अमित की माँ ने उसका हाथ इतनी मजबूती से पकड़ रखा था कि उसकी उंगलियाँ सुन्न होने लगी थीं।
दोनों घर के बाहर खड़े थे।
पीछे से अभी भी वही आवाज आ रही थी।
“भैया…”
अमित की आँखें बंद थीं।
उसका दिल कह रहा था कि वह पीछे मुड़कर देखे।
आखिर वह उसकी बहन थी।
वही बहन, जिसकी यादें उसके दिमाग से मिटा दी गई थीं।
लेकिन उसकी माँ लगातार फुसफुसा रही थीं—
“पीछे मत देखना… चाहे कुछ भी हो जाए।”
अचानक पीछे से हँसी की आवाज आई।
“माँ… आप अभी भी झूठ बोल रही हो?”
अमित की माँ काँप गईं।
आवाज अब नैना जैसी नहीं थी।
वह किसी बूढ़ी औरत जैसी भारी और डरावनी हो गई थी।
फिर आवाज बदलकर अमित के पिता जैसी हो गई—
“अमित, बेटा… पीछे देखो।”
अमित ने दाँत भींच लिए।
“यह मुझे क्यों बुला रहा है?”
माँ ने कहा,
“क्योंकि उसे तुम्हारी जरूरत है।”
“किसलिए?”
“अपनी दुनिया में वापस आने के लिए।”
अमित ने पहली बार माँ की तरफ गौर से देखा।
“माँ, मुझे सच बताइए। उस रात क्या हुआ था?”
माँ चुप रहीं।
“मैंने क्या किया था?”
माँ की आँखों में आँसू आ गए।
“तुमने कुछ नहीं किया था।”
“तो फिर मेरी यादें क्यों मिटाई गईं?”
“क्योंकि तुम्हारे पिता डर गए थे।”
“किससे?”
माँ ने पीछे घर की तरफ देखा।
“नैना से नहीं।”
“फिर?”
माँ ने बहुत धीमी आवाज में कहा—
“उस चीज से जो नैना के पीछे आई थी।”
अमित का शरीर ठंडा पड़ गया।
“क्या चीज?”
“हम उसे नाम नहीं देते।”
“क्यों?”
“क्योंकि जिस चीज का नाम लिया जाता है, वह उसके पास पहुँच जाती है।”
कुछ पल तक दोनों चुप रहे।
अचानक घर की सारी खिड़कियाँ एक साथ खुल गईं।
धड़ाम!
अंदर से ठंडी हवा का झोंका बाहर आया।
ऊपरी मंजिल की खिड़की में एक छोटी बच्ची खड़ी दिखाई दी।
लाल फ्रॉक।
दो चोटियाँ।
चेहरा सफेद।
वह अमित को देख रही थी।
फिर उसने हाथ उठाया।
और मुस्कुराई।
अमित की माँ ने उसे तुरंत दूसरी दिशा में खींच लिया।
“इधर मत देखो!”
लेकिन अमित के कदम रुक गए।
उसने पूछा,
“माँ… क्या वह नैना है?”
माँ ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“लेकिन उसका चेहरा—”
“वह नैना का चेहरा पहनती है।”
अमित ने घबराकर पूछा,
“तो असली नैना कहाँ है?”
माँ ने काँपती आवाज में कहा,
“शायद अभी भी उसी कमरे में।”
“आपने कहा था वह मर गई।”
“उसका शरीर मर गया था।”
अमित ने माँ की तरफ देखा।
“लेकिन उसकी आत्मा?”
माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसी समय सड़क के दूसरी तरफ से किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।
छपाक…
छपाक…
छपाक…
बारिश फिर शुरू हो चुकी थी।
अमित ने सामने देखा।
सड़क के बीच बूढ़ी औरत खड़ी थी।
वही लालटेन।
वही सफेद साड़ी।
अमित ने राहत की साँस ली।
“आप यहाँ कैसे?”
बूढ़ी औरत ने उसकी माँ की तरफ देखा।
दोनों महिलाएँ एक-दूसरे को पहचानती थीं।
अमित यह देखकर हैरान रह गया।
“आप दोनों एक-दूसरे को जानती हैं?”
माँ ने नजरें झुका लीं।
बूढ़ी औरत ने कहा,
“बहुत पहले से।”
अमित ने पूछा,
“आपने मुझे इस रास्ते पर भेजा था?”
बूढ़ी औरत ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“तो फिर मैं वहाँ पहुँचा कैसे?”
बूढ़ी औरत ने अमित की माँ की तरफ देखा।
“क्योंकि तुम्हारी माँ ने रास्ता खोला था।”
अमित पीछे हट गया।
“माँ?”
माँ रोने लगीं।
“मेरे पास कोई और रास्ता नहीं था।”
“आपने क्या किया?”
माँ ने जवाब देने की कोशिश की, लेकिन आवाज नहीं निकली।
बूढ़ी औरत बोली,
“बारह साल पहले तुम्हारे पिता ने एक वादा किया था।”
“किससे?”
“उसी से जो तुम्हारे घर में है।”
अमित ने पूछा,
“कैसा वादा?”
बूढ़ी औरत ने कहा,
“अगर वह तुम्हारे परिवार को छोड़ देगी, तो हर बार एक बच्चा उसके पास भेजा जाएगा।”
अमित की साँस अटक गई।
“एक बच्चा?”
“हाँ।”
“तो नैना?”
“पहली थी।”
अमित की आँखें फैल गईं।
“और मैं?”
बूढ़ी औरत चुप रही।
अमित समझ गया।
“दूसरा?”
बूढ़ी औरत ने धीरे से सिर हिलाया।
“लेकिन मैं तो बच गया।”
“क्योंकि उस रात किसी ने नियम तोड़ दिया था।”
“किसने?”
बूढ़ी औरत ने उसकी माँ की तरफ देखा।
माँ फूट-फूटकर रोने लगीं।
“मैंने।”
अमित ने पूछा,
“आपने क्या किया?”
माँ ने कहा,
“मैंने तुम्हें जंगल तक पहुँचने से पहले ही रोकने की कोशिश की थी। लेकिन तुम्हारे पिता ने मुझे कमरे में बंद कर दिया।”
“फिर?”
“नैना को उसने कमरे में भेज दिया।”
अमित की आँखों के सामने धुंध छाने लगी।
धीरे-धीरे उसे सब याद आने लगा।
वह रात।
बारिश।
बिजली की चमक।
नैना का रोना।
उसके पिता का गुस्सा।
और वह पुराना आईना।
उसके पिता ने नैना से कहा था—
“बस एक बार पीछे देखो।”
नैना डरते हुए पीछे मुड़ी थी।
आईने में उसके पीछे एक काली परछाईं खड़ी थी।
अमित चीखना चाहता था।
लेकिन उसकी आवाज नहीं निकल रही थी।
फिर उसके पिता ने उसे खींचकर कमरे से बाहर कर दिया था।
और दरवाजा बंद कर दिया था।
अमित ने सिर पकड़ लिया।
“मुझे सब याद आ रहा है…”
माँ ने उसे गले लगा लिया।
“बेटा…”
अमित ने माँ को दूर कर दिया।
“आपने मुझे क्यों नहीं बताया?”
“मैं तुम्हें बचाना चाहती थी।”
“मुझसे मेरी बहन छीनकर?”
माँ रोती रहीं।
बूढ़ी औरत ने कहा,
“अब पछताने का समय नहीं है।”
“क्या करना होगा?”
“आज रात अमावस्या है।”
अमित ने आसमान की तरफ देखा।
बादलों के पीछे चाँद बिल्कुल दिखाई नहीं दे रहा था।
“इसका मतलब?”
“आज वह पूरी तरह बाहर आ सकती है।”
“और अगर हमने उसे रोक दिया?”
“तो वह हमेशा के लिए तुम्हारे घर से चली जाएगी।”
“कैसे रोकेंगे?”
बूढ़ी औरत ने अपनी लालटेन उठाई।
“तुम्हें उसी कमरे में वापस जाना होगा।”
अमित ने तुरंत कहा,
“नहीं।”
बूढ़ी औरत बोली,
“तुम्हें जाना ही होगा।”
“वहाँ वह है।”
“हाँ।”
“और अगर उसने मुझे पकड़ लिया?”
“तो तुम्हारी जगह वह ले लेगी।”
अमित ने अपनी माँ की तरफ देखा।
माँ ने सिर झुका लिया।
बूढ़ी औरत ने कहा,
“लेकिन तुम्हारे पास एक मौका है।”
“क्या?”
“उसे आईने के सामने अपना असली नाम बताना होगा।”
अमित ने पूछा,
“नैना का?”
“नहीं।”
“फिर?”
बूढ़ी औरत ने उसकी आँखों में देखा।
“उसका असली नाम।”
“लेकिन आपने कहा था कि उसका नाम नहीं लेना चाहिए।”
“तभी तो मुश्किल है।”
अमित ने धीरे से पूछा,
“आपको उसका नाम पता है?”
बूढ़ी औरत ने जवाब नहीं दिया।
वह सिर्फ घर की तरफ देखने लगी।
ऊपर खिड़की में खड़ी बच्ची अब वहाँ नहीं थी।
लेकिन जमीन पर लालटेन की रोशनी में छोटे-छोटे पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे।
वे घर से निकलकर सड़क तक आ रहे थे।
फिर अचानक रुक गए।
बूढ़ी औरत ने उन निशानों को देखा और फुसफुसाई—
“वह बाहर आ चुकी है।”
अमित ने पूछा,
“कौन?”
बूढ़ी औरत ने पहली बार डरते हुए कहा—
“जिसे हमने बारह साल से नैना समझ रखा था।”
तभी अमित के मोबाइल पर एक संदेश आया।
नंबर अनजान था।
संदेश में सिर्फ एक लाइन थी—
“भैया, अगर सच में मुझे बचाना चाहते हो तो अकेले कमरे में वापस आओ।”
अमित ने संदेश पढ़ा।
उसने माँ और बूढ़ी औरत की तरफ देखा।
फिर घर की ओर बढ़ गया।
लेकिन उसे पता नहीं था कि कमरे के अंदर उसका इंतजार नैना नहीं…
बल्कि कोई और कर रहा था।
और इस बार—
वह उसे पीछे मुड़ने पर मजबूर करने वाला था।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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