेंटेशन दे रही हो।

    उसका अंदाज़ एकदम बदल गया था। वो रिया, जो कॉल पर रो पड़ती थी अगर मैं पाँच मिनट लेट फोन करूँ, अब पत्थर बन चुकी थी।

    “लेकिन रिया, तुमने कहा था कि तुम मुझसे प्यार करती हो? गोवा का प्लान? हमारी वो बातें?”

    “वो सब एक क्रेज था, अर्जुन। अब मैं मैच्योर हो गई हूँ। प्लीज, मुझे कॉल मत करना।”

    उसने फोन काट दिया। मैंने दोबारा मिलाया। ब्लॉक। व्हाट्सएप चेक किया। ब्लॉक। इंस्टाग्राम? ब्लॉक।

     

    मैंने हार नहीं मानी। मैंने अपने एक दोस्त के फोन से उसे कॉल किया। उसने उठाया।

    “रिया, प्लीज एक बार बात कर लो। मैं अपनी शादी छोड़ दूंगा, मैं बैंगलोर आ जाऊंगा,” मैं गिड़गिड़ा रहा था। एक 32 साल का शादीशुदा आदमी, जो अपनी लाइफ में सब कुछ अचीव कर चुका था, एक 25 साल की लड़की के सामने भीख मांग रहा था।

    “अर्जुन, तुम पैथेटिक लग रहे हो। गेट अ लाइफ!” रिया की आवाज़ में नफरत थी।

    “पर क्यों? कम से कम वजह तो बताओ? कोई और मिल गया क्या?”

    “वजह यह है कि मुझे अब तुममें कोई इंटरेस्ट नहीं है। ख़त्म।”

    उसने फिर से ब्लॉक कर दिया। मैंने ईमेल लिखे, लंबे-लंबे पैराग्राफ लिखे। मैंने उसे वो वॉयस नोट्स याद दिलाए जो उसने मुझे भेजे थे। मैंने उसे हमारी वो ‘हॉट चैट्स’ याद दिलाईं। पर कोई जवाब नहीं।

    मुझे समझ नहीं आ रहा था कि जो इंसान कल तक मेरे बिना सांस नहीं ले सकता था, वो आज मुझे कचरा कैसे समझ सकता है?

     

    कुछ हफ़्तों बाद, एक कॉमन फ्रेंड के ज़रिए मुझे पता चला कि रिया की सगाई हो गई है। एक एनआरआई (NRI) लड़के के साथ। वो लड़का अनमैरिड था, अमीर था और अमेरिका में रहता था।

    सब कुछ साफ़ हो गया। रिया के लिए मैं कोई ‘सोलमेट’ नहीं था। मैं बस एक ‘टाइमपास’ था, एक ‘फिलर’ था। जब तक उसे अपनी लाइफ का असली ‘हीरो’ नहीं मिला, वह मेरे साथ डिजिटल रोमांस का नाटक करती रही। मेरी शादीशुदा लाइफ उसके लिए एक सुरक्षा कवच थी, उसे पता था कि मैं कभी उस पर शादी का दबाव नहीं बनाऊंगा, इसलिए वह खुलकर एन्जॉय कर रही थी।

    जैसे ही उसकी लाइफ में ‘सेटल’ होने का मौका आया, उसने मुझे ‘डिलीट’ कर दिया जैसे हम फोन से कोई फालतू ऐप डिलीट कर देते हैं।

     

    आज मैं अपनी बालकनी में खड़ा हूँ। नेहा अंदर आरव (मेरा बेटा, जो अब हो गया है) को सुला रही है। लाइफ फिर से वही है, ईएमआई, ऑफिस और बोरियत।

    रिया अब अमेरिका में है। शायद वह अपने पति के साथ वैसी ही बातें करती होगी जैसी मुझसे करती थी। या शायद नहीं।

    यह कहानी एक लेसन पर खत्म होती है। मेरा लेसन यह था, ऑनलाइन प्यार अक्सर एक ‘फ्री ट्रायल’ की तरह होता है। जैसे ही सब्सक्रिप्शन लेने का टाइम आता है, कंपनी (या लड़की) हाथ खींच लेती है।”

    मोहब्बत बेवजह नहीं होती, उसके पीछे हमेशा एक वजह होती है। कभी वो वजह ‘अकेलापन’ होती है, तो कभी ‘लालच’। रिया के लिए वजह ‘मनोरंजन’ थी, और मेरे लिए वजह ‘भटकाव’ था।

    मैंने अपना फोन निकाला, रिया का नंबर जो आज भी मेरे ‘ब्लॉक लिस्ट’ में सबसे ऊपर था, उसे हमेशा के लिए डिलीट कर दिया। लाइफ सॉर्टेड तो नहीं हुई, पर अब कम से कम ‘हैंग’ नहीं हो रही थी।

     

    लेखक का सन्देश और आभार

    मेरे प्यारे और दिल टूटे (या जुड़े हुए) पाठकों,

    इस मॉडर्न, बेबाक और कड़वे सच से भरी शैली में रचित इस कहानी “बेवजह की मोहब्बत” को पढ़ने के लिए आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया! यह कहानी हमें सिखाती है कि डिजिटल दुनिया के वादे अक्सर ‘नेटवर्क’ की तरह होते हैं, जो कभी भी गायब हो सकते हैं।

    शादीशुदा लाइफ में जब हम बाहर सुकून ढूंढते हैं, तो अक्सर हम ‘सुकून’ नहीं, बल्कि ‘तूफान’ को दावत देते हैं। उम्मीद है कि अर्जुन की यह कहानी आपको अपनी प्राथमिकताओं को समझने में मदद करेगी।

    क्या अर्जुन के साथ जो हुआ, वो सही था? क्या रिया ने जो किया, वह आज के समय की कड़वी सच्चाई है? अपनी राय और एक्सपीरियंस नीचे कमेंट सेक्शन में ज़रूर साझा करें।

    यदि इस डिजिटल लव-स्टोरी और ब्रेकअप ने आपके दिल को छुआ हो, तो कृपया स्टिकर  भेजकर अपना प्यार और समर्थन दें।

    आपकी हर प्रतिक्रिया मुझे और भी ज़्यादा आधुनिक लाइफस्टाइल और मानवीय रिश्तों पर कहानियाँ लिखने की प्रेरणा देती है।

     

    प्यार करो तो ‘लॉगिन’ संभलकर करना, क्योंकि ‘लॉगआउट’ अक्सर दर्दनाक होता है!

     

     

  • बेवजह की मोहब्बत

    बेवजह की मोहब्बत

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    बेवजह की मोहब्बत  

     

     

     

     

     

    रात के लगभग ढाई बजे थे, अंधेरे कमरे में बस मोबाइल की हल्की नीली रोशनी थी, और उस रोशनी में बैठा था विवेक, एक शादीशुदा आदमी, जिसकी ज़िंदगी बाहर से बिल्कुल परफेक्ट लगती थी।

     

    एक अच्छी नौकरी, एक समझदार पत्नी, एक छोटा सा बच्चा… सब कुछ था उसके पास।

     

    फिर भी… उसे लगता था, कि कुछ कमी है।

     

    और उस कमी का नाम उसे तब तक नहीं पता था, जब तक कि एक दिन उसकी ज़िंदगी में “नेहा” नहीं आई।

     

     

     

     

    नेहा का एक मैसेज, जो विवेक की जिदंगी में सब बदल गया

     

    वो एक सामान्य दिन था। ऑफिस के काम के बीच विवेक ने फेसबुक खोला, और उसमें  एक नोटिफिकेशन आया

     

    “Hi… क्या आप सच में उतने ही serious हैं, जितने आपकी पोस्ट दिखती हैं?”

     

    विवेक ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, शायद उससे थोड़ा ज्यादा…

     

    बस, यहीं से शुरू हुई एक कहानी, जो जितनी जल्दी बनी, उतनी ही जल्दी टूट भी गई।

     

     

     

     

    नेहा आज की माडर्न लड़की थी, उसकी सोच अलग थी, उसकी बातें… उसकी सोच… सब कुछ ऐसा था जो विवेक को नेहा कि ओर खींचता चला गया।

     

    पहले तो शुरुआत में हल्की-फुल्की बातें हुईं, काम, जिंदगी, सपने… ज्यादातर काम की सीरियस बात उन दोनों के बीच होती थी।

     

    फिर धीरे-धीरे बातें गहरी होने लगीं।

     

    नेहा विवेक से कहती तुमसे बात करके सुकून मिलता है…”

     

    विवेक हँसकर जवाब देता, मुझे भी…”

     

    लेकिन दोनों जानते थे, ये सिर्फ “सुकून” नहीं था।

     

     

     

     

    धीरे-धीरे उनके बीच बातचीत की सीमा टूटने लगी

     

    विवेक शादीशुदा था, ये बात उसने पहले ही दिन नेहा को बता दी थी।

     

    नेहा यह सुनकर कुछ पल के लिए चुप हुई थी…

    फिर बोली—

    “दिल का क्या करें… वो तो किसी से भी लग सकता है…”

     

    उस दिन के बाद से दोनों के बीच एक अनकहा रिश्ता बन गया।

     

    ना नाम था, ना कोई वादा… लेकिन दोनों के बीच एहसास गहरे और सच्चे थे।

     

     

    अब उनकी बातें सिर्फ चैट तक सीमित नहीं रहीं।

     

    रात होते ही कॉल शुरू हो जाती।

     

    धीरे-धीरे वो कॉल्स लंबी होने लगीं—

    कभी एक घंटा, कभी दो…

     

    और फिर वो पल आया, जब दोनों ने अपनी झिझक छोड़ दी।

     

    अब उनकी आवाज़ों में सिर्फ बातें नहीं थीं…

    उनमें एहसास था, चाहत थी।

     

    नेहा की हँसी में एक अपनापन था,

    और विवेक की आवाज़ में एक अपनापन।

     

    वो कहते—

    “काश… हम पहले मिले होते…”

     

    और हर बार ये “काश” उनकी दूरी को और गहरा कर देता।

     

     

    उनके बीच अब झिझक की कोई दीवार नहीं बची थी।

     

    चैट में, कॉल में, दोनों खुलकर अपनी भावनाएँ जताते।

     

    नेहा विवेक से कहती जब तुम ‘miss you’ कहते हो ना… दिल सच में भर आता है…”

     

    विवेक जवाब देता, तुम मेरी आदत बन गई हो…”

     

    उनकी बातें कभी-कभी इतनी गहरी हो जातीं कि लगता हि नही था, कि ये रिश्ता सिर्फ ऑनलाइन है, दिल से जुड़ा हुआ नही है।

     

    लेकिन शायद यही विवेक का सबसे बड़ी गलती थी।

    एक दिन 1-2  हफ्ते के लिए अपने  ऑफिस के काम में कुछ ज्यादा ब्यस्त हो गया, तो वह नेहा को कुछ कम समय दे पा रहा था, जिससे नेहा नाराज रहने लगी।

     

    बाद मे जब विवेक अपने काम से फुर्सत पाया तो उसने नेहा से बात करने का कोशिश किया…  लेकिन अचानक से नेहा का व्यवहार बहुत बदल गया।

     

    धीरे-धीरे नेहा का मैसेज विवेक को कम आने लगा।

     

    कॉल्स छोटी हो गईं, और फिर… अचानक एक दिन वह बंद ही हो गया।

     

    पहले दिन जब  विवेक ने  सुबह दोपहर शाम को अभिवादन का मैसेज किया, जिसका कोई जबाब नही आया तो विवेक सोचा, शायद किसी काम में व्यस्त होगी।”

    दूसरे दिन, जब यही सिलसिला जारी रहा तो, विवेक सोचने लगा, शायद वह किसी बात से नाराज़ है…

    तीसरे दिन भी जब मैसेज  नही आया, तो विवेक अपने आप में सोचने लगा कि क्या मैंने कुछ गलत कहा?”

     

    उसने नेहा को  मैसेज किया सब ठीक है?”

    लेकिन कोई  जवाब  नही,  तब विवेक को नेहा कि फिक्र होने लगा, उसका मन किसी अनहोनी की आशंका से भर गया, वह उससे बात करने, तथा उसका हाल जानने के लिए  उसका मन तड़प गया।

    तब विवेक ने उसके और नेहा के बीच कुछ काॅमन दोस्त थे, उनसे चर्चा किया, नेहा के बारे में उसके कुछ देर बाद नेहा का मैसेज आया।

    मैसेज के शब्द बहुत ही उत्साहहीन था, एकदम बदलता हुआ अंदाज अब वह नेहा पहले जैसी नहीं रही।

     

    वो पहले घंटों बात करती थी,

    अब मिनटों में “busy हूँ” कहकर चली जाती थी।

     

    विवेक हर दिन कोशिश करता, नए तरीके से बात शुरू करने की, उसे हँसाने की…

     

    लेकिन हर बार जवाब वही मिलता “मूड नहीं है…”

     

     

     

     

    विवेक ने हार नहीं मानी।

     

    उसने खुद को दिल से और ज्यादा झोंक दिया उस रिश्ते में।

     

    वो हमेशा पूछता कुछ हुआ है क्या?”

     

    नेहा हमेशा अपने जबाब में  कहती कुछ नहीं…”

     

    वो कहता “तुम पहले जैसी क्यों नहीं हो?” क्योंकि विवेक को तो चुलबुली और नटखट नेहा की आदत थी, लेकिन यहां नेहा एक दम चुप हो गई थी।

     

    नेहा  ज्यादातर सवालों के जवाब में अब चुप हो जाती।

     

    उसकी चुप्पी…  विवेक को सबसे ज्यादा दर्द देती थी।

     

     

     

    एक सच, जो धीरे-धीरे सामने आया, एक दिन, बहुत कोशिश के बाद नेहा ने कहा विवेक… शायद ये सब गलत है…”

     

    विवेक का दिल धड़क उठा, और उसने पुछा

    “गलत? क्या?”

     

    नेहा बोली ये रिश्ता… ये बातें… सब कुछ…”

     

    विवेक ने समझाने की कोशिश की लेकिन ये रिस्ता तो  सच्चा है…”

     

    नेहा ने जवाब दिया “सच्चा है… लेकिन सही नहीं है…”

     

     

     

    उस दिन के बाद, नेहा विवेक से और दूर हो गई।

     

    अब वो खुद से बात शुरू नहीं करती थी।

     

    विवेक हर दिन एक नया मैसेज भेजता, कैसी हो?”

    “आज क्या किया?”

     

    लेकिन जवाब… या तो देर से आता,

    या आता ही नहीं।

     

    एक रात, विवेक ने हिम्मत जुटाई।

     

    उसने कॉल किया।

     

    काफी देर बाद नेहा ने उठाया।

     

    आवाज़ में वही अपनापन नहीं था।

     

    विवेक ने कहा नेहा, हम ये सब खत्म क्यों कर रहे हैं?”

     

    नेहा कुछ पल चुप रही…

    फिर बोली “क्योंकि ये कभी शुरू ही नहीं होना चाहिए था…”

     

     

    अलविदा… बिना शोर के

     

    विवेक ने आखिरी बार कहा—

    “मैं इसे संभाल सकता हूँ… हम इसे सही बना सकते हैं…”

     

    नेहा की आवाज़ धीमी थी—

    “कुछ चीजें सही नहीं बनतीं… बस खत्म हो जाती हैं…”

     

    और फिर… कॉल कट।

     

    उसके बाद नेहा ने खुद से कभी मैसेज नहीं किया।

     

     

    विवेक के पास सब कुछ था…

    फिर भी  उसे लग रहा था, कि जैसे कुछ नहीं था।

     

    उसकी जिंदगी वही थी, ऑफिस, घर, परिवार…

     

    लेकिन अब हर चीज में एक खालीपन था।

     

    वो  मिनट मिनट पर फोन उठाता… नेहा के मैसेज को देखता, लेकिन वहां सब कुछ खाली ही था।

    उसके दिनचर्या में एक अध्याय नेहा का इंतज़ार भी जुड गया।

     

    लेकिन रियल में क्योंकि अब कोई “नेहा” नहीं थी

     

    कुछ रिश्ते वजह से नहीं बनते…

    और इसलिए ही बिना वजह खत्म हो जाते हैं।

     

    विवेक और नेहा का रिश्ता भी ऐसा ही था।

     

    ना कोई शुरुआत का सही कारण,

    ना कोई अंत का सही जवाब।

     

    बस एक एहसास था, जो आया… और चला गया।

     

    एक दिन, महीनों बाद, विवेक ने अपने पुराने चैट पढ़े।

     

    हर मैसेज… हर कॉल…

    सब कुछ जैसे फिर से जिंदा हो गया।

     

    उसने मुस्कुराते हुए फोन बंद किया और सोचा, शायद वो सही थी…

    ये सच्चा था… लेकिन सही नहीं था…”

     

    बेवजह की मोहब्बत… दिल को बहुत कुछ देती है

    कुछ खूबसूरत यादें, कुछ अधूरे सवाल… और एक गहरा सन्नाटा।

     

    “कुछ लोग हमारी जिंदगी में आते हैं,

    हमें खुद से मिलवाने के लिए…

    और फिर चले जाते हैं, 

    हमें अधूरा छोड़कर,

    लेकिन थोड़ा मजबूत बनाकर…”

     

    इस कहानी को पढ़ने के लिए आपको दिल से धन्यवाद ❤️

    अगर कहानी ने आपके दिल को छुआ हो, तो उत्साहवर्धन के लिए स्टिकर जरूर भेजें 😊

     

     

  • भाग – 1 इश्क का पैगाम

    भाग – 1 इश्क का पैगाम

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

     

     

     

     

     

    • भाग – 1 इश्क का पैगाम

    सकरी की माटी और रूह की पहली प्यास

     

    बिहार राज्य के पूर्णिया जिला के सकरी गाँव की सरहद पर जब शाम उतरती है, तो ऐसा लगता है मानो किसी नवयौवना ने अपनी सिंदूरी साड़ी का पल्लू पूरे आकाश पर फैला दिया हो। वह धूल भरी पगडंडी, जिसके दोनों ओर बाँस के झुरमुट हवा में धीरे-धीरे सरसराते थे, जैसे कोई पुराना आशिक अपनी प्रेमिका के कान में कोई गुप्त मंत्र फूँक रहा हो। इसी पगडंडी पर धूल उड़ाती हुई जब ईशान की काली जीप रुकी, तो पूरे गाँव के सन्नाटे में एक अजीब सी हलचल मच गई।

     

    ईशान, जिसके चेहरे पर दिल्ली की भागदौड़ और ‘ब्रेकअप्स’ की थकान साफ़ झलक रही थी, जीप से नीचे उतरा। उसने चश्मा हटाया और एक लम्बी साँस ली। हवा में नीम के पत्तों की कड़वाहट और जलते हुए उपलों की वह सोंधी महक थी, जिसे बहुत से लेखक ने अपनी कहानियों में अमर कर दिया था। ईशान के लिए यह केवल एक ‘लोकेशन’ नहीं थी; यह एक ऐसी दुनिया थी जहाँ प्रेम आज भी अपनी आदिम शुद्धता में जीवित था।

    “यही है सकरी…” ईशान बुदबुदाया। उसके हाथ में कैमरा था, लेकिन मन में एक ऐसी बेचैनी थी जिसे वह खुद समझ नहीं पा रहा था। वह यहाँ एक डॉक्यूमेंट्री शूट करने आया था, लेकिन उसके भीतर का आधुनिक युवा, जो केवल ‘शॉर्ट-टर्म’ रिश्तों और ‘कैजुअल डेटिंग’ का आदी था, यहाँ की शांति से डर रहा था। उसे क्या पता था कि सकरी की यह शांति किसी बड़े तूफान के आने की आहट है।

    गाँव के बीचों-बीच एक पुराना पोखर था, जिसे लोग ‘हंसिया पोखर’ कहते थे। शाम का वक्त था। गाँव की औरतें और लड़कियाँ अपने घड़ों में पानी भरने वहीं जुटती थीं। ईशान टहलता हुआ उधर ही निकल गया। वहीं उसकी मुलाकात मंजरी से हुई।

    मंजरी… वह कोई मामूली लड़की नहीं थी। वह सकरी की धूप और बारिश से बनी एक ऐसी मूरत थी, जिसे देखकर पत्थर भी पिघल जाए। उसने हलके नीले रंग की सूती साड़ी पहनी थी, जिसका पल्लू उसके कंधे से ढलक कर उसकी सुडौल कमर पर आ टिका था। जब वह पानी भरने के लिए पोखर की सीढ़ियों पर झुकी, तो उसकी साड़ी का एक हिस्सा भीग गया। वह भीगा हुआ कपड़ा उसके जिस्म से इस तरह चिपक गया था, मानो साड़ी ने उसके शरीर की हर वक्रता (curve) को चूमने की कसम खा ली हो।

    ईशान का कैमरा हाथ में ही रह गया। उसने कई बार फैशन शोज़ में अधनंगी मॉडल को देखा था, लेकिन मंजरी के उस भीगे हुए रूप में जो ‘शुद्ध कामुकता’ थी, उसने ईशान के पैरों तले की ज़मीन खिसका दी। वह आकर्षण केवल शारीरिक नहीं था; वह रूह की एक ऐसी पुकार थी जिसे ईशान ने पहले कभी महसूस नहीं किया था। मंजरी के गोरे और सुडौल बदन पर पानी की छोटी-छोटी बूंदें सूरज की आखिरी किरणों में ऐसे चमक रही थीं, जैसे किसी कलाकार ने सोने की राख बिखेर दी हो।

    मंजरी ने जैसे ही आहट पाकर पीछे मुड़कर देखा, उसकी आँखें ईशान की आँखों से टकराईं। वह क्षण जैसे अनंत काल के लिए थम गया। मंजरी की आँखों में वह ग्रामीण लज्जा तो थी, लेकिन साथ ही एक ऐसी आग भी थी जो सीधे कलेजे को चीर कर पार निकल जाए। प्रेम की भाषा में कहें तो, “मंजरी की चितवन में वह जादू था, जो सावन की पहली फुहार में मिट्टी से उठने वाली उस महक में होता है, जो मन को पागल कर देती है।

    उसने अपनी पायल की छन-छन के साथ एक कदम पीछे हटाया। उसके भीगे बदन की सिहरन दूर खड़े ईशान तक पहुँच रही थी। ईशान के भीतर का आधुनिक पुरुष, जो हमेशा शब्दों और तर्कों से खेलता था, आज गूंगा हो गया था। उसे अपनी रगों में खून की गति तेज होती महसूस हुई। वह मंजरी के करीब जाना चाहता था, उसे छूना चाहता था, यह देखना चाहता था कि क्या यह हाड़-मांस की बनी कोई इंसान है या सिर्फ उसका कोई सपना।

    “कौन हैं आप?” मंजरी की आवाज़ में कोई डर नहीं था, बल्कि एक अजीब सा अधिकार था। उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे पुरानी बांसुरी से कोई विरह का राग निकल रहा हो।

    ईशान ने खुद को संभाला। “मैं… मैं शहर से आया हूँ। कुछ तस्वीरें खींचने।”

    मंजरी हल्का सा मुस्कुराई। उस मुस्कुराहट ने उसके चेहरे पर वह नूर बिखेरा कि ईशान को लगा जैसे पूरी कायनात सिमट कर वहीं आ गई हो। “तस्वीरें? हमारी क्या तस्वीरें खींचिएगा बाबू? यहाँ तो सब कुछ पुराना है, धूल भरा है।”

    “नहीं…” ईशान ने आगे बढ़कर कहा, उसकी आवाज़ में एक गहरी हूक थी, “यहाँ वो है, जो मेरी दुनिया में खो चुका है। यहाँ ‘इश्क’ अपनी असली शक्ल में है।”

    मंजरी ने अपनी नज़रें झुका लीं। उसके गालों पर गुलाबी रंग उभर आया, जो शायद उस शाम की लाली से भी ज्यादा गहरा था। वह अपनी गागर उठाकर जाने लगी, लेकिन उसका भीगा आँचल रास्ते में पड़ी एक झाड़ी में फँस गया। जैसे ही उसने उसे छुड़ाने के लिए ज़ोर लगाया, साड़ी का वह भीगा हिस्सा और भी तन गया, जिससे उसके शरीर की बनावट ईशान के सामने पूरी तरह स्पष्ट हो गई। ईशान का गला सूखने लगा। आज की ‘फास्ट लाइफ’ में जहाँ सेक्स सिर्फ एक ज़रूरत थी, यहाँ उसे महसूस हुआ कि एक स्पर्श की प्यास क्या होती है।

    मंजरी ने शरमाते हुए आँचल छुड़ाया और एक बार पीछे मुड़कर ईशान को देखा। उस एक नज़र में हज़ारों पैगाम थे, आमंत्रण भी, डर भी और एक अनकही चाहत भी।

    उस रात, सकरी के डाक-बंगले में लेटे हुए ईशान को नींद नहीं आई। बाहर झींगुरों का शोर था और दूर कहीं कोई बिरहा गा रहा था। उसे बार-बार मंजरी का वह भीगा बदन, उसकी सुराहीदार गर्दन पर थमी पानी की वो बूंद और उसकी आँखों की वो आग याद आ रही थी। उसने महसूस किया कि उसका शहरी दिल, जो अब तक केवल ‘डेटिंग ऐप्स’ के छोटे-छोटे पैगामों में खुशी ढूँढता था, अब एक बड़ी आग में जलने को तैयार है।

    सकरी की वह रात गवाह थी कि एक आधुनिक प्रेमी और एक ग्रामीण प्रेमिका के बीच की वह दीवार अब टूटने वाली थी। यह केवल एक प्रेम कहानी की शुरुआत नहीं थी; यह दो अलग-अलग दुनियाओं के टकराने और एक होने की दास्तान थी, जहाँ जिस्म की प्यास और रूह की तलाश एक दूसरे में मिलने वाली थी।

    जारी…..

     

    मेरे प्यारे पाठकों, “इश्क का पैगाम” का यह पहला भाग आपको कैसा लगा? क्या सकरी गाँव की माटी की महक और मंजरी की वो पहली सिहरन आपके दिल तक पहुँची?

    पढ़ने के लिए आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया! ❤️

    यह एक लम्बी और रोमांचक यात्रा है। आपकी हर एक टिप्पणी (Comment) और प्रतिक्रिया मुझे आगे लिखने की ऊर्जा देगी। कृपया  अपने विचार जरूर लिखें और कहानी पसंद आये, तो उपहार स्वरूप स्टीकर भेजकर प्रोत्साहित करें।

    सधन्यवाद