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लेखक: Alka Singh

Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

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  • भाग 6: आखिरी रहस्य

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    सुबह तक काली हवेली पूरी तरह मलबे में बदल चुकी थी।

     

    गाँव वाले दूर खड़े होकर उस जगह को देख रहे थे।

     

    हरिराम बाबा भी वहाँ पहुँचे।

     

    उन्होंने आरव, निखिल, करण और मोहित को देखा।

     

    चारों जिंदा थे।

     

    बाबा ने राहत की साँस ली।

     

    “सब खत्म हो गया।”

     

    आरव ने कुछ नहीं कहा।

     

    वह मलबे की तरफ देखता रहा।

     

    उसके मन में सिर्फ मीरा का चेहरा था।

     

    कुछ देर बाद पुलिस भी आई।

     

    हवेली के अंदर से पुराने कागज, तस्वीरें और कई साल पुरानी चीजें मिलीं।

     

    लेकिन सबसे अजीब चीज थी—

     

    एक पुराना रजिस्टर।

     

    उसमें उन सभी लोगों के नाम लिखे थे जो पिछले पैंतीस सालों में हवेली के आसपास गायब हुए थे।

     

    हर नाम के सामने एक तारीख थी।

     

    सबसे आखिरी नाम था—

     

    मोहित।

     

    आरव का दिल बैठ गया।

     

    “ये कैसे हो सकता है?”

     

    मोहित तो उसके सामने खड़ा था।

     

    हरिराम बाबा ने रजिस्टर देखा।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “इसे यहीं छोड़ दो।”

     

    लेकिन आरव को यकीन नहीं हुआ।

     

    उसने आखिरी पन्ना पलटा।

     

    वहाँ एक और नाम लिखा था—

     

    आरव।

     

    उसके सामने तारीख थी—

     

    आज की।

     

    आरव ने घबराकर पन्ना बंद कर दिया।

     

    “बाबा…”

     

    हरिराम बाबा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मुझे भी यही डर था।”

     

    “क्या?”

     

    बाबा ने कहा—

     

    “हवेली में सिर्फ एक आत्मा नहीं थी।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “तो कितनी?”

     

    बाबा ने मलबे की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “जितने लोग वहाँ मरे, उतनी ही।”

     

    मोहित धीरे-धीरे उनके पास आया।

     

    “लेकिन हमने तो उस आत्मा को खत्म कर दिया।”

     

    बाबा ने सिर हिलाया।

     

    “तुमने सिर्फ उस आत्मा को रोका है।”

     

    “खत्म नहीं किया?”

     

    “नहीं।”

     

    तभी हवा का एक ठंडा झोंका आया।

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    मलबे के बीच वही छोटा आईने का टुकड़ा पड़ा था।

     

    वह उसे उठाने के लिए आगे बढ़ा।

     

    हरिराम बाबा ने चिल्लाया—

     

    “उसे मत छूना!”

     

    लेकिन देर हो चुकी थी।

     

    आरव ने आईना उठा लिया।

     

    आईने में उसे अपना चेहरा दिखाई दिया।

     

    फिर धीरे-धीरे उसके पीछे मीरा दिखाई दी।

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मीरा…”

     

    मीरा ने कुछ नहीं कहा।

     

    उसने सिर्फ पीछे की तरफ इशारा किया।

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    फिर आईने में देखा।

     

    मीरा के पीछे…

     

    एक लंबा आदमी खड़ा था।

     

    वही काली आत्मा।

     

    आरव के हाथ से आईने का टुकड़ा गिर गया।

     

    छन्न!

     

    आईना टूट गया।

     

    उसी पल मोहित ने सिर पकड़ लिया।

     

    “मुझे फिर वही आवाज सुनाई दे रही है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    मोहित ने काँपते हुए कहा—

     

    “दरवाजा खोलो…”

     

    सभी चुप हो गए।

     

    हरिराम बाबा ने मलबे की तरफ देखा।

     

    “कौन सा दरवाजा?”

     

    मोहित ने उंगली से जमीन के नीचे की तरफ इशारा किया।

     

    “तीसरा कमरा।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “लेकिन हवेली तो गिर चुकी है।”

     

    मोहित ने सिर हिलाया।

     

    “कमरा नहीं गिरा।”

     

    सभी ने मलबे की तरफ देखा।

     

    वहाँ पत्थरों के बीच एक लोहे का छोटा दरवाजा दिखाई दे रहा था।

     

    उस पर वही शब्द लिखे थे—

     

    “इसे मत खोलना।”

     

    हरिराम बाबा पीछे हट गए।

     

    “इसे बंद ही रहने दो।”

     

    लेकिन अंदर से आवाज आई।

     

    पहले बहुत धीमी।

     

    फिर साफ।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव का शरीर ठंडा पड़ गया।

     

    फिर एक लड़की की आवाज आई—

     

    “भैया…”

     

    आरव ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उसे मीरा याद आई।

     

    उसने दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाया।

     

    बाबा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “अगर अंदर कोई जिंदा है तो?”

     

    बाबा ने कहा—

     

    “पैंतीस साल तक कोई जिंदा नहीं रह सकता।”

     

    अंदर से फिर आवाज आई—

     

    “भैया… मुझे बाहर निकालो…”

     

    आरव के आँसू निकल आए।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “मीरा?”

     

    अंदर से जवाब आया—

     

    “हाँ।”

     

    आरव ने दरवाजे पर हाथ रख दिया।

     

    तभी पीछे से मोहित चिल्लाया—

     

    “आरव! मत खोलना!”

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    मोहित की आँखें फिर काली हो चुकी थीं।

     

    वह धीरे-धीरे मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि…”

     

    उसकी आवाज बदल गई।

     

    “मीरा अंदर नहीं है।”

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    मोहित ने कहा—

     

    “वह तो आज़ाद हो चुकी है।”

     

    दरवाजे के अंदर से अचानक एक भारी पुरुष आवाज आई—

     

    “लेकिन मैं अभी भी अंदर हूँ।”

     

    हरिराम बाबा ने तुरंत आरव को पीछे खींच लिया।

     

    दरवाजा जोर-जोर से हिलने लगा।

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    गाँव वाले डरकर पीछे हटने लगे।

     

    और फिर अचानक सब शांत हो गया।

     

    सुबह तक उस जगह को मिट्टी और पत्थरों से पूरी तरह बंद कर दिया गया।

     

    उस दिन के बाद गाँव में किसी ने काली हवेली का नाम तक नहीं लिया।

     

    आरव ने शहर वापस जाकर अपनी जिंदगी शुरू कर दी।

     

    लेकिन एक चीज कभी सामान्य नहीं हुई।

     

    हर रात ठीक 12:00 बजे उसके कमरे के दरवाजे पर दस्तक होती।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    पहली रात उसने ध्यान नहीं दिया।

     

    दूसरी रात भी नहीं।

     

    तीसरी रात उसने दरवाजा खोल दिया।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    लेकिन फर्श पर एक पुरानी तस्वीर पड़ी थी।

     

    आरव ने तस्वीर उठाई।

     

    उसमें काली हवेली के सामने पाँच बच्चे खड़े थे।

     

    मीरा।

     

    आरव।

     

    उसका छोटा भाई।

     

    और दो बच्चे जिन्हें वह पहचानता नहीं था।

     

    तस्वीर के पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “हवेली में पाँच कमरे थे।”

     

    आरव ने काँपते हुए तस्वीर पलटी।

     

    नीचे एक और लाइन लिखी थी—

     

    “तुमने अभी तक सिर्फ तीसरा कमरा खोला है।”

     

    उसी पल उसके कमरे की लाइट बंद हो गई।

     

    अंधेरे में एक बच्चे की आवाज आई—

     

    “भैया… चौथा कमरा खोलोगे?”

     

    और दरवाजे पर फिर दस्तक हुई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    समाप्त… !!

  • भाग 5: आखिरी दरवाजा

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    आरव, निखिल और करण धीरे-धीरे होश में आए।

     

    मोहित गायब था।

     

    मीरा ने ऊपर की मंजिल की तरफ देखा।

     

    “वह उसे पुराने कमरे में ले गया है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन सा कमरा?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “जहाँ से सब शुरू हुआ था।”

     

    तीनों सीढ़ियों की तरफ भागे।

     

    इस बार सीढ़ियाँ दिखाई दे रही थीं।

     

    लेकिन हर सीढ़ी पर किसी न किसी का नाम लिखा था।

     

    पहली सीढ़ी पर—

     

    मोहन।

     

    दूसरी पर—

     

    सुरेश।

     

    तीसरी पर—

     

    कमला।

     

    और सबसे ऊपर—

     

    मोहित।

     

    करण डर गया।

     

    “ये सारे नाम कौन हैं?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “वे लोग जिन्होंने कभी इस हवेली से बाहर निकलने की कोशिश की थी।”

     

    ऊपर पहुँचते ही उन्हें एक बड़ा कमरा दिखाई दिया।

     

    दरवाजा खुला था।

     

    अंदर मोहित कुर्सी पर बैठा था।

     

    उसके हाथ-पैर बंधे हुए थे।

     

    आरव दौड़कर उसकी तरफ गया।

     

    “मोहित!”

     

    मोहित ने आँखें खोलीं।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने रस्सी खोलनी शुरू की।

     

    तभी कमरे में हँसी गूँजी।

     

    हा… हा… हा…

     

    काली परछाईं उनके सामने दिखाई दी।

     

    “तुमने आईना तोड़ दिया।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “अब तू कुछ नहीं कर सकता।”

     

    परछाईं हँसी।

     

    “आईना सिर्फ दरवाजा था।”

     

    उसने दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    “असली कैद यहाँ है।”

     

    दीवार पर अचानक दर्जनों हाथों के निशान उभर आए।

     

    मोहित चिल्लाया—

     

    “आरव! भागो!”

     

    लेकिन देर हो चुकी थी।

     

    दीवार से काले हाथ बाहर निकल आए।

     

    उन्होंने निखिल और करण को पकड़ लिया।

     

    आरव ने उन्हें छुड़ाने की कोशिश की।

     

    मीरा चिल्लाई—

     

    “घंटी!”

     

    आरव को याद आया।

     

    हरिराम बाबा ने उसे एक पुरानी घंटी दी थी।

     

    वह घंटी उसकी जेब में थी।

     

    आरव ने घंटी निकालकर जोर से बजाई।

     

    टनननन…!

     

    काली परछाईं पीछे हट गई।

     

    सारे हाथ गायब हो गए।

     

    मोहित जमीन पर गिर पड़ा।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “इसे खत्म करने का सिर्फ एक तरीका है।”

     

    “क्या?”

     

    “जिसने पहली बार आत्मा दी थी, उसे आखिरी आत्मा वापस लेनी होगी।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “लेकिन वह आदमी तो मर चुका है।”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “वह आदमी नहीं…”

     

    उसने टूटी हुई आईने की तरफ देखा।

     

    “…उसकी आत्मा अभी भी यहीं है।”

     

    अचानक कमरे के बीचोंबीच काली परछाईं फिर दिखाई दी।

     

    उसने आरव की तरफ हाथ बढ़ाया।

     

    “तुम्हें अपने भाई की याद है?”

     

    आरव रुक गया।

     

    “मेरा भाई?”

     

    परछाईं हँसी।

     

    “तुम्हारा एक छोटा भाई था।”

     

    आरव की आँखों के सामने एक और याद आई।

     

    उसकी माँ उसे और उसके छोटे भाई को लेकर हवेली आई थी।

     

    लेकिन वह बच्चा…

     

    कभी घर वापस नहीं गया।

     

    आरव काँप गया।

     

    “वह कहाँ है?”

     

    परछाईं ने कहा—

     

    “यहीं।”

     

    अचानक कमरे के कोने में एक छोटा लड़का दिखाई दिया।

     

    वह करीब छह साल का था।

     

    उसने आरव को देखते ही कहा—

     

    “भैया…”

     

    आरव की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    “तू जिंदा है?”

     

    लड़का मुस्कुराया।

     

    “मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा था।”

     

    मीरा ने सिर हिलाया।

     

    “वह तुम्हारा भाई नहीं है।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    लड़के का चेहरा धीरे-धीरे बदलने लगा।

     

    वह वही बिना आँखों वाला आदमी बन गया।

     

    आरव समझ गया।

     

    “तुमने मेरी यादों का इस्तेमाल किया।”

     

    काली आत्मा चीखी—

     

    “और अब तुम्हारी आत्मा मेरी होगी!”

     

    आरव ने घंटी उठाई।

     

    लेकिन तभी मोहित उसके सामने आ गया।

     

    “आरव, घंटी मुझे दे।”

     

    आरव ने उसे घंटी दे दी।

     

    मोहित ने घंटी बजाई।

     

    टनननन…

     

    काली आत्मा चीखने लगी।

     

    लेकिन घंटी की आवाज सुनकर मोहित की आँखें फिर काली हो गईं।

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “अब समझे?”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “मोहित?”

     

    मोहित ने कहा—

     

    “मैं शुरू से उसके साथ था।”

     

    निखिल और करण डरकर पीछे हट गए।

     

    मोहित ने घंटी जमीन पर फेंक दी।

     

    काली आत्मा उसके शरीर के अंदर समाने लगी।

     

    मीरा चीख पड़ी—

     

    “नहीं!”

     

    आरव ने तुरंत टूटा हुआ आईने का सबसे बड़ा टुकड़ा उठाया।

     

    उसने उसे मोहित के सामने कर दिया।

     

    आईने में मोहित का असली चेहरा दिखाई दे रहा था।

     

    उसकी आँखों में आँसू थे।

     

    “आरव…”

     

    वह फुसफुसाया।

     

    “मुझे बचा।”

     

    आरव समझ गया।

     

    काली आत्मा अभी पूरी तरह उसके अंदर नहीं गई थी।

     

    उसने आईने का टुकड़ा मोहित के सामने रखते हुए कहा—

     

    “तू मोहित नहीं है!”

     

    मोहित चीखने लगा।

     

    “नहीं!”

     

    आरव ने पूरी ताकत से कहा—

     

    “तू मेरे दोस्त को छोड़!”

     

    काली आत्मा पीछे हटने लगी।

     

    मीरा ने घंटी उठा ली।

     

    उसने उसे आखिरी बार बजाया।

     

    टनननन…!

     

    हवेली की पूरी दीवारें हिलने लगीं।

     

    छत से धूल गिरने लगी।

     

    काली आत्मा चीखते हुए टूटी हुई आईने की तरफ खिंचने लगी।

     

    लेकिन जाने से पहले उसने आरव की तरफ देखकर कहा—

     

    “हवेली गिर सकती है… लेकिन मैं नहीं।”

     

    अचानक पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।

     

    और जब रोशनी वापस आई…

     

    काली आत्मा गायब थी।

     

    मोहित जमीन पर बेहोश पड़ा था।

     

    लेकिन हवेली की नींव जोर-जोर से काँप रही थी।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “अब हमें जाना होगा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और तुम?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “मेरा काम पूरा हो गया।”

     

    अचानक उसके शरीर से हल्की सफेद रोशनी निकलने लगी।

     

    आरव समझ गया।

     

    “मीरा…”

     

    उसने आखिरी बार मुस्कुराकर कहा—

     

    “इस बार मुझे जाने देना।”

     

    और वह रोशनी बनकर हवा में गायब हो गई।

     

    तीनों दोस्त मोहित को उठाकर बाहर भागे।

     

    पीछे से पूरी काली हवेली जोरदार आवाज के साथ गिर गई।

     

    लेकिन मलबे के बीच…

     

    एक छोटा-सा आईने का टुकड़ा अब भी चमक रहा था।

  • भाग 4: आरव का असली राज

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

     

    तीसरे कमरे का दरवाजा खुल चुका था।

     

    आरव कुछ कदम दूर खड़ा था।

     

    अंदर घना अंधेरा था।

     

    मोहित, निखिल और करण उसके पीछे खड़े थे।

     

    मीरा दरवाजे के पास जाकर रुक गई।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “आरव… अगर तुम अंदर गए, तो तुम्हें सब याद आ जाएगा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और अगर नहीं गया?”

     

    मीरा ने सिर झुका लिया।

     

    “तो वह हमेशा तुम्हारे अंदर रहेगा।”

     

    आरव ने हिम्मत जुटाई और कमरे के अंदर कदम रख दिया।

     

    जैसे ही वह अंदर गया, दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    “आरव!”

     

    बाहर से निखिल की आवाज आई।

     

    लेकिन आरव जवाब नहीं दे पाया।

     

    कमरे के अंदर सिर्फ एक पुराना आईना था।

     

    आईने के सामने एक लकड़ी की कुर्सी रखी थी।

     

    आरव धीरे-धीरे आईने के पास गया।

     

    उसने उसमें अपना चेहरा देखा।

     

    लेकिन कुछ गलत था।

     

    आईने में आरव नहीं था।

     

    वहाँ एक दस साल का बच्चा खड़ा था।

     

    बच्चा रो रहा था।

     

    उसके सामने वही छोटी लड़की मीरा खड़ी थी।

     

    और पीछे एक आदमी हाथ में लालटेन लिए खड़ा था।

     

    आरव ने आईने को छुआ।

     

    अचानक उसकी आँखों के सामने पुरानी यादें घूमने लगीं।

     

    वह बच्चा सच में आरव था।

     

    पैंतीस साल पहले वह इस हवेली में आया था।

     

    उसकी माँ इस हवेली में काम करती थी।

     

    आरव तब सिर्फ दस साल का था।

     

    मीरा उसी हवेली के मालिक की बेटी थी।

     

    दोनों दोस्त बन गए थे।

     

    लेकिन हवेली का मालिक एक अजीब आदमी था।

     

    वह रात में तीसरे कमरे में जाकर घंटों किसी से बातें करता था।

     

    एक दिन आरव ने चुपके से उसका पीछा किया।

     

    उसने कमरे के अंदर एक आईना देखा।

     

    आईने के सामने मालिक खड़ा होकर कह रहा था—

     

    “मुझे और समय चाहिए।”

     

    आईने के अंदर से किसी ने जवाब दिया—

     

    “बदले में क्या दोगे?”

     

    मालिक ने कहा—

     

    “एक आत्मा।”

     

    उसी समय आरव ने आवाज कर दी।

     

    मालिक ने उसे पकड़ लिया।

     

    मीरा भी वहाँ पहुँच गई।

     

    मालिक ने दोनों बच्चों को कमरे में बंद कर दिया।

     

    फिर आईने के सामने खड़े होकर बोला—

     

    “एक को मैं दूँगा…”

     

    मीरा ने आरव को धक्का देकर पीछे किया।

     

    “भागो!”

     

    लेकिन तभी आईने के अंदर से काला हाथ बाहर निकला।

     

    उसने मीरा को पकड़ लिया।

     

    मीरा चीखती रही।

     

    आरव उसे बचाने के लिए आगे बढ़ा।

     

    लेकिन मालिक ने आरव के सिर पर वार कर दिया।

     

    आरव जमीन पर गिर गया।

     

    उसके बाद उसे कुछ याद नहीं रहा।

     

    सुबह गाँव वालों ने उसे हवेली के बाहर पाया।

     

    उसे कुछ भी याद नहीं था।

     

    लेकिन मीरा कभी नहीं मिली।

     

    आरव ने आईने से हाथ हटाया।

     

    उसकी आँखों से आँसू निकल रहे थे।

     

    “मीरा…”

     

    पीछे से आवाज आई—

     

    “हाँ।”

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    मीरा खड़ी थी।

     

    “तुम मर गई थीं?”

     

    मीरा ने सिर हिलाया।

     

    “मैं उस दिन नहीं मरी थी।”

     

    “फिर?”

     

    “उस आईने ने मुझे अपने अंदर कैद कर लिया।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और वह आदमी?”

     

    मीरा का चेहरा अचानक डर से भर गया।

     

    “वह भी मरा नहीं था।”

     

    कमरे की छत से भारी आवाज आई—

     

    “मैं कभी गया ही नहीं।”

     

    आरव ने ऊपर देखा।

     

    एक काली परछाईं छत से नीचे उतर रही थी।

     

    धीरे-धीरे वह एक आदमी का रूप लेने लगी।

     

    वही हवेली का मालिक।

     

    उसका चेहरा सड़ा हुआ था।

     

    आँखों की जगह दो काले गड्ढे थे।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम वापस आ ही गए।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “तुमने मुझे क्यों बुलाया?”

     

    वह हँसा।

     

    “क्योंकि अधूरा सौदा पूरा होना बाकी था।”

     

    “कौन सा सौदा?”

     

    उसने आईने की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारी आत्मा के बदले मेरी आजादी।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “अगर मैं मना कर दूँ?”

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तो तुम्हारे दोस्त बारी-बारी से मेरे साथ रहेंगे।”

     

    अचानक कमरे के बाहर से करण की चीख सुनाई दी।

     

    “आरव!”

     

    फिर निखिल की आवाज आई—

     

    “भागो!”

     

    आरव दरवाजे की तरफ दौड़ा।

     

    लेकिन दरवाजा बंद था।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “आईना तोड़ दो!”

     

    आरव ने पास रखी लोहे की कुर्सी उठाई।

     

    पूरी ताकत से आईने पर मारी।

     

    छन्न्न्न!

     

    आईना टूट गया।

     

    लेकिन उसके टूटते ही कमरे में सैकड़ों आवाजें गूँज उठीं।

     

    “बचाओ…”

     

    “हमें बाहर निकालो…”

     

    “हमें जाने दो…”

     

    काले मालिक की परछाईं चीखने लगी।

     

    “नहीं!”

     

    आईने के टुकड़ों से धुआँ निकलने लगा।

     

    मीरा ने आरव का हाथ पकड़ा।

     

    “भागो!”

     

    दरवाजा अपने आप खुल गया।

     

    आरव बाहर दौड़ा।

     

    लेकिन गलियारा खाली था।

     

    निखिल और करण जमीन पर बेहोश पड़े थे।

     

    मोहित गायब था।

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    फिर उसे दूर से मोहित की आवाज सुनाई दी—

     

    “आरव…”

     

    वह आवाज हवेली की सबसे ऊपरी मंजिल से आ रही थी।

     

    और उसके साथ एक दूसरी आवाज भी थी—

     

    “अब आखिरी आत्मा मेरी होगी।”

  • भाग 3: मोहित के अंदर कौन था?

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    मोहित गलियारे में खड़ा था।

     

    उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    आरव ने उसे देखते ही कहा—

     

    “मोहित… तुम ठीक हो?”

     

    मोहित मुस्कुराया।

     

    लेकिन वह मुस्कान उसकी नहीं थी।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “मैं मोहित नहीं हूँ।”

     

    निखिल पीछे हट गया।

     

    “तो फिर कौन हो?”

     

    मोहित ने सिर टेढ़ा किया।

     

    “तुम्हें सच में नहीं पता?”

     

    अचानक हवेली की सारी खिड़कियाँ एक साथ बंद हो गईं।

     

    धड़ाम!

     

    हवा रुक गई।

     

    टॉर्च की रोशनी भी बार-बार झपकने लगी।

     

    आरव ने मीरा की तरफ देखा।

     

    वह लड़की अब गलियारे के एक कोने में खड़ी काँप रही थी।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तुम इसे पहचानती हो?”

     

    मीरा ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “कौन है?”

     

    मीरा ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “वही जिसने मेरे भाई को मारा था।”

     

    आरव के पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई।

     

    उसने मोहित की तरफ देखा।

     

    मोहित अब धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ रहा था।

     

    “तुम लोगों ने सोचा था कि तीसरा कमरा बंद करके सब खत्म हो जाएगा?”

     

    उसने हँसते हुए कहा—

     

    “दरवाजा सिर्फ कमरे का था।”

     

    वह रुका।

     

    “लेकिन रास्ता…”

     

    उसने अपनी छाती पर हाथ रखा।

     

    “…हमेशा इंसान के अंदर होता है।”

     

    निखिल ने काँपते हुए पूछा—

     

    “मोहित को क्या हुआ है?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “वह सिर्फ उसका शरीर है।”

     

    आरव ने तुरंत मोहित की तरफ कदम बढ़ाया।

     

    “मोहित! अगर तुम मेरी आवाज सुन सकते हो तो वापस आओ!”

     

    कुछ पल के लिए मोहित का चेहरा बदल गया।

     

    उसकी आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “आरव…”

     

    उसकी असली आवाज वापस आ गई।

     

    “मुझे बचा…”

     

    आरव उसकी तरफ दौड़ा।

     

    लेकिन जैसे ही उसने मोहित का हाथ पकड़ा, मोहित ने उसका गला पकड़ लिया।

     

    उसकी ताकत अचानक कई गुना बढ़ गई।

     

    आरव दीवार से जा टकराया।

     

    “आरव!”

     

    करण और निखिल ने मोहित को पीछे खींचा।

     

    मोहित जोर-जोर से हँसने लगा।

     

    “तुम उसे नहीं बचा सकते।”

     

    अचानक तीसरे कमरे के अंदर से फिर वही आदमी की आवाज आई—

     

    “आरव…”

     

    आरव ने दरवाजे की तरफ देखा।

     

    जंजीर अपने आप उठकर दरवाजे पर लिपट गई।

     

    फिर दरवाजे के बीच एक छोटी-सी दरार दिखाई दी।

     

    उस दरार के पीछे एक चेहरा था।

     

    आरव का चेहरा।

     

    वह चेहरा अंदर से उसे देख रहा था।

     

    आरव की साँस रुक गई।

     

    “ये… मैं हूँ?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    “तो कौन?”

     

    “तुम्हारा भाई।”

     

    आरव को अचानक अपने बचपन की एक धुंधली याद आई।

     

    एक पुराना घर।

     

    एक छोटी लड़की।

     

    एक लड़का।

     

    और एक आदमी…

     

    जो किसी बच्चे को घसीटते हुए तीसरे कमरे की तरफ ले जा रहा था।

     

    आरव ने सिर पकड़ लिया।

     

    “मुझे कुछ याद क्यों नहीं?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “क्योंकि तुम्हें याद नहीं रहने दिया गया।”

     

    “किसने?”

     

    मीरा ने धीरे से उस कमरे की तरफ इशारा किया।

     

    “उसने।”

     

    तभी हवेली की दीवारों से बच्चों के रोने की आवाज आने लगी।

     

    एक नहीं।

     

    दर्जनों।

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    दीवारों पर लगे पुराने चित्र बदलने लगे।

     

    हर चित्र में वही परिवार दिखाई दे रहा था।

     

    लेकिन हर तस्वीर में लड़की मीरा थी।

     

    और उसके बगल में खड़ा लड़का…

     

    हर तस्वीर में थोड़ा बड़ा होता जा रहा था।

     

    फिर आखिरी तस्वीर में लड़का जवान था।

     

    उसका चेहरा आरव जैसा था।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “मैं… यहाँ पहले आ चुका हूँ।”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    “कब?”

     

    “पैंतीस साल पहले।”

     

    आरव की आँखें फैल गईं।

     

    “लेकिन मैं तो…”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “तुम्हारा शरीर आज का है।”

     

    वह कुछ पल रुकी।

     

    “लेकिन तुम्हारी कहानी बहुत पुरानी है।”

     

    अचानक मोहित जमीन पर गिर गया।

     

    उसकी काली आँखें सामान्य होने लगीं।

     

    वह जोर-जोर से साँस लेने लगा।

     

    “आरव…”

     

    “क्या?”

     

    मोहित ने काँपते हुए कहा—

     

    “मैंने अंदर देखा है।”

     

    “क्या?”

     

    “उस कमरे में…”

     

    उसने दरवाजे की तरफ देखा।

     

    “एक आईना है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो?”

     

    मोहित की आवाज धीमी हो गई।

     

    “उस आईने में हम चार नहीं…”

     

    वह रुक गया।

     

    “हमारे पीछे सैकड़ों लोग खड़े हैं।”

     

    उसी समय गलियारे के आखिर में एक बड़ा आईना दिखाई दिया।

     

    जो कुछ सेकंड पहले वहाँ नहीं था।

     

    चारों धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़े।

     

    आईने में उनकी परछाइयाँ दिखाई दे रही थीं।

     

    आरव।

     

    निखिल।

     

    करण।

     

    मोहित।

     

    लेकिन उनके पीछे…

     

    मीरा नहीं थी।

     

    उसकी जगह एक लंबा आदमी खड़ा था।

     

    वह धीरे-धीरे मुस्कुरा रहा था।

     

    फिर उसने आईने के अंदर से अपना हाथ उठाया।

     

    और काँच पर उंगली से लिखा—

     

    “आरव, तुम्हें अपनी माँ से एक सवाल पूछना है।”

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा—

     

    “क्या सवाल?”

     

    आईने पर अगली लाइन अपने आप लिखी गई—

     

    “तुम्हारा जन्मदिन किस दिन है?”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    उसे अचानक एहसास हुआ…

     

    उसे अपना जन्मदिन याद ही नहीं था।

     

    और उसी क्षण…

     

    तीसरे कमरे का दरवाजा अपने आप खुल गया।

     

    अंदर से किसी बच्चे की आवाज आई—

     

    “भैया… घर चलो।”

     

    आरव ने उस अंधेरे कमरे की तरफ देखा।

     

    और पहली बार उसे महसूस हुआ कि शायद…

     

    वह इस हवेली में भटककर नहीं आया था।

     

    उसे यहाँ बुलाया गया था।

  • भाग 2: हवेली में पाँचवाँ कौन था?

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    आरव दीवार के सामने खड़ा रह गया।

     

    उसके हाथ में टॉर्च काँप रही थी।

     

    दीवार पर लिखा था—

     

    “अब तुम पाँच हो।”

     

    निखिल, करण और मोहित उसके पीछे खड़े थे।

     

    चारों ने एक-दूसरे को देखा।

     

    मोहित की आवाज काँप रही थी।

     

    “हम तो चार हैं…”

     

    करण ने तुरंत गिनती की।

     

    “आरव… निखिल… मोहित… मैं।”

     

    चार।

     

    फिर उसने पीछे देखा।

     

    गलियारा खाली था।

     

    लेकिन उसी समय तीसरे कमरे के अंदर से एक बच्ची के रोने की आवाज आई।

     

    “भैया…”

     

    आरव ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “ये हमें डराने की कोशिश कर रही है।”

     

    निखिल ने कहा—

     

    “लेकिन सीढ़ियाँ कहाँ गईं?”

     

    किसी के पास जवाब नहीं था।

     

    वे जिस रास्ते से ऊपर आए थे, वहाँ अब एक काली दीवार खड़ी थी।

     

    आरव ने दीवार को हाथ लगाया।

     

    वह पत्थर की तरह ठंडी थी।

     

    “पीछे हटो।”

     

    उसने लोहे की टॉर्च से दीवार पर वार किया।

     

    ठक!

     

    दीवार पर कोई निशान नहीं पड़ा।

     

    तभी पीछे से किसी ने धीरे से कहा—

     

    “सीढ़ियाँ तुम्हें जाने नहीं देंगी।”

     

    चारों एक साथ पलटे।

     

    गलियारे के आखिर में वही छोटी लड़की खड़ी थी, जिसे उन्होंने आईने में देखा था।

     

    इस बार वह सच में वहाँ थी।

     

    उसने सफेद रंग की पुरानी फ्रॉक पहन रखी थी।

     

    उसके लंबे बाल चेहरे पर बिखरे हुए थे।

     

    आरव ने धीरे से पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    वह तीसरे कमरे की तरफ देखने लगी।

     

    फिर उसने अपना हाथ उठाकर इशारा किया।

     

    “उसके अंदर मत जाना।”

     

    मोहित ने पूछा—

     

    “कौन है अंदर?”

     

    लड़की ने उसकी तरफ देखा।

     

    “वो…”

     

    कुछ पल चुप रहने के बाद उसने कहा—

     

    “जो मेरा पिता बनकर घूमता है।”

     

    चारों के चेहरे पर डर उतर आया।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तुम्हारे पिता कौन थे?”

     

    लड़की ने धीरे से कहा—

     

    “इस हवेली के मालिक।”

     

    “और उन्होंने तुम्हें कमरे में बंद किया था?”

     

    लड़की ने सिर हिलाया।

     

    “उन्होंने मुझे नहीं बंद किया।”

     

    “फिर?”

     

    लड़की ने तीसरे कमरे की तरफ देखा।

     

    “उसने किया था।”

     

    अचानक कमरे के अंदर से किसी आदमी की आवाज आई—

     

    “झूठ बोल रही है।”

     

    लड़की डरकर पीछे हट गई।

     

    दरवाजे की जंजीर अपने आप हिलने लगी।

     

    छन्न… छन्न…

     

    आरव ने देखा कि जंजीर धीरे-धीरे खुल रही थी।

     

    निखिल ने कहा—

     

    “भागो!”

     

    लेकिन लड़की ने जोर से चिल्लाया—

     

    “रुको!”

     

    जंजीर अचानक जमीन पर गिर गई।

     

    तीसरे कमरे का दरवाजा थोड़ा-सा खुल गया।

     

    अंदर से घना अंधेरा दिखाई दे रहा था।

     

    और उस अंधेरे के बीच…

     

    एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी रखी थी।

     

    कुर्सी पर एक आदमी बैठा था।

     

    उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    आरव ने टॉर्च उसकी तरफ की।

     

    आदमी ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।

     

    उसका चेहरा देखकर चारों के मुँह से चीख निकल गई।

     

    चेहरा इंसान जैसा था…

     

    लेकिन आँखें नहीं थीं।

     

    जहाँ आँखें होनी चाहिए थीं, वहाँ सिर्फ काली त्वचा थी।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अंदर आओ।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    आदमी ने फिर कहा—

     

    “तुम चार नहीं हो।”

     

    उसकी आवाज पूरे गलियारे में गूँजने लगी।

     

    “तुम पाँच हो।”

     

    मोहित ने डरते हुए पूछा—

     

    “पाँचवाँ कौन है?”

     

    वह आदमी हँसने लगा।

     

    फिर उसने उंगली आरव की तरफ कर दी।

     

    “वही।”

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    उसके पीछे कोई नहीं था।

     

    “मैं?”

     

    आदमी ने सिर हिलाया।

     

    “तुम्हारे अंदर पाँचवाँ पहले से है।”

     

    अचानक आरव को सिर में तेज दर्द हुआ।

     

    उसे चक्कर आने लगे।

     

    उसके कानों में फुसफुसाहट सुनाई दी—

     

    “मुझे याद करो…”

     

    आरव ने अपना सिर पकड़ लिया।

     

    और तभी उसे एक दृश्य दिखाई दिया।

     

    एक छोटी बच्ची हवेली के आँगन में खेल रही थी।

     

    उसके साथ एक लड़का भी था।

     

    लड़के का चेहरा आरव जैसा था।

     

    आरव डरकर जमीन पर बैठ गया।

     

    “ये क्या है?”

     

    लड़की उसके पास आई।

     

    उसने पहली बार अपना नाम बताया।

     

    “मेरा नाम मीरा है।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “और वो लड़का?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “वो मेरा भाई था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कहाँ है वो?”

     

    मीरा ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “तुम्हारे अंदर।”

     

    अचानक हवेली में जोर की घंटी बजने लगी।

     

    टन… टन… टन…

     

    कमरे के अंदर बैठा वह बिना आँखों वाला आदमी खड़ा हो गया।

     

    “अब समय आ गया है।”

     

    मीरा चिल्लाई—

     

    “आरव! दरवाजा बंद करो!”

     

    आरव ने पूरी ताकत से तीसरे कमरे का दरवाजा बंद करने की कोशिश की।

     

    लेकिन उस आदमी ने अंदर से दरवाजा पकड़ लिया।

     

    उसकी ताकत बहुत ज्यादा थी।

     

    करण और निखिल भी आरव की मदद करने लगे।

     

    मोहित पीछे खड़ा काँप रहा था।

     

    तभी उसके कंधे पर किसी ने हाथ रखा।

     

    मोहित ने सोचा कि शायद करण है।

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    फिर उसके कान के पास फुसफुसाहट हुई—

     

    “पाँचवाँ मिल गया…”

     

    मोहित की आँखें फैल गईं।

     

    उधर आरव ने दरवाजा पूरी ताकत से बंद कर दिया।

     

    तीसरा कमरा बंद हो गया।

     

    कुछ सेकंड तक सब शांत रहा।

     

    फिर मोहित की चीख सुनाई दी।

     

    तीनों ने पलटकर देखा।

     

    मोहित गलियारे के आखिरी कोने में खड़ा था।

     

    उसकी आँखें बंद थीं।

     

    और वह मुस्कुरा रहा था।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “मोहित?”

     

    मोहित ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।

     

    लेकिन उसकी आँखों का रंग बदल चुका था।

     

    वे पूरी तरह काली थीं।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तुम लोगों ने गलत दरवाजा बंद किया है।”

     

    फिर पीछे की दीवार से आवाज आई—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    और इस बार आवाज तीसरे कमरे से नहीं…

     

    उनके पीछे से आ रही थी।

  • भाग 1: आधी रात की दस्तक

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    शहर से करीब पंद्रह किलोमीटर दूर एक छोटा-सा गाँव था—रामपुरा।

     

    गाँव के आखिरी छोर पर एक बहुत पुरानी हवेली थी।

     

    लोग उसे काली हवेली कहते थे।

     

    हवेली इतनी पुरानी थी कि उसकी दीवारों पर उगी काई ने पूरी इमारत को हरे और काले रंग में ढक दिया था। खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाजे पर लोहे की बड़ी-बड़ी कीलें लगी थीं।

     

    लेकिन उस हवेली की सबसे डरावनी बात उसका बंद पड़ा तीसरा कमरा था।

     

    गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि उस कमरे का दरवाजा पिछले पैंतीस साल से नहीं खुला था।

     

    और जो भी उसे खोलने की कोशिश करता…

     

    वह रात में गायब हो जाता।

     

    इसी गाँव में आरव नाम का एक लड़का रहता था।

     

    आरव को पुरानी जगहों और रहस्यमयी कहानियों में बहुत दिलचस्पी थी। वह हमेशा अपने दोस्तों से कहता था—

     

    “भूत होते तो आज तक किसी ने वीडियो बना लिया होता।”

     

    उसके तीन दोस्त थे—निखिल, करण और मोहित।

     

    एक दिन चारों स्कूल से लौट रहे थे।

     

    रास्ते में निखिल ने काली हवेली की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “तुझे पता है, कल रात वहाँ से किसी लड़की के रोने की आवाज आई थी।”

     

    आरव हँस पड़ा।

     

    “तू भी दादी-नानी वाली कहानियों पर विश्वास करता है?”

     

    करण ने कहा—

     

    “मजाक मत कर। मेरे चाचा ने भी सुना है।”

     

    आरव ने हवेली की तरफ देखा।

     

    उसकी तीसरी मंजिल की एक खिड़की खुली थी।

     

    “अगर वहाँ कोई है, तो आज रात पता कर लेते हैं।”

     

    मोहित तुरंत बोला—

     

    “तू पागल है क्या?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “डर गया?”

     

    “डर नहीं लगा…”

     

    मोहित ने धीमे से कहा।

     

    “लेकिन उस हवेली के बारे में एक बात सच है।”

     

    “क्या?”

     

    “उसमें रात के बारह बजे कोई दरवाजा खटखटाता है।”

     

    चारों कुछ पल चुप रहे।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    मोहित ने सिर हिलाया।

     

    “किसी को नहीं पता।”

     

    उस रात करीब साढ़े ग्यारह बजे चारों दोस्त हवेली के बाहर पहुँच गए।

     

    आसमान में बादल थे।

     

    चाँद कभी बादलों के पीछे छिप जाता, कभी दिखाई देता।

     

    हवेली का मुख्य दरवाजा आधा खुला था।

     

    आरव ने टॉर्च जलाई।

     

    “चलो।”

     

    अंदर कदम रखते ही ठंडी हवा का झोंका आया।

     

    हवेली के अंदर धूल की मोटी परत थी।

     

    दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे।

     

    एक चित्र में हवेली के मालिक का परिवार दिखाई दे रहा था।

     

    एक आदमी…

     

    एक औरत…

     

    और उनके बीच करीब दस साल की एक लड़की।

     

    मोहित ने तस्वीर पर टॉर्च डाली।

     

    “इस लड़की के चेहरे पर खरोंच क्यों है?”

     

    आरव ने पास जाकर देखा।

     

    लड़की के चेहरे को किसी नुकीली चीज से इतनी बार खरोंचा गया था कि चेहरा पहचान में नहीं आ रहा था।

     

    तभी ऊपर से आवाज आई।

     

    ठक…

     

    चारों ने सिर उठाया।

     

    फिर—

     

    ठक… ठक…

     

    जैसे कोई ऊपर की मंजिल पर चल रहा हो।

     

    करण ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “कोई है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “चलकर देखते हैं।”

     

    वे सीढ़ियों की तरफ बढ़े।

     

    हर कदम के साथ लकड़ी की सीढ़ियाँ चरमरातीं।

     

    ऊपर पहुँचकर उन्हें एक लंबा गलियारा दिखाई दिया।

     

    गलियारे के आखिर में तीन दरवाजे थे।

     

    पहला कमरा खुला था।

     

    दूसरा बंद था।

     

    और तीसरे कमरे पर मोटी लोहे की जंजीर बंधी थी।

     

    जंजीर पर लाल रंग से कुछ लिखा था—

     

    “इसे मत खोलना।”

     

    आरव ने टॉर्च उस लिखावट पर डाली।

     

    मोहित पीछे हट गया।

     

    “हमें वापस जाना चाहिए।”

     

    तभी तीसरे कमरे के अंदर से आवाज आई।

     

    बहुत धीमी।

     

    एक लड़की की आवाज।

     

    “भैया…”

     

    चारों जम गए।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “मुझे बाहर निकालो…”

     

    मोहित की साँसें तेज हो गईं।

     

    “यहाँ कोई बच्ची बंद है!”

     

    आरव ने जंजीर को देखा।

     

    “अगर सच में कोई अंदर है तो हमें मदद करनी चाहिए।”

     

    करण ने कहा—

     

    “लेकिन यह जंजीर…”

     

    आरव ने उसे पकड़ लिया।

     

    जंजीर बर्फ जैसी ठंडी थी।

     

    अचानक अंदर से जोर की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    चारों पीछे हट गए।

     

    फिर दरवाजे के नीचे से किसी की उंगलियाँ दिखाई दीं।

     

    पतली…

     

    सफेद…

     

    और असामान्य रूप से लंबी।

     

    वे उंगलियाँ धीरे-धीरे दरवाजे के नीचे से बाहर आईं।

     

    मोहित चीखने ही वाला था कि आरव ने उसका मुँह दबा दिया।

     

    अंदर से लड़की की आवाज आई—

     

    “भैया… तुम आ गए।”

     

    आरव का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    कुछ सेकंड कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर अंदर से आवाज आई—

     

    “मैं वही हूँ… जिसे इस हवेली ने पैंतीस साल पहले बंद कर दिया था।”

     

    आरव ने करण की तरफ देखा।

     

    “पैंतीस साल?”

     

    तभी उसके पीछे लगे पुराने आईने में कुछ दिखाई दिया।

     

    चारों लड़के वहाँ खड़े थे।

     

    लेकिन आईने में…

     

    पाँच लोग दिखाई दे रहे थे।

     

    उनके पीछे एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    उसका चेहरा बिल्कुल काला था।

     

    और वह धीरे-धीरे अपना हाथ उठाकर तीसरे कमरे की तरफ इशारा कर रही थी।

     

    आरव ने पलटकर पीछे देखा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    फिर आईने की तरफ देखा।

     

    लड़की अब भी वहाँ थी।

     

    उसने अपने होंठ खोले।

     

    और बिना आवाज के सिर्फ इतना कहा—

     

    “दरवाजा मत खोलना।”

     

    अचानक तीसरे कमरे के अंदर से जोर-जोर से दरवाजा पीटने की आवाज आने लगी।

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    और फिर एक आदमी की भारी आवाज गूँजी—

     

    “उसे बाहर मत निकालना!”

     

    चारों लड़के डरकर सीढ़ियों की तरफ भागे।

     

    लेकिन सीढ़ियों के पास पहुँचते ही आरव रुक गया।

     

    नीचे जाने वाली सीढ़ियाँ गायब थीं।

     

    उनकी जगह…

     

    एक लंबी, काली दीवार थी।

     

    और दीवार पर ताजा खून से लिखा था—

     

    “अब तुम पाँच हो।”

  • भाग 6 — सच और सीख

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

    कई साल बीत गए।

    आरव अब बड़ा हो चुका था।

    उसने उस पुराने घर के बारे में कभी किसी से बात नहीं की।

    उसके पिता ने वह मकान बेच दिया था और शहर में नया घर बना लिया था।

    आरव की जिंदगी धीरे-धीरे सामान्य हो गई।

    लेकिन अपनी माँ की एक बात वह कभी नहीं भूला—

    “सच से कभी मत भागना।”

    एक दिन आरव अपने पिता के पुराने सामान को व्यवस्थित कर रहा था।

    उसे एक लकड़ी का डिब्बा मिला।

    डिब्बे में उसकी माँ की तस्वीर थी।

    और उसके नीचे एक छोटी डायरी।

    आरव ने डायरी खोली।

    पहले पन्ने पर लिखा था—

    “अगर कभी आरव बड़ा होकर यह डायरी पढ़े, तो उसे सच्चाई जरूर बताना।”

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

    उसने पढ़ना शुरू किया।

    मीरा ने लिखा था कि उसे अपनी मृत्यु का अंदाजा हो गया था।

    उसे पता था कि सावित्री की आत्मा खतरनाक है।

    लेकिन उसे यह भी पता था कि असली समस्या सिर्फ सावित्री नहीं थी।

    कालिका उस घर में बहुत पहले से मौजूद थी।

    मीरा ने अपने बेटे को बचाने के लिए अपनी आत्मा का एक हिस्सा उस घर में छोड़ दिया था।

    इसलिए वह कई बार आरव को दिखाई देती थी।

    आरव यह पढ़कर चौंक गया।

    उसने आगे पढ़ा—

    “मैं नहीं चाहती कि मेरा बेटा भूतों से डरकर जिंदगी जिए। मैं चाहती हूं कि वह समझे कि डर हमेशा बाहर से नहीं आता। कई बार डर हमारे अपने मन में होता है।”

    आरव ने डायरी बंद कर दी।

    उसी रात उसने सपना देखा।

    वह उसी पुराने घर में खड़ा था।

    ऊपर वाला कमरा खुला था।

    अंदर उसकी माँ बैठी थीं।

    उन्होंने मुस्कुराकर कहा—

    “तुमने डायरी पढ़ ली?”

    आरव ने कहा—

    “हाँ।”

    “अब तुम्हें सब समझ आ गया?”

    “हाँ, माँ।”

    “तो अब तुम मुझसे एक वादा करो।”

    “क्या?”

    “किसी बच्चे को कभी डर के साथ अकेला मत छोड़ना।”

    आरव ने सिर हिलाया।

    “मैं वादा करता हूँ।”

    मीरा ने कहा—

    “और एक बात।”

    “क्या?”

    “लोगों को डराने के लिए भूत की कहानी मत सुनाना। अगर सुनाओ, तो उसमें छिपी सीख भी बताना।”

    आरव मुस्कुराया।

    तभी सपना टूट गया।

    सुबह वह उठकर खिड़की के पास गया।

    सूरज निकल चुका था।

    आसमान साफ था।

    उसने पहली बार महसूस किया कि उसकी माँ सच में उससे दूर नहीं गई थीं।

    वह उसकी यादों में थीं।

    उसकी आदतों में थीं।

    उसके संस्कारों में थीं।

    उसके दिल में थीं।

    कुछ दिनों बाद आरव ने उस पुराने घर को देखने का फैसला किया।

    वह वहां पहुंचा तो घर लगभग खंडहर बन चुका था।

    मुख्य दरवाजा टूटा हुआ था।

    ऊपर की खिड़की पर धूल जमी थी।

    आरव धीरे-धीरे अंदर गया।

    उसे डर नहीं लग रहा था।

    वह ऊपर गया।

    जिस कमरे में कभी भयानक घटनाएं हुई थीं, वहां अब खाली दीवारें थीं।

    उसने फर्श को देखा।

    जहां कभी काला निशान बना था, वहां अब एक छोटा-सा पौधा उग आया था।

    आरव कुछ देर उसे देखता रहा।

    फिर उसके पीछे किसी ने कहा—

    “बेटा…”

    आरव ने तुरंत पीछे देखा।

    कोई नहीं था।

    उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

    “माँ?”

    हवा का हल्का झोंका आया।

    खिड़की का पर्दा हिला।

    और जमीन पर एक सूखा पत्ता गिरा।

    आरव ने पत्ता उठाया।

    उस पर लाल रंग की हल्की रेखा थी।

    उसे अचानक लाल गेंद याद आई।

    रवि।

    सावित्री।

    कालिका।

    और वह पूरा डरावना अतीत।

    आरव ने पत्ते को वहीं रख दिया।

    “सबको शांति मिले।”

    वह नीचे आ गया।

    घर से बाहर निकलते समय उसने आखिरी बार पीछे देखा।

    इस बार ऊपर की खिड़की में कोई चेहरा नहीं था।

    सिर्फ सुबह की धूप थी।

    आरव ने समझ लिया कि कहानी खत्म हो चुकी है।

    लेकिन जाते-जाते उसे एक बात महसूस हुई—

    किसी भी घर को भूतिया बनाने वाली चीज सिर्फ दीवारें नहीं होतीं।

    कभी-कभी इंसानों का लालच, गुस्सा, बदला और अधूरा दुःख भी किसी जगह को डरावना बना देता है।

    सावित्री बुरी बनकर पैदा नहीं हुई थी।

    वह अपने बेटे के प्यार में टूट गई थी।

    देवदत्त अपने बेटे को वापस लाने की लालसा में गलत रास्ते पर चला गया।

    कालिका ने लोगों के दुःख का फायदा उठाया।

    और मीरा ने अपने बेटे को बचाने के लिए अपनी आखिरी सांस तक हिम्मत नहीं छोड़ी।

    यही इस कहानी का सबसे बड़ा सच था।

    डर से भागने पर डर बड़ा होता है।

    सच का सामना करने पर डर छोटा हो जाता है।

    और सबसे बड़ी बात—

    जिस इंसान के दिल में सच्चा प्यार और अच्छे संस्कार होते हैं, उसे अंधेरे से लड़ने के लिए किसी जादू की जरूरत नहीं होती।

    कहानी की सीख

    इस कहानी से हमें कई महत्वपूर्ण बातें सीखने को मिलती हैं—

    डर के कारण किसी गलत फैसले पर भरोसा नहीं करना चाहिए।

    दुःख को दिल में दबाकर रखने के बजाय उसे स्वीकार करना जरूरी है।

    लालच और बदले की भावना इंसान को गलत रास्ते पर ले जा सकती है।

    मुश्किल समय में परिवार का साथ सबसे बड़ी ताकत बनता है।

    सच्चाई चाहे कितनी भी डरावनी हो, उससे भागने के बजाय उसका सामना करना चाहिए।

    किसी की गलती के पीछे छिपे दुःख को समझना जरूरी है, लेकिन गलत काम को सही नहीं मानना चाहिए।

    माफी कमजोरी नहीं, बल्कि अपने मन को आजाद करने की ताकत है।

    माँ-बाप का प्यार शरीर के खत्म होने के बाद भी उनकी यादों और संस्कारों के रूप में हमारे साथ रहता है।

    और शायद इसी वजह से आरव की माँ की आखिरी बात सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण थी—

    “डर को अपनी जिंदगी मत बनने देना। अंधेरा कितना भी गहरा हो, एक छोटी-सी रोशनी उसे खत्म करने के लिए काफी होती है।”

    समाप्त।

  • भाग 5 — आखिरी रात

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

    आईना टूट चुका था।

    सावित्री की आत्मा मुक्त हो चुकी थी।

    रवि भी चला गया था।

    और आरव को लगा कि अब सब खत्म हो गया है।

    लेकिन उसके पिता को यकीन नहीं था।

    उन्होंने कहा—

    “जब तक कालिका का नाम इस घर से पूरी तरह मिट नहीं जाता, खतरा खत्म नहीं हुआ है।”

    आरव ने पूछा—

    “हम उसे कैसे खत्म करेंगे?”

    पापा ने कहा—

    “मुझे नहीं पता।”

    दोनों ने साधु को फोन किया।

    साधु ने कहा—

    “आज रात घर में मत रहना।”

    पापा ने पूछा—

    “क्यों?”

    “क्योंकि आज अमावस्या है।”

    आरव ने खिड़की से बाहर देखा।

    आसमान पर बादल छाए थे।

    रात करीब दस बजे अचानक बिजली चली गई।

    पापा ने कहा—

    “हम अभी निकलते हैं।”

    लेकिन जैसे ही उन्होंने मुख्य दरवाजा खोला, बाहर घना कोहरा था।

    सड़क दिखाई नहीं दे रही थी।

    फिर दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

    ठक!

    आरव ने कहा—

    “पापा…”

    पापा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    “डरो मत।”

    तभी घर में किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

    “माँ…”

    आरव चौंका।

    यह रवि की आवाज थी।

    “लेकिन रवि तो मुक्त हो गया था।”

    पापा ने कहा—

    “यह रवि नहीं है।”

    आवाज फिर आई—

    “माँ…”

    फिर उसी आवाज ने कहा—

    “आरव…”

    आरव पीछे हट गया।

    आवाज बदलने लगी।

    पहले रवि।

    फिर उसकी माँ।

    फिर सावित्री।

    फिर कई लोगों की आवाजें एक साथ।

    “आरव…”

    दीवारों पर काले हाथों के निशान दिखाई देने लगे।

    पापा ने मंदिर से मिला पवित्र धागा आरव की कलाई पर बांध दिया।

    “जब तक यह तुम्हारे हाथ में है, वह तुम्हें छू नहीं पाएगी।”

    तभी ऊपर से किसी के दौड़ने की आवाज आई।

    धड़धड़धड़…

    पापा ने कहा—

    “हमें ऊपर जाना होगा।”

    आरव डर गया।

    “फिर से?”

    “हाँ। इस बार हमें इसे हमेशा के लिए खत्म करना होगा।”

    दोनों सीढ़ियां चढ़ने लगे।

    ऊपर पहुंचकर उन्होंने देखा कि टूटा हुआ आईना पूरी तरह गायब था।

    उसकी जगह फर्श पर एक गोल काला निशान बना हुआ था।

    निशान के बीच एक पुराना दीपक रखा था।

    दीपक अपने आप जल उठा।

    और उसके पीछे एक आवाज आई—

    “आखिर तुम आ ही गए।”

    कालिका सामने खड़ी थी।

    अब उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

    वह किसी बूढ़ी औरत जैसी दिखती थी।

    उसकी आंखें पूरी तरह काली थीं।

    पापा ने पूछा—

    “तुम्हें क्या चाहिए?”

    “वही जो मुझे कभी नहीं मिला।”

    “क्या?”

    “एक शरीर।”

    आरव ने डरते हुए पूछा—

    “किसका?”

    कालिका मुस्कुराई।

    “तुम्हारा।”

    आरव पीछे हट गया।

    “मैं तुम्हें अपना शरीर नहीं दूंगा।”

    “तुम्हें देना नहीं पड़ेगा।”

    उसने हाथ उठाया।

    आरव की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा।

    उसे लगा जैसे वह किसी दूसरी जगह पहुंच गया है।

    उसने खुद को एक पुराने घर में देखा।

    वहां एक छोटा बच्चा खेल रहा था।

    एक महिला उसे खाना खिला रही थी।

    वह सावित्री थी।

    बच्चा रवि था।

    दृश्य बदल गया।

    रवि सड़क पर खेल रहा था।

    एक तेज आवाज हुई।

    फिर सब अंधेरा।

    सावित्री अपने बेटे को ढूंढते हुए रो रही थी।

    फिर देवदत्त आया।

    उसने कहा—

    “मैं उसे वापस लाऊंगा।”

    फिर उसने कालिका को बुलाया।

    लेकिन कालिका कोई साधारण आत्मा नहीं थी।

    वह उस घर में पहले से मौजूद एक भटकती शक्ति थी।

    उसने देवदत्त से कहा—

    “मैं तुम्हारे बेटे की याद दे सकती हूँ, जीवन नहीं।”

    देवदत्त ने फिर भी अनुष्ठान किया।

    और उस दिन से घर अभिशप्त हो गया।

    आरव ने सब कुछ देखा।

    फिर उसने कालिका से कहा—

    “तुम्हें रवि नहीं चाहिए था। तुम्हें लोगों का दुःख चाहिए था।”

    कालिका कुछ क्षण शांत रही।

    फिर बोली—

    “दुःख सबसे शक्तिशाली भावना है।”

    आरव ने कहा—

    “लेकिन प्यार उससे ज्यादा शक्तिशाली है।”

    उसी समय उसकी कलाई पर बंधा धागा चमकने लगा।

    आरव को अपनी माँ की आवाज सुनाई दी—

    “बेटा, डर को जितना ताकत दोगे, वह उतना बड़ा होगा।”

    आरव ने आंखें बंद कीं।

    उसे माँ की सारी बातें याद आने लगीं।

    वह रातें जब माँ उसे कहानी सुनाती थीं।

    उसकी पहली स्कूल ड्रेस।

    उसका जन्मदिन।

    माँ का माथे पर हाथ रखना।

    धीरे-धीरे उसके अंदर का डर कम होने लगा।

    कालिका पीछे हटने लगी।

    “नहीं…”

    आरव ने कहा—

    “तुम मेरे डर से ताकत लेती हो। लेकिन मैं अब तुमसे नहीं डरता।”

    कालिका चीखी।

    कमरे की दीवारें कांपने लगीं।

    पापा ने किताब में लिखा मंत्र पढ़ना शुरू किया।

    आरव ने लकड़ी का वह खिलौना जमीन पर रखा जो उसकी माँ ने बनाया था।

    उसने कहा—

    “यह मेरी माँ की याद है। इसे कोई नहीं छीन सकता।”

    अचानक कमरे में तेज रोशनी फैल गई।

    मीरा की आत्मा दिखाई दी।

    उसके पीछे सावित्री और रवि भी थे।

    सावित्री ने कालिका से कहा—

    “तुमने मेरे दुःख का इस्तेमाल किया। अब मेरा दुःख तुम्हारी ताकत नहीं है।”

    रवि ने अपनी माँ का हाथ पकड़ लिया।

    कालिका कमजोर पड़ने लगी।

    मीरा ने आरव की ओर देखा।

    “अब आखिरी काम तुम्हें करना होगा।”

    “क्या?”

    “उसे माफ कर दो।”

    आरव चौंक गया।

    “जिसने आपको और इतने लोगों को परेशान किया, उसे?”

    मीरा ने कहा—

    “माफी उसके लिए नहीं होती। कभी-कभी माफी अपने दिल को आजाद करने के लिए होती है।”

    आरव ने कालिका की ओर देखा।

    “मैं तुम्हें माफ करता हूँ।”

    कालिका चीखने लगी।

    उसका शरीर धुएं में बदलने लगा।

    फिर वह पूरी तरह गायब हो गई।

    घर में पहली बार शांति छा गई।

    सुबह सूरज की रोशनी खिड़की से अंदर आई।

    पापा ने आरव को गले लगा लिया।

    दोनों रो रहे थे।

    उस दिन उन्होंने वह घर छोड़ने का फैसला किया।

    लेकिन जाने से पहले आरव आखिरी बार ऊपर वाले कमरे में गया।

    कमरा अब बिल्कुल सामान्य था।

    दीवार पर उसकी माँ की एक तस्वीर लगी थी।

    आरव ने तस्वीर के सामने हाथ जोड़कर कहा—

    “माँ, अब मैं डरूंगा नहीं।”

    तस्वीर के होंठों पर हल्की मुस्कान दिखाई दी।

    आरव नीचे लौट आया।

    जब वह घर से बाहर निकला, उसने पीछे मुड़कर देखा।

    खिड़की में उसकी माँ खड़ी थी।

    वह हाथ हिला रही थी।

    आरव ने भी हाथ हिलाया।

    फिर उसने पलक झपकाई।

    खिड़की खाली थी।

    उस दिन के बाद उस घर में कभी किसी ने भूत नहीं देखा।

    लेकिन मोहल्ले के बुजुर्ग आज भी कहते हैं कि अमावस्या की रात उस घर की ऊपरी खिड़की में कभी-कभी हल्की रोशनी दिखाई देती है।

    लोग कहते हैं, वह किसी भूत की रोशनी नहीं है।

    वह एक माँ का प्यार 

  • भाग 4 — घर का असली रहस्य

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    आरव और उसके पापा ने पूरी रात घर से बाहर रहने का फैसला किया।

    सुबह होते ही वे पुराने मंदिर गए, जहां पापा ने एक बुजुर्ग साधु से पूरी घटना बताई।

    साधु ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा।

    फिर उन्होंने पूछा—

    “यह घर तुम्हारे परिवार ने खरीदा था?”

    पापा ने सिर हिलाया।

    “हाँ।”

    “किससे?”

    पापा ने कहा, “एक बूढ़े आदमी से। उसने बताया था कि घर कई साल से खाली पड़ा था।”

    साधु ने गंभीर होकर कहा—

    “उसने झूठ बोला।”

    पापा चौंक गए।

    “आप उसे जानते हैं?”

    साधु ने कहा—

    “मैंने उस घर का इतिहास सुना है। सावित्री अकेली नहीं थी।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन था उसके साथ?”

    साधु ने कहा—

    “उसका पति।”

    पापा चुप हो गए।

    “सावित्री के पति का नाम देवदत्त था। वह तांत्रिक विद्या में विश्वास करता था। अपने बेटे की मौत के बाद उसने सावित्री को समझाया कि वह आत्माओं की मदद से रवि को वापस ला सकता है।”

    आरव ने डरते हुए पूछा—

    “क्या उसने सच में ऐसा किया?”

    “उसने कोशिश की।”

    साधु ने आगे कहा—

    “लेकिन आत्मा को वापस लाने के बजाय उसने कई आत्माओं को उस घर में बांध दिया।”

    पापा ने पूछा—

    “तो सावित्री?”

    “वह अपने बेटे के दुःख में धीरे-धीरे उस शक्ति का हिस्सा बन गई।”

    आरव को पिछली रात का कागज याद आया।

    “सावित्री अकेली नहीं थी…”

    साधु ने कहा—

    “उस घर में कई आत्माएं कैद थीं।”

    यह सुनकर आरव के रोंगटे खड़े हो गए।

    साधु ने उन्हें एक पुरानी किताब दी।

    “इसे अपने साथ ले जाओ। लेकिन ध्यान रखना—घर के अंदर इसे आधी रात के बाद मत पढ़ना।”

    पापा ने किताब ले ली।

    घर लौटने के बाद उन्होंने दिन के उजाले में किताब पढ़नी शुरू की।

    उसमें लिखा था कि देवदत्त ने एक कमरे में एक विशेष अनुष्ठान किया था। उसका उद्देश्य मृत आत्मा को वापस बुलाना था।

    लेकिन अनुष्ठान अधूरा रह गया।

    रवि की आत्मा तो वापस नहीं आई, लेकिन घर में कई भटकी आत्माएं फंस गईं।

    सावित्री उनमें से एक बन गई।

    आरव ने पूछा—

    “अगर वह आत्मा मुक्त हो गई, तो बाकी आत्माओं का क्या होगा?”

    पापा ने किताब पलटी।

    एक पन्ने पर लिखा था—

    “जब तक घर की अंतिम स्मृति नष्ट नहीं होती, आत्माएं मुक्त नहीं होंगी।”

    “अंतिम स्मृति क्या है?”

    पापा ने जवाब पढ़ा।

    “वह वस्तु जिसमें सबसे ज्यादा दुःख और मृत्यु की ऊर्जा बंधी हो।”

    आरव को समझ आ गया।

    “वह संदूक?”

    पापा ने कहा—

    “शायद।”

    दोनों ऊपर गए।

    कमरा पहले जैसा नहीं था।

    दीवारों पर बने पुराने चित्र गायब हो चुके थे।

    लेकिन कमरे के बीच में एक चीज रखी थी—

    एक बड़ा आईना।

    आरव ने आईने में देखा।

    उसे अपना चेहरा नहीं दिखाई दिया।

    उसमें उसकी माँ खड़ी थी।

    “आरव…”

    वह पीछे हट गया।

    “माँ?”

    आईने में मीरा ने सिर हिलाया।

    “बेटा, आईने को मत तोड़ना।”

    पापा ने पूछा—

    “मीरा, क्या इसमें आत्माएं कैद हैं?”

    मीरा ने कहा—

    “यह आईना सिर्फ प्रतिबिंब नहीं दिखाता। यह उन लोगों की यादें दिखाता है जिन्हें इस घर ने खोया है।”

    अचानक आईने में दृश्य बदल गया।

    एक छोटा बच्चा दिखाई दिया।

    वह रवि था।

    फिर एक आदमी आया।

    देवदत्त।

    उसने कुछ मंत्र पढ़े और आईने के सामने एक काला दीपक जलाया।

    फिर दृश्य बदल गया।

    सावित्री रो रही थी।

    उसकी गोद में रवि की तस्वीर थी।

    देवदत्त ने कहा—

    “मैं रवि को वापस लाऊंगा।”

    लेकिन उसी समय कमरे में तेज हवा चली।

    दीपक बुझ गया।

    आईने में कई काली परछाइयां दिखाई दीं।

    देवदत्त डरकर भाग गया।

    सावित्री अकेली रह गई।

    तभी एक परछाईं उसके पीछे आकर खड़ी हो गई।

    उसने सावित्री के कान में कुछ कहा।

    सावित्री ने अपना चेहरा ऊपर उठाया।

    उसकी आंखें बदल गईं।

    दृश्य समाप्त हो गया।

    आरव कांपने लगा।

    “माँ, वह परछाईं कौन थी?”

    मीरा ने कहा—

    “वही असली आत्मा है जिसने सबको बांध रखा है।”

    “उसका नाम?”

    मीरा ने कहा—

    “कालिका।”

    कमरे में अचानक तापमान गिर गया।

    आईना काला पड़ गया।

    और एक आवाज गूंजी—

    “मीरा…”

    मीरा की आत्मा घबरा गई।

    “आरव, भागो!”

    लेकिन देर हो चुकी थी।

    आईने से एक काली आकृति बाहर निकल आई।

    उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

    उसने हाथ बढ़ाया।

    पापा पीछे गिर गए।

    आरव भागने लगा, लेकिन उसके पैर जैसे जमीन से चिपक गए।

    काली आकृति ने कहा—

    “तुम्हारी माँ ने मुझे बहुत सालों तक रोका है।”

    मीरा ने कहा—

    “मैंने तुम्हें नहीं रोका। मैंने आरव को बचाया है।”

    कालिका हंसी।

    “अब तुम्हारा बेटा मेरे पास आएगा।”

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

    उसे माँ की बात याद आई—

    “सच से कभी मत भागना।”

    उसने आंखें खोलीं।

    “तुम चाहती क्या हो?”

    कालिका शांत हो गई।

    “मुझे वह चाहिए जो तुम्हारी माँ ने छिपाया।”

    “क्या?”

    “तुम्हारी माँ की आखिरी याद।”

    पापा ने कहा—

    “मीरा की आखिरी याद तो…”

    अचानक उन्हें कुछ याद आया।

    माँ की मृत्यु से पहले उसने आरव के लिए एक छोटा-सा लकड़ी का खिलौना बनाया था।

    वह खिलौना हमेशा आरव के पास रहता था।

    आरव ने जेब से उसे निकाला।

    कालिका की आंखें चमक उठीं।

    “यही है।”

    मीरा चीखी—

    “आरव, इसे मत देना!”

    कालिका आगे बढ़ी।

    आरव ने खिलौना पीछे कर लिया।

    “यह मेरी माँ की आखिरी निशानी है। मैं इसे तुम्हें नहीं दूंगा।”

    कालिका का चेहरा विकृत हो गया।

    “फिर तुम्हें भी यहीं रहना होगा!”

    अचानक आईना टूटने लगा।

    कांच की दरारों से सैकड़ों आवाजें आने लगीं।

    “बचाओ…”

    “हमें मुक्त करो…”

    “हमें बाहर जाने दो…”

    आरव ने समझ लिया कि कालिका उन सभी आत्माओं को कैद करके रखे हुए थी।

    उसने पापा से कहा—

    “हमें इस आईने को नष्ट करना होगा।”

    पापा ने मंदिर से मिली किताब खोली।

    उसमें लिखा था कि आईने को तोड़ना पर्याप्त नहीं होगा।

    उसे उस जगह ले जाकर तोड़ना होगा जहां पहला अनुष्ठान हुआ था।

    यानी—

    ऊपर वाले कमरे के बीचोंबीच।

    पापा ने आईना उठाया।

    लेकिन कालिका ने रास्ता रोक लिया।

    मीरा ने अपनी पूरी शक्ति से उसे रोकने की कोशिश की।

    “आरव, अभी!”

    आरव ने लकड़ी का खिलौना जमीन पर रखा।

    फिर उसने आईने को दोनों हाथों से उठाया।

    और पूरी ताकत से उसे फर्श पर पटक दिया।

    छन्न्न्न!

    आईना हजारों टुकड़ों में टूट गया।

    एक भयानक चीख पूरे घर में गूंज उठी।

    खिड़कियां टूट गईं।

    दीवारों में दरारें पड़ गईं।

    काली आकृति हवा में तड़पने लगी।

    फिर एक-एक करके सारी आत्माएं रोशनी में बदलने लगीं।

    रवि भी उनमें था।

    उसने अपनी माँ की तरफ देखा।

    “माँ…”

    सावित्री की आत्मा भी दिखाई दी।

    वह मुस्कुराई।

    और फिर दोनों रोशनी में बदल गए।

    लेकिन कालिका अभी भी खत्म नहीं हुई थी।

    उसने आखिरी बार आरव की तरफ देखा।

    “तुमने मुझे रोका है… खत्म नहीं किया।”

    और वह अंधेरे में गायब हो गई।

    घर फिर शांत हो गया।

    मीरा की आत्मा ने आरव को देखा।

    “अब मुझे जाना होगा।”

    आरव ने पूछा—

    “क्या आप फिर कभी आएंगी?”

    मीरा ने कहा—

    “जब तुम्हें मेरी सबसे ज्यादा जरूरत होगी, तब तुम्हें मेरी आवाज अपने दिल में सुनाई देगी।”

    और वह भी रोशनी बनकर गायब हो गई।

    आरव ने अपनी आंखें बंद कर लीं।

    उस रात पहली बार घर में कोई आवाज नहीं आई।

    लेकिन अगले दिन जब पापा ने टूटा हुआ आईना देखा, तो उसके एक छोटे से टुकड़े में अभी भी कुछ दिखाई दे रहा था।

    एक काला चेहरा।

    और उसके नीचे लिखा था—

    “मैं अभी यहीं हूँ।”

     

  • भाग 3 — माँ की आत्मा

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

    घर का मुख्य दरवाजा बंद था।

    पापा ने पूरी ताकत से उसे खोलने की कोशिश की, लेकिन दरवाजा जैसे पत्थर का बन गया था।

    आरव रोते हुए बोला, “पापा, अब क्या होगा?”

    पापा ने कहा, “डरो मत। मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा।”

    तभी घर की सारी घड़ियां एक साथ बंद हो गईं।

    बारह बज रहे थे।

    फिर अचानक एक-एक करके सभी घड़ियां उल्टी दिशा में चलने लगीं।

    आरव ने अपनी आंखें बंद कर लीं।

    ऊपर से किसी के गाने की आवाज आ रही थी।

    बहुत धीमी।

    बहुत उदास।

    पापा ने आरव को पीछे रहने को कहा और खुद सीढ़ियों की तरफ बढ़े।

    “कौन है?”

    कोई जवाब नहीं आया।

    फिर ऊपर से आवाज आई—

    “अरुण…”

    पापा रुक गए।

    यह उनकी पत्नी मीरा की आवाज थी।

    “अरुण, मुझे बचा लो…”

    पापा की आंखों में आंसू आ गए।

    उन्होंने धीरे से कहा, “मीरा?”

    आरव ने उनका हाथ पकड़ लिया।

    “पापा, मत जाइए।”

    लेकिन पापा जैसे उस आवाज के जादू में आ चुके थे।

    वह सीढ़ियां चढ़ने लगे।

    आरव भी उनके पीछे चला।

    ऊपर पहुंचकर उन्होंने देखा कि कमरे का दरवाजा खुला हुआ था।

    अंदर अंधेरा था।

    फिर अचानक कमरे के बीच एक हल्की रोशनी दिखाई दी।

    उस रोशनी में एक औरत खड़ी थी।

    सफेद साड़ी।

    चेहरा शांत।

    आंखों में आंसू।

    वह मीरा थी।

    आरव दौड़कर उसकी ओर जाना चाहता था, लेकिन पापा ने उसे रोक लिया।

    “रुको।”

    औरत ने कहा—

    “आरव… मैं सच में तुम्हारी माँ हूँ।”

    आरव ने उसे ध्यान से देखा।

    इस बार उसके पैर सीधे थे।

    चेहरा भी डरावना नहीं था।

    उसने कहा, “अगर आप मेरी माँ हैं तो मुझे वह बात बताइए जो सिर्फ माँ जानती थी।”

    औरत मुस्कुराई।

    “तुम्हें बचपन में नींद नहीं आती थी। मैं तुम्हें नीले रंग की छोटी कार देती थी। तुम उसे तकिए के नीचे रखकर सोते थे।”

    आरव की आंखों से आंसू निकल आए।

    यह बात किसी और को नहीं पता थी।

    वह आगे बढ़ा।

    “माँ…”

    औरत ने हाथ फैलाए।

    लेकिन पापा ने फिर उसे रोक दिया।

    “मीरा, अगर तुम सच में हो तो बताओ, सावित्री को कैसे रोका जा सकता है?”

    औरत का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

    “उसकी आत्मा को खत्म नहीं किया जा सकता।”

    “फिर?”

    “उसे मुक्त करना होगा।”

    पापा ने पूछा, “कैसे?”

    मीरा ने कमरे के एक कोने की तरफ इशारा किया।

    वहाँ वही पुराना लोहे का संदूक रखा था।

    “उसमें रवि की आखिरी चीज है।”

    पापा ने संदूक खोला।

    अंदर एक छोटी लाल गेंद, एक पुरानी तस्वीर और चांदी का लॉकेट था।

    मीरा ने कहा—

    “सावित्री अपने बेटे की मौत को स्वीकार नहीं कर पाई। उसका दुःख ही उसकी शक्ति बन गया। उसे लगता है कि हर बच्चा उसका रवि है। अगर रवि की आखिरी याद उसे वापस दे दी जाए, तो शायद वह मुक्त हो सके।”

    आरव ने पूछा—

    “लेकिन वह मेरी माँ जैसी क्यों दिखती है?”

    मीरा ने कहा—

    “क्योंकि वह जानती है कि बच्चे अपनी माँ की आवाज पर भरोसा करते हैं। उसने तुम्हें अपने बेटे की जगह पाने के लिए मेरी शक्ल अपनाई।”

    अचानक कमरे में तेज हवा चलने लगी।

    मीरा का चेहरा धुंधला पड़ने लगा।

    “माँ!”

    आरव उसकी तरफ दौड़ा।

    मीरा ने कहा—

    “मुझे अभी जाना होगा। सावित्री आ रही है।”

    तभी कमरे की दीवार पर एक काली परछाईं दिखाई दी।

    सावित्री।

    उसकी आवाज गूंज उठी—

    “तुमने मेरा बेटा मुझसे छीन लिया!”

    मीरा ने कहा—

    “तुम्हारा बेटा मर चुका है, सावित्री। आरव तुम्हारा बेटा नहीं है।”

    सावित्री चीखी।

    कमरे की खिड़कियां टूटने लगीं।

    कांच के टुकड़े हवा में उड़ने लगे।

    पापा ने आरव को अपने पीछे कर लिया।

    सावित्री धीरे-धीरे कमरे में उतर आई।

    उसके बाल हवा में उड़ रहे थे।

    उसकी आंखें लाल थीं।

    “मेरा रवि…”

    उसने आरव की तरफ हाथ बढ़ाया।

    आरव पीछे हट गया।

    “मैं रवि नहीं हूँ!”

    सावित्री की आवाज बदल गई।

    “तुम्हें बनना पड़ेगा।”

    उसने हाथ घुमाया और आरव अचानक जमीन से ऊपर उठ गया।

    “पापा!”

    पापा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    लेकिन वह भी धीरे-धीरे हवा में उठने लगे।

    तभी मीरा की आत्मा ने सावित्री के सामने आकर कहा—

    “उसे छोड़ दो!”

    सावित्री चीखी—

    “तुमने मेरे बेटे को मुझसे छीन लिया!”

    मीरा ने कहा—

    “तुम्हारा बेटा तुम्हें किसी ने नहीं छीना था। वह हादसे में मरा था। लेकिन तुमने उसकी मौत को स्वीकार नहीं किया। तुमने अपने दुःख में निर्दोष बच्चों को कैद करना शुरू कर दिया।”

    सावित्री कुछ क्षण के लिए शांत हो गई।

    उसकी आंखों में पहली बार गुस्से की जगह दर्द दिखाई दिया।

    मीरा ने लाल गेंद उसकी तरफ बढ़ाई।

    “यह रवि की है।”

    सावित्री ने गेंद को देखा।

    उसका चेहरा बदलने लगा।

    उसे जैसे कुछ याद आ गया।

    “रवि…”

    उसकी आवाज अब डरावनी नहीं थी।

    बल्कि एक माँ की तरह थी।

    “माँ, मैं गिर गया…”

    सावित्री के चेहरे पर आंसू आ गए।

    वह जमीन पर बैठ गई।

    “रवि…”

    कमरे में अचानक बच्चे की हंसी गूंजने लगी।

    सावित्री ने ऊपर देखा।

    उसे सामने एक छोटा बच्चा दिखाई दिया।

    वह लाल गेंद लेकर खड़ा था।

    “माँ, मैं घर जाना चाहता हूँ।”

    सावित्री उसके पीछे चल पड़ी।

    लेकिन जाते-जाते उसने आरव की ओर देखा।

    “मुझे माफ करना…”

    और फिर वह गायब हो गई।

    कमरे में शांति छा गई।

    मीरा भी धीरे-धीरे गायब होने लगी।

    आरव दौड़कर उसके पास गया।

    “माँ, आप जा रही हो?”

    मीरा ने उसके सिर पर हाथ रखा।

    “बेटा, माँ कभी पूरी तरह नहीं जाती।”

    “फिर आप वापस क्यों नहीं आ सकतीं?”

    मीरा मुस्कुराई।

    “क्योंकि कुछ रिश्ते शरीर से नहीं, प्यार से जुड़े होते हैं।”

    आरव रोने लगा।

    “मैं आपको भूलना नहीं चाहता।”

    “मुझे भूलना मत। लेकिन मेरे लिए अपना जीवन मत रोकना।”

    मीरा की छवि धीरे-धीरे रोशनी में बदल गई।

    आखिरी बार उसकी आवाज आई—

    “सच से कभी मत भागना, आरव।”

    और वह गायब हो गई।

    घर की सारी खिड़कियां खुल गईं।

    मुख्य दरवाजा भी खुल गया।

    सुबह की हल्की रोशनी घर में आने लगी।

    आरव और उसके पिता नीचे आ गए।

    लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी।

    क्योंकि जब पापा ने पुराने संदूक को दोबारा देखा, तो उसमें एक और कागज मिला।

    उस पर लिखा था—

    “सावित्री अकेली नहीं थी।”

    पापा का चेहरा फिर सफेद पड़ गया।

    आरव ने पूछा—

    “पापा… इसका मतलब क्या है?”

    पापा ने कोई जवाब नहीं दिया।

    और तभी ऊपर वाले कमरे से किसी बच्चे की हंसी सुनाई दी।