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लेखक: Alka Singh

Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

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  • पीछे देखना मना है..!!

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    बूढ़ी औरत की आवाज कुएँ के भीतर गूँजी—

     

    “पीछे देखो…”

     

    अमित का शरीर ठंडा पड़ गया।

     

    नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “भैया, मत सुनना।”

     

    लेकिन इस बार आवाज फिर आई।

     

    “अमित… पीछे देखो।”

     

    आवाज बिल्कुल बूढ़ी औरत की थी।

     

    अमित ने धीरे-धीरे उसकी तरफ देखा।

     

    बूढ़ी औरत वहीं खड़ी थी।

     

    लेकिन कुछ अजीब था।

     

    उसकी लालटेन बुझ चुकी थी।

     

    फिर भी उसके आसपास हल्की नीली रोशनी थी।

     

    अमित ने पूछा—

     

    “आपने कहा था पीछे मत देखना।”

     

    बूढ़ी औरत मुस्कुराई।

     

    “मैंने?”

     

    अमित चुप हो गया।

     

    नैना अचानक उसके सामने आ गई।

     

    “भैया, यह वह नहीं है।”

     

    बूढ़ी औरत का चेहरा धीरे-धीरे बदलने लगा।

     

    उसकी त्वचा काली पड़ गई।

     

    आँखें खाली हो गईं।

     

    फिर उसके चेहरे पर कोई चेहरा नहीं रहा।

     

    सिर्फ एक गहरा अंधेरा।

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    “तो असली बूढ़ी औरत कहाँ है?”

     

    काली आकृति ने कहा—

     

    “तुमने उसे बहुत पहले छोड़ दिया।”

     

    अमित ने चारों तरफ देखा।

     

    “वह कहाँ है?”

     

    “उस जगह जहाँ हर वह इंसान जाता है जो पीछे देखता है।”

     

    अचानक कुएँ की दीवारें हिलने लगीं।

     

    नैना ने अमित का हाथ पकड़ लिया।

     

    “हमें यहाँ से निकलना होगा।”

     

    दोनों ऊपर की तरफ भागे।

     

    बूढ़ी औरत भी उनके पीछे आई।

     

    लेकिन जैसे ही वे कुएँ से बाहर निकले, अमित ने देखा कि मंदिर के सामने तीन लोग खड़े थे।

     

    एक उसकी माँ।

     

    दूसरा उसका पिता।

     

    तीसरा रवि।

     

    तीनों बिल्कुल चुप।

     

    अमित की माँ ने कहा—

     

    “बेटा… घर चलो।”

     

    अमित वहीं रुक गया।

     

    नैना ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “ये तीनों असली नहीं हैं।”

     

    रवि आगे बढ़ा।

     

    “अमित, मैं हूँ।”

     

    अमित ने उसे देखा।

     

    “अगर तुम रवि हो तो मुझे बताओ… पहली बार मैंने तुम्हें कहाँ देखा था?”

     

    रवि मुस्कुराया।

     

    “कॉलेज में।”

     

    अमित ने सिर हिलाया।

     

    “गलत।”

     

    रवि का चेहरा बदलने लगा।

     

    अमित बोला—

     

    “मैंने तुम्हें स्कूल में देखा था।”

     

    रवि का चेहरा अचानक काला पड़ गया।

     

    उसने चीख मारी और गायब हो गया।

     

    अब उसके पिता आगे आए।

     

    “बेटा…”

     

    अमित की आँखें भर आईं।

     

    “पापा।”

     

    नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “सावधान।”

     

    अमित ने पूछा—

     

    “पापा, आपने मुझे क्यों बचाया था?”

     

    आकृति चुप रही।

     

    “क्योंकि मैं आपका बेटा था?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    “या इसलिए कि आपको डर था कि अगर मैं मर गया तो आपका सौदा पूरा नहीं होगा?”

     

    आकृति का चेहरा बदल गया।

     

    अमित समझ गया।

     

    “आपने मुझे नहीं बचाया था।”

     

    उसने कहा—

     

    “आपने सिर्फ अपना वादा बचाया था।”

     

    आकृति चीखते हुए गायब हो गई।

     

    अब उसकी माँ की आकृति सामने थी।

     

    “अमित…”

     

    अमित ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “आप मेरी माँ नहीं हैं।”

     

    आकृति हँसी।

     

    “कैसे पता?”

     

    “क्योंकि मेरी माँ मुझे कभी पीछे मुड़कर देखने के लिए नहीं कहेंगी।”

     

    आकृति भी धुएँ में बदल गई।

     

    अब मंदिर के सामने सिर्फ अमित, नैना और बूढ़ी औरत खड़े थे।

     

    अमित ने बूढ़ी औरत की तरफ देखा।

     

    “अब सच बताइए।”

     

    बूढ़ी औरत ने सिर झुका लिया।

     

    “मैं भी तुम्हारे पिता के साथ इस सब में शामिल थी।”

     

    “आपने मुझे जंगल में क्यों बचाया?”

     

    “क्योंकि मुझे अपनी गलती सुधारनी थी।”

     

    “और आपने मुझे उस घर में क्यों भेजा?”

     

    “क्योंकि मुझे पता था कि अगर तुमने अपनी यादें वापस नहीं पाईं, तो वह कभी नहीं जाएगी।”

     

    अमित ने पूछा—

     

    “वह कौन है?”

     

    बूढ़ी औरत ने नैना की तरफ देखा।

     

    “जिसे तुमने अवनि समझा… वह कोई आत्मा नहीं है।”

     

    “तो?”

     

    “वह डर है।”

     

    अमित चुप रहा।

     

    “हर इंसान के अंदर एक डर होता है। लेकिन कुछ लोग अपने डर को इतना बड़ा बना देते हैं कि वह उनसे अलग होकर एक रूप ले लेता है।”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता ने अपने डर को आईने में कैद करने की कोशिश की। लेकिन वह डर तुम्हारे परिवार की यादों, अपराधबोध और मौत से जुड़ गया।”

     

    अमित ने नैना की तरफ देखा।

     

    “और नैना?”

     

    “नैना उसकी पहली शिकार थी।”

     

    नैना मुस्कुराई।

     

    “लेकिन मैं आखिरी नहीं थी।”

     

    अमित ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    नैना ने मंदिर के पीछे जंगल की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि उसने तुम्हारे डर से एक नया रूप बना लिया है।”

     

    “कौन सा?”

     

    नैना ने अमित की तरफ देखा।

     

    “तुम।”

     

    अमित की साँस रुक गई।

     

    उसे अचानक समझ आया।

     

    दूसरा अमित सिर्फ उसका प्रतिबिंब नहीं था।

     

    वह उसके अंदर मौजूद डर था।

     

    उसकी सारी बेचैनी।

     

    उसका अपराधबोध।

     

    नैना को बचा न पाने का दर्द।

     

    पिता से नफरत।

     

    माँ से नाराजगी।

     

    और सबसे बड़ा डर—

     

    अकेले रह जाने का।

     

    अमित ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “तो उसे खत्म कैसे करूँ?”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “उसे खत्म नहीं कर सकते।”

     

    “फिर?”

     

    “उसे स्वीकार करना होगा।”

     

    अमित ने पूछा—

     

    “कैसे?”

     

    “पीछे देखो।”

     

    नैना ने तुरंत कहा—

     

    “नहीं!”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “आज पहली बार पीछे देखना जरूरी है।”

     

    अमित चौंक गया।

     

    “लेकिन यही तो नियम था।”

     

    “नियम डर ने बनाया था।”

     

    अमित ने धीरे-धीरे अपनी आँखें बंद कीं।

     

    फिर उसने साँस ली।

     

    एक…

     

    दो…

     

    तीन…

     

    और वह पीछे मुड़ गया।

     

    उसके पीछे दूसरा अमित खड़ा था।

     

    लेकिन अब वह भयानक नहीं था।

     

    वह सिर्फ एक डरा हुआ बच्चा था।

     

    आठ साल का अमित।

     

    वही बच्चा जो उस रात कमरे के बाहर खड़ा अपनी बहन की चीख सुन रहा था।

     

    बच्चा रो रहा था।

     

    “मैंने उसे बचाया नहीं।”

     

    अमित की आँखों में आँसू आ गए।

     

    वह बच्चे के पास गया।

     

    “तुम बच्चे थे।”

     

    “लेकिन मैंने पीछे देखा था।”

     

    “तुम्हें सच नहीं पता था।”

     

    “मैं डर गया था।”

     

    “डरना गलत नहीं है।”

     

    बच्चे ने ऊपर देखा।

     

    “फिर नैना क्यों मर गई?”

     

    अमित घुटनों के बल बैठ गया।

     

    “क्योंकि बड़ों ने गलत फैसले लिए थे।”

     

    बच्चा रोता रहा।

     

    अमित ने उसे गले लगा लिया।

     

    “तुम्हारी गलती नहीं थी।”

     

    जैसे ही उसने यह कहा, बच्चे का शरीर धुएँ में बदलने लगा।

     

    दूर से एक भयानक चीख सुनाई दी।

     

    जंगल के पेड़ हिलने लगे।

     

    मंदिर की घंटी अपने आप बजने लगी।

     

    और काली परछाईं आसमान में उठने लगी।

     

    नैना ने कहा—

     

    “भैया, यह खत्म हो रही है।”

     

    अमित ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम भी?”

     

    नैना मुस्कुराई।

     

    “मुझे भी जाना होगा।”

     

    “नहीं।”

     

    “भैया, मैं बारह साल से इंतजार कर रही थी।”

     

    “मैं तुम्हें फिर नहीं खो सकता।”

     

    नैना ने उसके माथे पर हाथ रखा।

     

    “तुमने मुझे खोया नहीं था।”

     

    “फिर?”

     

    “मैं हमेशा तुम्हारी यादों में थी।”

     

    अमित रोने लगा।

     

    नैना धीरे-धीरे रोशनी में बदलने लगी।

     

    “अब पीछे मत देखना।”

     

    अमित ने कहा—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अब तुम्हें आगे जीना है।”

     

    नैना गायब हो गई।

     

    मंदिर के सामने अचानक तेज रोशनी फैल गई।

     

    काली परछाईं चीखती हुई आकाश में उठी और फिर हजारों छोटे-छोटे काले टुकड़ों में टूट गई।

     

    हवा शांत हो गई।

     

    पक्षियों की आवाज आने लगी।

     

    सूरज पूरी तरह निकल चुका था।

     

    बूढ़ी औरत ने लंबी साँस ली।

     

    “सब खत्म हो गया।”

     

    अमित ने पूछा—

     

    “क्या सच में?”

     

    बूढ़ी औरत मुस्कुराई।

     

    “हाँ।”

     

    फिर वह धीरे-धीरे धुंध में बदलने लगी।

     

    अमित चौंका।

     

    “आप भी?”

     

    उसने कहा—

     

    “मैंने भी उस रात पीछे देखा था।”

     

    “तो?”

     

    “अब मेरा इंतजार खत्म हुआ।”

     

    अमित कुछ कह पाता, उससे पहले वह गायब हो गई।

     

    मंदिर के सामने सिर्फ उसकी लालटेन बची।

     

    अमित ने उसे उठा लिया।

     

    कई घंटे बाद वह अपने घर पहुँचा।

     

    घर बिल्कुल शांत था।

     

    उसने दरवाजा खोला।

     

    अंदर उसकी माँ बैठी थीं।

     

    इस बार वह असली थीं।

     

    उन्होंने अमित को देखते ही गले लगा लिया।

     

    दोनों बहुत देर तक रोते रहे।

     

    उस दिन के बाद घर का बंद कमरा हमेशा के लिए खोल दिया गया।

     

    अंदर कोई आईना नहीं था।

     

    सिर्फ नैना की एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    अमित ने वह तस्वीर दीवार पर लगा दी।

     

    तस्वीर के नीचे उसने एक वाक्य लिखा—

     

    “कुछ दरवाजे डर से बंद होते हैं, लेकिन उन्हें खोलने की चाबी साहस होता है।”

     

    कई महीने बीत गए।

     

    अमित ने अपनी जिंदगी दोबारा शुरू कर दी।

     

    रात में अब उसे कोई आवाज नहीं बुलाती थी।

     

    कोई कदमों की आहट नहीं आती थी।

     

    कोई परछाईं उसके पीछे नहीं चलती थी।

     

    लेकिन एक रात…

     

    ठीक 15 अगस्त को…

     

    अमित अपने कमरे में सो रहा था।

     

    अचानक उसकी आँख खुल गई।

     

    कमरे में अंधेरा था।

     

    खिड़की से चाँद की हल्की रोशनी अंदर आ रही थी।

     

    अमित ने पानी पीने के लिए उठना चाहा।

     

    तभी उसे पीछे से बहुत धीमी आवाज सुनाई दी—

     

    “भैया…”

     

    अमित का शरीर जम गया।

     

    वह धीरे से पलटा।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    फर्श पर सिर्फ उसकी परछाईं थी।

     

    एक ही परछाईं।

     

    अमित ने राहत की साँस ली।

     

    तभी उसके मोबाइल की स्क्रीन अपने आप जल उठी।

     

    एक नया संदेश था।

     

    कोई नंबर नहीं।

     

    सिर्फ एक लाइन—

     

    “तुमने पीछे देखना सीख लिया… लेकिन क्या तुमने यह सीखा कि किस पर भरोसा करना है?”

     

    अमित ने स्क्रीन बंद कर दी।

     

    उसने खिड़की की तरफ देखा।

     

    और बाहर सड़क पर…

     

    एक छोटी बच्ची लाल फ्रॉक पहने खड़ी थी।

     

    वह मुस्कुरा रही थी।

     

    अमित ने आँखें बंद कर लीं।

     

    इस बार उसने पीछे नहीं देखा।

     

    क्योंकि उसे आखिरकार समझ आ गया था—

     

    डर हमेशा पीछे से नहीं आता।

     

    कभी-कभी वह हमारे साथ चलता है।

     

    और उसे हराने का एक ही तरीका है—

     

    उसकी तरफ देखना… और कहना—

     

    “अब मैं तुमसे नहीं डरता।”

     

    समाप्त।

  • पीछे देखना मना है..!!

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    अमित दरवाजे पर खड़ा था।

     

    उसके सामने सुबह की हल्की रोशनी फैल रही थी।

     

    लेकिन उसके पैरों के नीचे दो परछाइयाँ थीं।

     

    एक उसकी अपनी।

     

    और दूसरी…

     

    उसके ठीक पीछे खड़ी किसी चीज की।

     

    अमित ने धीरे-धीरे सिर घुमाने की कोशिश की।

     

    नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “भैया, मत देखना!”

     

    अमित रुक गया।

     

    “लेकिन पीछे कोई है।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “वह कौन है?”

     

    नैना ने काँपती आवाज में कहा—

     

    “वही, जिससे हम भाग रहे हैं।”

     

    अमित ने अपनी परछाईं की तरफ देखा।

     

    दोनों परछाइयाँ एक साथ हिल रही थीं।

     

    लेकिन दूसरी परछाईं की गर्दन उसकी तरफ नहीं, बल्कि दूसरी दिशा में मुड़ी हुई थी।

     

    जैसे वह किसी और को देख रही हो।

     

    अमित ने फुसफुसाकर पूछा—

     

    “नैना, क्या वह मेरे अंदर है?”

     

    नैना ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    “वह तुम्हारी परछाईं के अंदर है।”

     

    अमित ने अपनी मुट्ठी कस ली।

     

    “उसे बाहर कैसे निकालें?”

     

    नैना ने कहा—

     

    “सूरज निकलने से पहले।”

     

    अमित ने बाहर आसमान की तरफ देखा।

     

    पूर्व दिशा में हल्की लालिमा दिखाई देने लगी थी।

     

    सुबह होने में ज्यादा समय नहीं था।

     

    बूढ़ी औरत उनके पीछे खड़ी थी।

     

    उसके चेहरे पर चिंता थी।

     

    “अगर सूरज निकलने से पहले दूसरी परछाईं अलग नहीं हुई, तो वह हमेशा तुम्हारे साथ रहेगी।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “और अगर सूरज निकल गया?”

     

    “तो तुम दोनों एक हो जाओगे।”

     

    “और फिर?”

     

    “फिर वह तुम्हारी जिंदगी जीएगी।”

     

    अमित ने डरकर पूछा,

     

    “मेरी जगह?”

     

    “हाँ।”

     

    उसी समय पीछे से दरवाजा जोर से बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    नैना ने अमित का हाथ पकड़कर कहा—

     

    “हमें मंदिर जाना होगा।”

     

    “कौन सा मंदिर?”

     

    “वही जहाँ पापा गए थे।”

     

    बूढ़ी औरत ने सिर हिलाया।

     

    “वहाँ अभी भी वह चीज मौजूद है।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “वह पत्थर।”

     

    “कौन सा पत्थर?”

     

    “जिस पर पहली बार उसका नाम लिखा गया था।”

     

    तीनों घर से बाहर निकल पड़े।

     

    सड़क सुनसान थी।

     

    बारिश रुक चुकी थी।

     

    लेकिन जमीन अब भी गीली थी।

     

    अमित बाइक की तरफ बढ़ा।

     

    उसने देखा कि बाइक के पास फिर वही छोटे पैरों के निशान थे।

     

    नैना ने कहा—

     

    “उसने हमारा रास्ता पकड़ लिया है।”

     

    अमित ने बाइक स्टार्ट की।

     

    “बैठो।”

     

    नैना पीछे बैठ गई।

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “मैं रास्ता बताऊँगी।”

     

    अमित ने बाइक तेज कर दी।

     

    जंगल की ओर जाते हुए उसे बार-बार लगता रहा कि कोई उसके पीछे बैठा है।

     

    कभी उसके कंधे पर ठंडी साँस महसूस होती।

     

    कभी उसके कान के पास कोई फुसफुसाता।

     

    “अमित…”

     

    वह जवाब नहीं देता।

     

    कुछ देर बाद उसने देखा कि पीछे बैठे नैना के पैर जमीन को छू रहे थे।

     

    अमित ने चौंककर पूछा—

     

    “तुम्हारे पैर…”

     

    नैना ने कहा,

     

    “मत देखो।”

     

    अमित ने सामने देखा।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं पूरी तरह इस दुनिया में नहीं हूँ।”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “वह सही कह रही है।”

     

    अमित ने बाइक रोक दी।

     

    “हम कितनी दूर हैं?”

     

    “बस थोड़ा।”

     

    सामने जंगल के बीच एक पुराना मंदिर दिखाई दिया।

     

    मंदिर की दीवारें टूटी हुई थीं।

     

    दरवाजे पर कोई मूर्ति नहीं थी।

     

    बस एक बड़ा पत्थर रखा था।

     

    उस पत्थर पर पुराने अक्षरों में कुछ लिखा था।

     

    अमित उतरकर उसके पास गया।

     

    उसने हाथ से धूल हटाई।

     

    नीचे शब्द दिखाई दिए—

     

    “जो पीछे देखता है, वह अपना रास्ता खो देता है।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “यही है?”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    उसने पत्थर के पीछे जाने को कहा।

     

    वहाँ एक छोटा-सा कुआँ था।

     

    कुआँ पूरी तरह सूखा था।

     

    लेकिन उसके अंदर से पानी टपकने की आवाज आ रही थी।

     

    टप…

     

    टप…

     

    टप…

     

    अमित ने नीचे झाँका।

     

    अंदर बिल्कुल अंधेरा था।

     

    अचानक कुएँ के अंदर से किसी बच्चे की आवाज आई—

     

    “भैया…”

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    नैना ने कहा—

     

    “वह मुझे बुला रही है।”

     

    “कौन?”

     

    “मेरी दूसरी याद।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “दूसरी याद?”

     

    नैना ने कहा—

     

    “मेरी मौत की।”

     

    अमित ने रस्सी उठाई।

     

    “मैं नीचे जा रहा हूँ।”

     

    बूढ़ी औरत ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “अकेले मत जाना।”

     

    अमित ने कहा,

     

    “मैं जाऊँगा।”

     

    नैना बोली—

     

    “मैं भी।”

     

    तीनों कुएँ के अंदर उतरने लगे।

     

    कुछ ही देर में वे नीचे पहुँच गए।

     

    वहाँ एक छोटी सुरंग थी।

     

    सुरंग की दीवारों पर पुराने चित्र बने थे।

     

    एक चित्र में एक बच्ची आईने के सामने खड़ी थी।

     

    दूसरे में एक आदमी उसके पीछे खड़ा था।

     

    तीसरे चित्र में बच्ची गायब थी।

     

    और चौथे चित्र में एक लड़का आईने के सामने खड़ा था।

     

    अमित ने कहा,

     

    “यह मैं हूँ।”

     

    बूढ़ी औरत ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    आगे दीवार पर एक आखिरी चित्र था।

     

    उसमें दो बच्चे खड़े थे।

     

    लेकिन उनके पीछे सिर्फ एक परछाईं थी।

     

    नैना ने कहा—

     

    “यही रात थी।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “फिर क्या हुआ?”

     

    नैना ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पिता ने मुझे नहीं बचाया था।”

     

    “तो?”

     

    “उन्होंने तुम्हें बचाया था।”

     

    “और तुम?”

     

    “मुझे उन्होंने उसके हवाले कर दिया।”

     

    अमित की आँखें भर आईं।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उसने शर्त रखी थी।”

     

    “क्या शर्त?”

     

    नैना ने कहा—

     

    “उसे दो आत्माओं में से एक चुननी थी।”

     

    “और पापा ने…”

     

    “तुम्हें चुना।”

     

    अमित ने दीवार पर मुक्का मारा।

     

    “उन्होंने ऐसा कैसे किया?”

     

    नैना ने कहा—

     

    “क्योंकि तुम उनके बेटे थे।”

     

    अमित कुछ नहीं बोला।

     

    तभी सुरंग के अंत से भारी कदमों की आवाज आई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    बूढ़ी औरत ने लालटेन बुझा दी।

     

    “वह आ गई।”

     

    सामने अंधेरे में दो लाल आँखें दिखाई दीं।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “अमित…”

     

    अमित ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “मैं नहीं डरूँगा।”

     

    आवाज हँसी।

     

    “तुम्हारे पिता भी यही कहते थे।”

     

    अचानक अंधेरे में उसके पिता दिखाई दिए।

     

    वह घायल थे।

     

    चेहरे पर खून था।

     

    उन्होंने अमित की तरफ हाथ बढ़ाया।

     

    “बेटा… मुझे बचाओ।”

     

    अमित की आँखों में आँसू आ गए।

     

    नैना ने कहा—

     

    “वह पापा नहीं हैं।”

     

    अमित ने कहा,

     

    “मुझे पता है।”

     

    पिता की आकृति मुस्कुराई।

     

    “तो पीछे क्यों नहीं देखते?”

     

    अमित ने कहा—

     

    “क्योंकि अब मुझे पता है कि डर मुझे पीछे नहीं, आगे देखना सिखा रहा है।”

     

    उसने जेब से टूटे आईने का टुकड़ा निकाला।

     

    काली आकृति अचानक पीछे हट गई।

     

    बूढ़ी औरत चिल्लाई—

     

    “आईने को जमीन पर रखो!”

     

    अमित ने टुकड़ा जमीन पर रखा।

     

    नैना ने उसके सामने खड़े होकर अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    बूढ़ी औरत ने मंत्र पढ़ना शुरू किया।

     

    काली आकृति चीखने लगी।

     

    अमित की दूसरी परछाईं जमीन से अलग होने लगी।

     

    पहले पैरों से।

     

    फिर शरीर से।

     

    फिर सिर से।

     

    एक काली आकृति जमीन से उठकर सामने खड़ी हो गई।

     

    अब वह बिल्कुल स्पष्ट थी।

     

    उसका चेहरा नहीं था।

     

    लेकिन उसके अंदर अमित का चेहरा बन रहा था।

     

    वह बोली—

     

    “अगर मुझे छोड़ दिया, तो तुम अधूरे रहोगे।”

     

    अमित ने कहा—

     

    “मैं अधूरा रहना पसंद करूँगा।”

     

    “तुम मुझे हमेशा याद करोगे।”

     

    “तो करूँगा।”

     

    “तुम्हें डर लगेगा।”

     

    “तो लगेगा।”

     

    “तुम अकेले हो जाओगे।”

     

    अमित ने नैना की तरफ देखा।

     

    “नहीं।”

     

    नैना मुस्कुराई।

     

    अमित ने कहा—

     

    “मैं अकेला नहीं हूँ।”

     

    काली आकृति अचानक नैना की तरफ झपटी।

     

    अमित ने बीच में आकर उसे रोक लिया।

     

    उसका हाथ काली आकृति के अंदर चला गया।

     

    अमित को लगा जैसे उसका शरीर बर्फ बन गया हो।

     

    लेकिन उसने हाथ नहीं हटाया।

     

    “नैना!”

     

    नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    दोनों ने एक साथ आँखें बंद कर लीं।

     

    काली आकृति चीखने लगी।

     

    बाहर से पक्षियों के चहचहाने की आवाज आने लगी।

     

    सुबह होने वाली थी।

     

    बूढ़ी औरत चिल्लाई—

     

    “बस कुछ सेकंड और!”

     

    अमित ने पूरी ताकत से काली आकृति को आईने के टुकड़े की तरफ धकेला।

     

    आकृति उसमें खिंचने लगी।

     

    एक भयानक चीख के साथ वह आईने के अंदर बंद हो गई।

     

    उसी समय सूरज की पहली किरण कुएँ के अंदर पहुँची।

     

    आईना टूट गया।

     

    काली धुंध गायब हो गई।

     

    अमित जमीन पर गिर पड़ा।

     

    नैना भी उसके पास बैठ गई।

     

    कुछ देर तक दोनों चुप रहे।

     

    फिर अमित ने धीरे से पूछा—

     

    “क्या सब खत्म हो गया?”

     

    नैना ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हाँ।”

     

    बूढ़ी औरत ने कुछ नहीं कहा।

     

    अमित ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    बूढ़ी औरत के चेहरे पर डर था।

     

    उसने जमीन की तरफ इशारा किया।

     

    अमित ने नीचे देखा।

     

    उसकी अपनी परछाईं वहाँ थी।

     

    लेकिन नैना की नहीं।

     

    और फिर…

     

    कुएँ की दीवार पर एक नई परछाईं दिखाई दी।

     

    तीन सिर वाली।

     

    नैना ने धीरे से कहा—

     

    “भैया… हमने गलत चीज को बंद किया है।”

     

    अमित ने पूछा—

     

    “क्या मतलब?”

     

    नैना ने काँपते हुए कहा—

     

    “वह अकेली नहीं थी।”

     

    दूर जंगल में किसी ने धीरे से कहा—

     

    “पीछे देखो…”

     

    और इस बार आवाज बूढ़ी औरत की थी।

  • पीछे देखना मना है..!!

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    घर की सारी घड़ियाँ एक साथ बारह बजाने लगीं।

     

    टन…

     

    टन…

     

    टन…

     

    हर घंटी के साथ घर की दीवारें जैसे काँप रही थीं।

     

    अमित कमरे के बीचोंबीच खड़ा था।

     

    एक तरफ नैना थी।

     

    दूसरी तरफ उसका दूसरा रूप।

     

    और फर्श के नीचे से अब भी किसी चीज के खरोंचने की आवाज आ रही थी।

     

    खर्र…

     

    खर्र…

     

    खर्र…

     

    अमित ने नैना की तरफ देखा।

     

    “तुम चाहती हो कि मैं तुम्हें मार दूँ?”

     

    नैना ने आँसू पोंछे।

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मेरे अंदर जो है, वह अब पूरी तरह जाग चुकी है।”

     

    “अगर मैं तुम्हें मार दूँ तो वह भी मर जाएगी?”

     

    नैना ने सिर हिलाया।

     

    “शायद।”

     

    दूसरा अमित हँस पड़ा।

     

    “झूठ बोल रही है।”

     

    नैना ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम चुप रहो।”

     

    दूसरा अमित बोला,

     

    “तुम्हें पता है वह क्या चाहती है?”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारी आत्मा।”

     

    अमित ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मेरी?”

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम उसके लिए सिर्फ एक इंसान नहीं हो।”

     

    दूसरा अमित धीरे-धीरे अमित के करीब आया।

     

    “तुम उस रात बच गए थे। तुम्हारी आत्मा का आधा हिस्सा आईने में बंद कर दिया गया। और वही आधा हिस्सा मैं हूँ।”

     

    अमित ने कहा,

     

    “तो?”

     

    “तो अब तुम्हारी आत्मा अधूरी है।”

     

    “इससे क्या होगा?”

     

    दूसरे अमित ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अगर मैं तुम्हारे अंदर वापस आ गया, तो तुम पूरे हो जाओगे।”

     

    अमित ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “और फिर?”

     

    “फिर तुम और मैं एक हो जाएँगे।”

     

    “और अवनि?”

     

    दूसरा अमित कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “वह भी यही चाहती है।”

     

    अचानक घर के अंदर एक तेज हवा चली।

     

    सारी खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं।

     

    लालटेन की लौ बुझ गई।

     

    अंधेरे में नैना की आवाज आई—

     

    “भैया… भागो!”

     

    अमित ने उसकी आवाज की दिशा में हाथ बढ़ाया।

     

    लेकिन उसी समय किसी ने उसकी कलाई पकड़ ली।

     

    पकड़ बहुत ठंडी थी।

     

    अमित ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की।

     

    “कौन?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर उसके कान के पास फुसफुसाहट हुई—

     

    “पीछे मत देखना।”

     

    अमित जम गया।

     

    यह वही नियम था।

     

    वही शब्द।

     

    लेकिन इस बार आवाज उसकी अपनी थी।

     

    उसने धीरे-धीरे आँखें बंद कर लीं।

     

    “मैं पीछे नहीं देखूँगा।”

     

    फुसफुसाहट हँसी।

     

    “तुमने हमेशा यही कहा।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “तू कौन है?”

     

    “तुम्हारी पहली याद।”

     

    अचानक अमित के दिमाग में एक दृश्य चमका।

     

    वह बहुत छोटा था।

     

    शायद तीन साल का।

     

    उसकी माँ उसे गोद में लिए बैठी थीं।

     

    सामने नैना खड़ी थी।

     

    लेकिन नैना तब सिर्फ एक नवजात बच्ची थी।

     

    अमित की माँ ने उसे देखते हुए कहा था—

     

    “इसे किसी कीमत पर आईने के सामने मत ले जाना।”

     

    फिर दृश्य बदल गया।

     

    अमित के पिता एक पुराने मंदिर में बैठे थे।

     

    उनके सामने एक साधु था।

     

    साधु ने कहा—

     

    “आपकी बेटी साधारण बच्ची नहीं है।”

     

    पिता ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    “उसके जन्म के समय कुछ उसके साथ आया है।”

     

    “क्या?”

     

    साधु ने जवाब नहीं दिया।

     

    फिर उसने जमीन पर एक वृत्त बनाया।

     

    “इसे आईने में बाँधना होगा।”

     

    अमित की आँखें खुल गईं।

     

    “तो यह सब नैना के जन्म से शुरू हुआ था।”

     

    बूढ़ी औरत ने धीरे से कहा,

     

    “हाँ।”

     

    अमित ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आप उस साधु को जानती थीं?”

     

    बूढ़ी औरत ने सिर झुका लिया।

     

    “वह मेरा पति था।”

     

    अमित स्तब्ध रह गया।

     

    “क्या?”

     

    “मैंने तुम्हारे परिवार को यह सब शुरू करने में मदद की थी।”

     

    अमित की माँ ने कहा,

     

    “हमारे पास कोई रास्ता नहीं था।”

     

    अमित गुस्से में बोला,

     

    “हर कोई यही कहता है! कोई रास्ता नहीं था!”

     

    वह चीखा—

     

    “लेकिन किसी ने मुझसे नहीं पूछा!”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    अमित की माँ रोने लगीं।

     

    “तुम सही हो।”

     

    “नैना को क्यों चुना?”

     

    “क्योंकि वह सबसे कमजोर थी।”

     

    अमित ने माँ की तरफ देखा।

     

    “वह मेरी बहन थी!”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “फिर आपने उसे मरने दिया?”

     

    माँ ने सिर झुका लिया।

     

    “मैंने उसे बचाने की कोशिश की थी।”

     

    नैना की आवाज आई—

     

    “माँ झूठ नहीं बोल रही।”

     

    अमित ने उसकी तरफ देखा।

     

    नैना अब पहले से ज्यादा धुंधली दिखाई दे रही थी।

     

    “उन्होंने मुझे बचाने की कोशिश की थी।”

     

    “लेकिन?”

     

    “लेकिन पापा ने उन्हें रोक दिया।”

     

    अमित की मुट्ठियाँ कस गईं।

     

    “पापा ने ऐसा क्यों किया?”

     

    नैना ने कहा,

     

    “क्योंकि उन्हें लगता था कि अगर मैं उसके साथ रहूँगी, तो तुम बच जाओगे।”

     

    “और तुम?”

     

    “मैंने मान लिया।”

     

    “क्यों?”

     

    नैना मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि मैं बड़ी बहन थी।”

     

    अमित की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “लेकिन तुम तो मुझसे छोटी थीं।”

     

    नैना चुप हो गई।

     

    अमित ने उसकी तरफ देखा।

     

    फिर अचानक उसे एक बात समझ आई।

     

    “रुको…”

     

    “क्या?”

     

    “मैं तुमसे छोटा था।”

     

    नैना ने कुछ नहीं कहा।

     

    अमित ने माँ की तरफ देखा।

     

    “लेकिन मेरी यादों में नैना हमेशा मुझसे बड़ी थी।”

     

    माँ का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    अमित ने पूछा—

     

    “असल में नैना कौन थी?”

     

    कमरे में एक तेज चीख गूँजी।

     

    सारी दीवारें काँपने लगीं।

     

    और नैना का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    अब वह छोटी बच्ची नहीं थी।

     

    वह एक वयस्क महिला जैसी दिख रही थी।

     

    उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    वह बोली—

     

    “तुम्हें सच नहीं जानना चाहिए था।”

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    “तू नैना नहीं है।”

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “बहुत देर से समझे।”

     

    बूढ़ी औरत ने लालटेन जला दी।

     

    पीली रोशनी में सामने खड़ी आकृति साफ दिखाई देने लगी।

     

    उसके शरीर का आधा हिस्सा नैना जैसा था।

     

    दूसरा आधा काली परछाईं जैसा।

     

    बूढ़ी औरत ने मंत्र पढ़ना शुरू किया।

     

    आकृति पीछे हटने लगी।

     

    अमित ने पूछा,

     

    “इसे कैसे रोकें?”

     

    “तुम्हें अपना नाम बोलना होगा।”

     

    “मेरा नाम?”

     

    “हाँ।”

     

    “बस इतना?”

     

    “नहीं।”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “पहले अपना नाम।”

     

    फिर उसने अमित की माँ की तरफ देखा।

     

    “फिर अपनी बहन का।”

     

    फिर टूटे आईने की तरफ।

     

    “और अंत में उसका।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “उसका नाम अवनि है।”

     

    बूढ़ी औरत ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “तो?”

     

    “अवनि उसका झूठा नाम है।”

     

    अमित चौंक गया।

     

    “फिर असली नाम?”

     

    बूढ़ी औरत ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “मृत्यु।”

     

    कमरे की हवा अचानक भारी हो गई।

     

    अमित ने यह शब्द दोहराया—

     

    “मृत्यु?”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “उसका कोई इंसानी नाम नहीं है। तुम्हारे पिता ने उसे अवनि इसलिए कहा था क्योंकि असली नाम बोलते ही उसका दरवाजा खुल जाता है।”

     

    अचानक फर्श पर पड़ी दरार चौड़ी हो गई।

     

    उसमें से काली धुंध बाहर आने लगी।

     

    नैना की आकृति चीखने लगी।

     

    “भैया! अब!”

     

    अमित ने अपनी पूरी ताकत से कहा—

     

    “मैं अमित हूँ!”

     

    घर में एक तेज धमाका हुआ।

     

    दूसरा अमित पीछे हट गया।

     

    अमित ने फिर कहा—

     

    “मैं नैना का भाई हूँ!”

     

    नैना के चेहरे पर पहली बार शांति आई।

     

    काली धुंध पीछे हटने लगी।

     

    अमित ने आखिरी शब्द बोलने के लिए मुँह खोला।

     

    लेकिन तभी माँ ने उसका मुँह पकड़ लिया।

     

    “मत बोलो!”

     

    अमित ने हैरानी से उन्हें देखा।

     

    माँ चिल्लाईं—

     

    “अगर तुमने उसका असली नाम लिया, तो वह हमेशा के लिए तुम्हारे अंदर आ जाएगी!”

     

    अमित रुक गया।

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “नहीं! यही आखिरी परीक्षा है!”

     

    अमित दोनों की बातों के बीच फँस गया।

     

    काली धुंध अब उसकी तरफ बढ़ रही थी।

     

    नैना चीख रही थी—

     

    “भैया, भरोसा करो!”

     

    दूसरा अमित मुस्कुरा रहा था।

     

    “किसी पर भरोसा मत करना।”

     

    अमित ने आँखें बंद कर लीं।

     

    फिर उसने धीरे से कहा—

     

    “मुझे किसी पर भरोसा नहीं करना।”

     

    सब शांत हो गया।

     

    उसने आँखें खोलीं।

     

    “मुझे अपने ऊपर भरोसा करना है।”

     

    उसने फर्श पर पड़ा टूटा हुआ आईने का सबसे बड़ा टुकड़ा उठाया।

     

    और उसे अपने सामने कर लिया।

     

    आईने के टुकड़े में उसे अपना चेहरा दिखाई दिया।

     

    लेकिन इस बार प्रतिबिंब मुस्कुरा नहीं रहा था।

     

    वह रो रहा था।

     

    और उसके पीछे एक छोटी बच्ची खड़ी थी।

     

    नैना।

     

    उसने हाथ जोड़कर कहा—

     

    “भैया… मुझे घर जाना है।”

     

    अमित ने आईने को जमीन पर रख दिया।

     

    “तो चलो।”

     

    जैसे ही उसने नैना का हाथ पकड़ने की कोशिश की, काली धुंध ने उसे चारों तरफ से घेर लिया।

     

    एक भयानक आवाज आई—

     

    “तुमने नियम तोड़ा।”

     

    अमित ने पूछा—

     

    “कौन सा?”

     

    आवाज आई—

     

    “तुमने पीछे देखा।”

     

    अमित ने पीछे देखा।

     

    और इस बार…

     

    उसे कुछ भी दिखाई नहीं दिया।

     

    सिर्फ एक खुला दरवाजा।

     

    दरवाजे के बाहर सुबह की हल्की रोशनी थी।

     

    बूढ़ी औरत चीखी—

     

    “भागो!”

     

    अमित नैना का हाथ पकड़कर दरवाजे की ओर दौड़ा।

     

    लेकिन बाहर निकलने से ठीक पहले नैना रुक गई।

     

    “भैया…”

     

    “क्या हुआ?”

     

    उसने पीछे देखा।

     

    “मुझे लगता है…”

     

    वह काँपने लगी।

     

    “…वह तुम्हारे साथ बाहर आ गई है।”

     

    अमित ने उसकी तरफ देखा।

     

    “कौन?”

     

    नैना ने उसके पीछे इशारा किया।

     

    अमित धीरे-धीरे मुड़ा।

     

    और उसने देखा—

     

    उसकी अपनी परछाईं जमीन पर नहीं थी।

     

    वहाँ एक नहीं, दो परछाइयाँ थीं।

  • पीछे देखना मना है..!!

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    कमरे में अचानक अंधेरा छा गया।

     

    अमित कुछ सेकंड तक बिल्कुल स्थिर खड़ा रहा।

     

    उसके हाथ में लोहे की कुर्सी थी और सामने टूटे हुए आईने के टुकड़े फर्श पर बिखरे पड़े थे।

     

    लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि उसके पीछे कोई खड़ा था।

     

    वही चेहरा।

     

    वही शरीर।

     

    वही आवाज।

     

    दूसरा अमित।

     

    उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    उसने मुस्कुराते हुए कहा—

     

    “इतने सालों से तुम मुझे ढूँढ रहे थे।”

     

    अमित ने काँपते हुए पूछा,

     

    “तू मेरे अंदर था?”

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन कैसे?”

     

    दूसरा अमित धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    “जिस रात नैना उस कमरे में गई थी, उसी रात तुम्हारे पिता ने एक गलती की थी।”

     

    “क्या?”

     

    “उन्होंने तुम्हें बचाने के लिए तुम्हारी आत्मा का एक हिस्सा आईने में बंद कर दिया।”

     

    अमित का सिर घूमने लगा।

     

    “मेरी आत्मा का हिस्सा?”

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वह चीज तुम्हें पूरी तरह अपने साथ ले जाना चाहती थी।”

     

    दूसरा अमित हँसा।

     

    “तुम्हारे पिता ने सोचा कि अगर तुम्हारा आधा हिस्सा इस दुनिया में रहेगा और आधा हिस्सा आईने के पीछे, तो वह तुम्हें नहीं ले जा पाएगी।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “फिर तू कौन है?”

     

    “मैं वही हिस्सा हूँ जिसे तुम्हारे पिता ने बंद किया था।”

     

    अमित ने टूटे हुए आईने की तरफ देखा।

     

    “तो इतने सालों से मैं…”

     

    “अधूरा था।”

     

    अमित की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “नैना ने मुझे क्यों नहीं बताया?”

     

    दूसरा अमित कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “क्योंकि नैना जानती थी कि अगर तुम्हें सच पता चल गया, तो वह तुम्हें बचा नहीं पाएगी।”

     

    कमरे के दूसरे कोने से धीमी आवाज आई।

     

    “भैया…”

     

    अमित ने देखा।

     

    टूटे हुए आईने के बीच नैना खड़ी थी।

     

    उसका शरीर धुंधला था।

     

    “नैना?”

     

    उसने सिर उठाया।

     

    “हाँ।”

     

    अमित उसके पास जाना चाहता था।

     

    लेकिन दूसरा अमित उसके सामने आ गया।

     

    “उसे मत छूना।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अब वह आधी इस दुनिया में है और आधी दूसरी दुनिया में।”

     

    “मैं उसे वापस ला सकता हूँ?”

     

    दूसरा अमित मुस्कुराया।

     

    “शायद।”

     

    “कैसे?”

     

    “तुम्हें अपनी यादें पूरी करनी होंगी।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “और अगर मैंने कर लीं?”

     

    “तो तुम्हें पता चल जाएगा कि उस रात वास्तव में क्या हुआ था।”

     

    अचानक नीचे से उसकी माँ की चीख सुनाई दी।

     

    “अमित!”

     

    वह सीढ़ियों की तरफ दौड़ा।

     

    दूसरा अमित भी उसके पीछे आया।

     

    नीचे पहुँचकर अमित ने देखा कि उसकी माँ फर्श पर बैठी थीं।

     

    बूढ़ी औरत दरवाजे के पास खड़ी थी।

     

    घर की सभी खिड़कियाँ खुली थीं।

     

    बाहर तेज हवा चल रही थी।

     

    माँ ने अमित को देखते ही कहा—

     

    “बेटा, तुमने आईना तोड़ दिया?”

     

    “हाँ।”

     

    बूढ़ी औरत का चेहरा उतर गया।

     

    “तुमने बहुत बड़ी गलती कर दी।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि आईना सिर्फ दरवाजा था।”

     

    अमित ने घबराकर पूछा,

     

    “दरवाजा किसका?”

     

    बूढ़ी औरत ने घर की दीवार की तरफ देखा।

     

    “उस दुनिया का जहाँ वह रहती है।”

     

    “तो आईना तोड़ने से वह बंद हो जाएगी?”

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    “अब वह बिना आईने के भी आ सकती है।”

     

    अचानक घर की सारी लाइटें जल गईं।

     

    फिर बंद।

     

    फिर जल गईं।

     

    फिर बंद।

     

    हर बार रोशनी बुझने पर कमरे में किसी न किसी चीज की आकृति दिखाई देती।

     

    पहली बार—

     

    एक छोटी बच्ची।

     

    दूसरी बार—

     

    एक बूढ़ी औरत।

     

    तीसरी बार—

     

    अमित के पिता।

     

    चौथी बार—

     

    अमित खुद।

     

    पाँचवीं बार जब लाइट जली, तो कमरे में कोई नहीं था।

     

    सिर्फ फर्श पर गीले पैरों के निशान थे।

     

    वे निशान सीढ़ियों से नीचे आए।

     

    फिर अमित की माँ के पास जाकर रुक गए।

     

    माँ काँपने लगीं।

     

    “वह आ गई।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    माँ ने जवाब नहीं दिया।

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता ने उसका नाम ‘छाया’ रखा था।”

     

    अमित ने कहा,

     

    “आपने कहा था उसका नाम नहीं लेना चाहिए।”

     

    “वह उसका असली नाम नहीं है।”

     

    “तो असली नाम क्या है?”

     

    बूढ़ी औरत ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    अचानक माँ ने कहा—

     

    “मुझे पता है।”

     

    अमित ने उनकी तरफ देखा।

     

    “आपको?”

     

    माँ ने सिर हिलाया।

     

    “तुम्हारे पिता ने मरने से पहले मुझे उसका असली नाम बताया था।”

     

    “फिर आपने मुझे कभी क्यों नहीं बताया?”

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता ने कहा था कि अगर तुमने वह नाम सुन लिया, तो वह तुम्हारे पास आ जाएगी।”

     

    “अब तो वह आ ही चुकी है।”

     

    माँ चुप रहीं।

     

    “नाम बताइए।”

     

    माँ ने धीरे से कहा—

     

    “अवनि।”

     

    अमित ने जैसे ही यह नाम सुना, घर के अंदर तापमान अचानक गिर गया।

     

    उसकी साँस से धुआँ निकलने लगा।

     

    दीवारों पर लगी तस्वीरें अपने आप हिलने लगीं।

     

    फिर ऊपर से एक भयानक चीख आई।

     

    “माँ!”

     

    अमित ने ऊपर देखा।

     

    नैना सीढ़ियों के ऊपर खड़ी थी।

     

    उसका चेहरा डर से भरा था।

     

    “तुमने उसका नाम क्यों लिया?”

     

    माँ रोने लगीं।

     

    “मुझे नहीं पता था कि वह इतनी जल्दी सुन लेगी।”

     

    नैना ने चीखकर कहा—

     

    “वह अब सब सुन सकती है!”

     

    अचानक घर का दरवाजा जोर से बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    बूढ़ी औरत ने लालटेन उठाई।

     

    “सब लोग एक जगह रहो।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “क्या होगा अब?”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “जिसका नाम लिया गया है, वह अपना रास्ता खुद बना लेती है।”

     

    फर्श पर एक लंबी काली दरार दिखाई देने लगी।

     

    वह धीरे-धीरे फैलती हुई अमित के पैरों तक आ गई।

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    दरार के अंदर से ठंडी हवा निकल रही थी।

     

    फिर किसी ने नीचे से उसका पैर पकड़ लिया।

     

    अमित चीख पड़ा।

     

    माँ और बूढ़ी औरत ने उसे खींचकर पीछे किया।

     

    लेकिन काली दरार से एक हाथ बाहर आ चुका था।

     

    लंबी उंगलियाँ।

     

    काले नाखून।

     

    और हाथ पर एक लाल धागा बँधा हुआ था।

     

    अमित ने उस धागे को पहचान लिया।

     

    वही धागा उसकी बहन नैना बचपन में पहनती थी।

     

    “यह नैना का है।”

     

    नैना सीढ़ियों से नीचे दौड़ी।

     

    “भैया, इसे मत छूना!”

     

    लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

     

    अमित ने उस हाथ को छू लिया।

     

    अचानक उसके दिमाग में एक तेज आवाज गूँजी।

     

    और उसके सामने बारह साल पुरानी रात का दृश्य खुल गया।

     

    वह आठ साल का अमित था।

     

    नैना उसके सामने खड़ी थी।

     

    उसके पिता कमरे के दरवाजे पर थे।

     

    पिता कह रहे थे—

     

    “अमित, पीछे मत देखना।”

     

    लेकिन इस बार अमित ने देखा।

     

    नैना के पीछे एक काली परछाईं खड़ी थी।

     

    उसने नैना के कान में कुछ कहा।

     

    नैना ने अमित की तरफ देखा।

     

    फिर उसने उसे धक्का देकर कमरे से बाहर कर दिया।

     

    दरवाजा बंद हो गया।

     

    अंदर से उसकी चीख आई—

     

    “भैया, भागो!”

     

    फिर उसके पिता की आवाज—

     

    “नहीं!”

     

    फिर एक भयानक गर्जना।

     

    और फिर…

     

    सन्नाटा।

     

    अमित ने आँखें खोल दीं।

     

    वह फर्श पर पड़ा था।

     

    माँ उसके पास बैठी थीं।

     

    बूढ़ी औरत उसके माथे पर पानी डाल रही थी।

     

    नैना उसके सामने खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार वह रो रही थी।

     

    “भैया… तुम्हें सब याद आ गया?”

     

    अमित ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “तो अब तुम्हें यह भी याद होगा कि मैंने तुम्हें क्यों बचाया था।”

     

    अमित ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुमने मुझे बचाया नहीं था।”

     

    नैना चौंक गई।

     

    “क्या?”

     

    अमित की आवाज काँप रही थी।

     

    “तुमने उस रात मुझे बाहर भेजकर खुद को उसके हवाले कर दिया था।”

     

    नैना की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन एक बात तुमने मुझसे छिपाई।”

     

    नैना चुप रही।

     

    “तुम सिर्फ मेरी बहन नहीं थीं।”

     

    नैना का चेहरा बदल गया।

     

    अमित ने कहा—

     

    “तुम्हारे जन्म से पहले ही वह चीज तुम्हारे अंदर थी।”

     

    नैना ने सिर झुका लिया।

     

    बूढ़ी औरत ने धीरे से कहा—

     

    “अब सच्चाई सामने आ गई है।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “तो नैना कौन है?”

     

    नैना ने उसकी तरफ देखा।

     

    उसकी आवाज अब बहुत धीमी थी—

     

    “मैं तुम्हारी बहन हूँ…”

     

    फिर उसके पीछे एक काली परछाईं उभरी।

     

    “…लेकिन मेरे अंदर वह भी रहती है।”

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    नैना ने रोते हुए कहा—

     

    “भैया, अगर मुझे बचाना है तो तुम्हें मुझे मारना होगा।”

     

    अमित स्तब्ध रह गया।

     

    और तभी उसके पीछे से दूसरी आवाज आई—

     

    “लेकिन अगर तुमने नैना को मारा…”

     

    दूसरा अमित मुस्कुराया।

     

    “तो मैं हमेशा के लिए तुम्हारे शरीर में रह जाऊँगा।”

     

    घर की सारी घड़ियाँ एक साथ बारह बजाने लगीं।

     

    और अमावस्या की रात अभी शुरू ही हुई थी।

  • पीछे देखना मना है..!!

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    अमित ने मोबाइल अपनी जेब में रख लिया।

     

    सामने उसका पुराना घर खड़ा था।

     

    ऊपरी मंजिल की वही खिड़की अब पूरी तरह अंधेरी थी।

     

    उसकी माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “अमित, अकेले मत जाना।”

     

    अमित ने माँ की तरफ देखा।

     

    “मैसेज में साफ लिखा है कि मुझे अकेले जाना है।”

     

    बूढ़ी औरत ने तुरंत कहा,

     

    “वह नैना का संदेश नहीं है।”

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    “क्योंकि नैना तुम्हें अकेले नहीं बुलाएगी।”

     

    अमित चुप हो गया।

     

    “फिर कौन बुला रहा है?”

     

    बूढ़ी औरत ने अपनी लालटेन जमीन पर रख दी।

     

    “वही जो चाहता है कि तुम उसके सामने अपनी पहचान भूल जाओ।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “अगर मैं नहीं गया तो?”

     

    “तो वह खुद बाहर आएगा।”

     

    कुछ क्षणों तक तीनों खामोश रहे।

     

    फिर घर के अंदर से अचानक किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

     

    “भैया…”

     

    अमित का दिल काँप उठा।

     

    यह वही आवाज थी जिसे उसने बचपन की धुंधली यादों में सुना था।

     

    नैना की आवाज।

     

    उसने माँ की तरफ देखा।

     

    माँ ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “जाओ।”

     

    “माँ?”

     

    “अगर वह सच में नैना है… तो शायद आज उसे आजाद करने का यही मौका है।”

     

    अमित ने दरवाजा खोला।

     

    घर के अंदर अंधेरा था।

     

    वह धीरे-धीरे सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।

     

    हर कदम के साथ फर्श चरमराता।

     

    चर्र…

     

    चर्र…

     

    चर्र…

     

    अचानक पीछे से बूढ़ी औरत की आवाज आई—

     

    “अमित!”

     

    वह रुक गया।

     

    “क्या?”

     

    “कुछ भी हो जाए, अगर तुम्हें पीछे से अपनी माँ की आवाज सुनाई दे, तो मत मुड़ना।”

     

    अमित ने सिर हिलाया।

     

    “ठीक है।”

     

    वह सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।

     

    ऊपर पहुँचकर बंद कमरे का दरवाजा खुला हुआ था।

     

    अंदर से हल्की नीली रोशनी बाहर आ रही थी।

     

    अमित ने दरवाजे पर कदम रखा।

     

    कमरा पहले जैसा नहीं था।

     

    पुराना सामान गायब था।

     

    दीवारें साफ थीं।

     

    बीच में वही बड़ा आईना रखा था।

     

    और उसके सामने एक छोटी बच्ची बैठी थी।

     

    लाल फ्रॉक।

     

    दो चोटियाँ।

     

    पीठ अमित की तरफ।

     

    अमित धीरे से बोला,

     

    “नैना?”

     

    बच्ची ने सिर उठाया।

     

    “भैया…”

     

    अमित की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तुम सच में नैना हो?”

     

    बच्ची ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “तुम इतने साल कहाँ थीं?”

     

    “यहीं।”

     

    “मुझे क्यों नहीं बुलाया?”

     

    “मैं बुलाती रही।”

     

    “लेकिन मुझे कुछ याद नहीं था।”

     

    “उन्होंने तुम्हारी यादें छीन ली थीं।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “किसने?”

     

    बच्ची ने आईने की तरफ देखा।

     

    “उसने।”

     

    अमित ने आईने में देखा।

     

    इस बार उसमें कमरे का प्रतिबिंब नहीं था।

     

    बल्कि एक लंबा गलियारा दिखाई दे रहा था।

     

    गलियारे के अंत में एक आदमी खड़ा था।

     

    अमित ने आँखें सिकोड़कर देखा।

     

    वह उसके पिता थे।

     

    अमित के पिता की मृत्यु पाँच साल पहले हो चुकी थी।

     

    फिर भी वह आईने में बिल्कुल जीवित खड़े थे।

     

    अमित की साँस रुक गई।

     

    “पापा…”

     

    आईने में खड़े आदमी ने हाथ उठाया।

     

    “अमित…”

     

    अमित एक कदम आगे बढ़ा।

     

    नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मत जाना।”

     

    “लेकिन पापा—”

     

    “वह पापा नहीं हैं।”

     

    आईने के अंदर खड़ा आदमी मुस्कुराया।

     

    उसका चेहरा धीरे-धीरे बदलने लगा।

     

    पहले आँखें काली हुईं।

     

    फिर त्वचा झुर्रीदार हो गई।

     

    फिर उसका चेहरा बूढ़ी औरत जैसा हो गया।

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    नैना बोली,

     

    “अब समझे?”

     

    “यह कौन है?”

     

    नैना ने कहा,

     

    “वह जो हर किसी का चेहरा पहन सकती है।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “उसका नाम क्या है?”

     

    नैना ने चुप्पी साध ली।

     

    “तुम्हें पता है?”

     

    “हाँ।”

     

    “तो बताओ।”

     

    नैना ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर मैंने उसका नाम लिया तो वह मुझे फिर से पकड़ लेगी।”

     

    अमित कुछ समझ नहीं पाया।

     

    “लेकिन उसे रोकने के लिए उसका असली नाम जानना जरूरी है।”

     

    नैना ने धीरे से कहा,

     

    “तुम्हें उसका नाम पहले से पता है।”

     

    “मुझे?”

     

    “हाँ।”

     

    “कहाँ?”

     

    नैना ने आईने की तरफ इशारा किया।

     

    “तुम्हारी यादों में।”

     

    अमित ने आँखें बंद कर लीं।

     

    अचानक उसके दिमाग में तस्वीरें दौड़ने लगीं।

     

    एक पुराना मंदिर।

     

    एक कुआँ।

     

    उसके पिता किसी आदमी से बात कर रहे थे।

     

    फिर वही आदमी काले कपड़ों में एक किताब खोलता है।

     

    किताब के पन्ने पर एक नाम लिखा था।

     

    अमित उसे पढ़ने की कोशिश करता है।

     

    लेकिन शब्द धुंधले हो जाते हैं।

     

    उसने आँखें खोल दीं।

     

    “मुझे याद नहीं।”

     

    नैना बोली,

     

    “याद आएगा।”

     

    तभी कमरे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    अमित दौड़कर दरवाजे तक गया।

     

    कुंडी हिलाई।

     

    दरवाजा नहीं खुला।

     

    नैना ने कहा,

     

    “अब वह आ रही है।”

     

    “कौन?”

     

    “वही।”

     

    कमरे की दीवारों से फुसफुसाहट आने लगी।

     

    “अमित…”

     

    “अमित…”

     

    “अमित…”

     

    आवाजें अलग-अलग लोगों की थीं।

     

    उसकी माँ।

     

    उसके पिता।

     

    रवि।

     

    बूढ़ी औरत।

     

    और फिर…

     

    अमित की अपनी आवाज।

     

    “अमित, पीछे देखो।”

     

    अमित ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “मैं नहीं देखूँगा।”

     

    फुसफुसाहट तेज हो गई।

     

    “पीछे देखो।”

     

    “पीछे देखो।”

     

    “पीछे देखो।”

     

    अमित ने कान बंद कर लिए।

     

    नैना उसके सामने खड़ी थी।

     

    “भैया, मेरी तरफ देखो।”

     

    अमित ने आँखें खोलीं।

     

    नैना का चेहरा बदल रहा था।

     

    एक पल वह छोटी बच्ची थी।

     

    अगले पल वह उसकी माँ जैसी दिखने लगी।

     

    फिर उसके पिता जैसी।

     

    फिर बूढ़ी औरत जैसी।

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    “तुम नैना नहीं हो।”

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “बहुत देर से समझे।”

     

    अमित का काला धागा अचानक जलने लगा।

     

    उसने दर्द से हाथ पकड़ लिया।

     

    धागे से धुआँ निकल रहा था।

     

    आईने में काली परछाईं दिखाई दी।

     

    वह धीरे-धीरे आईने से बाहर आने लगी।

     

    पहले उसके हाथ निकले।

     

    फिर सिर।

     

    फिर पूरा शरीर।

     

    अमित ने देखा कि उसका चेहरा नहीं था।

     

    सिर्फ खाली काला स्थान।

     

    उसने धीमी आवाज में पूछा—

     

    “तुम मुझे क्यों चाहती हो?”

     

    परछाईं ने जवाब दिया—

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता ने वादा किया था।”

     

    “क्या वादा?”

     

    “तुम्हें मुझे देने का।”

     

    अमित के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “लेकिन मैं तो बच गया था।”

     

    “हाँ।”

     

    “कैसे?”

     

    परछाईं ने आईने की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारी बहन की वजह से।”

     

    अमित ने नैना की तरफ देखा।

     

    “नैना?”

     

    परछाईं हँसी।

     

    “वह तुम्हारी बहन नहीं थी।”

     

    अमित के चेहरे पर डर फैल गया।

     

    “झूठ।”

     

    “तो उससे पूछो।”

     

    अमित ने नैना की तरफ देखा।

     

    नैना की आँखों से काला तरल बहने लगा।

     

    “भैया… मुझे माफ कर दो।”

     

    “तुमने क्या किया?”

     

    “मैंने तुम्हें बचाने के लिए…”

     

    वह रुक गई।

     

    “…उससे एक समझौता किया था।”

     

    अमित ने काँपते हुए पूछा,

     

    “कैसा समझौता?”

     

    नैना ने सिर झुका लिया।

     

    “मैं उसकी दुनिया में रहूँगी।”

     

    “और बदले में?”

     

    “तुम्हें छोड़ दिया जाएगा।”

     

    अमित की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “तो तुम इतने साल से यहाँ हो?”

     

    “हाँ।”

     

    “और अब?”

     

    “अब मेरा समय खत्म हो गया है।”

     

    परछाईं आगे बढ़ी।

     

    “अब तुम्हारी बारी है।”

     

    अमित पीछे हटते-हटते आईने से जा टकराया।

     

    आईने की सतह पानी जैसी लहराने लगी।

     

    उसके अंदर से आवाज आई—

     

    “बस एक कदम।”

     

    “और तुम मेरे साथ।”

     

    अमित ने नैना की तरफ देखा।

     

    “मुझे क्या करना होगा?”

     

    नैना ने कहा,

     

    “आईने को तोड़ दो।”

     

    अमित ने पास पड़ी लोहे की कुर्सी उठा ली।

     

    परछाईं उसकी तरफ झपटी।

     

    अमित ने पूरी ताकत से कुर्सी आईने पर दे मारी।

     

    धड़ाम!

     

    आईना टूट गया।

     

    कमरे में तेज चीख गूँजी।

     

    ऐसी चीख कि पूरा घर काँप उठा।

     

    परछाईं पीछे हट गई।

     

    नैना चीखने लगी—

     

    “भैया! जल्दी!”

     

    अमित ने दूसरी बार कुर्सी उठाई।

     

    लेकिन तभी उसके पीछे से उसके पिता की आवाज आई—

     

    “अमित…”

     

    उसका हाथ रुक गया।

     

    आवाज बिल्कुल उसके पिता जैसी थी।

     

    “बेटा…”

     

    अमित की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “पापा?”

     

    नैना चीखी—

     

    “पीछे मत देखना!”

     

    लेकिन अमित ने धीरे-धीरे गर्दन घुमा दी।

     

    और जो उसने देखा…

     

    उसे देखकर उसकी पूरी दुनिया बदल गई।

     

    उसके पीछे उसके पिता नहीं थे।

     

    वहाँ अमित खुद खड़ा था।

     

    लेकिन इस बार उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब समझे?”

     

    फिर उसने फुसफुसाया—

     

    “जिसे तुम छह भागों से ढूँढ रहे हो… वह हमेशा से तुम्हारे अंदर था।”

     

    आईना पूरी तरह टूट गया।

     

    और कमरे की सारी रोशनियाँ एक साथ बुझ गईं।

  • पीछे देखना मना है..!!

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    अमित की माँ ने उसका हाथ इतनी मजबूती से पकड़ रखा था कि उसकी उंगलियाँ सुन्न होने लगी थीं।

     

    दोनों घर के बाहर खड़े थे।

     

    पीछे से अभी भी वही आवाज आ रही थी।

     

    “भैया…”

     

    अमित की आँखें बंद थीं।

     

    उसका दिल कह रहा था कि वह पीछे मुड़कर देखे।

     

    आखिर वह उसकी बहन थी।

     

    वही बहन, जिसकी यादें उसके दिमाग से मिटा दी गई थीं।

     

    लेकिन उसकी माँ लगातार फुसफुसा रही थीं—

     

    “पीछे मत देखना… चाहे कुछ भी हो जाए।”

     

    अचानक पीछे से हँसी की आवाज आई।

     

    “माँ… आप अभी भी झूठ बोल रही हो?”

     

    अमित की माँ काँप गईं।

     

    आवाज अब नैना जैसी नहीं थी।

     

    वह किसी बूढ़ी औरत जैसी भारी और डरावनी हो गई थी।

     

    फिर आवाज बदलकर अमित के पिता जैसी हो गई—

     

    “अमित, बेटा… पीछे देखो।”

     

    अमित ने दाँत भींच लिए।

     

    “यह मुझे क्यों बुला रहा है?”

     

    माँ ने कहा,

     

    “क्योंकि उसे तुम्हारी जरूरत है।”

     

    “किसलिए?”

     

    “अपनी दुनिया में वापस आने के लिए।”

     

    अमित ने पहली बार माँ की तरफ गौर से देखा।

     

    “माँ, मुझे सच बताइए। उस रात क्या हुआ था?”

     

    माँ चुप रहीं।

     

    “मैंने क्या किया था?”

     

    माँ की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तुमने कुछ नहीं किया था।”

     

    “तो फिर मेरी यादें क्यों मिटाई गईं?”

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता डर गए थे।”

     

    “किससे?”

     

    माँ ने पीछे घर की तरफ देखा।

     

    “नैना से नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    माँ ने बहुत धीमी आवाज में कहा—

     

    “उस चीज से जो नैना के पीछे आई थी।”

     

    अमित का शरीर ठंडा पड़ गया।

     

    “क्या चीज?”

     

    “हम उसे नाम नहीं देते।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि जिस चीज का नाम लिया जाता है, वह उसके पास पहुँच जाती है।”

     

    कुछ पल तक दोनों चुप रहे।

     

    अचानक घर की सारी खिड़कियाँ एक साथ खुल गईं।

     

    धड़ाम!

     

    अंदर से ठंडी हवा का झोंका बाहर आया।

     

    ऊपरी मंजिल की खिड़की में एक छोटी बच्ची खड़ी दिखाई दी।

     

    लाल फ्रॉक।

     

    दो चोटियाँ।

     

    चेहरा सफेद।

     

    वह अमित को देख रही थी।

     

    फिर उसने हाथ उठाया।

     

    और मुस्कुराई।

     

    अमित की माँ ने उसे तुरंत दूसरी दिशा में खींच लिया।

     

    “इधर मत देखो!”

     

    लेकिन अमित के कदम रुक गए।

     

    उसने पूछा,

     

    “माँ… क्या वह नैना है?”

     

    माँ ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “लेकिन उसका चेहरा—”

     

    “वह नैना का चेहरा पहनती है।”

     

    अमित ने घबराकर पूछा,

     

    “तो असली नैना कहाँ है?”

     

    माँ ने काँपती आवाज में कहा,

     

    “शायद अभी भी उसी कमरे में।”

     

    “आपने कहा था वह मर गई।”

     

    “उसका शरीर मर गया था।”

     

    अमित ने माँ की तरफ देखा।

     

    “लेकिन उसकी आत्मा?”

     

    माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसी समय सड़क के दूसरी तरफ से किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।

     

    छपाक…

     

    छपाक…

     

    छपाक…

     

    बारिश फिर शुरू हो चुकी थी।

     

    अमित ने सामने देखा।

     

    सड़क के बीच बूढ़ी औरत खड़ी थी।

     

    वही लालटेन।

     

    वही सफेद साड़ी।

     

    अमित ने राहत की साँस ली।

     

    “आप यहाँ कैसे?”

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी माँ की तरफ देखा।

     

    दोनों महिलाएँ एक-दूसरे को पहचानती थीं।

     

    अमित यह देखकर हैरान रह गया।

     

    “आप दोनों एक-दूसरे को जानती हैं?”

     

    माँ ने नजरें झुका लीं।

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “बहुत पहले से।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “आपने मुझे इस रास्ते पर भेजा था?”

     

    बूढ़ी औरत ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “तो फिर मैं वहाँ पहुँचा कैसे?”

     

    बूढ़ी औरत ने अमित की माँ की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि तुम्हारी माँ ने रास्ता खोला था।”

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    “माँ?”

     

    माँ रोने लगीं।

     

    “मेरे पास कोई और रास्ता नहीं था।”

     

    “आपने क्या किया?”

     

    माँ ने जवाब देने की कोशिश की, लेकिन आवाज नहीं निकली।

     

    बूढ़ी औरत बोली,

     

    “बारह साल पहले तुम्हारे पिता ने एक वादा किया था।”

     

    “किससे?”

     

    “उसी से जो तुम्हारे घर में है।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “कैसा वादा?”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “अगर वह तुम्हारे परिवार को छोड़ देगी, तो हर बार एक बच्चा उसके पास भेजा जाएगा।”

     

    अमित की साँस अटक गई।

     

    “एक बच्चा?”

     

    “हाँ।”

     

    “तो नैना?”

     

    “पहली थी।”

     

    अमित की आँखें फैल गईं।

     

    “और मैं?”

     

    बूढ़ी औरत चुप रही।

     

    अमित समझ गया।

     

    “दूसरा?”

     

    बूढ़ी औरत ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “लेकिन मैं तो बच गया।”

     

    “क्योंकि उस रात किसी ने नियम तोड़ दिया था।”

     

    “किसने?”

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी माँ की तरफ देखा।

     

    माँ फूट-फूटकर रोने लगीं।

     

    “मैंने।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “आपने क्या किया?”

     

    माँ ने कहा,

     

    “मैंने तुम्हें जंगल तक पहुँचने से पहले ही रोकने की कोशिश की थी। लेकिन तुम्हारे पिता ने मुझे कमरे में बंद कर दिया।”

     

    “फिर?”

     

    “नैना को उसने कमरे में भेज दिया।”

     

    अमित की आँखों के सामने धुंध छाने लगी।

     

    धीरे-धीरे उसे सब याद आने लगा।

     

    वह रात।

     

    बारिश।

     

    बिजली की चमक।

     

    नैना का रोना।

     

    उसके पिता का गुस्सा।

     

    और वह पुराना आईना।

     

    उसके पिता ने नैना से कहा था—

     

    “बस एक बार पीछे देखो।”

     

    नैना डरते हुए पीछे मुड़ी थी।

     

    आईने में उसके पीछे एक काली परछाईं खड़ी थी।

     

    अमित चीखना चाहता था।

     

    लेकिन उसकी आवाज नहीं निकल रही थी।

     

    फिर उसके पिता ने उसे खींचकर कमरे से बाहर कर दिया था।

     

    और दरवाजा बंद कर दिया था।

     

    अमित ने सिर पकड़ लिया।

     

    “मुझे सब याद आ रहा है…”

     

    माँ ने उसे गले लगा लिया।

     

    “बेटा…”

     

    अमित ने माँ को दूर कर दिया।

     

    “आपने मुझे क्यों नहीं बताया?”

     

    “मैं तुम्हें बचाना चाहती थी।”

     

    “मुझसे मेरी बहन छीनकर?”

     

    माँ रोती रहीं।

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “अब पछताने का समय नहीं है।”

     

    “क्या करना होगा?”

     

    “आज रात अमावस्या है।”

     

    अमित ने आसमान की तरफ देखा।

     

    बादलों के पीछे चाँद बिल्कुल दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    “इसका मतलब?”

     

    “आज वह पूरी तरह बाहर आ सकती है।”

     

    “और अगर हमने उसे रोक दिया?”

     

    “तो वह हमेशा के लिए तुम्हारे घर से चली जाएगी।”

     

    “कैसे रोकेंगे?”

     

    बूढ़ी औरत ने अपनी लालटेन उठाई।

     

    “तुम्हें उसी कमरे में वापस जाना होगा।”

     

    अमित ने तुरंत कहा,

     

    “नहीं।”

     

    बूढ़ी औरत बोली,

     

    “तुम्हें जाना ही होगा।”

     

    “वहाँ वह है।”

     

    “हाँ।”

     

    “और अगर उसने मुझे पकड़ लिया?”

     

    “तो तुम्हारी जगह वह ले लेगी।”

     

    अमित ने अपनी माँ की तरफ देखा।

     

    माँ ने सिर झुका लिया।

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “लेकिन तुम्हारे पास एक मौका है।”

     

    “क्या?”

     

    “उसे आईने के सामने अपना असली नाम बताना होगा।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “नैना का?”

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “उसका असली नाम।”

     

    “लेकिन आपने कहा था कि उसका नाम नहीं लेना चाहिए।”

     

    “तभी तो मुश्किल है।”

     

    अमित ने धीरे से पूछा,

     

    “आपको उसका नाम पता है?”

     

    बूढ़ी औरत ने जवाब नहीं दिया।

     

    वह सिर्फ घर की तरफ देखने लगी।

     

    ऊपर खिड़की में खड़ी बच्ची अब वहाँ नहीं थी।

     

    लेकिन जमीन पर लालटेन की रोशनी में छोटे-छोटे पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे।

     

    वे घर से निकलकर सड़क तक आ रहे थे।

     

    फिर अचानक रुक गए।

     

    बूढ़ी औरत ने उन निशानों को देखा और फुसफुसाई—

     

    “वह बाहर आ चुकी है।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    बूढ़ी औरत ने पहली बार डरते हुए कहा—

     

    “जिसे हमने बारह साल से नैना समझ रखा था।”

     

    तभी अमित के मोबाइल पर एक संदेश आया।

     

    नंबर अनजान था।

     

    संदेश में सिर्फ एक लाइन थी—

     

    “भैया, अगर सच में मुझे बचाना चाहते हो तो अकेले कमरे में वापस आओ।”

     

    अमित ने संदेश पढ़ा।

     

    उसने माँ और बूढ़ी औरत की तरफ देखा।

     

    फिर घर की ओर बढ़ गया।

     

    लेकिन उसे पता नहीं था कि कमरे के अंदर उसका इंतजार नैना नहीं…

     

    बल्कि कोई और कर रहा था।

     

    और इस बार—

     

    वह उसे पीछे मुड़ने पर मजबूर करने वाला था।

  • पीछे देखना मना है..!!

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    अमित कुछ सेकंड तक सीढ़ियों पर खड़े अपने ही चेहरे को देखता रहा।

     

    सामने खड़ा दूसरा अमित बिल्कुल उसकी तरह था।

     

    वही आँखें।

     

    वही बाल।

     

    वही कपड़े।

     

    यहाँ तक कि उसकी दाहिनी भौंह के ऊपर बचपन में लगी चोट का छोटा-सा निशान भी बिल्कुल वैसा ही था।

     

    अमित के गले से आवाज नहीं निकल रही थी।

     

    दूसरा अमित मुस्कुराया।

     

    “डर गए?”

     

    अमित ने खुद को संभालते हुए पूछा,

     

    “तू कौन है?”

     

    सामने वाला हँसा।

     

    “मैंने बताया ना… तुम्हारी जगह लेने आया हूँ।”

     

    “मेरी जगह?”

     

    “हाँ।”

     

    “कहाँ?”

     

    “हर जगह।”

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    उसी समय ऊपर बंद कमरे से बच्चे के रोने की आवाज फिर आई।

     

    “माँ…”

     

    अमित ने सीढ़ियों की तरफ देखा।

     

    “ऊपर कौन है?”

     

    दूसरे अमित ने जवाब नहीं दिया।

     

    वह सिर्फ मुस्कुराता रहा।

     

    अमित ने सीढ़ियों पर चढ़ने की कोशिश की।

     

    लेकिन जैसे ही उसने पहला कदम आगे बढ़ाया, दूसरे अमित ने उसका रास्ता रोक लिया।

     

    “ऊपर मत जाना।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वहाँ तुम्हारे सारे सवालों के जवाब हैं।”

     

    “तो मैं वहीं जाऊँगा।”

     

    “और अगर जवाब पसंद नहीं आया तो?”

     

    अमित ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “फिर भी जाऊँगा।”

     

    दूसरा अमित कुछ देर उसे देखता रहा।

     

    फिर अचानक एक तरफ हट गया।

     

    “जाओ।”

     

    अमित धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।

     

    हर कदम के साथ उसका दिल तेज धड़क रहा था।

     

    ऊपर पहुँचते ही उसने बंद कमरे को देखा।

     

    दरवाजे पर वही पुराना ताला लगा था।

     

    उसने जेब से बूढ़ी औरत की दी हुई चाबी निकाली।

     

    चाबी ताले में डालते ही—

     

    क्लिक!

     

    ताला खुल गया।

     

    नीचे खड़ा दूसरा अमित अचानक चिल्लाया—

     

    “मत खोलो!”

     

    अमित रुक गया।

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    दूसरा अमित अब मुस्कुरा नहीं रहा था।

     

    उसके चेहरे पर पहली बार डर दिखाई दे रहा था।

     

    “तू डर रहा है?” अमित ने पूछा।

     

    दूसरा अमित कुछ नहीं बोला।

     

    अमित ने दरवाजा खोल दिया।

     

    दरवाजा चरमराता हुआ अंदर की तरफ खुला।

     

    कमरे से बासी हवा का झोंका बाहर आया।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    अमित ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

     

    कमरे में पुराने सामान रखे थे।

     

    एक टूटी हुई अलमारी।

     

    कुछ पुराने खिलौने।

     

    एक लकड़ी की मेज।

     

    दीवार पर धूल से ढकी तस्वीरें।

     

    और कमरे के बीच में एक पुराना आईना।

     

    अमित धीरे-धीरे अंदर गया।

     

    आईने के सामने पहुँचते ही उसके कदम रुक गए।

     

    आईने में उसका प्रतिबिंब दिखाई दे रहा था।

     

    लेकिन कुछ अजीब था।

     

    वह प्रतिबिंब अमित की तरह खड़ा नहीं था।

     

    अमित सीधा खड़ा था।

     

    आईने वाला अमित थोड़ा झुका हुआ था।

     

    अमित ने अपना हाथ उठाया।

     

    आईने में हाथ उठ गया।

     

    लेकिन एक पल देर से।

     

    अमित का दिल जोर से धड़का।

     

    उसने दोबारा हाथ हिलाया।

     

    इस बार भी प्रतिबिंब एक पल बाद हिला।

     

    “यह क्या है?”

     

    पीछे से आवाज आई—

     

    “यही तुम्हारा असली घर है।”

     

    अमित ने पलटकर देखा।

     

    दूसरा अमित दरवाजे पर खड़ा था।

     

    “तू अंदर कैसे आया?”

     

    “यह कमरा मुझे भी पहचानता है।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “तुम दोनों का क्या संबंध है?”

     

    दूसरा अमित चुप रहा।

     

    तभी कमरे के एक कोने से किसी बच्चे के खिलखिलाने की आवाज आई।

     

    अमित ने टॉर्च उस तरफ घुमाई।

     

    वहाँ एक छोटी-सी लकड़ी की कुर्सी थी।

     

    कुर्सी पर एक पुरानी गुड़िया बैठी थी।

     

    उसकी आँखें काली थीं।

     

    अमित ने गुड़िया को देखा।

     

    अचानक गुड़िया की गर्दन धीरे-धीरे उसकी तरफ घूम गई।

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    दूसरा अमित बोला,

     

    “उसे मत छूना।”

     

    “यह क्या है?”

     

    “वह यहाँ बहुत पहले से है।”

     

    “कब से?”

     

    दूसरे अमित ने धीरे से कहा,

     

    “जब से तुम्हारी बहन मरी थी।”

     

    अमित का चेहरा बदल गया।

     

    “मेरी कोई बहन नहीं थी।”

     

    दूसरा अमित मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें यही बताया गया था।”

     

    अमित के दिमाग में जैसे कोई पुराना दरवाजा खुलने लगा।

     

    उसे बचपन की कुछ धुंधली यादें दिखाई देने लगीं।

     

    एक छोटी बच्ची।

     

    दो चोटियाँ।

     

    लाल फ्रॉक।

     

    वह उसे “दीदी” कहकर बुला रहा था।

     

    फिर एक कमरा।

     

    बहुत तेज बारिश।

     

    किसी के रोने की आवाज।

     

    और उसकी माँ चिल्ला रही थीं—

     

    “पीछे मत देखना!”

     

    अमित ने सिर पकड़ लिया।

     

    “ये यादें… मुझे क्यों नहीं याद थीं?”

     

    दूसरा अमित धीरे से बोला,

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता ने उन्हें मिटाने की कोशिश की थी।”

     

    “मेरे पिता?”

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    दूसरा अमित आईने की तरफ देखने लगा।

     

    “क्योंकि उस रात जो हुआ था, उसके बाद तुम बदल गए थे।”

     

    अमित ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैं?”

     

    “नहीं।”

     

    दूसरे अमित ने आईने की तरफ इशारा किया।

     

    “तुम्हारा वह हिस्सा।”

     

    अमित ने आईने में देखा।

     

    इस बार उसका प्रतिबिंब मुस्कुरा रहा था।

     

    लेकिन अमित नहीं मुस्कुरा रहा था।

     

    आईने वाला अमित धीरे-धीरे अपना मुँह खोलने लगा।

     

    उसके होंठ हिले—

     

    “भैया…”

     

    अमित के पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    वही आवाज।

     

    वही बच्ची की आवाज।

     

    “भैया… तुम मुझे छोड़कर क्यों चले गए?”

     

    अमित की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मुझे कुछ याद नहीं।”

     

    आईने में बच्ची का चेहरा दिखाई दिया।

     

    वह धीरे-धीरे बड़ी होने लगी।

     

    पहले पाँच साल की बच्ची।

     

    फिर दस साल की।

     

    फिर एक किशोरी।

     

    फिर अचानक उसका चेहरा काला पड़ गया।

     

    आँखें खाली हो गईं।

     

    और उसने कहा—

     

    “तुम्हें याद करना ही पड़ेगा।”

     

    कमरे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    अमित ने दौड़कर दरवाजा खोलने की कोशिश की।

     

    दरवाजा नहीं खुला।

     

    दूसरा अमित कमरे के कोने में खड़ा था।

     

    उसका चेहरा अब बदलने लगा था।

     

    त्वचा काली पड़ रही थी।

     

    आँखें लाल हो रही थीं।

     

    अमित चीखा—

     

    “तू इंसान नहीं है!”

     

    दूसरा अमित हँसने लगा।

     

    “अब समझे?”

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    तभी कमरे की दीवार पर लगी एक पुरानी तस्वीर नीचे गिर गई।

     

    काँच टूट गया।

     

    तस्वीर में चार लोग थे।

     

    अमित के पिता।

     

    उसकी माँ।

     

    एक छोटी बच्ची।

     

    और…

     

    अमित।

     

    लेकिन तस्वीर देखकर अमित की साँस रुक गई।

     

    तस्वीर में अमित की उम्र लगभग आठ साल थी।

     

    उसके पास खड़ी बच्ची के चेहरे पर लाल निशान था।

     

    और तस्वीर के पीछे किसी ने तारीख लिखी थी—

     

    15 अगस्त 2010

     

    अमित ने काँपते हुए कहा,

     

    “यह मेरी बहन है?”

     

    दूसरे अमित ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “उसका नाम क्या था?”

     

    “नैना।”

     

    अमित की आँखों से आँसू निकलने लगे।

     

    “नैना को क्या हुआ था?”

     

    कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।

     

    फिर आईने के अंदर से वही बच्ची बोली—

     

    “भैया ने मुझे पीछे देखने को कहा था।”

     

    अमित का दिल बैठ गया।

     

    “नहीं…”

     

    “भैया ने कहा था कि पीछे कोई नहीं है।”

     

    “नहीं!”

     

    “मैंने पीछे देखा।”

     

    अमित अपने कान बंद करने लगा।

     

    “बस करो!”

     

    आईने में नैना का चेहरा अचानक विकृत हो गया।

     

    “और फिर… उसने मुझे देख लिया।”

     

    अमित चीख पड़ा।

     

    उसी समय कमरे की लाइट अपने आप जल गई।

     

    दरवाजा खुल गया।

     

    नीचे से उसकी माँ की आवाज आई—

     

    “अमित!”

     

    अमित सीढ़ियों की तरफ भागा।

     

    नीचे उसकी माँ खड़ी थीं।

     

    उनके चेहरे पर आँसू थे।

     

    “बेटा… तुम यहाँ नहीं आना चाहिए था।”

     

    अमित दौड़कर उनके पास पहुँचा।

     

    “माँ, नैना कौन थी?”

     

    माँ का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    उन्होंने धीरे से कहा—

     

    “तुम्हारी बहन।”

     

    “फिर आपने मुझसे इतने साल झूठ क्यों बोला?”

     

    माँ रोने लगीं।

     

    “क्योंकि वह मरने के बाद भी घर से नहीं गई।”

     

    अमित ने काँपते हुए पूछा—

     

    “वह क्या चाहती है?”

     

    माँ ने पीछे देखा।

     

    ऊपर कमरे के दरवाजे पर दूसरा अमित खड़ा था।

     

    माँ ने उसे देखते ही अमित का हाथ पकड़ लिया।

     

    “भागो!”

     

    “क्यों?”

     

    माँ चिल्लाईं—

     

    “क्योंकि वह नैना नहीं है!”

     

    अमित ने ऊपर देखा।

     

    दूसरा अमित मुस्कुरा रहा था।

     

    और उसके पीछे आईने में एक छोटी बच्ची खड़ी थी।

     

    वह बच्ची धीरे-धीरे आईने से बाहर निकल रही थी।

     

    माँ ने अमित को खींचते हुए कहा—

     

    “अगर उसने तुम्हें छू लिया, तो तुम्हारी जगह वह ले लेगी।”

     

    अमित ने पूछा—

     

    “फिर असली नैना कहाँ है?”

     

    माँ ने काँपते हुए कहा—

     

    “वह तो उसी रात मर गई थी।”

     

    अमित ने पीछे देखा।

     

    ऊपर खड़ी परछाईं अब सीढ़ियों से उतर रही थी।

     

    लेकिन उसके कदमों की आवाज नहीं आ रही थी।

     

    वह धीरे-धीरे नीचे आ रही थी।

     

    और उसके पीछे…

     

    आईने से बाहर निकल चुकी छोटी बच्ची मुस्कुरा रही थी।

     

    अमित की माँ ने दरवाजा खोलते हुए कहा—

     

    “बाहर निकलो!”

     

    दोनों बाहर भागे।

     

    लेकिन जैसे ही अमित ने घर के बाहर कदम रखा, उसके पीछे से एक मासूम आवाज आई—

     

    “भैया…”

     

    अमित रुक गया।

     

    माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “पीछे मत देखना!”

     

    लेकिन तभी आवाज फिर आई—

     

    “भैया… अगर तुमने पीछे नहीं देखा… तो तुम्हें कैसे पता चलेगा कि मैं सच में नैना नहीं हूँ?”

     

    अमित की आँखें बंद हो गईं।

     

    उसके सामने अब सिर्फ एक सवाल था—

     

    क्या वह अपनी बहन की आवाज पर भरोसा करे… या बूढ़ी औरत की चेतावनी पर?

  • पीछे देखना मना है..!!

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    अमित के हाथ से मोबाइल लगभग गिर ही गया।

     

    उसकी माँ की आखिरी बात उसके कानों में बार-बार गूँज रही थी—

     

    “तुम्हारा कमरा अंदर से बंद है… और अंदर से तुम्हारी आवाज आ रही है।”

     

    कमरे में कुछ देर तक बिल्कुल सन्नाटा रहा।

     

    बाहर बारिश अब धीमी पड़ चुकी थी, लेकिन हवा अभी भी तेज चल रही थी। खिड़की के बाहर पेड़ों की शाखाएँ अंधेरे में हिल रही थीं।

     

    अमित ने बूढ़ी औरत की तरफ देखा।

     

    “मुझे घर जाना होगा।”

     

    बूढ़ी औरत ने सिर हिलाया।

     

    “अभी नहीं।”

     

    “मेरी माँ अकेली हैं।”

     

    “अगर तुम अभी घर गए, तो शायद तुम्हारी माँ तुम्हें पहचान भी न पाए।”

     

    अमित का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “आप कहना क्या चाहती हैं?”

     

    बूढ़ी औरत ने लालटेन उठाई और कमरे के दूसरे हिस्से में चली गई।

     

    “तुम्हारे घर में जो है, वह तुम्हारी आवाज में बोल सकता है। तुम्हारा चेहरा भी बना सकता है। लेकिन एक चीज नहीं बना सकता।”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारी परछाईं।”

     

    अमित कुछ समझ नहीं पाया।

     

    “मतलब?”

     

    “वह इंसान की तरह दिख सकता है, इंसान की तरह बोल सकता है, लेकिन उसकी परछाईं नहीं होती।”

     

    अमित ने तुरंत अपनी तरफ देखा।

     

    लालटेन की रोशनी में उसकी परछाईं फर्श पर साफ दिखाई दे रही थी।

     

    उसने राहत की साँस ली।

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “इसका मतलब तुम अभी वही हो जो तुम समझ रहे हो।”

     

    “और मेरे घर में?”

     

    “वहाँ जाकर देखना होगा।”

     

    “लेकिन कैसे?”

     

    बूढ़ी औरत ने कमरे के कोने से एक पुराना कपड़ा उठाया। उसके नीचे एक लकड़ी का संदूक रखा था।

     

    उसने संदूक खोला।

     

    अंदर पुराने कागज, एक लोहे की चाबी और कुछ काले धागे रखे थे।

     

    उसने चाबी अमित की हथेली पर रख दी।

     

    “यह किसकी है?”

     

    “तुम्हारे घर की।”

     

    अमित चौंक गया।

     

    “आपके पास मेरे घर की चाबी कैसे?”

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी तरफ देखा।

     

    “यह तुम्हारे घर की मुख्य चाबी नहीं है। यह उस कमरे की चाबी है जिसे तुम्हारे परिवार ने वर्षों से बंद रखा है।”

     

    अमित का दिल तेज धड़कने लगा।

     

    “मेरे घर में ऐसा कोई कमरा नहीं है।”

     

    बूढ़ी औरत हल्का सा मुस्कुराई।

     

    “हर घर में कुछ कमरे ऐसे होते हैं जिनके बारे में घर वाले भूल जाना चाहते हैं।”

     

    अमित को अचानक अपने बचपन की एक बात याद आई।

     

    जब वह छोटा था, घर की ऊपरी मंजिल पर एक कमरा हमेशा बंद रहता था।

     

    उसकी माँ उसे कभी वहाँ जाने नहीं देती थीं।

     

    जब भी अमित पूछता, माँ कहतीं—

     

    “वहाँ पुराना सामान रखा है।”

     

    एक बार उसने उस कमरे का दरवाजा खोलने की कोशिश की थी।

     

    उसी रात उसके पिता ने उसे बहुत डाँटा था।

     

    अगले दिन उस कमरे पर नया ताला लगा दिया गया था।

     

    अमित ने धीरे से पूछा,

     

    “उस कमरे में क्या है?”

     

    बूढ़ी औरत ने जवाब दिया,

     

    “वही, जिसकी वजह से वह तुम्हारे घर तक पहुँच चुका है।”

     

    अमित ने चाबी मुट्ठी में कस ली।

     

    “मुझे वापस जाना होगा।”

     

    “हाँ।”

     

    “आप मेरे साथ चलेंगी?”

     

    बूढ़ी औरत ने सिर हिला दिया।

     

    “मैं इस घर से बाहर नहीं जा सकती।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि बहुत साल पहले मैंने भी पीछे मुड़कर देखा था।”

     

    अमित चुप हो गया।

     

    बूढ़ी औरत ने दरवाजा खोला।

     

    बारिश लगभग रुक चुकी थी।

     

    बाहर उसकी बाइक खड़ी थी।

     

    लेकिन अमित ने जैसे ही बाइक की तरफ देखा, उसके शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    बाइक के पीछे की सीट पर गीले पैरों के निशान थे।

     

    एक नहीं।

     

    दो नहीं।

     

    बल्कि छोटे-छोटे पैरों के निशान।

     

    जैसे कोई बच्चा बारिश में भीगकर बाइक पर बैठा हो।

     

    अमित ने पीछे हटते हुए पूछा,

     

    “ये किसके निशान हैं?”

     

    बूढ़ी औरत ने उन्हें देखा और तुरंत नजरें झुका लीं।

     

    “उसे मत देखो।”

     

    “लेकिन—”

     

    “बाइक पर बैठो।”

     

    अमित बाइक पर बैठ गया।

     

    बूढ़ी औरत उसके पास आई और उसकी कलाई पर काला धागा बाँध दिया।

     

    “जब तक सूरज नहीं निकलता, इसे मत उतारना।”

     

    “और अगर यह टूट गया?”

     

    बूढ़ी औरत ने गंभीर आवाज में कहा,

     

    “तो किसी भी आवाज का जवाब मत देना।”

     

    अमित ने बाइक स्टार्ट की।

     

    इस बार इंजन पहली कोशिश में चालू हो गया।

     

    वह सड़क पर निकल पड़ा।

     

    कुछ दूर जाने के बाद उसने पीछे से वही आवाज सुनी—

     

    “अमित…”

     

    उसने आँखें बंद करके एक पल के लिए साँस रोकी।

     

    फिर बाइक और तेज कर दी।

     

    आवाज फिर आई।

     

    इस बार वह उसकी माँ की आवाज थी।

     

    “बेटा… रुक जाओ।”

     

    अमित की आँखों में आँसू आ गए।

     

    वह जानता था कि उसकी माँ घर पर थीं।

     

    फिर भी दिल बार-बार कह रहा था कि शायद सच में माँ उसे पुकार रही हैं।

     

    “बेटा… मुझे छोड़कर मत जाओ।”

     

    अमित का हाथ ब्रेक की तरफ बढ़ा।

     

    तभी उसकी नजर कलाई पर बँधे काले धागे पर पड़ी।

     

    उसे बूढ़ी औरत की बात याद आई।

     

    “किसी भी आवाज का जवाब मत देना।”

     

    उसने ब्रेक नहीं लगाया।

     

    कुछ मिनट बाद जंगल खत्म हो गया।

     

    सड़क पर स्ट्रीट लाइट दिखाई देने लगीं।

     

    अमित को लगा कि वह बच गया।

     

    लेकिन तभी उसकी बाइक अपने आप धीमी होने लगी।

     

    उसने एक्सीलेटर दबाया।

     

    बाइक नहीं बढ़ी।

     

    अचानक इंजन बंद हो गया।

     

    सामने उसका घर था।

     

    अमित ने घर की तरफ देखा।

     

    ऊपरी मंजिल की खिड़की में रोशनी जल रही थी।

     

    उसका वही कमरा।

     

    वह कमरा जो सालों से बंद था।

     

    अमित बाइक से उतरा।

     

    घर के बाहर उसकी माँ की चप्पलें पड़ी थीं।

     

    दरवाजा खुला हुआ था।

     

    “माँ?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    अमित अंदर गया।

     

    घर में अजीब शांति थी।

     

    टेबल पर एक गिलास पानी रखा था।

     

    टीवी चल रहा था, लेकिन स्क्रीन पर सिर्फ काली-सफेद झिलमिलाहट थी।

     

    “माँ?”

     

    इस बार ऊपर से आवाज आई—

     

    “अमित… मैं ऊपर हूँ।”

     

    यह उसकी माँ की आवाज थी।

     

    अमित सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।

     

    पहली सीढ़ी पर कदम रखते ही उसके मोबाइल में एक संदेश आया।

     

    उसने स्क्रीन देखी।

     

    संदेश उसकी माँ के नंबर से था।

     

    “अमित, घर मत आना।”

     

    अमित जम गया।

     

    उसने तुरंत ऊपर देखा।

     

    “माँ?”

     

    ऊपर से कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर वही आवाज आई—

     

    “अमित… जल्दी ऊपर आओ।”

     

    अमित के माथे पर पसीना आ गया।

     

    उसने फोन मिलाया।

     

    माँ का नंबर व्यस्त था।

     

    उसी समय नीचे मुख्य दरवाजा धीरे-धीरे बंद होने लगा।

     

    चर्ररर…

     

    अमित ने पीछे देखा।

     

    दरवाजा पूरी तरह बंद हो चुका था।

     

    वह दौड़कर दरवाजे तक गया और हैंडल घुमाया।

     

    दरवाजा नहीं खुला।

     

    तभी ऊपर से किसी के धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरने की आवाज आने लगी।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    अमित ने सीढ़ियों की तरफ देखा।

     

    ऊपर अंधेरे में कोई खड़ा था।

     

    पहले सिर्फ पैर दिखाई दिए।

     

    फिर शरीर।

     

    फिर चेहरा।

     

    वह चेहरा देखकर अमित की साँस रुक गई।

     

    वह खुद था।

     

    सीढ़ियों पर खड़ा दूसरा अमित धीरे-धीरे मुस्कुरा रहा था।

     

    उसने वही कपड़े पहन रखे थे।

     

    वही चेहरा।

     

    वही आवाज।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम बहुत देर से आए।”

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    “तू कौन है?”

     

    दूसरा अमित सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा।

     

    “मैं?”

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “मैं वही हूँ, जो आज रात तुम्हारी जगह घर जाएगा।”

     

    अमित ने अपनी कलाई की तरफ देखा।

     

    काला धागा अभी भी बँधा था।

     

    दूसरे अमित ने भी अपनी कलाई दिखाई।

     

    उस पर भी वही काला धागा था।

     

    अमित के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    फिर दूसरा अमित धीरे से बोला—

     

    “तुम्हें लगता है बूढ़ी औरत ने तुम्हें बचाने के लिए वह धागा दिया था?”

     

    वह एक कदम और नीचे आया।

     

    “नहीं अमित… उसने तुम्हें पहचानने के लिए दिया था।”

     

    अमित कुछ बोल नहीं पाया।

     

    दूसरे अमित ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “क्योंकि असली सवाल यह नहीं है कि मैं कौन हूँ।”

     

    वह बिल्कुल उसके सामने आ गया।

     

    “असली सवाल यह है कि हम दोनों में से… असली अमित कौन है?”

     

    उसी क्षण ऊपर वाले बंद कमरे से किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

     

    और कमरे के अंदर से एक धीमी आवाज सुनाई दी—

     

    “माँ… उसने फिर से पीछे देख लिया।”

     

    अमित ने डरकर ऊपर देखा।

     

    और पहली बार उसे महसूस हुआ कि इस घर का रहस्य जंगल से भी ज्यादा पुराना है।

  • पीछे देखना मना है..!!

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    अमित कुछ पल तक उस बूढ़ी औरत को देखता रहा।

     

    उसके चेहरे पर ऐसा डर था, जैसा अमित ने पहले कभी किसी इंसान के चेहरे पर नहीं देखा था।

     

    दरवाजा बंद हो चुका था।

     

    बाहर बारिश अब पहले से भी तेज हो गई थी।

     

    टप-टप की आवाज अब लगातार पड़ती बूंदों की तेज आवाज में बदल चुकी थी। मकान के चारों तरफ अंधेरा था। सिर्फ बूढ़ी औरत के हाथ में पकड़ी लालटेन की पीली रोशनी कमरे के एक छोटे से हिस्से को रोशन कर रही थी।

     

    अमित ने घबराकर पूछा,

     

    “आपने कहा था कि मैं जिसे रास्ते में छोड़कर आया हूँ, वह वापस आ गया है। आखिर कौन है वो?”

     

    बूढ़ी औरत ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    वह धीरे-धीरे कमरे के कोने में गई और एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर बैठ गई।

     

    “बैठ जाओ,” उसने कहा।

     

    अमित बैठने ही वाला था कि बाहर से दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई।

     

    ठक…

     

    अमित वहीं रुक गया।

     

    बूढ़ी औरत की आँखें दरवाजे पर टिक गईं।

     

    फिर दूसरी दस्तक हुई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    अमित ने धीरे से पूछा,

     

    “कौन है?”

     

    बूढ़ी औरत ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “चुप!”

     

    उसकी उंगलियाँ ठंडी थीं।

     

    “कोई आवाज मत करना।”

     

    अमित ने हैरानी से उसे देखा।

     

    कुछ सेकंड तक बाहर बिल्कुल शांति रही।

     

    फिर दरवाजे के दूसरी तरफ से आवाज आई—

     

    “अमित…”

     

    अमित का दिल जैसे सीने से बाहर निकलने लगा।

     

    वह आवाज उसी की थी।

     

    बिल्कुल उसकी अपनी आवाज।

     

    “दरवाजा खोलो… मैं बाहर हूँ।”

     

    अमित के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    उसने बूढ़ी औरत की तरफ देखा।

     

    वह आँखें बंद करके कुछ बुदबुदा रही थी।

     

    “यह तुम्हारी आवाज में क्यों बोल रहा है?” अमित ने फुसफुसाकर पूछा।

     

    बूढ़ी औरत ने आँखें खोलीं।

     

    “क्योंकि अब यह तुम्हें पहचान चुका है।”

     

    “कौन है यह?”

     

    “जिसे तुम जानना चाहते हो, उसके बारे में पूछना बंद करो।”

     

    बाहर से फिर आवाज आई।

     

    “अमित… दरवाजा खोलो।”

     

    इस बार आवाज बिल्कुल सामान्य थी।

     

    ऐसी जैसे कोई परेशान होकर अपने दोस्त को बुला रहा हो।

     

    अमित के दिमाग में अचानक रवि का चेहरा घूम गया।

     

    “रवि!”

     

    उसने कहा,

     

    “शायद मेरा दोस्त मुझे ढूँढते हुए यहाँ आया है।”

     

    बूढ़ी औरत ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया।

     

    “तुम्हारा दोस्त यहाँ नहीं है।”

     

    “लेकिन आवाज—”

     

    “वह आवाज तुम्हारे दोस्त की भी हो सकती है।”

     

    अमित चुप हो गया।

     

    बाहर अचानक किसी ने दरवाजे को खरोंचना शुरू कर दिया।

     

    खर्र…

     

    खर्र…

     

    खर्र…

     

    ऐसा लग रहा था जैसे कोई अपने लंबे नाखून लकड़ी पर घिस रहा हो।

     

    अमित ने डरकर पीछे कदम किया।

     

    “मैं यहाँ से जाना चाहता हूँ।”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “अभी नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर तुमने इस समय दरवाजा खोला, तो तुम अकेले नहीं जाओगे।”

     

    अमित कुछ समझ नहीं पाया।

     

    “क्या मतलब?”

     

    बूढ़ी औरत ने सामने दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    वहाँ कई पुराने कागज टंगे हुए थे।

     

    हर कागज पर किसी इंसान का नाम लिखा था।

     

    अमित धीरे-धीरे उनके पास गया।

     

    पहला नाम था—

     

    रमेश — 1998

     

    दूसरा—

     

    सुरेश — 2003

     

    तीसरा—

     

    नरेश — 2007

     

    फिर कई नाम।

     

    कुछ नामों के आगे तारीखें थीं।

     

    लेकिन आखिरी कागज देखकर अमित की साँस रुक गई।

     

    उस पर लिखा था—

     

    अमित — 15 अगस्त 2026

     

    उसने पीछे मुड़कर बूढ़ी औरत को देखा।

     

    “यह क्या है?”

     

    बूढ़ी औरत ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    “यह मेरा नाम है।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “और आज की तारीख भी।”

     

    “मुझे यह भी पता है।”

     

    अमित की आवाज काँपने लगी।

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    बूढ़ी औरत धीरे-धीरे उठी।

     

    “क्योंकि तुम पहले नहीं हो।”

     

    “क्या?”

     

    “हर कुछ साल में कोई न कोई उस रास्ते से गुजरता है।”

     

    वह दीवार पर लगे पुराने कागजों की तरफ देखने लगी।

     

    “उसे पीछे से कोई पुकारता है। वह आवाज सुनता है। अगर वह पीछे मुड़कर देख ले… तो फिर वह कभी अपने घर नहीं पहुँचता।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “और अगर पीछे न देखे?”

     

    बूढ़ी औरत कुछ देर चुप रही।

     

    फिर बोली,

     

    “तो वह मेरे घर तक पहुँच जाता है।”

     

    “फिर?”

     

    “फिर सुबह होने तक उसे यहाँ रहना पड़ता है।”

     

    “और उसके बाद?”

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “उसके बाद फैसला होता है कि वह वापस जाएगा या नहीं।”

     

    अमित को लगा जैसे उसका सिर घूम रहा है।

     

    “किसका फैसला?”

     

    बूढ़ी औरत ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसी समय ऊपर की मंजिल से किसी चीज के गिरने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    अमित उछल पड़ा।

     

    “ऊपर कौन है?”

     

    बूढ़ी औरत ने तुरंत कहा,

     

    “कोई नहीं।”

     

    “लेकिन आवाज तो—”

     

    “ऊपर मत जाना।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वहाँ जो रहता है, वह इंसान नहीं है।”

     

    अमित की नजर सीढ़ियों पर गई।

     

    लकड़ी की पुरानी सीढ़ियाँ अंधेरे में गायब हो रही थीं।

     

    उसे ऐसा लगा जैसे ऊपर कोई खड़ा उसे देख रहा है।

     

    “मुझे कोई दिखाई दे रहा है,” अमित ने कहा।

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या?”

     

    “सीढ़ियों के ऊपर…”

     

    वह धीरे-धीरे ऊपर देखने लगी।

     

    अचानक उसका चेहरा बदल गया।

     

    “नीचे आओ!”

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    ऊपर सीढ़ियों के अंतिम पायदान पर एक काली परछाईं खड़ी थी।

     

    वह बिल्कुल स्थिर थी।

     

    चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    लेकिन उसकी दो सफेद आँखें साफ दिखाई दे रही थीं।

     

    अमित की साँस अटक गई।

     

    परछाईं ने धीरे-धीरे सिर झुकाया।

     

    फिर उसी आवाज में बोली—

     

    “अमित…”

     

    अमित ने कान बंद कर लिए।

     

    बूढ़ी औरत ने लालटेन उठाई और तेज आवाज में कुछ मंत्र जैसा बोलना शुरू कर दिया।

     

    परछाईं अचानक गायब हो गई।

     

    कुछ सेकंड बाद ऊपर से किसी के भागने की आवाज आई।

     

    धड़…

     

    धड़…

     

    धड़…

     

    फिर सब शांत हो गया।

     

    अमित ने काँपते हुए पूछा,

     

    “वह क्या था?”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “तुम्हारा पीछा करने वाला।”

     

    “लेकिन वह ऊपर कैसे पहुँच गया?”

     

    “वह जहाँ चाहे पहुँच सकता है।”

     

    अमित की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मैंने उसका क्या बिगाड़ा है?”

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी तरफ देखा।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “फिर वह मेरे पीछे क्यों पड़ा है?”

     

    बूढ़ी औरत कुछ देर चुप रही।

     

    फिर उसने दीवार पर लगे अमित के नाम वाले कागज को उतार लिया।

     

    कागज के पीछे कुछ लिखा था।

     

    उसने अमित को वह कागज दिया।

     

    पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “जिसने तुम्हें रास्ते पर पुकारा, वह तुम्हें लेने नहीं आया था।”

     

    अमित ने पढ़कर पूछा,

     

    “तो फिर?”

     

    बूढ़ी औरत ने बहुत धीमी आवाज में कहा—

     

    “वह तुम्हें घर तक पहुँचाना चाहता था।”

     

    अमित ने हैरानी से पूछा,

     

    “घर तक?”

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    बूढ़ी औरत ने दरवाजे की तरफ देखा।

     

    फिर बोली—

     

    “क्योंकि असली खतरा इस जंगल में नहीं है।”

     

    अमित ने धीरे से पूछा,

     

    “तो कहाँ है?”

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी ओर देखा।

     

    “तुम्हारे घर में।”

     

    अमित का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    तभी उसकी जेब में रखा मोबाइल अचानक बज उठा।

     

    ट्रिन…

     

    ट्रिन…

     

    ट्रिन…

     

    कमरे में मौजूद दोनों लोग जम गए।

     

    अमित ने काँपते हाथों से मोबाइल निकाला।

     

    स्क्रीन पर उसके घर का नंबर दिखाई दे रहा था।

     

    माँ कॉल कर रही थीं।

     

    अमित ने कॉल उठाई।

     

    दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक सिर्फ सन्नाटा था।

     

    फिर उसकी माँ की घबराई हुई आवाज सुनाई दी—

     

    “अमित… बेटा, तुम कहाँ हो?”

     

    “माँ, मैं रास्ते में हूँ।”

     

    दूसरी तरफ कुछ पल खामोशी रही।

     

    फिर माँ ने काँपती आवाज में कहा—

     

    “नहीं बेटा… तुम रास्ते में नहीं हो।”

     

    अमित का दिल बैठ गया।

     

    “क्या मतलब?”

     

    माँ ने कहा—

     

    “तुम्हारा कमरा अंदर से बंद है।”

     

    अमित कुछ बोल नहीं पाया।

     

    फिर उसकी माँ फुसफुसाईं—

     

    “और अंदर से तुम्हारी आवाज आ रही है।”

     

    कॉल अचानक कट गई।

     

    अमित ने धीरे-धीरे बूढ़ी औरत की तरफ देखा।

     

    बूढ़ी औरत ने सिर्फ इतना कहा—

     

    “अब तुम्हें समझ आया कि पीछे देखना मना क्यों है?”

  • 😱पीछे देखना मना है..!!😱

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे।आसमान पर बादल इतने घने थे कि चाँद का कहीं नामोनिशान नहीं था। सुनसान सड़क पर दूर-दूर तक कोई इंसान दिखाई नहीं दे रहा था। सड़क के दोनों तरफ खड़े पेड़ हवा के साथ इस तरह झूम रहे थे, जैसे अँधेरे में कोई उन्हें हिला रहा हो।

     

    अमित अपनी बाइक तेज चला रहा था।

     

    उसका घर शहर से लगभग बीस किलोमीटर दूर था और आज ऑफिस में काम ज्यादा होने के कारण उसे निकलने में देर हो गई थी। आमतौर पर वह मुख्य सड़क से जाता था, लेकिन आज बारिश के कारण मुख्य रास्ते पर लंबा जाम लगा हुआ था।

     

    तभी उसे अपने दोस्त रवि की कही बात याद आई।

     

    “अगर कभी देर रात घर जाना हो, तो पुराने जंगल वाले रास्ते से मत जाना।”

     

    अमित ने उस समय हँसते हुए पूछा था, “क्यों? वहाँ भूत रहता है क्या?”

     

    रवि ने मजाक नहीं किया था।

     

    उसने सिर्फ इतना कहा था, “भूत से भी ज्यादा खतरनाक चीज है वहाँ।”

     

    “क्या?”

     

    रवि कुछ देर चुप रहा था।

     

    फिर बोला था, “वहाँ एक नियम है। अगर पीछे से कोई आवाज आए, तो पीछे मुड़कर मत देखना।”

     

    अमित को वह बात याद आते ही हल्की हँसी आ गई।

     

    “क्या बेवकूफी है,” उसने खुद से कहा।

     

    लेकिन उसी समय उसकी बाइक की हेडलाइट एक पुराने पत्थर के बोर्ड पर पड़ी।

     

    पुराना जंगल मार्ग — 7 किलोमीटर

     

    अमित ने बाइक रोक दी।

     

    मुख्य सड़क से जाने में कम से कम एक घंटा लगना था। दूसरी तरफ यह रास्ता सिर्फ सात किलोमीटर का था।

     

    उसने कुछ पल सोचा।

     

    फिर बाइक जंगल वाले रास्ते पर मोड़ दी।

     

    शुरुआत में रास्ता बिल्कुल सामान्य था। कच्ची सड़क, दोनों तरफ पेड़ और बीच-बीच में पानी से भरे गड्ढे।

     

    लेकिन करीब दो किलोमीटर आगे जाने के बाद अचानक मोबाइल का नेटवर्क गायब हो गया।

     

    अमित ने फोन निकाला।

     

    कोई सिग्नल नहीं था।

     

    “कमाल है।”

     

    उसने फोन वापस जेब में रख लिया।

     

    कुछ देर बाद उसे लगा कि उसके पीछे कोई बाइक चल रही है।

     

    पहले आवाज बहुत हल्की थी।

     

    घर्र… घर्र… घर्र…

     

    अमित ने शीशे में देखने की कोशिश की।

     

    लेकिन शीशा बारिश की बूंदों से धुंधला था।

     

    उसने बाइक थोड़ी तेज कर दी।

     

    पीछे आने वाली आवाज भी तेज हो गई।

     

    घर्र… घर्र… घर्र…

     

    अब उसे साफ महसूस हो रहा था कि कोई उसके पीछे है।

     

    उसने दोबारा शीशे में देखने के लिए गर्दन थोड़ी घुमाई।

     

    तभी उसे रवि की बात याद आई।

     

    “पीछे से कोई आवाज आए, तो पीछे मुड़कर मत देखना।”

     

    अमित का हाथ अपने आप ब्रेक पर चला गया।

     

    लेकिन उसने बाइक नहीं रोकी।

     

    पीछे से अचानक किसी ने बहुत धीमी आवाज में कहा—

     

    “अमित…”

     

    उसके शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।

     

    उसने बाइक और तेज कर दी।

     

    उस आवाज ने फिर पुकारा।

     

    “अमित… रुक जाओ…”

     

    इस बार आवाज बिल्कुल उसके पीछे से आई थी।

     

    अमित का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

     

    उसे समझ नहीं आ रहा था कि जंगल के बीच कोई उसका नाम कैसे जानता है।

     

    उसने अपने आप से कहा—

     

    “नहीं देखना है… बस आगे देखना है।”

     

    सड़क अब और ज्यादा सुनसान हो गई थी।

     

    पेड़ों की शाखाएँ रास्ते के ऊपर झुककर एक सुरंग जैसी बना रही थीं।

     

    अचानक बाइक की हेडलाइट टिमटिमाई।

     

    एक बार।

     

    दो बार।

     

    फिर पूरी तरह बंद हो गई।

     

    अमित ने ब्रेक लगा दिया।

     

    चारों तरफ घुप्प अँधेरा।

     

    सिर्फ बारिश की आवाज।

     

    टप… टप… टप…

     

    और उसके पीछे किसी के कदमों की आवाज।

     

    छपाक…

     

    छपाक…

     

    छपाक…

     

    कोई पानी भरे रास्ते पर धीरे-धीरे उसकी तरफ आ रहा था।

     

    अमित की साँस रुकने लगी।

     

    उसने आँखें बंद कर लीं।

     

    “जो भी है… चला जाएगा।”

     

    लेकिन कदमों की आवाज रुक गई।

     

    अब उसके बिल्कुल पीछे कोई खड़ा था।

     

    उसे अपनी गर्दन के पीछे ठंडी हवा महसूस हुई।

     

    फिर किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “तुमने पीछे क्यों नहीं देखा?”

     

    अमित का पूरा शरीर काँपने लगा।

     

    उसने किसी तरह बाइक स्टार्ट करने की कोशिश की।

     

    पहली बार इंजन नहीं चला।

     

    दूसरी बार भी नहीं।

     

    तीसरी बार—

     

    बाइक अचानक स्टार्ट हो गई।

     

    हेडलाइट जल उठी।

     

    अमित ने बिना पीछे देखे बाइक दौड़ा दी।

     

    कुछ मीटर आगे जाने के बाद उसे सड़क के किनारे एक पुराना मकान दिखाई दिया।

     

    मकान के बाहर एक लालटेन जल रही थी।

     

    उसे लगा शायद वहाँ कोई इंसान होगा।

     

    उसने बाइक रोक दी।

     

    मकान के दरवाजे पर एक बूढ़ी औरत खड़ी थी।

     

    सफेद साड़ी।

     

    झुकी हुई कमर।

     

    और हाथ में लालटेन।

     

    अमित ने पूछा—

     

    “माँजी… यहाँ से शहर का रास्ता किधर है?”

     

    बूढ़ी औरत ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    वह सिर्फ अमित को घूरती रही।

     

    फिर उसकी नजर अमित के पीछे चली गई।

     

    उसका चेहरा अचानक डर से सफेद पड़ गया।

     

    “तुम अकेले नहीं हो,” उसने काँपती आवाज में कहा।

     

    अमित के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उसने पूछा—

     

    “क्या मतलब?”

     

    बूढ़ी औरत ने लालटेन नीचे कर दी।

     

    “तुम्हारे पीछे जो है… उसे तुमने देखा नहीं?”

     

    अमित ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    बूढ़ी औरत ने धीरे से कहा—

     

    “अच्छा किया।”

     

    फिर उसने दरवाजा खोलते हुए कहा—

     

    “अंदर आ जाओ।”

     

    अमित बाइक छोड़कर मकान की तरफ बढ़ा।

     

    लेकिन दरवाजे के पास पहुँचते ही बूढ़ी औरत ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    उसकी पकड़ आश्चर्यजनक रूप से मजबूत थी।

     

    वह फुसफुसाई—

     

    “एक बात याद रखना।”

     

    “क्या?”

     

    “आज रात अगर कोई तुम्हें तुम्हारे नाम से पुकारे…”

     

    बूढ़ी औरत की आँखें अमित की आँखों में गड़ गईं।

     

    “तो किसी भी हालत में पीछे मत देखना।”

     

    अमित कुछ पूछ पाता, उससे पहले जंगल की तरफ से वही आवाज आई—

     

    “अमित…”

     

    इस बार आवाज बूढ़ी औरत ने भी सुन ली।

     

    उसके हाथ से लालटेन लगभग छूट गई।

     

    वह काँपते हुए बोली—

     

    “हे भगवान… यह इतनी जल्दी वापस कैसे आ गया?”

     

    अमित ने पूछा—

     

    “क्या वापस आया?”

     

    बूढ़ी औरत ने दरवाजा बंद करते हुए कहा—

     

    “जिसे तुम रास्ते में छोड़कर आए हो।”

     

    अमित के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    क्योंकि उसे अचानक एहसास हुआ—

     

    जब वह बाइक चला रहा था, तब पीछे से जो कदमों की आवाज आ रही थी…

     

    वह सड़क पर नहीं थी।

     

    वह आवाज उसकी बाइक के साथ-साथ चल रही थी।