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लेखक: lovely jo

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lovely jo

NSW नया लेखक – 🥉

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  • उसने मुझे कुछ पूछा

    उसने मुझे कुछ पूछा

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    उसने पूछा—

    “तू मुझे देखती भी नहीं…

    क्या तुझे मुझसे मोहब्बत है?”

    मैं मुस्कुरा दी…

    मोहब्बत नहीं होती तो यूँ नज़रें क्यों चुराती?

    मुझमें बस हिम्मत नहीं है।

    डर लगता है…

    कहीं तुम्हें देखते-देखते

    खुद को ही न भूल बैठूँ।

    कहीं तुम्हारी आँखों में ऐसा खो जाऊँ

    कि फिर इस दुनिया का कोई ख़याल ही न रहे।

    इसलिए नज़रें झुका लेती हूँ…

    क्योंकि एक बार जो तुम्हें देख लिया,

    फिर नज़रें हटाना मेरे बस में नहीं रहता।

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  • “बारिश वाली मुलाकात”

    “बारिश वाली मुलाकात”

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    शाम का समय था। हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। सड़क किनारे एक छोटी सी चाय की दुकान पर भीड़ लगी थी। रिया भीगती हुई वहाँ आकर रुकी। उसके हाथ में किताबें थीं और चेहरे पर गुस्सा।

    “आज ही बारिश आनी थी…” उसने धीरे से कहा।

     

    तभी पास खड़े एक लड़के ने अपनी छतरी उसकी तरफ बढ़ा दी।

    “अगर चाहो तो इस्तेमाल कर सकती हो।”

     

    रिया ने उसकी तरफ देखा। लड़का मुस्कुरा रहा था। सफेद शर्ट पूरी भीग चुकी थी, लेकिन फिर भी उसके चेहरे पर अजीब सी शांति थी।

     

    “और तुम?” रिया ने पूछा।

     

    “मैं बारिश पसंद करता हूँ।” उसने हँसते हुए कहा।

     

    रिया ने बिना कुछ बोले छतरी ले ली। कुछ देर बाद दोनों एक ही बस में बैठे थे। संयोग ऐसा था कि सीट भी साथ मिली।

     

    “वैसे मैं आरव हूँ।”

     

    “रिया।”

     

    बस की खिड़की से बारिश की बूंदें अंदर आ रही थीं। दोनों छोटी-छोटी बातें करने लगे। रिया ने अपने बैग से एक नोट बुक निकाली ओर उसने कुछ लिखने लगी पता ही नहीं चला कब रास्ता खत्म हो गया। उतरते समय रिया जल्दी में थी। उसकी किताब नीचे गिर गई। आरव ने उठाकर उसे दी। तभी उसके अंदर से एक छोटा सा कागज़ गिरा।

     

    आरव ने अनजाने में उसे उठा लिया।

    उस पर हल्के नीले पेन से लिखा था—

     

    “कुछ मुलाकातें अजीब होती हैं…

    सिर्फ कुछ मिनटों में कोई इंसान अपना सा लगने लगता है…”

     

    रिया की धड़कन जैसे रुक गई। उसने जल्दी से वो कागज़ उसके हाथ से ले लिया। “वो… बस ऐसे ही लिखा था मैंने।” उसने नजरें चुराते हुए कहा।

     

    आरव कुछ पल उसे देखता रहा। फिर हल्का सा मुस्कुराया।

    “अच्छा लिखा है…” उसने धीमी आवाज़ में कहा,

    “क्योंकि मुझे भी आज कुछ ऐसा ही महसूस हुआ।”

     

    रिया ने पहली बार उसकी आँखों में देखा।

    बारिश की बूंदें अब भी गिर रही थीं, बस फर्क इतना था कि अब उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी।

     

    दोनो अपने अपने रस्ते की ओर चले गए दोनों बिना ये सोचे कि फिर मुलाकात होगी कि नहीं रिया अक्सर आरव के बारे में सोचने लगी वो हर बार बस उस प्लान को अपने दिमाग में दोहराती ओर ऐसा ही कुछ हाल आरव का था ऐसे ही सालों बीत गए पर रिया उस दिन के अलावा कभी आरव को सोच नहीं पाई शायद वो फिर मुलाकात नहीं उस पल में ही खुश रहना चाहती थी शायद यही होता है कुछ पल का सुकून या प्यार 

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    NSW नया लेखक – 🥉

  • ब्लाइंड डेट से मिला प्यार एपिसोड 2

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    एपिसोड 2: बॉस का इंतकाम या दिलचस्प शुरुआत?

    मुंबई की रात कभी नहीं सोती। सड़कों पर शोर था, ट्रैफ़िक का शोर, लोगों की आवाज़ें… लेकिन AK Industries की 25वीं मंज़िल पर एक अलग ही खामोशी पसरी थी। वहां सिर्फ कीबोर्ड की ‘टैप-टैप’ सुनाई दे रही थी। कांच की बड़ी खिड़की के पीछे एक शख्स अंधेरे में डूबा, लैपटॉप की रोशनी में काम कर रहा था।

    तभी, भारी दरवाज़ा एक झटके से खुला। शख्स की उंगलियां कीबोर्ड पर रुकीं। उसने बिना पीछे मुड़े, अपनी घड़ी देखी—रात के 11 बज रहे थे।

    “तो… कैसी रही तुम्हारी ब्लाइंड डेट?” एक गहरी और रौबदार आवाज़ गूंजी।

    दरवाज़े पर खड़ा शख्स, विजय, हंसते हुए अंदर आया और सामने वाली चेयर पर बैठ गया। “भाई! डेट तो ऐसी थी कि तुझे ज़िंदगी भर अफ़सोस होगा कि तू क्यों नहीं गया!”

    काम में डूबे उस शख्स ने लैपटॉप बंद किया। यह अक्षय खन्ना था। 25 साल का हैंडसम, कामयाब और थोड़ा सा ‘वर्कहोलिक’ बिज़नेस टाइकून। उसके लिए काम ही उसकी दुनिया थी, और उसकी एक नज़र लड़कियों का दिल धड़काने के लिए काफी थी।

    अक्षय ने कुर्सी पीछे झुकाई और ठंडे अंदाज़ में पूछा, “इतनी तारीफ? क्या खास था उसमें?”

    विजय ने मेज़ पर झुकते हुए कहा, “खास वो नहीं, उसकी बातें थीं! उसे पता नहीं था कि वो ‘अक्षय खन्ना’ के सबसे पक्के दोस्त के साथ बैठी है। वो बेचारी तो अपने बॉस की धज्जियां उड़ा रही थी।”

    अक्षय की एक भौंह ऊपर उठी। “बॉस की?”

    “हाँ!” विजय ने मजे लेते हुए कहा, “कह रही थी कि उसका बॉस ‘चलता-फिरता टेंशन’ है। हिटलर का दूसरा अवतार! और सुन… उसने ये भी कहा कि अगर पैसों की मजबूरी न होती, तो वो उस ‘खड़ूस’ की कंपनी में एक पल न रुकती।”

    अक्षय के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया, पर उसकी आंखों में एक चमक जागी। “मेरी कंपनी की एम्प्लॉई है?”

    “बिलकुल! बातों-बातों में उसने AK Industries का नाम ले लिया। नाम तो नहीं बताया उसने अपना, पर भाई… लड़की में दम है। तुझे ‘हिटलर’ बोलकर निकल गई!” विजय ठहाका मारकर हंसा।

    अक्षय की उंगलियां टेबल पर ताल देने लगीं। उसके होंठों पर एक शातिर मुस्कान आई। “मेरे ही नमक का हक अदा कर रही है और मुझे ही हिटलर कह रही है? दिलचस्प है…”

    उसने अपना फोन उठाया और एक नंबर डायल किया। “कल सुबह 9 बजे तक मुझे अपनी कंपनी की हर फीमेल एम्प्लॉई की लिस्ट चाहिए। हर एक की।”

    दूसरी तरफ: आरोही का घर

    आरोही ने अपने घर का दरवाज़ा खोला। सामने सोफे पर रोशनी बैठी थी, जिसके पैर पर पट्टी बंधी थी, पर हाथ में चिप्स का पैकेट था।

    आरोही थककर सोफे पर गिरी। “पैर कैसा है अब तेरा? या सिर्फ मेरी खिंचाई करने के लिए पट्टी बांधी है?”

    रोशनी हंसी, “अरे यार, दर्द तो है, पर तेरी डेट की कहानी सुनने की एक्साइटमेंट ज़्यादा है। बता, लड़का कैसा था? उसने तुझे रिजेक्ट किया या तूने उसे भगाया?”

    आरोही ने टीवी का रिमोट उठाते हुए चैन की सांस ली। “मैंने काम तमाम कर दिया। साफ़ कह दिया कि मेरा बॉयफ्रेंड है। अब वो कभी पलटकर नहीं आएगा। वैसे… लड़का बुरा नहीं था, काफी सुलझा हुआ था। पर मुझे इन सब पचड़ों में नहीं पड़ना।”

    रोशनी ने उसे कोहनी मारते हुए कहा, “देख लेना आरोही, कहीं वो लड़का तेरा पीछा न करने लगे।”

    आरोही ने लापरवाही से कहा, “अरे छोड़! मुंबई इतनी बड़ी है, वो दोबारा कभी नहीं मिलेगा। और कल सुबह मुझे ऑफिस जल्दी जाना है, वो ‘हिटलर’ बॉस कल कोई नई आफत न खड़ी कर दे।”

    वापस अक्षय के केबिन में… अक्षय अंधेरे में खिड़की से बाहर मुंबई की लाइट्स देख रहा था। उसके दिमाग में विजय की बातें गूंज रही थीं—”चलता फिरता टेंशन।”

    उसने धीरे से बुदबुदाया, “कल ऑफिस में मिलते हैं, मिस्टीरियस एम्प्लॉई। देखते हैं कल तुम अपनी ‘टेंशन’ को कैसे झेलती हो।”

    उसकी आंखों में अब एक अलग ही शिकार वाली चमक थी।

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  • ब्लाइंड डेट से मिला प्यार

    ब्लाइंड डेट से मिला प्यार

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    एपिसोड 1 

    राज होटल में आज मुंबई शहर का सबसे चर्चित ब्लाइंड डेट इवेंट था। शाम के ठीक पाँच बजे होटल का मुख्य हॉल हल्की नीली रोशनी और गहरे साए में डूबा हुआ था। वेटर्स ने अपने चेहरों पर काले मास्क पहन रखे थे और एंट्रेंस पर लंबी लाइन लगी थी। हर गेस्ट का कार्ड चेक किया जा रहा था, फिर उनकी आंखों पर पट्टी बांधकर उन्हें अलग-अलग कमरों की ओर ले जाया जा रहा था। माहौल में हल्का म्यूज़िक और अनजाना सा रोमांच घुला हुआ था।

    उसी लाइन में खड़ी थी आरोही। हाथ में डायमंड वीआईपी पास और दिमाग में अनगिनत सवाल। वह यहां अपनी दोस्त रोशनी की जगह आई थी, बस थोड़ी देर के लिए। वह बार-बार अपने फोन की स्क्रीन देख रही थी, जैसे खुद से ही पूछ रही हो — क्या सच में अंदर जाना चाहिए?

    तभी उसका फोन बजा। स्क्रीन पर रोशनी का नाम चमक रहा था। आरोही ने तुरंत कॉल उठाई और धीमी आवाज में बोली, “कहां है तू? तेरी बारी आने वाली है।” उधर से दर्द भरी आवाज आई, “सॉरी यार, मैं घर से निकलने ही वाली थी कि मेरा पैर मुड़ गया। अभी हॉस्पिटल में हूं। प्लीज तू मेरी जगह चली जा।”

    आरोही ने झुंझलाते हुए कहा, “मुझे इन सब में कोई इंटरेस्ट नहीं है, और वैसे भी मेरे पास बॉयफ्रेंड बनाने का टाइम नहीं है।”

    रोशनी ने लगभग विनती करते हुए कहा, “प्लीज… आखिरी बार। तुझे मेरी कसम।”

    बस यही वो शब्द थे जिन पर आरोही हमेशा हार जाती थी। उसने गहरी सांस ली और कहा, “ठीक है, पर ये आखिरी बार है। तू मुझे हर बार ऐसे ही फंसा लेती है। बता यहां मुझे करना क्या है?”

    रोशनी चहकते हुए बोली,

    “कुछ खास नहीं, बस जैसी तू है वैसे ही रहना। और हां… लड़का मुझे ना कह दे, आगे मैं अपनी मॉम को संभाल लूंगी।”

    कुछ ही देर बाद उसकी बारी आ गई। उसने हल्की सी मुस्कान के साथ अपना पास दिखाया। दो स्टाफ मेंबर्स उसके पास आए, उसकी आंखों पर काली पट्टी बांधी और उसे धीरे-धीरे एक शांत, अंधेरे कमरे तक ले गए। कुर्सी पर बैठाकर पट्टी हटा दी गई। कमरे में हल्की सी पीली रोशनी थी, इतनी कि सामने बैठे शख्स की परछाईं दिखे, चेहरा नहीं।

    कुछ क्षणों तक खामोशी रही। फिर सामने से एक गहरी और संतुलित आवाज आई, “हेलो।”

    आरोही ने भी जवाब दिया, “हाय।”

    शुरुआती बातचीत औपचारिक थी, लेकिन धीरे-धीरे माहौल सहज होने लगा। आरोही का रुखापन भी थोड़ा कम होने लगा। जब उसने पूछा, “आप क्या करते हैं?” तो सामने वाले ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, “बस… बिज़नेस।”

    “अच्छा है,” आरोही ने हंसते हुए कहा, “कम से कम आप अपने बॉस को रोज़ नहीं झेलते होंगे। मेरा बॉस तो… क्या बताऊं, चलता-फिरता टेंशन है। अगर पैसों की जरूरत ना होती तो उसकी कंपनी में एक दिन भी काम ना करती।”

    सामने बैठा शख्स हल्का सा हंसा, “इतना बुरा है?”

    आरोही बातों में इतनी खो गई कि उसने अपनी कंपनी का नाम भी बोल दिया — “AK Industries में काम करना कोई आसान बात नहीं है।”

    जैसे ही ये शब्द उसके मुंह से निकले, सामने बैठे शख्स की उंगलियां कुर्सी के हैंडल पर हल्के से थम गईं। उसकी मुस्कान थोड़ी गहरी हुई, पर उसने अपनी प्रतिक्रिया छुपा ली।

    बातचीत आगे बढ़ती रही। दोनो यहां वहा की बाते कर रहे थे ।

    इवेंट खत्म होने का संकेत मिला तो सामने वाले ने शांत स्वर में पूछा, “क्या हम फिर मिल सकते हैं?”

     लेकिन आरोही ने शांत स्वर में मना करते हुए कहा,

    “मेरा पहले से एक बॉयफ्रेंड है। मैं यहां बस अपनी मॉम की वजह से आई थी… इसलिए शायद हमें आगे नहीं मिलना चाहिए। यही हमारे लिए बेहतर है।”

    वह उठी, दरवाज़ा खोला और बिना पीछे देखे बाहर चली गई।

    कमरे में कुछ पल सन्नाटा रहा। फिर उसी अंधेरे में बैठा वह शख्स हल्के से मुस्कुराया और बहुत धीमी आवाज में बोला, “AK Industries… दिलचस्प।”

     

    उसकी आंखों में अब हल्की सी चमक थी।

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  • एक कहानी

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    खामोशियों में भी एक कहानी होती है,
    दिल की धड़कनों में भी एक रवानी होती है।
    हर कोई समझ नहीं पाता इन जज़्बातों को,
    क्योंकि सच्ची मोहब्बत अक्सर बेआवाज़ होती है। ❤️✨

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