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लेखक: Alka Singh

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Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

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  • कन्नप्पा…की पौराणिक शिव कथा

    कन्नप्पा…की पौराणिक शिव कथा

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

     

    कहते हैं, भगवान को पाने के लिए न तो बड़े-बड़े शास्त्रों का ज्ञान आवश्यक है, न ही कठिन तपस्या। भगवान तो केवल सच्चे हृदय की पुकार देखते हैं। जिसके भीतर प्रेम सच्चा हो, जिसकी भक्ति में छल न हो और जिसके मन में अपने आराध्य के लिए पूर्ण समर्पण हो, उसके लिए स्वयं भगवान भी अपने भक्त के सामने झुक जाते हैं।

     

    भगवान शिव की महिमा भी कुछ ऐसी ही है। वे देवों के देव हैं, महादेव हैं, भोलेनाथ हैं। संसार उन्हें अनेक नामों से पुकारता है, परंतु शिव अपने भक्त के हृदय में छिपे प्रेम को देखते हैं।

     

    ऐसी ही एक अद्भुत कथा है कन्नप्पा की—एक ऐसे वनवासी युवक की, जिसे आरंभ में न पूजा-पाठ पर विश्वास था, न देवी-देवताओं पर। उसके लिए पत्थर केवल पत्थर था। लेकिन जब उसके जीवन में भगवान शिव की कृपा का एक ऐसा क्षण आया, जिसने उसके हृदय को भीतर तक बदल दिया, तब वही कन्नप्पा शिव का ऐसा अनन्य भक्त बन गया कि उसने अपने आराध्य के लिए अपनी दोनों आँखें तक अर्पित कर दीं।

     

    यह कथा केवल भक्ति की नहीं है। यह कथा बताती है कि भगवान तक पहुँचने का मार्ग बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि निर्मल हृदय से होकर जाता |

     

    बहुत समय पहले दक्षिण भारत के घने वनों में एक वनवासी युवक रहता था। उसका नाम था कन्नप्पा।

     

    वह अत्यंत साहसी, सरल और निडर था। उसका जीवन जंगलों के बीच बीतता था। वह शिकार करता, अपने परिवार और साथियों के साथ रहता और प्रकृति को ही अपना संसार मानता था।

     

    कन्नप्पा ने बचपन से किसी मंदिर में बैठकर मंत्रों का जाप नहीं किया था। उसने वेद-पुराण नहीं पढ़े थे। पूजा की विधि भी वह नहीं जानता था।

     

    जब कभी वह किसी मंदिर में भगवान की मूर्ति देखता, तो उसके मन में यही विचार आता—

     

    “यह तो पत्थर है। इसमें भगवान कहाँ रहते हैं?”

     

    उसका विश्वास था कि संसार में जो कुछ दिखाई देता है, वही सत्य है। वह देवी-देवताओं की पूजा को भी केवल मनुष्य की कल्पना मानता था।

     

    लेकिन मनुष्य कितना भी अपने विचारों पर अडिग क्यों न हो, भगवान की लीला कब और किस रूप में उसके जीवन में प्रवेश कर जाए, कोई नहीं जानता।

     

    कन्नप्पा के जीवन में भी वह समय आने वाला था।

     

    —

     

     

     

    एक दिन कन्नप्पा जंगल में शिकार करते-करते बहुत दूर निकल गया। उसके साथ कोई नहीं था।

     

    जंगल की नीरवता के बीच अचानक उसकी दृष्टि एक ऐसे स्थान पर पड़ी, जहाँ एक शिवलिंग स्थापित था।

     

    वह कुछ क्षण तक उसे देखता रहा।

     

    उसके मन में कोई विशेष श्रद्धा नहीं थी। वह आगे बढ़ने ही वाला था कि अचानक उसके भीतर एक अजीब-सी अनुभूति हुई।

     

    वह शिवलिंग के पास जाकर खड़ा हो गया।

     

    उसने उसे ध्यान से देखा और मन में कहा—

     

    “यदि तू सच में भगवान है, तो तू यहाँ अकेला क्यों पड़ा है? तेरा ध्यान कौन रखता है?”

     

    उस प्रश्न का उत्तर उसे कहीं से नहीं मिला।

     

    लेकिन उस दिन के बाद कन्नप्पा के भीतर कुछ बदलने लगा।

     

    वह रोज उस शिवलिंग के पास जाने लगा।

     

    उसे पूजा की विधि नहीं आती थी। उसे यह भी नहीं पता था कि भगवान को क्या चढ़ाया जाता है और क्या नहीं।

     

    लेकिन उसे एक बात आती थी—प्रेम।

     

    वह अपने मन से जो सबसे अच्छा समझता, वही शिवलिंग पर अर्पित कर देता।

     

     

     

    कन्नप्पा शिकार करके लौटता तो अपने साथ लाया हुआ भोजन शिवलिंग के सामने रख देता।

     

    वह अपने पात्र में जल भरकर लाता।

     

    कभी-कभी उसके पास जल रखने का कोई पात्र नहीं होता, तो वह अपने मुख में जल भरकर ले आता और शिवलिंग पर अर्पित कर देता।

     

    उसे यह नहीं मालूम था कि मंदिर की मर्यादा क्या है।

     

    उसे यह भी नहीं मालूम था कि भगवान को क्या स्वीकार्य है और क्या नहीं।

     

    वह तो बस यही सोचता—

     

    “मेरे पास जो कुछ है, उसमें सबसे अच्छा मैं अपने भगवान को दूँगा।”

     

    उसकी पूजा देखकर कोई विद्वान शायद कहता कि यह पूजा की विधि नहीं है।

     

    परंतु भगवान शिव उसके बाहरी कर्म नहीं, उसके भीतर का भाव देख रहे थे।

     

    कन्नप्पा की आँखों में छल नहीं था।

     

    उसके मन में स्वार्थ नहीं था।

     

    उसकी भक्ति में दिखावा नहीं था।

     

    वह भगवान से कुछ माँगता भी नहीं था।

     

    वह तो बस इतना जानता था—

     

    “यह मेरे भगवान हैं और मुझे इनकी रक्षा करनी है।”

     

    कन्नप्पा की यही भावना धीरे-धीरे उसके जीवन का सबसे बड़ा सत्य बन गई।

     

    —

     

    एक दिन भगवान ने लीला रची

     

    एक दिन कन्नप्पा हमेशा की तरह शिवलिंग के पास पहुँचा।

     

    लेकिन उस दिन उसने कुछ ऐसा देखा, जिससे उसका हृदय काँप उठा।

     

    उसे लगा कि शिवलिंग की एक आँख से रक्त बह रहा है।

     

    कन्नप्पा घबरा गया।

     

    वह शिवलिंग के पास दौड़कर पहुँचा और बोला—

     

    “मेरे भगवान! आपको चोट कैसे लग गई?”

     

    उसने चारों ओर देखा।

     

    वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे।

     

    उसने अपने हाथों से उस स्थान को साफ करने का प्रयास किया। उसने अपनी पूरी शक्ति से भगवान की सेवा करने की कोशिश की।

     

    लेकिन रक्त बहना बंद नहीं हुआ।

     

    कन्नप्पा की आँखों में आँसू आ गए।

     

    वह व्याकुल होकर बोला—

     

    “आपको दर्द हो रहा है और मैं कुछ नहीं कर पा रहा हूँ!”

     

    उसके लिए उस समय शिवलिंग कोई पत्थर नहीं था।

     

    वह उसके लिए जीवित भगवान थे।

     

    उसका अपना कोई प्रिय व्यक्ति घायल होता, तो वह जितना दुखी होता, उससे कहीं अधिक वह अपने शिव के लिए दुखी हो उठा।

     

    अचानक उसके मन में एक विचार आया।

     

    “यदि भगवान की आँख घायल है, तो मैं अपनी आँख दे सकता हूँ।”

     

    विचार आते ही उसने देर नहीं की।

     

    —

     

    कन्नप्पा ने दे दी अपनी पहली आँख

     

    कन्नप्पा ने अपनी आँख निकालकर भगवान की उस आँख के स्थान पर रख दी।

     

    उस क्षण वहाँ उपस्थित लोगों के हृदय काँप उठे।

     

    जो लोग दूर खड़े यह सब देख रहे थे, वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि यह मनुष्य क्या कर रहा है।

     

    लेकिन कन्नप्पा के लिए यह कोई बलिदान नहीं था।

     

    वह तो अपने भगवान का दर्द दूर कर रहा था।

     

    और सच कहा जाए तो सच्ची भक्ति में भक्त यह नहीं सोचता कि—

     

    “मैंने भगवान के लिए इतना बड़ा त्याग कर दिया।”

     

    वह तो केवल इतना सोचता है—

     

    “मेरे भगवान को कष्ट नहीं होना चाहिए।”

     

    कन्नप्पा ने देखा कि एक आँख का रक्त रुक गया।

     

    उसके मन में प्रसन्नता हुई।

     

    लेकिन तभी उसकी दृष्टि शिवलिंग की दूसरी आँख पर गई।

     

    वहाँ भी रक्त दिखाई दे रहा था।

     

    कन्नप्पा का हृदय फिर से टूट गया।

     

    उसने सोचा—

     

    “मेरे भगवान की दूसरी आँख भी घायल है।”

     

    अब उसके पास देने के लिए अपनी दूसरी आँख थी।

     

    लेकिन समस्या यह थी कि एक आँख वह पहले ही दे चुका था।

     

    दूसरी आँख निकालने के बाद वह देख नहीं पाएगा कि उसे भगवान की आँख के स्थान पर कहाँ रखना है।

     

    कन्नप्पा ने एक उपाय सोचा।

     

    उसने अपना पैर शिवलिंग की उस आँख के पास रख दिया, ताकि उसे स्थान का पता रहे।

     

    फिर वह अपनी दूसरी आँख निकालने के लिए तैयार हो गया।

     

    वह अपने भगवान के लिए अपनी अंतिम दृष्टि भी अर्पित करने वाला था।

     

    उस क्षण उसके मन में न मृत्यु का भय था, न अंधकार का भय।

     

    उसे केवल एक चिंता थी—

     

    “मेरे भगवान की आँख का दर्द दूर हो जाए।”

     

    —

     

    तभी गूँज उठी भगवान शिव की आवाज

     

    जैसे ही कन्नप्पा अपनी दूसरी आँख अर्पित करने वाला था, अचानक वहाँ एक दिव्य प्रकाश फैल गया।

     

    पूरा वातावरण अद्भुत तेज से भर उठा।

     

    कन्नप्पा की भक्ति की परीक्षा पूरी हो चुकी थी।

     

    स्वयं भगवान शिव उसके सामने प्रकट हो गए।

     

    उनके साथ माता पार्वती भी थीं।

     

    भगवान शिव ने आगे बढ़कर कन्नप्पा का हाथ पकड़ लिया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “बस, कन्नप्पा! अब और नहीं।”

     

    कन्नप्पा ने भगवान की आवाज सुनी तो उसका हृदय आनंद से भर गया।

     

    वह भगवान को देखने में असमर्थ था, क्योंकि उसकी एक आँख जा चुकी थी और दूसरी आँख अर्पित करने वाला था।

     

    लेकिन उसके भीतर ऐसा प्रकाश जाग चुका था, जो संसार की आँखों से कहीं अधिक उज्ज्वल था।

     

    भगवान शिव ने अपने भक्त को हृदय से लगा लिया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “कन्नप्पा, तुमने मुझे वह दे दिया, जो संसार में सबसे कठिन है—अपना सर्वस्व।”

     

    “तुम्हें विधि नहीं आती थी, मंत्र नहीं आते थे, शास्त्रों का ज्ञान नहीं था। लेकिन तुम्हारे हृदय में जो प्रेम था, वह निर्मल था।”

     

    “तुमने मुझे पत्थर समझकर नहीं, अपने जीवित स्वामी और अपने प्रियतम के रूप में प्रेम किया।”

     

    माता पार्वती भी कन्नप्पा की भक्ति देखकर प्रसन्न हुईं।

     

    भगवान शिव ने अपनी कृपा से कन्नप्पा की आँखें उसे लौटा दीं।

     

    कन्नप्पा ने पहली बार भगवान शिव के दिव्य स्वरूप का दर्शन किया।

     

    उस क्षण उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    जिस युवक ने कभी कहा था—

     

    “भगवान कहाँ होते हैं? यह तो केवल पत्थर है।”

     

    आज वही युवक भगवान के सामने खड़ा था।

     

    उसने हाथ जोड़कर कहा—

     

    “प्रभु! मुझे संसार में और कुछ नहीं चाहिए। मुझे बस अपने चरणों में स्थान दीजिए।”

     

    भगवान शिव मुस्कुराए।

     

    उन्होंने कन्नप्पा को अपना अनन्य भक्त स्वीकार किया।

     

    कन्नप्पा की भक्ति इतनी महान मानी गई कि उन्हें कन्नप्पा नयनार के रूप में शिव के महान भक्तों में स्मरण किया जाता है।

     

    —

     

    कन्नप्पा ने संसार को क्या सिखाया?

     

    कन्नप्पा की कथा हमें एक बहुत गहरा संदेश देती है।

     

    भक्ति केवल मंदिर में घंटी बजाने का नाम नहीं है।

     

    भक्ति केवल माथे पर तिलक लगाने का नाम नहीं है।

     

    भक्ति केवल बड़े-बड़े मंत्र बोलने का नाम नहीं है।

     

    भक्ति का अर्थ है—

     

    अपने आराध्य के प्रति ऐसा प्रेम, जिसमें स्वयं से पहले भगवान का सुख दिखाई दे।

     

    कन्नप्पा को पूजा की विधि नहीं आती थी, लेकिन उसे प्रेम करना आता था।

     

    उसे संस्कृत के मंत्र नहीं आते थे, लेकिन उसके हृदय की भाषा भगवान समझते थे।

     

    उसे शास्त्रों का ज्ञान नहीं था, लेकिन उसने समर्पण का सबसे बड़ा शास्त्र अपने जीवन से लिख दिया।

     

    यही भगवान शिव की महिमा है।

     

    वे अपने भक्त के प्रेम को देखते हैं।

     

    कहा जाता है कि भगवान को पाने के लिए मनुष्य को बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं होती। यदि हृदय सच्चा हो, तो भगवान वहीं मिल जाते हैं जहाँ प्रेम होता है।

     

    —

     

    श्रीकालहस्ती की पावन भूमि

     

    कन्नप्पा की यह कथा दक्षिण भारत के प्रसिद्ध श्रीकालहस्ती से जुड़ी हुई मानी जाती है। वहाँ भगवान शिव का प्रसिद्ध श्रीकालहस्ती मंदिर स्थित है और कन्नप्पा नयनार की भक्ति की स्मृति आज भी श्रद्धा से जुड़ी हुई है।

     

    लोक-परंपरा में यह भी कहा जाता है कि भगवान शिव ने कन्नप्पा की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे ऐसा वरदान दिया कि जो भक्त पहले कन्नप्पा के दर्शन और फिर भगवान शिव के दर्शन करेगा, उसकी मनोकामना पूर्ण होगी।

     

    यह केवल एक वरदान की कथा नहीं है।

     

    इसके पीछे एक बहुत सुंदर भाव छिपा है—

     

    भगवान तक पहुँचने से पहले उस भक्ति को प्रणाम करो, जिसने भगवान को भी प्रसन्न कर दिया।

     

    —

     

    भक्ति का सबसे बड़ा रहस्य

     

    कन्नप्पा की कहानी का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि उसकी भक्ति किसी डर से पैदा नहीं हुई थी।

     

    उसने भगवान को इसलिए नहीं माना कि उसे स्वर्ग चाहिए।

     

    उसने भगवान को इसलिए नहीं माना कि उसे धन चाहिए।

     

    उसने भगवान को इसलिए नहीं माना कि संसार उसे महान भक्त कहे।

     

    उसने भगवान को इसलिए माना क्योंकि उसके हृदय में प्रेम जाग गया था।

     

    और जब प्रेम सच्चा हो जाता है, तब भक्त और भगवान के बीच कोई दूरी नहीं रहती।

     

    कन्नप्पा ने भगवान से कभी नहीं कहा—

     

    “प्रभु, मेरी इच्छा पूरी करो।”

     

    उसने केवल यह कहा—

     

    “प्रभु, आपको दर्द नहीं होना चाहिए।”

     

    यही भक्ति की पराकाष्ठा है।

     

    जहाँ “मैं” समाप्त हो जाता है और केवल “मेरे भगवान” रह जाते हैं।

     

    —

     

    अंत में एक बात

     

    कन्नप्पा की कथा हमें यह नहीं सिखाती कि हमें अपने शरीर को कष्ट देना चाहिए या किसी बाहरी कर्म की नकल करनी चाहिए।

     

    यह कथा हमें उसके पीछे छिपी भावना समझाती है—

     

    सच्ची भक्ति में अहंकार नहीं होता।

     

    जिस दिन मनुष्य अपने अहंकार को भगवान के चरणों में रख देता है, उसी दिन उसके भीतर भक्ति का जन्म होता है।

     

    कन्नप्पा ने अपनी आँखें अर्पित की थीं, लेकिन वास्तव में उसने केवल आँखें नहीं दी थीं।

     

    उसने अपना अहंकार, अपना स्वार्थ, अपना भय और अपना पूरा जीवन भगवान शिव को समर्पित कर दिया था।

     

    और शायद इसी कारण उसकी भक्ति आज भी लोगों के हृदय को छूती है।

     

    क्योंकि संसार में बहुत लोग भगवान से कुछ माँगते हैं।

     

    लेकिन कन्नप्पा वह भक्त था जिसने भगवान से कुछ माँगा नहीं—

     

    अपना सब कुछ भगवान को दे दिया।

     

    और जब भक्त अपना सब कुछ भगवान को दे देता है, तब भगवान भी अपने भक्त को अपना बना लेते हैं।

     

    यही कन्नप्पा की कहानी है।

     

    यही शिव की महिमा है।

     

    और यही सच्ची भक्ति का सबसे सुंदर संदेश है—

     

    “भगवान को पाने के लिए हृदय में सच्चा प्रेम चाहिए; क्योंकि जहाँ निष्कपट प्रेम होता है, वहाँ स्वयं महादेव विराजमान होते हैं।”

     

    हर हर महादेव।❤️🙏

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • आखिरी ट्रेन का यात्री भाग 5

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    अंधेरा इतना गहरा था कि कबीर को अपने हाथ भी दिखाई नहीं दे रहे थे।

     

    उसके कानों में सिर्फ ट्रेन के पहियों की आवाज़ थी।

     

    छुक…

     

    छुक…

     

    छुक…

     

    रोहित उसके पास था।

     

    मीरा कहीं दिखाई नहीं दे रही थी।

     

    “मीरा!”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    “रोहित?”

     

    कोई आवाज़ नहीं।

     

    कबीर अकेला था।

     

    फिर सामने एक हल्की रोशनी दिखाई दी।

     

    वह धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ा।

     

    एक दरवाज़ा।

     

    दरवाज़े के ऊपर लिखा था—

     

    आखिरी स्टेशन।

     

    कबीर ने दरवाज़ा खोला।

     

    सामने एक प्लेटफॉर्म था।

     

    लेकिन यह देवगढ़ स्टेशन नहीं था।

     

    प्लेटफॉर्म पर हजारों पुराने टिकट पड़े थे।

     

    दीवारों पर सैकड़ों तस्वीरें थीं।

     

    हर तस्वीर में कोई न कोई यात्री था।

     

    कुछ लोग रो रहे थे।

     

    कुछ चिल्ला रहे थे।

     

    और कुछ कैमरे की तरफ देखकर मुस्कुरा रहे थे।

     

    कबीर धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    अचानक पीछे से मीरा की आवाज़ आई—

     

    “भैया।”

     

    कबीर ने पलटकर देखा।

     

    मीरा खड़ी थी।

     

    उसके साथ रघुवीर भी था।

     

    लेकिन रोहित नहीं था।

     

    “रोहित कहाँ है?”

     

    मीरा ने नीचे देखा।

     

    “वह वापस चला गया।”

     

    कबीर ने राहत की साँस ली।

     

    “तो हम भी वापस जा सकते हैं?”

     

    मीरा ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “कैसे?”

     

    मीरा ने सामने एक पुराना रेलवे सिग्नल दिखाया।

     

    “उसे लाल से हरा करना होगा।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “बस इतना?”

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “इसके लिए किसी एक को यहाँ रहना होगा।”

     

    कबीर चुप हो गया।

     

    रघुवीर आगे आया।

     

    “इस बार मैं रहूँगा।”

     

    मीरा ने अपने पिता की तरफ देखा।

     

    “बहुत देर कर दी आपने।”

     

    रघुवीर की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    मीरा कुछ नहीं बोली।

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “लेकिन इस ट्रेन को खत्म कैसे करेंगे?”

     

    रघुवीर ने कहा—

     

    “ट्रेन किसी इंजन से नहीं चलती।”

     

    “फिर?”

     

    “यह डर से चलती है।”

     

    कबीर समझ नहीं पाया।

     

    रघुवीर ने कहा—

     

    “जब कोई इंसान डरकर इसकी बात मानता है, ट्रेन मजबूत होती है। जब कोई इसके सामने खड़ा होकर कहता है कि उसे डर नहीं लगता, ट्रेन कमजोर होने लगती है।”

     

    कबीर ने सामने देखा।

     

    काली ट्रेन प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी।

     

    उसकी खिड़कियों से दर्जनों चेहरे उसे देख रहे थे।

     

    फिर वही बिना चेहरे वाली आकृति ट्रेन से बाहर निकली।

     

    वह धीरे-धीरे कबीर की तरफ बढ़ी।

     

    उसकी लाल आँखें चमक रही थीं।

     

    उसने भारी आवाज़ में कहा—

     

    “तुम वापस नहीं जा सकते।”

     

    कबीर का शरीर काँपने लगा।

     

    लेकिन उसने खुद को संभाला।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुमने मेरा टिकट स्वीकार किया।”

     

    कबीर ने अपनी जेब से टिकट निकाला।

     

    उस पर अब लिखा था—

     

    यात्री — कबीर शर्मा

     

    लेकिन नीचे एक नई लाइन दिखाई दी—

     

    “स्थिति — मृत।”

     

    कबीर ने टिकट को देखा।

     

    फिर उस आकृति की तरफ।

     

    “अगर मैं मर चुका हूँ…”

     

    उसने टिकट फाड़ दिया।

     

    “…तो मैं डर क्यों रहा हूँ?”

     

    आकृति कुछ पल के लिए स्थिर हो गई।

     

    उसके शरीर से काला धुआँ निकलने लगा।

     

    कबीर ने जोर से कहा—

     

    “मैं तुम्हारा यात्री नहीं हूँ!”

     

    ट्रेन हिलने लगी।

     

    सभी खिड़कियाँ काँपने लगीं।

     

    अंदर बैठे यात्रियों की चीखें सुनाई देने लगीं।

     

    आकृति पीछे हट गई।

     

    कबीर ने और जोर से कहा—

     

    “मैं तुम्हें स्वीकार नहीं करता!”

     

    ट्रेन की दीवारों में दरारें पड़ने लगीं।

     

    मीरा चिल्लाई—

     

    “सिग्नल!”

     

    कबीर दौड़कर सिग्नल के पास पहुँचा।

     

    लेकिन सिग्नल तक पहुँचने से पहले जमीन पर दर्जनों हाथ निकल आए।

     

    उन्होंने कबीर के पैर पकड़ लिए।

     

    वही पुराने यात्री।

     

    वे सभी उसे नीचे खींच रहे थे।

     

    “हमें छोड़कर मत जाओ!”

     

    “हमें भी साथ ले चलो!”

     

    “हम अकेले नहीं रहना चाहते!”

     

    कबीर ने पूरी ताकत से खुद को छुड़ाने की कोशिश की।

     

    तभी रघुवीर दौड़कर आया।

     

    उसने उन हाथों को रोक लिया।

     

    “भागो!”

     

    कबीर ने सिग्नल पकड़ लिया।

     

    वह जाम था।

     

    उसने पूरी ताकत लगाई।

     

    सिग्नल हिला।

     

    एक बार।

     

    दो बार।

     

    फिर अचानक—

     

    क्लिक!

     

    लाल बत्ती हरी हो गई।

     

    पूरे स्टेशन में एक भयानक चीख गूँज उठी।

     

    ट्रेन के पहिए अपने आप घूमने लगे।

     

    काली आकृति चीखती हुई ट्रेन की तरफ खिंचने लगी।

     

    “नहीं!”

     

    उसने कबीर की तरफ हाथ बढ़ाया।

     

    लेकिन तभी मीरा उसके सामने आ गई।

     

    “अब यह तुम्हारा घर नहीं है।”

     

    आकृति ने मीरा को पकड़ने की कोशिश की।

     

    रघुवीर बीच में आ गया।

     

    “मेरी बेटी को छोड़ दो!”

     

    एक तेज़ रोशनी चमकी।

     

    और अगले ही पल रघुवीर और वह आकृति दोनों गायब हो गए।

     

    ट्रेन भी धीरे-धीरे धुएँ में बदलने लगी।

     

    मीरा कबीर की तरफ देखने लगी।

     

    “अब जाओ।”

     

    “और तुम?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “मेरा स्टेशन आ गया है।”

     

    कबीर ने उसका हाथ पकड़ना चाहा।

     

    लेकिन उसका हाथ हवा से गुजर गया।

     

    मीरा की आँखों से आँसू निकल रहे थे।

     

    “भैया… अगर कभी रात में कोई ट्रेन तुम्हारा नाम लेकर बुलाए…”

     

    “हाँ?”

     

    “पीछे मत देखना।”

     

    इतना कहकर मीरा भी गायब हो गई।

     

    अचानक कबीर ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    जब उसने आँखें खोलीं—

     

    वह देवगढ़ स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर पड़ा था।

     

    सुबह हो चुकी थी।

     

    सूरज निकल रहा था।

     

    रोहित उसके पास बैठा था।

     

    “कबीर!”

     

    कबीर ने उसे देखा।

     

    “तू ठीक है?”

     

    रोहित ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ। लेकिन तू पूरी रात गायब था।”

     

    कबीर ने घड़ी देखी।

     

    सुबह के 7:30 बजे थे।

     

    उसने राहत की साँस ली।

     

    “ट्रेन खत्म हो गई?”

     

    रोहित ने कहा—

     

    “कौन-सी ट्रेन?”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुझे कुछ याद नहीं?”

     

    रोहित ने सिर हिलाया।

     

    कबीर ने सब कुछ बताना शुरू किया।

     

    लेकिन तभी उसकी नजर प्लेटफॉर्म की दीवार पर पड़ी।

     

    वहाँ एक नया पोस्टर लगा था।

     

    “देवगढ़ स्टेशन पर नया प्लेटफॉर्म नंबर 4 अगले महीने शुरू होगा।”

     

    कबीर ने पोस्टर को देखा।

     

    उसके नीचे किसी ने लाल स्याही से लिखा था—

     

    “12:15 — पहली ट्रेन।”

     

    कबीर का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “रोहित…”

     

    “क्या?”

     

    “चल यहाँ से।”

     

    दोनों स्टेशन से बाहर निकलने लगे।

     

    तभी पीछे से ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

     

    फूँऽऽऽऽऽ!

     

    कबीर रुक गया।

     

    रोहित ने कहा—

     

    “पीछे मत देखना।”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुझे कैसे पता?”

     

    रोहित कुछ सेकंड चुप रहा।

     

    फिर धीरे से मुस्कुराया।

     

    उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    “क्योंकि मैं भी उस ट्रेन में जा चुका हूँ।”

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    रोहित ने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया।

     

    उसकी हथेली पर एक पुराना टिकट था।

     

    यात्री — रोहित वर्मा

     

    सीट — 13

     

    गंतव्य — देवगढ़

     

    कबीर के चेहरे से सारी उम्मीद खत्म हो गई।

     

    दूर स्टेशन की घड़ी ने 12:15 बजाए।

     

    लेकिन सुबह के 7:30 बजे।

     

    और उसी समय प्लेटफॉर्म नंबर 4 पर एक ट्रेन आकर रुकी।

     

    दरवाज़ा खुला।

     

    अंदर से मीरा की आवाज़ आई—

     

    “भैया… इस बार अकेले मत आना।”

     

    ट्रेन की सारी खिड़कियों में एक साथ चेहरे दिखाई दिए।

     

    उनमें एक चेहरा कबीर का था।

     

    दूसरा रघुवीर का।

     

    तीसरा मीरा का।

     

    और चौथा—

     

    रोहित का।

     

    कबीर ने आखिरी बार ट्रेन की तरफ देखा।

     

    फिर अंधेरे में एक बोर्ड चमका—

     

    “आखिरी ट्रेन कभी खत्म नहीं होती।”

     

    और ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ गई।

     

    समाप्त।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • आखिरी ट्रेन का यात्री भाग 4

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    “अगला यात्री… कबीर शर्मा…”

     

    कमरे में गूँजती आवाज़ के साथ ही कबीर के पैरों के नीचे की जमीन गायब हो गई।

     

    वह और रोहित किसी गहरी खाई में गिरने लगे।

     

    कबीर ने चीखते हुए रोहित का हाथ पकड़ लिया।

     

    कुछ सेकंड तक दोनों नीचे गिरते रहे।

     

    फिर अचानक—

     

    धड़ाम!

     

    कबीर किसी कठोर चीज़ पर आकर गिरा।

     

    उसने आँखें खोलीं।

     

    वह एक ट्रेन के अंदर था।

     

    रोहित उसके पास पड़ा था।

     

    दोनों उठने की कोशिश करने लगे।

     

    कबीर ने चारों तरफ देखा।

     

    वह वही ट्रेन थी।

     

    वही काली ट्रेन।

     

    वही पीली रोशनी।

     

    वही पुराने यात्री।

     

    लेकिन इस बार ट्रेन चल रही थी।

     

    खिड़की के बाहर कोई स्टेशन नहीं था।

     

    सिर्फ घना अंधेरा।

     

    रोहित ने काँपते हुए पूछा—

     

    “हम कहाँ हैं?”

     

    कबीर ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसकी नजर सीट नंबर 13 पर गई।

     

    सीट खाली थी।

     

    फिर पीछे से आवाज़ आई—

     

    “कबीर…”

     

    वह मुड़ा।

     

    वही बूढ़ा आदमी सामने खड़ा था।

     

    रघुवीर सिंह।

     

    लेकिन अब उसका चेहरा बूढ़ा नहीं था।

     

    वह लगभग तीस साल का दिखाई दे रहा था।

     

    “आपने हमें यहाँ क्यों बुलाया?”

     

    रघुवीर ने कहा—

     

    “मैंने नहीं बुलाया।”

     

    “तो कौन?”

     

    रघुवीर ने ट्रेन के आखिरी डिब्बे की ओर देखा।

     

    “वह।”

     

    “कौन वह?”

     

    रघुवीर ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसने कबीर को एक पुराना कागज़ दिया।

     

    “इसे पढ़ो।”

     

    कागज़ पर रघुवीर की लिखावट थी।

     

    “मैंने अपनी बेटी को नहीं मारा।”

     

    कबीर ने अगली लाइन पढ़ी।

     

    “मैंने उसे बचाने की कोशिश की थी।”

     

    फिर अचानक ट्रेन जोर से हिली।

     

    सभी यात्री एक साथ अपनी सीटों पर सीधे बैठ गए।

     

    उनकी आँखें बंद थीं।

     

    रघुवीर ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “जब तक ट्रेन रुक न जाए, किसी यात्री से बात मत करना।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वे यात्री नहीं हैं।”

     

    रोहित ने धीरे से पूछा—

     

    “तो ये लोग कौन हैं?”

     

    रघुवीर ने कहा—

     

    “ये वे लोग हैं जिन्होंने अपनी जिंदगी का आखिरी सफर पूरा नहीं किया।”

     

    अचानक सामने बैठे एक आदमी ने आँखें खोल दीं।

     

    उसने कबीर को देखा।

     

    फिर मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें भी देर हो गई।”

     

    रघुवीर ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

     

    “चुप!”

     

    आदमी ने अपना सिर झुका लिया।

     

    लेकिन कुछ ही सेकंड बाद सभी यात्रियों ने अपनी आँखें खोल दीं।

     

    एक साथ।

     

    तेरहों की आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    कबीर ने गिनना शुरू किया।

     

    एक…

     

    दो…

     

    तीन…

     

    बारह…

     

    वह रुक गया।

     

    सिर्फ बारह यात्री थे।

     

    तेरहवीं सीट खाली थी।

     

    सीट नंबर 13।

     

    रघुवीर ने कहा—

     

    “वह सीट हमेशा खाली रहती है।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि जिस दिन कोई उस पर बैठता है, ट्रेन उसे अपना बना लेती है।”

     

    तभी ट्रेन की लाइटें झपकने लगीं।

     

    पीली रोशनी।

     

    अंधेरा।

     

    पीली रोशनी।

     

    अंधेरा।

     

    हर बार रोशनी वापस आती तो सीट नंबर 13 पर कोई अलग चीज़ दिखाई देती।

     

    पहली बार खाली।

     

    दूसरी बार एक लाल फ्रॉक।

     

    तीसरी बार एक छोटी बच्ची।

     

    मीरा।

     

    वह सीट पर बैठी थी।

     

    कबीर ने उसे देखते ही कहा—

     

    “मीरा!”

     

    रघुवीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “उससे बात मत करो!”

     

    लेकिन मीरा ने खुद कबीर की तरफ देखा।

     

    “भैया… पापा झूठ बोल रहे हैं।”

     

    रघुवीर का चेहरा बदल गया।

     

    “मीरा!”

     

    बच्ची ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आपने मुझे बंद किया था।”

     

    कबीर ने रघुवीर की तरफ देखा।

     

    “क्या यह सच है?”

     

    रघुवीर ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “हाँ।”

     

    रोहित ने गुस्से में पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    रघुवीर की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “क्योंकि उस रात मुझे पता चल गया था कि ट्रेन क्या चाहती है।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    “एक जीवित बच्चा।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    रघुवीर ने आगे कहा—

     

    “हर साल 15 अगस्त की रात यह ट्रेन आती थी। पहले यह सिर्फ एक यात्री ले जाती थी। फिर हर साल इसकी भूख बढ़ती गई।”

     

    “तो मीरा?”

     

    “मैंने उसे ट्रेन से बचाने के लिए पुराने कमरे में छिपा दिया था।”

     

    कबीर ने कहा—

     

    “लेकिन वह गायब कैसे हुई?”

     

    रघुवीर की आवाज़ टूट गई।

     

    “क्योंकि ट्रेन मेरे घर तक पहुँच गई।”

     

    मीरा ने धीरे से कहा—

     

    “पापा ने दरवाज़ा खोला था।”

     

    रघुवीर ने सिर झुका लिया।

     

    “मैं डर गया था।”

     

    “और फिर?”

     

    “ट्रेन ने मीरा को ले लिया।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “फिर आपने क्या किया?”

     

    रघुवीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैंने ट्रेन से सौदा किया।”

     

    “कैसा सौदा?”

     

    “मैंने कहा कि अगर वह मीरा को वापस कर देगी, तो मैं हर साल एक यात्री उसे दे दूँगा।”

     

    रोहित चिल्लाया—

     

    “आपने लोगों को मरने के लिए भेजा?”

     

    रघुवीर ने कुछ नहीं कहा।

     

    यात्रियों के चेहरे धीरे-धीरे बदलने लगे।

     

    उनमें से एक आदमी ने कहा—

     

    “हममें से किसी ने टिकट नहीं खरीदा था।”

     

    दूसरे ने कहा—

     

    “हमारे नाम उसने चुने थे।”

     

    तीसरे ने कहा—

     

    “हर साल एक।”

     

    कबीर को अचानक सब समझ आने लगा।

     

    यह ट्रेन यात्रियों को नहीं चुनती थी।

     

    कोई उसे यात्री देता था।

     

    और वह व्यक्ति था—

     

    रघुवीर।

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “तो इस बार आपने मुझे चुना?”

     

    रघुवीर ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “फिर कौन?”

     

    रघुवीर ने ट्रेन के आखिरी डिब्बे की तरफ देखा।

     

    “इस बार उसने खुद चुना है।”

     

    अचानक ट्रेन के पीछे से एक जोरदार आवाज़ आई।

     

    धड़ाम!

     

    दरवाज़ा खुल गया।

     

    काला धुआँ पूरे डिब्बे में फैलने लगा।

     

    मीरा सीट से उतर गई।

     

    उसने कबीर का हाथ पकड़ लिया।

     

    “भैया, हमें भागना होगा।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “कहाँ?”

     

    “ट्रेन के इंजन तक।”

     

    “क्यों?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “वहीं उसकी मौत है।”

     

    कबीर ने चौंककर पूछा—

     

    “किसकी?”

     

    मीरा ने पीछे देखा।

     

    अंधेरे में एक विशाल आकृति खड़ी थी।

     

    उसका शरीर इंसान जैसा था।

     

    लेकिन चेहरा नहीं था।

     

    सिर्फ दो लाल आँखें।

     

    मीरा ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “ट्रेन की।”

     

    रघुवीर ने चिल्लाकर कहा—

     

    “भागो!”

     

    कबीर, रोहित और मीरा आगे की ओर दौड़े।

     

    लेकिन पीछे से यात्रियों की आवाज़ आने लगी।

     

    “हमें भी साथ ले चलो!”

     

    कबीर रुका।

     

    उसने पीछे देखा।

     

    बारहों यात्री अपनी सीटों से उठ चुके थे।

     

    वे सभी अब इंसानों जैसे नहीं दिख रहे थे।

     

    उनके शरीर से काला धुआँ निकल रहा था।

     

    उनमें से एक ने हाथ बढ़ाया।

     

    “हमें इस ट्रेन से बाहर निकालो…”

     

    कबीर ने मीरा की तरफ देखा।

     

    मीरा रो रही थी।

     

    “भैया… अगर उन्होंने हमें पकड़ लिया तो हम भी हमेशा के लिए यहीं रह जाएँगे।”

     

    तीनों इंजन की ओर दौड़े।

     

    ट्रेन के डिब्बे एक के बाद एक पार करते हुए वे सबसे आगे पहुँचे।

     

    इंजन के दरवाज़े पर वही काली आँखों वाला आदमी खड़ा था।

     

    कबीर रुक गया।

     

    वह आदमी धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ा।

     

    फिर उसने अपना चेहरा बदला।

     

    पहले वह बूढ़ा बना।

     

    फिर मीरा।

     

    फिर रोहित।

     

    और अंत में—

     

    कबीर।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तुम्हें पता है असली कबीर कौन है?”

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    वह नकली कबीर हँसने लगा।

     

    “तुम्हें कैसे पता कि तुम असली हो?”

     

    अचानक रोहित ने कबीर का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मेरी बात सुन।”

     

    “क्या?”

     

    “अगर हम तीनों यहाँ हैं… तो बाहर कौन है?”

     

    कबीर के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    क्योंकि उसी क्षण ट्रेन की खिड़की से बाहर उसे प्लेटफॉर्म दिखाई दिया।

     

    वहाँ एक आदमी खड़ा था।

     

    वह बिल्कुल कबीर जैसा दिख रहा था।

     

    और उसके हाथ में कैमरा था।

     

    वह ट्रेन की तस्वीर ले रहा था।

     

    फिर उसने कैमरा नीचे किया और सीधे खिड़की की तरफ देखा।

     

    कबीर ने पहचान लिया।

     

    वह वही कबीर था जो उसे पहले तस्वीरों में दिखाई देता था।

     

    वह मुस्कुराया।

     

    और उसके हाथ में एक टिकट था।

     

    सीट नंबर 13।

     

    मीरा ने कबीर से कहा—

     

    “भैया… वह असली है।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “तो मैं कौन हूँ?”

     

    मीरा ने धीरे से उसकी तरफ देखा।

     

    उसकी आँखों में आँसू थे।

     

    “आप… इस ट्रेन के अगले यात्री हो।”

     

    और तभी ट्रेन की सीटी बजी।

     

    फूँऽऽऽऽऽ!

     

    सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

     

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • आखिरी ट्रेन का यात्री भाग 3

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

     

    सुबह के लगभग सात बजे कबीर देवगढ़ स्टेशन से बाहर निकला, लेकिन उसके कदम आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रहे थे।

     

    उसके हाथ में अभी भी वही तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में वह खुद प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर बैठा था। उसके पीछे वही रहस्यमयी ट्रेन खड़ी थी और खिड़की के अंदर लाल कपड़े पहने एक छोटी बच्ची मुस्कुरा रही थी।

     

    कबीर ने तस्वीर को कई बार देखा।

     

    फिर उसने उसे डिलीट कर दिया।

     

    लेकिन कुछ सेकंड बाद वही तस्वीर दोबारा उसकी गैलरी में दिखाई देने लगी।

     

    कबीर का दिल बैठ गया।

     

    उसने फोन बंद कर दिया।

     

    “यह सब मेरे दिमाग का वहम है,” उसने खुद से कहा।

     

    लेकिन तभी उसके फोन की स्क्रीन अपने आप जल उठी।

     

    समय था—

     

    12:15 PM

     

    और स्क्रीन पर एक शब्द लिखा था—

     

    “आओ।”

     

    कबीर ने तुरंत फोन बंद कर दिया।

     

    वह स्टेशन से बाहर निकलकर मुख्य सड़क पर आया। वहाँ एक ऑटो खड़ा था।

     

    “शहर चलोगे?” कबीर ने पूछा।

     

    ऑटो वाले ने उसकी तरफ देखा और तुरंत सिर हिला दिया।

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    ड्राइवर ने स्टेशन की तरफ देखा।

     

    “आप रात में प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर गए थे?”

     

    कबीर चुप हो गया।

     

    ड्राइवर ने डरते हुए कहा—

     

    “तो फिर मेरे ऑटो में मत बैठिए।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि ऐसे लोग ज्यादा दूर नहीं जाते।”

     

    यह सुनकर कबीर पीछे हट गया।

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    ड्राइवर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसने ऑटो स्टार्ट किया और तेज़ी से वहाँ से चला गया।

     

    कबीर सड़क किनारे अकेला खड़ा रह गया।

     

    कुछ देर बाद उसे एक बस मिली और वह शहर लौट आया।

     

    घर पहुँचते ही उसने सबसे पहले रोहित को बुलाया।

     

    रोहित ने कबीर को देखते ही पूछा—

     

    “तू ठीक है?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    “सब कुछ शुरू से बता।”

     

    कबीर ने उसे ट्रेन, बूढ़े आदमी, बच्ची और टिकट की पूरी कहानी बताई।

     

    रोहित ध्यान से सुनता रहा।

     

    फिर उसने लैपटॉप खोला।

     

    “मैंने कल रात से उस ट्रेन के बारे में खोजबीन की है।”

     

    उसने स्क्रीन पर एक पुरानी अखबार की कटिंग दिखाई।

     

    शीर्षक था—

     

    “देवगढ़ स्टेशन से 13 यात्री रहस्यमय तरीके से लापता।”

     

    खबर की तारीख थी—

     

    16 अगस्त 2001।

     

    कबीर ने खबर पढ़नी शुरू की।

     

    15 अगस्त की रात देवगढ़ स्टेशन पर एक ट्रेन आई थी।

     

    ट्रेन का कोई नंबर नहीं था।

     

    उसमें तेरह यात्री सवार हुए थे।

     

    सुबह स्टेशन पर ट्रेन तो मिली, लेकिन उसमें कोई यात्री नहीं था।

     

    सिर्फ तेरह पुराने टिकट मिले थे।

     

    रेलवे ने इसे दुर्घटना मानकर मामला बंद कर दिया।

     

    लेकिन उसी खबर में एक और बात लिखी थी।

     

    स्टेशन मास्टर रघुवीर सिंह की आठ वर्षीय बेटी मीरा भी उस रात गायब हुई थी।

     

    कबीर ने तुरंत पूछा—

     

    “मीरा?”

     

    रोहित ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ। वही बच्ची।”

     

    “तो वह ट्रेन में गई थी?”

     

    “शायद।”

     

    रोहित ने दूसरी फाइल खोली।

     

    उसमें एक पुरानी फोटो थी।

     

    एक छोटी बच्ची।

     

    लाल फ्रॉक।

     

    हाथ में लकड़ी का खिलौना।

     

    कबीर की साँस अटक गई।

     

    “यही है।”

     

    रोहित ने कहा—

     

    “इसका नाम मीरा सिंह था।”

     

    कबीर ने फोटो को ध्यान से देखा।

     

    मीरा की आँखें बिल्कुल सामान्य थीं।

     

    लेकिन फोटो के पीछे किसी ने पेंसिल से लिखा था—

     

    “मीरा कभी ट्रेन में नहीं गई थी।”

     

    कबीर ने चौंककर पूछा—

     

    “फिर?”

     

    रोहित ने कहा—

     

    “यही सबसे बड़ा रहस्य है।”

     

    उसने एक और दस्तावेज़ खोला।

     

    यह पुलिस की पुरानी रिपोर्ट थी।

     

    रिपोर्ट में लिखा था कि मीरा के गायब होने से पहले स्टेशन मास्टर रघुवीर सिंह ने पुलिस को बताया था कि उसे कई दिनों से एक अजीब ट्रेन दिखाई दे रही थी।

     

    लेकिन उस समय रेलवे अधिकारियों ने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया।

     

    रघुवीर का दावा था कि ट्रेन हमेशा 12:15 पर आती थी।

     

    और हर बार उसकी खिड़की में एक बच्ची दिखाई देती थी।

     

    वही बच्ची।

     

    मीरा।

     

    कबीर ने कहा—

     

    “लेकिन मीरा तो पहले से गायब हो चुकी थी?”

     

    रोहित ने सिर हिलाया।

     

    “यही तो सवाल है।”

     

    कुछ देर दोनों चुप रहे।

     

    फिर कबीर को अपने बैग में कुछ महसूस हुआ।

     

    उसने बैग खोला।

     

    अंदर एक पुराना टिकट पड़ा था।

     

    कबीर ने उसे बाहर निकाला।

     

    टिकट पर लिखा था—

     

    देवगढ़ से — अज्ञात स्थान

     

    यात्री — मीरा

     

    सीट — 13

     

    कबीर ने टिकट देखते ही उसे फेंक दिया।

     

    लेकिन टिकट जमीन पर गिरने के बजाय सीधे मेज पर जा गिरा।

     

    और उसके ऊपर एक नया शब्द उभर आया—

     

    “मुझे ढूँढो।”

     

    रोहित ने पीछे हटते हुए कहा—

     

    “इसे मत छूना।”

     

    लेकिन कबीर ने टिकट उठा लिया।

     

    अचानक कमरे की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    खिड़की अपने आप खुल गई।

     

    बाहर तेज़ हवा चलने लगी।

     

    फिर किसी बच्ची की आवाज़ आई—

     

    “भैया…”

     

    कबीर जम गया।

     

    आवाज़ कमरे के अंदर से आई थी।

     

    “भैया… मुझे घर जाना है।”

     

    रोहित ने काँपते हुए कहा—

     

    “कबीर… पीछे मत देखना।”

     

    लेकिन कबीर ने पीछे देख लिया।

     

    कमरे के दरवाज़े के पास मीरा खड़ी थी।

     

    लाल फ्रॉक।

     

    हाथ में लकड़ी का खिलौना।

     

    चेहरा सफेद।

     

    आँखें काली।

     

    कबीर ने धीरे से पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    बच्ची ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मैं मीरा हूँ।”

     

    “तुम चाहती क्या हो?”

     

    मीरा ने सिर झुका लिया।

     

    “मुझे घर जाना है।”

     

    “तुम्हारा घर कहाँ है?”

     

    उसने हाथ उठाकर खिड़की की ओर इशारा किया।

     

    “ट्रेन में।”

     

    कबीर ने डरते हुए पूछा—

     

    “तुम ट्रेन में क्यों हो?”

     

    मीरा का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    उसकी मुस्कान गायब हो गई।

     

    उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “क्योंकि पापा ने दरवाज़ा बंद कर दिया था।”

     

    कमरे का तापमान अचानक गिर गया।

     

    रोहित ने पूछा—

     

    “किसने?”

     

    मीरा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “रघुवीर ने।”

     

    कबीर को कुछ समझ नहीं आया।

     

    “लेकिन रघुवीर तुम्हारे पिता थे।”

     

    मीरा ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “उन्होंने तुम्हें ट्रेन में क्यों बंद किया?”

     

    मीरा ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसने बस अपना खिलौना जमीन पर रख दिया।

     

    खिलौने के अंदर से एक पुरानी चाबी निकली।

     

    “प्लेटफॉर्म के नीचे कमरा है।”

     

    कबीर ने चाबी उठाई।

     

    मीरा धीरे-धीरे पीछे हटने लगी।

     

    “वहाँ सबूत है।”

     

    “किस चीज़ का?”

     

    मीरा ने दरवाज़े की तरफ देखा।

     

    “उस रात ट्रेन में कौन गया था… और कौन नहीं गया था।”

     

    इतना कहकर वह गायब हो गई।

     

    कमरे की लाइटें वापस जल गईं।

     

    रोहित ने काँपती आवाज़ में कहा—

     

    “हमें पुलिस को बताना चाहिए।”

     

    कबीर ने सिर हिलाया।

     

    “पहले हमें वह कमरा ढूँढना होगा।”

     

    रात तक दोनों देवगढ़ स्टेशन वापस पहुँच गए।

     

    इस बार वे प्लेटफॉर्म नंबर 3 के नीचे बने पुराने हिस्से में गए।

     

    वहाँ जंग लगा एक छोटा दरवाज़ा था।

     

    कबीर ने चाबी लगाई।

     

    क्लिक!

     

    दरवाज़ा खुल गया।

     

    अंदर सीढ़ियाँ नीचे जा रही थीं।

     

    सीढ़ियों से बदबू आ रही थी।

     

    जैसे वहाँ वर्षों से कोई बंद पड़ा हो।

     

    दोनों टॉर्च जलाकर नीचे उतरने लगे।

     

    नीचे एक लंबा कमरा था।

     

    दीवारों पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।

     

    हर तस्वीर में एक यात्री था।

     

    कबीर एक-एक करके तस्वीरें देखने लगा।

     

    कुछ चेहरे पुराने थे।

     

    कुछ नए।

     

    लेकिन हर तस्वीर के नीचे एक तारीख थी।

     

    2001…

     

    2005…

     

    2012…

     

    2018…

     

    2024…

     

    कबीर अचानक रुक गया।

     

    आखिरी तस्वीर के नीचे तारीख लिखी थी—

     

    15 अगस्त 2026।

     

    तस्वीर में कोई चेहरा नहीं था।

     

    सिर्फ एक खाली कुर्सी थी।

     

    उसके नीचे लिखा था—

     

    “यात्री अभी बाकी है।”

     

    रोहित ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “कबीर… इधर देख।”

     

    कमरे के दूसरे कोने में एक पुराना रजिस्टर पड़ा था।

     

    कबीर ने उसे खोला।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “इस ट्रेन में तेरह यात्री नहीं जाते।”

     

    अगली लाइन थी—

     

    “हर बार बारह जाते हैं।”

     

    कबीर ने पन्ना पलटा।

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “तेरहवाँ यात्री हमेशा वही होता है जिसे ट्रेन खुद चुनती है।”

     

    कबीर की नजर आखिरी लाइन पर गई।

     

    उसका दिल रुक-सा गया।

     

    क्योंकि वहाँ आज की तारीख के सामने नाम लिखा था—

     

    कबीर शर्मा।

     

    अचानक ऊपर से ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

     

    फूँऽऽऽऽऽ!

     

    रोहित चिल्लाया—

     

    “लेकिन अभी तो 11:50 हैं!”

     

    कबीर ने घड़ी देखी।

     

    12:14।

     

    सिर्फ एक मिनट बाकी था।

     

    दोनों सीढ़ियों की तरफ भागे।

     

    लेकिन दरवाज़ा बंद हो चुका था।

     

    ऊपर से किसी ने उसे बाहर से बंद कर दिया था।

     

    फिर कमरे में अंधेरा हो गया।

     

    कबीर ने दरवाज़ा पीटना शुरू किया।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    फिर अंधेरे में किसी ने फुसफुसाया—

     

    “सीट नंबर 13 तैयार है।”

     

    कबीर ने धीरे से पीछे देखा।

     

    कमरे के बीचों-बीच वही पुरानी कुर्सी अब मौजूद नहीं थी।

     

    उसकी जगह एक रेलवे सीट थी।

     

    और सीट पर कोई बैठा था।

     

    कबीर जैसा चेहरा।

     

    काली आँखें।

     

    वही मुस्कान।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “इस बार तुम नहीं बचोगे।”

     

    ऊपर से ट्रेन की सीटी बजी।

     

    12:15।

     

    और बंद कमरे के अंदर अचानक ट्रेन चलने की आवाज़ आने लगी।

     

    कबीर ने नीचे देखा।

     

    फर्श गायब हो चुका था।

     

    उसके नीचे सिर्फ काला अंधेरा था।

     

    और उसी अंधेरे से दर्जनों आवाज़ें एक साथ आईं—

     

    “अगला यात्री… कबीर शर्मा…”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • आखिरी ट्रेन का यात्री भाग 2

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    कबीर कुछ देर तक प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर खड़ा रहा।

     

    ट्रेन जा चुकी थी।

     

    लेकिन उसके कानों में अभी भी पहियों की आवाज़ गूँज रही थी।

     

    उसने अपने हाथ में पकड़े टिकट को फिर से देखा।

     

    यात्री — कबीर शर्मा

    सीट — 13

    गंतव्य — देवगढ़

     

    कबीर की उंगलियाँ काँप रही थीं।

     

    “यह किसी का मज़ाक है,” उसने खुद से कहा।

     

    लेकिन उसकी आवाज़ में खुद उसे भी भरोसा नहीं था।

     

    कुछ देर पहले जिस बूढ़े आदमी से उसकी बात हुई थी, वह अचानक गायब हो चुका था। प्लेटफॉर्म पर उसके अलावा कोई नहीं था।

     

    कबीर ने मोबाइल निकाला।

     

    नेटवर्क वापस आ चुका था।

     

    उसने तुरंत अपने दोस्त रोहित को फोन लगाया।

     

    एक बार घंटी गई।

     

    दो बार।

     

    तीन बार।

     

    फिर कॉल उठ गई।

     

    “हाँ कबीर?”

     

    रोहित की आवाज़ नींद में डूबी हुई थी।

     

    कबीर ने जल्दी-जल्दी सारी घटना बताई।

     

    कुछ सेकंड तक रोहित चुप रहा।

     

    फिर उसने पूछा, “तू अभी देवगढ़ स्टेशन पर है?”

     

    “हाँ।”

     

    “तुरंत वहाँ से निकल।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैंने अभी तेरे नंबर से एक फोटो रिसीव की है।”

     

    कबीर के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    “क्या फोटो?”

     

    रोहित ने जवाब नहीं दिया।

     

    कुछ सेकंड बाद कबीर के मोबाइल पर वही फोटो आ गई।

     

    कबीर ने फोटो खोली।

     

    उसकी साँस रुक गई।

     

    फोटो में वही ट्रेन थी।

     

    लेकिन इस बार तस्वीर बाहर से नहीं ली गई थी।

     

    तस्वीर ट्रेन के अंदर से ली गई थी।

     

    और तस्वीर में सीट नंबर 13 पर कोई बैठा हुआ था।

     

    कबीर।

     

    वह खुद।

     

    उसने वही काली जैकेट पहन रखी थी।

     

    वही घड़ी।

     

    वही बैग।

     

    लेकिन तस्वीर में बैठा कबीर कैमरे की तरफ नहीं देख रहा था।

     

    वह खिड़की के बाहर देख रहा था।

     

    कबीर ने घबराकर मोबाइल नीचे कर लिया।

     

    “ये कैसे हो सकता है?”

     

    रोहित ने पूछा, “क्या हुआ?”

     

    “फोटो किसने भेजी?”

     

    “तेरे ही नंबर से।”

     

    कबीर के हाथ से मोबाइल लगभग गिर गया।

     

    तभी प्लेटफॉर्म के दूसरे छोर से किसी के चलने की आवाज़ आई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    कबीर ने धीरे से सिर उठाया।

     

    अंधेरे में कोई उसकी ओर आ रहा था।

     

    वह बूढ़ा आदमी था।

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    “आप?”

     

    बूढ़ा कुछ नहीं बोला।

     

    वह उसके पास आया और धीरे से बोला—

     

    “तुमने टिकट उठा लिया।”

     

    कबीर ने टिकट जेब में रख लिया।

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि अब वह तुम्हें ढूँढ रही है।”

     

    “कौन?”

     

    बूढ़े ने प्लेटफॉर्म के पीछे अंधेरे की तरफ देखा।

     

    “ट्रेन की मालकिन।”

     

    कबीर ने घबराकर पूछा, “कौन है वह?”

     

    बूढ़े ने जवाब देने के बजाय पूछा—

     

    “तुमने ट्रेन के आखिरी डिब्बे को देखा था?”

     

    कबीर ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “अच्छा हुआ।”

     

    “क्यों?”

     

    बूढ़े ने धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “क्योंकि वहाँ जो बैठा है, वह यात्री नहीं है।”

     

    अचानक स्टेशन की सारी लाइटें फिर से बुझ गईं।

     

    कबीर ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    बूढ़ा सामने खड़ा था।

     

    लेकिन अब उसके चेहरे पर डर था।

     

    “हमें यहाँ से जाना होगा।”

     

    “क्यों?”

     

    बूढ़े ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “क्योंकि अगली ट्रेन आने वाली है।”

     

    कबीर ने घड़ी देखी।

     

    12:28।

     

    “लेकिन ट्रेन तो अभी गई है।”

     

    बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

     

    “वह ट्रेन नहीं थी।”

     

    “क्या मतलब?”

     

    “वह सिर्फ उसका रास्ता था।”

     

    अचानक पटरी के नीचे से आवाज़ आई।

     

    जैसे लोहे के नीचे कोई चीज़ खरोंच रही हो।

     

    खर्र…

     

    खर्र…

     

    खर्र…

     

    कबीर और बूढ़ा दोनों पीछे हट गए।

     

    फिर पटरी के बीच से काला धुआँ निकलने लगा।

     

    धुआँ ऊपर उठकर एक इंसानी आकार बनाने लगा।

     

    धीरे-धीरे उस धुएँ में एक चेहरा दिखाई दिया।

     

    एक औरत का चेहरा।

     

    चेहरा सफेद था।

     

    आँखें बंद थीं।

     

    लेकिन उसके होंठ हिल रहे थे।

     

    वह कुछ कह रही थी।

     

    कबीर ने ध्यान से सुना।

     

    “सीट… नंबर… तेरह…”

     

    कबीर की रीढ़ में ठंडक दौड़ गई।

     

    उसने जेब से टिकट निकालकर फाड़ना चाहा।

     

    लेकिन टिकट फट नहीं रहा था।

     

    उसने दोनों हाथों से जोर लगाया।

     

    कुछ नहीं हुआ।

     

    फिर टिकट पर लिखे शब्द बदलने लगे।

     

    यात्री — कबीर शर्मा

     

    धीरे-धीरे नाम गायब हुआ।

     

    उसकी जगह नया नाम दिखाई दिया—

     

    यात्री — रघुवीर सिंह

     

    कबीर ने बूढ़े की तरफ देखा।

     

    बूढ़े का चेहरा सफेद पड़ चुका था।

     

    “रघुवीर सिंह कौन है?”

     

    बूढ़े ने कुछ नहीं कहा।

     

    कबीर ने उसका कंधा पकड़ लिया।

     

    “बताइए!”

     

    बूढ़े ने आखिरकार कहा—

     

    “इस स्टेशन का पहला स्टेशन मास्टर।”

     

    “और?”

     

    “पच्चीस साल पहले उसकी बेटी ट्रेन में गायब हुई थी।”

     

    “कौन-सी ट्रेन में?”

     

    बूढ़े ने प्लेटफॉर्म नंबर 3 की ओर देखा।

     

    “इसी ट्रेन में।”

     

    अचानक दूर से सीटी की आवाज़ आई।

     

    फूँऽऽऽऽऽ!

     

    कबीर ने देखा।

     

    इस बार ट्रेन पटरी पर नहीं आ रही थी।

     

    वह अंधेरे के अंदर से जैसे हवा में तैरती हुई प्लेटफॉर्म की तरफ बढ़ रही थी।

     

    उसकी खिड़कियों में कोई रोशनी नहीं थी।

     

    सिर्फ एक खिड़की में हल्की पीली रोशनी जल रही थी।

     

    सीट नंबर 13।

     

    बूढ़े ने कबीर का हाथ पकड़ लिया।

     

    “भागो!”

     

    दोनों प्लेटफॉर्म से बाहर की तरफ दौड़ने लगे।

     

    लेकिन कुछ कदम बाद कबीर रुक गया।

     

    उसे किसी बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई दी।

     

    “माँ…”

     

    आवाज़ प्लेटफॉर्म नंबर 3 से आ रही थी।

     

    फिर वही आवाज़ आई—

     

    “माँ… मुझे घर जाना है…”

     

    कबीर ने पीछे देखा।

     

    ट्रेन खड़ी थी।

     

    उसका दरवाज़ा खुला हुआ था।

     

    दरवाज़े पर लगभग आठ साल की एक बच्ची खड़ी थी।

     

    उसने लाल फ्रॉक पहन रखी थी।

     

    उसके हाथ में एक पुराना खिलौना था।

     

    वह सीधे कबीर को देख रही थी।

     

    “भैया…”

     

    कबीर कुछ नहीं बोला।

     

    बच्ची ने पूछा—

     

    “क्या आप मुझे घर छोड़ देंगे?”

     

    बूढ़ा चिल्लाया—

     

    “उसकी तरफ मत देखो!”

     

    लेकिन देर हो चुकी थी।

     

    बच्ची मुस्कुराई।

     

    उसके चेहरे की त्वचा धीरे-धीरे काली पड़ने लगी।

     

    उसकी आँखें खुलीं।

     

    आँखों की जगह सिर्फ गहरा अंधेरा था।

     

    और उसके मुँह से इंसानी आवाज़ नहीं निकली।

     

    एक भारी, गहरी आवाज़ आई—

     

    “सीट नंबर 13 खाली है।”

     

    ट्रेन का दरवाज़ा अचानक पूरी तरह खुल गया।

     

    अंदर बैठे सभी यात्रियों ने एक साथ अपना सिर उठाया।

     

    फिर सभी ने एक साथ कहा—

     

    “कबीर…”

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    लेकिन उसके पीछे कोई खड़ा था।

     

    उसने धीरे से गर्दन घुमाई।

     

    वही आदमी।

     

    जो बिल्कुल उसके जैसा दिखता था।

     

    काली आँखें।

     

    चेहरे पर मुस्कान।

     

    उसने कबीर के कान के पास आकर कहा—

     

    “एक कबीर ट्रेन में जा चुका है।”

     

    फिर उसने अपनी उंगली कबीर की ओर की।

     

    “अब दूसरे की बारी है।”

     

    कबीर चीखकर भागा।

     

    लेकिन उसके पैर जैसे जमीन से चिपक गए थे।

     

    उसने नीचे देखा।

     

    उसके जूते के फीते नहीं थे।

     

    उनकी जगह काले बालों की लंबी लटें उसके पैरों से लिपटी थीं।

     

    वे बाल पटरी के नीचे से निकल रहे थे।

     

    कबीर ने पूरी ताकत से पैर छुड़ाया।

     

    और अचानक वह जमीन पर गिर पड़ा।

     

    जब उसने आँखें खोलीं, सुबह हो चुकी थी।

     

    सूरज निकल चुका था।

     

    प्लेटफॉर्म नंबर 3 खाली था।

     

    ट्रेन गायब थी।

     

    बूढ़ा भी गायब था।

     

    कबीर ने राहत की साँस ली।

     

    वह खड़ा हुआ और स्टेशन से बाहर जाने लगा।

     

    तभी उसकी नजर स्टेशन की दीवार पर लगी एक पुरानी तस्वीर पर पड़ी।

     

    तस्वीर में स्टेशन के पुराने कर्मचारी खड़े थे।

     

    नीचे तारीख लिखी थी—

     

    15 अगस्त 2001

     

    कबीर की नजर तस्वीर के बीच में खड़े एक आदमी पर टिक गई।

     

    वह बूढ़ा आदमी था।

     

    वही चेहरा।

     

    वही कपड़े।

     

    वही आँखें।

     

    लेकिन तस्वीर के नीचे नाम लिखा था—

     

    रघुवीर सिंह — स्टेशन मास्टर

     

    कबीर के हाथ से मोबाइल गिर गया।

     

    क्योंकि तस्वीर में रघुवीर सिंह की उम्र लगभग तीस साल थी।

     

    और तस्वीर के पीछे लाल स्याही से किसी ने लिखा था—

     

    “वह आज भी अपनी बेटी का इंतज़ार कर रहा है।”

     

    उसी क्षण कबीर के मोबाइल में एक नया मैसेज आया।

     

    मैसेज उसी अज्ञात नंबर से था।

     

    सिर्फ एक लाइन—

     

    “आज रात 12:15 बजे सीट नंबर 13 पर बैठना मत भूलना।”

     

    और उसके नीचे एक तस्वीर थी।

     

    कबीर ने तस्वीर खोली।

     

    उसमें वह खुद स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर बैठा हुआ था।

     

    लेकिन तस्वीर में रात नहीं थी।

     

    तस्वीर में सुबह थी।

     

    और उसके पीछे खड़ी ट्रेन की खिड़की से एक छोटी बच्ची उसे देखकर मुस्कुरा रही थी।

     

     

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • आखिरी ट्रेन का यात्री (भाग 1)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर के बाहर एक पुराना रेलवे स्टेशन था—देवगढ़ स्टेशन।

     

    कभी इस स्टेशन पर दिन-रात यात्रियों की भीड़ रहती थी। लेकिन पिछले दस वर्षों से यहाँ सिर्फ कुछ गिनी-चुनी ट्रेनें रुकती थीं। रात होते ही स्टेशन लगभग सुनसान हो जाता था।

     

    स्टेशन की सबसे अजीब बात थी प्लेटफॉर्म नंबर 3।

     

    वहाँ अब कोई ट्रेन नहीं रुकती थी।

     

    रेलवे रिकॉर्ड के मुताबिक उस प्लेटफॉर्म की पटरी कई साल पहले बंद कर दी गई थी। उसके आगे की रेलवे लाइन भी टूट चुकी थी।

     

    फिर भी गाँव के लोग कहते थे कि हर रात ठीक 12:15 बजे प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर एक ट्रेन आती है।

     

    एक ऐसी ट्रेन, जिसका कोई नंबर नहीं था।

     

    कोई टाइमटेबल नहीं था।

     

    और सबसे डरावनी बात—

     

    उस ट्रेन में बैठने वाला कोई भी यात्री फिर कभी वापस नहीं आता था।

     

    लोग इसे अफवाह मानते थे।

     

    लेकिन कबीर अफवाहों पर विश्वास नहीं करता था।

     

    कबीर 27 साल का एक स्वतंत्र पत्रकार था। उसे अजीब घटनाओं की सच्चाई पता लगाने का शौक था। कुछ दिनों पहले उसे देवगढ़ स्टेशन के बारे में एक ईमेल मिला था।

     

    ईमेल में सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

     

    “अगर हिम्मत है तो 15 अगस्त की रात 12:15 बजे देवगढ़ स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर आना।”

     

    नीचे कोई नाम नहीं था।

     

    कबीर ने पहले इसे मज़ाक समझा।

     

    फिर उसे उसी ईमेल के साथ एक तस्वीर मिली।

     

    तस्वीर में एक पुरानी ट्रेन प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर खड़ी थी।

     

    तस्वीर धुंधली थी, लेकिन ट्रेन की खिड़की के पास एक आदमी साफ दिखाई दे रहा था।

     

    वह आदमी सीधे कैमरे की ओर देख रहा था।

     

    कबीर को तस्वीर में कुछ अजीब लगा।

     

    उस आदमी का चेहरा बिल्कुल वैसा था जैसे कोई कई दिनों से सोया न हो।

     

    आँखें पूरी तरह काली।

     

    और उसके होंठों पर हल्की मुस्कान।

     

    कबीर ने तस्वीर ज़ूम की।

     

    ट्रेन के शीशे पर किसी ने उंगली से लिखा था—

     

    “अगला यात्री तुम हो।”

     

    उस रात कबीर देवगढ़ स्टेशन पहुँच गया।

     

    समय था रात के 11:40।

     

    पूरा स्टेशन सुनसान था।

     

    टिकट खिड़की बंद थी।

     

    चाय की दुकान बंद थी।

     

    स्टेशन मास्टर का कमरा भी अंधेरे में डूबा हुआ था।

     

    कबीर प्लेटफॉर्म नंबर 3 की तरफ बढ़ा।

     

    वहाँ पहुँचते ही उसे अजीब ठंड महसूस हुई।

     

    अगस्त की गर्म रात थी, लेकिन प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर हवा बर्फ जैसी ठंडी थी।

     

    कबीर ने मोबाइल निकाला।

     

    नेटवर्क गायब था।

     

    उसने घड़ी देखी।

     

    11:52।

     

    अचानक पीछे से आवाज़ आई—

     

    “आप भी ट्रेन का इंतज़ार कर रहे हैं?”

     

    कबीर ने तुरंत पीछे देखा।

     

    एक बूढ़ा आदमी बेंच पर बैठा था।

     

    उसने काला कोट पहन रखा था।

     

    कबीर ने पूछा, “आप यहाँ इतनी रात को?”

     

    बूढ़े ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसने सिर्फ सामने पटरी की ओर देखा।

     

    “पहली बार आए हो?”

     

    “हाँ।”

     

    बूढ़ा धीरे से मुस्कुराया।

     

    “तो एक बात याद रखना।”

     

    “क्या?”

     

    “जब ट्रेन आए, तो उसमें मत बैठना।”

     

    कबीर हँस पड़ा।

     

    “आप भी उस ट्रेन की कहानी जानते हैं?”

     

    बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

     

    “कहानी नहीं है।”

     

    उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी।

     

    “मैं उस ट्रेन में जा चुका हूँ।”

     

    कबीर की हँसी रुक गई।

     

    “क्या मतलब?”

     

    बूढ़े ने अपनी आस्तीन ऊपर की।

     

    उसकी कलाई पर एक काला निशान था।

     

    निशान किसी टिकट की मुहर जैसा दिखाई दे रहा था।

     

    “मैं पच्चीस साल पहले उस ट्रेन में बैठा था।”

     

    “फिर?”

     

    बूढ़े ने स्टेशन की घड़ी की ओर देखा।

     

    12:03।

     

    “फिर मैं वापस आया।”

     

    कबीर ने राहत की साँस ली।

     

    “तो फिर डर किस बात का?”

     

    बूढ़े ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “क्योंकि मेरे हिसाब से मैं सिर्फ तीन मिनट के लिए गया था।”

     

    कबीर चुप हो गया।

     

    बूढ़े ने आगे कहा—

     

    “लेकिन जब मैं वापस आया, तब यहाँ पच्चीस साल बीत चुके थे।”

     

    कबीर के चेहरे का रंग बदल गया।

     

    “यह कैसे संभव है?”

     

    बूढ़ा कुछ कहने ही वाला था कि अचानक प्लेटफॉर्म की सारी लाइटें बुझ गईं।

     

    अंधेरा।

     

    पूरे स्टेशन पर ऐसा सन्नाटा छा गया कि कबीर को अपनी साँसें सुनाई देने लगीं।

     

    फिर दूर से ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

     

    फूँऽऽऽऽऽऽ!

     

    कबीर ने पटरी की ओर देखा।

     

    दूर अंधेरे में एक छोटी-सी पीली रोशनी दिखाई दी।

     

    धीरे-धीरे वह रोशनी बड़ी होने लगी।

     

    ट्रेन आ रही थी।

     

    लेकिन उसकी आवाज़ अजीब थी।

     

    पहिए पटरी पर चलने की आवाज़ नहीं कर रहे थे।

     

    ऐसा लग रहा था जैसे कोई बहुत भारी चीज़ जमीन पर घसीटी जा रही हो।

     

    ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आकर रुक गई।

     

    दरवाज़े अपने आप खुल गए।

     

    कबीर ने ट्रेन के ऊपर देखा।

     

    वहाँ कोई नंबर नहीं था।

     

    कोई नाम नहीं।

     

    सिर्फ काले रंग में एक शब्द लिखा था—

     

    “अंतिम।”

     

    कबीर ने बूढ़े की तरफ देखा।

     

    बूढ़ा वहाँ नहीं था।

     

    बेंच खाली थी।

     

    कबीर घबरा गया।

     

    “बाबा?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    फिर ट्रेन के अंदर से आवाज़ आई—

     

    “कबीर…”

     

    कबीर जम गया।

     

    उसने किसी को अपना नाम नहीं बताया था।

     

    फिर आवाज़ आई—

     

    “कबीर… अंदर आओ।”

     

    आवाज़ किसी बूढ़े आदमी की थी।

     

    बिल्कुल उसी बूढ़े की।

     

    कबीर ने ट्रेन की खिड़की से अंदर देखा।

     

    अंदर लगभग दस यात्री बैठे थे।

     

    सभी बिल्कुल शांत।

     

    कोई मोबाइल नहीं चला रहा था।

     

    कोई बात नहीं कर रहा था।

     

    सभी की नजरें नीचे थीं।

     

    कबीर ने देखा कि हर यात्री के हाथ में एक पुराना टिकट था।

     

    फिर उसकी नजर सबसे आखिरी सीट पर गई।

     

    वहाँ वही आदमी बैठा था जो उसे उस ईमेल वाली तस्वीर में दिखाई दिया था।

     

    काली आँखें।

     

    हल्की मुस्कान।

     

    वह धीरे-धीरे अपना सिर उठाने लगा।

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    तभी उसके मोबाइल पर एक मैसेज आया।

     

    “ट्रेन में मत बैठना।”

     

    कबीर ने राहत की साँस ली।

     

    लेकिन अगले ही सेकंड दूसरा मैसेज आया।

     

    “क्योंकि अगर तुम नहीं बैठे… तो वह खुद उतर जाएगी।”

     

    कबीर का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    ट्रेन की सीटी फिर बजी।

     

    फूँऽऽऽऽ!

     

    दरवाज़ा बंद होने लगा।

     

    तभी अंदर बैठे सभी यात्रियों ने एक साथ अपना सिर उठाया।

     

    सभी की आँखें काली थीं।

     

    और सभी कबीर को देख रहे थे।

     

    फिर आखिरी सीट पर बैठा आदमी मुस्कुराया।

     

    उसने अपना टिकट खिड़की से बाहर फेंक दिया।

     

    टिकट कबीर के पैरों के पास आकर गिरा।

     

    कबीर ने काँपते हाथों से टिकट उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    यात्री: कबीर शर्मा

     

    सीट: 13

     

    गंतव्य: देवगढ़

     

    कबीर ने घबराकर ट्रेन की तरफ देखा।

     

    ट्रेन चलने लगी थी।

     

    लेकिन दरवाज़े के पास कोई खड़ा था।

     

    वही बूढ़ा आदमी।

     

    उसने धीरे से अपना हाथ उठाया और इशारा किया—

     

    अंदर आ जाओ।

     

    और तभी कबीर ने देखा कि बूढ़े के पीछे ट्रेन के दरवाज़े पर एक और आदमी खड़ा था।

     

    वह बिल्कुल कबीर जैसा दिखता था।

     

    उसी चेहरे के साथ।

     

    उसी कपड़ों में।

     

    लेकिन उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    वह मुस्कुराया और होंठ हिलाए—

     

    “तुम देर कर चुके हो।”

     

    ट्रेन अंधेरे में गायब हो गई।

     

    और प्लेटफॉर्म नंबर 3 की घड़ी रुक गई।

     

    12:15।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • आख़िरी तस्वीर — भाग 3 (अंतिम भाग)” 👻

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    हरिदास उस कमरे के बीचों-बीच खड़ा था।उसके हाथ में तस्वीर थी और सामने आरव खड़ा था।

     

    लेकिन वह आरव जैसा दिखते हुए भी आरव नहीं लग रहा था।

     

    उसका चेहरा बिल्कुल सफेद था। आंखें खुली थीं, मगर उनमें कोई चमक नहीं थी। उसके पीछे आठ काली परछाइयां खड़ी थीं।

     

    हरिदास ने कांपती आवाज़ में पूछा, “आरव… तुम जिंदा हो?”

     

    आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसने बस अपना हाथ उठाया और दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    हरिदास ने पीछे देखा।

     

    दीवार पर एक नई तस्वीर लगी थी।

     

    उसमें देवेंद्र दिखाई दे रहा था।

     

    वह उसी कमरे में खड़ा था।

     

    लेकिन तस्वीर के अंदर।

     

    हरिदास की सांस रुक गई।

     

    “देवेंद्र!”

     

    तभी तस्वीर के अंदर देवेंद्र ने अपना सिर उठाया।

     

    उसके होंठ हिले।

     

    “हरिदास… तस्वीर मत खींचना।”

     

    अचानक तस्वीर के अंदर से चीख सुनाई दी।

     

    और तस्वीर काली हो गई।

     

    हरिदास पीछे हट गया।

     

    आरव पहली बार बोला।

     

    “अब बहुत देर हो चुकी है।”

     

    हरिदास ने उसे घूरकर देखा।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “मैं वही हूं जिसे तुम ढूंढने आए थे।”

     

    “आरव कहां है?”

     

    आरव ने धीरे से अपनी गर्दन घुमाई।

     

    “वह अभी भी तस्वीर के अंदर है।”

     

    हरिदास के हाथ से तस्वीर गिर गई।

     

    “तो तुम कौन हो?”

     

    आरव की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “मैं वह हूं जो हर तस्वीर के बाद पैदा होता है।”

     

    कमरे की दीवारें अचानक कांपने लगीं।

     

    पुरानी तस्वीरें फर्श पर गिरने लगीं।

     

    हर तस्वीर में मौजूद लोग अब कमरे की तरफ देख रहे थे।

     

    उनमें रघुवीर था।

     

    मीरा थी।

     

    तारा थी।

     

    और कई अनजान चेहरे थे।

     

    हरिदास ने समझ लिया कि ये सभी वही लोग थे जो वर्षों से इस घर की तस्वीरों में कैद थे।

     

    लेकिन एक तस्वीर देखकर उसकी नजर जम गई।

     

    उसमें उसकी पत्नी थी।

     

    वही चेहरा।

     

    वही साड़ी।

     

    वही मुस्कान।

     

    हरिदास की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “सरिता…”

     

    तस्वीर के अंदर उसकी पत्नी ने हाथ उठाया।

     

    जैसे उसे बुला रही हो।

     

    फिर तस्वीर के नीचे शब्द उभरने लगे—

     

    “एक तस्वीर लो और उसे वापस ले जाओ।”

     

    हरिदास ने कांपते हाथों से कैमरा उठाया।

     

    आरव ने उसे रोकना चाहा।

     

    “ऐसा मत करना।”

     

    हरिदास ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अगर मैं तस्वीर खींच लूं तो मेरी पत्नी वापस आ जाएगी?”

     

    आरव ने कुछ नहीं कहा।

     

    हरिदास समझ गया।

     

    “झूठ बोल रहे हो।”

     

    अचानक कमरे में एक और आवाज गूंजी।

     

    “नहीं…”

     

    आवाज़ उसकी पत्नी की थी।

     

    “मैं सच कह रही हूं।”

     

    हरिदास ने तस्वीर की तरफ देखा।

     

    सरिता रो रही थी।

     

    “बस एक तस्वीर…”

     

    हरिदास कैमरा लेकर उसके सामने खड़ा हो गया।

     

    उसकी उंगली शटर पर थी।

     

    तभी उसे कुछ याद आया।

     

    1998 की तस्वीर।

     

    उसमें पांचवीं परछाई थी।

     

    फिर आरव की तस्वीर में सात परछाइयां थीं।

     

    फिर आठ।

     

    आखिर हर तस्वीर के साथ परछाइयां बढ़ क्यों रही थीं?

     

    हरिदास ने अचानक कैमरे की स्क्रीन देखी।

     

    स्क्रीन पर वही पुरानी तस्वीर खुली थी।

     

    उसने ज़ूम किया।

     

    पहली बार उसने तस्वीर के पीछे की दीवार देखी।

     

    वहां एक छोटा-सा आईना लगा था।

     

    आईने में उस काली परछाई का चेहरा दिखाई दे रहा था।

     

    लेकिन वह चेहरा किसी और का नहीं था।

     

    वह तारा का था।

     

    दस साल की बच्ची।

     

    हरिदास ने देवेंद्र की बात याद की।

     

    “तारा की मौत कमरे में हुई थी।”

     

    उसने अचानक समझ लिया।

     

    “तारा ही वो साया है!”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “हां। लेकिन वह अकेली नहीं है।”

     

    “तो बाकी लोग?”

     

    “वे लोग उसके साथ फंस गए।”

     

    हरिदास ने पूछा, “उन्हें आज़ाद कैसे करें?”

     

    आरव ने दीवार की तरफ देखा।

     

    “आख़िरी तस्वीर मिटानी होगी।”

     

    “कौन-सी?”

     

    “वह तस्वीर जो पहली तस्वीर से पहले खींची गई थी।”

     

    हरिदास समझ नहीं पाया।

     

    “पहली तस्वीर से पहले?”

     

    आरव ने कमरे के फर्श की तरफ इशारा किया।

     

    वहां एक लकड़ी का पुराना संदूक पड़ा था।

     

    हरिदास ने उसे खोला।

     

    अंदर पुराने कैमरे, निगेटिव और सैकड़ों तस्वीरें थीं।

     

    सबसे नीचे एक काला लिफाफा रखा था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “तारा की आख़िरी तस्वीर।”

     

    हरिदास ने लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक तस्वीर थी।

     

    तारा अकेली खड़ी थी।

     

    लेकिन उसके पीछे कोई परछाई नहीं थी।

     

    हरिदास ने गौर से देखा।

     

    तस्वीर के पीछे लिखा था—

     

    “मैंने इसे नहीं बुलाया था। उसने मुझे बुलाया था।”

     

    नीचे एक नाम लिखा था।

     

    मीरा।

     

    हरिदास चौंक गया।

     

    “मीरा?”

     

    आरव ने कहा, “तारा की मां।”

     

    अचानक कमरे में तेज हवा चलने लगी।

     

    दीवारों पर लगी सभी तस्वीरें एक साथ हिलने लगीं।

     

    औरत की चीख सुनाई दी।

     

    फिर एक बच्ची रोने लगी।

     

    “मां… तुमने ऐसा क्यों किया?”

     

    हरिदास को सब समझ आने लगा।

     

    मीरा ने किसी पुराने तांत्रिक से मदद लेकर अपनी बेटी को मौत से वापस लाने की कोशिश की थी।

     

    लेकिन जो वापस आया था, वह तारा नहीं था।

     

    वह एक ऐसी शक्ति थी जिसने तस्वीरों के जरिए लोगों की आत्माओं को कैद करना शुरू कर दिया।

     

    और हर नई तस्वीर उसे और शक्तिशाली बनाती गई।

     

    हरिदास ने तारा की तस्वीर कैमरे के सामने रखी।

     

    आरव चिल्लाया—

     

    “जल्दी करो!”

     

    हरिदास ने कैमरा उठाया।

     

    तभी काली परछाई उसके सामने आ गई।

     

    उसका चेहरा बदलने लगा।

     

    पहले तारा।

     

    फिर सरिता।

     

    फिर आरव।

     

    फिर हरिदास का अपना चेहरा।

     

    उसने फुसफुसाकर कहा—

     

    “तुम मुझे खत्म नहीं कर सकते।”

     

    हरिदास ने कैमरे का फ्लैश ऑन किया।

     

    “शायद नहीं…”

     

    उसने तस्वीर कैमरे के सामने रखी।

     

    “…लेकिन तुम्हें तस्वीर में कैद तो कर सकता हूं।”

     

    क्लिक!

     

    एक तेज फ्लैश हुआ।

     

    पूरा कमरा सफेद रोशनी से भर गया।

     

    सभी परछाइयां चीखने लगीं।

     

    दीवारों पर लगी तस्वीरें एक-एक करके फटने लगीं।

     

    आरव जमीन पर गिर पड़ा।

     

    देवेंद्र की तस्वीर टूटकर फर्श पर आ गिरी।

     

    फिर आख़िरी चीख सुनाई दी।

     

    तारा की।

     

    “मुझे घर जाना है…”

     

    और सब शांत हो गया।

     

    कुछ देर बाद हरिदास ने आंखें खोलीं।

     

    कमरा बिल्कुल खाली था।

     

    न आरव।

     

    न परछाइयां।

     

    न तस्वीरें।

     

    सिर्फ एक कैमरा फर्श पर पड़ा था।

     

    हरिदास ने उसे उठाया।

     

    उसमें सिर्फ एक तस्वीर थी।

     

    उसने तस्वीर देखी।

     

    उसमें तारा खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं था।

     

    वह मुस्कुरा रही थी।

     

    उसके पीछे कोई परछाई नहीं थी।

     

    तस्वीर के नीचे तारीख लिखी थी—

     

    17 अगस्त 2026

     

    और समय—

     

    3:08 PM.

     

    हरिदास ने राहत की सांस ली।

     

    तभी उसके पीछे किसी ने कहा—

     

    “काका…”

     

    हरिदास जम गया।

     

    वह धीरे-धीरे पीछे मुड़ा।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    उसने कैमरे की स्क्रीन देखी।

     

    स्क्रीन पर एक नई तस्वीर दिखाई दे रही थी।

     

    उस तस्वीर में हरिदास खुद कमरे में खड़ा था।

     

    और उसके पीछे…

     

    एक छोटी बच्ची मुस्कुरा रही थी।

     

    हरिदास ने डरते हुए तस्वीर को ज़ूम किया।

     

    वह तारा नहीं थी।

     

    वह कोई और लड़की थी।

     

    नीचे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “कहानी अभी खत्म नहीं हुई…”

     

    अगली सुबह पुलिस को पुराने घर में हरिदास मिला।

     

    वह जिंदा था।

     

    लेकिन उसे कुछ याद नहीं था।

     

    आरव का कोई पता नहीं चला।

     

    देवेंद्र भी गायब था।

     

    पुराना घर कुछ दिनों बाद तोड़ दिया गया।

     

    मजदूरों ने मलबा हटाते समय एक पुराना कैमरा पाया।

     

    पुलिस ने उसे सबूत समझकर थाने में रख दिया।

     

    तीन दिन बाद एक पुलिसकर्मी ने कैमरा चालू किया।

     

    उसमें सिर्फ एक तस्वीर थी।

     

    एक खाली सड़क की।

     

    सड़क के बीच एक आदमी खड़ा था।

     

    आरव।

     

    उसके हाथ में कैमरा था।

     

    और उसके पीछे…

     

    सैकड़ों परछाइयां खड़ी थीं।

     

    तस्वीर के नीचे तारीख थी—

     

    18 अगस्त 2026।

     

    लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि तस्वीर पुलिस स्टेशन के अंदर से खींची गई थी।

     

    और कैमरा…

     

    पुलिस स्टेशन की अलमारी के अंदर बंद था।

     

    उस दिन के बाद वह कैमरा हमेशा के लिए गायब कर दिया गया।

     

    लेकिन कहते हैं, आज भी अगर कोई उस पुराने घर की जगह पर रात के ठीक 3:07 बजे तस्वीर खींचता है…

     

    तो तस्वीर में उसके पीछे एक छोटी बच्ची दिखाई देती है।

     

    वह मुस्कुराती है।

     

    और तस्वीर के पीछे सिर्फ एक सवाल लिखा होता है—

     

    “क्या तुम मेरी आख़िरी तस्वीर बनोगे?”

     

    End

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • आख़िरी तस्वीर — भाग 2

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    सुबह के करीब सात बजे मकान मालिक हरिदास उस पुराने घर के सामने खड़ा था। उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

     

    दरवाज़ा खुला था।

     

    अंदर अजीब-सी खामोशी थी।

     

    “आरव!” उसने आवाज लगाई।

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    वह धीरे-धीरे अंदर गया। फर्श पर आरव का कैमरा पड़ा था। उसके पास मोबाइल भी था, जिसकी स्क्रीन टूट चुकी थी।

     

    हरिदास ने कांपते हाथों से कैमरा उठाया।

     

    कैमरे में सिर्फ एक आख़िरी तस्वीर थी।

     

    उस तस्वीर को देखकर उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    तस्वीर में आरव कमरे के बीचों-बीच खड़ा था।

     

    उसके पीछे सात परछाइयां थीं।

     

    हरिदास ने कैमरा तुरंत बंद कर दिया।

     

    वह जानता था कि अब बहुत देर हो चुकी थी।

     

    पच्चीस साल पहले भी ऐसा ही हुआ था।

     

    लेकिन इस बार फर्क था।

     

    पहली बार उस घर ने किसी बाहरी आदमी को नहीं, बल्कि आरव को चुना था।

     

    हरिदास कैमरा लेकर सीधे घर से बाहर निकल गया।

     

    उसे आरव को ढूंढना था।

     

    लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी था उस तस्वीर का सच पता लगाना।

     

    वह शहर के पुराने हिस्से में रहने वाले एक बुजुर्ग आदमी के पास गया, जिसका नाम देवेंद्र था। देवेंद्र पहले उस घर के मालिक के परिवार के लिए काम करता था।

     

    हरिदास ने कैमरा उसके सामने रख दिया।

     

    देवेंद्र ने तस्वीर देखी।

     

    कुछ सेकंड तक वह बिल्कुल चुप रहा।

     

    फिर उसने पूछा, “उसने ऊपर वाला कमरा खोल दिया था?”

     

    हरिदास ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। कमरा बाहर से बंद था। लेकिन उसने तस्वीर खींच ली थी।”

     

    देवेंद्र ने लंबी सांस ली।

     

    “तो फिर वही हुआ जिसका डर था।”

     

    हरिदास ने बेचैनी से पूछा, “आप मुझे सब कुछ बताइए।”

     

    देवेंद्र कुर्सी पर बैठ गया।

     

    “1998 में उस घर में एक परिवार रहता था। घर का मालिक था रघुवीर। उसके साथ उसकी पत्नी मीरा, बेटा निखिल और दस साल की बेटी तारा रहती थी।”

     

    हरिदास ध्यान से सुनता रहा।

     

    “एक रात परिवार ने घर में एक तस्वीर खिंचवाई। उस तस्वीर में चार लोग थे। लेकिन तस्वीर निकलने के बाद उसमें पांचवां साया दिखाई दिया।”

     

    “वही औरत?” हरिदास ने पूछा।

     

    देवेंद्र ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “फिर?”

     

    “उस रात तारा गायब हो गई।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    “अगली सुबह उसका शरीर घर के ऊपर वाले कमरे में मिला। लेकिन कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद था।”

     

    हरिदास ने पूछा, “पुलिस?”

     

    “पुलिस आई थी। मगर उन्हें कुछ समझ नहीं आया।”

     

    देवेंद्र कुछ पल रुका।

     

    “उसके बाद रघुवीर ने उस तस्वीर को जला दिया।”

     

    “तो फिर यह तस्वीर?”

     

    “तस्वीर जली थी… लेकिन खत्म नहीं हुई।”

     

    हरिदास की रीढ़ में ठंडक दौड़ गई।

     

    देवेंद्र ने आगे कहा, “जिसने भी उस तस्वीर को दोबारा कैमरे में कैद किया, उसके साथ कुछ न कुछ हुआ।”

     

    हरिदास ने कैमरा कसकर पकड़ लिया।

     

    “आरव कहां है?”

     

    देवेंद्र ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “जहां बाकी लोग हैं।”

     

    “कहां?”

     

    देवेंद्र ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसी समय कैमरे की स्क्रीन अपने आप जल उठी।

     

    दोनों चौंक गए।

     

    स्क्रीन पर नई तस्वीर दिखाई दे रही थी।

     

    आरव।

     

    वह एक लंबे अंधेरे गलियारे में खड़ा था।

     

    हरिदास ने घबराकर कहा, “यह तो उस घर में नहीं है।”

     

    देवेंद्र तस्वीर के करीब गया।

     

    “यह घर के अंदर ही है।”

     

    “लेकिन ऐसा कोई गलियारा वहां नहीं है!”

     

    देवेंद्र ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    फिर उसकी नजर तस्वीर के कोने पर पड़ी।

     

    वहां दीवार पर एक पुरानी घड़ी थी।

     

    घड़ी में समय था—

     

    3:07.

     

    देवेंद्र अचानक खड़ा हो गया।

     

    “हमें तुरंत वहां जाना होगा।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि 3:07 वह समय है जब वह दरवाज़ा खुलता है।”

     

    हरिदास ने घड़ी की तरफ देखा।

     

    अभी सुबह के आठ बज रहे थे।

     

    “तो हमारे पास समय है।”

     

    देवेंद्र ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    उसने कैमरे की स्क्रीन दिखाई।

     

    तस्वीर में घड़ी की सुई धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।

     

    3:03…

     

    3:04…

     

    3:05…

     

    जैसे तस्वीर के अंदर समय चल रहा हो।

     

    हरिदास की सांस अटक गई।

     

    “यह कैसे संभव है?”

     

    देवेंद्र ने कहा, “क्योंकि तस्वीर के अंदर भी समय चलता है।”

     

    दोनों तुरंत घर की ओर लौटे।

     

    ऊपर वाला कमरा अभी भी बंद था।

     

    लेकिन अब दरवाज़े के नीचे से हल्की नीली रोशनी बाहर आ रही थी।

     

    हरिदास ने दरवाज़े पर हाथ रखा।

     

    अंदर से किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

     

    “मुझे बाहर निकालो…”

     

    हरिदास पीछे हट गया।

     

    देवेंद्र ने फुसफुसाकर कहा, “आवाज़ का जवाब मत देना।”

     

    फिर रोने की आवाज तेज हो गई।

     

    “काका… मुझे बाहर निकालो…”

     

    देवेंद्र की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तारा…”

     

    हरिदास ने उसे रोकना चाहा।

     

    लेकिन देवेंद्र ने दरवाज़ा खोल दिया।

     

    कमरा खाली था।

     

    वहां सिर्फ एक पुरानी लकड़ी की मेज थी।

     

    मेज पर कई तस्वीरें रखी थीं।

     

    हर तस्वीर में अलग-अलग लोग थे।

     

    कुछ लोग परिवार के थे।

     

    कुछ अनजान।

     

    लेकिन हर तस्वीर में एक चीज समान थी।

     

    पीछे वही काली परछाई।

     

    हरिदास ने एक तस्वीर उठाई।

     

    उसमें आरव था।

     

    वह एक अंधेरे कमरे में बैठा था।

     

    उसकी आंखें बंद थीं।

     

    उसके सामने एक लड़की खड़ी थी।

     

    दस साल की।

     

    पीली फ्रॉक पहने हुए।

     

    देवेंद्र ने तस्वीर देखते ही कहा—

     

    “तारा।”

     

    अचानक पीछे से दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    कमरे की खिड़कियां अपने आप बंद हो गईं।

     

    हरिदास ने दरवाज़ा खींचा।

     

    “खुलो!”

     

    कोई फायदा नहीं हुआ।

     

    तभी मेज पर रखी तस्वीरों में हलचल होने लगी।

     

    एक-एक करके तस्वीरों के अंदर मौजूद लोग अपना सिर घुमाने लगे।

     

    हरिदास पीछे हट गया।

     

    “ये… ये जिंदा हैं।”

     

    देवेंद्र ने कहा, “नहीं।”

     

    “तो फिर?”

     

    “ये इंतजार कर रहे हैं।”

     

    अचानक एक तस्वीर फर्श पर गिर गई।

     

    उसमें आरव दिखाई दे रहा था।

     

    इस बार उसकी आंखें खुली थीं।

     

    वह सीधे कैमरे की तरफ देख रहा था।

     

    और उसके होंठ हिल रहे थे।

     

    हरिदास ने तस्वीर कान के पास कर ली।

     

    बहुत धीमी आवाज सुनाई दी—

     

    “मुझे यहां से निकालो।”

     

    हरिदास ने घबराकर कहा, “आरव!”

     

    देवेंद्र ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “उसकी आवाज पर भरोसा मत करो।”

     

    “लेकिन वह आरव है!”

     

    “हो सकता है।”

     

    देवेंद्र ने तस्वीर को उलट दिया।

     

    पीछे लिखा था—

     

    “एक को बाहर निकालोगे, तो एक को अंदर जाना होगा।”

     

    दोनों चुप हो गए।

     

    तभी कमरे की दीवार पर एक नई तस्वीर दिखाई देने लगी।

     

    जैसे किसी अदृश्य हाथ ने दीवार पर तस्वीर चिपका दी हो।

     

    तस्वीर में हरिदास और देवेंद्र खड़े थे।

     

    उनके बीच आरव था।

     

    लेकिन आरव के चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    हरिदास ने कांपते हुए कहा, “यह तस्वीर अभी खींची गई है?”

     

    देवेंद्र ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    क्योंकि तस्वीर के पीछे तारीख लिखी थी।

     

    17 अगस्त 2026।

     

    और समय था—

     

    3:07 PM.

     

    हरिदास ने अपनी घड़ी देखी।

     

    3:06 PM.

     

    सिर्फ एक मिनट बाकी था।

     

    तभी कमरे में किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “किसे अंदर भेजोगे?”

     

    हरिदास और देवेंद्र दोनों ने पीछे देखा।

     

    वहां कोई नहीं था।

     

    फिर वही आवाज आई—

     

    “हरिदास…”

     

    हरिदास जम गया।

     

    आवाज़ उसकी मृत पत्नी की थी।

     

    “हरिदास… मुझे बहुत साल हो गए हैं।”

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    देवेंद्र ने उसे पकड़ लिया।

     

    “मत सुनो!”

     

    लेकिन आवाज अब बिल्कुल उसके कान के पास थी।

     

    “बस एक तस्वीर खिंचवा दो…”

     

    3:07.

     

    अचानक कैमरा अपने आप उठ गया।

     

    फ्लैश चमका।

     

    कमरा पूरी तरह सफेद रोशनी में डूब गया।

     

    जब रोशनी गायब हुई, देवेंद्र वहां नहीं था।

     

    हरिदास अकेला खड़ा था।

     

    मेज पर एक नई तस्वीर पड़ी थी।

     

    उसने कांपते हाथों से तस्वीर उठाई।

     

    तस्वीर में वह खुद खड़ा था।

     

    उसके पीछे देवेंद्र था।

     

    और उनके बीच…

     

    आरव मुस्कुरा रहा था।

     

    हरिदास ने तस्वीर पलटी।

     

    पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “अब तीसरी तस्वीर तुम्हें खींचनी है।”

     

    उसी क्षण कमरे के कोने से कैमरे की क्लिक की आवाज आई।

     

    हरिदास ने धीरे-धीरे सिर घुमाया।

     

    वहां आरव खड़ा था।

     

    लेकिन उसके पीछे सात नहीं…

     

    आठ परछाइयां थीं।

     

    और उनमें से एक परछाई धीरे-धीरे हरिदास की तरफ बढ़ रही थी।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • भाग 1 — आख़िरी तस्वीर

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। शहर के पुराने हिस्से में बारिश लगातार हो रही थी। सड़कें सुनसान थीं और बिजली बार-बार चमक रही थी। उसी रात आरव अपने नए किराए के घर में पहली बार अकेला था।

     

    घर बहुत पुराना था। दीवारों पर नमी के निशान थे, लकड़ी के दरवाज़े जगह-जगह से उखड़े हुए थे और ऊपर की मंज़िल पर एक छोटा-सा कमरा था, जिसे मकान मालिक ने साफ़ करने से मना किया था।

     

    आरव को यह बात अजीब लगी थी।

     

    जब उसने पूछा था, “वह कमरा बंद क्यों है?”

     

    मकान मालिक ने बस इतना कहा था, “पुराना सामान है। आपको उसकी जरूरत नहीं पड़ेगी।”

     

    आरव ने ज्यादा सवाल नहीं किए।

     

    वह पेशे से फोटोग्राफर था। पुराने घरों और सुनसान जगहों की तस्वीरें लेना उसका शौक था। इसलिए घर की अजीब हालत देखकर डरने के बजाय वह उत्साहित था।

     

    रात को खाना खाने के बाद उसने अपना कैमरा निकाला और घर की तस्वीरें लेने लगा।

     

    सीढ़ियां…

     

    खिड़की…

     

    पुरानी घड़ी…

     

    फिर उसकी नजर सामने की दीवार पर पड़ी।

     

    वहां एक पुरानी तस्वीर लगी थी।

     

    तस्वीर में चार लोग खड़े थे—एक बुजुर्ग आदमी, एक औरत, करीब दस साल की बच्ची और एक जवान लड़का। सभी कैमरे की तरफ देख रहे थे।

     

    लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि तस्वीर के पीछे की तारीख साफ दिखाई दे रही थी।

     

    “17 अगस्त 1998.”

     

    आरव ने तस्वीर उतारी और अपने कैमरे से उसकी फोटो खींच ली।

     

    तभी ऊपर से कुछ गिरने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    आरव चौंक गया।

     

    उसने ऊपर देखा।

     

    आवाज़ उसी बंद कमरे की तरफ से आई थी।

     

    कुछ सेकंड तक वह सीढ़ियों के पास खड़ा रहा। फिर उसने खुद को समझाया कि शायद कोई पुरानी चीज गिर गई होगी।

     

    वह ऊपर गया।

     

    कमरे का दरवाज़ा बंद था।

     

    आरव ने हैंडल घुमाया।

     

    दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    अंदर से हल्की-सी खरोंचने की आवाज आ रही थी।

     

    खर्र… खर्र…

     

    आरव का दिल तेज धड़कने लगा।

     

    “कोई है?” उसने धीरे से पूछा।

     

    आवाज़ तुरंत बंद हो गई।

     

    कुछ पल बाद उसने नीचे लौटने का फैसला किया।

     

    कमरे में वापस आकर उसने कैमरे की तस्वीरें लैपटॉप में डालनी शुरू कीं।

     

    एक-एक करके तस्वीरें सामने आने लगीं।

     

    लेकिन जब उसने उस पुरानी तस्वीर वाली फोटो खोली, तो उसकी सांस रुक गई।

     

    तस्वीर में अब चार लोग नहीं थे।

     

    उनके पीछे एक पांचवीं परछाई खड़ी थी।

     

    एक औरत।

     

    उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    आरव ने आंखें मलकर स्क्रीन को देखा।

     

    उसे लगा शायद कैमरे की रोशनी के कारण ऐसा दिख रहा है।

     

    उसने फोटो को ज़ूम किया।

     

    परछाई बिल्कुल साफ थी।

     

    काले कपड़े।

     

    लंबे बाल।

     

    और चेहरा पूरी तरह नीचे झुका हुआ।

     

    आरव ने तस्वीर सेव की और कैमरा बंद कर दिया।

     

    तभी कमरे की खिड़की अपने आप खुल गई।

     

    तेज़ हवा अंदर आई।

     

    लाइट चली गई।

     

    पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।

     

    आरव ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    लेकिन फर्श पर गीले पैरों के निशान थे।

     

    खिड़की से लेकर उसके कैमरे तक।

     

    आरव धीरे-धीरे कैमरे के पास गया।

     

    कैमरा अभी बंद था।

     

    फिर भी उसकी स्क्रीन जल उठी।

     

    स्क्रीन पर एक तस्वीर दिखाई दे रही थी।

     

    आरव ने उसे देखा और उसके हाथ कांपने लगे।

     

    वह तस्वीर उसी कमरे की थी।

     

    लेकिन उसमें आरव खुद खड़ा था।

     

    और उसके पीछे वही काले कपड़ों वाली औरत खड़ी थी।

     

    आरव ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

     

    कुछ नहीं था।

     

    वह घबराकर कमरे से बाहर निकला।

     

    नीचे पहुंचकर उसने मकान मालिक को फोन किया।

     

    “आपने मुझे इस घर के बारे में सब कुछ नहीं बताया,” आरव ने गुस्से में कहा।

     

    दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक चुप्पी रही।

     

    फिर मकान मालिक ने पूछा, “आपने ऊपर वाले कमरे की तस्वीर देख ली?”

     

    आरव चौंका।

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    मकान मालिक की आवाज अचानक धीमी हो गई।

     

    “क्योंकि उस घर में जो भी उस तस्वीर को कैमरे में कैद करता है… वह ज्यादा दिन जिंदा नहीं रहता।”

     

    आरव के हाथ से मोबाइल लगभग गिर गया।

     

    “क्या मतलब?”

     

    मकान मालिक ने जवाब नहीं दिया।

     

    फोन कट गया।

     

    उसी समय ऊपर से किसी के चलने की आवाज आई।

     

    धीरे-धीरे।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    जैसे कोई सीढ़ियों से नीचे उतर रहा हो।

     

    आरव ने मोबाइल की रोशनी सीढ़ियों पर डाली।

     

    कोई दिखाई नहीं दिया।

     

    लेकिन आवाज जारी रही।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    फिर अचानक उसके फोन पर एक नई तस्वीर आई।

     

    अज्ञात नंबर से।

     

    आरव ने तस्वीर खोली।

     

    उसमें वही पुरानी तस्वीर थी।

     

    चार लोग…

     

    और पीछे खड़ी पांचवीं परछाई।

     

    लेकिन इस बार परछाई का चेहरा थोड़ा ऊपर उठा हुआ था।

     

    आरव ने तस्वीर को ज़ूम किया।

     

    उसका खून जम गया।

     

    चेहरा किसी औरत का नहीं था।

     

    वह चेहरा आरव की अपनी मां का था।

     

    उसकी मां की मौत छह साल पहले हो चुकी थी।

     

    तभी फोन पर एक मैसेज आया।

     

    “मुझे ढूंढना मत।”

     

    आरव ने कांपते हुए लिखा—

     

    “आप कौन हैं?”

     

    कुछ सेकंड बाद जवाब आया।

     

    “मैं वो हूं… जिसकी आख़िरी तस्वीर तुमने खींची है।”

     

    आरव ने तुरंत घर छोड़ने का फैसला किया।

     

    उसने बैग उठाया और दरवाज़े की तरफ दौड़ा।

     

    लेकिन मुख्य दरवाज़ा बंद था।

     

    उसने चाबी घुमाई।

     

    चाबी घूम रही थी, मगर दरवाज़ा नहीं खुल रहा था।

     

    पीछे से किसी के हंसने की आवाज आई।

     

    बहुत धीमी।

     

    बहुत करीब।

     

    आरव धीरे-धीरे मुड़ा।

     

    सीढ़ियों के नीचे वही काले कपड़ों वाली औरत खड़ी थी।

     

    उसके लंबे बाल चेहरे पर लटक रहे थे।

     

    आरव पीछे हटने लगा।

     

    औरत ने अपना सिर उठाया।

     

    चेहरा अब साफ दिखाई दे रहा था।

     

    वह उसकी मां थी।

     

    लेकिन उसकी आंखें पूरी तरह काली थीं।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “बेटा… एक तस्वीर और ले लो।”

     

    आरव का कैमरा अपने आप चालू हो गया।

     

    स्क्रीन पर लिखा आया—

     

    “आख़िरी तस्वीर — 17 अगस्त 2026.”

     

    और कैमरे ने खुद ही तस्वीर खींच ली।

     

    फ्लैश चमका।

     

    उस एक पल में आरव ने देखा कि उसके पीछे दर्जनों लोग खड़े थे।

     

    सबके चेहरे पहचान में नहीं आ रहे थे।

     

    और सबसे आगे वही चार लोग खड़े थे, जो पुरानी तस्वीर में थे।

     

    फिर अंधेरा छा गया।

     

    सुबह जब मकान मालिक घर पहुंचा, तो दरवाज़ा खुला था।

     

    आरव कहीं नहीं था।

     

    सिर्फ उसका कैमरा फर्श पर पड़ा था।

     

    कैमरे में आख़िरी तस्वीर मौजूद थी।

     

    उस तस्वीर में आरव अकेला खड़ा था।

     

    लेकिन उसके पीछे एक नहीं…

     

    सात परछाइयां थीं।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • सुनसान रास्ता..(part-6)

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

     

     

    आरव और कबीर जंगल से बाहर निकलकर सड़क पर आ गए।

     

    सुबह होने वाली थी।

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    उसने कबीर को गले लगा लिया।

     

    लेकिन कबीर बिल्कुल चुप था।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    कबीर ने सड़क के किनारे लगे बोर्ड की तरफ इशारा किया।

     

    वहां फिर वही शब्द लिखे थे—

     

    “पीछे देखना मना है।”

     

    आरव ने डरते हुए कहा—

     

    “अब तो हम बाहर आ गए हैं।”

     

    कबीर ने धीरे से उसकी तरफ देखा और कहा—

     

    “हम दोनों नहीं आए हैं।”

     

    आरव ने उसकी बात का मतलब नहीं समझा।

     

    तभी सड़क पर एक ट्रक आया और उसकी हेडलाइट की रोशनी दोनों पर पड़ी।

     

    आरव ने जमीन पर देखा।

     

    कबीर की परछाई वहां थी।

     

    लेकिन आरव की परछाई…

     

    नहीं थी।

     

    उसका दिल बैठ गया।

     

    तभी पीछे से किसी के कदमों की आवाज आई।

     

    छप… छप… छप…

     

    वही गीले पैरों की आवाज।

     

    कबीर ने आरव का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    “भैया… जो भी हो, पीछे मत देखना।”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    उसके कान के पास वही आवाज आई—

     

    “बहुत अच्छा… तुमने पीछे नहीं देखा।”

     

    कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “लेकिन अब कोई और देख चुका है।”

     

    आरव ने धीरे से सामने देखा।

     

    सड़क के दूसरी तरफ एक आदमी खड़ा था।

     

    वह उनकी तरफ देख रहा था।

     

    उस आदमी ने अचानक पीछे मुड़कर देखा।

     

    और उसी पल उसकी परछाई जमीन से गायब हो गई।

     

    आरव समझ गया…

     

    ये कहानी खत्म नहीं हुई थी।

     

    क्योंकि उसी समय उसकी जेब में रखा मोबाइल अपने आप बजने लगा।

     

    स्क्रीन पर एक मैसेज था—

     

    “अगला नंबर तुम्हारा नहीं… उस आदमी का है।”

     

    और नीचे लिखा था—

     

    “पीछे देखना मना है।”

     

    End

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।