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पीछे देखना मना है..!!

पढ़ने का समय : 7 मिनट

अमित के हाथ से मोबाइल लगभग गिर ही गया।

 

उसकी माँ की आखिरी बात उसके कानों में बार-बार गूँज रही थी—

 

“तुम्हारा कमरा अंदर से बंद है… और अंदर से तुम्हारी आवाज आ रही है।”

 

कमरे में कुछ देर तक बिल्कुल सन्नाटा रहा।

 

बाहर बारिश अब धीमी पड़ चुकी थी, लेकिन हवा अभी भी तेज चल रही थी। खिड़की के बाहर पेड़ों की शाखाएँ अंधेरे में हिल रही थीं।

 

अमित ने बूढ़ी औरत की तरफ देखा।

 

“मुझे घर जाना होगा।”

 

बूढ़ी औरत ने सिर हिलाया।

 

“अभी नहीं।”

 

“मेरी माँ अकेली हैं।”

 

“अगर तुम अभी घर गए, तो शायद तुम्हारी माँ तुम्हें पहचान भी न पाए।”

 

अमित का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

“आप कहना क्या चाहती हैं?”

 

बूढ़ी औरत ने लालटेन उठाई और कमरे के दूसरे हिस्से में चली गई।

 

“तुम्हारे घर में जो है, वह तुम्हारी आवाज में बोल सकता है। तुम्हारा चेहरा भी बना सकता है। लेकिन एक चीज नहीं बना सकता।”

 

“क्या?”

 

“तुम्हारी परछाईं।”

 

अमित कुछ समझ नहीं पाया।

 

“मतलब?”

 

“वह इंसान की तरह दिख सकता है, इंसान की तरह बोल सकता है, लेकिन उसकी परछाईं नहीं होती।”

 

अमित ने तुरंत अपनी तरफ देखा।

 

लालटेन की रोशनी में उसकी परछाईं फर्श पर साफ दिखाई दे रही थी।

 

उसने राहत की साँस ली।

 

बूढ़ी औरत ने कहा,

 

“इसका मतलब तुम अभी वही हो जो तुम समझ रहे हो।”

 

“और मेरे घर में?”

 

“वहाँ जाकर देखना होगा।”

 

“लेकिन कैसे?”

 

बूढ़ी औरत ने कमरे के कोने से एक पुराना कपड़ा उठाया। उसके नीचे एक लकड़ी का संदूक रखा था।

 

उसने संदूक खोला।

 

अंदर पुराने कागज, एक लोहे की चाबी और कुछ काले धागे रखे थे।

 

उसने चाबी अमित की हथेली पर रख दी।

 

“यह किसकी है?”

 

“तुम्हारे घर की।”

 

अमित चौंक गया।

 

“आपके पास मेरे घर की चाबी कैसे?”

 

बूढ़ी औरत ने उसकी तरफ देखा।

 

“यह तुम्हारे घर की मुख्य चाबी नहीं है। यह उस कमरे की चाबी है जिसे तुम्हारे परिवार ने वर्षों से बंद रखा है।”

 

अमित का दिल तेज धड़कने लगा।

 

“मेरे घर में ऐसा कोई कमरा नहीं है।”

 

बूढ़ी औरत हल्का सा मुस्कुराई।

 

“हर घर में कुछ कमरे ऐसे होते हैं जिनके बारे में घर वाले भूल जाना चाहते हैं।”

 

अमित को अचानक अपने बचपन की एक बात याद आई।

 

जब वह छोटा था, घर की ऊपरी मंजिल पर एक कमरा हमेशा बंद रहता था।

 

उसकी माँ उसे कभी वहाँ जाने नहीं देती थीं।

 

जब भी अमित पूछता, माँ कहतीं—

 

“वहाँ पुराना सामान रखा है।”

 

एक बार उसने उस कमरे का दरवाजा खोलने की कोशिश की थी।

 

उसी रात उसके पिता ने उसे बहुत डाँटा था।

 

अगले दिन उस कमरे पर नया ताला लगा दिया गया था।

 

अमित ने धीरे से पूछा,

 

“उस कमरे में क्या है?”

 

बूढ़ी औरत ने जवाब दिया,

 

“वही, जिसकी वजह से वह तुम्हारे घर तक पहुँच चुका है।”

 

अमित ने चाबी मुट्ठी में कस ली।

 

“मुझे वापस जाना होगा।”

 

“हाँ।”

 

“आप मेरे साथ चलेंगी?”

 

बूढ़ी औरत ने सिर हिला दिया।

 

“मैं इस घर से बाहर नहीं जा सकती।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि बहुत साल पहले मैंने भी पीछे मुड़कर देखा था।”

 

अमित चुप हो गया।

 

बूढ़ी औरत ने दरवाजा खोला।

 

बारिश लगभग रुक चुकी थी।

 

बाहर उसकी बाइक खड़ी थी।

 

लेकिन अमित ने जैसे ही बाइक की तरफ देखा, उसके शरीर में सिहरन दौड़ गई।

 

बाइक के पीछे की सीट पर गीले पैरों के निशान थे।

 

एक नहीं।

 

दो नहीं।

 

बल्कि छोटे-छोटे पैरों के निशान।

 

जैसे कोई बच्चा बारिश में भीगकर बाइक पर बैठा हो।

 

अमित ने पीछे हटते हुए पूछा,

 

“ये किसके निशान हैं?”

 

बूढ़ी औरत ने उन्हें देखा और तुरंत नजरें झुका लीं।

 

“उसे मत देखो।”

 

“लेकिन—”

 

“बाइक पर बैठो।”

 

अमित बाइक पर बैठ गया।

 

बूढ़ी औरत उसके पास आई और उसकी कलाई पर काला धागा बाँध दिया।

 

“जब तक सूरज नहीं निकलता, इसे मत उतारना।”

 

“और अगर यह टूट गया?”

 

बूढ़ी औरत ने गंभीर आवाज में कहा,

 

“तो किसी भी आवाज का जवाब मत देना।”

 

अमित ने बाइक स्टार्ट की।

 

इस बार इंजन पहली कोशिश में चालू हो गया।

 

वह सड़क पर निकल पड़ा।

 

कुछ दूर जाने के बाद उसने पीछे से वही आवाज सुनी—

 

“अमित…”

 

उसने आँखें बंद करके एक पल के लिए साँस रोकी।

 

फिर बाइक और तेज कर दी।

 

आवाज फिर आई।

 

इस बार वह उसकी माँ की आवाज थी।

 

“बेटा… रुक जाओ।”

 

अमित की आँखों में आँसू आ गए।

 

वह जानता था कि उसकी माँ घर पर थीं।

 

फिर भी दिल बार-बार कह रहा था कि शायद सच में माँ उसे पुकार रही हैं।

 

“बेटा… मुझे छोड़कर मत जाओ।”

 

अमित का हाथ ब्रेक की तरफ बढ़ा।

 

तभी उसकी नजर कलाई पर बँधे काले धागे पर पड़ी।

 

उसे बूढ़ी औरत की बात याद आई।

 

“किसी भी आवाज का जवाब मत देना।”

 

उसने ब्रेक नहीं लगाया।

 

कुछ मिनट बाद जंगल खत्म हो गया।

 

सड़क पर स्ट्रीट लाइट दिखाई देने लगीं।

 

अमित को लगा कि वह बच गया।

 

लेकिन तभी उसकी बाइक अपने आप धीमी होने लगी।

 

उसने एक्सीलेटर दबाया।

 

बाइक नहीं बढ़ी।

 

अचानक इंजन बंद हो गया।

 

सामने उसका घर था।

 

अमित ने घर की तरफ देखा।

 

ऊपरी मंजिल की खिड़की में रोशनी जल रही थी।

 

उसका वही कमरा।

 

वह कमरा जो सालों से बंद था।

 

अमित बाइक से उतरा।

 

घर के बाहर उसकी माँ की चप्पलें पड़ी थीं।

 

दरवाजा खुला हुआ था।

 

“माँ?”

 

कोई जवाब नहीं।

 

अमित अंदर गया।

 

घर में अजीब शांति थी।

 

टेबल पर एक गिलास पानी रखा था।

 

टीवी चल रहा था, लेकिन स्क्रीन पर सिर्फ काली-सफेद झिलमिलाहट थी।

 

“माँ?”

 

इस बार ऊपर से आवाज आई—

 

“अमित… मैं ऊपर हूँ।”

 

यह उसकी माँ की आवाज थी।

 

अमित सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।

 

पहली सीढ़ी पर कदम रखते ही उसके मोबाइल में एक संदेश आया।

 

उसने स्क्रीन देखी।

 

संदेश उसकी माँ के नंबर से था।

 

“अमित, घर मत आना।”

 

अमित जम गया।

 

उसने तुरंत ऊपर देखा।

 

“माँ?”

 

ऊपर से कोई जवाब नहीं आया।

 

फिर वही आवाज आई—

 

“अमित… जल्दी ऊपर आओ।”

 

अमित के माथे पर पसीना आ गया।

 

उसने फोन मिलाया।

 

माँ का नंबर व्यस्त था।

 

उसी समय नीचे मुख्य दरवाजा धीरे-धीरे बंद होने लगा।

 

चर्ररर…

 

अमित ने पीछे देखा।

 

दरवाजा पूरी तरह बंद हो चुका था।

 

वह दौड़कर दरवाजे तक गया और हैंडल घुमाया।

 

दरवाजा नहीं खुला।

 

तभी ऊपर से किसी के धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरने की आवाज आने लगी।

 

ठक…

 

ठक…

 

ठक…

 

अमित ने सीढ़ियों की तरफ देखा।

 

ऊपर अंधेरे में कोई खड़ा था।

 

पहले सिर्फ पैर दिखाई दिए।

 

फिर शरीर।

 

फिर चेहरा।

 

वह चेहरा देखकर अमित की साँस रुक गई।

 

वह खुद था।

 

सीढ़ियों पर खड़ा दूसरा अमित धीरे-धीरे मुस्कुरा रहा था।

 

उसने वही कपड़े पहन रखे थे।

 

वही चेहरा।

 

वही आवाज।

 

उसने कहा—

 

“तुम बहुत देर से आए।”

 

अमित पीछे हट गया।

 

“तू कौन है?”

 

दूसरा अमित सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा।

 

“मैं?”

 

वह मुस्कुराया।

 

“मैं वही हूँ, जो आज रात तुम्हारी जगह घर जाएगा।”

 

अमित ने अपनी कलाई की तरफ देखा।

 

काला धागा अभी भी बँधा था।

 

दूसरे अमित ने भी अपनी कलाई दिखाई।

 

उस पर भी वही काला धागा था।

 

अमित के पैरों तले जमीन खिसक गई।

 

फिर दूसरा अमित धीरे से बोला—

 

“तुम्हें लगता है बूढ़ी औरत ने तुम्हें बचाने के लिए वह धागा दिया था?”

 

वह एक कदम और नीचे आया।

 

“नहीं अमित… उसने तुम्हें पहचानने के लिए दिया था।”

 

अमित कुछ बोल नहीं पाया।

 

दूसरे अमित ने मुस्कुराकर कहा—

 

“क्योंकि असली सवाल यह नहीं है कि मैं कौन हूँ।”

 

वह बिल्कुल उसके सामने आ गया।

 

“असली सवाल यह है कि हम दोनों में से… असली अमित कौन है?”

 

उसी क्षण ऊपर वाले बंद कमरे से किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

 

और कमरे के अंदर से एक धीमी आवाज सुनाई दी—

 

“माँ… उसने फिर से पीछे देख लिया।”

 

अमित ने डरकर ऊपर देखा।

 

और पहली बार उसे महसूस हुआ कि इस घर का रहस्य जंगल से भी ज्यादा पुराना है।

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