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लेखक: Alka Singh

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Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

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  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

     

    भाग 5 — माखनचोर नंदलाल: जब कान्हा ने गोकुल में मचा दी धूम

     

     

     

    गोकुल की गलियों में अब एक नया नाम बहुत तेजी से प्रसिद्ध हो रहा था।

     

    वह नाम था—

     

    माखनचोर कन्हैया।

     

    लेकिन यह नाम किसी ने प्रेम से रखा था या शिकायत करते हुए, यह कहना कठिन था।

     

    क्योंकि गोकुल की गोपियों के घरों में जब भी कोई माखन की मटकी खाली मिलती, तो सबसे पहले सबकी निगाहें नंद बाबा के घर की ओर उठतीं।

     

    और वहाँ क्या मिलता?

     

    एक नन्हा-सा बालक।

     

    घुँघराले बाल।

     

    माथे पर छोटी-सी लट।

     

    आँखों में शरारत।

     

    होंठों पर मुस्कान।

     

    और चेहरे पर ऐसा भाव—

     

    मानो उसने कुछ किया ही न हो।

     

    वह थे हमारे नंदलाल।

     

    श्रीकृष्ण।

     

    —

     

    माखन से कृष्ण का प्रेम

     

    यशोदा मैया प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर घर के काम में लग जाती थीं।

     

    गायों का दूध दुहा जाता।

     

    दूध को उबाला जाता।

     

    फिर उससे दही जमाया जाता।

     

    और अगले दिन सुबह यशोदा मैया बड़े प्रेम से दही मथकर उसमें से सफेद-सफेद माखन निकालतीं।

     

    माखन को देखकर कृष्ण की आँखें चमक उठतीं।

     

    जब वे बहुत छोटे थे, तब बस दूर से माखन को देखते थे।

     

    लेकिन अब तो घुटनों के बल चलना सीख चुके थे।

     

    इसलिए माखन उनके लिए केवल देखने की वस्तु नहीं रह गया था।

     

    वह उनके लिए अधिकार की वस्तु बन चुका था।

     

    एक दिन यशोदा मैया माखन निकाल रही थीं।

     

    कृष्ण पास में बैठे उन्हें ध्यान से देख रहे थे।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “क्या देख रहे हो लाला?”

     

    कृष्ण चुप।

     

    यशोदा ने फिर पूछा—

     

    “माखन चाहिए?”

     

    कृष्ण ने तुरंत सिर हिला दिया।

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “अच्छा! अभी देती हूँ।”

     

    उन्होंने एक छोटी-सी कटोरी में माखन निकाला और कृष्ण को दे दिया।

     

    कृष्ण ने दोनों हाथों से कटोरी पकड़ ली।

     

    पहले थोड़ा-सा माखन खाया।

     

    फिर मैया की ओर देखा।

     

    फिर थोड़ा और खाया।

     

    और फिर पूरी कटोरी खाली कर दी।

     

    यशोदा हँसते हुए बोलीं—

     

    “बस भी कर! इतना माखन खाएगा तो पेट दुखेगा।”

     

    कृष्ण ने कटोरी आगे बढ़ा दी।

     

    मानो कह रहे हों—

     

    “मैया, अभी तो शुरुआत हुई है।”

     

    —

     

    कृष्ण को अपना माखन क्यों पसंद नहीं था?

     

    गोकुल की एक विचित्र बात थी।

     

    हर घर में माखन था।

     

    कृष्ण को जब भी माखन चाहिए होता, यशोदा मैया उन्हें माखन दे देतीं।

     

    फिर भी कृष्ण को दूसरे घरों का माखन अधिक प्रिय था।

     

    एक दिन यशोदा मैया ने कृष्ण से पूछा—

     

    “लाला, मेरे घर का माखन अच्छा नहीं लगता क्या?”

     

    कृष्ण ने तुरंत सिर हिला दिया।

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तो फिर पड़ोस की गोपी के घर क्यों जाते हो?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    यशोदा ने उनकी आँखों में देखा।

     

    “अच्छा! अब समझी। तुम्हें माखन से ज्यादा चोरी करना पसंद है।”

     

    कृष्ण खिलखिलाकर हँस पड़े।

     

    —

     

    पहली बड़ी चोरी

     

    एक सुबह यशोदा मैया किसी काम से बाहर गई थीं।

     

    कृष्ण ने देखा कि घर में माखन की मटकी ऊपर टँगी हुई है।

     

    कृष्ण ने मटकी की ओर देखा।

     

    फिर अपने छोटे-छोटे हाथों की ओर देखा।

     

    फिर आसपास देखा।

     

    कोई दिखाई नहीं दिया।

     

    उन्होंने सोचा—

     

    “आज तो अवसर अच्छा है।”

     

    लेकिन मटकी बहुत ऊँचाई पर थी।

     

    कृष्ण अकेले उसे नहीं पहुँच सकते थे।

     

    तभी उन्हें अपने ग्वाल-बाल मित्र दिखाई दिए।

     

    कृष्ण ने उन्हें संकेत किया।

     

    सब बच्चे पास आए।

     

    एक बोला—

     

    “क्या हुआ कन्हैया?”

     

    कृष्ण ने मटकी की ओर उँगली की।

     

    बच्चे समझ गए।

     

    एक ने कहा—

     

    “माखन?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।

     

    अब योजना बननी शुरू हुई।

     

    सबसे पहले एक बालक नीचे बैठा।

     

    उसके ऊपर दूसरा।

     

    फिर उसके ऊपर तीसरा।

     

    और सबसे ऊपर चढ़े—

     

    कन्हैया।

     

    कृष्ण धीरे-धीरे ऊपर पहुँचे।

     

    उन्होंने मटकी पकड़ ली।

     

    लेकिन मटकी बहुत कसकर बाँधी गई थी।

     

    कृष्ण ने खींचा।

     

    नहीं निकली।

     

    उन्होंने फिर खींचा।

     

    फिर भी नहीं निकली।

     

    तब उन्होंने अपने मित्रों से कहा—

     

    “और जोर लगाओ!”

     

    सभी बच्चों ने एक साथ जोर लगाया।

     

    मटकी हिली।

     

    फिर हिली।

     

    और अचानक—

     

    धड़ाम!

     

    मटकी नीचे गिर गई।

     

    दही और माखन चारों ओर फैल गया।

     

    कृष्ण ने तुरंत माखन उठाया।

     

    एक मित्र के मुँह में लगाया।

     

    फिर दूसरे के।

     

    फिर स्वयं खाने लगे।

     

    सभी बच्चे हँसने लगे।

     

    —

     

    गोपी ने देख लिया

     

    लेकिन उन्हें पता नहीं था कि पास की खिड़की से एक गोपी यह सब देख रही थी।

     

    वह चुपचाप खड़ी होकर सब देखती रही।

     

    उसने सोचा—

     

    “आज तो नंदलाल को रंगे हाथों पकड़ लिया।”

     

    वह तुरंत यशोदा मैया के पास पहुँची।

     

    “यशोदा!”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    गोपिका बोली—

     

    “अपने लाला को समझाओ।”

     

    यशोदा ने आश्चर्य से पूछा—

     

    “क्यों? क्या कर दिया उसने?”

     

    गोपिका बोली—

     

    “तुम्हारा लाल हमारे घर का माखन चुराने लगा है।”

     

    यशोदा ने हँसकर कहा—

     

    “अरे, मेरा कन्हैया ऐसा नहीं कर सकता।”

     

    गोपी बोली—

     

    “अच्छा? तो मेरे साथ चलो।”

     

    यशोदा उनके साथ चल पड़ीं।

     

    —

     

    शिकायतों की शुरुआत

     

    अब तो जैसे गोकुल की सभी गोपियों को एक अवसर मिल गया।

     

    एक गोपी बोली—

     

    “यशोदा, तुम्हारा कृष्ण मेरे घर से माखन चुरा ले जाता है।”

     

    दूसरी बोली—

     

    “मेरे घर में तो मटकी ही फोड़ दी।”

     

    तीसरी बोली—

     

    “मेरे घर का माखन खाकर बंदरों को भी खिला देता है।”

     

    चौथी बोली—

     

    “और मेरे घर में तो माखन खाकर ऊपर से मुस्कुराता है!”

     

    यशोदा मैया सबकी बातें सुनती रहीं।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “सच कह रही हो?”

     

    एक साथ कई गोपियाँ बोलीं—

     

    “हाँ!”

     

    तभी पीछे से किसी ने हँसकर कहा—

     

    “यशोदा, तुम्हारा लाल बहुत बड़ा चोर है।”

     

    यशोदा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    कृष्ण चुपचाप खड़े थे।

     

    उनके होंठों पर माखन लगा हुआ था।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “कन्हैया! यह क्या है?”

     

    कृष्ण ने तुरंत अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया।

     

    सभी गोपियाँ हँस पड़ीं।

     

    —

     

    कृष्ण की मासूम सफाई

     

    यशोदा ने कृष्ण को अपनी ओर बुलाया।

     

    “इधर आओ।”

     

    कृष्ण धीरे-धीरे आगे आए।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “तुमने माखन चुराया?”

     

    कृष्ण ने सिर हिला दिया—

     

    “नहीं।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “तो तुम्हारे मुँह पर माखन कैसे लगा?”

     

    कृष्ण चुप।

     

    यशोदा ने फिर पूछा—

     

    “बोलो।”

     

    कृष्ण ने अपनी आँखें बड़ी कर लीं।

     

    फिर धीरे से बोले—

     

    “मैया… मुझे तो बंदर ने लगाया।”

     

    गोपियाँ हँसते-हँसते दोहरी हो गईं।

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “अच्छा! अब बंदर तुम्हारे मुँह पर माखन लगाने लगे?”

     

    कृष्ण मुस्कुरा दिए।

     

    यशोदा समझ गईं कि उनका लाल सच नहीं बोल रहा।

     

    लेकिन उनका मन कठोर कैसे होता?

     

    उन्होंने कृष्ण को गोद में उठा लिया।

     

    गोपियाँ बोलीं—

     

    “देखा! फिर बच गया।”

     

    —

     

    एक नई शरारत

     

    लेकिन कृष्ण कहाँ रुकने वाले थे?

     

    अगले दिन उन्होंने एक नई योजना बनाई।

     

    अब वह अकेले चोरी नहीं करते थे।

     

    उन्होंने अपने मित्रों की पूरी टोली बना ली थी।

     

    एक बालक दरवाजे पर पहरा देता।

     

    दूसरा खिड़की के पास खड़ा रहता।

     

    तीसरा मटकी तक पहुँचने की व्यवस्था करता।

     

    और कृष्ण?

     

    वे तो स्वयं सेनापति थे।

     

    कृष्ण ने कहा—

     

    “जब मैं संकेत करूँ, तब सब माखन खाना।”

     

    सबने सिर हिलाया।

     

    कृष्ण घर में घुसे।

     

    मटकी देखी।

     

    धीरे से उसे नीचे उतारा।

     

    माखन निकाला।

     

    पहले स्वयं खाया।

     

    फिर सबको बाँट दिया।

     

    फिर बोले—

     

    “जो यहाँ आया है, उसे खाली हाथ नहीं जाना चाहिए।”

     

    उन्होंने थोड़ा माखन बाहर बैठे बंदरों को भी दे दिया।

     

    बंदर माखन खाते रहे।

     

    बच्चे हँसते रहे।

     

    कृष्ण भी हँसते रहे।

     

    उन्हें देखकर ऐसा लगता था जैसे गोकुल में कोई बड़ा उत्सव चल रहा हो।

     

    —

     

    गोपियों ने बनाई योजना

     

    अब गोपियाँ भी कृष्ण की शरारतों से परेशान होने लगीं।

     

    उन्होंने आपस में सलाह की।

     

    एक बोली—

     

    “अब माखन ऐसी जगह रखेंगे जहाँ कृष्ण पहुँच ही न सके।”

     

    दूसरी बोली—

     

    “मटकी बहुत ऊँचाई पर बाँधेंगे।”

     

    तीसरी बोली—

     

    “घर के दरवाजे बंद रखेंगे।”

     

    चौथी बोली—

     

    “देखते हैं अब नंदलाल कैसे चोरी करते हैं।”

     

    सब हँस पड़ीं।

     

    लेकिन वे कृष्ण को अभी ठीक से जानती नहीं थीं।

     

    कृष्ण ने जब यह योजना सुनी तो मुस्कुरा दिए।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “माखन छिपाओगी?”

     

    उनकी आँखों में शरारत चमक रही थी।

     

    “तो हम भी देखेंगे।”

     

    —

     

    ऊँची मटकी और नंदलाल

     

    अगले दिन गोपियों ने माखन की मटकी बहुत ऊँचाई पर बाँध दी।

     

    कृष्ण घर में आए।

     

    उन्होंने ऊपर देखा।

     

    मटकी बहुत दूर थी।

     

    कृष्ण ने अपने हाथ कमर पर रखे।

     

    कुछ क्षण सोचा।

     

    फिर बाहर गए।

     

    अपने मित्रों को बुलाया।

     

    सबने मिलकर एक-दूसरे के ऊपर चढ़ना शुरू किया।

     

    कृष्ण सबसे ऊपर पहुँचे।

     

    उन्होंने मटकी को देखा।

     

    मटकी भी जैसे उन्हें देखकर डर रही हो।

     

    कृष्ण ने धीरे से हाथ बढ़ाया।

     

    लेकिन तभी—

     

    दरवाजे के बाहर से आवाज आई—

     

    “अरे! कौन है वहाँ?”

     

    सभी बच्चे घबरा गए।

     

    कृष्ण ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “शांत!”

     

    सब चुप हो गए।

     

    गोपी अंदर आई।

     

    उसने देखा कि बच्चे दीवार के पास खड़े हैं।

     

    मटकी सुरक्षित थी।

     

    वह मुस्कुराकर बाहर चली गई।

     

    जैसे ही वह गई, कृष्ण ने मटकी की ओर देखा।

     

    फिर मित्रों की ओर।

     

    और अचानक—

     

    मटकी फूट गई।

     

    माखन नीचे गिरा।

     

    बच्चे खिलखिलाकर हँसने लगे।

     

    —

     

    यशोदा मैया की चिंता

     

    धीरे-धीरे कृष्ण की शरारतें इतनी बढ़ने लगीं कि यशोदा मैया को चिंता होने लगी।

     

    वह एक दिन नंद बाबा से बोलीं—

     

    “आप अपने लाल को कुछ समझाते क्यों नहीं?”

     

    नंद बाबा हँसकर बोले—

     

    “मैं क्या समझाऊँ? जब वह मुस्कुराता है तो मैं स्वयं सब भूल जाता हूँ।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “लेकिन यह दूसरे घरों की मटकी फोड़ता है।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “तो गोपियाँ शिकायत करने आती हैं?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “हाँ।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “और फिर?”

     

    यशोदा मुस्कुराकर बोलीं—

     

    “फिर मैं भी उसे देखकर कुछ कह नहीं पाती।”

     

    दोनों हँस पड़े।

     

    —

     

    माखनचोर का अर्थ

     

    धीरे-धीरे “माखनचोर” नाम कृष्ण के लिए प्रेम का नाम बन गया।

     

    गोपियाँ शिकायत करतीं, लेकिन भीतर से चाहतीं कि कृष्ण उनके घर भी आएँ।

     

    क्योंकि जिस घर में कृष्ण आते थे, वहाँ केवल माखन नहीं चोरी होता था।

     

    वहाँ तो—

     

    मन की उदासी भी चोरी हो जाती थी।

     

    कृष्ण आते और घर हँसी से भर जाता।

     

    बच्चे उनके पीछे दौड़ते।

     

    गोपियाँ उन्हें पकड़ने का नाटक करतीं।

     

    कृष्ण भागते।

     

    कभी छिपते।

     

    कभी माखन किसी के हाथ पर लगा देते।

     

    और कभी स्वयं मुँह पर माखन लगाकर ऐसे खड़े हो जाते जैसे कोई अपराध ही न किया हो।

     

    इसीलिए तो ब्रजवासी कहते—

     

    “हमारा माखन जाए तो जाए, पर कन्हैया की मुस्कान न जाए।”

     

    —

     

    कृष्ण और बंदर

     

    कृष्ण को बंदरों से भी बहुत प्रेम था।

     

    जब वह माखन चुराते, तो उसका कुछ भाग बंदरों को अवश्य खिलाते।

     

    एक दिन यशोदा मैया ने उन्हें ऐसा करते देख लिया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “लाला! यह क्या कर रहे हो?”

     

    कृष्ण बोले—

     

    “मैया, ये भी तो भूखे हैं।”

     

    यशोदा मैया कुछ कह न सकीं।

     

    उन्होंने देखा कि कृष्ण स्वयं कम खा रहे हैं और बंदरों को अधिक खिला रहे हैं।

     

    उनका हृदय भर आया।

     

    उन्होंने कृष्ण को गले लगा लिया।

     

    “तू सच में बहुत दयालु है मेरे लाल।”

     

    कृष्ण मुस्कुरा दिए।

     

    —

     

    माखन-चोरी की लीला का रहस्य

     

    कृष्ण की माखन-चोरी केवल बाल-शरारत नहीं मानी जाती।

     

    भक्ति की दृष्टि से “माखन” को मन की निर्मलता का प्रतीक माना जाता है।

     

    जैसे दूध को मथकर माखन निकाला जाता है, वैसे ही प्रेम और भक्ति से मन को मथने पर उसके भीतर से निर्मल भाव निकलता है।

     

    और कृष्ण उस निर्मल प्रेम को अपने पास खींच लेते हैं।

     

    इसीलिए भक्त प्रेम से कहते हैं—

     

    “कृष्ण चोर हैं, पर माखन के नहीं—वे भक्तों के हृदय चुराते हैं।”

     

    वे किसी के घर की मटकी तोड़ते हैं तो किसी के भीतर का अहंकार भी तोड़ देते हैं।

     

    वे माखन खाते हैं तो किसी के जीवन से चिंता भी खा जाते हैं।

     

    और वे मुस्कुराते हैं तो भक्त का मन अपने आप उनके चरणों में लग जाता है।

     

    —

     

    एक दिन की बड़ी शिकायत

     

    एक दिन गोकुल की सभी गोपियाँ एक साथ यशोदा मैया के घर पहुँचीं।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “आज क्या हुआ?”

     

    एक गोपी बोली—

     

    “आज तो हद हो गई।”

     

    दूसरी बोली—

     

    “हाँ! तुम्हारे लाल ने हमारी सारी मटकी फोड़ दी।”

     

    तीसरी बोली—

     

    “और जाते-जाते खिड़की पर माखन से अपना नाम भी लिख गया।”

     

    यशोदा ने आश्चर्य से पूछा—

     

    “क्या?”

     

    सब हँसने लगीं।

     

    तभी बाहर से कृष्ण की हँसी सुनाई दी।

     

    यशोदा ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    कृष्ण दरवाजे पर खड़े थे।

     

    उनके हाथ में माखन था।

     

    और चेहरे पर वही मासूम मुस्कान।

     

    गोपियों ने एक साथ कहा—

     

    “यही है अपराधी!”

     

    कृष्ण भागे।

     

    सभी गोपियाँ उनके पीछे दौड़ीं।

     

    कृष्ण हँसते हुए आँगन में भागने लगे।

     

    यशोदा मैया भी पीछे दौड़ीं।

     

    “रुक जा कन्हैया!”

     

    कृष्ण और तेज भागे।

     

    गोपियाँ हँसती रहीं।

     

    पूरा गोकुल हँसी से गूँज उठा।

     

    और उस दिन सबको समझ में आ गया—

     

    माखन की मटकी चाहे कितनी भी ऊँची क्यों न रखो, नंदलाल तक पहुँचने से उसे कोई नहीं रोक सकता।

     

    लेकिन किसी को क्या पता था कि कृष्ण की यह नटखट माखन-चोरी जल्द ही एक ऐसी घटना का रूप लेने वाली है, जिसमें यशोदा मैया अपने कन्हैया को पकड़ लेंगी।

     

    उस दिन पहली बार गोकुल देखेगा कि—

     

    जिस भगवान को पूरा संसार बाँध नहीं सकता, वही अपनी माँ के प्रेम से बँध जाएगा।

     

    और यशोदा मैया के हाथ में होगी—

     

    एक साधारण-सी रस्सी।

     

    लेकिन उस रस्सी में संसार की सबसे बड़ी शक्ति होगी—

     

    माँ का प्रेम।

     

    क्रमशः…

     

     

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 13 मिनट

     

     

                         (भाग 4)

    ( तृणावर्त का अंत: जब नन्हे कृष्ण ने बवंडर को भी रोक दिया)

     

     

     

    गोकुल में नंदलाल की बाल-लीलाएँ दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थीं।

     

    अभी कुछ ही समय पहले की बात थी, जब एक भारी बैलगाड़ी के नीचे सोए हुए नन्हे कृष्ण ने अपने छोटे-से पैर से उसे पलट दिया था। गोकुलवासी उस घटना को लेकर आज भी चर्चा करते थे।

     

    कोई कहता—

     

    “यह अवश्य कोई दैवी शक्ति है।”

     

    कोई कहता—

     

    “न जाने इस बालक के जन्म के साथ गोकुल में कैसी-कैसी अद्भुत घटनाएँ होने लगी हैं!”

     

    लेकिन यशोदा मैया इन बातों को सुनकर मुस्कुरा देतीं।

     

    उनके लिए कृष्ण कोई रहस्यमय शक्ति नहीं थे।

     

    वे तो बस उनके लाला थे।

     

    उनकी आँखों का तारा।

     

    उनकी गोद की शोभा।

     

    उनके जीवन की सबसे बड़ी खुशी।

     

    कृष्ण अब थोड़ा बड़े होने लगे थे। उनके हाथ-पैरों में चंचलता आ गई थी। वे कभी करवट लेने का प्रयास करते, कभी हाथ-पैर चलाकर अपने पास रखे खिलौनों को छूने की कोशिश करते।

     

    जब भी वे मुस्कुराते, यशोदा मैया की आँखों में खुशी छलक उठती।

     

    वह अक्सर अपनी सखियों से कहतीं—

     

    “मेरा कन्हैया जब मुस्कुराता है न, तब लगता है जैसे पूरा घर उजाला हो गया।”

     

    गोपियाँ हँसतीं और कहतीं—

     

    “यशोदा, तुम्हें तो अपने लाल के अलावा कुछ दिखाई ही नहीं देता।”

     

    यशोदा कहतीं—

     

    “माँ को अपने बच्चे के अलावा भला क्या दिखाई देगा?”

     

    और सच ही तो था।

     

    माँ का हृदय अपने बच्चे में ही संसार देखता है।

     

    लेकिन उस दिन गोकुल में जो होने वाला था, वह यशोदा मैया के हृदय को कंपा देने वाला था।

     

    —

     

    कंस की बेचैनी फिर बढ़ी

     

    उधर मथुरा में कंस को जब यह समाचार मिला कि पूतना का भी अंत हो गया, तो उसका भय और बढ़ गया।

     

    वह अपने महल में क्रोध से इधर-उधर घूमने लगा।

     

    उसने अपने मंत्रियों से कहा—

     

    “पूतना जैसी शक्तिशाली राक्षसी उस बालक का कुछ नहीं बिगाड़ सकी। आखिर वह बालक है कौन?”

     

    एक मंत्री ने धीरे से कहा—

     

    “महाराज, संभव है कि वह साधारण बालक न हो।”

     

    कंस ने घूरकर देखा।

     

    “क्या कहना चाहते हो?”

     

    मंत्री काँपते हुए बोला—

     

    “शायद आकाशवाणी सत्य होने वाली है।”

     

    यह सुनते ही कंस का चेहरा क्रोध से लाल हो गया।

     

    “चुप!”

     

    उसने अपना मुकुट उतारकर फेंक दिया।

     

    “मैं किसी बालक से नहीं हार सकता। चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो।”

     

    तभी सभा में उपस्थित एक राक्षस आगे आया।

     

    उसका नाम था—

     

    तृणावर्त।

     

    वह अत्यंत शक्तिशाली मायावी राक्षस था।

     

    वह अपने शरीर को भयंकर बवंडर में बदल सकता था।

     

    जहाँ वह जाता, वहाँ धूल का ऐसा तूफान उठता कि कुछ दिखाई नहीं देता।

     

    तृणावर्त ने कंस से कहा—

     

    “महाराज, यदि आपको उस बालक की चिंता है तो मुझे गोकुल जाने की अनुमति दीजिए।”

     

    कंस ने पूछा—

     

    “तुम क्या करोगे?”

     

    तृणावर्त मुस्कुराया।

     

    “मैं उसे आकाश में ले जाऊँगा। इतनी ऊँचाई पर कि कोई उसे बचा नहीं सकेगा।”

     

    कंस की आँखों में चमक आ गई।

     

    “जाओ।”

     

    तृणावर्त ने प्रणाम किया।

     

    “उस बालक को मैं आपके पास वापस नहीं आने दूँगा।”

     

    कंस को क्या पता था कि वह स्वयं अपने विनाश की ओर एक और कदम बढ़ा रहा है।

     

    —

     

    गोकुल का शांत दिन

     

    उधर गोकुल में एक दिन सब कुछ सामान्य था।

     

    सुबह की हल्की धूप चारों ओर फैल रही थी।

     

    गायें चरने के लिए बाहर जा रही थीं।

     

    गोप अपने काम में व्यस्त थे।

     

    गोपियाँ घरों में दही मथ रही थीं।

     

    यशोदा मैया अपने कन्हैया को लेकर आँगन में बैठी थीं।

     

    कृष्ण आज कुछ अधिक ही चंचल दिखाई दे रहे थे।

     

    वे बार-बार यशोदा मैया की ओर हाथ बढ़ा रहे थे।

     

    यशोदा ने उन्हें गोद में उठा लिया।

     

    “क्या चाहिए मेरे लाला?”

     

    कृष्ण ने अपनी छोटी-सी उँगली से बाहर की ओर संकेत किया।

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “बाहर जाना है?”

     

    कृष्ण मुस्कुरा दिए।

     

    यशोदा हँसकर बोलीं—

     

    “अभी नहीं। बाहर धूप है।”

     

    कृष्ण ने फिर अपनी उँगली हिलाई।

     

    “अच्छा-अच्छा, मेरी बात नहीं मानोगे?”

     

    कृष्ण खिलखिलाकर हँस पड़े।

     

    यशोदा ने उनके गाल पर हल्की-सी चपत लगाई।

     

    “बड़े नटखट हो गए हो।”

     

    पास बैठी एक गोपी बोली—

     

    “अभी से नटखट है, यशोदा। बड़ा होकर तो पूरे गोकुल को नचा देगा।”

     

    सभी हँसने लगीं।

     

    —

     

    अचानक मौसम बदल गया

     

    कुछ समय बाद अचानक वातावरण बदलने लगा।

     

    आकाश पर धूल छाने लगी।

     

    हवा धीरे-धीरे तेज होने लगी।

     

    पहले तो किसी ने ध्यान नहीं दिया।

     

    लेकिन थोड़ी ही देर में हवा इतनी तेज हो गई कि पेड़ों की डालियाँ जोर-जोर से हिलने लगीं।

     

    गायें बेचैन होकर रंभाने लगीं।

     

    पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौटने लगे।

     

    गोपियाँ अपने बच्चों को घर के भीतर बुलाने लगीं।

     

    एक गोपी ने आकाश की ओर देखकर कहा—

     

    “अरे! यह अचानक कैसी आँधी आ गई?”

     

    दूसरी बोली—

     

    “इतनी तेज हवा तो मैंने बहुत दिनों से नहीं देखी।”

     

    तीसरी ने अपने बच्चे को पकड़ते हुए कहा—

     

    “सब लोग अपने-अपने घरों में चले जाओ।”

     

    धीरे-धीरे हवा का वेग बढ़ता गया।

     

    आकाश में धूल ही धूल दिखाई देने लगी।

     

    कुछ ही क्षणों में ऐसा लगने लगा कि दिन के समय भी रात उतर आई हो।

     

    —

     

    यशोदा मैया की गोद में कृष्ण

     

    उस समय कृष्ण यशोदा मैया की गोद में थे।

     

    यशोदा मैया ने उन्हें और कसकर पकड़ लिया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “डरना मत मेरे लाल। मैया यहीं है।”

     

    कृष्ण बिल्कुल शांत थे।

     

    वह अपनी माँ की ओर देखकर मुस्कुरा रहे थे।

     

    लेकिन अचानक उनका शरीर यशोदा मैया को बहुत भारी लगने लगा।

     

    यशोदा ने आश्चर्य से उन्हें संभाला।

     

    “अरे! मेरा लाला इतना भारी कब हो गया?”

     

    उन्होंने कृष्ण को अपनी गोद में सँभालने की कोशिश की।

     

    लेकिन कुछ ही क्षणों में उन्हें लगा कि वह बालक को उठा नहीं पा रही हैं।

     

    यशोदा ने उन्हें धीरे से नीचे बैठा दिया।

     

    “अच्छा, तू यहीं रह। मैया अभी आती है।”

     

    उन्होंने कृष्ण को सुरक्षित स्थान पर लिटाया।

     

    उन्हें क्या पता था कि यह सब उसी मायावी शक्ति का प्रभाव था।

     

    तृणावर्त अपना समय देख चुका था।

     

    —

     

    तृणावर्त का आगमन

     

    अचानक हवा का एक भयंकर चक्र उठा।

     

    वह धूल और मिट्टी को अपने भीतर समेटता हुआ तेजी से घूमने लगा।

     

    किसी को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    वह कोई साधारण आँधी नहीं थी।

     

    वह स्वयं तृणावर्त था।

     

    उसने बवंडर का रूप धारण कर लिया था।

     

    उसकी गति इतनी तेज थी कि वृक्षों की शाखाएँ टूटने लगीं।

     

    छप्पर उड़ने लगे।

     

    गोपियाँ अपने बच्चों को पकड़कर घरों में छिपने लगीं।

     

    गायें भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगीं।

     

    किसी को समझ नहीं आ रहा था कि यह कैसा संकट आ गया।

     

    तृणावर्त ने कृष्ण को देखा।

     

    नन्हा बालक शांत पड़ा था।

     

    उसने मन ही मन कहा—

     

    “यही है वह बालक!”

     

    वह तेज गति से नीचे आया और देखते ही देखते कृष्ण को अपने साथ आकाश में उठा ले गया।

     

    —

     

    यशोदा मैया का हृदय काँप उठा

     

    जब यशोदा मैया वापस आईं, तो उन्होंने देखा—

     

    जहाँ कृष्ण लेटे थे, वहाँ कोई नहीं था।

     

    “कन्हैया?”

     

    उन्होंने इधर-उधर देखा।

     

    “कन्हैया!”

     

    लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला।

     

    यशोदा की आँखें भय से फैल गईं।

     

    उन्होंने चारों ओर देखा।

     

    कृष्ण कहीं दिखाई नहीं दिए।

     

    उन्होंने घबराकर पुकारा—

     

    “मेरा लाल कहाँ गया?”

     

    गोपियाँ दौड़कर उनके पास आईं।

     

    “क्या हुआ यशोदा?”

     

    यशोदा रोते हुए बोलीं—

     

    “मेरा कन्हैया… मेरा कन्हैया यहाँ था। अभी यहीं था। मैं थोड़ी देर के लिए गई और…”

     

    उनकी आवाज रुक गई।

     

    उन्होंने अपने सिर पर हाथ रख लिया।

     

    “हे भगवान! मेरा बच्चा कहाँ चला गया?”

     

    गोपियाँ भी घबरा गईं।

     

    किसी ने कहा—

     

    “शायद कहीं लुढ़क गया हो।”

     

    किसी ने कहा—

     

    “आँगन में खोजो।”

     

    किसी ने घर के भीतर देखा।

     

    लेकिन कृष्ण कहीं नहीं थे।

     

    —

     

    आकाश में तृणावर्त

     

    उधर तृणावर्त कृष्ण को लेकर बहुत ऊँचाई तक पहुँच चुका था।

     

    उसे लगा—

     

    “अब यह बालक मेरे हाथ से नहीं बच सकता।”

     

    वह और ऊपर जाने लगा।

     

    नीचे पूरा गोकुल बहुत छोटा दिखाई दे रहा था।

     

    लेकिन तभी उसे अपने शरीर पर एक विचित्र भार महसूस हुआ।

     

    पहले उसे लगा कि शायद हवा का प्रभाव है।

     

    लेकिन भार बढ़ता गया।

     

    तृणावर्त ने सोचा—

     

    “यह क्या हो रहा है?”

     

    उसने कृष्ण को और ऊपर ले जाने का प्रयास किया।

     

    लेकिन अब कृष्ण का शरीर उसे अत्यंत भारी लगने लगा।

     

    कुछ ही क्षणों में उसकी गति रुक गई।

     

    उसकी साँसें भारी होने लगीं।

     

    वह सोचने लगा—

     

    “यह बालक इतना भारी कैसे हो गया?”

     

    तृणावर्त ने पूरी शक्ति लगा दी।

     

    लेकिन अब तो वह स्वयं नीचे खिंचने लगा।

     

    —

     

    भगवान का अद्भुत रूप

     

    तृणावर्त को अब समझ में आने लगा कि यह कोई साधारण बालक नहीं है।

     

    उसने कृष्ण को अपने शरीर से अलग करने का प्रयास किया।

     

    लेकिन कृष्ण ने अपनी छोटी-सी भुजा उसके गले के चारों ओर डाल दी।

     

    और देखते ही देखते उनकी पकड़ इतनी मजबूत हो गई कि तृणावर्त का दम घुटने लगा।

     

    उसकी आँखें बाहर निकल आईं।

     

    उसने अपनी पूरी शक्ति लगा दी।

     

    लेकिन भगवान के सामने उसकी सारी शक्ति समाप्त हो गई।

     

    तृणावर्त की गति रुक गई।

     

    उसका बवंडर समाप्त होने लगा।

     

    आकाश से धूल नीचे गिरने लगी।

     

    गोकुल में धीरे-धीरे प्रकाश लौटने लगा।

     

    और फिर—

     

    धड़ाम!

     

    तृणावर्त का विशाल शरीर एक ऊँचे स्थान से धरती पर आ गिरा।

     

    उसका प्राणांत हो चुका था।

     

    और उसके ऊपर नन्हे कृष्ण सुरक्षित बैठे थे।

     

    —

     

    गोकुलवासियों ने देखा अद्भुत दृश्य

     

    जैसे ही धूल बैठी, गोकुलवासियों ने देखा कि एक विशाल राक्षस धरती पर पड़ा है।

     

    उसके ऊपर नन्हा कृष्ण सुरक्षित था।

     

    एक गोप चिल्लाया—

     

    “कन्हैया!”

     

    सब लोग दौड़ पड़े।

     

    यशोदा मैया तो अपने लाल को देखते ही रोती हुई दौड़ीं।

     

    उन्होंने कृष्ण को उठाकर अपनी छाती से लगा लिया।

     

    “मेरा लाल!”

     

    उन्होंने कृष्ण को बार-बार चूमा।

     

    उनके आँसू रुक ही नहीं रहे थे।

     

    “तुझे कुछ हो जाता तो?”

     

    कृष्ण अपनी माँ की गोद में शांत थे।

     

    जैसे उन्हें कुछ हुआ ही न हो।

     

    यशोदा मैया ने उन्हें अपने आँचल में छिपा लिया।

     

    “अब मैं तुझे पलभर के लिए भी अकेला नहीं छोड़ूँगी।”

     

    —

     

    नंद बाबा की चिंता

     

    जब नंद बाबा को घटना का समाचार मिला, वे भी तुरंत वहाँ पहुँचे।

     

    उन्होंने तृणावर्त का विशाल शरीर देखा और फिर कृष्ण को देखा।

     

    उनका मन भय और आश्चर्य से भर गया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “यह कैसी अद्भुत घटना है?”

     

    एक वृद्ध गोप ने कहा—

     

    “नंद बाबा, यह बालक साधारण नहीं लगता।”

     

    नंद बाबा कुछ क्षण चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “जो भी हो, भगवान ने आज मेरे बालक की रक्षा की है।”

     

    उन्होंने कृष्ण को गोद में लिया।

     

    कृष्ण ने उनकी दाढ़ी पकड़ ली।

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “अरे! तुझे तो कोई चिंता ही नहीं है।”

     

    गोपियाँ भी मुस्कुराने लगीं।

     

    कुछ ही समय पहले जिस गोकुल में भय छाया हुआ था, वहीं अब हँसी लौटने लगी थी।

     

    —

     

    यशोदा मैया की ममता

     

    उस रात यशोदा मैया ने कृष्ण को अपनी गोद से नीचे नहीं उतारा।

     

    वह उन्हें देखती रहीं।

     

    कभी उनके माथे पर हाथ फेरतीं।

     

    कभी उनके पैरों को सहलातीं।

     

    फिर धीरे से बोलीं—

     

    “लाला, आज तू मुझे बहुत डरा गया।”

     

    कृष्ण ने आँखें खोलकर माँ की ओर देखा।

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “क्या देख रहा है?”

     

    कृष्ण ने अपनी छोटी-सी उँगली से यशोदा के चेहरे को छुआ।

     

    यशोदा की आँखों से फिर आँसू निकल आए।

     

    उन्होंने कृष्ण को चूमते हुए कहा—

     

    “तू मेरा है।”

     

    भगवान स्वयं उनके सामने थे।

     

    फिर भी यशोदा उन्हें अपना मानती थीं।

     

    यही तो प्रेम की शक्ति है।

     

    —

     

    इस लीला का गहरा संदेश

     

    तृणावर्त केवल एक राक्षस का नाम नहीं था।

     

    वह अहंकार और अंधी शक्ति का प्रतीक भी माना जाता है।

     

    उसे अपनी शक्ति पर इतना अभिमान था कि उसने सोचा—

     

    “मैं इस छोटे-से बालक को आकाश में ले जाकर समाप्त कर दूँगा।”

     

    लेकिन जिस बालक को उसने कमजोर समझा, वही उसके लिए सबसे भारी बन गया।

     

    यह लीला हमें सिखाती है कि केवल बाहरी शक्ति ही सब कुछ नहीं होती।

     

    जिसके भीतर अहंकार होता है, वह अपनी ही शक्ति के कारण विनाश की ओर जा सकता है।

     

    और जो भगवान की शरण में होता है, उसकी रक्षा स्वयं भगवान करते हैं।

     

    —

     

    गोकुल में फिर मुस्कान लौटी

     

    अगली सुबह गोकुल में फिर वही चहल-पहल थी।

     

    गोपियाँ एक-दूसरे से कल की घटना के बारे में बातें कर रही थीं।

     

    एक बोली—

     

    “मैंने तो ऐसा बवंडर कभी नहीं देखा।”

     

    दूसरी बोली—

     

    “और देखो, हमारा कन्हैया फिर बच गया।”

     

    तीसरी हँसते हुए बोली—

     

    “अब तो मुझे लगता है कि यह बालक स्वयं गोकुल की रक्षा करने आया है।”

     

    यशोदा मैया ने यह बात सुनी तो बोलीं—

     

    “अरे, ऐसी बातें मत करो। मेरा लाला तो अभी बहुत छोटा है।”

     

    गोपियाँ हँसने लगीं।

     

    “हाँ-हाँ, तुम्हारा लाला बहुत छोटा है!”

     

    यशोदा भी मुस्कुरा दीं।

     

    लेकिन मन ही मन वह कल की घटना को भूल नहीं पा रही थीं।

     

    उन्होंने कृष्ण को देखा।

     

    कृष्ण उस समय एक छोटी-सी लकड़ी की वस्तु से खेल रहे थे।

     

    यशोदा ने सोचा—

     

    “यह मेरा नन्हा-सा बालक आखिर कौन है?”

     

    लेकिन अगले ही क्षण उन्होंने उस विचार को मन से निकाल दिया।

     

    “जो भी है, मेरा तो है।”

     

    उन्होंने कृष्ण को उठाकर अपनी गोद में भर लिया।

     

    और कृष्ण ने अपनी माँ के गले में हाथ डाल दिए।

     

    —

     

    आगे की लीला की शुरुआत

     

    गोकुल में अब कृष्ण की ख्याति बढ़ती जा रही थी।

     

    हर दिन कोई नई शरारत।

     

    हर दिन कोई नई मुस्कान।

     

    हर दिन कोई नई लीला।

     

    लेकिन अब उनकी सबसे बड़ी शरारतें आरंभ होने वाली थीं।

     

    कृष्ण धीरे-धीरे घुटनों के बल चलना सीखने वाले थे।

     

    वे घर के एक कोने से दूसरे कोने तक जाते।

     

    माखन की मटकी को देखते।

     

    दही को देखते।

     

    और फिर अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से यशोदा मैया की ओर देखते।

     

    यशोदा समझ जातीं—

     

    “कुछ तो शरारत होने वाली है।”

     

    लेकिन वह शरारत क्या थी?

     

    एक दिन कृष्ण ने अपने छोटे-से हाथ से माखन की मटकी की ओर बढ़ना शुरू किया।

     

    गोपियों ने उन्हें देख लिया।

     

    एक गोपी चिल्लाई—

     

    “अरी यशोदा! संभाल अपने लाल को!”

     

    यशोदा ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    कृष्ण मटकी की ओर बढ़ रहे थे।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “कन्हैया! उधर क्या कर रहे हो?”

     

    कृष्ण तुरंत रुक गए।

     

    यशोदा उनकी ओर बढ़ीं।

     

    कृष्ण ने मासूम चेहरा बना लिया।

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तू माखन खाने जा रहा था न?”

     

    कृष्ण ने आँखें झुका लीं।

     

    गोपियाँ हँसने लगीं।

     

    यशोदा भी मुस्कुरा उठीं।

     

    लेकिन उस दिन से गोकुल में एक नई पहचान बनने वाली थी—

     

    माखनचोर कन्हैया की।

     

    जो माखन चुराएगा।

     

    जो मटकी फोड़ेगा।

     

    जो गोपियों को सताएगा।

     

    और फिर ऐसी मासूम मुस्कान देगा कि कोई उसे डाँट ही नहीं पाएगा।

     

    यही थी नंदलाल की अगली लीला की शुरुआत।

     

    क्रमशः…

     

     

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

     

    (भाग 3 — शकटासुर का उद्धार)

     

    गोकुल में श्रीकृष्ण के जन्म को कुछ समय बीत चुका था।

     

    पूतना जैसी भयंकर राक्षसी का अंत होने के बाद भी गोकुलवासियों का जीवन पहले जैसा ही चलता रहा। किसी को यह समझ नहीं आ रहा था कि नंद बाबा का यह नन्हा-सा बालक बार-बार बड़े संकटों से कैसे बच जाता है।

     

    परंतु यशोदा मैया के लिए तो उनका कन्हैया अभी भी वही नन्हा बालक था, जिसे हर समय अपनी आँखों के सामने रखने का मन करता था।

     

    कृष्ण अब धीरे-धीरे बड़े होने लगे थे।

     

    उनके हाथ-पैरों में पहले से अधिक चंचलता आ गई थी।

     

    कभी वे अपनी छोटी-सी उँगली से यशोदा मैया की उँगली पकड़ लेते, तो कभी पैरों को हिलाते हुए खिलखिलाकर हँसने लगते।

     

    उनकी मुस्कान देखते ही यशोदा मैया की सारी थकान दूर हो जाती।

     

    एक दिन सुबह यशोदा मैया कृष्ण को गोद में लेकर आँगन में बैठी थीं।

     

    कृष्ण बार-बार उनकी ओर देखकर मुस्कुरा रहे थे।

     

    यशोदा मैया ने उनके गालों को सहलाते हुए कहा—

     

    “क्या हुआ मेरे लाला? आज बड़े प्रसन्न हो!”

     

    कृष्ण ने कोई उत्तर नहीं दिया।

     

    बस अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मैया को देखते रहे।

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “अच्छा! अभी से इतना मुस्कुराते हो? लगता है कोई बड़ी शरारत सोच रहे हो।”

     

    कृष्ण ने फिर मुस्कुरा दिया।

     

    —

     

    गोकुल में उत्सव की तैयारी

     

    कुछ समय बाद नंद बाबा के घर एक विशेष उत्सव मनाने की तैयारी होने लगी।

     

    गोकुल में ऐसे अवसरों पर सभी गोप-गोपियाँ एकत्र होते थे।

     

    घर को सजाया गया।

     

    आँगन में सुंदर रंगोली बनाई गई।

     

    गायों को नहलाकर उनके सींगों पर रंग लगाया गया।

     

    उनके गले में नई घंटियाँ बाँधी गईं।

     

    गोपियाँ अपने-अपने घरों से दही, माखन, दूध और मिठाइयाँ लेकर नंद भवन पहुँचने लगीं।

     

    पूरा गोकुल जैसे एक परिवार बन गया था।

     

    कहीं गीत गाए जा रहे थे।

     

    कहीं ढोलक बज रही थी।

     

    कहीं बच्चे खेल रहे थे।

     

    और नंद भवन में तो विशेष चहल-पहल थी।

     

    यशोदा मैया सुबह से ही काम में लगी थीं।

     

    कभी रसोई में जातीं, कभी आँगन में आतीं, कभी मेहमानों का स्वागत करतीं।

     

    लेकिन बार-बार उनकी दृष्टि अपने कन्हैया पर चली जाती।

     

    “मेरा लाल कहाँ है?”

     

    वह पूछतीं।

     

    एक गोपी हँसकर कहती—

     

    “अरी यशोदा! आज तो पूरे गोकुल की चिंता छोड़कर बस अपने लाला की चिंता कर रही हो।”

     

    यशोदा मुस्कुराकर कहतीं—

     

    “क्या करूँ? यह है ही ऐसा।”

     

    दूसरी गोपी बोली—

     

    “अभी छोटा है, थोड़ा बड़ा होने दो। फिर तुम्हें पता चलेगा इसकी शरारतों का।”

     

    यशोदा ने हँसकर कहा—

     

    “मेरा कन्हैया तो बहुत सीधा है।”

     

    सभी गोपियाँ हँस पड़ीं।

     

    किसी को क्या पता था कि यही “सीधा” बालक आगे चलकर पूरे गोकुल की मटकी चुराने वाला है!

     

    —

     

    वह पुरानी बैलगाड़ी

     

    उत्सव के कारण नंद भवन के आँगन में बहुत-सा सामान रखा हुआ था।

     

    दूध के मटके, दही के घड़े, मक्खन के पात्र और अन्य घरेलू वस्तुएँ एक बड़ी पुरानी बैलगाड़ी के ऊपर रखी थीं।

     

    वह बैलगाड़ी बहुत भारी थी।

     

    उसे आँगन के एक कोने में खड़ा कर दिया गया था।

     

    यशोदा मैया ने सोचा कि कुछ समय के लिए कृष्ण को उसी गाड़ी के नीचे छाया में सुला दिया जाए।

     

    उन्होंने कृष्ण को एक सुंदर वस्त्र पर लिटाया।

     

    फिर उनके सिर के पास बैठकर बोलीं—

     

    “लाला, मैं अभी आती हूँ। तुम यहीं सोना।”

     

    कृष्ण ने अपनी आँखें खोलकर मैया की ओर देखा।

     

    यशोदा ने उनके माथे को चूमा और काम में लग गईं।

     

    आँगन में उत्सव का शोर बढ़ता जा रहा था।

     

    कहीं कोई गीत गा रहा था।

     

    कहीं बच्चे हँस रहे थे।

     

    कहीं मटकी में दही मथा जा रहा था।

     

    और उस सबके बीच नन्हा कृष्ण उस भारी बैलगाड़ी के नीचे लेटे हुए थे।

     

    —

     

    संकट की आहट

     

    कहानी के अनुसार, कंस ने कृष्ण को समाप्त करने के लिए एक और राक्षस भेजा था।

     

    उस राक्षस का नाम था—

     

    शकटासुर।

     

    वह मायावी राक्षस था।

     

    उसने सोचा—

     

    “पूतना असफल हो गई। अब मैं इस बालक को समाप्त करूँगा।”

     

    शकटासुर ने अपनी मायावी शक्ति से उस भारी बैलगाड़ी में प्रवेश कर लिया।

     

    अब वह बैलगाड़ी केवल लकड़ी और पहियों की गाड़ी नहीं थी।

     

    उसमें एक भयंकर राक्षसी शक्ति समा चुकी थी।

     

    शकटासुर मन ही मन प्रसन्न हुआ।

     

    “यह बालक तो मेरे नीचे लेटा है। जैसे ही अवसर मिलेगा, मैं इस गाड़ी को इसके ऊपर गिरा दूँगा।”

     

    लेकिन उसे यह नहीं पता था कि वह जिस बालक के ऊपर अपनी शक्ति आजमाने आया है, उसके लिए पर्वत भी खिलौने के समान हैं।

     

    —

     

    कृष्ण को भूख लगी

     

    कुछ समय बीता।

     

    कृष्ण की आँख खुल गई।

     

    उन्होंने इधर-उधर देखा।

     

    मैया कहीं दिखाई नहीं दीं।

     

    उन्होंने अपनी छोटी-सी मुट्ठी हिलाई।

     

    फिर अपने पैरों को चलाया।

     

    लेकिन मैया काम में व्यस्त थीं।

     

    कृष्ण को भूख लगी।

     

    उन्होंने धीरे-धीरे रोना शुरू किया।

     

    पहले हल्की-सी आवाज निकली।

     

    फिर रोना बढ़ गया।

     

    आँगन में उपस्थित कुछ गोपियों ने कृष्ण की आवाज सुनी।

     

    एक गोपी बोली—

     

    “लगता है यशोदा का लाला जाग गया।”

     

    दूसरी ने कहा—

     

    “यशोदा तो अभी रसोई में हैं।”

     

    तीसरी बोली—

     

    “अरे, कोई जाकर देखो!”

     

    लेकिन उत्सव की भीड़ और शोर के कारण किसी का ध्यान ठीक से कृष्ण की ओर नहीं गया।

     

    कृष्ण अब और जोर से रोने लगे।

     

    उन्होंने अपने छोटे-छोटे पैर चलाने शुरू किए।

     

    एक बार उन्होंने अपना पैर ऊपर उठाया।

     

    फिर नीचे किया।

     

    और फिर—

     

    उनका नन्हा-सा पैर उस भारी बैलगाड़ी से जा लगा।

     

    अगले ही क्षण जो हुआ, उसे देखकर सभी के होश उड़ गए।

     

    —

     

    भारी गाड़ी का पलटना

     

    एक भयंकर आवाज हुई—

     

    धड़ाम!

     

    वह विशाल और भारी बैलगाड़ी उलट गई।

     

    उस पर रखे सारे मटके और घड़े टूटकर चारों ओर बिखर गए।

     

    दही और दूध आँगन में फैल गया।

     

    लकड़ी के पहिए एक ओर जा गिरे।

     

    बर्तन टूटने की आवाज सुनकर पूरा गोकुल दौड़ पड़ा।

     

    गोपियाँ चिल्लाईं—

     

    “अरे! यह क्या हो गया?”

     

    “गाड़ी कैसे पलट गई?”

     

    “कहीं बालक कृष्ण को तो कुछ नहीं हुआ?”

     

    यशोदा मैया ने जैसे ही आवाज सुनी, उनके हाथ-पैर काँपने लगे।

     

    वह सब काम छोड़कर दौड़ती हुई आईं।

     

    “मेरा लाल!”

     

    उनकी आँखें सीधे कृष्ण को खोजने लगीं।

     

    उन्होंने देखा—

     

    कृष्ण बिल्कुल सुरक्षित थे।

     

    वह वहीं लेटे हुए थे और अपने छोटे-छोटे हाथ-पैर हिला रहे थे।

     

    यशोदा मैया ने तुरंत उन्हें उठाकर अपनी गोद में भर लिया।

     

    “मेरे लाल! तुझे कुछ तो नहीं हुआ?”

     

    वह कृष्ण के हाथ-पैर देखने लगीं।

     

    उनके माथे को चूमा।

     

    फिर उन्हें अपने सीने से लगा लिया।

     

    उनकी आँखों से आँसू निकल आए।

     

    —

     

    गोकुलवासियों का आश्चर्य

     

    गोप और गोपियाँ उस उलटी हुई गाड़ी को देखकर हैरान थे।

     

    एक गोप बोला—

     

    “यह गाड़ी इतनी भारी थी। इसे तो चार-पाँच आदमी मिलकर भी मुश्किल से हिला पाते हैं।”

     

    दूसरा बोला—

     

    “फिर यह अपने आप कैसे उलट गई?”

     

    तीसरा बोला—

     

    “क्या किसी ने इसे धक्का दिया था?”

     

    एक बालक बोला—

     

    “मैंने देखा था! कन्हैया ने पैर मारा था।”

     

    सभी उसकी ओर देखने लगे।

     

    एक गोपी हँसकर बोली—

     

    “अरे पगले! इतने-से पैर में इतनी शक्ति कहाँ से आएगी?”

     

    बालक बोला—

     

    “मैंने सच में देखा था!”

     

    दूसरे बच्चे भी कहने लगे—

     

    “हाँ! कन्हैया ने पैर मारा था।”

     

    गोपियाँ हँसने लगीं।

     

    उन्हें लगा कि बच्चे अपने प्रिय मित्र की प्रशंसा कर रहे हैं।

     

    किसी ने कल्पना भी नहीं की कि सचमुच उस गाड़ी को नन्हे कृष्ण ने ही पलटा था।

     

    —

     

    शकटासुर का अंत

     

    वास्तव में उस गाड़ी के भीतर छिपा शकटासुर भगवान कृष्ण के चरण-स्पर्श से नष्ट हो चुका था।

     

    जिस शक्ति के भरोसे वह आया था, वही शक्ति उसके लिए विनाश का कारण बन गई।

     

    भगवान ने न तो कोई अस्त्र उठाया।

     

    न कोई युद्ध किया।

     

    न कोई बड़ी शक्ति दिखाई।

     

    उन्होंने केवल अपने नन्हे-से पैर को थोड़ा-सा हिलाया।

     

    और राक्षस का अंत हो गया।

     

    यही तो कृष्ण की बाल-लीला थी।

     

    जो कार्य साधारण मनुष्य के लिए असंभव था, वह उनके लिए खेल मात्र था।

     

    —

     

    यशोदा मैया की चिंता

     

    लेकिन यशोदा मैया को इन सब बातों से कोई मतलब नहीं था।

     

    उनके लिए बस इतना महत्वपूर्ण था कि उनका लाल सुरक्षित रहे।

     

    वह कृष्ण को गोद में लेकर बोलीं—

     

    “तू वहाँ अकेला क्यों लेटा था?”

     

    कृष्ण उन्हें देखते रहे।

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “मैंने कहा था न, मैया अभी आती है!”

     

    कृष्ण ने अपनी आँखें झपकाईं।

     

    यशोदा का हृदय पिघल गया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “अच्छा, अब रोना मत।”

     

    और फिर उन्हें अपने आँचल से ढक लिया।

     

    गोपियाँ यह दृश्य देखकर मुस्कुराने लगीं।

     

    एक गोपी बोली—

     

    “यशोदा, तुम्हारा लाल तो बहुत भाग्यशाली है। उसे ऐसी माँ मिली है जो उसे पलभर के लिए भी अकेला नहीं छोड़ती।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर कृष्ण को और कसकर पकड़ लिया।

     

    —

     

    नंद बाबा को समाचार मिला

     

    जब नंद बाबा को इस घटना के बारे में पता चला, तो वे भी तुरंत वहाँ पहुँचे।

     

    उन्होंने उलटी हुई बैलगाड़ी देखी।

     

    टूटे हुए मटके देखे।

     

    फिर अपने बालक को देखा।

     

    नंद बाबा कुछ क्षण तक कुछ बोल ही नहीं पाए।

     

    उन्होंने कृष्ण को गोद में लिया।

     

    “कन्हैया!”

     

    उन्होंने उसे अपने सीने से लगा लिया।

     

    फिर बोले—

     

    “आज तो भगवान ने मेरे लाल की रक्षा कर दी।”

     

    नंद बाबा को क्या पता था कि भगवान स्वयं उनके हाथों में हैं।

     

    —

     

    ब्रज के बुजुर्गों की चर्चा

     

    गोकुल के कुछ वृद्ध लोग वहाँ एकत्र हुए।

     

    उन्होंने घटना को ध्यान से देखा।

     

    एक वृद्ध बोले—

     

    “यह कोई साधारण घटना नहीं है।”

     

    दूसरे ने कहा—

     

    “बच्चों की बात पर विश्वास नहीं करना चाहिए, लेकिन इतनी भारी गाड़ी का अपने आप उलटना भी तो संभव नहीं।”

     

    तीसरे ने कहा—

     

    “हो सकता है इसमें कोई अदृश्य शक्ति हो।”

     

    एक अन्य वृद्ध बोले—

     

    “हमें अपने बालक की रक्षा के लिए भगवान का स्मरण करते रहना चाहिए।”

     

    सभी ने मिलकर भगवान का नाम लिया।

     

    लेकिन कृष्ण अपनी माँ की गोद में आराम से मुस्कुरा रहे थे।

     

    मानो उन्हें सब पता हो।

     

    —

     

    नंदलाल की नटखट मुस्कान

     

    उस शाम यशोदा मैया कृष्ण को अपने घर के भीतर लेकर आईं।

     

    उन्होंने उन्हें एक सुंदर शैया पर लिटाया।

     

    कृष्ण ने मैया की ओर देखा और मुस्कुराने लगे।

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “क्या बात है? आज बड़ी खुशी हो रही है?”

     

    कृष्ण ने पैर हिलाया।

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “अच्छा! आज गाड़ी भी तुमने ही पलटाई थी क्या?”

     

    कृष्ण फिर मुस्कुराए।

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “अरे! तू तो बड़ा शरारती निकलेगा।”

     

    कृष्ण ने जैसे अपनी आँखों से उत्तर दिया—

     

    “मैया, अभी तो शुरुआत है।”

     

    —

     

    इस लीला का रहस्य

     

    शकटासुर की कथा में एक गहरा आध्यात्मिक संदेश भी माना जाता है।

     

    वह भारी बैलगाड़ी जैसे हमारे जीवन के उन बोझों का प्रतीक मानी जा सकती है, जिन्हें हम अपने मन में ढोते रहते हैं।

     

    अहंकार।

     

    भय।

     

    लोभ।

     

    क्रोध।

     

    पुरानी चिंताएँ।

     

    और अनेक प्रकार के मानसिक बोझ।

     

    जब मनुष्य भगवान का स्मरण करता है, तो उसके भीतर ऐसी शक्ति आती है जो बड़े से बड़े बोझ को भी दूर करने का सामर्थ्य देती है।

     

    श्रीकृष्ण ने इस लीला में यह दिखाया कि भगवान के लिए कोई संकट बड़ा नहीं होता।

     

    और सबसे सुंदर बात यह थी कि उन्होंने यह लीला किसी बड़े योद्धा के रूप में नहीं, बल्कि एक छोटे-से बालक के रूप में की।

     

    यही कृष्ण की बाल-लीलाओं की विशेषता है।

     

    वे कभी रोते हैं।

     

    कभी हँसते हैं।

     

    कभी खेलते हैं।

     

    कभी शरारत करते हैं।

     

    और आवश्यकता पड़ने पर संसार की रक्षा भी कर देते हैं।

     

    —

     

    गोकुल में फिर लौटी खुशी

     

    घटना के बाद गोकुलवासियों ने भगवान का धन्यवाद किया।

     

    टूटे हुए मटकों को हटाया गया।

     

    आँगन साफ किया गया।

     

    गायों को फिर से बाँधा गया।

     

    बच्चे थोड़ी देर तक उस घटना की चर्चा करते रहे।

     

    एक बालक दूसरे से कह रहा था—

     

    “मैंने तो पहले ही कहा था, कन्हैया ने पैर मारा था।”

     

    दूसरा बोला—

     

    “हाँ, लेकिन कोई हमारी बात मानता ही नहीं।”

     

    दोनों हँस पड़े।

     

    उधर कृष्ण यशोदा मैया की गोद में आराम से सो चुके थे।

     

    उनके मुख पर हल्की-सी मुस्कान थी।

     

    यशोदा मैया उन्हें देखती रहीं।

     

    उन्होंने धीरे से कहा—

     

    “मेरे लाला, तू हमेशा ऐसे ही हँसता रहना।”

     

    बाहर रात उतरने लगी।

     

    आकाश में तारे चमकने लगे।

     

    यमुना जी की धारा शांत होकर बह रही थी।

     

    गोकुल में सब लोग सोने लगे।

     

    लेकिन भगवान की लीला कहाँ रुकने वाली थी?

     

    जिस बालक ने अभी अपने पैर से एक भारी गाड़ी पलट दी थी, वह शीघ्र ही ऐसी लीला करने वाला था जिसमें एक भयंकर बवंडर पूरे गोकुल को अपनी चपेट में ले लेगा।

     

    लोग भय से काँप उठेंगे।

     

    यशोदा मैया अपने लाल को खोजती हुई व्याकुल हो जाएँगी।

     

    और तब गोकुलवासियों को एक बार फिर अनुभव होगा कि उनका नन्हा कन्हैया कोई साधारण बालक नहीं है।

     

    क्योंकि अगली लीला में आने वाला था—

     

    तृणावर्त।

     

    एक ऐसा राक्षस, जो स्वयं बवंडर का रूप धारण करके नंदलाल को आकाश में ले जाएगा।

     

    लेकिन वह नहीं जानता था कि जिसे वह आकाश में ले जा रहा है, वही संपूर्ण आकाश का स्वामी है।

     

    क्रमशः…

     

     

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 13 मिनट

     

     

    (भाग 2 — पूतना का गोकुल आगमन)

     

    पिछले भाग में आपने पढ़ा कि किस प्रकार भाद्रपद मास की अष्टमी की अर्धरात्रि में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने देवकी और वसुदेव के पुत्र के रूप में जन्म लिया और वसुदेव जी उन्हें यमुना पार करके गोकुल ले आए।

     

    गोकुल में उस समय किसी को यह ज्ञात नहीं था कि नंद बाबा के घर जन्म लेने वाला वह नन्हा बालक कोई साधारण शिशु नहीं, बल्कि स्वयं भगवान हैं।

     

    यशोदा मैया तो उन्हें अपना लाल समझकर ही दुलार रही थीं।

     

    कभी उन्हें गोद में लेकर चूमतीं, कभी उनके नन्हे हाथों को अपनी उँगली पकड़ातीं और कभी उनके मुख को निहारते-निहारते स्वयं मुस्कुराने लगतीं।

     

    गोकुल में हर ओर आनंद था।

     

    लेकिन इसी आनंद के बीच मथुरा में बैठा कंस बेचैन था।

     

    उसे उस आकाशवाणी की बात बार-बार याद आ रही थी—

     

    “तेरा काल गोकुल में जन्म ले चुका है।”

     

    कंस के मन में भय ने घर कर लिया था।

     

    उसने अपने सैनिकों और राक्षसों को आदेश दिया—

     

    “गोकुल और उसके आसपास जितने भी नवजात बालक हैं, उन्हें खोजो। मुझे किसी भी कीमत पर उस बालक का पता चाहिए।”

     

    कंस को क्या पता था कि जिस बालक को वह खोज रहा है, वह उसके महलों से बहुत दूर नहीं, बल्कि एक छोटे-से गाँव में अपनी माँ की गोद में मुस्कुरा रहा है।

     

    —

     

    कंस की चिंता

     

    मथुरा के राजमहल में उस रात कंस सो नहीं पाया।

     

    वह बार-बार अपने महल की खिड़की के पास जाकर बाहर देखने लगता।

     

    चाँदनी रात थी, लेकिन कंस के मन में अंधकार था।

     

    उसने अपने एक मंत्री से कहा—

     

    “मुझे वह बालक चाहिए। चाहे वह कहीं भी छिपा हो।”

     

    मंत्री ने डरते हुए कहा—

     

    “महाराज, यदि वह बालक गोकुल में है तो वहाँ पहुँचने वाले हमारे राक्षस उसे खोज लेंगे।”

     

    कंस ने क्रोध से कहा—

     

    “मुझे आश्वासन नहीं चाहिए! मुझे परिणाम चाहिए।”

     

    तभी उसके मन में एक विचार आया।

     

    उसे याद आई एक अत्यंत शक्तिशाली राक्षसी—

     

    पूतना।

     

    पूतना मायावी थी।

     

    वह अपना रूप बदल सकती थी।

     

    कभी सुंदर स्त्री बन सकती थी, तो कभी भयंकर राक्षसी।

     

    वह छोटे बच्चों को छल से अपने पास बुलाती और अपने विषैले स्तनों का दूध पिलाकर उनका जीवन समाप्त कर देती।

     

    कंस ने तुरंत उसे बुलवाया।

     

    कुछ ही समय बाद पूतना उसके सामने उपस्थित हुई।

     

    उसका विशाल शरीर, लाल आँखें और भयंकर रूप देखकर राजमहल के सैनिक भी काँप उठे।

     

    कंस ने कहा—

     

    “पूतना! मुझे एक काम करना है।”

     

    पूतना ने मुस्कुराकर पूछा—

     

    “कैसा काम, महाराज?”

     

    कंस ने कहा—

     

    “गोकुल में एक बालक जन्मा है। मुझे संदेह है कि वही मेरे विनाश का कारण है। तुम गोकुल जाओ और उस बालक का वध कर दो।”

     

    पूतना ने ठहाका लगाया।

     

    “बस इतनी-सी बात?”

     

    कंस ने कहा—

     

    “उसे पहचानना आसान नहीं होगा। वहाँ नंद नाम का गोप रहता है। उसके घर एक बालक है। मुझे वही चाहिए।”

     

    पूतना ने उत्तर दिया—

     

    “महाराज, आप चिंता न करें। मैं उस बालक को ऐसी मृत्यु दूँगी कि किसी को संदेह तक नहीं होगा।”

     

    कंस के चेहरे पर दुष्ट मुस्कान फैल गई।

     

    उसे लगा कि अब उसका भय समाप्त हो जाएगा।

     

    लेकिन वह नहीं जानता था कि जिस बालक के पास पूतना जा रही है, उसके सामने मृत्यु स्वयं भी असहाय होने वाली है।

     

    —

     

    गोकुल की सुबह

     

    उधर गोकुल में एक सुंदर सुबह हुई।

     

    सूर्य की किरणें धीरे-धीरे गाँव की गलियों में फैलने लगीं।

     

    गायों के गले की घंटियाँ बजने लगीं।

     

    गोपियाँ अपने-अपने घरों में दही मथने लगीं।

     

    कहीं मटकी में माखन निकाला जा रहा था, तो कहीं बालक खेलते हुए इधर-उधर दौड़ रहे थे।

     

    नंद बाबा के घर तो जैसे हर दिन उत्सव ही रहता था।

     

    यशोदा मैया अपने लाल को गोद में लिए बैठी थीं।

     

    बालक कृष्ण उनकी उँगली पकड़कर खेल रहे थे।

     

    कभी अपनी छोटी-सी मुट्ठी बंद करते, कभी खोलते।

     

    यशोदा मैया हँसकर बोलीं—

     

    “अरे मेरे लाल! इतनी-सी मुट्ठी में क्या छिपा रखा है?”

     

    कृष्ण ने अपनी मुट्ठी और कसकर बंद कर ली।

     

    यशोदा मैया बोलीं—

     

    “अच्छा! मुझसे भी नहीं बताओगे?”

     

    कृष्ण मुस्कुराने लगे।

     

    यशोदा मैया उन्हें देखकर इतनी प्रसन्न हुईं कि उन्हें अपने हृदय से लगा लिया।

     

    उन्हें क्या पता था कि आज उनके लाल के जीवन में एक बड़ी लीला होने वाली है।

     

    —

     

    पूतना का रूप परिवर्तन

     

    उधर पूतना गोकुल की ओर बढ़ रही थी।

     

    उसका असली रूप इतना भयंकर था कि कोई मनुष्य उसे देखकर जीवित न रह पाए।

     

    इसलिए उसने अपनी मायावी शक्ति से स्वयं को एक अत्यंत सुंदर स्त्री के रूप में बदल लिया।

     

    उसने सुंदर वस्त्र पहने।

     

    बालों में सुगंधित फूल लगाए।

     

    माथे पर सुंदर तिलक लगाया।

     

    उसका चेहरा इतना मनोहर बना दिया कि जो भी उसे देखता, उसे कोई राजमहल की देवी समझता।

     

    हाथ में उसने एक सुंदर पात्र लिया।

     

    लेकिन उस पात्र में अमृत नहीं, मृत्यु छिपी थी।

     

    उसने अपने स्तनों पर घोर विष लगा रखा था।

     

    उसका उद्देश्य स्पष्ट था—

     

    बालकृष्ण को अपने पास बुलाना और विषपान कराकर उनका वध करना।

     

    पूतना धीरे-धीरे गोकुल में प्रवेश कर गई।

     

    आश्चर्य की बात यह थी कि उसे देखकर किसी को भी उस पर संदेह नहीं हुआ।

     

    गोपियाँ उसकी सुंदरता देखकर एक-दूसरे से कहने लगीं—

     

    “यह कौन है?”

     

    दूसरी गोपी बोली—

     

    “शायद किसी दूर के नगर से आई कोई देवी है।”

     

    तीसरी ने कहा—

     

    “देखो, कितनी सुंदर है!”

     

    पूतना मन ही मन मुस्कुरा रही थी।

     

    वह सोच रही थी—

     

    “मूर्खों! तुम जिसे देवी समझ रहे हो, वही तुम्हारे प्रिय बालक की मृत्यु बनकर आई है।”

     

    लेकिन वह यह नहीं जानती थी कि भगवान के नगर में छल कितनी देर टिक सकता है।

     

    —

     

    नंद भवन में प्रवेश

     

    पूतना सीधे नंद बाबा के घर पहुँची।

     

    उस समय यशोदा मैया अपने लाल को गोद में लिए बैठी थीं।

     

    जैसे ही पूतना ने घर में प्रवेश किया, श्रीकृष्ण ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    कथा में कहा जाता है कि भगवान ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वे अपनी लीला को पूर्ण करने वाले थे।

     

    पूतना धीरे-धीरे यशोदा के पास पहुँची।

     

    उसने मधुर स्वर में कहा—

     

    “बहन! कितना सुंदर बालक है तुम्हारा।”

     

    यशोदा मैया ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हाँ, मेरा कन्हैया बहुत प्यारा है।”

     

    पूतना ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    उसके मन में दुष्ट विचार उठे—

     

    “यही है वह बालक।”

     

    लेकिन तभी उसके भीतर एक विचित्र भावना भी उठी।

     

    उसने ऐसा सुंदर बालक पहले कभी नहीं देखा था।

     

    कृष्ण का मुख चंद्रमा के समान चमक रहा था।

     

    उनके छोटे-छोटे हाथ और चरण देखकर कुछ क्षण के लिए पूतना का हृदय भी कोमल हो उठा।

     

    लेकिन उसके भीतर छिपी दुष्टता ने उस भावना को दबा दिया।

     

    उसने कहा—

     

    “बहन, मुझे बालक को थोड़ी देर गोद में लेने दो।”

     

    यशोदा मैया ने सहजता से कृष्ण को उसकी गोद में दे दिया।

     

    यशोदा को क्या पता था कि जिस स्त्री की गोद में वह अपने लाल को दे रही हैं, वह उन्हें मारने के उद्देश्य से आई है।

     

    —

     

    पूतना की गोद में कृष्ण

     

    पूतना ने बालक कृष्ण को अपनी गोद में लिया।

     

    कृष्ण शांत थे।

     

    उन्होंने अपनी आँखें बंद कर रखी थीं।

     

    पूतना ने उन्हें अपने विषैले स्तन से दूध पिलाने के लिए अपने पास किया।

     

    वह मन ही मन सोच रही थी—

     

    “अब यह बालक कुछ ही क्षणों में समाप्त हो जाएगा।”

     

    लेकिन जैसे ही श्रीकृष्ण ने दूध पीना आरंभ किया, कुछ अद्भुत हुआ।

     

    उन्होंने केवल दूध ही नहीं पिया।

     

    उन्होंने पूतना के प्राण भी खींचने आरंभ कर दिए।

     

    पूतना का चेहरा बदलने लगा।

     

    उसकी आँखें फैल गईं।

     

    वह दर्द से तड़प उठी।

     

    उसने कृष्ण को अपने से अलग करने की कोशिश की।

     

    लेकिन बालक कृष्ण ने उसे और कसकर पकड़ लिया।

     

    पूतना चीख उठी—

     

    “छोड़ो! छोड़ो मुझे!”

     

    लेकिन नन्हे कृष्ण ने उसे नहीं छोड़ा।

     

    अब उसका सुंदर स्त्री वाला रूप समाप्त होने लगा।

     

    उसका शरीर विशाल होने लगा।

     

    उसके बाल बिखर गए।

     

    उसकी आँखें लाल हो गईं।

     

    उसके दाँत बाहर निकल आए।

     

    उसका वास्तविक राक्षसी रूप प्रकट होने लगा।

     

    गोकुल की धरती काँपने लगी।

     

    गोपियाँ भयभीत होकर चिल्लाने लगीं—

     

    “अरे! यह क्या हो रहा है?”

     

    —

     

    पूतना का भयंकर रूप

     

    अचानक पूतना अपने वास्तविक विशाल रूप में आ गई।

     

    उसका शरीर पर्वत के समान विशाल हो गया।

     

    वह जोर-जोर से चिल्लाने लगी।

     

    उसकी चीख से पूरा गोकुल काँप उठा।

     

    पेड़ों से पक्षी उड़ गए।

     

    गायें भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगीं।

     

    गोप और गोपियाँ अपने घरों से बाहर निकल आए।

     

    किसी को समझ नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है।

     

    पूतना ने कृष्ण को अपने शरीर से हटाने की बहुत कोशिश की।

     

    लेकिन भगवान कृष्ण उसके प्राणों को खींचते रहे।

     

    अंततः उसकी शक्ति समाप्त होने लगी।

     

    उसने अंतिम बार भयंकर गर्जना की—

     

    “आऽऽह!”

     

    और देखते ही देखते वह धरती पर गिर पड़ी।

     

    उसका विशाल शरीर गोकुल से बहुत दूर तक फैल गया।

     

    वृक्ष टूट गए।

     

    धरती काँप उठी।

     

    चारों ओर धूल उड़ने लगी।

     

    कुछ क्षण के लिए गोकुल में सन्नाटा छा गया।

     

    —

     

    यशोदा मैया की घबराहट

     

    जैसे ही धूल थोड़ी शांत हुई, यशोदा मैया की दृष्टि अपने कृष्ण पर पड़ी।

     

    उनका कलेजा मुँह को आ गया।

     

    “मेरा लाल!”

     

    वे दौड़कर कृष्ण को उठाने लगीं।

     

    उन्होंने देखा कि उनका कन्हैया बिल्कुल सुरक्षित है।

     

    न कोई चोट।

     

    न कोई भय।

     

    न कोई आँसू।

     

    वह तो ऐसे मुस्कुरा रहे थे जैसे कुछ हुआ ही न हो।

     

    यशोदा मैया ने उन्हें अपने सीने से लगा लिया।

     

    उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “मेरे लाल! तुझे कुछ हो जाता तो मैं क्या करती?”

     

    नंद बाबा भी दौड़ते हुए वहाँ पहुँचे।

     

    उन्होंने कृष्ण को देखा और राहत की साँस ली।

     

    गोपियाँ भी चारों ओर इकट्ठी हो गईं।

     

    एक गोपी बोली—

     

    “यशोदा! तुम्हारा लाल तो बिल्कुल ठीक है!”

     

    दूसरी बोली—

     

    “देखो तो, यह तो हँस रहा है!”

     

    तीसरी ने आश्चर्य से कहा—

     

    “जिस राक्षसी ने पूरे गोकुल को हिला दिया, उसके ऊपर बैठकर यह बालक ऐसे मुस्कुरा रहा है जैसे खेल रहा हो!”

     

    सभी कृष्ण को आश्चर्य से देखने लगीं।

     

    —

     

    गोकुलवासियों ने क्या किया?

     

    गोपियों ने कृष्ण की रक्षा के लिए तुरंत उन्हें गोद में लेकर मंत्रों और भगवान के नाम का स्मरण किया।

     

    वे कहने लगीं—

     

    “हे नारायण! हमारे बालक की रक्षा करना।”

     

    “हे गोविंद! हमारे कन्हैया को अपनी छाया में रखना।”

     

    “हे माधव! इसे हर संकट से बचाना।”

     

    किसी ने कृष्ण के माथे पर गोबर और गोमूत्र से पारंपरिक रूप से रक्षा-चिह्न लगाया।

     

    किसी ने उनके चारों ओर पवित्र नामों का स्मरण किया।

     

    यशोदा मैया उन्हें बार-बार चूमती रहीं।

     

    वे बार-बार उनके हाथ-पैर देखतीं।

     

    “कहीं चोट तो नहीं लगी?”

     

    कृष्ण मुस्कुरा रहे थे।

     

    मानो कह रहे हों—

     

    “मैया, मैं बिल्कुल ठीक हूँ।”

     

    लेकिन माँ का हृदय तो माँ का ही होता है।

     

    वह भगवान को भी बालक ही समझती है।

     

    —

     

    पूतना के शरीर का रहस्य

     

    अब गोकुलवासियों के सामने सबसे बड़ी समस्या थी—उस विशाल राक्षसी के शरीर का क्या किया जाए?

     

    उसका शरीर इतना विशाल था कि देखकर सभी भयभीत हो रहे थे।

     

    गोपों ने उसके शरीर को काटकर गोकुल से दूर ले जाकर जलाने का निर्णय किया।

     

    जब उसका शरीर जलाया गया तो आश्चर्यजनक रूप से वातावरण में एक सुगंध फैलने लगी।

     

    गोकुलवासी चकित रह गए।

     

    जिस राक्षसी के शरीर से मृत्यु और भय का संकेत मिलना चाहिए था, उसके शरीर से तो सुगंध आ रही थी।

     

    इसका कारण था—

     

    भगवान श्रीकृष्ण के स्पर्श ने उसे पवित्र कर दिया था।

     

    पूतना श्रीकृष्ण को मारने आई थी।

     

    उसके हृदय में प्रेम नहीं था।

     

    उसका उद्देश्य छल और हत्या था।

     

    फिर भी भगवान ने उसके साथ ऐसा व्यवहार किया, जैसा एक माँ के साथ किया जाता है।

     

    क्यों?

     

    क्योंकि उसने भगवान को अपने स्तन से दूध पिलाने का भाव बनाया था, चाहे उसके मन में विष और छल ही क्यों न हो।

     

    इसीलिए भगवान ने उसे भी अपनी कृपा प्रदान की।

     

    यह श्रीकृष्ण की करुणा का अद्भुत उदाहरण है।

     

    —

     

    नंद बाबा का लौटना

     

    कुछ समय बाद नंद बाबा और गोकुल के अन्य पुरुष भी लौटकर आए।

     

    उन्होंने जब पूरी घटना सुनी तो वे आश्चर्य में पड़ गए।

     

    नंद बाबा ने कृष्ण को अपनी गोद में उठाया।

     

    उन्होंने अपने लाल को देखा और बोले—

     

    “कन्हैया! तू ठीक है न?”

     

    कृष्ण ने उनकी उँगली पकड़ ली।

     

    नंद बाबा की आँखें भर आईं।

     

    उन्होंने मन ही मन भगवान से कहा—

     

    “हे प्रभु! मेरे बालक की सदैव रक्षा करना।”

     

    उन्हें यह नहीं पता था कि जिसे वे भगवान से बचाने की प्रार्थना कर रहे हैं, वही स्वयं भगवान है।

     

    —

     

    गोकुल में एक नई चर्चा

     

    उस दिन के बाद गोकुल में हर जगह केवल एक ही चर्चा होने लगी—

     

    “नंद बाबा का बालक साधारण नहीं है।”

     

    कोई कहता—

     

    “उसने उस भयंकर राक्षसी को कैसे मार दिया?”

     

    दूसरा कहता—

     

    “इतना छोटा बालक भला ऐसा कैसे कर सकता है?”

     

    तीसरा कहता—

     

    “शायद किसी देवता की कृपा है।”

     

    लेकिन यशोदा मैया को इन बातों से कोई लेना-देना नहीं था।

     

    उनके लिए कृष्ण भगवान नहीं थे।

     

    वे उनके लाल थे।

     

    उनका संसार थे।

     

    उनकी साँसों का आधार थे।

     

    रात को जब कृष्ण उनकी गोद में सोए, तो यशोदा मैया उन्हें निहारती रहीं।

     

    उन्होंने धीरे से कहा—

     

    “तू जहाँ भी जाएगा, मैं तेरे साथ रहूँगी।”

     

    कृष्ण ने आँखें बंद कर लीं।

     

    यशोदा मैया ने उनके माथे को चूमा।

     

    बाहर यमुना की लहरें धीरे-धीरे बह रही थीं।

     

    आकाश में चाँद चमक रहा था।

     

    गोकुल शांत था।

     

    लेकिन यह शांति अधिक समय तक रहने वाली नहीं थी।

     

    क्योंकि नंदलाल अभी अपनी बाल-लीलाओं की शुरुआत ही कर रहे थे।

     

    —

     

    इस लीला का सबसे बड़ा संदेश

     

    श्रीकृष्ण की पूतना लीला केवल एक राक्षसी के वध की कथा नहीं है।

     

    यह भगवान की करुणा और कृपा का संदेश भी देती है।

     

    पूतना विष लेकर आई थी।

     

    उसके मन में हत्या का विचार था।

     

    फिर भी श्रीकृष्ण ने उसके भीतर से उस मातृत्व के बाहरी भाव को स्वीकार किया और उसे मुक्ति प्रदान की।

     

    इससे भक्तों को यह शिक्षा मिलती है कि भगवान की कृपा कितनी महान है।

     

    मनुष्य कितना भी दूर क्यों न चला गया हो, यदि उसका संबंध भगवान से किसी भी प्रकार जुड़ जाए, तो भगवान उसे अपने से दूर नहीं करते।

     

    और यही श्रीकृष्ण हैं—

     

    जो दुष्टों का अंत करते हैं,

    भक्तों की रक्षा करते हैं,

    और अपने शत्रुओं पर भी कृपा करते हैं।

     

    गोकुल के लोगों को उस दिन केवल इतना दिखाई दिया कि एक राक्षसी मारी गई और उनका कन्हैया बच गया।

     

    लेकिन देवताओं के लिए वह दिन कुछ और ही था।

     

    उन्होंने देखा था—

     

    स्वयं भगवान ने अपनी बाल-लीला आरंभ कर दी थी।

     

    अब गोकुल में कोई नहीं जानता था कि अगली बार क्या होगा।

     

    कभी कोई राक्षस आएगा।

     

    कभी कोई अद्भुत घटना घटेगी।

     

    और कभी नंदलाल अपनी ऐसी नटखट शरारत करेंगे कि पूरा गोकुल हँसते-हँसते लोटपोट हो जाएगा।

     

    क्योंकि यह तो केवल शुरुआत थी।

     

    आगे आने वाली लीलाओं में कृष्ण कभी अपने नन्हे पैरों से ऐसी अद्भुत लीला करेंगे कि एक भारी गाड़ी पलट जाएगी…

     

    और गोकुलवासी फिर सोच में पड़ जाएँगे—

     

    “आखिर हमारा यह नन्हा-सा कन्हैया है कौन?”

     

    क्रमशः…

     

     

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

     

    (भाग 1 — गोकुल में नंदलाल का आगमन)

     

     

    बहुत समय पहले की बात है। यमुना नदी के पवित्र तट के पास एक सुंदर-सा गाँव बसा हुआ था—गोकुल।

     

    गोकुल कोई बहुत बड़ा नगर नहीं था, लेकिन उसकी सुंदरता ऐसी थी कि मानो स्वयं प्रकृति ने अपने हाथों से उसे सजाया हो। चारों ओर हरे-भरे वृक्ष, लताओं से ढकी हुई पगडंडियाँ, फूलों की सुगंध से महकती हवाएँ और यमुना जी की कल-कल करती धारा।

     

    सुबह होते ही गोकुल में एक अलग ही जीवन दिखाई देता था।

     

    कहीं गायों की घंटियाँ बजतीं, कहीं गोपियाँ अपने घरों में दही मथतीं, कहीं बालक अपने मित्रों के साथ खेलते हुए गलियों में दौड़ते और कहीं ग्वाल अपने पशुओं को लेकर हरे-भरे मैदानों की ओर निकल जाते।

     

    गोकुल के मुखिया थे—नंद बाबा।

     

    नंद बाबा सरल हृदय, दयालु और धर्मात्मा थे। उनके घर में धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी, उनके आँगन में असंख्य गायें थीं, परंतु उनके जीवन में एक कमी थी।

     

    वह कमी थी—संतान की।

     

    नंद बाबा और उनकी पत्नी यशोदा मैया के मन में एक ही इच्छा थी—

     

    “काश! हमारे घर भी कोई बालक होता, जिसे हम अपनी गोद में खिलाते, जिसके नन्हे-नन्हे चरणों की आहट से हमारा आँगन गूँज उठता।”

     

    यशोदा मैया जब कभी किसी अन्य माता को अपने बच्चे को गोद में खिलाते देखतीं, तो उनके हृदय में मातृत्व की लहर उठती।

     

    वह मन ही मन भगवान से प्रार्थना करतीं—

     

    “हे प्रभु! मुझे कुछ नहीं चाहिए। न धन चाहिए, न वैभव। बस एक बार मुझे माँ कहकर पुकारने वाला कोई बालक दे दीजिए।”

     

    नंद बाबा भी यशोदा की इस इच्छा को समझते थे।

     

    वे उन्हें सांत्वना देते—

     

    “यशोदा, धैर्य रखो। भगवान जब देंगे, तब ऐसा देंगे कि हमारा जीवन धन्य हो जाएगा।”

     

    लेकिन उन्हें क्या पता था कि भगवान स्वयं उनके घर आने वाले हैं।

     

    —

     

    कंस का अत्याचार

     

    उधर मथुरा में राजा कंस का अत्याचार बढ़ता जा रहा था।

     

    कंस अत्यंत शक्तिशाली था, परंतु उसके हृदय में दया का नाम तक नहीं था। वह अपने भय और अहंकार में इतना डूब गया था कि प्रजा उसके नाम से काँपती थी।

     

    एक दिन कंस अपनी बहन देवकी के विवाह के बाद उसे और उसके पति वसुदेव को रथ में बैठाकर स्वयं विदा करने जा रहा था।

     

    तभी आकाश में एक दिव्य वाणी गूँजी—

     

    “हे कंस! जिस बहन को तू इतने प्रेम से विदा कर रहा है, उसी देवकी की आठवीं संतान तेरे विनाश का कारण बनेगी।”

     

    यह सुनते ही कंस के चेहरे का रंग बदल गया।

     

    उसने तलवार निकाल ली और देवकी को मारने के लिए आगे बढ़ा।

     

    वसुदेव ने हाथ जोड़कर कहा—

     

    “हे कंस! तुम्हें देवकी से क्या भय है? आकाशवाणी ने केवल उसकी आठवीं संतान के विषय में कहा है। मैं तुम्हें उसकी प्रत्येक संतान तुम्हारे हाथों सौंप दूँगा।”

     

    कंस ने वसुदेव की बात मान ली और दोनों को कारागार में बंद कर दिया।

     

    समय बीतता गया।

     

    देवकी की एक-एक करके छह संतानों का जन्म हुआ और कंस ने निर्दयतापूर्वक उनका वध कर दिया।

     

    सातवीं संतान के रूप में भगवान शेष के अंश बलराम जी प्रकट हुए, जिन्हें योगमाया की शक्ति से देवकी के गर्भ से रोहिणी के गर्भ में पहुँचा दिया गया।

     

    अब आठवीं संतान का समय निकट आ चुका था।

     

    मथुरा के कारागार में उस रात असाधारण शांति थी।

     

    आकाश में बादल छाए हुए थे।

     

    यमुना की धारा गंभीर होकर बह रही थी।

     

    चारों ओर अंधकार था।

     

    लेकिन उस अंधकार के भीतर एक ऐसी ज्योति जन्म लेने वाली थी, जो आने वाले युगों तक संसार को प्रकाशित करने वाली थी।

     

    —

     

    श्रीकृष्ण का दिव्य जन्म

     

    भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी की आधी रात थी।

     

    चारों ओर गहरा अंधकार था।

     

    कारागार के भीतर देवकी और वसुदेव भगवान से प्रार्थना कर रहे थे।

     

    तभी अचानक पूरा कारागार दिव्य प्रकाश से भर उठा।

     

    देवकी ने देखा—उनके सामने एक अद्भुत बालक प्रकट हुआ।

     

    उस बालक के सिर पर मुकुट था, हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म थे तथा उनके शरीर से दिव्य प्रकाश निकल रहा था।

     

    देवकी और वसुदेव समझ गए—

     

    स्वयं भगवान विष्णु उनके पुत्र के रूप में प्रकट हुए हैं।

     

    वसुदेव ने हाथ जोड़कर कहा—

     

    “हे प्रभु! आप स्वयं हमारे सामने प्रकट हुए हैं। हम अत्यंत भाग्यशाली हैं।”

     

    देवकी की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “प्रभु! कंस को यदि आपके जन्म का पता चल गया तो वह आपको भी मारने का प्रयास करेगा। कृपा करके अपनी यह दिव्य छवि छिपा लीजिए।”

     

    भगवान मुस्कुराए।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “माता, मैं तुम्हारे पुत्र के रूप में पृथ्वी पर आया हूँ। तुम चिंता मत करो। मुझे अभी गोकुल ले जाओ। वहाँ नंद बाबा के घर यशोदा के यहाँ एक कन्या जन्मी है। तुम मुझे वहाँ छोड़कर उस कन्या को यहाँ ले आना।”

     

    इतना कहकर भगवान ने अपना दिव्य रूप त्याग दिया और एक साधारण नवजात शिशु के रूप में दिखाई देने लगे।

     

    उसी क्षण कारागार के सभी द्वार अपने-आप खुल गए।

     

    पहरेदार गहरी नींद में सो गए।

     

    वसुदेव ने बालक को एक टोकरी में रखा और उसे अपने सिर पर उठा लिया।

     

    वे कारागार से बाहर निकल पड़े।

     

    —

     

    यमुना की परीक्षा

     

    बाहर भयंकर वर्षा हो रही थी।

     

    बिजलियाँ चमक रही थीं।

     

    वसुदेव जी बालक को लेकर यमुना की ओर बढ़ने लगे।

     

    उनके मन में एक ही विचार था—

     

    “मुझे किसी भी प्रकार इस बालक को सुरक्षित गोकुल पहुँचाना है।”

     

    जब वे यमुना जी के पास पहुँचे तो नदी उफान पर थी।

     

    वसुदेव जी कुछ क्षण रुक गए।

     

    लेकिन तभी उनके पीछे से एक दिव्य दृश्य दिखाई दिया।

     

    शेषनाग ने अपना विशाल फन फैलाकर वसुदेव और बालक कृष्ण के ऊपर छत्र बना दिया।

     

    तेज वर्षा होने के बाद भी बालक कृष्ण पर एक बूंद तक नहीं पड़ी।

     

    वसुदेव जी यमुना में उतर गए।

     

    यमुना का जल उनके कंधों तक पहुँचने लगा।

     

    तभी यमुना जी ने जैसे अपने प्रियतम को पहचान लिया।

     

    जल की एक लहर उठी और श्रीकृष्ण के चरणों को स्पर्श कर गई।

     

    मानो यमुना माता कह रही हों—

     

    “प्रभु! इतने वर्षों से आपकी प्रतीक्षा थी। आज मेरे तट पर आपका आगमन हुआ है।”

     

    वसुदेव जी सुरक्षित रूप से यमुना पार करके गोकुल पहुँच गए।

     

    —

     

    नंद भवन में आनंद

     

    उस समय गोकुल में सभी लोग गहरी नींद में सो रहे थे।

     

    नंद बाबा के घर भी एक बालिका का जन्म हुआ था।

     

    योगमाया की शक्ति से सभी लोग निद्रा में थे।

     

    वसुदेव जी ने देखा कि यशोदा मैया अपने शिशु के पास सो रही हैं।

     

    उन्होंने धीरे से श्रीकृष्ण को वहाँ सुला दिया और वहाँ जन्मी कन्या को उठाकर वापस मथुरा की ओर चल पड़े।

     

    उन्हें पता ही नहीं चला कि संसार का पालन करने वाला स्वयं उनके घर से होकर उनके घर को धन्य कर गया है।

     

    वसुदेव जी वापस कारागार पहुँचे।

     

    द्वार फिर अपने-आप बंद हो गए।

     

    पहरेदार जाग गए।

     

    और जैसे ही बालिका ने रोना आरंभ किया, कारागार में हलचल मच गई।

     

    कंस को समाचार दिया गया—

     

    “देवकी की आठवीं संतान का जन्म हो गया है।”

     

    कंस तुरंत कारागार में पहुँचा।

     

    उसने उस नवजात कन्या को उठाकर पत्थर पर पटकना चाहा।

     

    लेकिन तभी वह कन्या उसके हाथ से छूटकर आकाश में चली गई।

     

    उसका रूप दिव्य हो गया।

     

    उसने कहा—

     

    “हे कंस! मुझे मारकर तुझे क्या मिलेगा? तेरा काल तो गोकुल में जन्म ले चुका है।”

     

    यह कहकर वह देवी आकाश में विलीन हो गई।

     

    कंस के चेहरे पर भय छा गया।

     

    उधर गोकुल में किसी को कुछ पता नहीं था कि उनके बीच कौन आया है।

     

    —

     

    गोकुल में उत्सव

     

    प्रातःकाल होते ही गोकुल में एक अद्भुत आनंद फैल गया।

     

    यशोदा मैया की आँख खुली।

     

    उन्होंने अपने पास एक सुंदर बालक को देखा।

     

    बालक अत्यंत मनोहर था।

     

    श्याम वर्ण, घुँघराले बाल, गुलाबी होंठ और बंद आँखों पर झुकी हुई लंबी पलकें।

     

    यशोदा मैया कुछ क्षण तक उसे निहारती रह गईं।

     

    फिर उनके हृदय में ऐसी ममता उमड़ी कि उन्होंने बालक को अपनी छाती से लगा लिया।

     

    उनके मुख से अनायास निकला—

     

    “मेरे लाल!”

     

    जैसे ही यह समाचार गोकुल में फैला कि नंद बाबा के घर पुत्र हुआ है, पूरा गोकुल खुशी से झूम उठा।

     

    गोपियाँ दौड़-दौड़कर नंद भवन आने लगीं।

     

    कोई दही लेकर आई।

     

    कोई माखन लेकर आई।

     

    कोई शिशु के लिए सुंदर वस्त्र लेकर आई।

     

    किसी ने कहा—

     

    “अरे! नंद बाबा के घर तो चाँद उतर आया है!”

     

    दूसरी गोपी बोली—

     

    “नहीं-नहीं, चाँद तो आज फीका पड़ गया होगा। इतना सुंदर बालक उसने भी नहीं देखा होगा!”

     

    तीसरी गोपी हँसते हुए बोली—

     

    “देखना, यह बालक बड़ा होकर पूरे गोकुल की मटकी खाली कर देगा।”

     

    तब किसे पता था कि उसकी यह बात एक दिन सच होने वाली है!

     

    नंद बाबा तो आनंद से फूले नहीं समा रहे थे।

     

    उन्होंने गोकुल के लोगों के लिए दान बाँटा।

     

    गायों को सजाया गया।

     

    घर-घर दीप जलाए गए।

     

    ढोल और नगाड़े बजने लगे।

     

    गोप और गोपियाँ नाचने लगे।

     

    चारों ओर एक ही नाम गूँज रहा था—

     

    “नंद के घर आनंद भयो!”

     

    और उस दिन से वह नन्हा बालक सबके लिए बन गया—

     

    नंदलाल।

     

    —

     

    पहली बार यशोदा ने कृष्ण को देखा

     

    उत्सव समाप्त होने के बाद जब सब लोग चले गए, तब यशोदा मैया अपने लाल को लेकर अकेली बैठीं।

     

    वे उसके छोटे-छोटे हाथों को देखतीं।

     

    कभी उसके पैरों को चूमतीं।

     

    कभी उसके माथे पर हाथ फेरतीं।

     

    बालक कृष्ण ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं।

     

    उनकी आँखें इतनी सुंदर थीं कि यशोदा मैया उनमें खो गईं।

     

    उन्होंने प्रेम से पूछा—

     

    “लाला! तू कहाँ से आया है?”

     

    बालक मुस्कुराया।

     

    यशोदा मैया हँस पड़ीं।

     

    “अच्छा! अभी से मुझसे बातें करेगा?”

     

    उन्होंने उसे अपनी गोद में उठाया और धीरे-धीरे झुलाने लगीं।

     

    उन्हें क्या पता था कि जिस बालक को वह अपनी गोद में झुला रही हैं, उसी के चरणों में अनंत ब्रह्मांड झूलते हैं।

     

    जिसे वे अपना पुत्र समझकर दुलार रही हैं, वही समस्त संसार का पालनकर्ता है।

     

    परंतु भगवान को भी तो यही चाहिए था।

     

    उन्हें वैकुंठ का वैभव नहीं चाहिए था।

     

    उन्हें चाहिए था—

     

    माँ का प्रेम।

     

    इसीलिए तो वे गोकुल आए थे।

     

    —

     

    गोकुल क्यों बना भगवान का घर?

     

    भगवान श्रीकृष्ण ने गोकुल को इसलिए चुना क्योंकि वहाँ प्रेम था।

     

    वहाँ छल नहीं था।

     

    वहाँ अहंकार नहीं था।

     

    वहाँ लोग भगवान को किसी स्वार्थ से नहीं, प्रेम से चाहते थे।

     

    यशोदा के लिए कृष्ण भगवान नहीं थे।

     

    वे उनके लाला थे।

     

    नंद बाबा के लिए वे संसार के स्वामी नहीं थे।

     

    वे उनके कन्हैया थे।

     

    गोपियों के लिए वे कोई महान देवता नहीं थे।

     

    वे उनके गोकुल के नटखट बालक थे।

     

    और यही कृष्ण की सबसे सुंदर लीला थी—

     

    भगवान होकर भी भक्तों के प्रेम के वश में हो जाना।

     

    गोकुल की गलियों में अब एक नई चहल-पहल थी।

     

    हर घर में कृष्ण की चर्चा होने लगी।

     

    किसी को उनके सुंदर मुख की चिंता थी।

     

    किसी को उनकी मुस्कान की।

     

    कोई कहता—

     

    “नंदलाल बहुत सुंदर हैं।”

     

    कोई कहता—

     

    “इनकी आँखें तो कमल जैसी हैं।”

     

    और कोई हँसकर कहता—

     

    “अभी से इतना सुंदर है, बड़ा होकर जाने कितनी गोपियों की मटकी फोड़ेगा!”

     

    सभी हँस पड़ते।

     

    लेकिन किसी को यह नहीं पता था कि आने वाले दिनों में यही नन्हा बालक गोकुल की गलियों में ऐसी-ऐसी लीलाएँ करने वाला है कि लोग अपनी सारी चिंताएँ भूल जाएँगे।

     

    वह कभी माखन चुराएगा।

     

    कभी गोपियों को सताएगा।

     

    कभी यशोदा मैया से डाँट खाएगा।

     

    कभी ग्वाल-बालों के साथ गाय चराने जाएगा।

     

    और कभी अपनी छोटी-सी मुस्कान से पूरे ब्रज को मोहित कर देगा।

     

    लेकिन अभी तो वह केवल एक नन्हा शिशु था।

     

    यशोदा मैया की गोद में सोया हुआ।

     

    उनकी उँगली पकड़े हुए।

     

    और बाहर गोकुल की गलियों में गूँज रहा था—

     

    “जय कन्हैया लाल की!”

     

    यमुना की लहरें मंद-मंद बह रही थीं।

     

    गायें रंभा रही थीं।

     

    वृक्षों पर पक्षी मधुर स्वर में चहक रहे थे।

     

    मानो पूरी प्रकृति स्वयं कह रही हो—

     

    “गोकुल धन्य हो गया।”

     

    और सचमुच उस दिन से गोकुल केवल एक गाँव नहीं रहा।

     

    वह बन गया—

     

    श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं की पवित्र भूमि।

     

    जहाँ भगवान ने ईश्वर बनकर नहीं,

    एक नटखट बालक बनकर जीवन जिया।

     

    जहाँ भक्तों ने उन्हें पूजा नहीं,

    उन्हें प्रेम किया।

     

    और जहाँ एक माँ ने संसार के स्वामी को अपनी गोद में लेकर कहा—

     

    “सो जा मेरे लाल… मेरी आँखों के तारे, मेरे कान्हा।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    और उस मुस्कान में जैसे पूरा ब्रह्मांड समा गया।

     

    यहीं से आरंभ होती है नंदलाल की अद्भुत बाल-लीलाओं की कथा…

     

    लेकिन गोकुल को अभी कहाँ पता था कि उसके आँगन में आया यह नन्हा-सा बालक शीघ्र ही ऐसी लीला करने वाला है, जिससे एक भयानक राक्षसी का अंत होगा और पूरे ब्रज को पहली बार अपने कान्हा की दिव्यता का आभास होगा…|

     

     

    Continue…. ✍️✍️(Story pasand are to comment jarur de🙏)

     

     

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • बहन ने राखी तो बाँधी… लेकिन भाई की कलाई हमेशा के लिए खाली रह गई”

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    रक्षाबंधन की सुबह थी।

     

    पूरे शहर में खुशियों का माहौल था। कहीं बहनें अपने भाइयों के लिए राखियाँ खरीद रही थीं, तो कहीं भाई अपनी बहनों के लिए मिठाई और उपहार लेकर घर लौट रहे थे।

     

    लेकिन शहर के एक छोटे-से मोहल्ले में 24 साल की नंदिनी खिड़की के पास बैठी थी।

     

    उसके हाथ में एक राखी थी।

     

    वही राखी, जो उसने पिछले साल अपने भाई आकाश के लिए खरीदी थी।

     

    आकाश अब इस दुनिया में नहीं था।

     

    नंदिनी की आँखें राखी पर टिकी थीं और होंठों पर एक हल्की-सी मुस्कान थी।

     

    “तू होता ना आकाश… तो आज फिर मुझे चिढ़ाता कि इतनी महंगी राखी क्यों लाई?”

     

    आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    चार साल पहले तक नंदिनी और आकाश का रिश्ता बिल्कुल सामान्य भाई-बहन जैसा था।

     

    दोनों हर छोटी बात पर लड़ते थे।

     

    आकाश नंदिनी की चॉकलेट खा जाता था।

     

    नंदिनी उसकी किताबें छुपा देती थी।

     

    आकाश कहता—

     

    “तुम्हारी शादी हो जाएगी ना, तब देखना… तुम्हें तुम्हारा भाई याद आएगा।”

     

    नंदिनी हँसकर कहती—

     

    “पहले खुद कमाना सीख ले, फिर मेरी रक्षा करना।”

     

    आकाश मुस्कुरा देता।

     

    “पैसे नहीं होंगे तो क्या हुआ… जान तो है ना।”

     

    नंदिनी तब हँस देती थी।

     

    उसे क्या पता था कि एक दिन यही शब्द उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा दर्द बन जाएंगे।

     

    आकाश पढ़ाई में बहुत अच्छा था।

     

    उसका सपना था कि वह सरकारी नौकरी करेगा और अपनी माँ और बहन को एक अच्छा घर देगा।

     

    पिता पहले ही गुजर चुके थे।

     

    घर की जिम्मेदारी धीरे-धीरे आकाश के कंधों पर आ गई थी।

     

    दिन में पढ़ाई और रात में एक छोटी-सी दुकान पर काम।

     

    कई बार नंदिनी कहती—

     

    “भैया, इतनी मेहनत मत किया करो। थोड़ा आराम भी कर लिया करो।”

     

    आकाश हँसकर जवाब देता—

     

    “आराम गरीबों के लिए नहीं होता पगली… पहले जिंदगी बदलेंगे, फिर आराम करेंगे।”

     

    रक्षाबंधन का दिन आया।

     

    नंदिनी ने आकाश के लिए राखी बाँधी।

     

    आकाश ने जेब से एक छोटा-सा डिब्बा निकाला।

     

    “ये तेरे लिए।”

     

    नंदिनी ने डिब्बा खोला।

     

    अंदर एक छोटी-सी चाँदी की अंगूठी थी।

     

    नंदिनी की आँखें चमक उठीं।

     

    “इतने पैसे कहाँ से आए?”

     

    आकाश ने मजाक में कहा—

     

    “चोरी की है।”

     

    “सच बताओ।”

     

    आकाश कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “दो महीने से रोज दो घंटे ज्यादा काम कर रहा था।”

     

    नंदिनी ने अंगूठी वापस करने की कोशिश की।

     

    “मुझे नहीं चाहिए।”

     

    आकाश ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “बहन को दिया हुआ तोहफा वापस नहीं लेते।”

     

    फिर उसने धीरे से कहा—

     

    “और हाँ… एक वादा कर।”

     

    “क्या?”

     

    “तू अपनी पढ़ाई कभी मत छोड़ना।”

     

    नंदिनी ने हँसते हुए कहा—

     

    “ठीक है।”

     

    आकाश बोला—

     

    “नहीं। राखी की कसम खा।”

     

    नंदिनी ने उसकी कलाई पकड़कर कहा—

     

    “राखी की कसम… मैं पढ़ाई नहीं छोड़ूँगी।”

     

    अगले कुछ महीने सब ठीक चला।

     

    फिर एक रात आकाश दुकान से घर लौट रहा था।

     

    बारिश बहुत तेज थी।

     

    सड़क पर एक तेज रफ्तार ट्रक आया।

     

    एक पल…

     

    बस एक पल…

     

    और आकाश की जिंदगी खत्म हो गई।

     

    घर का दरवाजा खुला।

     

    लोगों की भीड़ थी।

     

    माँ चीख रही थीं।

     

    नंदिनी पत्थर बनकर खड़ी थी।

     

    उसे यकीन ही नहीं हो रहा था।

     

    उसने आकाश का हाथ पकड़ा।

     

    कलाई पर पिछले रक्षाबंधन की राखी अभी भी बंधी हुई थी।

     

    नंदिनी फूट-फूटकर रो पड़ी।

     

    “भैया उठो ना…”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    “तुमने कहा था ना… तुम मेरी रक्षा करोगे…”

     

    फिर भी कोई जवाब नहीं आया।

     

    उस दिन के बाद नंदिनी की जिंदगी बदल गई।

     

    उसने पढ़ाई छोड़ने का फैसला कर लिया।

     

    उसे लगा अब जीने का कोई मतलब नहीं।

     

    लेकिन एक रात उसे आकाश की अलमारी से एक डायरी मिली।

     

    डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर मैं कभी तेरे साथ नहीं रहूँ, तो रोना मत। बस इतना याद रखना कि तेरे सपने अब मेरी जिम्मेदारी हैं।”

     

    नंदिनी की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    नीचे एक और लाइन लिखी थी—

     

    “जिस दिन तू अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी, उस दिन समझूँगा कि मैंने अपनी बहन की रक्षा कर दी।”

     

    नंदिनी ने डायरी सीने से लगा ली।

     

    अगले दिन से उसने फिर पढ़ाई शुरू कर दी।

     

    लोग बातें करते रहे।

     

    “लड़की है, कितना पढ़ेगी?”

     

    “अब घर संभालना चाहिए।”

     

    “भाई भी नहीं है… कौन सहारा देगा?”

     

    नंदिनी हर बात सुनती।

     

    और चुपचाप पढ़ती रहती।

     

    दिन में कॉलेज।

     

    शाम को बच्चों को ट्यूशन।

     

    रात में पढ़ाई।

     

    कई बार भूखी सोई।

     

    कई बार फीस भरने के पैसे नहीं थे।

     

    लेकिन उसने हार नहीं मानी।

     

    तीन साल बाद उसका सरकारी नौकरी में चयन हो गया।

     

    जिस दिन नियुक्ति पत्र उसके हाथ में आया, वह सीधे आकाश की तस्वीर के सामने गई।

     

    उसने तस्वीर के पास एक राखी रखी।

     

    और बोली—

     

    “भैया… आज मैंने अपना वादा पूरा कर दिया।”

     

    उसकी माँ पीछे खड़ी रो रही थीं।

     

    नंदिनी मुस्कुराई।

     

    “अब मुझे किसी की दया नहीं चाहिए माँ। भैया ने सिखाया था कि जिंदगी चाहे कितनी भी दर्द दे… इंसान को अपने सपनों से रिश्ता नहीं तोड़ना चाहिए।”

     

    रक्षाबंधन फिर आया।

     

    इस बार नंदिनी ने अपनी कलाई पर खुद राखी बाँधी।

     

    लोगों ने पूछा—

     

    “अपने हाथ पर राखी क्यों?”

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि अब मुझे अपने सपनों की रक्षा खुद करनी है।”

     

    उस दिन उसे समझ आया—

     

    राखी सिर्फ भाई की कलाई पर बंधा धागा नहीं होती।

     

    वह एक वादा होती है।

     

    और कभी-कभी…

     

    वह वादा किसी इंसान के चले जाने के बाद भी जिंदा रहता है।

     

    सीख:

    जिसे हम खो देते हैं, वह हमेशा हमारे साथ नहीं रहता… लेकिन उसकी कही हुई अच्छी बातें हमारे अंदर हमेशा जिंदा रह सकती हैं। जिंदगी कितनी भी मुश्किल क्यों न हो, अपने सपनों को मरने मत देना। क्योंकि आपकी सफलता ही कभी-कभी आपके अपनों के अधूरे सपनों को पूरा करती है।

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    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • “कलाई पर बंधी डोर”

    “कलाई पर बंधी डोर”

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

    रक्षाबंधन का दिन था। पूरे घर में सुबह से ही चहल-पहल थी। आँगन में रंगोली बनी थी, रसोई से मिठाइयों की खुशबू आ रही थी और माँ बार-बार दरवाज़े की ओर देख रही थीं।

     

    लेकिन इस बार घर में एक कमी थी—आरव नहीं था।

     

    आरव शहर से बहुत दूर नौकरी करता था। पिछले तीन सालों से वह रक्षाबंधन पर घर नहीं आ पाया था। हर साल उसकी छोटी बहन नंदिनी राखी की थाली सजाकर दरवाज़े पर बैठ जाती, लेकिन शाम होते-होते उसकी आँखों की चमक बुझ जाती।

     

    इस बार भी नंदिनी सुबह से तैयार थी। उसने अपनी पसंद की गुलाबी साड़ी पहनी थी और आरव के लिए बाजार से एक सुंदर-सी राखी खरीदी थी।

     

     

    माँ ने धीरे से पूछा, “बेटा, आरव ने कुछ बताया?”

    नंदिनी ने मुस्कुराने की कोशिश की।

    “कहा है माँ… इस बार जरूर आएगा।”

    माँ ने उसके चेहरे को देखा। वह समझ रही थीं कि बेटी को भाई के आने से ज्यादा उसके वापस आने के वादे पर भरोसा था।

    दोपहर हो गई।

     

     

    फिर शाम होने लगी।

    नंदिनी बार-बार अपना फोन देखती। हर बार स्क्रीन खाली मिलती।

    उसने आरव को फोन लगाया।

    “भैया… कहाँ पहुँचे?”

    उधर से आरव की आवाज़ आई, “बस नंदू, थोड़ा काम फँस गया है। तुम चिंता मत करो। मैं कोशिश कर रहा हूँ।”

     

     

    नंदिनी कुछ पल चुप रही।

    फिर बोली, “हर साल कोशिश ही करते हो भैया…”

    फोन के दूसरी तरफ सन्नाटा छा गया।

    आरव समझ गया कि उसकी बहन की आवाज़ में शिकायत से ज्यादा टूटे हुए इंतज़ार का दर्द था।

     

     

    “नंदू… इस बार मैं—”

     

     

    नंदिनी ने फोन काट दिया।

    उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।

    वह अपने कमरे में गई और अलमारी खोली। अंदर एक छोटा-सा डिब्बा रखा था। उसने उसे बाहर निकाला। डिब्बे में बचपन की कई चीज़ें थीं—आरव की पुरानी घड़ी, एक टूटा हुआ खिलौना और एक छोटी-सी राखी।

     

     

    वह राखी देखकर नंदिनी को अपना बचपन याद आ गया।

    जब वह छोटी थी, तो स्कूल से लौटते समय कुछ लड़कों ने उसे परेशान किया था। वह रोते हुए घर आई थी। आरव ने उसकी आँखों में आँसू देखे तो बिना कुछ पूछे उसका हाथ पकड़ लिया था।

     

    “किसने परेशान किया?”

     

    नंदिनी ने डरते हुए नाम बताया।

     

    आरव उस समय खुद बहुत छोटा था, लेकिन उसने अपनी बहन से कहा था—

    “जब तक मैं हूँ, तुझे किसी से डरने की जरूरत नहीं।”

     

    उस दिन नंदिनी ने पहली बार अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधी थी।

    राखी बाँधते हुए उसने पूछा था, “भैया, ये धागा सच में मेरी रक्षा करेगा?”

    आरव हँस पड़ा था।

     

    “नहीं पगली… ये धागा मुझे याद दिलाएगा कि मेरी एक बहन है, जिसकी खुशी मेरी जिम्मेदारी है।”

    नंदिनी मुस्कुराई थी।

    आज वही बच्ची बड़ी हो गई थी।

    और वह धागा अब भी उसकी मुट्ठी में था।

    रात के लगभग आठ बज गए थे।

    घर के बाहर एक कार आकर रुकी।

     

     

    माँ ने खिड़की से देखा।

    उनकी आँखों में अचानक चमक आ गई।

    “नंदिनी…”

    नंदिनी कमरे से बाहर आई।

    दरवाज़े पर आरव खड़ा था।

     

     

    थका हुआ, धूल से भरा हुआ, लेकिन चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान।

    नंदिनी कुछ सेकंड तक उसे देखती रही।

     

     

    फिर दौड़कर उसके पास गई और उसके सीने से लगकर रो पड़ी।

    “बहुत देर कर दी भैया…”

     

    आरव ने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा,

     

    “माफ कर दे नंदू। इस बार देर हुई है… लेकिन आया तो हूँ।”

    नंदिनी ने आँसू पोंछे।

     

     

    “मुझे पता था आप आएँगे।”

    आरव मुस्कुराया।

    “इतना भरोसा?”

    नंदिनी ने उसकी ओर देखकर कहा,

    “आप पर नहीं… उस धागे पर है जो हर साल आपकी कलाई पर बाँधती हूँ।”

    माँ की आँखें भी भर आईं।

    नंदिनी ने जल्दी से पूजा की थाली सजाई। उसमें रोली, अक्षत, मिठाई और वही राखी रखी थी जिसे उसने पूरे दिन संभालकर रखा था।

     

     

    वह आरव के सामने बैठी।

     

     

    आरव ने अपनी कलाई आगे कर दी।

    नंदिनी ने पहले तिलक लगाया, फिर आरती उतारी और धीरे-धीरे उसकी कलाई पर राखी बाँध दी।

    राखी बाँधते समय उसके हाथ काँप रहे थे।

     

     

    “भैया…”

    “हम्म?”

    “एक वादा करोगे?”

    “बोल।”

    “चाहे कितनी भी दूर चले जाना… लेकिन कभी मुझसे दूर मत होना।”

    आरव की आँखें नम हो गईं।

    उसने अपनी जेब से एक छोटा-सा डिब्बा निकाला और नंदिनी की ओर बढ़ाया।

    “पहले तू अपना तोहफा खोल।”

     

     

    नंदिनी ने डिब्बा खोला।

    अंदर एक सुंदर-सी चाँदी की पायल थी।

    उसकी आँखों में खुशी आ गई।

    “मेरे लिए?”

    आरव ने सिर हिलाया।

    “हाँ। जब तू छोटी थी ना, तो तेरी पायल की आवाज़ पूरे घर में सुनाई देती थी। फिर पता ही नहीं चला कब तू बड़ी हो गई।”

    नंदिनी ने पायल हाथ में पकड़ ली।

     

     

    आरव ने कहा,

    “और एक बात…”

    “क्या?”

    “तू हर साल मुझे राखी बाँधती है और मेरी रक्षा की दुआ करती है। लेकिन सच बता, क्या तू जानती है कि मेरी सबसे बड़ी ताकत क्या है?”

    नंदिनी ने सिर हिलाया।

     

    आरव ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “तू।”

    नंदिनी फिर रो पड़ी।

    आरव ने उसे गले लगा लिया।

    माँ थोड़ी दूर खड़ी दोनों को देख रही थीं।

    उनके चेहरे पर संतोष था।

     

    उन्हें पता था कि राखी सिर्फ एक धागा नहीं होती।

    यह बचपन की याद होती है।

    यह भाई की कलाई पर बहन का विश्वास होती है।

    यह बहन की आँखों में भाई के लिए दुआ होती है।

    और यह वह रिश्ता है, जिसमें दूरी चाहे कितनी भी हो जाए, दिल कभी दूर नहीं होते।

     

     

    कुछ रिश्ते खून से बनते हैं, कुछ समय के साथ मजबूत होते हैं।

    लेकिन भाई-बहन का रिश्ता उन रिश्तों में से है, जिसे एक छोटी-सी राखी हर साल फिर से जीवित कर देती है।

     

    रात को नंदिनी अपने कमरे में गई। उसने अपनी कलाई पर बंधी राखी को देखा और मुस्कुराई।

     

    बाहर आरव माँ से बातें कर रहा था।

     

    नंदिनी ने धीरे से कहा—

    “कुछ धागे कलाई पर नहीं, दिल पर बंधते हैं… और उन्हें दुनिया की कोई दूरी कभी नहीं तोड़ सकती।”

     

    उस रात घर में सिर्फ एक भाई वापस नहीं आया था।

    एक बहन का इंतज़ार वापस आया था।

    और माँ के घर में फिर से वही पुरानी हँसी लौट आई थी। ❤️

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    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • आखिरी राखी

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    सुमन और उसका भाई विजय बचपन में बहुत करीब थे। विजय अपनी बहन से चार साल बड़ा था और हमेशा उसकी रक्षा करता था। स्कूल जाते समय वह उसका बैग उठाता। बारिश में उसकी छतरी पकड़ता। और जब भी कोई उसे परेशान करता, विजय उसके सामने दीवार बनकर खड़ा हो जाता। लेकिन जिंदगी ने दोनों को अलग कर दिया। पिता की मृत्यु के बाद विजय को नौकरी की तलाश में शहर जाना पड़ा। सुमन गांव में मां के साथ रह गई। समय बीतता गया। विजय शहर में मेहनत करता रहा और सुमन की शादी हो गई। दोनों की मुलाकात कम होने लगी। लेकिन रक्षाबंधन पर सुमन हमेशा भाई को राखी भेजती थी। एक साल राखी के कुछ दिन पहले सुमन को विजय का फोन आया। “बहन, इस बार राखी पर शायद मैं घर न आ पाऊं।” सुमन ने कहा, “क्यों?” “ऑफिस का काम बहुत ज्यादा है।” सुमन चुप हो गई। फिर बोली, “ठीक है भैया।” उसने फोन रख दिया। लेकिन उसे पता नहीं था कि विजय उससे एक बड़ी बात छिपा रहा था। विजय कई महीनों से गंभीर आर्थिक परेशानी में था। कर्ज बढ़ता जा रहा था। वह चाहता था कि परिवार को उसकी परेशानी का पता न चले। रक्षाबंधन के दिन सुमन ने पूजा की और भाई की तस्वीर के सामने राखी रख दी। फिर दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। सुमन ने दरवाजा खोला। सामने विजय खड़ा था। वह हैरान रह गई। “भैया! आपने तो कहा था नहीं आएंगे।” विजय मुस्कुराया। “बहन की राखी के लिए भाई नहीं आएगा तो कौन आएगा?” सुमन ने उसकी कलाई पर राखी बांधी। फिर उसने भाई की आंखों में देखा। “आप परेशान हैं ना?” विजय चौंक गया। “नहीं तो।” “झूठ मत बोलिए।” विजय की आंखें भर आईं। उसने अपनी परेशानी बहन को बता दी। सुमन ने कहा— “आपने इतने साल मेरी मदद की। अब मेरी बारी है।” विजय बोला, “तुम क्या करोगी?” सुमन ने अपनी बचत उसके सामने रख दी। “जितना मेरे पास है, उतना ले लीजिए।” विजय ने पैसे लेने से मना कर दिया। “नहीं बहन।” सुमन बोली— “जब मैं छोटी थी और मुझे कोई परेशानी होती थी, तब आपने कभी नहीं पूछा कि मेरे पास पैसे हैं या नहीं। आपने बस मदद की थी। आज मैं भी वही कर रही हूं।” विजय ने बहन का हाथ पकड़ लिया। “लेकिन मैं ये कर्ज कैसे चुकाऊंगा?” सुमन मुस्कुराई। “पैसे वापस मत करना। बस एक वादा करना।” “क्या?” “कभी अपनी परेशानी अकेले मत सहना।” विजय ने सिर हिला दिया। उस दिन दोनों भाई-बहन देर तक बातें करते रहे। अगले कुछ महीनों में सुमन और विजय ने मिलकर विजय की आर्थिक समस्या का समाधान किया। विजय ने अतिरिक्त काम करना शुरू किया। कुछ समय बाद उसने अपना छोटा सा व्यवसाय शुरू कर लिया। व्यवसाय चल पड़ा। लेकिन उस रक्षाबंधन की बात दोनों कभी नहीं भूले। कई साल बाद सुमन की बेटी ने विजय से पूछा— “मामा, राखी का मतलब क्या होता है?” विजय ने अपनी कलाई की तरफ देखा। फिर बोला— “राखी का मतलब सिर्फ यह नहीं कि भाई बहन की रक्षा करेगा।” “फिर?” “राखी का मतलब है कि जब जिंदगी में कोई अकेला पड़ जाए, तो दूसरा उसका हाथ पकड़ ले।” सुमन पास खड़ी मुस्कुरा रही थी। विजय ने अपनी बहन की तरफ देखकर कहा— “मेरी बहन ने मुझे सिखाया कि कभी-कभी जिसे हम कमजोर समझकर उसकी रक्षा करते हैं, वही एक दिन हमारी सबसे बड़ी ताकत बन जाता है।” सुमन की आंखें नम हो गईं। उसने कहा— “भैया, भाई-बहन में कौन बड़ा और कौन छोटा, ये मायने नहीं रखता। मायने रखता है कि मुश्किल वक्त में कौन किसके साथ खड़ा है।” दोनों मुस्कुराए। उनकी कलाई पर राखी का धागा था, लेकिन उस धागे से कहीं ज्यादा मजबूत उनका रिश्ता था। सीख: रिश्तों में हमेशा एक ही व्यक्ति देने वाला और दूसरा लेने वाला नहीं होता। कभी भाई बहन की ताकत बनता है, तो कभी बहन भाई की। सच्चा रिश्ता वही है जिसमें मुश्किल समय में बिना स्वार्थ के एक-दूसरे का हाथ थामा जाए।

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  • राखी का सबसे अनमोल तोहफा

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    शहर के एक छोटे से घर में मीरा अपनी मां और बड़े भाई मोहन के साथ रहती थी। मोहन एक साधारण नौकरी करता था और अपनी छोटी बहन से बहुत प्यार करता था।

     

    हर साल रक्षाबंधन पर मीरा अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती और बदले में मोहन उसे कोई न कोई उपहार जरूर देता।

     

    कभी नई ड्रेस, कभी चूड़ियां, कभी उसकी पसंद की मिठाई।

     

    लेकिन इस साल हालात कुछ अलग थे।

     

    मोहन की नौकरी छूट गई थी।

     

    घर का किराया बाकी था और मां की दवाइयों का खर्च भी चल रहा था।

     

    मीरा यह सब जानती थी, लेकिन उसने भाई के सामने कभी अपनी परेशानी नहीं रखी।

     

    रक्षाबंधन से एक दिन पहले मीरा बाजार गई।

     

    उसकी नजर एक सुंदर राखी पर पड़ी।

     

    राखी बहुत महंगी नहीं थी, लेकिन उसमें एक छोटा सा चांदी जैसा चमकता हुआ फूल लगा था।

     

    मीरा ने अपनी जमा की हुई थोड़ी सी रकम से वह राखी खरीद ली।

     

    अगले दिन सुबह उसने घर सजाया।

     

    मोहन चुपचाप बैठा हुआ था।

     

    उसके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

     

    मीरा ने मुस्कुराकर कहा, “भैया, आज तो मुस्कुराइए। आज राखी है।”

     

    मोहन ने मुस्कुराने की कोशिश की।

     

    “हां, मेरी बहन। लेकिन इस बार शायद मैं तुम्हें कोई तोहफा नहीं दे पाऊंगा।”

     

    मीरा ने तुरंत उसके मुंह पर हाथ रख दिया।

     

    “मुझे कोई तोहफा नहीं चाहिए।”

     

    “लेकिन हर साल तो…”

     

    “हर साल आप मुझे बाजार से चीजें लाकर देते थे। इस बार मुझे आपसे कुछ और चाहिए।”

     

    मोहन ने पूछा, “क्या?”

     

    मीरा ने राखी की थाली उसके सामने रखी।

     

    “आप मेरा हाथ पकड़कर एक वादा कीजिए।”

     

    मोहन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    मीरा बोली, “चाहे जिंदगी में कितनी भी परेशानी आए, आप कभी हार नहीं मानेंगे।”

     

    मोहन चुप हो गया।

     

    मीरा की आंखों में आंसू थे।

     

    “आप मेरे भाई हैं। अगर आप टूट जाएंगे तो मैं किससे हिम्मत लेना सीखूंगी?”

     

    मोहन की आंखें भी भर आईं।

     

    मीरा ने उसकी कलाई पर राखी बांधी।

     

    “मुझे बस इतना चाहिए कि आप कोशिश करते रहिए।”

     

    मोहन ने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    “मैं वादा करता हूं।”

     

    उस दिन के बाद मोहन ने कई जगह नौकरी के लिए आवेदन किया।

     

    कई जगह से जवाब नहीं आया।

     

    कहीं उसे मना कर दिया गया।

     

    लेकिन उसने हार नहीं मानी।

     

    सुबह नौकरी की तलाश करता और शाम को छोटी-मोटी मजदूरी करके घर चलाता।

     

    एक दिन उसे एक कंपनी में काम मिल गया।

     

    वेतन पहले से कम था, लेकिन मोहन बहुत खुश था।

     

    धीरे-धीरे घर की स्थिति सुधरने लगी।

     

    कुछ महीने बाद मोहन ने अपनी पहली अच्छी तनख्वाह से मीरा के लिए एक सुंदर ड्रेस खरीदी।

     

    जब उसने ड्रेस मीरा को दी तो मीरा की आंखें नम हो गईं।

     

    “भैया, इसकी क्या जरूरत थी?”

     

    मोहन मुस्कुराया।

     

    “तुमने मुझे उस दिन जो दिया था, उसके सामने ये कुछ भी नहीं।”

     

    मीरा ने पूछा, “मैंने क्या दिया था?”

     

    मोहन ने अपनी कलाई पर बंधी राखी दिखाई।

     

    “तुमने मुझे उम्मीद दी थी।”

     

    कई साल बाद मोहन की जिंदगी काफी बदल चुकी थी।

     

    वह मेहनत करके एक छोटे से व्यवसाय का मालिक बन गया।

     

    उसके पास अब पैसे की कमी नहीं थी।

     

    लेकिन हर रक्षाबंधन पर वह उसी पुराने तरीके से अपनी बहन के सामने बैठता।

     

    एक दिन मीरा ने मजाक में पूछा, “भैया, अब तो आप बहुत अमीर हो गए हैं। इस बार मेरा सबसे महंगा तोहफा क्या है?”

     

    मोहन हंसते हुए बोला, “तुम्हें जो चाहिए मांग लो।”

     

    मीरा कुछ देर सोचकर बोली—

     

    “मुझे वही चाहिए जो आपने पहली राखी पर दिया था।”

     

    मोहन हैरान हुआ।

     

    “क्या?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “आपका साथ।”

     

    मोहन की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने बहन को गले लगा लिया।

     

    उसे समझ आ गया कि रिश्तों में सबसे महंगा तोहफा सोना, कपड़े या पैसे नहीं होते।

     

    सबसे अनमोल तोहफा होता है—मुश्किल समय में किसी का साथ।

     

    सीख:

    रिश्तों की कीमत उपहारों से नहीं, बल्कि मुश्किल समय में साथ खड़े रहने से होती है। कभी-कभी किसी के जीवन में उम्मीद के दो शब्द ही सबसे बड़ा तोहफा बन जाते हैं।

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  • उस राखी का इंतजार

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    सीमा हर साल रक्षाबंधन पर अपने भाई राजू का इंतजार करती थी।

     

    राजू कई साल पहले नौकरी के लिए दूसरे शहर चला गया था।

     

    शुरुआत में वह हर महीने घर आता था, लेकिन धीरे-धीरे काम बढ़ता गया और उसका घर आना कम होता गया।

     

    सीमा हर रक्षाबंधन पर उसे फोन करती।

     

    “भैया, इस बार तो जरूर आना।”

     

    राजू हर बार कहता—

     

    “इस बार कोशिश करूंगा।”

     

    लेकिन कई बार कोशिश पूरी नहीं हो पाती।

     

    एक साल रक्षाबंधन से कुछ दिन पहले सीमा ने भाई को फोन किया।

     

    “भैया, इस बार भी नहीं आओगे क्या?”

     

    राजू कुछ सेकंड चुप रहा।

     

    “सीमा, ऑफिस में बहुत जरूरी काम है। शायद नहीं आ पाऊंगा।”

     

    सीमा ने धीरे से कहा, “ठीक है।”

     

    फोन कट गया।

     

    लेकिन उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    मां ने पूछा, “क्या हुआ?”

     

    सीमा ने कहा, “कुछ नहीं।”

     

    मां सब समझ गई।

     

    रक्षाबंधन की सुबह घर में मिठाई बनी।

     

    आस-पड़ोस की लड़कियां अपने भाइयों को राखी बांधने जा रही थीं।

     

    सीमा बार-बार दरवाजे की तरफ देखती।

     

    दोपहर हो गई।

     

    फिर शाम हो गई।

     

    लेकिन राजू नहीं आया।

     

    सीमा ने अपनी राखी संभालकर रख दी।

     

    रात को अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    सीमा ने दरवाजा खोला।

     

    सामने राजू खड़ा था।

     

    सीमा कुछ पल उसे देखती रह गई।

     

    “भैया!”

     

    वह दौड़कर भाई से लिपट गई।

     

    राजू ने उसे कसकर पकड़ लिया।

     

    “माफ करना बहन। इस बार मैं देर से आया।”

     

    सीमा की आंखों में आंसू थे।

     

    “आपको पता है मैंने कितनी देर इंतजार किया?”

     

    राजू ने कहा, “पता है।”

     

    सीमा ने पूछा, “फिर आए क्यों?”

     

    राजू मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि रास्ते में मुझे पापा की एक बात याद आ गई।”

     

    सीमा चुप हो गई।

     

    राजू बोला—

     

    “पापा कहते थे कि दुनिया में कितना भी बड़ा काम क्यों न हो, अपने लोगों के लिए समय निकालना जरूरी है।”

     

    राजू ने अपनी जेब से एक छोटा सा डिब्बा निकाला।

     

    उसमें एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में दोनों बच्चे थे।

     

    सीमा ने तस्वीर हाथ में ली और रोने लगी।

     

    “आपने इसे संभालकर रखा?”

     

    राजू बोला, “तुम्हारी हर राखी संभालकर रखी है।”

     

    सीमा ने उसकी कलाई पर राखी बांधी।

     

    “इस बार मैं आपसे कोई वादा नहीं लूंगी।”

     

    राजू ने पूछा, “क्यों?”

     

    सीमा बोली, “क्योंकि आज मुझे समझ आया कि भाई-बहन का रिश्ता सिर्फ राखी के दिन नहीं होता।”

     

    राजू ने कहा, “तो फिर?”

     

    “जब मैं खुश हूं, तब भी आप मेरे भाई हैं। जब मैं दुखी हूं, तब भी। और जब आप दूर हैं, तब भी।”

     

    राजू की आंखें भर आईं।

     

    उसने बहन से कहा, “मैं वादा करता हूं कि चाहे जिंदगी कितनी भी व्यस्त हो जाए, तुम्हारे लिए मेरे पास हमेशा समय रहेगा।”

     

    उस दिन दोनों देर रात तक बचपन की बातें करते रहे।

     

    सुबह राजू को वापस जाना था।

     

    सीमा ने दरवाजे पर उसे विदा करते हुए कहा—

     

    “भैया, अगली राखी पर देर मत करना।”

     

    राजू मुस्कुराया।

     

    “अगली राखी पर मैं सबसे पहले दरवाजे पर खड़ा मिलूंगा।”

     

    कुछ महीने बाद राजू की नौकरी में बड़ी तरक्की हुई।

     

    उसने सबसे पहले अपनी बहन को फोन किया।

     

    “सीमा, तुम्हारे लिए एक खबर है।”

     

    “क्या?”

     

    “मैंने अपने ऑफिस के पास एक घर ले लिया है।”

     

    सीमा खुश होकर बोली, “अच्छा! अब तो आप हमें जल्दी-जल्दी मिलने आओगे।”

     

    राजू हंस पड़ा।

     

    “नहीं। अब तुम और मां मेरे पास आओगी।”

     

    सीमा कुछ बोल नहीं पाई।

     

    उसकी आंखों से आंसू निकल आए।

     

    उसने सिर्फ इतना कहा—

     

    “भैया, इस बार राखी का इंतजार बहुत छोटा होगा।”

     

    राजू ने जवाब दिया—

     

    “क्योंकि अब मैं समझ गया हूं कि जिंदगी में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिनके लिए समय निकालना नहीं पड़ता… उन्हें समय देना पड़ता है।”

     

    सीख:

    रिश्ते दूरी से कमजोर नहीं होते, लेकिन समय न देने से जरूर कमजोर हो सकते हैं। अपने प्रिय लोगों को यह महसूस कराते रहिए कि वे आपकी जिंदगी में महत्वपूर्ण हैं। त्योहार सिर्फ रस्म नहीं, रिश्तों को फिर से करीब लाने का अवसर होते हैं।

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