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पीछे देखना मना है..!!

पढ़ने का समय : 7 मिनट

अमित ने मोबाइल अपनी जेब में रख लिया।

 

सामने उसका पुराना घर खड़ा था।

 

ऊपरी मंजिल की वही खिड़की अब पूरी तरह अंधेरी थी।

 

उसकी माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“अमित, अकेले मत जाना।”

 

अमित ने माँ की तरफ देखा।

 

“मैसेज में साफ लिखा है कि मुझे अकेले जाना है।”

 

बूढ़ी औरत ने तुरंत कहा,

 

“वह नैना का संदेश नहीं है।”

 

“आपको कैसे पता?”

 

“क्योंकि नैना तुम्हें अकेले नहीं बुलाएगी।”

 

अमित चुप हो गया।

 

“फिर कौन बुला रहा है?”

 

बूढ़ी औरत ने अपनी लालटेन जमीन पर रख दी।

 

“वही जो चाहता है कि तुम उसके सामने अपनी पहचान भूल जाओ।”

 

अमित ने पूछा,

 

“अगर मैं नहीं गया तो?”

 

“तो वह खुद बाहर आएगा।”

 

कुछ क्षणों तक तीनों खामोश रहे।

 

फिर घर के अंदर से अचानक किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

 

“भैया…”

 

अमित का दिल काँप उठा।

 

यह वही आवाज थी जिसे उसने बचपन की धुंधली यादों में सुना था।

 

नैना की आवाज।

 

उसने माँ की तरफ देखा।

 

माँ ने धीरे से सिर हिलाया।

 

“जाओ।”

 

“माँ?”

 

“अगर वह सच में नैना है… तो शायद आज उसे आजाद करने का यही मौका है।”

 

अमित ने दरवाजा खोला।

 

घर के अंदर अंधेरा था।

 

वह धीरे-धीरे सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।

 

हर कदम के साथ फर्श चरमराता।

 

चर्र…

 

चर्र…

 

चर्र…

 

अचानक पीछे से बूढ़ी औरत की आवाज आई—

 

“अमित!”

 

वह रुक गया।

 

“क्या?”

 

“कुछ भी हो जाए, अगर तुम्हें पीछे से अपनी माँ की आवाज सुनाई दे, तो मत मुड़ना।”

 

अमित ने सिर हिलाया।

 

“ठीक है।”

 

वह सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।

 

ऊपर पहुँचकर बंद कमरे का दरवाजा खुला हुआ था।

 

अंदर से हल्की नीली रोशनी बाहर आ रही थी।

 

अमित ने दरवाजे पर कदम रखा।

 

कमरा पहले जैसा नहीं था।

 

पुराना सामान गायब था।

 

दीवारें साफ थीं।

 

बीच में वही बड़ा आईना रखा था।

 

और उसके सामने एक छोटी बच्ची बैठी थी।

 

लाल फ्रॉक।

 

दो चोटियाँ।

 

पीठ अमित की तरफ।

 

अमित धीरे से बोला,

 

“नैना?”

 

बच्ची ने सिर उठाया।

 

“भैया…”

 

अमित की आँखों में आँसू आ गए।

 

“तुम सच में नैना हो?”

 

बच्ची ने धीरे से सिर हिलाया।

 

“हाँ।”

 

“तुम इतने साल कहाँ थीं?”

 

“यहीं।”

 

“मुझे क्यों नहीं बुलाया?”

 

“मैं बुलाती रही।”

 

“लेकिन मुझे कुछ याद नहीं था।”

 

“उन्होंने तुम्हारी यादें छीन ली थीं।”

 

अमित ने पूछा,

 

“किसने?”

 

बच्ची ने आईने की तरफ देखा।

 

“उसने।”

 

अमित ने आईने में देखा।

 

इस बार उसमें कमरे का प्रतिबिंब नहीं था।

 

बल्कि एक लंबा गलियारा दिखाई दे रहा था।

 

गलियारे के अंत में एक आदमी खड़ा था।

 

अमित ने आँखें सिकोड़कर देखा।

 

वह उसके पिता थे।

 

अमित के पिता की मृत्यु पाँच साल पहले हो चुकी थी।

 

फिर भी वह आईने में बिल्कुल जीवित खड़े थे।

 

अमित की साँस रुक गई।

 

“पापा…”

 

आईने में खड़े आदमी ने हाथ उठाया।

 

“अमित…”

 

अमित एक कदम आगे बढ़ा।

 

नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“मत जाना।”

 

“लेकिन पापा—”

 

“वह पापा नहीं हैं।”

 

आईने के अंदर खड़ा आदमी मुस्कुराया।

 

उसका चेहरा धीरे-धीरे बदलने लगा।

 

पहले आँखें काली हुईं।

 

फिर त्वचा झुर्रीदार हो गई।

 

फिर उसका चेहरा बूढ़ी औरत जैसा हो गया।

 

अमित पीछे हट गया।

 

नैना बोली,

 

“अब समझे?”

 

“यह कौन है?”

 

नैना ने कहा,

 

“वह जो हर किसी का चेहरा पहन सकती है।”

 

अमित ने पूछा,

 

“उसका नाम क्या है?”

 

नैना ने चुप्पी साध ली।

 

“तुम्हें पता है?”

 

“हाँ।”

 

“तो बताओ।”

 

नैना ने सिर हिलाया।

 

“नहीं।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि अगर मैंने उसका नाम लिया तो वह मुझे फिर से पकड़ लेगी।”

 

अमित कुछ समझ नहीं पाया।

 

“लेकिन उसे रोकने के लिए उसका असली नाम जानना जरूरी है।”

 

नैना ने धीरे से कहा,

 

“तुम्हें उसका नाम पहले से पता है।”

 

“मुझे?”

 

“हाँ।”

 

“कहाँ?”

 

नैना ने आईने की तरफ इशारा किया।

 

“तुम्हारी यादों में।”

 

अमित ने आँखें बंद कर लीं।

 

अचानक उसके दिमाग में तस्वीरें दौड़ने लगीं।

 

एक पुराना मंदिर।

 

एक कुआँ।

 

उसके पिता किसी आदमी से बात कर रहे थे।

 

फिर वही आदमी काले कपड़ों में एक किताब खोलता है।

 

किताब के पन्ने पर एक नाम लिखा था।

 

अमित उसे पढ़ने की कोशिश करता है।

 

लेकिन शब्द धुंधले हो जाते हैं।

 

उसने आँखें खोल दीं।

 

“मुझे याद नहीं।”

 

नैना बोली,

 

“याद आएगा।”

 

तभी कमरे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

 

धड़ाम!

 

अमित दौड़कर दरवाजे तक गया।

 

कुंडी हिलाई।

 

दरवाजा नहीं खुला।

 

नैना ने कहा,

 

“अब वह आ रही है।”

 

“कौन?”

 

“वही।”

 

कमरे की दीवारों से फुसफुसाहट आने लगी।

 

“अमित…”

 

“अमित…”

 

“अमित…”

 

आवाजें अलग-अलग लोगों की थीं।

 

उसकी माँ।

 

उसके पिता।

 

रवि।

 

बूढ़ी औरत।

 

और फिर…

 

अमित की अपनी आवाज।

 

“अमित, पीछे देखो।”

 

अमित ने आँखें बंद कर लीं।

 

“मैं नहीं देखूँगा।”

 

फुसफुसाहट तेज हो गई।

 

“पीछे देखो।”

 

“पीछे देखो।”

 

“पीछे देखो।”

 

अमित ने कान बंद कर लिए।

 

नैना उसके सामने खड़ी थी।

 

“भैया, मेरी तरफ देखो।”

 

अमित ने आँखें खोलीं।

 

नैना का चेहरा बदल रहा था।

 

एक पल वह छोटी बच्ची थी।

 

अगले पल वह उसकी माँ जैसी दिखने लगी।

 

फिर उसके पिता जैसी।

 

फिर बूढ़ी औरत जैसी।

 

अमित पीछे हट गया।

 

“तुम नैना नहीं हो।”

 

वह मुस्कुराई।

 

“बहुत देर से समझे।”

 

अमित का काला धागा अचानक जलने लगा।

 

उसने दर्द से हाथ पकड़ लिया।

 

धागे से धुआँ निकल रहा था।

 

आईने में काली परछाईं दिखाई दी।

 

वह धीरे-धीरे आईने से बाहर आने लगी।

 

पहले उसके हाथ निकले।

 

फिर सिर।

 

फिर पूरा शरीर।

 

अमित ने देखा कि उसका चेहरा नहीं था।

 

सिर्फ खाली काला स्थान।

 

उसने धीमी आवाज में पूछा—

 

“तुम मुझे क्यों चाहती हो?”

 

परछाईं ने जवाब दिया—

 

“क्योंकि तुम्हारे पिता ने वादा किया था।”

 

“क्या वादा?”

 

“तुम्हें मुझे देने का।”

 

अमित के पैरों तले जमीन खिसक गई।

 

“लेकिन मैं तो बच गया था।”

 

“हाँ।”

 

“कैसे?”

 

परछाईं ने आईने की तरफ देखा।

 

“तुम्हारी बहन की वजह से।”

 

अमित ने नैना की तरफ देखा।

 

“नैना?”

 

परछाईं हँसी।

 

“वह तुम्हारी बहन नहीं थी।”

 

अमित के चेहरे पर डर फैल गया।

 

“झूठ।”

 

“तो उससे पूछो।”

 

अमित ने नैना की तरफ देखा।

 

नैना की आँखों से काला तरल बहने लगा।

 

“भैया… मुझे माफ कर दो।”

 

“तुमने क्या किया?”

 

“मैंने तुम्हें बचाने के लिए…”

 

वह रुक गई।

 

“…उससे एक समझौता किया था।”

 

अमित ने काँपते हुए पूछा,

 

“कैसा समझौता?”

 

नैना ने सिर झुका लिया।

 

“मैं उसकी दुनिया में रहूँगी।”

 

“और बदले में?”

 

“तुम्हें छोड़ दिया जाएगा।”

 

अमित की आँखों से आँसू निकल आए।

 

“तो तुम इतने साल से यहाँ हो?”

 

“हाँ।”

 

“और अब?”

 

“अब मेरा समय खत्म हो गया है।”

 

परछाईं आगे बढ़ी।

 

“अब तुम्हारी बारी है।”

 

अमित पीछे हटते-हटते आईने से जा टकराया।

 

आईने की सतह पानी जैसी लहराने लगी।

 

उसके अंदर से आवाज आई—

 

“बस एक कदम।”

 

“और तुम मेरे साथ।”

 

अमित ने नैना की तरफ देखा।

 

“मुझे क्या करना होगा?”

 

नैना ने कहा,

 

“आईने को तोड़ दो।”

 

अमित ने पास पड़ी लोहे की कुर्सी उठा ली।

 

परछाईं उसकी तरफ झपटी।

 

अमित ने पूरी ताकत से कुर्सी आईने पर दे मारी।

 

धड़ाम!

 

आईना टूट गया।

 

कमरे में तेज चीख गूँजी।

 

ऐसी चीख कि पूरा घर काँप उठा।

 

परछाईं पीछे हट गई।

 

नैना चीखने लगी—

 

“भैया! जल्दी!”

 

अमित ने दूसरी बार कुर्सी उठाई।

 

लेकिन तभी उसके पीछे से उसके पिता की आवाज आई—

 

“अमित…”

 

उसका हाथ रुक गया।

 

आवाज बिल्कुल उसके पिता जैसी थी।

 

“बेटा…”

 

अमित की आँखों में आँसू आ गए।

 

“पापा?”

 

नैना चीखी—

 

“पीछे मत देखना!”

 

लेकिन अमित ने धीरे-धीरे गर्दन घुमा दी।

 

और जो उसने देखा…

 

उसे देखकर उसकी पूरी दुनिया बदल गई।

 

उसके पीछे उसके पिता नहीं थे।

 

वहाँ अमित खुद खड़ा था।

 

लेकिन इस बार उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

 

उसने मुस्कुराकर कहा—

 

“अब समझे?”

 

फिर उसने फुसफुसाया—

 

“जिसे तुम छह भागों से ढूँढ रहे हो… वह हमेशा से तुम्हारे अंदर था।”

 

आईना पूरी तरह टूट गया।

 

और कमरे की सारी रोशनियाँ एक साथ बुझ गईं।

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