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पीछे देखना मना है..!!

पढ़ने का समय : 7 मिनट

अमित कुछ पल तक उस बूढ़ी औरत को देखता रहा।

 

उसके चेहरे पर ऐसा डर था, जैसा अमित ने पहले कभी किसी इंसान के चेहरे पर नहीं देखा था।

 

दरवाजा बंद हो चुका था।

 

बाहर बारिश अब पहले से भी तेज हो गई थी।

 

टप-टप की आवाज अब लगातार पड़ती बूंदों की तेज आवाज में बदल चुकी थी। मकान के चारों तरफ अंधेरा था। सिर्फ बूढ़ी औरत के हाथ में पकड़ी लालटेन की पीली रोशनी कमरे के एक छोटे से हिस्से को रोशन कर रही थी।

 

अमित ने घबराकर पूछा,

 

“आपने कहा था कि मैं जिसे रास्ते में छोड़कर आया हूँ, वह वापस आ गया है। आखिर कौन है वो?”

 

बूढ़ी औरत ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

वह धीरे-धीरे कमरे के कोने में गई और एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर बैठ गई।

 

“बैठ जाओ,” उसने कहा।

 

अमित बैठने ही वाला था कि बाहर से दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई।

 

ठक…

 

अमित वहीं रुक गया।

 

बूढ़ी औरत की आँखें दरवाजे पर टिक गईं।

 

फिर दूसरी दस्तक हुई।

 

ठक…

 

ठक…

 

अमित ने धीरे से पूछा,

 

“कौन है?”

 

बूढ़ी औरत ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“चुप!”

 

उसकी उंगलियाँ ठंडी थीं।

 

“कोई आवाज मत करना।”

 

अमित ने हैरानी से उसे देखा।

 

कुछ सेकंड तक बाहर बिल्कुल शांति रही।

 

फिर दरवाजे के दूसरी तरफ से आवाज आई—

 

“अमित…”

 

अमित का दिल जैसे सीने से बाहर निकलने लगा।

 

वह आवाज उसी की थी।

 

बिल्कुल उसकी अपनी आवाज।

 

“दरवाजा खोलो… मैं बाहर हूँ।”

 

अमित के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

 

उसने बूढ़ी औरत की तरफ देखा।

 

वह आँखें बंद करके कुछ बुदबुदा रही थी।

 

“यह तुम्हारी आवाज में क्यों बोल रहा है?” अमित ने फुसफुसाकर पूछा।

 

बूढ़ी औरत ने आँखें खोलीं।

 

“क्योंकि अब यह तुम्हें पहचान चुका है।”

 

“कौन है यह?”

 

“जिसे तुम जानना चाहते हो, उसके बारे में पूछना बंद करो।”

 

बाहर से फिर आवाज आई।

 

“अमित… दरवाजा खोलो।”

 

इस बार आवाज बिल्कुल सामान्य थी।

 

ऐसी जैसे कोई परेशान होकर अपने दोस्त को बुला रहा हो।

 

अमित के दिमाग में अचानक रवि का चेहरा घूम गया।

 

“रवि!”

 

उसने कहा,

 

“शायद मेरा दोस्त मुझे ढूँढते हुए यहाँ आया है।”

 

बूढ़ी औरत ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया।

 

“तुम्हारा दोस्त यहाँ नहीं है।”

 

“लेकिन आवाज—”

 

“वह आवाज तुम्हारे दोस्त की भी हो सकती है।”

 

अमित चुप हो गया।

 

बाहर अचानक किसी ने दरवाजे को खरोंचना शुरू कर दिया।

 

खर्र…

 

खर्र…

 

खर्र…

 

ऐसा लग रहा था जैसे कोई अपने लंबे नाखून लकड़ी पर घिस रहा हो।

 

अमित ने डरकर पीछे कदम किया।

 

“मैं यहाँ से जाना चाहता हूँ।”

 

बूढ़ी औरत ने कहा,

 

“अभी नहीं।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि अगर तुमने इस समय दरवाजा खोला, तो तुम अकेले नहीं जाओगे।”

 

अमित कुछ समझ नहीं पाया।

 

“क्या मतलब?”

 

बूढ़ी औरत ने सामने दीवार की तरफ इशारा किया।

 

वहाँ कई पुराने कागज टंगे हुए थे।

 

हर कागज पर किसी इंसान का नाम लिखा था।

 

अमित धीरे-धीरे उनके पास गया।

 

पहला नाम था—

 

रमेश — 1998

 

दूसरा—

 

सुरेश — 2003

 

तीसरा—

 

नरेश — 2007

 

फिर कई नाम।

 

कुछ नामों के आगे तारीखें थीं।

 

लेकिन आखिरी कागज देखकर अमित की साँस रुक गई।

 

उस पर लिखा था—

 

अमित — 15 अगस्त 2026

 

उसने पीछे मुड़कर बूढ़ी औरत को देखा।

 

“यह क्या है?”

 

बूढ़ी औरत ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

“यह मेरा नाम है।”

 

“मुझे पता है।”

 

“और आज की तारीख भी।”

 

“मुझे यह भी पता है।”

 

अमित की आवाज काँपने लगी।

 

“आपको कैसे पता?”

 

बूढ़ी औरत धीरे-धीरे उठी।

 

“क्योंकि तुम पहले नहीं हो।”

 

“क्या?”

 

“हर कुछ साल में कोई न कोई उस रास्ते से गुजरता है।”

 

वह दीवार पर लगे पुराने कागजों की तरफ देखने लगी।

 

“उसे पीछे से कोई पुकारता है। वह आवाज सुनता है। अगर वह पीछे मुड़कर देख ले… तो फिर वह कभी अपने घर नहीं पहुँचता।”

 

अमित ने पूछा,

 

“और अगर पीछे न देखे?”

 

बूढ़ी औरत कुछ देर चुप रही।

 

फिर बोली,

 

“तो वह मेरे घर तक पहुँच जाता है।”

 

“फिर?”

 

“फिर सुबह होने तक उसे यहाँ रहना पड़ता है।”

 

“और उसके बाद?”

 

बूढ़ी औरत ने उसकी आँखों में देखा।

 

“उसके बाद फैसला होता है कि वह वापस जाएगा या नहीं।”

 

अमित को लगा जैसे उसका सिर घूम रहा है।

 

“किसका फैसला?”

 

बूढ़ी औरत ने जवाब नहीं दिया।

 

उसी समय ऊपर की मंजिल से किसी चीज के गिरने की आवाज आई।

 

धड़ाम!

 

अमित उछल पड़ा।

 

“ऊपर कौन है?”

 

बूढ़ी औरत ने तुरंत कहा,

 

“कोई नहीं।”

 

“लेकिन आवाज तो—”

 

“ऊपर मत जाना।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि वहाँ जो रहता है, वह इंसान नहीं है।”

 

अमित की नजर सीढ़ियों पर गई।

 

लकड़ी की पुरानी सीढ़ियाँ अंधेरे में गायब हो रही थीं।

 

उसे ऐसा लगा जैसे ऊपर कोई खड़ा उसे देख रहा है।

 

“मुझे कोई दिखाई दे रहा है,” अमित ने कहा।

 

बूढ़ी औरत ने उसकी तरफ देखा।

 

“क्या?”

 

“सीढ़ियों के ऊपर…”

 

वह धीरे-धीरे ऊपर देखने लगी।

 

अचानक उसका चेहरा बदल गया।

 

“नीचे आओ!”

 

अमित पीछे हट गया।

 

ऊपर सीढ़ियों के अंतिम पायदान पर एक काली परछाईं खड़ी थी।

 

वह बिल्कुल स्थिर थी।

 

चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

 

लेकिन उसकी दो सफेद आँखें साफ दिखाई दे रही थीं।

 

अमित की साँस अटक गई।

 

परछाईं ने धीरे-धीरे सिर झुकाया।

 

फिर उसी आवाज में बोली—

 

“अमित…”

 

अमित ने कान बंद कर लिए।

 

बूढ़ी औरत ने लालटेन उठाई और तेज आवाज में कुछ मंत्र जैसा बोलना शुरू कर दिया।

 

परछाईं अचानक गायब हो गई।

 

कुछ सेकंड बाद ऊपर से किसी के भागने की आवाज आई।

 

धड़…

 

धड़…

 

धड़…

 

फिर सब शांत हो गया।

 

अमित ने काँपते हुए पूछा,

 

“वह क्या था?”

 

बूढ़ी औरत ने कहा,

 

“तुम्हारा पीछा करने वाला।”

 

“लेकिन वह ऊपर कैसे पहुँच गया?”

 

“वह जहाँ चाहे पहुँच सकता है।”

 

अमित की आँखों में आँसू आ गए।

 

“मैंने उसका क्या बिगाड़ा है?”

 

बूढ़ी औरत ने उसकी तरफ देखा।

 

“कुछ नहीं।”

 

“फिर वह मेरे पीछे क्यों पड़ा है?”

 

बूढ़ी औरत कुछ देर चुप रही।

 

फिर उसने दीवार पर लगे अमित के नाम वाले कागज को उतार लिया।

 

कागज के पीछे कुछ लिखा था।

 

उसने अमित को वह कागज दिया।

 

पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

 

“जिसने तुम्हें रास्ते पर पुकारा, वह तुम्हें लेने नहीं आया था।”

 

अमित ने पढ़कर पूछा,

 

“तो फिर?”

 

बूढ़ी औरत ने बहुत धीमी आवाज में कहा—

 

“वह तुम्हें घर तक पहुँचाना चाहता था।”

 

अमित ने हैरानी से पूछा,

 

“घर तक?”

 

“हाँ।”

 

“लेकिन क्यों?”

 

बूढ़ी औरत ने दरवाजे की तरफ देखा।

 

फिर बोली—

 

“क्योंकि असली खतरा इस जंगल में नहीं है।”

 

अमित ने धीरे से पूछा,

 

“तो कहाँ है?”

 

बूढ़ी औरत ने उसकी ओर देखा।

 

“तुम्हारे घर में।”

 

अमित का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

तभी उसकी जेब में रखा मोबाइल अचानक बज उठा।

 

ट्रिन…

 

ट्रिन…

 

ट्रिन…

 

कमरे में मौजूद दोनों लोग जम गए।

 

अमित ने काँपते हाथों से मोबाइल निकाला।

 

स्क्रीन पर उसके घर का नंबर दिखाई दे रहा था।

 

माँ कॉल कर रही थीं।

 

अमित ने कॉल उठाई।

 

दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक सिर्फ सन्नाटा था।

 

फिर उसकी माँ की घबराई हुई आवाज सुनाई दी—

 

“अमित… बेटा, तुम कहाँ हो?”

 

“माँ, मैं रास्ते में हूँ।”

 

दूसरी तरफ कुछ पल खामोशी रही।

 

फिर माँ ने काँपती आवाज में कहा—

 

“नहीं बेटा… तुम रास्ते में नहीं हो।”

 

अमित का दिल बैठ गया।

 

“क्या मतलब?”

 

माँ ने कहा—

 

“तुम्हारा कमरा अंदर से बंद है।”

 

अमित कुछ बोल नहीं पाया।

 

फिर उसकी माँ फुसफुसाईं—

 

“और अंदर से तुम्हारी आवाज आ रही है।”

 

कॉल अचानक कट गई।

 

अमित ने धीरे-धीरे बूढ़ी औरत की तरफ देखा।

 

बूढ़ी औरत ने सिर्फ इतना कहा—

 

“अब तुम्हें समझ आया कि पीछे देखना मना क्यों है?”

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