अमित कुछ सेकंड तक सीढ़ियों पर खड़े अपने ही चेहरे को देखता रहा।
सामने खड़ा दूसरा अमित बिल्कुल उसकी तरह था।
वही आँखें।
वही बाल।
वही कपड़े।
यहाँ तक कि उसकी दाहिनी भौंह के ऊपर बचपन में लगी चोट का छोटा-सा निशान भी बिल्कुल वैसा ही था।
अमित के गले से आवाज नहीं निकल रही थी।
दूसरा अमित मुस्कुराया।
“डर गए?”
अमित ने खुद को संभालते हुए पूछा,
“तू कौन है?”
सामने वाला हँसा।
“मैंने बताया ना… तुम्हारी जगह लेने आया हूँ।”
“मेरी जगह?”
“हाँ।”
“कहाँ?”
“हर जगह।”
अमित पीछे हट गया।
उसी समय ऊपर बंद कमरे से बच्चे के रोने की आवाज फिर आई।
“माँ…”
अमित ने सीढ़ियों की तरफ देखा।
“ऊपर कौन है?”
दूसरे अमित ने जवाब नहीं दिया।
वह सिर्फ मुस्कुराता रहा।
अमित ने सीढ़ियों पर चढ़ने की कोशिश की।
लेकिन जैसे ही उसने पहला कदम आगे बढ़ाया, दूसरे अमित ने उसका रास्ता रोक लिया।
“ऊपर मत जाना।”
“क्यों?”
“क्योंकि वहाँ तुम्हारे सारे सवालों के जवाब हैं।”
“तो मैं वहीं जाऊँगा।”
“और अगर जवाब पसंद नहीं आया तो?”
अमित ने उसकी आँखों में देखा।
“फिर भी जाऊँगा।”
दूसरा अमित कुछ देर उसे देखता रहा।
फिर अचानक एक तरफ हट गया।
“जाओ।”
अमित धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।
हर कदम के साथ उसका दिल तेज धड़क रहा था।
ऊपर पहुँचते ही उसने बंद कमरे को देखा।
दरवाजे पर वही पुराना ताला लगा था।
उसने जेब से बूढ़ी औरत की दी हुई चाबी निकाली।
चाबी ताले में डालते ही—
क्लिक!
ताला खुल गया।
नीचे खड़ा दूसरा अमित अचानक चिल्लाया—
“मत खोलो!”
अमित रुक गया।
उसने पीछे मुड़कर देखा।
दूसरा अमित अब मुस्कुरा नहीं रहा था।
उसके चेहरे पर पहली बार डर दिखाई दे रहा था।
“तू डर रहा है?” अमित ने पूछा।
दूसरा अमित कुछ नहीं बोला।
अमित ने दरवाजा खोल दिया।
दरवाजा चरमराता हुआ अंदर की तरफ खुला।
कमरे से बासी हवा का झोंका बाहर आया।
अंदर अंधेरा था।
अमित ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।
कमरे में पुराने सामान रखे थे।
एक टूटी हुई अलमारी।
कुछ पुराने खिलौने।
एक लकड़ी की मेज।
दीवार पर धूल से ढकी तस्वीरें।
और कमरे के बीच में एक पुराना आईना।
अमित धीरे-धीरे अंदर गया।
आईने के सामने पहुँचते ही उसके कदम रुक गए।
आईने में उसका प्रतिबिंब दिखाई दे रहा था।
लेकिन कुछ अजीब था।
वह प्रतिबिंब अमित की तरह खड़ा नहीं था।
अमित सीधा खड़ा था।
आईने वाला अमित थोड़ा झुका हुआ था।
अमित ने अपना हाथ उठाया।
आईने में हाथ उठ गया।
लेकिन एक पल देर से।
अमित का दिल जोर से धड़का।
उसने दोबारा हाथ हिलाया।
इस बार भी प्रतिबिंब एक पल बाद हिला।
“यह क्या है?”
पीछे से आवाज आई—
“यही तुम्हारा असली घर है।”
अमित ने पलटकर देखा।
दूसरा अमित दरवाजे पर खड़ा था।
“तू अंदर कैसे आया?”
“यह कमरा मुझे भी पहचानता है।”
अमित ने पूछा,
“तुम दोनों का क्या संबंध है?”
दूसरा अमित चुप रहा।
तभी कमरे के एक कोने से किसी बच्चे के खिलखिलाने की आवाज आई।
अमित ने टॉर्च उस तरफ घुमाई।
वहाँ एक छोटी-सी लकड़ी की कुर्सी थी।
कुर्सी पर एक पुरानी गुड़िया बैठी थी।
उसकी आँखें काली थीं।
अमित ने गुड़िया को देखा।
अचानक गुड़िया की गर्दन धीरे-धीरे उसकी तरफ घूम गई।
अमित पीछे हट गया।
दूसरा अमित बोला,
“उसे मत छूना।”
“यह क्या है?”
“वह यहाँ बहुत पहले से है।”
“कब से?”
दूसरे अमित ने धीरे से कहा,
“जब से तुम्हारी बहन मरी थी।”
अमित का चेहरा बदल गया।
“मेरी कोई बहन नहीं थी।”
दूसरा अमित मुस्कुराया।
“तुम्हें यही बताया गया था।”
अमित के दिमाग में जैसे कोई पुराना दरवाजा खुलने लगा।
उसे बचपन की कुछ धुंधली यादें दिखाई देने लगीं।
एक छोटी बच्ची।
दो चोटियाँ।
लाल फ्रॉक।
वह उसे “दीदी” कहकर बुला रहा था।
फिर एक कमरा।
बहुत तेज बारिश।
किसी के रोने की आवाज।
और उसकी माँ चिल्ला रही थीं—
“पीछे मत देखना!”
अमित ने सिर पकड़ लिया।
“ये यादें… मुझे क्यों नहीं याद थीं?”
दूसरा अमित धीरे से बोला,
“क्योंकि तुम्हारे पिता ने उन्हें मिटाने की कोशिश की थी।”
“मेरे पिता?”
“हाँ।”
“क्यों?”
दूसरा अमित आईने की तरफ देखने लगा।
“क्योंकि उस रात जो हुआ था, उसके बाद तुम बदल गए थे।”
अमित ने उसकी तरफ देखा।
“मैं?”
“नहीं।”
दूसरे अमित ने आईने की तरफ इशारा किया।
“तुम्हारा वह हिस्सा।”
अमित ने आईने में देखा।
इस बार उसका प्रतिबिंब मुस्कुरा रहा था।
लेकिन अमित नहीं मुस्कुरा रहा था।
आईने वाला अमित धीरे-धीरे अपना मुँह खोलने लगा।
उसके होंठ हिले—
“भैया…”
अमित के पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।
वही आवाज।
वही बच्ची की आवाज।
“भैया… तुम मुझे छोड़कर क्यों चले गए?”
अमित की आँखों में आँसू आ गए।
“मुझे कुछ याद नहीं।”
आईने में बच्ची का चेहरा दिखाई दिया।
वह धीरे-धीरे बड़ी होने लगी।
पहले पाँच साल की बच्ची।
फिर दस साल की।
फिर एक किशोरी।
फिर अचानक उसका चेहरा काला पड़ गया।
आँखें खाली हो गईं।
और उसने कहा—
“तुम्हें याद करना ही पड़ेगा।”
कमरे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।
धड़ाम!
अमित ने दौड़कर दरवाजा खोलने की कोशिश की।
दरवाजा नहीं खुला।
दूसरा अमित कमरे के कोने में खड़ा था।
उसका चेहरा अब बदलने लगा था।
त्वचा काली पड़ रही थी।
आँखें लाल हो रही थीं।
अमित चीखा—
“तू इंसान नहीं है!”
दूसरा अमित हँसने लगा।
“अब समझे?”
अमित पीछे हट गया।
तभी कमरे की दीवार पर लगी एक पुरानी तस्वीर नीचे गिर गई।
काँच टूट गया।
तस्वीर में चार लोग थे।
अमित के पिता।
उसकी माँ।
एक छोटी बच्ची।
और…
अमित।
लेकिन तस्वीर देखकर अमित की साँस रुक गई।
तस्वीर में अमित की उम्र लगभग आठ साल थी।
उसके पास खड़ी बच्ची के चेहरे पर लाल निशान था।
और तस्वीर के पीछे किसी ने तारीख लिखी थी—
15 अगस्त 2010
अमित ने काँपते हुए कहा,
“यह मेरी बहन है?”
दूसरे अमित ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“उसका नाम क्या था?”
“नैना।”
अमित की आँखों से आँसू निकलने लगे।
“नैना को क्या हुआ था?”
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।
फिर आईने के अंदर से वही बच्ची बोली—
“भैया ने मुझे पीछे देखने को कहा था।”
अमित का दिल बैठ गया।
“नहीं…”
“भैया ने कहा था कि पीछे कोई नहीं है।”
“नहीं!”
“मैंने पीछे देखा।”
अमित अपने कान बंद करने लगा।
“बस करो!”
आईने में नैना का चेहरा अचानक विकृत हो गया।
“और फिर… उसने मुझे देख लिया।”
अमित चीख पड़ा।
उसी समय कमरे की लाइट अपने आप जल गई।
दरवाजा खुल गया।
नीचे से उसकी माँ की आवाज आई—
“अमित!”
अमित सीढ़ियों की तरफ भागा।
नीचे उसकी माँ खड़ी थीं।
उनके चेहरे पर आँसू थे।
“बेटा… तुम यहाँ नहीं आना चाहिए था।”
अमित दौड़कर उनके पास पहुँचा।
“माँ, नैना कौन थी?”
माँ का चेहरा सफेद पड़ गया।
उन्होंने धीरे से कहा—
“तुम्हारी बहन।”
“फिर आपने मुझसे इतने साल झूठ क्यों बोला?”
माँ रोने लगीं।
“क्योंकि वह मरने के बाद भी घर से नहीं गई।”
अमित ने काँपते हुए पूछा—
“वह क्या चाहती है?”
माँ ने पीछे देखा।
ऊपर कमरे के दरवाजे पर दूसरा अमित खड़ा था।
माँ ने उसे देखते ही अमित का हाथ पकड़ लिया।
“भागो!”
“क्यों?”
माँ चिल्लाईं—
“क्योंकि वह नैना नहीं है!”
अमित ने ऊपर देखा।
दूसरा अमित मुस्कुरा रहा था।
और उसके पीछे आईने में एक छोटी बच्ची खड़ी थी।
वह बच्ची धीरे-धीरे आईने से बाहर निकल रही थी।
माँ ने अमित को खींचते हुए कहा—
“अगर उसने तुम्हें छू लिया, तो तुम्हारी जगह वह ले लेगी।”
अमित ने पूछा—
“फिर असली नैना कहाँ है?”
माँ ने काँपते हुए कहा—
“वह तो उसी रात मर गई थी।”
अमित ने पीछे देखा।
ऊपर खड़ी परछाईं अब सीढ़ियों से उतर रही थी।
लेकिन उसके कदमों की आवाज नहीं आ रही थी।
वह धीरे-धीरे नीचे आ रही थी।
और उसके पीछे…
आईने से बाहर निकल चुकी छोटी बच्ची मुस्कुरा रही थी।
अमित की माँ ने दरवाजा खोलते हुए कहा—
“बाहर निकलो!”
दोनों बाहर भागे।
लेकिन जैसे ही अमित ने घर के बाहर कदम रखा, उसके पीछे से एक मासूम आवाज आई—
“भैया…”
अमित रुक गया।
माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“पीछे मत देखना!”
लेकिन तभी आवाज फिर आई—
“भैया… अगर तुमने पीछे नहीं देखा… तो तुम्हें कैसे पता चलेगा कि मैं सच में नैना नहीं हूँ?”
अमित की आँखें बंद हो गईं।
उसके सामने अब सिर्फ एक सवाल था—
क्या वह अपनी बहन की आवाज पर भरोसा करे… या बूढ़ी औरत की चेतावनी पर?

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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