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लेखक: Alka Singh

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Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

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  • 😱भानगढ़ का किला😱 भाग 1 — किले में पहली रात😱

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    राजस्थान की सूखी पहाड़ियों के बीच बसा भानगढ़ का किला दिन में भी किसी रहस्य से कम नहीं लगता था।

     

    ऊँची-ऊँची टूटी दीवारें, सुनसान गलियाँ, पुराने महल के खंडहर और दूर तक फैली वीरानी…

     

    लेकिन शाम होते ही उस जगह का माहौल पूरी तरह बदल जाता था।

     

    स्थानीय लोग कहते थे कि सूरज ढलने के बाद किले के अंदर कोई नहीं जाता।

     

    क्योंकि रात में वहाँ से पायल की आवाज़ आती थी।

     

    कभी किसी औरत के रोने की।

     

    और कभी…

     

    किसी के धीरे-धीरे अपना नाम पुकारने की।

     

    लेकिन आदित्य इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।

     

    वह एक युवा डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता था और उसे भारत की रहस्यमयी ऐतिहासिक जगहों पर फिल्में बनाना पसंद था।

     

    उसके साथ उसकी दोस्त मीरा, कैमरा संभालने वाला कबीर और स्थानीय गाइड गोपाल थे।

     

    गोपाल ने किले के मुख्य रास्ते पर पहुँचते ही कहा—

     

    “एक बात पहले ही बता देता हूँ। सूरज डूबने के बाद हम यहाँ नहीं रुकेंगे।”

     

    कबीर हँस पड़ा।

     

    “क्यों? भूत पकड़ लेगा?”

     

    गोपाल ने उसकी तरफ देखा।

     

    “भूत से ज्यादा डर उस चीज़ का है जो खुद को भूत नहीं मानती।”

     

    कबीर की हँसी अचानक रुक गई।

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “हमें सिर्फ कुछ फुटेज चाहिए। अगर अंधेरा होने लगेगा तो निकल जाएँगे।”

     

    गोपाल ने सिर हिला दिया।

     

    चारों किले के अंदर जाने लगे।

     

    जैसे-जैसे वे आगे बढ़े, मोबाइल नेटवर्क गायब हो गया।

     

    हवा भी अजीब तरह से ठंडी लग रही थी।

     

    किले के पुराने बाजार के खंडहरों के बीच से गुजरते हुए मीरा ने एक टूटी हुई दुकान की दीवार पर कुछ देखा।

     

    वहाँ लाल रंग से एक निशान बना था।

     

    “ये क्या है?”

     

    गोपाल ने निशान देखा और तुरंत दूसरी तरफ देखने लगा।

     

    “इसे मत छूना।”

     

    आदित्य ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    गोपाल ने जवाब नहीं दिया।

     

    कुछ दूर जाने के बाद वे महल के पास पहुँचे।

     

    महल का एक हिस्सा बाकी जगहों से अलग था।

     

    उसकी दीवारें काली थीं।

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “यहाँ रात में कोई नहीं आता।”

     

    आदित्य ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    गोपाल ने धीरे से कहा—

     

    “कहते हैं इसी हिस्से में राजदरबार की एक दासी रहती थी। उसका नाम था रूहानी।”

     

    मीरा ने पूछा—

     

    “रूहानी?”

     

    “हाँ। लोग कहते हैं वह बहुत खूबसूरत थी। एक तांत्रिक उस पर मोहित हो गया था। उसने रूहानी को पाने के लिए जादू किया।”

     

    आदित्य मुस्कुराया।

     

    “ये तो पुरानी लोककथा है।”

     

    गोपाल बोला—

     

    “लोककथा हो या सच… लेकिन उस रात किले में बहुत कुछ हुआ था।”

     

    “क्या?”

     

    “रूहानी ने तांत्रिक का विरोध किया। तांत्रिक ने गुस्से में किले को श्राप दे दिया।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    गोपाल कुछ कहता, उससे पहले अचानक ऊपर से पत्थर गिरा।

     

    धड़ाम!

     

    सभी चौंक गए।

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “हमें वापस चलना चाहिए।”

     

    लेकिन आदित्य ने कैमरा ऊपर कर दिया।

     

    “यही तो हमें चाहिए।”

     

    उन्होंने शूटिंग जारी रखी।

     

    शाम होने लगी।

     

    आसमान नारंगी से धीरे-धीरे काला होने लगा।

     

    गोपाल बार-बार घड़ी देख रहा था।

     

    “हमें अब निकलना होगा।”

     

    लेकिन तभी कैमरे में कुछ दिखाई दिया।

     

    मीरा ने स्क्रीन देखी।

     

    “आदित्य…”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “वहाँ कौन खड़ा है?”

     

    कैमरे में उनसे लगभग पचास मीटर दूर एक महिला खड़ी दिखाई दे रही थी।

     

    उसने सफेद कपड़े पहन रखे थे।

     

    बाल बहुत लंबे थे।

     

    चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    आदित्य ने कैमरा नीचे किया।

     

    सामने कोई नहीं था।

     

    फिर कैमरा स्क्रीन पर देखा।

     

    महिला अभी भी वहीं थी।

     

    “ये कैसे संभव है?”

     

    कबीर ने कैमरा लिया।

     

    तभी स्क्रीन पर महिला ने अपना सिर उठाया।

     

    और सीधे कैमरे की तरफ देखने लगी।

     

    कबीर के हाथ काँप गए।

     

    “आदित्य… इसे बंद कर।”

     

    स्क्रीन अचानक काली हो गई।

     

    उसी समय दूर से पायल की आवाज़ सुनाई दी।

     

    छन… छन… छन…

     

    गोपाल का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “भागो।”

     

    चारों तेजी से मुख्य द्वार की तरफ भागे।

     

    लेकिन रास्ता जैसे बदल गया था।

     

    जिस रास्ते से वे आए थे, वहाँ अब एक ऊँची दीवार खड़ी थी।

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “ये रास्ता तो यहाँ था!”

     

    गोपाल ने घबराकर कहा—

     

    “किला रास्ते बदलता नहीं… हमें भटका रहा है।”

     

    अचानक पीछे से किसी औरत की आवाज़ आई—

     

    “रुक जाओ…”

     

    चारों जम गए।

     

    आवाज़ बहुत पास से आई थी।

     

    मीरा ने धीरे से पीछे देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    फिर वही आवाज़ दूसरी तरफ से आई—

     

    “मीरा…”

     

    मीरा के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “इसे मेरा नाम कैसे पता?”

     

    आदित्य ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मेरे पीछे रहो।”

     

    वे एक टूटे हुए कमरे में घुस गए।

     

    कमरे का दरवाज़ा उन्होंने अंदर से बंद कर लिया।

     

    कुछ सेकंड तक बाहर सन्नाटा रहा।

     

    फिर…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    दरवाज़े पर तीन बार दस्तक हुई।

     

    कबीर ने फुसफुसाकर पूछा—

     

    “कौन है?”

     

    बाहर से जवाब आया—

     

    “गोपाल…”

     

    गोपाल ने घबराकर कहा—

     

    “मैं यहाँ हूँ।”

     

    दरवाज़े के बाहर से फिर आवाज़ आई—

     

    “दरवाज़ा खोलो।”

     

    गोपाल आगे बढ़ा।

     

    आदित्य ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “रुको।”

     

    “वो मेरी आवाज़ है,” गोपाल ने कहा।

     

    आदित्य ने धीरे से पूछा—

     

    “अगर तुम अंदर हो… तो बाहर कौन बोल रहा है?”

     

    गोपाल पीछे हट गया।

     

    कुछ पल बाद बाहर से वही आवाज़ बदल गई।

     

    अब वह आदित्य की आवाज़ थी।

     

    “गोपाल, दरवाज़ा खोलो।”

     

    फिर कबीर की।

     

    “जल्दी खोलो!”

     

    फिर मीरा की।

     

    “मुझे डर लग रहा है।”

     

    मीरा ने अपने कान बंद कर लिए।

     

    बाहर से अचानक जोर-जोर से हँसी आने लगी।

     

    दरवाज़ा हिलने लगा।

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “ये हमें अंदर आने के लिए मजबूर कर रहा है।”

     

    आदित्य ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    गोपाल ने जवाब दिया—

     

    “किले का श्राप।”

     

    अचानक कमरे की दीवार पर एक काला निशान उभर आया।

     

    वही निशान जो उन्होंने रास्ते में देखा था।

     

    लेकिन इस बार उसके नीचे एक शब्द लिखा था—

     

    “रूहानी।”

     

    मीरा ने डरते हुए कहा—

     

    “ये नाम किसका है?”

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “जिससे हमें डरना चाहिए था।”

     

    उसी समय कमरे की छत से धूल गिरने लगी।

     

    और फर्श के नीचे से किसी महिला की धीमी आवाज़ आई—

     

    “तुम लोग बहुत देर से आए हो…”

     

    आदित्य ने नीचे देखा।

     

    फर्श के बीच एक पतली दरार बन चुकी थी।

     

    उस दरार के अंदर से सफेद रोशनी निकल रही थी।

     

    और फिर…

     

    एक हाथ धीरे-धीरे जमीन से बाहर आया।

     

    चारों चीख पड़े।

     

    हाथ के साथ एक चाँदी की पायल भी बाहर निकली।

     

    आदित्य ने पायल को देखा।

     

    उसी क्षण उसके कैमरे की स्क्रीन अपने आप चालू हो गई।

     

    स्क्रीन पर एक दृश्य दिखाई दिया।

     

    एक पुराना महल।

     

    एक महिला भाग रही थी।

     

    उसके पीछे एक आदमी मंत्र पढ़ रहा था।

     

    और महिला चिल्ला रही थी—

     

    “मुझे छोड़ दो!”

     

    फिर दृश्य बदल गया।

     

    महिला ने कैमरे की तरफ देखा।

     

    वह रूहानी थी।

     

    उसके होंठ हिले।

     

    आवाज़ बहुत धीमी थी—

     

    “मुझे श्राप नहीं दिया गया था…”

     

    फिर स्क्रीन काली हो गई।

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “उसने क्या कहा?”

     

    मीरा ने काँपते हुए जवाब दिया—

     

    “उसने कहा… उसे श्राप नहीं दिया गया था।”

     

    बाहर अचानक तेज़ हवा चलने लगी।

     

    दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

     

    सामने कोई नहीं था।

     

    लेकिन जमीन पर गीले पैरों के निशान बने थे।

     

    वे निशान धीरे-धीरे आगे जा रहे थे।

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “अब हमें उस जगह जाना होगा जहाँ ये निशान जा रहे हैं।”

     

    आदित्य ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    गोपाल ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि अगर हमने रूहानी की कहानी नहीं समझी…”

     

    वह कुछ पल रुका।

     

    “तो शायद हम इस किले से कभी बाहर नहीं निकल पाएँगे।”

     

    और चारों उन रहस्यमयी पैरों के निशानों का पीछा करते हुए किले के उस हिस्से की ओर बढ़ गए…

     

    जहाँ पिछले सौ साल से कोई नहीं गया था।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱राजगीर की आखिरी हवेली 😱 भाग 3 — आखिरी रात😱

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    कमरे में अंधेरा गहराता जा रहा था।

     

    राघव, अमन और छोटू दीवार से सटे खड़े थे।

     

    सामने उसके पिता के रूप में खड़ा वह साया धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ रहा था।

     

    उसकी आवाज़ बिल्कुल सुरेश जैसी थी।

     

    “राघव… मेरे पास आओ।”

     

    राघव के कदम पीछे हट गए।

     

    “तुम मेरे पिता नहीं हो।”

     

    साया मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    राघव ने कहा—

     

    “क्योंकि मेरे पिता मुझे कभी इस तरह नहीं बुलाते थे।”

     

    साया कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसका चेहरा विकृत होने लगा।

     

    अनामिका ने कहा—

     

    “इसे मत देखना।”

     

    राघव ने पूछा—

     

    “इसे कैसे खत्म करें?”

     

    अनामिका बोली—

     

    “हवेली के डर को खत्म करना होगा।”

     

    “कैसे?”

     

    “जिस याद से यह पैदा हुआ है, उसे स्वीकार करके।”

     

    राघव को डायरी याद आई।

     

    उसने अपने पिता की आखिरी डायरी का फटा हुआ हिस्सा ढूँढना शुरू किया।

     

    कुछ देर बाद उसे मेज के नीचे एक पुराना कागज़ मिला।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “मैंने उस बच्ची को बचाने की कोशिश नहीं की। मैं डर गया था। लेकिन मैंने उसके डर को हमेशा के लिए अपने बेटे से दूर रखने की कोशिश की।”

     

    राघव की आँखें भर आईं।

     

    “मेरे पिता…”

     

    अनामिका ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता बुरे नहीं थे। लेकिन उन्होंने गलती की थी।”

     

    “उन्होंने तुम्हें क्यों छोड़ा?”

     

    “क्योंकि उस रात उन्हें चुनना था। मुझे बचाना या खुद बचना।”

     

    राघव ने पूछा—

     

    “और उन्होंने खुद को चुना?”

     

    अनामिका ने सिर झुका लिया।

     

    “हाँ।”

     

    कमरे में अचानक एक जोरदार चीख गूँजी।

     

    साया दीवार से टकराया।

     

    “झूठ!”

     

    उसकी आवाज़ पूरे कमरे में फैल गई।

     

    “उसने मुझे नहीं छोड़ा था। मैंने उसे छोड़ा था।”

     

    राघव चौंका।

     

    “क्या?”

     

    अनामिका ने उसकी ओर देखा।

     

    “तुम्हारे पिता ने आखिरी समय पर मुझे बाहर निकाल दिया था।”

     

    राघव ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    “लेकिन जब वह मुझे लेकर भाग रहे थे, हवेली के मालिक ने उन्हें पकड़ लिया।”

     

    “फिर क्या हुआ?”

     

    “उसने तुम्हारे पिता को धमकी दी कि अगर वह मुझे बाहर ले गए तो वह तुम्हारे परिवार को नुकसान पहुँचाएगा।”

     

    राघव की साँस रुक गई।

     

    “मेरे परिवार को?”

     

    अनामिका ने कहा—

     

    “तुम तब छोटे बच्चे थे।”

     

    “इसलिए मेरे पिता ने…”

     

    “हाँ। उन्होंने मुझे वापस कमरे में बंद कर दिया।”

     

    राघव की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “और तुम मर गईं।”

     

    अनामिका ने सिर हिलाया।

     

    “लेकिन मरते समय मैंने उसे माफ कर दिया था।”

     

    साया अचानक चीखने लगा।

     

    “नहीं!”

     

    अनामिका ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारी शक्ति मेरी नफरत से थी।”

     

    “और अब मेरे अंदर नफरत नहीं है।”

     

    साया पीछे हटने लगा।

     

    राघव को अचानक समझ आया।

     

    यह साया अनामिका की आत्मा नहीं था।

     

    यह उसके डर, गुस्से और अधूरे दर्द से पैदा हुई एक अलग शक्ति थी।

     

    राघव ने कहा—

     

    “तो हमें इसे नष्ट नहीं करना।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    “इसे सच बताना होगा।”

     

    राघव साए के सामने खड़ा हो गया।

     

    “तुम अनामिका नहीं हो।”

     

    साया चीखा—

     

    “मैं वही हूँ!”

     

    “नहीं।”

     

    राघव ने कहा—

     

    “तुम उसके डर हो।”

     

    साया पीछे हट गया।

     

    “तुम उसके दर्द हो।”

     

    साया का शरीर काँपने लगा।

     

    “तुम उसकी मौत नहीं हो।”

     

    राघव की आवाज़ और मजबूत हो गई।

     

    “और अब कोई तुमसे नहीं डरेगा।”

     

    साया ने जोर से चीख मारी।

     

    पूरी हवेली काँपने लगी।

     

    छत से पत्थर गिरने लगे।

     

    दरवाज़े अपने आप खुलने लगे।

     

    दीवारों पर लगी सारी तस्वीरें नीचे गिर गईं।

     

    छोटू रोने लगा।

     

    अमन ने उसे पकड़ लिया।

     

    तभी कमरे के बीच अनामिका दिखाई दी।

     

    उसने राघव की ओर हाथ बढ़ाया।

     

    “मुझे बाहर ले चलो।”

     

    राघव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    उसका हाथ बर्फ जैसा ठंडा था।

     

    दोनों कमरे से बाहर निकले।

     

    अमन और छोटू उनके पीछे थे।

     

    साया लगातार उनका पीछा कर रहा था।

     

    वे सीढ़ियों से नीचे भागे।

     

    मुख्य दरवाज़ा दिखाई दे रहा था।

     

    लेकिन दरवाज़े के सामने वही काला साया खड़ा था।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम बाहर नहीं जा सकते।”

     

    राघव रुका।

     

    अनामिका उसके पीछे खड़ी थी।

     

    उसने कहा—

     

    “राघव…”

     

    “तुम्हें मेरी एक मदद करनी होगी।”

     

    “क्या?”

     

    “मेरी आखिरी चीज़ बाहर ले जाओ।”

     

    उसने अपनी गर्दन से लॉकेट उतारकर राघव को दे दिया।

     

    “इसे उस जगह ले जाना जहाँ मेरे पिता ने मुझे पहली बार बंद किया था।”

     

    राघव ने पूछा—

     

    “वहीं क्यों?”

     

    “क्योंकि मेरी कहानी वहीं खत्म हुई थी।”

     

    “और अब?”

     

    “वहीं से मेरी कहानी आजाद होगी।”

     

    राघव ने लॉकेट कसकर पकड़ लिया।

     

    वह दरवाज़े की तरफ दौड़ा।

     

    साया उसके पीछे आया।

     

    अचानक अनामिका साए के सामने खड़ी हो गई।

     

    “इसे जाने दो।”

     

    साया गरजा—

     

    “तुम मुझे रोक नहीं सकती!”

     

    अनामिका मुस्कुराई।

     

    “मैं अकेली नहीं हूँ।”

     

    तभी हवेली की दीवारों पर लगी पुरानी तस्वीरों से एक-एक करके रोशनी निकलने लगी।

     

    उन तस्वीरों में दिखाई देने वाले सभी लोग धीरे-धीरे अनामिका के पीछे खड़े हो गए।

     

    जैसे वे वर्षों से इसी क्षण का इंतजार कर रहे हों।

     

    साया पीछे हट गया।

     

    राघव, अमन और छोटू हवेली से बाहर निकल गए।

     

    जैसे ही राघव ने लॉकेट जमीन पर रखा…

     

    पूरी हवेली के अंदर से एक जोरदार चीख सुनाई दी।

     

    फिर…

     

    सन्नाटा।

     

    कई सेकंड तक कोई आवाज़ नहीं आई।

     

    हवेली की खिड़कियों में जलती हुई रोशनी एक-एक करके बुझ गई।

     

    और फिर मुख्य दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    राघव ने हवेली की ओर देखा।

     

    पहली मंजिल की खिड़की में अनामिका खड़ी थी।

     

    उसने मुस्कुराकर हाथ हिलाया।

     

    फिर वह धीरे-धीरे गायब हो गई।

     

    सुबह होने तक हवेली बिल्कुल शांत हो चुकी थी।

     

    गाँव के लोग वहाँ पहुँचे।

     

    रामजी ने हवेली को देखा और कई वर्षों बाद पहली बार उसके अंदर कदम रखा।

     

    “अब कुछ नहीं है,” उन्होंने कहा।

     

    राघव ने पूछा—

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    रामजी मुस्कुराए।

     

    “क्योंकि इतने सालों में पहली बार मुझे यहाँ डर नहीं लग रहा।”

     

    कुछ दिनों बाद राघव पटना लौट गया।

     

    उसने इस घटना पर एक किताब लिखने का फैसला किया।

     

    लेकिन उसने कहानी का अंत बदल दिया।

     

    उसने लिखा—

     

    “हर भूत बदला लेने नहीं लौटता। कुछ आत्माएँ सिर्फ इसलिए लौटती हैं ताकि उनकी अधूरी कहानी पूरी हो सके।”

     

    कई महीनों बाद राघव को गाँव से एक पत्र मिला।

     

    पत्र में सिर्फ एक फोटो थी।

     

    वह सिंह हवेली की थी।

     

    लेकिन फोटो देखकर राघव के हाथ काँपने लगे।

     

    फोटो में हवेली बिल्कुल साफ दिखाई दे रही थी।

     

    सारी खिड़कियाँ बंद थीं।

     

    लेकिन पहली मंजिल की खिड़की पर…

     

    एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    उसके चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    फोटो के पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “अब मुझे डर नहीं लगता।”

     

    राघव समझ गया।

     

    अनामिका आखिरकार आज़ाद हो चुकी थी।

     

    और सिंह हवेली का वह डर…

     

    जिसने वर्षों तक पूरे गाँव को अपने कब्जे में रखा था…

     

    हमेशा के लिए खत्म हो गया था।

     

    लेकिन उस दिन के बाद गाँव वालों ने एक बात जरूर देखी।

     

    हवेली के बंद कमरे नंबर 13 के बाहर हर अमावस्या की रात…

     

    एक छोटी-सी लाल गुड़िया रखी मिलती थी।

     

    कोई नहीं जानता था कि उसे वहाँ कौन रखता था।

     

    लेकिन उसके साथ हमेशा एक छोटा-सा कागज़ होता था।

     

    उस पर लिखा रहता—

     

    “जिससे डरते हो, उसका सामना करो। क्योंकि कई बार अंधेरे में छिपा राक्षस नहीं… सिर्फ एक अधूरी कहानी होती है।”

     

    और इस तरह…

     

    राजगीर की उस आखिरी हवेली का रहस्य हमेशा के लिए खत्म हो गया।

     

    समाप्त।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱राजगीर की आखिरी हवेली😱 भाग 2 — बंद कमरे का राज😱

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    राघव कुछ सेकंड तक हवेली के बंद दरवाज़े को देखता रहा।

     

    अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “राघव, हमें पुलिस के पास जाना चाहिए।”

     

    राघव ने सिर हिलाया।

     

    “छोटू अंदर है।”

     

    “लेकिन हम अंदर गए तो हम भी फँस सकते हैं।”

     

    राघव ने कहा—

     

    “वह बच्चा है। मैं उसे अकेला नहीं छोड़ सकता।”

     

    दोनों फिर हवेली के अंदर चले गए।

     

    इस बार अंदर पहले से ज्यादा अंधेरा था।

     

    मुख्य दरवाज़ा उनके पीछे अपने आप बंद हो गया।

     

    अमन ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    “छोटू!”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    फिर ऊपर से आवाज़ आई—

     

    “भैया…”

     

    दोनों सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।

     

    पहली मंजिल पर पहुँचकर राघव रुक गया।

     

    गलियारे के दोनों तरफ कई कमरे थे।

     

    लेकिन सभी दरवाज़े खुले थे।

     

    सिर्फ कमरा नंबर 13 बंद था।

     

    राघव ने पूछा—

     

    “छोटू कहाँ गया होगा?”

     

    अमन ने कहा—

     

    “शायद उसी कमरे में।”

     

    दरवाज़े के नीचे से हल्की रोशनी आ रही थी।

     

    राघव ने धीरे से दरवाज़ा खोला।

     

    कमरा खाली था।

     

    लेकिन फर्श पर छोटे-छोटे पैरों के निशान बने थे।

     

    वे निशान कमरे की पिछली दीवार तक जा रहे थे।

     

    राघव ने दीवार पर हाथ रखा।

     

    उसे अंदर से आवाज़ सुनाई दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    अमन ने पूछा—

     

    “दीवार के पीछे कोई है?”

     

    राघव ने जोर से दीवार थपथपाई।

     

    अंदर से जवाब आया।

     

    ठक… ठक…

     

    फिर छोटू की आवाज़—

     

    “भैया…”

     

    राघव चिल्लाया—

     

    “छोटू! डरो मत। हम तुम्हें निकालेंगे।”

     

    अंदर से छोटू रोते हुए बोला—

     

    “जल्दी करो…”

     

    “यहाँ कोई और भी है।”

     

    राघव और अमन ने दीवार के पास की पुरानी अलमारी हटाई।

     

    उसके पीछे लकड़ी का एक छोटा दरवाज़ा था।

     

    दरवाज़ा खोलते ही संकरी सुरंग दिखाई दी।

     

    अंदर से सड़ी हुई मिट्टी की गंध आ रही थी।

     

    अमन ने कहा—

     

    “ये हवेली के नीचे जाती है।”

     

    दोनों सुरंग में उतर गए।

     

    कुछ दूर जाने के बाद उन्हें छोटू दिखाई दिया।

     

    वह एक कोने में बैठा काँप रहा था।

     

    राघव उसके पास पहुँचा।

     

    “छोटू!”

     

    छोटू ने उसे पकड़ लिया।

     

    “भैया, मुझे यहाँ एक लड़की लाई थी।”

     

    “कौन लड़की?”

     

    “वही… काली आँखों वाली।”

     

    राघव ने पूछा—

     

    “उसने तुम्हारे साथ क्या किया?”

     

    छोटू ने सामने की तरफ इशारा किया।

     

    “वो वहाँ गई है।”

     

    सुरंग के आखिरी हिस्से में एक बड़ा कमरा था।

     

    कमरे की दीवारों पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।

     

    कुछ बहुत पुरानी।

     

    कुछ नई।

     

    राघव ने एक तस्वीर उठाई।

     

    उसमें गाँव के लोग थे।

     

    एक तस्वीर में रामजी चायवाला भी था।

     

    दूसरी में राघव के पिता।

     

    राघव का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “मेरे पिता यहाँ क्यों हैं?”

     

    अमन ने दूसरी तस्वीर उठाई।

     

    “देख…”

     

    तस्वीर में राघव के पिता के साथ एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    वही लड़की।

     

    काली आँखों वाली।

     

    पीछे तारीख लिखी थी—

     

    1999।

     

    राघव को याद आया कि उसके पिता कई वर्षों तक इसी इलाके में काम करते थे।

     

    लेकिन उन्होंने कभी इस हवेली का जिक्र नहीं किया था।

     

    कमरे के बीच में एक पुरानी मेज थी।

     

    उस पर एक डायरी रखी थी।

     

    डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “यह कहानी उस रात से शुरू हुई जब मैंने अपनी बेटी को खो दिया।”

     

    राघव ने डायरी पढ़ना शुरू किया।

     

    डायरी उसके पिता की थी।

     

    उसमें लिखा था—

     

    “मेरा नाम सुरेश है। वर्ष 1999 में मुझे इस हवेली में एक रात रुकना पड़ा। उस रात मैंने एक छोटी लड़की को देखा। उसका नाम था अनामिका।”

     

    राघव का हाथ काँपने लगा।

     

    आगे लिखा था—

     

    “अनामिका इस हवेली में रहने वाले परिवार की बेटी थी। लेकिन उसके माता-पिता कहते थे कि वह पैदा होने के बाद ही मर गई थी।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “तो यह लड़की कौन थी?”

     

    राघव पढ़ता गया।

     

    “मैंने उसे रात में गलियारे में खेलते देखा। उसने मुझसे कहा कि उसके माता-पिता ने उसे कमरे नंबर 13 में बंद कर दिया है।”

     

    अगला पन्ना फटा हुआ था।

     

    फिर लिखा था—

     

    “मैंने दरवाज़ा खोला। अंदर एक बच्ची थी। लेकिन जैसे ही मैंने उसका हाथ पकड़ा, उसने मेरी तरफ देखकर कहा—’आप मेरे पापा नहीं हैं।’”

     

    राघव ने पढ़ना बंद कर दिया।

     

    “फिर?”

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “मैंने पीछे देखा। कमरे में एक आदमी खड़ा था। उसका चेहरा बिल्कुल मेरे जैसा था।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “ये तो…”

     

    राघव ने अगला पन्ना पलटा।

     

    “उसने कहा—’जिस दिन तुमने उसे देखा, उसी दिन से वह तुम्हारे पीछे आएगी।’”

     

    इसके बाद कई पन्नों पर सिर्फ एक ही वाक्य लिखा था—

     

    “उसे घर मत ले जाना।”

     

    राघव ने डायरी बंद कर दी।

     

    तभी कमरे की लाइट अपने आप जल गई।

     

    सामने अनामिका खड़ी थी।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता ने मुझे बचाने की कोशिश की थी।”

     

    राघव ने पूछा—

     

    “फिर उन्होंने मुझे क्यों नहीं बताया?”

     

    “क्योंकि उन्होंने तुम्हें बचाने के लिए सब कुछ भूलने का फैसला किया।”

     

    “तुम कौन हो?”

     

    लड़की ने कहा—

     

    “मैं इस हवेली की बेटी नहीं हूँ।”

     

    “फिर?”

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “मैं वह हूँ जिसे इस हवेली ने बनाया है।”

     

    कमरे की दीवारें हिलने लगीं।

     

    अनामिका बोली—

     

    “बहुत साल पहले यहाँ एक आदमी ने अपने परिवार को धोखा दिया। उसने अपनी संपत्ति बचाने के लिए अपनी ही बेटी को कमरे में बंद कर दिया।”

     

    “वह लड़की मर गई?”

     

    “हाँ।”

     

    “और फिर?”

     

    “उसका डर हवेली में रह गया।”

     

    राघव ने पूछा—

     

    “लेकिन तुम?”

     

    अनामिका ने कहा—

     

    “मैं उसी डर का चेहरा हूँ।”

     

    अचानक उसके चेहरे की त्वचा काली पड़ने लगी।

     

    उसकी आँखें और बड़ी हो गईं।

     

    वह चीखने लगी—

     

    “हर वह व्यक्ति जो इस कमरे का दरवाज़ा खोलता है… उसका डर मेरा हिस्सा बन जाता है!”

     

    अमन ने छोटू को पीछे किया।

     

    “राघव, भाग!”

     

    लेकिन राघव वहीं खड़ा रहा।

     

    “तुम मुझे यहाँ क्यों लाई?”

     

    अनामिका शांत हो गई।

     

    उसने कहा—

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता ने मुझे खत्म करने की कोशिश की थी।”

     

    राघव चौंक गया।

     

    “उन्होंने क्या किया?”

     

    “उन्होंने कमरे नंबर 13 की दीवार में मेरी आखिरी याद बंद कर दी।”

     

    “कौन सी याद?”

     

    अनामिका ने सामने की दीवार की ओर देखा।

     

    वहाँ एक छोटी लकड़ी की पेटी दिखाई दी।

     

    राघव ने पेटी खोली।

     

    अंदर एक पुराना लॉकेट था।

     

    लॉकेट खोलते ही एक तस्वीर दिखाई दी।

     

    तस्वीर में एक आदमी था।

     

    राघव का पिता।

     

    और उसके साथ…

     

    अनामिका।

     

    पीछे लिखा था—

     

    “सच जानने के बाद भी मैंने उसे बचाया नहीं।”

     

    राघव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मेरे पिता ने उसे मरने दिया?”

     

    अनामिका ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    अचानक सुरंग के बाहर से कदमों की आवाज़ आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    कोई उनकी तरफ आ रहा था।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “कौन है?”

     

    जवाब आया—

     

    “मैं सुरेश हूँ।”

     

    राघव के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    उसके पिता का नाम सुरेश था।

     

    लेकिन उसके पिता की मृत्यु पाँच साल पहले हो चुकी थी।

     

    कदमों की आवाज़ और करीब आई।

     

    अंधेरे से एक आदमी बाहर आया।

     

    चेहरा…

     

    राघव के पिता जैसा।

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “तुमने मुझे बुलाया था, बेटा?”

     

    राघव पीछे हट गया।

     

    अनामिका चीख पड़ी—

     

    “ये तुम्हारे पिता नहीं हैं!”

     

    आदमी का चेहरा अचानक बदलने लगा।

     

    उसकी आँखें काली हो गईं।

     

    मुँह असामान्य रूप से फैल गया।

     

    और उसने कहा—

     

    “लेकिन अब तुम्हें मेरे साथ रहना होगा।”

     

    सुरंग का रास्ता अचानक बंद हो गया।

     

    कमरे की दीवारों पर लाल अक्षरों में एक वाक्य उभर आया—

     

    “एक जाएगा, बाकी तीन बचेंगे।”

     

    राघव ने छोटू, अमन और अनामिका की तरफ देखा।

     

    उसे समझ आ गया था कि हवेली अब एक बलि चाहती थी।

     

    लेकिन वह यह नहीं जानता था कि इस हवेली का असली रहस्य…

     

    उसके अपने परिवार से जुड़ा हुआ था।

     

    और उस रात…

     

    उसे अपने पिता की सबसे बड़ी गलती का सामना करना था।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱राजगीर की आखिरी हवेली 😱 भाग 1 — हवेली से आती आवाज़😱

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    बिहार के राजगीर से कुछ दूर पहाड़ियों और घने पेड़ों के बीच एक छोटा-सा गाँव था—बरहटा।

     

    गाँव छोटा था, लेकिन उसके आखिरी छोर पर खड़ी एक पुरानी हवेली के कारण दूर-दूर तक मशहूर था।

     

    लोग उसे सिंह हवेली कहते थे।

     

    कहा जाता था कि लगभग पचास साल पहले उस हवेली में एक जमींदार परिवार रहता था। एक रात परिवार के सभी सदस्य अचानक गायब हो गए।

     

    न कोई लाश मिली।

     

    न कोई सामान चोरी हुआ।

     

    न घर के दरवाज़े टूटे।

     

    बस हवेली के अंदर एक कमरा ऐसा था, जिसे तब से हमेशा के लिए बंद कर दिया गया था।

     

    गाँव के लोग कहते थे कि रात के समय उस कमरे से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आती है।

     

    कभी किसी बूढ़े आदमी के चलने की।

     

    और कभी…

     

    किसी महिला की आवाज़—

     

    “दरवाज़ा खोल दो…”

     

    गाँव में रहने वाला राघव इन कहानियों को हमेशा मजाक समझता था।

     

    वह पटना में रहकर पत्रकारिता करता था और कुछ दिनों के लिए अपने गाँव आया था।

     

    एक शाम चाय की दुकान पर बैठे हुए उसने हवेली की बात छेड़ दी।

     

    “लोग आज भी उस हवेली से डरते हैं?”

     

    बूढ़े दुकानदार रामजी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “डरना चाहिए।”

     

    राघव हँस पड़ा।

     

    “आप भी?”

     

    रामजी ने चाय का गिलास नीचे रखा।

     

    “मैंने अपनी आँखों से देखा है।”

     

    “क्या?”

     

    “उस हवेली की खिड़की में एक लड़की खड़ी थी।”

     

    राघव मुस्कुराया।

     

    “कब?”

     

    “बीस साल पहले।”

     

    “फिर?”

     

    रामजी की आवाज़ धीमी हो गई।

     

    “अगले दिन जिस आदमी ने उसे देखा था… वह गायब हो गया।”

     

    राघव कुछ देर चुप रहा।

     

    उसी समय उसके दोस्त अमन का फोन आया।

     

    अमन पटना से राघव से मिलने गाँव आया था।

     

    उसने कहा—

     

    “भाई, सुना है यहाँ एक पुरानी हवेली है।”

     

    राघव ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “चलोगे?”

     

    अमन तुरंत तैयार हो गया।

     

    उनके साथ गाँव का लड़का छोटू भी चल पड़ा।

     

    तीनों शाम करीब पाँच बजे हवेली पहुँच गए।

     

    हवेली बाहर से ही डरावनी लग रही थी।

     

    ऊँची दीवारों पर बेलें चढ़ी थीं।

     

    मुख्य दरवाज़े पर जंग लगी लोहे की जंजीर लटक रही थी।

     

    राघव ने जंजीर हटाई।

     

    दरवाज़ा अपने आप थोड़ा खुल गया।

     

    क्रीईई…

     

    अमन ने कहा—

     

    “भाई, अभी भी वापस चल सकते हैं।”

     

    राघव हँसा।

     

    “डर गया?”

     

    “नहीं। लेकिन मरने की जल्दी भी नहीं है।”

     

    तीनों अंदर चले गए।

     

    हवेली के अंदर पुराने फर्नीचर पर धूल जमी थी।

     

    दीवारों पर परिवार की पुरानी तस्वीरें लगी थीं।

     

    एक तस्वीर में एक आदमी, उसकी पत्नी और दो बच्चे दिखाई दे रहे थे।

     

    नीचे तारीख लिखी थी—

     

    1978।

     

    राघव ने तस्वीर को कैमरे से रिकॉर्ड किया।

     

    तभी छोटू ने कहा—

     

    “भैया…”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “इस तस्वीर में चार लोग हैं ना?”

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन दीवार पर पाँच परछाइयाँ क्यों हैं?”

     

    राघव ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    वास्तव में तस्वीर के नीचे दीवार पर पाँच परछाइयाँ दिखाई दे रही थीं।

     

    चौथी परछाईं किसी बच्चे की थी।

     

    और पाँचवीं…

     

    एक बहुत लंबे आदमी की।

     

    अमन ने तुरंत कहा—

     

    “चलो यहाँ से।”

     

    लेकिन तभी ऊपर से किसी के दौड़ने की आवाज़ आई।

     

    धड़… धड़… धड़…

     

    तीनों ने ऊपर देखा।

     

    पहली मंजिल खाली थी।

     

    राघव ने आवाज़ लगाई—

     

    “कोई है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर ऊपर से एक बच्चे की आवाज़ आई—

     

    “भैया…”

     

    छोटू का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    “ये आवाज़…”

     

    “क्या?”

     

    “मेरी छोटी बहन जैसी है।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “तुम्हारी बहन तो पटना में है।”

     

    छोटू ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    आवाज़ फिर आई—

     

    “छोटू…”

     

    इस बार छोटू सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।

     

    राघव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “रुको।”

     

    छोटू बोला—

     

    “वो मुझे बुला रही है।”

     

    राघव ने कहा—

     

    “जो भी है, ऊपर नहीं जाना।”

     

    लेकिन तभी सीढ़ियों के ऊपर एक लड़की दिखाई दी।

     

    उसने लाल रंग की पुरानी पोशाक पहनी थी।

     

    उसके लंबे बाल चेहरे पर थे।

     

    वह बिल्कुल स्थिर खड़ी थी।

     

    राघव ने कैमरा उसकी तरफ किया।

     

    कैमरे की स्क्रीन पर लड़की दिखाई नहीं दे रही थी।

     

    सिर्फ एक खाली गलियारा था।

     

    राघव का हाथ काँप गया।

     

    “ये…”

     

    अचानक लड़की ने अपना सिर उठाया।

     

    उसका चेहरा दिखाई दिया।

     

    आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “तुम बहुत देर से आए हो।”

     

    लाइट अचानक बंद हो गई।

     

    तीनों चीख पड़े।

     

    कुछ सेकंड बाद लाइट वापस आई।

     

    लड़की गायब थी।

     

    लेकिन सीढ़ियों के आखिरी पायदान पर एक पुरानी चाबी पड़ी थी।

     

    राघव ने चाबी उठा ली।

     

    उस पर एक छोटा-सा नंबर लिखा था—

     

    13।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “तेरह किस चीज़ का नंबर है?”

     

    राघव ने हवेली की ओर देखा।

     

    उसे पहली मंजिल पर एक बंद दरवाज़ा दिखाई दिया।

     

    दरवाज़े पर वही नंबर था।

     

    13।

     

    दरवाज़े पर मोटी लोहे की जंजीर लगी थी।

     

    राघव ने चाबी लगाई।

     

    जंजीर खुल गई।

     

    अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “दरवाज़ा मत खोल।”

     

    राघव ने कहा—

     

    “हम इतनी दूर सिर्फ देखने आए हैं।”

     

    उसने दरवाज़ा खोल दिया।

     

    कमरे के अंदर अंधेरा था।

     

    फर्श पर पुराने खिलौने पड़े थे।

     

    एक टूटी हुई गुड़िया।

     

    लकड़ी की छोटी ट्रेन।

     

    और एक पुराना झूला।

     

    कमरे के बीच में दीवार पर एक वाक्य लिखा था—

     

    “जिसे तुम खोज रहे हो, वह तुम्हें पहले से खोज रहा है।”

     

    राघव ने दीवार को छुआ।

     

    अचानक उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाया—

     

    “राघव…”

     

    वह पीछे हट गया।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    राघव ने कुछ नहीं कहा।

     

    तभी कमरे के कोने में रखा पुराना रेडियो अपने आप चालू हो गया।

     

    उसमें से टूटी-फूटी आवाज़ आने लगी।

     

    “आज रात…”

     

    “हवेली में…”

     

    “कोई…”

     

    “जिंदा नहीं बचेगा…”

     

    रेडियो बंद हो गया।

     

    अमन ने कहा—

     

    “हमें अभी निकलना होगा।”

     

    तीनों बाहर भागे।

     

    लेकिन जैसे ही वे मुख्य दरवाज़े के पास पहुँचे, दरवाज़ा बंद था।

     

    राघव ने उसे खींचा।

     

    नहीं खुला।

     

    अचानक ऊपर से किसी महिला के रोने की आवाज़ आई।

     

    “मेरे बच्चे को बचा लो…”

     

    फिर दूसरी आवाज़ आई—

     

    “राघव…”

     

    “तुमने दरवाज़ा खोल दिया है।”

     

    राघव ने ऊपर देखा।

     

    पहली मंजिल पर वही काली आँखों वाली लड़की खड़ी थी।

     

    इस बार उसके हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    उसने तस्वीर नीचे फेंक दी।

     

    राघव ने उसे उठाया।

     

    तस्वीर में वही परिवार था।

     

    लेकिन इस बार एक बात अलग थी।

     

    परिवार के चार लोगों के बीच…

     

    राघव खुद खड़ा था।

     

    राघव के हाथ से तस्वीर गिर गई।

     

    अमन ने कहा—

     

    “ये कैसे हो सकता है?”

     

    तभी पीछे से दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई।

     

    मुख्य दरवाज़ा धीरे-धीरे खुल गया।

     

    बाहर रात हो चुकी थी।

     

    लेकिन जैसे ही तीनों बाहर निकलने लगे…

     

    छोटू रुक गया।

     

    “भैया…”

     

    राघव ने पीछे देखा।

     

    छोटू गायब था।

     

    सिर्फ जमीन पर उसकी चप्पल पड़ी थी।

     

    और हवेली के अंदर से उसकी आवाज़ आ रही थी—

     

    “भैया…”

     

    “मुझे ढूँढो…”

     

    “मैं अभी जिंदा हूँ।”

     

    राघव ने हवेली की ओर देखा।

     

    दरवाज़ा अपने आप बंद हो चुका था।

     

    और उसके ऊपर दीवार पर ताजा लाल अक्षरों में लिखा था—

     

    “अब तीन नहीं… चार लोग हैं।”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • ❤️ सावन की पहली बारिश 💦❤️💚

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

     

    सावन आया तो बादल भी मुस्कुराने लगे,

    सूखे पत्तों पर मोती-से आँसू गिराने लगे।

    मिट्टी ने जब ली बारिश की पहली अंगड़ाई,

    हवा में घुल गई जैसे कोई मीठी-सी तन्हाई।❣️❣️💞💞❣️❣️

     

    नीम की डाल पर झूला धीरे-धीरे झूलने लगा,

    मन का कोई भूला हुआ गीत फिर से गूंजने लगा।

    भीगी गलियों में तेरी यादों के दीप जले,

    हर बूँद में जैसे तेरे ही एहसास मिले।💛💛💛❤️❤️

     

    कहीं रिमझिम, कहीं घटाओं का शोर है,

    सावन की हर बूँद में छुपा कोई प्रेम का दौर है।

    खिड़की पर ठहरी बूँद ने चुपके से ये कहा—

    “जिसे दिल से चाहो, उसे बारिश में महसूस करना।”💕💕💕

     

    और जब शाम हुई, बादल भी थम गए,

    आसमान के आँचल में सितारे फिर जम गए।

    मैंने हथेली पर एक बूँद संभालकर रख ली—

    सोचा, शायद इसमें तुम्हारी मुस्कान मिल गई।💞💞💞

     

    सावन तो हर साल आता है,

    मगर कुछ बारिशें उम्रभर याद रहती हैं…!!!❤️❤️

     

     

    ❤️HAPPY SAVAN TO ALL FRIENDS 💚🫂🌻🌹🙏

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • बहु बनी डायन 😱 भाग 3 — असली डायन का सच और अंतिम अंत😱

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

     

     

    हवेली की दीवारें काँप रही थीं।ऊपर की खिड़की में खड़ी वह बूढ़ी औरत लगातार मुस्कुरा रही थी।

     

    उसकी लाल आँखें अंधेरे में किसी जलते हुए अंगारे की तरह चमक रही थीं।

     

    नीचे तहखाने में नंदिनी, अमन, हरिदास बाबा और वीरेंद्र पत्थर की तरह खड़े थे।

     

    किसी के मुँह से आवाज नहीं निकल रही थी।

     

    वीरेंद्र की नजर अब भी ऊपर उसी बूढ़ी औरत पर थी।

     

    उसने काँपते हुए कहा—

     

    “दादी… आप तो तीस साल पहले मर गई थीं।”

     

    बूढ़ी औरत ने अपना सिर टेढ़ा किया।

     

    फिर उसकी हँसी पूरे तहखाने में गूँज उठी।

     

    “मरी थी… लेकिन तुम लोगों के लालच ने मुझे मरने नहीं दिया।”

     

    नंदिनी ने गौरी की आत्मा की तरफ देखा।

     

    “क्या यही वह औरत है?”

     

    गौरी ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “इसने तुम्हारे साथ क्या किया था?”

     

    गौरी की आँखों में वर्षों पुराना दर्द दिखाई दिया।

     

    “उसका नाम था भवानी।”

     

    हरिदास बाबा ने काँपते हुए कहा—

     

    “भवानी… भैरव सिंह की माँ।”

     

    वीरेंद्र ने सिर झुका लिया।

     

    गौरी ने अपनी कहानी शुरू की।

     

    तीस साल पहले जब गाँव में बीमारी फैली थी, तब भवानी ने लोगों के डर का फायदा उठाया था।

     

    वह तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास की बातें करके लोगों को अपने नियंत्रण में रखती थी।

     

    भैरव सिंह जमीन हड़पता था और भवानी लोगों के मन में डर पैदा करती थी।

     

    जिस औरत के पास जमीन होती, उसे डायन कह दिया जाता।

     

    जिस परिवार ने विरोध किया, उसके घर के बाहर रात में अजीब निशान बना दिए जाते।

     

    फिर पूरे गाँव में अफवाह फैलाई जाती कि उस परिवार पर डायन का साया है।

     

    लोग डर जाते।

     

    और आखिरकार अपनी जमीन छोड़कर गाँव से चले जाते।

     

    गौरी ने इस षड्यंत्र को देख लिया था।

     

    इसीलिए उसे भी डायन बना दिया गया।

     

    लेकिन गौरी भागने में सफल हो गई।

     

    उस रात उसने भवानी और भैरव सिंह को आपस में बात करते सुन लिया था।

     

    वे किसी पुराने तहखाने में एक अनुष्ठान करने वाले थे।

     

    गौरी ने उन्हें रोकने की कोशिश की।

     

    लेकिन भवानी ने उसे पकड़ लिया।

     

    “तुमने हमारा राज देख लिया है,” भवानी ने कहा था।

     

    गौरी ने जवाब दिया—

     

    “मैं पूरे गाँव को सच बता दूँगी।”

     

    भवानी हँसी।

     

    “गाँव वाले तुम्हारी बात नहीं मानेंगे।”

     

    गौरी ने कहा—

     

    “एक दिन सच सामने जरूर आएगा।”

     

    भवानी ने उसे धमकाया।

     

    लेकिन उसी समय मंदिर की घंटियाँ बजने लगीं।

     

    गाँव वाले उस तरफ आने लगे।

     

    भवानी डर गई।

     

    उसने गौरी को तहखाने में बंद कर दिया और गाँव वालों से कहा—

     

    “गौरी डायन है। इसे पकड़ो।”

     

    गाँव वालों ने तहखाने को घेर लिया।

     

    लेकिन उसी रात अचानक भयंकर आग लग गई।

     

    अराजकता में गौरी तहखाने से बाहर निकल गई।

     

    वह बरगद के पेड़ तक पहुँची।

     

    वहाँ उसने आखिरी बार हरिदास को देखा।

     

    “बाबा, मुझे बचा लीजिए।”

     

    लेकिन हरिदास डर के कारण कुछ नहीं कर पाए।

     

    गौरी जंगल की तरफ भागी।

     

    इसके बाद किसी ने उसे जीवित नहीं देखा।

     

    कुछ दिनों बाद बरगद के पेड़ के पास उसकी चूड़ियाँ और खून से सना कपड़ा मिला।

     

    गाँव वालों ने मान लिया कि वह मर चुकी है।

     

    लेकिन सच्चाई कुछ और थी।

     

    गौरी कई वर्षों तक जंगल में छिपकर जीवित रही।

     

    उसने गाँव से दूर एक छोटी झोपड़ी बनाई।

     

    वह आज भी लोगों का इलाज करती रही।

     

    लेकिन भवानी ने उसे ढूँढ़ लिया।

     

    और एक रात…

     

    गौरी की हत्या कर दी गई।

     

    उसकी आत्मा उसी बरगद के पेड़ से बंध गई।

     

    गौरी ने कहा—

     

    “मैंने कभी किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया। मैं सिर्फ अपना सच साबित करना चाहती थी।”

     

    नंदिनी की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “लेकिन लोग तुम्हें डायन कहते रहे।”

     

    गौरी ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    फिर उसने भवानी की ओर देखा।

     

    “और उसने मेरे नाम का इस्तेमाल करके डर फैलाया।”

     

    तभी ऊपर खड़ी भवानी की आत्मा जोर से हँसी।

     

    “क्योंकि इंसान डरना पसंद करता है।”

     

    अचानक हवेली की दीवारों से धुआँ निकलने लगा।

     

    भवानी नीचे उतरने लगी।

     

    उसके पैर जमीन को छू नहीं रहे थे।

     

    वह हवा में तैरती हुई सीढ़ियों से नीचे आई।

     

    हर कदम के साथ दीवारों पर लगे चित्रों से औरतों की चीखें आने लगीं।

     

    “हमें बचाओ…”

     

    “हम निर्दोष हैं…”

     

    “हमने कुछ नहीं किया…”

     

    नंदिनी ने चारों तरफ देखा।

     

    सभी चित्रों की आँखों से काले आँसू बह रहे थे।

     

    भवानी ने हाथ उठाया।

     

    अचानक अमन हवा में उठ गया।

     

    “अमन!”

     

    नंदिनी उसकी तरफ भागी।

     

    लेकिन किसी अदृश्य शक्ति ने उसे पीछे फेंक दिया।

     

    हरिदास मंत्र पढ़ने लगे।

     

    भवानी ने उनकी ओर देखा।

     

    “तुम!”

     

    हरिदास काँप गए।

     

    “मैंने क्या किया?”

     

    भवानी हँसी।

     

    “तुमने सच देखा था… फिर भी चुप रहे।”

     

    हरिदास घुटनों के बल बैठ गए।

     

    “हाँ… मेरी गलती थी।”

     

    “मैं डर गया था।”

     

    “लेकिन अब मैं सच बताऊँगा।”

     

    भवानी ने जोर से चीख मारी।

     

    पूरी हवेली हिलने लगी।

     

    लेकिन इस बार हरिदास पीछे नहीं हटे।

     

    उन्होंने ऊँची आवाज में कहा—

     

    “गौरी डायन नहीं थी!”

     

    उनकी आवाज हवेली से बाहर तक पहुँची।

     

    गाँव के कई लोग डरते-डरते हवेली के पास पहुँच चुके थे।

     

    हरिदास ने फिर कहा—

     

    “गौरी निर्दोष थी!”

     

    गाँव वाले एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    वीरेंद्र अचानक आगे आया।

     

    उसने सबके सामने अपने परिवार का सच बता दिया।

     

    “मेरे दादा और मेरी दादी ने गाँव की औरतों को डायन कहकर उनकी जमीन छीनी थी।”

     

    गाँव में सन्नाटा छा गया।

     

    वीरेंद्र ने कहा—

     

    “मैंने भी वर्षों तक यह सच छिपाया।”

     

    “लेकिन अब नहीं।”

     

    उसने जमीन के सारे कागज गाँव वालों के सामने रख दिए।

     

    “जिसकी जो जमीन थी, वह वापस मिलेगी।”

     

    भवानी की आत्मा क्रोध से काँपने लगी।

     

    “तुम मेरे खिलाफ जाओगे?”

     

    वीरेंद्र ने सिर उठाकर कहा—

     

    “हाँ।”

     

    “क्योंकि मेरे परिवार ने जो किया, वह गलत था।”

     

    अचानक भवानी की शक्ति और बढ़ गई।

     

    हवेली की छत टूटने लगी।

     

    लोग बाहर भागने लगे।

     

    लेकिन नंदिनी वहीं खड़ी रही।

     

    उसने गौरी की तरफ देखा।

     

    “अब क्या करें?”

     

    गौरी ने कहा—

     

    “मेरा सच सामने आ गया है।”

     

    “लेकिन भवानी?”

     

    “उसे भी सच से ही हराया जा सकता है।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “कैसे?”

     

    गौरी ने हवेली के बीच रखी एक पुरानी पत्थर की पटिया की ओर इशारा किया।

     

    “इसके नीचे वह चीज है जिसके लिए उसने यह सब किया।”

     

    नंदिनी, अमन और हरिदास ने मिलकर पत्थर हटाया।

     

    नीचे एक लोहे का संदूक मिला।

     

    संदूक खोलते ही उसमें पुराने दस्तावेज, सोने के सिक्के और एक काली किताब मिली।

     

    काली किताब भवानी की थी।

     

    उसमें गाँव की हर उस औरत का नाम लिखा था जिसे उसने डायन घोषित करवाया था।

     

    हर नाम के सामने उसकी जमीन का विवरण था।

     

    नंदिनी ने किताब उठाकर गाँव वालों को दिखाई।

     

    “यही है असली सबूत।”

     

    भवानी चीखने लगी।

     

    “उसे जला दो!”

     

    अचानक आग की लपटें किताब की ओर बढ़ीं।

     

    लेकिन नंदिनी ने किताब को कसकर पकड़ लिया।

     

    गौरी उसके सामने आ खड़ी हुई।

     

    दोनों आत्माएँ आमने-सामने थीं।

     

    एक निर्दोष की आत्मा।

     

    दूसरी लालच और झूठ से भरी आत्मा।

     

    भवानी ने कहा—

     

    “तुम मुझे नहीं हरा सकती।”

     

    गौरी ने शांत स्वर में कहा—

     

    “मैं तुम्हें नहीं हरा रही।”

     

    “सच तुम्हें हरा रहा है।”

     

    इतना सुनते ही हवेली के चारों तरफ तेज प्रकाश फैल गया।

     

    जिन औरतों के चित्र दीवारों पर लगे थे, वे एक-एक करके दीवार से बाहर निकलने लगे।

     

    वे सभी आत्माएँ थीं।

     

    वे गौरी के पीछे खड़ी हो गईं।

     

    भवानी पहली बार डर गई।

     

    “नहीं…”

     

    एक वृद्ध आत्मा आगे आई।

     

    “हम सबको तुमने डायन कहा।”

     

    दूसरी बोली—

     

    “हमारी जमीन छीनी।”

     

    तीसरी बोली—

     

    “हमारे परिवार उजाड़े।”

     

    चौथी ने कहा—

     

    “लेकिन अब हमारा सच सामने आ चुका है।”

     

    भवानी पीछे हटती गई।

     

    अचानक उसके पैरों के नीचे की जमीन काली पड़ने लगी।

     

    उसकी आत्मा कमजोर होने लगी।

     

    वह चीखी—

     

    “मैंने कुछ गलत नहीं किया!”

     

    गौरी ने कहा—

     

    “झूठ बोलना बंद करो।”

     

    भवानी ने आखिरी बार चीख लगाई।

     

    और फिर…

     

    उसका शरीर राख में बदल गया।

     

    हवेली में सन्नाटा छा गया।

     

    अचानक गौरी की आत्मा भी प्रकाश में बदलने लगी।

     

    नंदिनी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम जा रही हो?”

     

    गौरी मुस्कुराई।

     

    “हाँ।”

     

    “अब मुझे किसी बदले की जरूरत नहीं।”

     

    “मुझे सिर्फ यह चाहिए था कि लोग सच जानें।”

     

    नंदिनी की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    “क्या तुम फिर कभी वापस आओगी?”

     

    गौरी ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “जब तक लोग सच को याद रखेंगे, मुझे लौटने की जरूरत नहीं होगी।”

     

    यह कहते ही गौरी धीरे-धीरे प्रकाश में बदल गई।

     

    उसकी आत्मा आसमान की ओर उठी।

     

    और फिर पूरी तरह गायब हो गई।

     

    उसी क्षण हवेली की पुरानी घड़ी चलने लगी।

     

    टक… टक… टक…

     

    चालीस वर्षों से रुकी हुई घड़ी पहली बार आगे बढ़ी।

     

    सुबह होने लगी।

     

    सूरज की पहली किरण हवेली की टूटी खिड़की से अंदर आई।

     

    जहाँ रात भर अंधेरा था, वहाँ अब उजाला था।

     

    गाँव वालों ने उस दिन से हवेली को डर की जगह नहीं, बल्कि एक सबक की जगह बना दिया।

     

    जिन औरतों की जमीन छीनी गई थी, उनकी जमीन उनके परिवारों को वापस दी गई।

     

    गौरी के नाम पर गाँव में एक छोटा-सा स्वास्थ्य केंद्र बनाया गया, जहाँ गरीबों का मुफ्त इलाज होने लगा।

     

    बरगद के पेड़ के नीचे एक पत्थर लगाया गया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “गौरी — जिसे लोगों ने डायन कहा, लेकिन जिसने अंत तक इंसानियत नहीं छोड़ी।”

     

    हरिदास बाबा ने अपनी बाकी जिंदगी गाँव के बच्चों को यही समझाने में बिताई कि किसी भी अजीब घटना को देखकर तुरंत उसे भूत, डायन या जादू मत समझो।

     

    पहले सच खोजो।

     

    वीरेंद्र ने अपने परिवार के अपराधों को स्वीकार किया और गाँव वालों की जमीन वापस करने में मदद की।

     

    और नंदिनी?

     

    वह शहर वापस चली गई।

     

    लेकिन हर साल गौरी की बरसी पर भैरवपुर जरूर आती।

     

    एक बार उसने बरगद के पेड़ के नीचे रात बिताई।

     

    गाँव वाले उसे रोकते रहे।

     

    “रात मत रुकना।”

     

    “गौरी वापस आ सकती है।”

     

    लेकिन नंदिनी मुस्कुराई।

     

    “अगर वह आएगी भी तो मुझे उससे डर नहीं लगेगा।”

     

    रात के ठीक बारह बजकर तेरह मिनट हुए।

     

    हवा चली।

     

    बरगद के पत्ते हिले।

     

    नंदिनी ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उसे बहुत धीमी आवाज सुनाई दी—

     

    “सच को कभी मरने मत देना…”

     

    नंदिनी ने आँखें खोलीं।

     

    सामने कोई नहीं था।

     

    बस बरगद की एक शाखा पर सफेद चमेली के फूल खिले हुए थे।

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “मैं वादा करती हूँ।”

     

    और उसी रात पहली बार भैरवपुर में किसी ने डायन के डर से दरवाजा बंद नहीं किया।

     

    लोग बाहर निकले।

     

    बच्चे खेलते रहे।

     

    मंदिर की घंटियाँ बजीं।

     

    और वह हवेली, जो कभी डर का प्रतीक थी, अब गाँव को एक बात याद दिलाती थी—

     

    हर डर के पीछे भूत नहीं होता।

     

    कभी उसके पीछे कोई झूठ होता है।

     

    कभी लालच।

     

    कभी अज्ञान।

     

    और कभी किसी निर्दोष के साथ किया गया अन्याय।

     

    कहानी की सीख

     

    किसी भी इंसान को सिर्फ अफवाह, शक या अंधविश्वास के आधार पर डायन, भूत या बुरा इंसान मान लेना बहुत बड़ा अन्याय है।

     

    अंधविश्वास इंसान की सोचने की शक्ति छीन सकता है।

     

    गौरी को लोगों ने बिना सच जाने डायन समझ लिया और उसके साथ अन्याय किया। असली दोषी वे लोग थे जिन्होंने डर और लालच का इस्तेमाल किया।

     

    इसलिए हमें हमेशा याद रखना चाहिए—

     

    “सच जानने से पहले किसी पर विश्वास या आरोप मत लगाओ।”

     

    “डर के कारण अपनी बुद्धि मत खोओ।”

     

    और सबसे बड़ी बात—

     

    “किसी निर्दोष की चुप्पी को उसकी गलती मत समझो।”

     

    क्योंकि कभी-कभी जिसे पूरी दुनिया डायन समझती है…

     

    वह वास्तव में सबसे ज्यादा पीड़ित और सबसे ज्यादा निर्दोष इंसान होता है।

     

    और असली राक्षस किसी सुनसान जंगल या पुरानी हवेली में नहीं…

     

    इंसान के लालच, झूठ और अंधविश्वास के अंदर छिपा होता है।

     

    यहीं “बहु बनी डायन” की कहानी समाप्त होती है।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • बहु बनी डायन 😱 भाग 2 — हवेली के नीचे का रहस्य😱

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

    •  

     

    रात के लगभग एक बज चुके थे।भैरवपुर गाँव अब पूरी तरह नींद में डूबा हुआ था, लेकिन गाँव के बाहर खड़ी वह पुरानी हवेली जाग रही थी।

     

    हवेली की टूटी हुई खिड़कियों से कभी-कभी पीली रोशनी बाहर आती और फिर अचानक गायब हो जाती।

     

    हवा में चमगादड़ों की फड़फड़ाहट थी।

     

    दूर कहीं सियार रो रहे थे।

     

    और हवेली के सामने खड़े नंदिनी, अमन और हरिदास बाबा के चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

     

    भाग 1 में गौरी की आत्मा ने उन्हें हवेली के नीचे दफन सच खोजने का संकेत दिया था।

     

    लेकिन किसी को नहीं पता था कि उस हवेली में उनके लिए क्या इंतजार कर रहा था।

     

    अमन ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “नंदिनी, हमें वापस चलना चाहिए।”

     

    नंदिनी ने हवेली की ओर देखते हुए कहा—

     

    “अगर हम वापस चले गए तो गौरी की आत्मा कभी शांत नहीं होगी।”

     

    हरिदास बाबा ने गंभीर आवाज में कहा—

     

    “सिर्फ गौरी ही नहीं… शायद इस गाँव में कई आत्माएँ भटक रही हैं।”

     

    अमन ने उनकी तरफ देखा।

     

    “कई आत्माएँ?”

     

    हरिदास ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उन्होंने हवेली का पुराना दरवाजा धक्का देकर खोला।

     

    चर्रररर…

     

    दरवाजा इतनी तेज आवाज के साथ खुला कि तीनों सहम गए।

     

    अंदर घना अंधेरा था।

     

    हरिदास ने लालटेन जलाई।

     

    कमरे में पुराने फर्नीचर पड़े थे।

     

    दीवारों पर जाले लटक रहे थे।

     

    छत से चमगादड़ उल्टे लटके हुए थे।

     

    लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि दीवार पर दर्जनों औरतों के चित्र लगे थे।

     

    हर चित्र के नीचे एक ही शब्द लिखा था—

     

    “डायन।”

     

    नंदिनी धीरे-धीरे एक चित्र के पास गई।

     

    उसने धूल साफ की।

     

    चित्र में एक बूढ़ी औरत थी।

     

    नीचे लिखा था—

     

    “सीता — डायन।”

     

    दूसरे चित्र पर—

     

    “मालती — डायन।”

     

    तीसरे पर—

     

    “कमला — डायन।”

     

    नंदिनी ने घबराकर पूछा—

     

    “ये सब कौन थीं?”

     

    हरिदास ने कहा—

     

    “गाँव की औरतें।”

     

    “लेकिन इन्हें डायन क्यों कहा गया?”

     

    हरिदास चुप रहे।

     

    नंदिनी ने उनकी तरफ देखा।

     

    “बाबा, आप सब जानते हैं।”

     

    हरिदास ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “हाँ।”

     

    “तो बताइए।”

     

    हरिदास ने भारी आवाज में कहा—

     

    “तीस साल पहले भैरव सिंह गाँव का सबसे ताकतवर आदमी था। उसके पास जमीन थी, पैसा था और लोग उससे डरते थे।”

     

    “जो कोई उसके खिलाफ बोलता, उसे डायन या तांत्रिक कहकर बदनाम कर दिया जाता।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “लेकिन इससे उसे क्या फायदा होता था?”

     

    “जमीन।”

     

    हरिदास ने दीवार की ओर इशारा किया।

     

    “इनमें से ज्यादातर औरतों के पास जमीन थी। डर फैलाकर उन्हें गाँव से भगाया गया और उनकी जमीन भैरव सिंह ने अपने नाम कर ली।”

     

    नंदिनी की मुट्ठियाँ कस गईं।

     

    “और गौरी?”

     

    हरिदास की आँखें नम हो गईं।

     

    “गौरी ने उसके खिलाफ आवाज उठाई थी।”

     

    तभी ऊपर की मंजिल से किसी चीज के गिरने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    तीनों चौंक गए।

     

    अमन ने लालटेन उठाई।

     

    “ऊपर कोई है।”

     

    हरिदास ने तुरंत कहा—

     

    “हमें ऊपर नहीं जाना चाहिए।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि जिस रात गौरी गायब हुई थी, वह आखिरी बार इसी हवेली में देखी गई थी।”

     

    तीनों के पैरों के नीचे जैसे जमीन खिसक गई।

     

    नंदिनी ने धीरे से पूछा—

     

    “आपने यह बात पहले क्यों नहीं बताई?”

     

    हरिदास ने कहा—

     

    “क्योंकि मुझे डर था कि सच बाहर आया तो गाँव में फिर खून बह सकता है।”

     

    नंदिनी ने दृढ़ आवाज में कहा—

     

    “सच छिपाने से खून बहना बंद नहीं होता, बाबा।”

     

    तीनों सीढ़ियों की ओर बढ़े।

     

    हर कदम के साथ लकड़ी की सीढ़ियाँ कराह रही थीं।

     

    चीं… चीं… चीं…

     

    ऊपर पहुँचते ही उन्हें एक लंबा गलियारा दिखाई दिया।

     

    गलियारे के अंत में एक बंद कमरा था।

     

    उस दरवाजे पर खून से लिखा था—

     

    “गौरी यहाँ नहीं मरी।”

     

    नंदिनी ने दरवाजा खोला।

     

    कमरे के अंदर एक पुरानी मेज थी।

     

    मेज पर कुछ कागज पड़े थे।

     

    अमन ने एक कागज उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “जिसे दुनिया डायन समझती है, वह असल में गवाह है।”

     

    नंदिनी ने दूसरा कागज उठाया।

     

    उस पर गाँव के कई लोगों के नाम लिखे थे।

     

    कुछ नामों के आगे लाल निशान लगा था।

     

    नंदिनी ने देखा—

     

    हरिदास का नाम भी उनमें था।

     

    लेकिन उसके आगे लिखा था—

     

    “डरा हुआ गवाह।”

     

    हरिदास ने सिर झुका लिया।

     

    “मैंने कहा था ना… मैं सब जानता था।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “फिर गौरी को बचाने की कोशिश क्यों नहीं की?”

     

    हरिदास की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “मैं डर गया था।”

     

    अचानक कमरे की खिड़की जोर से खुली।

     

    धड़ाम!

     

    ठंडी हवा अंदर आई।

     

    दीवार पर लगी एक तस्वीर अपने आप गिर गई।

     

    उसके पीछे एक गुप्त दरवाजा दिखाई दिया।

     

    अमन ने कहा—

     

    “यहाँ कुछ छिपा हुआ है।”

     

    नंदिनी ने दरवाजा खोला।

     

    नीचे जाने वाली सीढ़ियाँ दिखाई दीं।

     

    सीढ़ियों के नीचे घना अंधेरा था।

     

    हरिदास ने काँपते हुए कहा—

     

    “यही है…”

     

    “क्या?”

     

    “हवेली का तहखाना।”

     

    तीनों धीरे-धीरे नीचे उतरने लगे।

     

    सीढ़ियाँ खत्म हुईं तो एक बड़ा कमरा सामने था।

     

    कमरे के बीच में लोहे का संदूक रखा था।

     

    संदूक पर पुराने ताले लगे थे।

     

    नंदिनी ने उसे छुआ।

     

    अचानक कमरे में किसी लड़की की हँसी गूँजी।

     

    ही… ही… ही…

     

    अमन पीछे हट गया।

     

    “यह आवाज…”

     

    हरिदास ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “गौरी।”

     

    अचानक संदूक अपने आप खुल गया।

     

    अंदर पुराने कपड़े, कागज और तस्वीरें थीं।

     

    नंदिनी ने तस्वीरें उठाईं।

     

    एक तस्वीर देखकर उसकी साँस रुक गई।

     

    तस्वीर में भैरव सिंह खड़ा था।

     

    उसके साथ गाँव के कई बड़े लोग थे।

     

    और उनके बीच…

     

    गौरी भी थी।

     

    लेकिन गौरी के चेहरे पर डर था।

     

    तस्वीर के पीछे लिखा था—

     

    “आज रात सौदा पूरा होगा।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “कौन-सा सौदा?”

     

    हरिदास ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    अमन ने संदूक के नीचे से एक और कागज निकाला।

     

    वह जमीन का नक्शा था।

     

    नक्शे पर हवेली, बरगद का पेड़ और गाँव के आसपास की जमीन दिखाई गई थी।

     

    लाल निशान एक खास जगह पर था।

     

    अमन ने कहा—

     

    “यह जगह कहाँ है?”

     

    हरिदास ने नक्शा देखते ही कहा—

     

    “पुराना कुआँ।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “वही कुआँ जहाँ गौरी गायब हुई थी?”

     

    हरिदास ने सिर हिलाया।

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “वह वहाँ नहीं मरी थी।”

     

    तीनों ने एक साथ पीछे देखा।

     

    कमरे के कोने में एक सफेद साया खड़ा था।

     

    लंबे बाल।

     

    झुका हुआ सिर।

     

    और धीरे-धीरे ऊपर उठता हुआ चेहरा।

     

    गौरी।

     

    अमन ने डरकर आँखें बंद कर लीं।

     

    नंदिनी वहीं खड़ी रही।

     

    उसने पूछा—

     

    “अगर तुम नहीं मरी थीं… तो तुम्हारे साथ क्या हुआ?”

     

    गौरी ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसने बस अपना हाथ उठाया।

     

    और दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    दीवार पर अचानक दरार पड़ गई।

     

    चर्ररर…

     

    फिर ईंटें गिरने लगीं।

     

    उनके पीछे एक छोटा कमरा दिखाई दिया।

     

    कमरे के अंदर एक पुराना लकड़ी का बक्सा था।

     

    नंदिनी ने बक्सा खोला।

     

    उसमें एक डायरी थी।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “यह मेरी आखिरी गवाही है।”

     

    नंदिनी ने पढ़ना शुरू किया।

     

    डायरी गौरी की थी।

     

    उसमें लिखा था कि जिस रात गाँव वालों ने उसे डायन कहकर पकड़ने की कोशिश की, वह भागकर हवेली पहुँची थी।

     

    वह भैरव सिंह से मदद माँगने आई थी।

     

    लेकिन भैरव सिंह ने उसकी मदद करने के बजाय उसे कैद कर लिया।

     

    गौरी ने वहाँ एक ऐसा राज देखा था, जिसके बारे में किसी को पता नहीं था।

     

    भैरव सिंह अकेला नहीं था।

     

    गाँव के कुछ बड़े लोग उसके साथ मिलकर लोगों की जमीन हड़पते थे।

     

    जो विरोध करता, उसके बारे में अफवाह फैलाई जाती कि वह डायन के जादू से गाँव को नुकसान पहुँचा रहा है।

     

    लेकिन डायरी का आखिरी हिस्सा सबसे ज्यादा डरावना था।

     

    गौरी ने लिखा था—

     

    “मैंने उन्हें एक ऐसी चीज करते देखा है, जिसे देखने के बाद शायद मुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे।”

     

    इसके आगे के पन्ने फटे हुए थे।

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “बाकी पन्ने कहाँ हैं?”

     

    तभी तहखाने में किसी आदमी की आवाज गूँजी—

     

    “तुम्हें बाकी पन्ने नहीं मिलेंगे।”

     

    तीनों पीछे मुड़े।

     

    सीढ़ियों के पास एक आदमी खड़ा था।

     

    वह गाँव का वर्तमान जमींदार वीरेंद्र सिंह था।

     

    भैरव सिंह का पोता।

     

    अमन ने गुस्से में कहा—

     

    “तुम यहाँ क्या कर रहे हो?”

     

    वीरेंद्र मुस्कुराया।

     

    “उस सच को बचाने आया हूँ जिसे मेरे परिवार ने तीस साल से छिपा रखा है।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “तुम्हें गौरी के बारे में सब पता है?”

     

    वीरेंद्र ने कहा—

     

    “मुझसे ज्यादा किसी को नहीं।”

     

    हरिदास ने काँपते हुए पूछा—

     

    “तुम्हारे दादा ने गौरी को कहाँ रखा था?”

     

    वीरेंद्र की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “तहखाने में।”

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “क्या उन्होंने उसे मार दिया?”

     

    वीरेंद्र ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    तीनों चौंक गए।

     

    “तो फिर?”

     

    वीरेंद्र ने कहा—

     

    “गौरी उस रात भाग गई थी।”

     

    “कहाँ?”

     

    वीरेंद्र ने बरगद के पेड़ की ओर इशारा किया।

     

    “लेकिन उसके बाद जो हुआ… वह मेरे परिवार के लिए भी रहस्य बन गया।”

     

    तभी तहखाने की दीवारों से धीमी-धीमी खरोंचने की आवाज आने लगी।

     

    खर्र… खर्र… खर्र…

     

    अमन ने चारों तरफ देखा।

     

    “ये आवाज कहाँ से आ रही है?”

     

    वीरेंद्र अचानक डर गया।

     

    “यह संभव नहीं…”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    वीरेंद्र ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “यह आवाज… तब आती है जब वह जागती है।”

     

    “कौन?”

     

    वीरेंद्र ने जवाब नहीं दिया।

     

    अचानक तहखाने की सारी लालटेन बुझ गईं।

     

    पूर्ण अंधकार।

     

    फिर किसी ने नंदिनी का हाथ पकड़ लिया।

     

    वह चीख पड़ी।

     

    “अमन!”

     

    “मैं यहाँ हूँ!”

     

    “तो फिर मेरा हाथ किसने पकड़ा?”

     

    अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    नंदिनी ने नीचे देखा।

     

    उसकी कलाई पर पाँच काली उँगलियों के निशान थे।

     

    तभी अंधेरे में एक और आवाज गूँजी।

     

    लेकिन इस बार आवाज गौरी की नहीं थी।

     

    वह किसी बूढ़ी औरत की आवाज थी।

     

    “गौरी को मैंने नहीं मारा…”

     

    हरिदास काँपने लगे।

     

    आवाज फिर आई—

     

    “उसे मैंने बनाया…”

     

    अचानक दीवार पर एक चेहरा उभर आया।

     

    वह चेहरा किसी बूढ़ी औरत का था।

     

    उसकी आँखें लाल थीं।

     

    और माथे पर गहरा काला निशान था।

     

    वीरेंद्र चीख पड़ा—

     

    “नहीं! यह नहीं हो सकता!”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “तुम इसे जानते हो?”

     

    वीरेंद्र पीछे हटने लगा।

     

    “मेरी दादी…”

     

    हरिदास ने भयभीत होकर कहा—

     

    “रुक जाओ…”

     

    लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

     

    दीवार पर वह चेहरा मुस्कुराया।

     

    और बोला—

     

    “जिसे तुम गौरी की आत्मा समझते रहे… वह गौरी नहीं थी।”

     

    तभी तहखाने का दरवाजा जोर से बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    कमरे में भयंकर ठंड फैल गई।

     

    और दीवार पर धीरे-धीरे एक नया नाम उभर आया—

     

    “नंदिनी।”

     

    नंदिनी पीछे हट गई।

     

    उसके सामने अंधेरे में दो लाल आँखें चमक रही थीं।

     

    फिर एक फुसफुसाहट सुनाई दी—

     

    “अब तुम्हारी बारी है…”

     

    अचानक जमीन फट गई।

     

    नंदिनी नीचे गिरने लगी।

     

    अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    लेकिन नीचे से किसी अदृश्य शक्ति ने नंदिनी को खींचना शुरू कर दिया।

     

    “अमन! मुझे बचाओ!”

     

    अमन पूरी ताकत लगा रहा था।

     

    हरिदास मंत्र पढ़ने लगे।

     

    वीरेंद्र दीवार से चिपककर खड़ा था।

     

    और तभी…

     

    गौरी की आत्मा अचानक प्रकट हुई।

     

    उसने नंदिनी की ओर हाथ बढ़ाया।

     

    एक तेज प्रकाश फैला।

     

    नंदिनी ऊपर खिंच आई।

     

    लेकिन गौरी का चेहरा अब शांत नहीं था।

     

    वह पहली बार डरती हुई दिखाई दे रही थी।

     

    उसने नंदिनी की तरफ देखा और कहा—

     

    “वह जाग चुकी है…”

     

    नंदिनी ने काँपते हुए पूछा—

     

    “कौन?”

     

    गौरी ने हवेली के नीचे अंधेरे की तरफ देखा।

     

    फिर बोली—

     

    “जिसने मुझे डायन बनाया था।”

     

    अगले ही पल हवेली की पूरी जमीन हिलने लगी।

     

    दीवारों से चीखें निकलने लगीं।

     

    सैकड़ों औरतों की आवाजें एक साथ सुनाई दीं—

     

    “हमें न्याय चाहिए…”

     

    और हवेली की सबसे ऊपरी खिड़की में एक बूढ़ी औरत खड़ी दिखाई दी।

     

    उसकी आँखें लाल थीं।

     

    उसके बाल हवा में उड़ रहे थे।

     

    और उसके चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी जिसे देखकर वीरेंद्र घुटनों के बल गिर पड़ा।

     

    उसने काँपते हुए कहा—

     

    “दादी…”

     

    बूढ़ी औरत ने नीचे देखा।

     

    और धीरे से बोली—

     

    “तीस साल पहले मैंने एक डायन बनाई थी… अब मैं पूरे गाँव को अपना घर बनाऊँगी।”

     

    अचानक पूरी हवेली अंधेरे में डूब गई।

     

    और उसी अंधेरे में नंदिनी ने एक बात समझ ली—

     

    गौरी से डरना शायद सबसे बड़ी भूल थी।

     

    क्योंकि असली डरावनी शक्ति अभी तक छिपी हुई थी।

     

    और अब वह जाग चुकी थी।

     

    जारी रहेगा…

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • बहु बनी डायन 😱 भाग 1 — वह रात जब डायन लौटी 😱

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

    रात के लगभग बारह बज चुके थे।आसमान में चाँद तो था, लेकिन उसके चारों ओर इतने घने बादल छाए थे कि उसकी रोशनी जमीन तक पहुँचने के लिए संघर्ष कर रही थी। पूरे गाँव पर अजीब-सी खामोशी पसरी हुई थी।

     

    गाँव का नाम था भैरवपुर।

     

    छोटा-सा गाँव था, लेकिन पिछले कुछ महीनों से वहाँ एक ऐसी दहशत फैल चुकी थी, जिसने लोगों को रात में अपने ही घरों में कैद कर दिया था।

     

    लोग कहते थे कि गाँव के बाहर पुराने बरगद के पेड़ के नीचे एक डायन रहती है।

     

    किसी ने उसे सफेद कपड़ों में देखा था।

     

    किसी ने उसके लंबे बाल देखे थे।

     

    किसी ने दावा किया था कि आधी रात को वह पेड़ के नीचे बैठकर किसी बच्चे की तरह रोती है।

     

    और कुछ लोगों का कहना था कि जिसने भी उसकी आँखों में देख लिया, उसकी मौत निश्चित है।

     

    लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि पिछले एक महीने में गाँव के तीन लोग रहस्यमय तरीके से गायब हो चुके थे।

     

    उनमें से पहला था रामलाल।

     

    दूसरी थी जमुना।

     

    और तीसरा था गाँव का चौकीदार हरिया।

     

    तीनों के घरों के बाहर सुबह सिर्फ एक चीज मिलती थी—

     

    काले राख जैसे पैरों के निशान।

     

    हरिया के गायब होने के बाद गाँव के मुखिया ने घोषणा कर दी थी—

     

    “आज से सूरज ढलने के बाद कोई भी घर से बाहर नहीं निकलेगा।”

     

    लेकिन उस रात एक लड़की घर से निकल चुकी थी।

     

    उसका नाम था नंदिनी।

     

    नंदिनी शहर से अपने गाँव आई थी। वह पढ़ी-लिखी और समझदार लड़की थी। वह भूत-प्रेत और डायन जैसी बातों पर बिल्कुल विश्वास नहीं करती थी।

     

    उसके पिता की मृत्यु के बाद उसकी माँ गाँव में अकेली रहती थी, इसलिए नंदिनी कुछ दिनों के लिए गाँव आई थी।

     

    उस रात अचानक उसकी माँ की तबीयत खराब हो गई।

     

    दवा घर में नहीं थी।

     

    नंदिनी ने घड़ी देखी।

     

    बारह बजकर पाँच मिनट।

     

    उसकी माँ ने कमजोर आवाज़ में कहा—

     

    “बेटी… सुबह तक रुक जा।”

     

    नंदिनी ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “माँ, डरने की जरूरत नहीं है। मैं अभी दवा लेकर आती हूँ।”

     

    माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “बाहर मत जाना।”

     

    “क्यों?”

     

    माँ की आँखें डर से फैल गईं।

     

    “वह आज रात फिर निकली है।”

     

    नंदिनी कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली—

     

    “माँ, कोई डायन नहीं है। गाँव वालों ने अफवाह फैला रखी है।”

     

    माँ ने सिर हिलाया।

     

    “काश तू सही होती…”

     

    नंदिनी ने लालटेन उठाई और घर से बाहर निकल गई।

     

    गली में कदम रखते ही उसे लगा जैसे पूरा गाँव उसे देख रहा हो।

     

    हर घर का दरवाजा बंद था।

     

    खिड़कियाँ बंद थीं।

     

    कहीं कोई आवाज नहीं थी।

     

    बस दूर कहीं कुत्ते के रोने की आवाज आ रही थी।

     

    हूँऽऽऽ… हूँऽऽऽ…

     

    नंदिनी तेज कदमों से आगे बढ़ने लगी।

     

    तभी उसे अपने पीछे किसी के चलने की आवाज सुनाई दी।

     

    छप… छप… छप…

     

    वह रुक गई।

     

    आवाज भी रुक गई।

     

    उसने पीछे देखा।

     

    सड़क खाली थी।

     

    नंदिनी ने खुद को समझाया—

     

    “शायद मेरा भ्रम है।”

     

    वह फिर आगे बढ़ी।

     

    कुछ कदम बाद वही आवाज फिर सुनाई दी।

     

    छप… छप… छप…

     

    इस बार आवाज बिल्कुल उसके पीछे थी।

     

    नंदिनी ने अचानक मुड़कर देखा।

     

    एक सफेद कपड़े पहने औरत सड़क के बीच खड़ी थी।

     

    उसके बाल चेहरे पर लटक रहे थे।

     

    चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    नंदिनी का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

     

    उसने कांपती आवाज में पूछा—

     

    “कौन हो तुम?”

     

    औरत ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    नंदिनी ने लालटेन ऊपर उठाई।

     

    अचानक हवा का तेज झोंका आया।

     

    लालटेन बुझ गई।

     

    अंधेरे में एक धीमी आवाज गूँजी—

     

    “नंदिनी…”

     

    नंदिनी के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “तुम मेरा नाम कैसे जानती हो?”

     

    औरत धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ने लगी।

     

    नंदिनी पीछे हटने लगी।

     

    फिर औरत ने अपना सिर उठाया।

     

    उसका चेहरा देखकर नंदिनी की चीख निकल गई।

     

    चेहरा सफेद था।

     

    आँखें बिल्कुल काली।

     

    और होंठों पर एक अजीब मुस्कान।

     

    वह औरत फुसफुसाई—

     

    “तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था…”

     

    नंदिनी भागने के लिए मुड़ी।

     

    लेकिन तभी उसके सामने कोई आकर खड़ा हो गया।

     

    वह उसका बचपन का दोस्त अमन था।

     

    अमन ने नंदिनी का हाथ पकड़ लिया।

     

    “भागो!”

     

    दोनों पूरी ताकत से दौड़ने लगे।

     

    पीछे से उस औरत की हँसी सुनाई दे रही थी।

     

    हा… हा… हा…

     

    दोनों दौड़ते हुए पुराने मंदिर तक पहुँचे।

     

    अमन ने मंदिर का दरवाजा बंद कर दिया।

     

    कुछ पल बाद बाहर किसी के पैरों की आवाज सुनाई दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    नंदिनी की साँसें तेज चल रही थीं।

     

    अमन ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “वह यहाँ तक आ गई है।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “तुमने उसे पहले भी देखा है?”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “कब?”

     

    “तीन दिन पहले।”

     

    “फिर तुमने किसी को बताया क्यों नहीं?”

     

    अमन कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “क्योंकि उस रात मैंने उसके पीछे जाकर जो देखा था… उसके बाद से मुझे डर लगता है।”

     

    “क्या देखा?”

     

    अमन ने मंदिर के फर्श की तरफ देखा।

     

    “वह किसी इंसान की तरह चल रही थी।”

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “तो?”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन उसके पैर उल्टी दिशा में थे।”

     

    नंदिनी के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    अचानक मंदिर के बाहर से एक आवाज आई—

     

    “अमन…”

     

    अमन काँप गया।

     

    आवाज उसकी माँ की थी।

     

    “बेटा… दरवाजा खोलो…”

     

    अमन दरवाजे की ओर बढ़ने लगा।

     

    नंदिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “रुको!”

     

    “मेरी माँ बाहर है!”

     

    “नहीं।”

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “क्योंकि तुम्हारी माँ तो पाँच साल पहले मर चुकी हैं।”

     

    अमन का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    बाहर की आवाज अचानक बदल गई।

     

    अब वह किसी बूढ़ी औरत की आवाज थी।

     

    “बहुत समझदार बनते हो…”

     

    मंदिर का दरवाजा जोर-जोर से हिलने लगा।

     

    धड़ाम! धड़ाम! धड़ाम!

     

    नंदिनी और अमन पीछे हट गए।

     

    फिर अचानक सब शांत हो गया।

     

    लगभग पाँच मिनट तक कोई आवाज नहीं आई।

     

    अमन ने धीरे से कहा—

     

    “शायद वह चली गई।”

     

    नंदिनी ने दरवाजे के पास जाकर बाहर झाँका।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    लेकिन जमीन पर कुछ लिखा हुआ था।

     

    राख से।

     

    नंदिनी नीचे बैठी और पढ़ने लगी।

     

    वहाँ लिखा था—

     

    “पहला नाम मिल गया।”

     

    नंदिनी के हाथ काँपने लगे।

     

    “पहला नाम?”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “किसका?”

     

    नंदिनी ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसी समय मंदिर के पीछे से घंटी बजने लगी।

     

    टन… टन… टन…

     

    दोनों पीछे मुड़े।

     

    मंदिर में कोई नहीं था।

     

    फिर भी घंटी लगातार बज रही थी।

     

    अमन ने कहा—

     

    “हमें यहाँ से निकलना होगा।”

     

    दोनों मंदिर से बाहर आए।

     

    सड़क पर पहुँचते ही उन्हें गाँव का बूढ़ा पुजारी हरिदास बाबा दिखाई दिया।

     

    उसने दोनों को देखते ही कहा—

     

    “तुम लोग उसके सामने आ गए?”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “किसके?”

     

    हरिदास ने बरगद की तरफ देखा।

     

    “गौरी के।”

     

    नंदिनी ने पहली बार वह नाम सुना था।

     

    “गौरी कौन?”

     

    हरिदास ने गहरी साँस ली।

     

    “जिसे इस गाँव ने डायन कहा था।”

     

    अमन ने घबराकर पूछा—

     

    “क्या वह सच में डायन थी?”

     

    हरिदास ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “नहीं।”

     

    दोनों चौंक गए।

     

    “तो फिर?”

     

    हरिदास ने कहा—

     

    “वह एक निर्दोष लड़की थी।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “फिर उसे डायन क्यों कहा गया?”

     

    हरिदास कुछ कहने ही वाला था कि अचानक बरगद के पेड़ की तरफ से किसी लड़की के रोने की आवाज आई।

     

    “मुझे बचा लो…”

     

    हरिदास का चेहरा बदल गया।

     

    उसने तुरंत दोनों से कहा—

     

    “मेरे साथ चलो।”

     

    तीनों मंदिर के अंदर वापस चले गए।

     

    हरिदास ने दरवाजा बंद किया।

     

    फिर उसने मंदिर के पुराने संदूक से एक कपड़े में लिपटी डायरी निकाली।

     

    “इसमें गौरी की कहानी है।”

     

    नंदिनी ने डायरी हाथ में ली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर कभी मेरा नाम डायन के रूप में लिया जाए, तो यह डायरी सच बताएगी।”

     

    नंदिनी ने पढ़ना शुरू किया।

     

    डायरी लगभग तीस वर्ष पुरानी थी।

     

    गौरी गाँव की सबसे गरीब लड़की थी।

     

    उसकी माँ जड़ी-बूटियों से लोगों का इलाज करती थी।

     

    गौरी ने भी अपनी माँ से वही विद्या सीखी थी।

     

    गाँव के लोग बीमार पड़ते तो गौरी उनकी मदद करती।

     

    लेकिन एक दिन गाँव में अचानक कई लोग बीमार पड़ने लगे।

     

    बच्चों को तेज बुखार आने लगा।

     

    जानवर मरने लगे।

     

    लोग डर गए।

     

    तभी गाँव के जमींदार भैरव सिंह ने कहा—

     

    “यह किसी डायन का काम है।”

     

    और उसने गौरी पर आरोप लगा दिया।

     

    गौरी ने बहुत समझाया।

     

    “मैंने किसी का बुरा नहीं किया।”

     

    लेकिन कोई उसकी बात सुनने को तैयार नहीं था।

     

    एक रात गाँव वालों की भीड़ उसके घर पहुँच गई।

     

    उन्होंने उसके घर में आग लगा दी।

     

    गौरी भागी।

     

    वह बरगद के पेड़ तक पहुँची।

     

    लेकिन वहाँ जमींदार के आदमी पहले से मौजूद थे।

     

    गौरी को पकड़ लिया गया।

     

    और उसी रात…

     

    वह गायब हो गई।

     

    डायरी यहीं खत्म हो गई थी।

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “आगे क्या हुआ?”

     

    हरिदास ने कहा—

     

    “यही तो रहस्य है।”

     

    “गौरी की लाश कभी नहीं मिली।”

     

    “लेकिन उसके बाद गाँव में एक-एक करके लोगों की मौत होने लगी।”

     

    अमन ने धीरे से पूछा—

     

    “क्या गौरी बदला लेने वापस आई?”

     

    हरिदास ने उसकी तरफ देखा।

     

    “शायद।”

     

    अचानक मंदिर की दीवार पर लगी घंटी अपने आप हिलने लगी।

     

    फिर एक काली परछाईं दीवार पर दिखाई दी।

     

    तीनों ने उस परछाईं को देखा।

     

    वह धीरे-धीरे बड़ी होती जा रही थी।

     

    फिर एक आवाज आई—

     

    “मुझे डायन बनाने वालों को… मैं कभी नहीं भूलूँगी…”

     

    दीवार पर खून जैसे लाल रंग से एक नाम उभर आया।

     

    भैरव सिंह।

     

    हरिदास के हाथ से डायरी गिर गई।

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “लेकिन भैरव सिंह तो तीस साल पहले मर चुका है।”

     

    हरिदास ने काँपते हुए कहा—

     

    “हाँ…”

     

    तभी परछाईं ने धीरे से दूसरा नाम लिखा।

     

    हरिदास।

     

    हरिदास पीछे हट गया।

     

    “नहीं…”

     

    नंदिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “बाबा, आपने क्या किया था?”

     

    हरिदास की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “मैंने…”

     

    वह कुछ बोल नहीं पाया।

     

    फिर मंदिर के बाहर किसी के चलने की आवाज आई।

     

    छप… छप… छप…

     

    तीनों ने दरवाजे की तरफ देखा।

     

    दरवाजे के नीचे से पानी अंदर आने लगा।

     

    लेकिन वह पानी नहीं था।

     

    वह काला था।

     

    और उसमें छोटे-छोटे लाल अक्षर तैर रहे थे।

     

    “सच बताओ…”

     

    हरिदास घुटनों के बल बैठ गया।

     

    “मैंने उसे नहीं मारा था…”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “तो फिर आपने क्या किया?”

     

    हरिदास ने सिर झुका लिया।

     

    “मैंने देखा था।”

     

    “क्या?”

     

    “उस रात मैंने गौरी को भागते देखा था।”

     

    “और?”

     

    “मैं उसे बचा सकता था।”

     

    “फिर बचाया क्यों नहीं?”

     

    हरिदास की आवाज टूट गई।

     

    “क्योंकि मैं डर गया था।”

     

    मंदिर के अंदर अचानक तेज हवा चली।

     

    दीपक बुझ गए।

     

    पूर्ण अंधकार छा गया।

     

    और अंधेरे में एक लड़की की आवाज गूँजी—

     

    “डरने वाले भी दोषी होते हैं…”

     

    नंदिनी ने महसूस किया कि किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा है।

     

    उसने धीरे-धीरे पीछे देखा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    लेकिन उसके कान के बिल्कुल पास किसी ने फुसफुसाया—

     

    “अब दूसरा नाम तुम्हारा है…”

     

    नंदिनी चीख पड़ी।

     

    और उसी क्षण मंदिर की सारी घंटियाँ एक साथ बज उठीं।

     

    टन… टन… टन… टन…

     

    दूर बरगद के पेड़ पर एक सफेद आकृति दिखाई दी।

     

    वह हवा में खड़ी थी।

     

    उसके बाल हवा में उड़ रहे थे।

     

    और उसके चेहरे पर एक भयानक मुस्कान थी।

     

    गौरी की आत्मा ने नंदिनी की तरफ देखा।

     

    फिर उसने अपना हाथ उठाकर गाँव के पुराने हवेली की ओर इशारा किया।

     

    और अचानक उसकी आवाज पूरे गाँव में गूँज उठी—

     

    “सच… उस हवेली के नीचे दफन है…”

     

    अगले ही पल वह गायब हो गई।

     

    नंदिनी ने अमन की तरफ देखा।

     

    अमन ने काँपते हुए पूछा—

     

    “अब?”

     

    नंदिनी ने हवेली की तरफ देखा।

     

    “अब हमें वहाँ जाना होगा।”

     

    लेकिन वे दोनों नहीं जानते थे कि उस हवेली के नीचे सिर्फ गौरी का राज नहीं दफन था।

     

    वहाँ ऐसा सच छिपा था…

     

    जिसे सामने आने के बाद पूरे गाँव की नींव हिलने वाली थी।

     

    और सबसे बड़ा सवाल अभी बाकी था—

     

    अगर गौरी निर्दोष थी, तो असली डायन कौन थी?

     

    जारी रहेगा…

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱 आत्मा का घर 😱 (A Complete Horror Story)

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

     

    रात के ठीक बारह बजकर तेरह मिनट हुए थे।गाँव के आखिरी छोर पर खड़ा वह पुराना मकान अँधेरे में किसी मरे हुए जानवर की तरह दिखाई दे रहा था। उसकी टूटी हुई खिड़कियों से आती हवा ऐसी आवाज़ कर रही थी, जैसे कोई अंदर बैठकर धीरे-धीरे रो रहा हो।

     

    गाँव वाले उसे “आत्मा का घर” कहते थे।

     

    कहा जाता था कि उस घर में जो भी रात बिताता है, सुबह तक उसकी आँखों में डर नहीं, बल्कि मौत उतर आती है।

     

    पिछले चालीस वर्षों से उस घर का दरवाज़ा बंद था।

     

    लेकिन उस रात…

     

    दरवाज़ा अपने आप खुला।

     

    चर्ररर…

     

    अंदर से ठंडी हवा का एक झोंका निकला और गाँव की सुनसान सड़क पर खड़े अर्जुन के चेहरे से टकराया।

     

    अर्जुन ने काँपते हुए अपनी घड़ी देखी।

     

    बारह बजकर चौदह मिनट।

     

    उसके पीछे उसका दोस्त निखिल खड़ा था।

     

    “अर्जुन… वापस चलते हैं।”

     

    अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तू डर गया?”

     

    निखिल ने घर की तरफ देखा और धीमी आवाज़ में बोला, “डर नहीं लगा होता तो भी वापस चलने को कहता। इस घर के बारे में जो सुना है, वह मज़ाक नहीं है।”

     

    अर्जुन मुस्कुराया।

     

    “भूत-वूत कुछ नहीं होते। कल तक मैं खुद साबित कर दूँगा कि इस घर का रहस्य सिर्फ एक अफवाह है।”

     

    निखिल ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “और अगर अफवाह नहीं हुई तो?”

     

    अर्जुन ने अपना हाथ छुड़ाया और घर के अंदर कदम रख दिया।

     

    निखिल कुछ पल वहीं खड़ा रहा।

     

    फिर मजबूरी में उसके पीछे चला गया।

     

    जैसे ही दोनों अंदर पहुँचे, दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    दोनों के शरीर में बिजली दौड़ गई।

     

    अर्जुन ने तुरंत पीछे मुड़कर दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।

     

    दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    “अरे… ये क्या?”

     

    निखिल ने काँपते हुए कहा, “मैंने कहा था ना… हमें नहीं आना चाहिए था।”

     

    अर्जुन ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    घर के अंदर हर तरफ धूल थी। दीवारों पर पुराने चित्र टंगे थे। कुछ चित्रों के चेहरे खरोंच दिए गए थे। कमरे के कोने में टूटी हुई कुर्सियाँ पड़ी थीं।

     

    लेकिन सबसे डरावनी चीज़ थी—

     

    दीवार पर लगी एक बड़ी घड़ी।

     

    उसकी सुइयाँ बारह बजकर तेरह मिनट पर अटकी हुई थीं।

     

    अर्जुन धीरे-धीरे उसके पास गया।

     

    तभी घड़ी चलने लगी।

     

    टक… टक… टक…

     

    निखिल ने पीछे हटते हुए कहा, “अर्जुन…”

     

    अर्जुन ने उसकी बात नहीं सुनी।

     

    घड़ी की सुइयाँ उल्टी दिशा में घूमने लगीं।

     

    फिर अचानक रुक गईं।

     

    बारह बजकर तेरह मिनट।

     

    उसी क्षण ऊपर की मंजिल से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आई।

     

    हूँ… हूँ… माँ…

     

    दोनों के चेहरे सफेद पड़ गए।

     

    निखिल ने फुसफुसाकर कहा, “यहाँ कोई बच्चा है?”

     

    अर्जुन ने हिम्मत जुटाकर कहा, “शायद कोई जानवर होगा।”

     

    “जानवर ‘माँ’ नहीं बोलते।”

     

    दोनों सीढ़ियों की तरफ बढ़े।

     

    हर कदम के साथ सीढ़ियाँ कराह रही थीं।

     

    चीं… चीं…

     

    ऊपर पहुँचकर उन्हें एक लंबा गलियारा दिखाई दिया।

     

    गलियारे के अंत में एक दरवाज़ा था।

     

    उस दरवाज़े पर लाल रंग से लिखा था—

     

    “जिसे अंदर आना हो, पहले अपना नाम बता।”

     

    अर्जुन ने उसे पढ़कर हँसने की कोशिश की।

     

    “किसी ने मज़ाक में लिखा होगा।”

     

    तभी पीछे से आवाज़ आई—

     

    “अर्जुन…”

     

    अर्जुन जम गया।

     

    आवाज़ बिल्कुल उसकी माँ जैसी थी।

     

    “अर्जुन… बेटा…”

     

    उसकी आँखों में आँसू आ गए।

     

    “माँ?”

     

    निखिल ने उसका कंधा पकड़ लिया।

     

    “रुक!”

     

    आवाज़ फिर आई।

     

    “अर्जुन… इधर आओ…”

     

    अर्जुन आगे बढ़ने ही वाला था कि निखिल ने उसका मुँह दबा दिया।

     

    “तेरी माँ तो गाँव में है ही नहीं। उन्हें गुज़रे पाँच साल हो चुके हैं।”

     

    अर्जुन का शरीर सुन्न हो गया।

     

    आवाज़ अचानक बदल गई।

     

    अब वह किसी बूढ़ी औरत की थी।

     

    “तुम दोनों… यहाँ क्यों आए हो?”

     

    गलियारे की सारी खिड़कियाँ एक साथ खुल गईं।

     

    धड़ाम! धड़ाम! धड़ाम!

     

    हवा के साथ बर्फ जैसी ठंड अंदर भर गई।

     

    और फिर दीवार पर लगे सारे चित्र नीचे गिर गए।

     

    उन चित्रों के पीछे एक और दीवार दिखाई दी।

     

    उस पर सैकड़ों नाम लिखे थे।

     

    अर्जुन ने मोबाइल की रोशनी डाली।

     

    सबसे ऊपर पुराने नाम थे।

     

    फिर नए।

     

    और सबसे नीचे…

     

    उसने अपना नाम देखा।

     

    “अर्जुन — 9 अगस्त 2026”

     

    उसका दिल रुकने जैसा हो गया।

     

    निखिल ने भी नाम देख लिया।

     

    “यह… यह कैसे हो सकता है?”

     

    अर्जुन पीछे हट गया।

     

    “किसी ने हमारा नाम पहले से लिखा है।”

     

    तभी उसके नीचे एक और नाम दिखाई दिया।

     

    “निखिल — 9 अगस्त 2026”

     

    निखिल की चीख निकल गई।

     

    उसी समय गलियारे के अंत वाला दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

     

    अंदर एक छोटा-सा कमरा था।

     

    कमरे के बीचोंबीच लकड़ी की एक मेज थी।

     

    मेज पर एक पुरानी डायरी रखी थी।

     

    अर्जुन ने डायरी उठाई।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “मेरा नाम सावित्री है। अगर तुम यह पढ़ रहे हो, तो समझ लो कि घर ने तुम्हें अपना अगला मेहमान चुन लिया है।”

     

    अर्जुन ने अगला पन्ना पलटा।

     

    डायरी लगभग चालीस साल पुरानी थी।

     

    उसमें लिखा था कि इस घर में सावित्री अपने पति और दस साल की बेटी राधा के साथ रहती थी।

     

    एक रात गाँव में भयंकर तूफान आया।

     

    सावित्री का पति शहर गया हुआ था।

     

    राधा घर में अकेली थी।

     

    तभी घर में आग लग गई।

     

    सावित्री ने अपनी बेटी को बचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन दोनों घर से बाहर नहीं निकल पाए।

     

    लोगों ने सुबह घर को जलता हुआ पाया।

     

    माँ और बेटी दोनों मर चुके थे।

     

    लेकिन गाँव वालों ने एक अजीब बात देखी।

     

    आग बुझने के बाद भी घर का एक कमरा बिल्कुल सही था।

     

    वही कमरा जिसमें राधा सोती थी।

     

    उस दिन के बाद उस घर से रात में रोने की आवाज़ें आने लगीं।

     

    लोगों ने कहा कि सावित्री की आत्मा अपनी बेटी को खोजती रहती है।

     

    लेकिन डायरी में अगली बात और भी डरावनी थी।

     

    “राधा की आत्मा घर में नहीं थी।”

     

    अर्जुन ने पन्ना पलटा।

     

    सावित्री ने लिखा था कि आग लगने की रात राधा ने घर के तहखाने में किसी को देखा था।

     

    एक अजनबी आदमी।

     

    वह आदमी घर में चोरी करने आया था।

     

    उसने ही गलती से आग लगाई थी।

     

    लेकिन सावित्री ने अपनी बेटी की जान बचाने की कोशिश में उस आदमी का चेहरा देख लिया था।

     

    उस आदमी ने भागने से पहले सावित्री पर हमला किया।

     

    सावित्री मर गई।

     

    राधा भी धुएँ में दम घुटने से मर गई।

     

    लेकिन मरने से पहले सावित्री ने उस आदमी का नाम दीवार पर अपने खून से लिख दिया था।

     

    अर्जुन ने घबराकर पूछा, “उसका नाम क्या था?”

     

    डायरी के अगले पन्ने पर सिर्फ एक शब्द था।

     

    “हरिनारायण।”

     

    निखिल अचानक बोला, “यह नाम तो गाँव के पुराने जमींदार का था।”

     

    अर्जुन ने उसकी ओर देखा।

     

    “था?”

     

    निखिल ने सिर हिलाया।

     

    “वह उसी रात गायब हो गया था।”

     

    अचानक कमरे की बत्ती जैसी कोई चीज़ जल उठी।

     

    कमरे के बीच एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    सफेद कपड़े।

     

    लंबे काले बाल।

     

    चेहरा झुका हुआ।

     

    निखिल ने अर्जुन का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    लड़की ने धीरे-धीरे अपना चेहरा ऊपर उठाया।

     

    उसकी आँखें नहीं थीं।

     

    सिर्फ दो काले गड्ढे।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम लोग भी उसे ढूँढ़ने आए हो?”

     

    अर्जुन की आवाज़ नहीं निकली।

     

    लड़की ने अपना हाथ उठाया।

     

    उसकी उँगली तहखाने की ओर थी।

     

    “वह नीचे है।”

     

    इतना कहकर वह गायब हो गई।

     

    फिर पूरे घर में एक साथ हँसी गूँजने लगी।

     

    हा… हा… हा… हा…

     

    अर्जुन और निखिल भागते हुए सीढ़ियों से नीचे उतरे।

     

    तहखाने का दरवाज़ा बंद था।

     

    दरवाज़े पर खून से लिखा था—

     

    “सच देखने के लिए आँखें नहीं, हिम्मत चाहिए।”

     

    अर्जुन ने दरवाज़ा खोला।

     

    अंदर घुप्प अँधेरा था।

     

    दोनों नीचे गए।

     

    कुछ दूर चलने के बाद उन्हें लोहे का एक संदूक मिला।

     

    संदूक खोलते ही उसमें पुराने कागज़, कुछ तस्वीरें और एक इंसानी खोपड़ी दिखाई दी।

     

    निखिल पीछे हट गया।

     

    तस्वीरों में हरिनारायण था।

     

    लेकिन आखिरी तस्वीर देखकर अर्जुन के हाथ काँपने लगे।

     

    तस्वीर में हरिनारायण के साथ गाँव के कई सम्मानित लोग खड़े थे।

     

    उनमें अर्जुन के दादा भी थे।

     

    अर्जुन की साँस रुक गई।

     

    तस्वीर के पीछे लिखा था—

     

    “जिसने अपराध देखा और चुप रहा, वह अपराधी से कम दोषी नहीं।”

     

    अर्जुन को अचानक अपने दादा की कही एक बात याद आई।

     

    बचपन में दादा हमेशा कहते थे—

     

    “उस पुराने घर के पास कभी मत जाना।”

     

    अर्जुन समझ गया।

     

    गाँव के लोगों ने सिर्फ डर के कारण उस घटना को दबा दिया था।

     

    हरिनारायण ने अपराध किया था, लेकिन उसे सज़ा नहीं मिली।

     

    और सावित्री की आत्मा चालीस वर्षों से उसी न्याय की प्रतीक्षा कर रही थी।

     

    तभी तहखाने में किसी के कदमों की आवाज़ आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    निखिल ने मोबाइल उठाया।

     

    सामने कोई नहीं था।

     

    फिर आवाज़ पीछे से आई।

     

    दोनों ने मुड़कर देखा।

     

    एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।

     

    चेहरा जला हुआ।

     

    आँखें लाल।

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “इतने साल बाद कोई मुझे पहचानने आया है…”

     

    अर्जुन समझ गया।

     

    “हरिनारायण!”

     

    बूढ़े ने ज़ोर से हँसते हुए कहा—

     

    “हाँ… वही हरिनारायण।”

     

    उसने हाथ आगे बढ़ाया।

     

    “तुम्हारे दादा ने मुझे बचाया था। बदले में मैंने उन्हें अपनी जमीन का हिस्सा दिया था।”

     

    अर्जुन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “तुम झूठ बोल रहे हो!”

     

    हरिनारायण ने उसकी तरफ देखकर कहा—

     

    “सच हमेशा सबसे ज्यादा डरावना होता है।”

     

    अचानक सावित्री की चीख पूरे तहखाने में गूँज उठी।

     

    “हरिनारायण!”

     

    बूढ़े का चेहरा विकृत हो गया।

     

    दीवारों से धुआँ निकलने लगा।

     

    चारों तरफ आग की लपटें दिखाई देने लगीं।

     

    हरिनारायण चीखने लगा।

     

    “नहीं! मुझे छोड़ दो!”

     

    एक सफेद साया उसके पीछे दिखाई दिया।

     

    सावित्री।

     

    उसके साथ वही छोटी लड़की राधा भी थी।

     

    सावित्री ने हरिनारायण की ओर देखा और कहा—

     

    “जिस घर को तुमने जलाया था, आज वही घर तुम्हारा न्याय करेगा।”

     

    अगले ही पल हरिनारायण का शरीर राख में बदल गया।

     

    आग अचानक गायब हो गई।

     

    सावित्री ने अर्जुन की तरफ देखा।

     

    उसकी आँखों में अब क्रोध नहीं था।

     

    सिर्फ दुख था।

     

    “सच को दबाने वाले भी दोषी होते हैं।”

     

    अर्जुन की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    सावित्री ने सिर हिलाया।

     

    “तुम्हारा अपराध नहीं था। लेकिन अब तुम्हारे हाथ में एक जिम्मेदारी है।”

     

    “क्या?”

     

    “सच गाँव वालों तक पहुँचाना।”

     

    इतना कहकर सावित्री और राधा धीरे-धीरे धुएँ में विलीन हो गईं।

     

    तहखाने का दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

     

    अर्जुन और निखिल बाहर भागे।

     

    सुबह गाँव वालों ने दोनों को घर के बाहर बेहोश पाया।

     

    अर्जुन ने होश में आते ही सबको पुरानी डायरी और तस्वीरें दिखाईं।

     

    गाँव के बुजुर्गों ने जब तस्वीर देखी तो उनके चेहरे उतर गए।

     

    अर्जुन के दादा का सच सामने आ चुका था।

     

    गाँव वालों ने उस पुराने अपराध को स्वीकार किया।

     

    उस दिन के बाद उस घर में कभी रोने की आवाज़ नहीं आई।

     

    कहा जाता है कि उसी रात पहली बार उस घर की टूटी खिड़कियों से ठंडी हवा नहीं, बल्कि चमेली के फूलों की खुशबू आई थी।

     

    कुछ दिनों बाद गाँव वालों ने उस घर को गिराने का फैसला किया।

     

    लेकिन जब मजदूरों ने आखिरी दीवार तोड़ी, तो उसके पीछे एक छोटा-सा कमरा मिला।

     

    कमरे की दीवार पर दो नाम लिखे थे—

     

    सावित्री।

     

    राधा।

     

    और उनके नीचे एक आखिरी वाक्य—

     

    “अब हमारा घर नहीं, हमारी कहानी बची रहे।”

     

    उसके बाद उस जगह पर गाँव वालों ने एक छोटा-सा स्मारक बना दिया।

     

    लोग वहाँ दीपक जलाने लगे।

     

    और अर्जुन हर साल वहाँ जाकर एक बात जरूर कहता—

     

    “भूतों से डरने से पहले अपने कर्मों से डरना सीखो।”

     

    क्योंकि उस रात अर्जुन ने समझ लिया था कि हर डरावनी जगह के पीछे कोई आत्मा नहीं होती।

     

    कभी-कभी वहाँ दबा हुआ सच होता है।

     

    कभी किसी निर्दोष की चीख होती है।

     

    कभी किसी के साथ हुआ अन्याय होता है।

     

    और कभी-कभी…

     

    सबसे डरावना भूत हमारे अपने अपराध और हमारी चुप्पी होती है।

     

    (सीख)

    इस कहानी की सबसे बड़ी सीख यही है कि गलत होते हुए देखकर चुप रहना भी एक तरह का अपराध है।

     

    हमें किसी भी निर्दोष के साथ अन्याय होते देखकर आवाज़ उठानी चाहिए। डर, लालच या अपने स्वार्थ के कारण सच को दबाने से समस्या खत्म नहीं होती; वह और गहरी होती जाती है।

     

    और सबसे जरूरी बात—

     

    डर से भागने वाला इंसान शायद कुछ समय के लिए बच जाए, लेकिन सच से भागने वाला इंसान पूरी जिंदगी अपने भीतर डर लेकर जीता है।

     

    इसलिए अंधविश्वास से नहीं, सत्य से डरिए।

     

    क्योंकि आत्माओं के घर से ज्यादा खतरनाक वह घर होता है, जहाँ सच को दफना दिया जाता है।

     

     

    END

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱सुहागन चुड़ैल😱तहखाने का रहस्य (अंतिम भाग)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    😱सुहागन चुड़ैल😱तहखाने का रहस्य (अंतिम भाग)

     

     

     

    मंदिर की सीढ़ियों पर हवा में लहराती लाल चुनरी धीरे-धीरे अर्जुन की ओर बढ़ने लगी। देखते ही देखते वह चुनरी उसके गले में लिपट गई। अर्जुन ने पूरी ताकत से उसे खींचकर अलग किया, लेकिन चुनरी मानो किसी जीवित प्राणी की तरह उसे जकड़ती जा रही थी।

    तभी पुजारी ने शिवलिंग के पास रखा गंगाजल उठाकर चुनरी पर छिड़क दिया।

    “ॐ नमः शिवाय!”

    मंत्र की गूँज के साथ चुनरी से एक भयानक चीख निकली और वह जलकर राख बन गई।

    पुजारी ने अर्जुन की ओर देखा।

    “आज दूसरी रात है। कल सूर्योदय से पहले अगर नंदिनी की आत्मा को मुक्ति नहीं मिली, तो वह तुम्हें हमेशा के लिए अपने साथ ले जाएगी।”

    अर्जुन ने दृढ़ स्वर में कहा, “मैं आज ही हवेली जाऊँगा।”

    पुजारी ने उसे एक रुद्राक्ष की माला, थोड़ा गंगाजल और एक पुराना तांबे का त्रिशूल दिया।

    “डरना मत। डर ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।”

    आधी रात होते ही अर्जुन फिर लाल हवेली पहुँचा।

    इस बार हवेली पहले से भी अधिक डरावनी लग रही थी। हर खिड़की अपने आप खुल-बंद हो रही थी। ऐसा लग रहा था मानो पूरी हवेली साँस ले रही हो।

    जैसे ही वह अंदर पहुँचा, ऊपर से पायल की आवाज़ आने लगी।

    लेकिन अर्जुन इस बार ऊपर नहीं गया।

    उसे पता था कि असली रहस्य तहखाने में छिपा है।

    काफी खोजने के बाद उसे फर्श के नीचे एक लोहे का पुराना दरवाज़ा मिला। उसने पूरी ताकत लगाकर उसे खोला।

    नीचे से सड़ी हुई मिट्टी और खून जैसी बदबू उठी।

    वह सीढ़ियाँ उतरने लगा।

    हर कदम के साथ अंधेरा गहराता जा रहा था।

    अचानक उसके पीछे किसी ने फुसफुसाया—

    “मत जाओ…”

    अर्जुन ने पीछे मुड़कर देखा।

    कोई नहीं था।

    वह आगे बढ़ा।

    तहखाने के बीचों-बीच एक टूटी हुई संदूक रखी थी।

    उसने संदूक खोली।

    अंदर लाल शादी का जोड़ा, टूटी हुई चूड़ियाँ, सूखा हुआ सिंदूर और एक पुरानी डायरी रखी थी।

    डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—

    “अगर यह डायरी किसी के हाथ लगे, तो जान लेना… मुझे डाकुओं ने नहीं, इसी हवेली के मालिक ने मारा है। उसने मुझे तहखाने में बंद कर दिया। मैं कई दिनों से भूखी हूँ। शायद अब मैं बचूँगी नहीं। लेकिन जिसने मेरा सुहाग छीना, उसकी सात पीढ़ियाँ चैन से नहीं जी पाएँगी…”

    अर्जुन की आँखें नम हो गईं।

    उसी समय पूरी हवेली काँप उठी।

    तहखाने की दीवारें हिलने लगीं।

    अंधेरे से वही लाल दुल्हन बाहर आई।

    इस बार उसका चेहरा पहले से भी अधिक भयानक था।

    उसके बाल ज़मीन तक लटक रहे थे।

    आँखों से खून बह रहा था।

    वह धीमे कदमों से अर्जुन की ओर बढ़ी।

    “तुमने मेरा राज़ जान लिया…”

    अर्जुन ने काँपते हुए कहा—

    “नंदिनी… तुम्हारे साथ बहुत अन्याय हुआ।”

    कुछ पल के लिए उसका चेहरा बदल गया।

    उसकी आँखों में दर्द दिखाई दिया।

    लेकिन अगले ही क्षण वह फिर चीख उठी।

    “सब झूठे हैं… सबने मुझे अकेला छोड़ दिया…”

    उसने अपने हाथ फैलाए।

    पूरा तहखाना काली धुंध से भर गया।

    सैकड़ों आत्माएँ दिखाई देने लगीं।

    वे वही लोग थे जो वर्षों से गायब हुए थे।

    सबकी आँखें बंद थीं।

    सबके गले पर लाल चूड़ियों के निशान थे।

    अर्जुन ने हिम्मत जुटाई।

    उसने गंगाजल चारों ओर छिड़का।

    आत्माएँ धीरे-धीरे शांत होने लगीं।

    लेकिन नंदिनी और भी क्रोधित हो गई।

    वह हवा में उठी और अर्जुन पर झपट पड़ी।

    अर्जुन ने तांबे का त्रिशूल आगे कर दिया।

    त्रिशूल की नोक से तेज़ प्रकाश निकला।

    नंदिनी दर्द से चीख उठी।

    उसी समय अर्जुन की नज़र तहखाने के एक कोने पर पड़ी।

    वहाँ मिट्टी का एक छोटा-सा उभरा हुआ ढेर था।

    उसे समझते देर नहीं लगी।

    यही उसकी कब्र थी।

    अर्जुन ने जल्दी-जल्दी मिट्टी हटानी शुरू की।

    कुछ ही देर में उसे हड्डियों का एक कंकाल मिला।

    कंकाल के हाथों में अब भी लाल चूड़ियों के टूटे हुए टुकड़े थे।

    अर्जुन की आँखों से आँसू बह निकले।

    उसने सम्मान से कंकाल को सफेद कपड़े में लपेटा।

    तभी नंदिनी की आत्मा उसके सामने आकर खड़ी हो गई।

    इस बार उसके चेहरे पर क्रोध नहीं था।

    वह रो रही थी।

    धीरे से बोली—

    “क्या… मुझे सचमुच मुक्ति मिलेगी?”

    अर्जुन ने सिर झुका दिया।

    “हाँ।”

    वह कंकाल को लेकर हवेली के बाहर आया।

    पुजारी पहले से वहाँ मौजूद थे।

    भोर होने ही वाली थी।

    श्मशान में पूरे विधि-विधान से नंदिनी का अंतिम संस्कार किया गया।

    जैसे ही अग्नि की लपटें उठीं, आसमान में तेज़ बिजली चमकी।

    हवा अचानक शांत हो गई।

    दूर लाल हवेली से एक लंबी, दर्दभरी चीख सुनाई दी।

    फिर सब कुछ शांत हो गया।

    कुछ क्षण बाद अर्जुन ने पीछे मुड़कर देखा।

    सफेद रोशनी के बीच नंदिनी खड़ी थी।

    लेकिन अब वह चुड़ैल नहीं थी।

    वह एक शांत, मुस्कुराती हुई दुल्हन थी।

    उसने हाथ जोड़कर अर्जुन को प्रणाम किया।

    “धन्यवाद…”

    इतना कहकर वह प्रकाश में विलीन हो गई।

    उसी क्षण हवेली की दीवारों में दरारें पड़ने लगीं।

    कुछ ही मिनटों में पूरी लाल हवेली ज़मीन पर ढह गई।

    उसके साथ ही वर्षों पुराना श्राप भी समाप्त हो गया।

    सुबह जब गाँव वाले वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने पहली बार उस जगह पर डर नहीं, बल्कि शांति महसूस की।

    सरपंच ने अर्जुन से कहा—

    “आज पच्चीस साल बाद भैरवपुर ने चैन की साँस ली है।”

    अर्जुन मुस्कुराया।

    उसने अपनी डायरी में आख़िरी पंक्ति लिखी—

    “हर भटकती आत्मा डरावनी नहीं होती। कुछ आत्माएँ केवल न्याय और सम्मान की प्रतीक्षा करती हैं। जब उन्हें वह मिल जाता है, तो सबसे गहरा अंधेरा भी समाप्त हो जाता है।”

    समाप्त।

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