भाग~44 सुलगते स्केच
रूहानी ने रात के खाने के बाद मीना को फ़ोन किया। मीना से उसने अपनी बात बड़ी ही आत्मीयता से साझा की कि वह चाहती है कि मीना की बेटी का जन्मदिन उसके नए स्टूडियो की उद्घाटन समारोह के साथ मनाया जाए।
मीना को इस प्रस्ताव पर कोई आपत्ति नहीं थी, उसकी आवाज़ में सहमति और थोड़ी प्रसन्नता झलक रही थी। रूहानी ने मुस्कराते हुए उसे जल्दी आने के लिए कहा और फ़ोन रख दिया।
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। फ़ोन रखने के बाद भी रूहानी की आंखों में नींद नहीं उतरी। बिस्तर पर करवटें बदलती रही…. एक बेचैनी, एक उलझन सी मन में थी, जैसे किसी पुरानी याद ने धीरे से दस्तक दी हो।
अंततः, जब नींद ने उसका हाथ थामने से इनकार कर दिया, तो वह चुपचाप, बहुत धीरे-धीरे बिस्तर से उठ खड़ी हुई। मन बोझिल था, और दिल किसी अनकहे सन्नाटे से भरा हुआ।
उसकी चाल में थकान थी, जैसे हर कदम बीते हुए वक़्त के किसी बोझ को ढो रहा हो। बिना आवाज़ किए वह अद्वैत के स्टडी रूम की ओर बढ़ी, जहाँ अब भी उसकी ख़ुशबू, उसकी आदतें और उसका सहेजा हुआ सन्नाटा बाकी था।
दरवाज़ा बंद कर उसने नज़रें कमरे के कोनों में दौड़ाईं, मेज़, किताबें, कागज़… और वो ख़त, जो इस बार ईशिता का नहीं, अद्वैत का था। शायद वो उसे छुपाकर रखना भूल गया था।
उसने धीरे से ख़त उठा लिया…. लग रहा था, ये कुछ ही देर पहले लिखा गया है।
उसने खिड़की खोली। ठंडी हवा का झोंका भीतर आया, जैसे बीते पलों की वो ख़ामोश चाँदनी साथ ले आया हो, जो कभी दो लोगों के बीच का मौन चुपचाप तोड़ जाया करती थी।
रूहानी फर्श पर बैठ गई। चाँद की रोशनी उसके चेहरे पर गिरी और वो पल फिर से आँखों में उतर आया… जब अदालत की ठंडी मेज़ पर उसने अद्वैत के साथ दस्तख़त किए थे। न सात फेरे थे, न मंगलसूत्र, बस काग़ज़ों की चुप्पी और एक अधूरा वादा…. जो कभी “हमेशा” नहीं था, फिर भी दिल ने मान लिया था।
उसने गहरी साँस ली… और पढ़ना शुरू किया।
💌 प्रिय ईशिता,
जब तुमने कहा था—“हमेशा,” मैंने उस एक लफ़्ज़ को अपनी रूह की सबसे भीतरी दीवार पर लिख लिया था।
मुझे लगा था, उस दिन से लेकर आख़िरी साँस तक, मेरी दुनिया में सिर्फ़ तुम होगी…. तुम्हारे साथ जीने का सपना, तुम्हारे साथ बूढ़ा होने की ख्वाहिश।
पर अब….. जब तुम नहीं हो मुझे शादी करनी पड़ी।
नहीं…. नहीं…… मात्र क़ानूनी तौर पर एक रिश्ता दर्ज है, मगर उसमें वो धड़कन नहीं है, वो तुम नहीं हो।
इस बंधन में न तुम्हारी हँसी है, न तुम्हारी बाँहों की वो पनाह, जहाँ मैं हर बार टूटकर समेटा जाता था।
आज भी तुम्हारी तस्वीर मेरे कमरे में है, जहाँ तुमने उसे पहली बार रखा था….. एक मुस्कान के साथ।
हर बार जब मेरी नज़र उस पर टिकती है, तो यूँ लगता है जैसे वो आँखें मुझसे पूछ रही हों….
“क्या अब भी वही हो, अद्वैत?”
और सच कहूँ, हाँ… मैं अब भी वहीं हूँ। जहाँ तुमने मुझे छोड़ा था।
रूहानी… हम्म्म… वह अब मेरी ज़िंदगी का हिस्सा है…… एक साल के लिए, एक समझौते की तरह।
कभी-कभी मुझे लगता है कि यह समय का एक अजीब सा खेल है। तुम तो जानती हो, मैं समझौतों में यकीन नहीं रखता था। लेकिन ज़िंदगी कभी-कभी तुम्हें ऐसे मोड़ पर ले आती है जहाँ सबसे अनचाहे रास्ते ही सबसे ज़रूरी लगने लगते हैं।
आज उसने मुझे अपने नए स्टूडियो की ओपनिंग में बुलाया। उसकी आँखों में चमक थी, लेकिन उसकी आवाज़ में वो थकान थी जिसे शब्द छिपा नहीं पाए।
उसने मुस्कराकर कहा, “अगर फीस लोगे तो अपनी बचत से दूँगी।” जैसे कोई कुछ साबित करना चाहता हो, शायद मुझे नहीं… खुद को।
तुम होती तो हँसकर कहती, “अद्वैत, तुम कभी नहीं बदलोगे।”
और मैं जवाब देता, “हाँ ईशिता, तुम्हारे बिना क्या बदलूँ?”
रूहानी की आँखों में कभी-कभी तुम्हारी सी ज़िद नज़र आती है….. वही जो तुमने देखी थी जब मैंने अपनी पहली किताब लिखी थी। पर उसमें तुम्हारे जैसा सुकून नहीं है।
लेकिन उसकी दुनिया अलग है, उलझनों से भरी… उसके संघर्ष अलग हैं। मैं उसे देखता हूँ, वो अपने सपनों को पूरा करने की कोशिश कर रही है। कभी उसकी हँसी में एक हल्की सी उदासी झलकती है…. एक ऐसी खामोशी, जो बहुत कुछ कहती है।
आज रात कमरे में बस पीली रौशनी थी। वो चाहती थी कि मैं कुछ कहूँ… और मैंने चाहा कि कह पाऊँ।
लेकिन मेरे होंठों पर सिर्फ़ तुम थी। मेरे शब्द हमेशा तुम्हारे लिए थे, ईशिता… सिर्फ़ तुम्हारे लिए।
लोग कहते हैं… “आगे बढ़ो।”
पर वो नहीं जानते कि आगे बढ़ने के लिए पीछे छूटना पड़ता है।
और तुम कभी पीछे नहीं छूटी… तुम तो मेरी हर साँस में बसी रही। हर सन्नाटे में, हर अधूरे वाक्य में।
मैं नहीं जानता ये समझौता क्या रंग लाएगा, रूहानी क्या खोज रही है, और मैं कहाँ जाऊँगा… पर एक बात जानता हूँ….
मेरी सबसे ख़ूबसूरत कहानी,
जो आज भी अधूरी है…
वो सिर्फ़ तुम्हारी है।
तुम्हारी याद में,
अद्वैत
उस ख़त की आख़िरी पंक्ति पर आते-आते, रूहानी की उंगलियाँ काँपने लगीं। उसकी आँखें ख़ामोश थीं लेकिन भीतर एक सुनामी फूट रही थी। खिड़की के पार रात अब और भी स्याह हो चुकी थी, लेकिन अंदर का अँधेरा… उससे कहीं ज़्यादा गहरा था।
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अपने कमरे में लौटने के बाद रूहानी धीमे-धीमे चलती हुई अपनी अलमारी के पास पहुंची। अलमारी खोलते हुए उसकी उंगलियों में कंपन था।
उसने नीचे की दराज से वो पुरानी फाइल निकाली, जिसे वो छूने से भी डरती थी….. वही फाइल जिसमें वो स्केच थे, जो उसने एकांश के लिए बनाए थे।
कुछ स्केच अधूरे थे, जैसे उनकी कहानी। कुछ के कोनों पर जले हुए निशान थे…. जैसे दिल के किसी हिस्से को समय ने धीरे-धीरे राख में बदला हो। उसने एक-एक करके उन्हें फर्श पर फैलाया, हर स्केच से जैसे कोई चीख़ बाहर आ रही थी।
वो मुस्कुराता चेहरा, वो आँखें जो रूहानी की आँखों में डूब जाया करती थीं, और वो अधूरा स्केच जिसमें रूहानी ने एकांश का चेहरा खत्म करने से पहले ही पेंसिल छोड़ दी थी।
अचानक वो पल कौंध गया….. वो विश्वासघात, वो ठंडापन, जो अब भी उसकी रगों में काँपती थी। उसकी साँसें तेज़ हो गईं, चेहरा पसीने से भीग गया।
वो सारे स्केच को समेटी , जैसे ज़हर को एक जगह इकट्ठा कर रही हो, और फिर कमरे के कोने में उन्हें पहाड़ कर दिया।
“अब तुमसे जुड़ा कुछ भी मेरे पास नहीं रहेगा…” वह बुदबुदाई, और माचिस जलाकर स्केच को आग लगा दी।
लपटें धीरे-धीरे फैलने लगीं। रूहानी की आँखें उस आग में डूब गईं, मानो वहीं अपना हर अधूरा जवाब खोज रही हो। उसके चेहरे पर आँसू नहीं थे, पर जो सूनापन था, वो किसी चीख से कम नहीं था।
वो उठी, और मोबाइल से उस जलते हुए पल की एक तस्वीर लेने लगी…. जैसे वो राख होते पलों को आख़िरी बार बंद करना चाहती हो।
लेकिन तभी…
उसका फोन कंपन करने लगा।
स्क्रीन पर नाम चमका…. एकांश कॉलिंग।
रूहानी का हाथ बीच हवा में रुक गया।
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एकांश को अभी क्यों याद आई रूहानी?
क्या रूहानी फोन उठाएगी… या इस बार वो जवाबों को सुलगा देगी, हमेशा के लिए?
क्या ये रिश्ता महज़ एक समझौता है… या किसी अनजाने मोड़ पर दिल फिर से धड़कने लगेगा?

लिखकर रूह छूने की कोशिश…..
🥹🥹








