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लेखक: Alka Singh

Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

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  • समाज का आईना भाग 3

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    अगली सुबह आरव सीधे पुराने मंदिर पहुँचा।

     

    हरिदास बाबा मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे थे।

     

    आरव ने उनके सामने लाल डायरी रख दी।

     

    बाबा ने डायरी देखते ही आँखें बंद कर लीं।

     

    “तुमने इसे खोल लिया।”

     

    “आप जानते थे इसके बारे में?”

     

    बाबा ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    आरव ने कठोर आवाज में पूछा—

     

    “इसमें आपका नाम क्यों है?”

     

    काफी देर तक चुप रहने के बाद बाबा बोले—

     

    “क्योंकि मैं भी दोषी हूँ।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    “किस चीज का?”

     

    बाबा ने मंदिर के पीछे बने छोटे कमरे की ओर इशारा किया।

     

    “वहाँ एक पुराना संदूक है। उसे खोलो।”

     

    आरव ने संदूक खोला।

     

    अंदर दर्जनों पुराने कागज थे।

     

    जमीन के कागज।

     

    शिकायतें।

     

    पुराने अखबार।

     

    और कई तस्वीरें।

     

    एक तस्वीर में ठाकुर रघुवीर सिंह था।

     

    उसके पास एक युवा हरिदास खड़ा था।

     

    आरव ने तस्वीर उठाई।

     

    “आप ठाकुर के साथ थे?”

     

    बाबा की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मैं उसका मुंशी था।”

     

    आरव चुप रहा।

     

    “मैंने उसकी बहुत मदद की,” बाबा बोले। “गरीबों की जमीन के कागज बदले। झूठे दस्तावेज बनाए। लोगों को धमकाया। और हर बार खुद को समझाया कि मैं सिर्फ नौकरी कर रहा हूँ।”

     

    “फिर?”

     

    “फिर एक दिन मैंने उस आईने को देखा।”

     

    बाबा की आवाज काँपने लगी।

     

    “ठाकुर ने मुझे उसके कमरे में बुलाया था। उसने कहा था कि आईना मुझे मेरा भविष्य दिखाएगा।”

     

    “और आपने क्या देखा?”

     

    बाबा ने सिर उठाया।

     

    “मैंने खुद को देखा… लेकिन बूढ़ा नहीं। एक लाश के पास खड़ा देखा।”

     

    आरव की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।

     

    “किसकी लाश?”

     

    बाबा ने कहा—

     

    “एक लड़की की।”

     

    कुछ पल के लिए मंदिर में बिल्कुल सन्नाटा छा गया।

     

    “उस लड़की का नाम मीरा था। वह किसान की बेटी थी। उसके पिता ने ठाकुर की जमीन हड़पने की कोशिश का विरोध किया था।”

     

    “क्या हुआ उसके साथ?”

     

    बाबा की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “मीरा ने सबूत इकट्ठा कर लिए थे। वह शहर जाकर शिकायत करने वाली थी। लेकिन वह कभी शहर नहीं पहुँच पाई।”

     

    आरव समझ गया।

     

    “उसे मार दिया गया?”

     

    बाबा ने सिर झुका लिया।

     

    “हाँ।”

     

    “और आपने?”

     

    “मैंने सब देखा।”

     

    “फिर पुलिस को क्यों नहीं बताया?”

     

    बाबा ने काँपते हुए कहा—

     

    “क्योंकि मैं डर गया था।”

     

    यही वह बात थी जिसे समाज बार-बार दोहराता है।

     

    अन्याय देखकर चुप रहना।

     

    गलत देखकर आँखें बंद कर लेना।

     

    और फिर खुद को निर्दोष समझना।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “मीरा की लाश कहाँ है?”

     

    बाबा ने धीरे से कहा—

     

    “हवेली के नीचे।”

     

    उसी रात आरव और कबीर हवेली पहुँचे।

     

    हरिदास बाबा ने उन्हें एक पुराना नक्शा दिया था।

     

    हवेली के तहखाने में जाने का रास्ता एक टूटी हुई दीवार के पीछे था।

     

    दोनों नीचे उतरे।

     

    सीढ़ियाँ इतनी पुरानी थीं कि हर कदम पर धूल उड़ रही थी।

     

    नीचे पहुँचकर उन्हें एक कमरा मिला।

     

    कमरे की दीवार पर दर्जनों नाम लिखे थे।

     

    कुछ नाम मिटाए गए थे।

     

    कुछ के नीचे लाल निशान थे।

     

    बीच में एक बड़ा आईना लगा था।

     

    आरव ने उसमें देखा।

     

    इस बार उसे अपना प्रतिबिंब नहीं दिखा।

     

    उसे पूरा सूरजपुर दिखाई दिया।

     

    लोगों के घर।

     

    गलियाँ।

     

    मंदिर।

     

    बाजार।

     

    और हर व्यक्ति के पीछे उसकी एक काली परछाईं।

     

    किसी की परछाईं लालच थी।

     

    किसी की झूठ।

     

    किसी की हिंसा।

     

    किसी की चुप्पी।

     

    फिर एक आवाज आई—

     

    “तुम्हें लगता है राक्षस बाहर है?”

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    “राक्षस कौन है?”

     

    आईने से जवाब आया—

     

    “जिस दिन इंसान गलत देखकर भी चुप रहता है, उसी दिन उसके भीतर राक्षस पैदा होता है।”

     

    अचानक कबीर चीख पड़ा।

     

    “आरव!”

     

    आरव ने देखा—कबीर आईने के सामने खड़ा था।

     

    आईने में कबीर का चेहरा नहीं था।

     

    वहाँ कबीर किसी आदमी पर हमला कर रहा था।

     

    आरव ने उसे पीछे खींच लिया।

     

    “तूने क्या देखा?”

     

    कबीर ने काँपते हुए कहा—

     

    “मैंने… अपना सच देखा।”

     

    “क्या सच?”

     

    कबीर ने कुछ नहीं कहा।

     

    तभी तहखाने में किसी लड़की के रोने की आवाज आई।

     

    बहुत धीमी।

     

    बहुत दूर से।

     

    “मुझे बाहर निकालो…”

     

    आरव ने आवाज का पीछा किया।

     

    दीवार के पीछे एक बंद जगह थी।

     

    उसने पत्थर हटाया।

     

    अंदर एक पुराना लकड़ी का संदूक मिला।

     

    संदूक के अंदर कपड़े का एक टुकड़ा और एक पुरानी चूड़ी थी।

     

    कपड़े पर खून के धब्बे थे।

     

    और नीचे एक छोटा-सा कागज था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “मैं मीरा हूँ। अगर यह कागज किसी को मिले, तो समझ लेना कि मुझे समाज ने नहीं, समाज की चुप्पी ने मारा है।”

     

    आरव की आँखें भर आईं।

     

    तभी पीछे से दरवाजा बंद हो गया।

     

    कबीर ने जोर से उसे खींचा।

     

    लेकिन दरवाजा नहीं खुला।

     

    आईने में मीरा दिखाई दी।

     

    उसका चेहरा डरावना नहीं था।

     

    वह सिर्फ दुखी थी।

     

    उसने आरव की तरफ देखकर कहा—

     

    “मुझे न्याय नहीं चाहिए… मुझे सच चाहिए।”

     

    फिर आईने की सतह पर एक नया नाम उभरा—

     

    “सूरजपुर का प्रधान।”

     

    आरव समझ गया।

     

    अगला चेहरा सिर्फ एक आदमी का नहीं था।

     

    यह चेहरा पूरे समाज के सामने आने वाला था।

     

    और शायद इस बार आईना किसी एक इंसान को नहीं, पूरे कस्बे को दिखाने वाला था।

  • समाज का आईना भाग 2

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    आरव कुछ समझ पाता, उससे पहले ही कमरे में मौजूद वह रहस्यमयी औरत गायब हो गई।

     

    उसके हाथ में पकड़ी लाल डायरी फर्श पर पड़ी थी।

     

    आरव ने डायरी उठाई।

     

    उसका पहला पन्ना खाली था।

     

    दूसरा पन्ना भी खाली।

     

    तीसरे पन्ने पर केवल एक तारीख लिखी थी—

     

    17 अगस्त 1986।

     

    उसके नीचे लिखा था—

     

    “जिस दिन पहला झूठ बोला गया, उसी दिन आईना बना।”

     

    आरव ने पन्ना पलटा।

     

    अब उस पर कुछ लिखा हुआ था।

     

    “हर समाज अपने लिए कुछ चेहरे चुनता है। किसी को अच्छा आदमी कहता है, किसी को बुरा। लेकिन असली सच उन चेहरों के पीछे छिपा रहता है।”

     

    आरव की उंगलियाँ काँपने लगीं।

     

    अचानक हवेली के बाहर किसी के चलने की आवाज आई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    कोई दरवाजे के पास आकर रुक गया।

     

    आरव ने टॉर्च जलाई।

     

    दरवाजे पर उसका दोस्त कबीर खड़ा था।

     

    “तू यहाँ क्या कर रहा है?” कबीर ने पूछा।

     

    आरव ने राहत की साँस ली।

     

    “तू मेरा पीछा कर रहा था?”

     

    कबीर ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ। मुझे लगा तू अकेला यहाँ आकर कोई बेवकूफी करेगा।”

     

    दोनों हवेली से बाहर निकल आए।

     

    लेकिन आरव ने लाल डायरी अपने बैग में रख ली।

     

    अगली सुबह उसने डायरी पढ़ना शुरू किया।

     

    डायरी में सूरजपुर के कई लोगों के बारे में लिखा था।

     

    सबसे पहला नाम था—

     

    शंभूनाथ।

     

    शंभूनाथ कस्बे का सबसे बड़ा व्यापारी था। बाहर से वह बहुत धार्मिक और दयालु माना जाता था। मंदिर में रोज पूजा करता और गरीबों को खाना बाँटता।

     

    लेकिन डायरी में लिखा था कि वह मजदूरों को महीनों की मजदूरी नहीं देता था।

     

    आरव ने उसी दिन शंभूनाथ से मिलने का फैसला किया।

     

    शंभूनाथ ने उसे बड़े प्यार से बैठाया।

     

    “बेटा, पत्रकार हो। चाय पियोगे?”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “आप अपने मजदूरों को समय पर पैसा क्यों नहीं देते?”

     

    शंभूनाथ का चेहरा बदल गया।

     

    “किसने कहा तुमसे?”

     

    “बस सवाल पूछा है।”

     

    वह हँसने लगा।

     

    “आजकल के पत्रकार भी न… गरीबों के नाम पर कहानी बनाते हैं।”

     

    आरव ने उसे गौर से देखा।

     

    वह आदमी बाहर से जितना शांत था, भीतर से उतना ही बेचैन।

     

    शाम को आरव को अपने कमरे में वही आवाज सुनाई दी—

     

    “पहला चेहरा देख लिया?”

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    उसने आईने के सामने जाकर खुद को देखा।

     

    लेकिन आईने में वह अकेला नहीं था।

     

    उसके पीछे शंभूनाथ खड़ा था।

     

    आरव पलटा।

     

    कमरा खाली था।

     

    फिर आईने की तरफ देखा।

     

    इस बार शंभूनाथ का चेहरा बदल रहा था।

     

    उसकी आँखें लाल हो गईं।

     

    मुँह से खून बहने लगा।

     

    और फिर आईने में लिखा दिखाई दिया—

     

    “झूठ का पहला चेहरा।”

     

    अगली सुबह पूरे कस्बे में खबर फैल गई।

     

    शंभूनाथ रात में अपने घर के कमरे में मृत पाया गया था।

     

    उसके सामने एक बड़ा आईना रखा था।

     

    और आईने पर उंगली से लिखा था—

     

    “मजदूरी का हिसाब बाकी है।”

     

    पुलिस ने इसे हत्या माना।

     

    कस्बे में डर फैल गया।

     

    लोग कहने लगे कि ठाकुर की हवेली का श्राप लौट आया है।

     

    लेकिन आरव को यकीन था कि यह सिर्फ श्राप नहीं था।

     

    किसी को उन लोगों के राज पता थे।

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “तू इस मामले से दूर क्यों नहीं हो जाता?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “क्योंकि कोई लोगों को मार नहीं रहा… कोई उन्हें उनके किए का हिसाब दिखा रहा है।”

     

    “और अगर अगला नाम तेरा हुआ तो?”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    उसी रात उसने लाल डायरी फिर खोली।

     

    एक नया पन्ना अपने आप खुल गया।

     

    उस पर उसका नाम लिखा था।

     

    आरव मिश्रा।

     

    उसके नीचे—

     

    “सच लिखने वाला आदमी भी सच से भागता है।”

     

    आरव का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    उसे अपने जीवन की एक घटना याद आई।

     

    तीन साल पहले उसने एक बड़े उद्योगपति के खिलाफ भ्रष्टाचार की खबर लिखी थी।

     

    लेकिन जब उस उद्योगपति ने उसे पैसे देने की पेशकश की थी, आरव ने खबर रोक दी थी।

     

    उसने खुद को समझाया था कि परिवार की जरूरत थी।

     

    मगर वह भी तो एक झूठ था।

     

    वह भी तो बिक गया था।

     

    आईने में उसका चेहरा अचानक बदल गया।

     

    उसे अपना चेहरा नहीं दिखाई दिया।

     

    एक आदमी दिखाई दिया जो नोटों का बंडल हाथ में लिए खड़ा था।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “नहीं…”

     

    आईने वाला आदमी मुस्कुराया।

     

    “तुम दूसरों का सच लिखते हो… अपना कब लिखोगे?”

     

    आरव ने आईने पर मुक्का मारा।

     

    शीशा नहीं टूटा।

     

    बल्कि उसके अंदर से आवाज आई—

     

    “समाज का सबसे खतरनाक झूठ वह होता है जिसे इंसान खुद से बोलता है।”

     

    अचानक कमरे की बत्ती बुझ गई।

     

    अंधेरे में लाल डायरी के पन्ने अपने आप पलटने लगे।

     

    फिर एक नाम पर आकर रुक गए।

     

    हरिदास बाबा।

     

    आरव की धड़कन तेज हो गई।

     

    वही बाबा जिन्होंने उसे हवेली से दूर रहने को कहा था।

     

    अब सवाल यह था—

     

    क्या हरिदास बाबा भी किसी सच को छिपा रहे थे?

     

    आरव को नहीं पता था कि इस सवाल का जवाब उसे सूरजपुर के सबसे पुराने मंदिर में मिलने वाला था।

     

    और वहाँ उसका सामना उस आदमी से होने वाला था, जो पिछले चालीस सालों से आईने का रहस्य छिपाए बैठा था।

  • समाज का आईना” (part-1)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    शहर से लगभग बीस किलोमीटर दूर एक छोटा-सा कस्बा था—सूरजपुर। नाम भले ही सूरजपुर था, लेकिन शाम ढलते ही यह जगह किसी अंधेरी दुनिया में बदल जाती थी। कस्बे के आखिरी छोर पर एक बहुत पुरानी हवेली थी, जिसे लोग “आईने वाली हवेली” कहते थे।

     

    हवेली करीब सौ साल पुरानी थी। उसकी ऊँची दीवारों पर काई जम चुकी थी, खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाजे पर लगी लोहे की जंजीर हमेशा हवा के साथ खड़खड़ाती रहती थी।

     

    लोग कहते थे कि उस हवेली में एक बहुत बड़ा आईना था।

     

    ऐसा आईना, जिसमें इंसान अपना चेहरा नहीं, बल्कि अपना असली चेहरा देखता था।

     

    कस्बे के बुजुर्गों का कहना था कि कई साल पहले हवेली का मालिक ठाकुर रघुवीर सिंह था। वह पूरे इलाके में बहुत सम्मानित आदमी माना जाता था। मंदिर में सबसे बड़ा दान वही देता था, गरीबों के सामने खुद को उनका मसीहा बताता था और हर साल बड़ी-बड़ी धार्मिक सभाएँ करवाता था।

     

    लेकिन उसकी हवेली के अंदर कुछ और ही कहानी थी।

     

    कहा जाता था कि ठाकुर गरीब किसानों की जमीन हड़पता था। जो उसके खिलाफ आवाज उठाता, उसे धमकाया जाता। मगर बाहर की दुनिया में ठाकुर को लोग “धर्मात्मा” कहते थे।

     

    एक रात ठाकुर ने उसी रहस्यमयी आईने के सामने खड़े होकर खुद को देखा।

     

    आईने में उसका चेहरा नहीं था।

     

    वहाँ एक ऐसा आदमी खड़ा था जिसके हाथ खून से सने थे।

     

    ठाकुर घबरा गया।

     

    उसने आईना तोड़ने की कोशिश की, लेकिन तभी आईने के अंदर से किसी औरत की आवाज आई—

     

    “दुनिया से झूठ बोल सकते हो ठाकुर… अपने आप से नहीं।”

     

    अगली सुबह ठाकुर अपनी हवेली के अंदर मृत मिला।

     

    उसकी आँखें खुली थीं और चेहरे पर ऐसा डर था जैसे मरने से पहले उसने कोई भयानक चीज देखी हो।

     

    तब से हवेली बंद कर दी गई।

     

    लेकिन असली कहानी वर्षों बाद शुरू हुई।

     

    सूरजपुर में रहने वाला आरव शहर से अपने कस्बे वापस आया था। वह पत्रकार था और समाज में फैले अंधविश्वास और अपराध पर लिखता था।

     

    उसे अपने दादा की पुरानी डायरी मिली थी।

     

    डायरी के आखिरी पन्ने पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

     

    “जिस दिन समाज अपने चेहरे से पर्दा हटाएगा, आईना फिर जाग जाएगा।”

     

    आरव ने उस लाइन को कई बार पढ़ा।

     

    उसे लगा कि शायद उसके दादा भी उसी हवेली की कहानी से परिचित थे।

     

    अगले दिन उसने कस्बे के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति, हरिदास बाबा, से इस बारे में पूछा।

     

    बाबा का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

     

    “उस हवेली का नाम दोबारा मत लेना।”

     

    “क्यों?” आरव ने पूछा।

     

    “क्योंकि वहाँ आईना है।”

     

    आरव हँस पड़ा।

     

    “आईना तो हर घर में होता है बाबा।”

     

    हरिदास बाबा ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “हर आईना चेहरा दिखाता है बेटा… लेकिन वह आईना नीयत दिखाता है।”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    बाबा ने आगे कहा—

     

    “वह आईना किसी बुरे आदमी को नहीं मारता। वह सिर्फ उसे उसका सच दिखाता है। डर इस बात का है कि इंसान अपना सच देखकर क्या करता है।”

     

    उस रात आरव ने तय किया कि वह हवेली जाएगा।

     

    रात के करीब ग्यारह बजे वह टॉर्च लेकर हवेली के सामने पहुँचा।

     

    हवा बहुत तेज थी।

     

    दरवाजा बिना छुए ही धीरे-धीरे खुल गया।

     

    चर्ररर…

     

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    अंदर धूल और सड़ांध की गंध थी। दीवारों पर पुराने चित्र टंगे थे। हर चित्र में ठाकुर परिवार के लोग मुस्कुरा रहे थे।

     

    लेकिन अजीब बात यह थी कि जैसे-जैसे आरव आगे बढ़ता, उसे लगता कि उन चित्रों की आँखें उसका पीछा कर रही हैं।

     

    वह एक बड़े कमरे में पहुँचा।

     

    कमरे के बीचोंबीच एक विशाल आईना कपड़े से ढका हुआ था।

     

    आरव ने धीरे से कपड़ा हटाया।

     

    आईना काला था।

     

    उसमें उसका प्रतिबिंब दिखाई ही नहीं दे रहा था।

     

    फिर अचानक आईने की सतह पर हल्की-सी लहर उठी।

     

    और उसके सामने उसका अपना चेहरा दिखाई दिया।

     

    लेकिन वह मुस्कुरा नहीं रहा था।

     

    आईने वाला आरव उसे घूर रहा था।

     

    फिर उसने धीरे से अपना हाथ उठाया।

     

    आरव ने हाथ नहीं उठाया था।

     

    आईने के अंदर का आरव मुस्कुराया और उसके होंठ हिले—

     

    “तुम सच जानना चाहते हो?”

     

    कमरे की सारी खिड़कियाँ एक साथ बंद हो गईं।

     

    टॉर्च बुझ गई।

     

    और अंधेरे में एक फुसफुसाहट गूँजी—

     

    “तो पहले अपना सच देखो…”

     

    आरव ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    दरवाजे पर कोई खड़ा था।

     

    एक औरत।

     

    उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    लेकिन उसके हाथ में एक पुरानी लाल डायरी थी।

     

    और वह धीरे-धीरे आरव की तरफ बढ़ रही थी।

     

    आरव पीछे हटने लगा।

     

    तभी औरत ने कहा—

     

    “यह आईना समाज का है… और इसमें हर किसी का चेहरा है।”

     

    अचानक आईने में कई चेहरे दिखाई देने लगे।

     

    पुलिस वाले।

     

    नेता।

     

    पुजारी।

     

    व्यापारी।

     

    शिक्षक।

     

    गरीब।

     

    अमीर।

     

    और उन सबके चेहरों के पीछे एक दूसरा चेहरा छिपा था।

     

    एक ऐसा चेहरा जो दुनिया से छिपाया गया था।

     

    आरव की साँस रुक गई।

     

    उसे समझ आ गया—

     

    यह सिर्फ एक हवेली की कहानी नहीं थी।

     

    यह पूरे समाज का आईना था।

     

    और आईना अब जाग चुका था।

  • PAPO KA SHAHAR (भाग 5 )आखिरी पाप

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

    मंदिर के अंदर खड़ा आदमी धीरे-धीरे प्रकाश में आया।

    अर्जुन की साँस रुक गई।

    “पापा…?”

    सामने खड़ा आदमी बिल्कुल उसके पिता जैसा था।

    वही चेहरा।

    वही आँखें।

    वही आवाज।

    लेकिन उसके पिता की मृत्यु को पाँच साल हो चुके थे।

    अर्जुन पीछे हट गया।

    “तुम मेरे पिता नहीं हो।”

    आदमी मुस्कुराया।

    “तुम्हें सच और झूठ में फर्क करना अभी भी नहीं आता।”

    अर्जुन ने पूछा—

    “तुम कौन हो?”

    उस आदमी ने मंदिर की मूर्ति की तरफ देखा।

    “मैं वह हूँ जिसने इस शहर के पापों को इतने सालों तक संभालकर रखा।”

    अचानक मंदिर की सारी मूर्तियों की आँखें लाल हो गईं।

    मीरा अर्जुन के पास आकर खड़ी हो गई।

    उसने फुसफुसाकर कहा—

    “इसे मत सुनना।”

    “क्यों?”

    “क्योंकि यह तुम्हारे डर से बात करता है।”

    वह आदमी हँसा।

    “मीरा… तुम अभी भी अधूरी कहानी हो।”

    मीरा की आँखों में गुस्सा आ गया।

    “तुमने मुझे खत्म करने की कोशिश की थी।”

    “लेकिन तुम बच गईं।”

    “क्योंकि सच को मारना आसान नहीं।”

    आदमी ने हाथ उठाया।

    मंदिर की दीवारों पर दृश्य उभरने लगे।

    सूरजपुर नहीं।

    कालपुर।

    सालों पहले का कालपुर।

    गरीब लोग भूखे थे।

    अमीर लोग धन जमा कर रहे थे।

    पुलिस अपराधियों से मिली थी।

    नेता झूठ बोल रहे थे।

    लोग सब जानते थे।

    लेकिन कोई कुछ नहीं करता था।

    फिर उस आदमी की आवाज आई—

    “यहीं से मेरा जन्म हुआ।”

    अर्जुन ने पूछा—

    “तुम कौन हो?”

    “मैं किसी एक इंसान का नाम नहीं।”

    उसने अपना चेहरा बदलना शुरू किया।

    पहले वह बूढ़ा बना।

    फिर जवान।

    फिर बच्चा।

    फिर महिला।

    फिर अर्जुन।

    फिर मीरा।

    अर्जुन डर गया।

    “तुम…?”

    “मैं इस शहर के हर पाप का चेहरा हूँ।”

    मीरा ने कहा—

    “यह कालपुर की आत्मा है।”

    आदमी हँसा।

    “आत्मा नहीं।”

    उसने अर्जुन की तरफ देखा।

    “मैं इंसानों की इच्छाओं से पैदा हुआ हूँ।”

    अर्जुन समझ गया।

    लालच।

    झूठ।

    विश्वासघात।

    हिंसा।

    और चुप्पी।

    ये सब मिलकर इस डरावनी शक्ति को जन्म देते रहे थे।

    लेकिन एक सवाल अभी भी बाकी था।

    “मेरा सातवाँ पाप क्या है?”

    आदमी मुस्कुराया।

    “तुमने सोचा था कि तुम्हारा पाप हत्या है।”

    “लेकिन वह तो दुर्घटना थी।”

    “हाँ।”

    “तो फिर?”

    वह धीरे-धीरे अर्जुन के पास आया।

    “तुम्हारा सबसे बड़ा पाप है… सच जानते हुए भी खुद को निर्दोष मानना।”

    अर्जुन चुप हो गया।

    उसके जीवन की सारी घटनाएँ उसकी आँखों के सामने घूमने लगीं।

    वह खबर जिसे उसने पैसे लेकर दबाया।

    वह आदमी जिसे उसने बिना पूरी जाँच के दोषी बताया।

    वह दुर्घटना जिसे उसके पिता ने छिपाया।

    और वह समय जब उसने अपने पिता पर सवाल नहीं उठाए।

    हर बार उसने खुद को समझाया था—

    “मेरी गलती नहीं।”

    लेकिन वह सच नहीं था।

    उसने धीरे से कहा—

    “हाँ।”

    काली शक्ति रुक गई।

    “क्या कहा?”

    “मैं दोषी हूँ।”

    मंदिर में अचानक सन्नाटा छा गया।

    अर्जुन ने आगे कहा—

    “मैंने लोगों के सच से अपना फायदा उठाया।”

    “मैंने अपनी गलतियों से आँखें बंद कीं।”

    “मैंने अपने पिता को सवालों से बचाया।”

    “मैंने नैना के मामले में सच खोजने की कोशिश नहीं की।”

    “और मैंने कई बार दूसरों को दोषी ठहराया, जबकि खुद निर्दोष नहीं था।”

    काली शक्ति पीछे हटने लगी।

    मीरा ने कहा—

    “यही इसकी कमजोरी है।”

    अर्जुन ने पूछा—

    “क्या?”

    “सच।”

    काली शक्ति चीखने लगी।

    मंदिर की दीवारें काँपने लगीं।

    शहर की सारी घंटियाँ एक साथ बजने लगीं।

    टन! टन! टन!

    लोग सड़कों पर गिरने लगे।

    उनके हाथों से पैसे और कागज गिर गए।

    लाल आँखें सामान्य होने लगीं।

    काली शक्ति का शरीर टूटने लगा।

    उसने अर्जुन की तरफ हाथ बढ़ाया।

    “तुम मुझे खत्म नहीं कर सकते!”

    अर्जुन ने कहा—

    “मैं तुम्हें खत्म नहीं कर रहा।”

    “फिर?”

    “मैं तुम्हें स्वीकार कर रहा हूँ।”

    काली शक्ति चीख पड़ी।

    उसके शरीर से धुआँ निकलने लगा।

    फिर वह हजारों छोटे-छोटे काले टुकड़ों में टूट गई।

    हर टुकड़ा किसी इंसान की परछाईं बनकर जमीन पर गिरा।

    मीरा की आँखों में आँसू थे।

    अर्जुन ने पूछा—

    “अब सब खत्म?”

    मीरा ने सिर हिलाया।

    “नहीं।”

    “क्यों?”

    “क्योंकि पाप खत्म नहीं होते।”

    “फिर?”

    “इंसान उन्हें पहचानना सीखता है।”

    सुबह हुई।

    कालपुर पहली बार कई वर्षों बाद शांत था।

    लोग अपने घरों से बाहर आए।

    उन्हें पिछली रात की पूरी घटना याद नहीं थी।

    लेकिन हर किसी के दरवाजे पर एक कागज रखा था।

    उस पर सिर्फ एक सवाल लिखा था—

    “अगर कोई तुम्हें न देख रहा हो, तो तुम क्या करोगे?”

    अर्जुन ने अपना कागज देखा।

    उसने उसे मोड़कर जेब में रख लिया।

    मीरा उसके पास खड़ी थी।

    “तुम अब क्या करोगे?”

    अर्जुन ने कहा—

    “सच लिखूँगा।”

    “चाहे उसमें मेरा अपना नाम क्यों न हो?”

    “हाँ।”

    मीरा मुस्कुराई।

    धीरे-धीरे उसका शरीर धुंध में बदलने लगा।

    अर्जुन घबरा गया।

    “तुम जा रही हो?”

    “अब मुझे रुकने की जरूरत नहीं।”

    “तुम्हें इंसाफ मिल गया?”

    मीरा ने कहा—

    “इंसाफ तब मिला जब लोगों ने मेरी कहानी पर विश्वास किया।”

    और वह गायब हो गई।

    कुछ देर बाद अर्जुन मंदिर से बाहर निकला।

    कालपुर की सड़कें अब सामान्य थीं।

    लेकिन शहर के बीचोंबीच लगी पुरानी घड़ी अब भी खड़ी थी।

    अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

    सुइयाँ बारह बजने से एक मिनट पहले रुकी हुई थीं।

    वह आगे बढ़ गया।

    तभी…

    घड़ी की सुइयाँ चलने लगीं।

    टिक… टिक… टिक…

    अर्जुन रुक गया।

    घड़ी ने बारह बजाए।

    एक…

    दो…

    तीन…

    चार…

    पाँच…

    छह…

    सात…

    आठ…

    नौ…

    दस…

    ग्यारह…

    बारह…

    अर्जुन ने राहत की साँस ली।

    लेकिन फिर—

    तेरहवीं घंटी।

    उसने धीरे से पीछे मुड़कर देखा।

    घड़ी के नीचे एक छोटा बच्चा खड़ा था।

    उसके हाथ में लाल गुब्बारा था।

    बच्चे ने अर्जुन को देखकर मुस्कुराया।

    और बोला—

    “अंकल… कालपुर में एक पाप अभी भी बाकी है।”

    अर्जुन के चेहरे का रंग उड़ गया।

    “कौन सा?”

    बच्चे ने धीरे से कहा—

    “पापों को देखकर भी चुप रहना।”

    और अगले ही पल बच्चा गायब हो गया।

    सड़क पर सिर्फ लाल गुब्बारा रह गया।

    अर्जुन ने उसे उठाया।

    उस पर खून से एक आखिरी शब्द लिखा था—

    “जारी…”

    समाप्त। :::

  • पापों का शहर (भाग 4)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    “हत्या…”

     

    काली आकृति की आवाज पूरे तहखाने में गूँज उठी।

     

    अर्जुन के कानों में जैसे किसी ने हजारों घंटियाँ बजा दी हों।

     

    उसके सामने वही दृश्य बार-बार घूम रहा था।

     

    एक सुनसान सड़क।

     

    तेज बारिश।

     

    एक कार।

     

    और सड़क के बीच खड़ा एक बच्चा।

     

    अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “नहीं… मुझे कुछ याद नहीं।”

     

    काली आकृति हँसी।

     

    “यादें कभी मरती नहीं। इंसान सिर्फ उन्हें दफना देता है।”

     

    अचानक तहखाने की दीवारें गायब हो गईं।

     

    अर्जुन फिर उसी सड़क पर खड़ा था।

     

    बारिश उसके चेहरे पर पड़ रही थी।

     

    सड़क के किनारे एक छोटी-सी लड़की खड़ी थी।

     

    उसके हाथ में लाल गुब्बारा था।

     

    अर्जुन ने उसे पहचानने की कोशिश की।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    लड़की ने कुछ नहीं कहा।

     

    दूर से कार की हेडलाइट दिखाई दी।

     

    कार तेजी से उसकी तरफ आ रही थी।

     

    अर्जुन चिल्लाया—

     

    “हटो!”

     

    लेकिन लड़की वहीं खड़ी रही।

     

    कार करीब आई।

     

    और अचानक अर्जुन ने देखा—

     

    कार चला कोई और नहीं, वह खुद था।

     

    उसने ब्रेक लगाने की कोशिश की।

     

    लेकिन ब्रेक काम नहीं कर रहे थे।

     

    एक जोरदार टक्कर हुई।

     

    लड़की हवा में उछली।

     

    लाल गुब्बारा आसमान में चला गया।

     

    और सड़क पर खामोशी छा गई।

     

    अर्जुन चीख उठा।

     

    “नहीं!”

     

    दृश्य बदल गया।

     

    अब वह अस्पताल में था।

     

    एक डॉक्टर किसी से कह रहा था—

     

    “बच्ची की हालत बहुत गंभीर है।”

     

    फिर एक आदमी अंदर आया।

     

    अर्जुन ने उसे देखा।

     

    वह उसका पिता था।

     

    उसने डॉक्टर से कहा—

     

    “इस मामले को यहीं खत्म कर दीजिए।”

     

    अर्जुन ने अपने पिता की तरफ देखा।

     

    “आपने ऐसा क्यों किया?”

     

    उसके पिता ने कहा—

     

    “क्योंकि अगर यह बात बाहर गई, तो तुम्हारी जिंदगी खत्म हो जाएगी।”

     

    अर्जुन के चेहरे पर भय उतर आया।

     

    “तो… वह लड़की?”

     

    “वह मर गई।”

     

    अर्जुन ने सिर पकड़ लिया।

     

    “मैंने उसे मारा?”

     

    पीछे से मीरा की आवाज आई—

     

    “नहीं।”

     

    अर्जुन ने पलटकर देखा।

     

    मीरा खड़ी थी।

     

    “तुमने उसे नहीं मारा।”

     

    “फिर?”

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें उस रात की पूरी सच्चाई कभी नहीं बताई।”

     

    अचानक दृश्य फिर बदला।

     

    इस बार अर्जुन ने देखा कि दुर्घटना से कुछ मिनट पहले कार में वह अकेला नहीं था।

     

    उसके साथ एक आदमी बैठा था।

     

    उस आदमी ने अर्जुन को शराब पिलाई थी।

     

    और फिर…

     

    उसने कार की ब्रेक लाइन काट दी थी।

     

    अर्जुन की आँखें फैल गईं।

     

    “यह कौन था?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “कालपुर का वह आदमी जिसने तुम्हारे पिता को ब्लैकमेल किया था।”

     

    “कौन?”

     

    मीरा ने जवाब नहीं दिया।

     

    काली आकृति आगे बढ़ी।

     

    “सच के पास पहुँचकर भी इंसान डरता है।”

     

    उसने हाथ उठाया।

     

    अर्जुन के सामने उस आदमी का चेहरा दिखाई दिया।

     

    गोविंद।

     

    अर्जुन पीछे हट गया।

     

    “नहीं…”

     

    उसने गोविंद की तरफ देखा।

     

    बूढ़ा चुप खड़ा था।

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “आपने मेरी कार की ब्रेक काटी थीं?”

     

    गोविंद की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता ने मुझे धोखा दिया था।”

     

    “उस बच्ची का क्या दोष था?”

     

    गोविंद चुप रहा।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “यही कालपुर का सबसे बड़ा पाप है।”

     

    अर्जुन ने गुस्से में गोविंद को पकड़ लिया।

     

    “तुमने उसे क्यों मारा?”

     

    गोविंद चीख पड़ा—

     

    “मैंने उसे मारना नहीं चाहा था!”

     

    “लेकिन वह मर गई!”

     

    “हाँ!”

     

    गोविंद जमीन पर बैठ गया।

     

    “और उस दिन से मैं हर रात उसकी चीख सुनता हूँ।”

     

    अचानक लाल गुब्बारा हवा में दिखाई दिया।

     

    वह धीरे-धीरे अर्जुन के सामने आकर रुक गया।

     

    उस पर खून से एक नाम लिखा था—

     

    “नैना।”

     

    अर्जुन की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “उस बच्ची का नाम नैना था?”

     

    मीरा ने सिर हिलाया।

     

    “और वह सिर्फ एक हादसे में नहीं मरी थी।”

     

    “फिर?”

     

    “उसे मरने के बाद भी इंसाफ नहीं मिला।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि कालपुर के लोगों ने उसकी मौत को छिपा दिया।”

     

    अर्जुन ने चारों तरफ देखा।

     

    दीवारों पर हजारों चेहरे उभर आए।

     

    हर चेहरा उस रात को देख रहा था।

     

    किसी ने पुलिस को नहीं बताया।

     

    किसी ने गवाही नहीं दी।

     

    किसी ने उसके परिवार की मदद नहीं की।

     

    हर कोई चुप रहा।

     

    काली आकृति ने कहा—

     

    “हत्या सिर्फ वह नहीं करता जो किसी की जान लेता है।”

     

    “कई बार हत्या वह भी करता है जो सच जानते हुए चुप रहता है।”

     

    अर्जुन ने सिर झुका लिया।

     

    तभी तहखाने में एक तेज आवाज हुई।

     

    धड़ाम!

     

    सारी दीवारें हिलने लगीं।

     

    काली आकृति पीछे हट गई।

     

    मीरा ने अर्जुन से कहा—

     

    “अब पाँचवाँ पाप जाग रहा है।”

     

    “कौन सा?”

     

    “लालच।”

     

    अचानक शहर के हर घर में एक साथ रोशनी जल उठी।

     

    लोग अपने घरों से बाहर निकलने लगे।

     

    लेकिन उनके हाथों में सोने के सिक्के थे।

     

    जमीन के कागज थे।

     

    नोटों की गड्डियाँ थीं।

     

    और हर व्यक्ति दूसरे से ज्यादा पाने के लिए लड़ रहा था।

     

    अर्जुन समझ गया—

     

    कालपुर सिर्फ लोगों के पाप दिखा नहीं रहा था।

     

    वह उन्हें जगा रहा था।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “जल्दी करो।”

     

    “कहाँ?”

     

    “शहर के पुराने मंदिर में।”

     

    “वहाँ क्यों?”

     

    “क्योंकि पाँचवें पाप की जड़ वहीं है।”

     

    अर्जुन और मीरा सुरंग से बाहर निकलने लगे।

     

    पीछे गोविंद बैठा रो रहा था।

     

    अर्जुन ने उसे देखा।

     

    “आप नहीं आएँगे?”

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “मेरी सजा अभी बाकी है।”

     

    अर्जुन आगे बढ़ गया।

     

    लेकिन जैसे ही वह सुरंग से बाहर निकला, उसे एहसास हुआ कि पूरा शहर बदल चुका था।

     

    सड़क पर कोई इंसान जैसा नहीं दिख रहा था।

     

    हर व्यक्ति की आँखें लाल थीं।

     

    हर हाथ में पैसा था।

     

    और सब एक ही चीज के लिए लड़ रहे थे—

     

    और ज्यादा।

     

    दूर मंदिर की घंटी बजने लगी।

     

    एक…

     

    दो…

     

    तीन…

     

    और फिर तेरहवीं घंटी।

     

    मंदिर के दरवाजे अपने आप खुल गए।

     

    अंदर एक विशाल मूर्ति के सामने कोई खड़ा था।

     

    वह आदमी अर्जुन को देखकर मुस्कुराया।

     

    “आ गए?”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    वह धीरे-धीरे प्रकाश में आया।

     

    अर्जुन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    वह आदमी…

     

    उसके पिता थे।

     

    लेकिन उनके पिता तो पाँच साल पहले मर चुके थे।

  • पापों का शहर (भाग 3 )

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    अर्जुन की हथेली में पड़ी चाबी लगातार काँप रही थी।

     

    उस पर जंग लगी थी और ऊपर सिर्फ दो शब्द खुदे थे—

     

    कमरा नंबर 13।

     

    अर्जुन ने चाबी को गौर से देखा।

     

    “यह चाबी कहाँ की है?”

     

    गोविंद ने जैसे ही उसे देखा, उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “इसे फेंक दो।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि इस होटल में कमरा नंबर 13 कभी था ही नहीं।”

     

    अर्जुन ने हैरानी से पूछा—

     

    “लेकिन चाबी…?”

     

    गोविंद ने उसकी बात काट दी।

     

    “मैंने कहा इसे फेंक दो।”

     

    अर्जुन ने चाबी मुट्ठी में कस ली।

     

    “नहीं।”

     

    गोविंद ने उसे घूरकर देखा।

     

    “तुम नहीं समझ रहे। इस चाबी के पीछे जितनी मौतें हैं, उतनी शायद पूरे शहर में भी नहीं।”

     

    “मुझे अपने पिता के बारे में जानना है।”

     

    गोविंद चुप हो गया।

     

    कुछ देर बाद उसने धीमी आवाज में कहा—

     

    “तो फिर तुम्हें होटल की पुरानी इमारत में जाना होगा।”

     

    “कहाँ?”

     

    गोविंद ने ऊपर की ओर देखा।

     

    “छत के नीचे एक मंजिल है, जो अब इस्तेमाल नहीं होती।”

     

    “क्या वहाँ कमरा 13 है?”

     

    गोविंद ने जवाब नहीं दिया।

     

    रात के करीब एक बजे दोनों सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।

     

    होटल की ऊपरी मंजिल पर पहुँचकर अर्जुन ने देखा कि वहाँ मोटी धूल जमा थी।

     

    दीवारों पर पुराने कमरों के नंबर लिखे थे—

     

    9…

     

    10…

     

    11…

     

    12…

     

    और फिर…

     

    दीवार खत्म हो गई।

     

    कमरा 13 कहीं नहीं था।

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “देखा? यहाँ कुछ नहीं है।”

     

    अर्जुन ने चाबी हाथ में ली।

     

    उसी क्षण दीवार के अंदर से हल्की-सी आवाज आई।

     

    खर्र… खर्र…

     

    जैसे कोई अंदर से नाखूनों से दीवार खुरच रहा हो।

     

    अर्जुन ने दीवार पर हाथ रखा।

     

    ठंडी थी।

     

    अचानक वहाँ एक दरवाजा उभर आया।

     

    गोविंद पीछे हट गया।

     

    “हे भगवान…”

     

    दरवाजे पर पीतल की पट्टी लगी थी—

     

    13

     

    अर्जुन ने चाबी ताले में लगाई।

     

    ताला अपने आप घूम गया।

     

    दरवाजा खुला।

     

    अंदर एक लंबा कमरा था।

     

    कमरे में पुराने अखबार, तस्वीरें और फाइलें बिखरी पड़ी थीं।

     

    दीवार पर एक बड़ा नक्शा लगा था।

     

    उसमें पूरे कालपुर के घरों पर लाल निशान बने थे।

     

    अर्जुन धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    एक मेज पर उसे पुरानी फाइल मिली।

     

    ऊपर लिखा था—

     

    “कालपुर अपराध अभिलेख — गोपनीय।”

     

    उसने फाइल खोली।

     

    पहला नाम था—

     

    रघुवीर चौहान।

     

    दूसरा—

     

    सावित्री देवी।

     

    तीसरा—

     

    इंस्पेक्टर नरेश।

     

    चौथा—

     

    गोविंद।

     

    अर्जुन की नजर ठहर गई।

     

    “आपका नाम भी है।”

     

    गोविंद ने सिर झुका लिया।

     

    “मैंने कहा था न, मैं निर्दोष नहीं हूँ।”

     

    “आपने क्या किया था?”

     

    गोविंद की आवाज भारी हो गई।

     

    “मैंने मीरा को देखा था।”

     

    अर्जुन ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

     

    “कब?”

     

    “उस रात।”

     

    “क्या हुआ था?”

     

    गोविंद कुछ बोल पाता, उससे पहले कमरे की बत्ती अपने आप जल गई।

     

    दीवार पर एक प्रोजेक्टर जैसा प्रकाश पड़ा।

     

    और एक पुराना दृश्य चलने लगा।

     

    एक लड़की भाग रही थी।

     

    वह मीरा थी।

     

    उसके हाथ में एक फाइल थी।

     

    पीछे तीन आदमी उसका पीछा कर रहे थे।

     

    मीरा चिल्लाई—

     

    “मुझे छोड़ दो!”

     

    उनमें से एक आदमी का चेहरा साफ दिखाई दिया।

     

    अर्जुन का दिल रुक गया।

     

    वह उसके पिता थे।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?”

     

    अर्जुन के पिता ने जवाब दिया—

     

    “क्योंकि तुम्हारे पास ऐसा सबूत है जो बहुत लोगों को बर्बाद कर देगा।”

     

    “तो सच सामने आने दीजिए।”

     

    “सच से ज्यादा जरूरी है परिवार।”

     

    मीरा रो पड़ी।

     

    “आप भी?”

     

    अचानक दृश्य खत्म हो गया।

     

    अर्जुन ने अपने सिर पर हाथ रख लिया।

     

    “मेरे पिता ने…?”

     

    गोविंद बोला—

     

    “उन्होंने मीरा को नहीं मारा था।”

     

    अर्जुन ने राहत की साँस ली।

     

    “फिर?”

     

    “उन्होंने उसे उस जगह पहुँचाया जहाँ से वह वापस नहीं आई।”

     

    “कहाँ?”

     

    गोविंद ने कमरे के फर्श की तरफ इशारा किया।

     

    फर्श के बीच एक लोहे का ढक्कन था।

     

    अर्जुन ने उसे उठाया।

     

    नीचे अँधेरी सीढ़ियाँ थीं।

     

    सीढ़ियाँ जमीन के बहुत नीचे जा रही थीं।

     

    नीचे से सड़ांध की गंध आ रही थी।

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “यही कालपुर का असली पेट है।”

     

    दोनों नीचे उतरने लगे।

     

    सीढ़ियाँ खत्म हुईं तो एक विशाल सुरंग सामने थी।

     

    दीवारों पर हजारों नाम लिखे थे।

     

    कुछ नामों पर काला रंग लगा था।

     

    कुछ पर लाल।

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “इनका मतलब?”

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “लाल मतलब पाप स्वीकार किया।”

     

    “और काला?”

     

    “पाप छिपाया।”

     

    अचानक सामने से बच्चे के रोने की आवाज आई।

     

    “माँ…”

     

    अर्जुन उस दिशा में बढ़ा।

     

    एक छोटे कमरे में उसे लकड़ी का पिंजरा मिला।

     

    अंदर कोई नहीं था।

     

    लेकिन पिंजरे की दीवार पर लिखा था—

     

    “जिसे समाज ने दोषी कहा, वह हमेशा दोषी नहीं होता।”

     

    अर्जुन को अपने पुराने केस याद आने लगे।

     

    उसने कितनी बार बिना पूरी सच्चाई जाने लोगों को दोषी ठहराया था।

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “तीसरा पाप।”

     

    अर्जुन पलटा।

     

    मीरा उसके पीछे खड़ी थी।

     

    उसकी आँखों में आँसू थे।

     

    “विश्वासघात।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “तुम्हारे साथ किसने विश्वासघात किया?”

     

    मीरा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पिता ने।”

     

    “लेकिन उन्होंने तुम्हें नहीं मारा।”

     

    “मुझे मौत ने नहीं मारा।”

     

    “फिर?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “मुझे उस आदमी की चुप्पी ने मारा, जिस पर मुझे सबसे ज्यादा भरोसा था।”

     

    अर्जुन की आँखें भर आईं।

     

    “मेरे पिता ने आखिर किया क्या?”

     

    मीरा ने एक पुराना लिफाफा उसकी तरफ बढ़ाया।

     

    “यह उन्होंने तुम्हारे लिए छोड़ा था।”

     

    अर्जुन ने लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक पत्र था।

     

    “अर्जुन,

     

    अगर तुम यह पत्र पढ़ रहे हो, तो शायद कालपुर ने तुम्हें भी बुला लिया है।

     

    मैंने जो किया, उसके लिए मेरे पास कोई बहाना नहीं।

     

    मैंने मीरा को बचाने के बजाय उसे उन लोगों के हवाले कर दिया जिनसे वह लड़ रही थी।

     

    लेकिन मैं उसे मरते हुए नहीं देख सका।

     

    मैंने उसे एक गुप्त सुरंग के रास्ते बाहर भेज दिया।

     

    अगर वह जीवित रही होगी, तो तुम्हें सच बताएगी।

     

    लेकिन अगर वह मर गई…

     

    तो समझना कि मैंने उसे नहीं, अपने डर को चुना था।

     

    — तुम्हारा पिता”

     

    अर्जुन ने पत्र नीचे कर लिया।

     

    “तो मीरा…”

     

    पीछे से आवाज आई—

     

    “मैं मरी नहीं थी।”

     

    अर्जुन ने पलटकर देखा।

     

    मीरा वहाँ खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं था।

     

    उसने कहा—

     

    “मुझे इस शहर ने छिपा दिया था।”

     

    “कहाँ?”

     

    “यहीं।”

     

    अचानक जमीन काँपने लगी।

     

    दीवारों पर लिखे हजारों नाम चमकने लगे।

     

    और एक विशाल काली आकृति सुरंग के आखिरी छोर से बाहर आने लगी।

     

    गोविंद चीख पड़ा—

     

    “यह आ गया!”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    गोविंद ने काँपते हुए कहा—

     

    “कालपुर का असली मालिक।”

     

    काली आकृति धीरे-धीरे आगे बढ़ी।

     

    उसका चेहरा नहीं था।

     

    बस दो लाल आँखें थीं।

     

    उसने अर्जुन की तरफ हाथ बढ़ाया।

     

    और उसकी आवाज पूरे तहखाने में गूँज उठी—

     

    “तुमने तीन पाप देख लिए हैं… अब चौथा तुम्हारा अपना है।”

     

    अर्जुन पीछे हट गया।

     

    अचानक उसके सामने एक दृश्य उभरा—

     

    एक सड़क…

     

    एक कार…

     

    एक दुर्घटना…

     

    और ड्राइविंग सीट पर बैठा था…

     

    खुद अर्जुन।

     

    उसकी साँस रुक गई।

     

    मीरा ने धीरे से कहा—

     

    “अब तुम्हें याद करना होगा… उस रात तुमने किसे मारा था।”

     

    अर्जुन ने सिर पकड़ लिया।

     

    उसे कुछ याद नहीं था।

     

    लेकिन अगले ही पल उसकी स्मृति में एक आवाज गूँजी—

     

    “अर्जुन, गाड़ी मत चलाओ…”

     

    और उसके बाद…

     

    एक जोरदार टक्कर।

     

    अँधेरा।

     

    और एक बच्चे की चीख।

     

    काली आकृति मुस्कुराई।

     

    “चौथा पाप…”

     

    उसने फुसफुसाकर कहा—

     

    “हत्या।”

  • पापों का शहर ( भाग 2 )

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    अर्जुन देर तक सड़क के किनारे खड़ा उस काले निशान को देखता रहा।

     

    जिस आदमी की कुछ मिनट पहले मौत हुई थी, उसका शरीर पुलिस ले जा चुकी थी। लेकिन जमीन पर बची राख अभी भी धुआँ दे रही थी।

     

    अर्जुन ने झुककर राख को छूना चाहा।

     

    “मत छूना।”

     

    पीछे से गोविंद की आवाज आई।

     

    अर्जुन ने हाथ रोक लिया।

     

    “क्यों?”

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “क्योंकि कालपुर में जो राख छोड़कर मरता है, उसकी कहानी वहीं खत्म नहीं होती।”

     

    अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आप आखिर जानते कितना हैं?”

     

    गोविंद कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “जितना जानता हूँ, उतना किसी को नहीं जानना चाहिए।”

     

    “फिर मुझे बताइए।”

     

    “तुम यहाँ से चले जाओ।”

     

    “मैं नहीं जाऊँगा।”

     

    गोविंद ने गहरी साँस ली।

     

    “ठीक है। लेकिन जो देखोगे, उसके बाद शायद तुम खुद जाना चाहोगे।”

     

    दोनों होटल के अंदर लौट आए।

     

    गोविंद ने कमरे का दरवाजा बंद किया और एक पुराना लोहे का संदूक खोला।

     

    उसमें कई तस्वीरें थीं।

     

    हर तस्वीर में एक आदमी या औरत था।

     

    कुछ तस्वीरों पर लाल निशान लगा था।

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “ये लोग कौन हैं?”

     

    गोविंद बोला—

     

    “कालपुर के लोग।”

     

    “और ये लाल निशान?”

     

    “उनका पाप।”

     

    अर्जुन ने एक तस्वीर उठाई।

     

    एक आदमी बहुत सम्मानित नेता जैसा दिख रहा था।

     

    उसके नीचे लिखा था—

     

    “रघुवीर चौहान — झूठ।”

     

    दूसरी तस्वीर पर लिखा था—

     

    “सावित्री देवी — लालच।”

     

    तीसरी पर—

     

    “इंस्पेक्टर नरेश — रिश्वत।”

     

    अर्जुन की नजर चौथी तस्वीर पर जाकर रुक गई।

     

    उसमें एक लड़की थी।

     

    लगभग पच्चीस साल की।

     

    चेहरा बेहद शांत।

     

    नीचे नाम लिखा था—

     

    “मीरा — सच।”

     

    अर्जुन ने चौंककर पूछा—

     

    “यह लड़की कौन है?”

     

    गोविंद ने तुरंत तस्वीर उसके हाथ से ले ली।

     

    “इसके बारे में मत पूछो।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि कालपुर की कहानी की शुरुआत इसी से हुई थी।”

     

    अर्जुन ने जोर देकर पूछा—

     

    “क्या हुआ था इसके साथ?”

     

    गोविंद की आँखें भर आईं।

     

    “पंद्रह साल पहले मीरा इस शहर में आई थी। वह यहाँ के लोगों के पापों का रिकॉर्ड रखती थी।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उसका पिता इस शहर के बड़े लोगों के खिलाफ सबूत इकट्ठा कर रहा था।”

     

    “फिर?”

     

    “एक रात उसका पिता गायब हो गया।”

     

    “और मीरा?”

     

    “उसने खोज जारी रखी।”

     

    गोविंद कुछ पल रुका।

     

    “लेकिन एक रात वह भी गायब हो गई।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “क्या वह भी मर गई?”

     

    गोविंद ने सिर हिलाया।

     

    “लोग कहते हैं, हाँ।”

     

    “लेकिन?”

     

    “मैंने उसकी लाश कभी नहीं देखी।”

     

    कमरे में अचानक खामोशी छा गई।

     

    तभी होटल के बाहर घड़ी की आवाज आई।

     

    टन…

     

    अर्जुन ने घड़ी देखी।

     

    रात के बारह बजने वाले थे।

     

    गोविंद ने तुरंत खिड़की बंद कर दी।

     

    “आज बाहर मत जाना।”

     

    “क्यों?”

     

    “आज दूसरा पाप जागेगा।”

     

    घड़ी ने बारह बजाए।

     

    टन…

     

    पहली घंटी।

     

    टन…

     

    दूसरी।

     

    टन…

     

    अर्जुन गिनता रहा।

     

    बारहवीं घंटी के बाद सब शांत हो गया।

     

    फिर—

     

    टन…

     

    तेरहवीं घंटी।

     

    होटल की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    इस बार आवाज होटल के नीचे से आई।

     

    किसी महिला की चीख।

     

    “बचाओ!”

     

    अर्जुन ने दरवाजा खोला।

     

    गोविंद ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मत जाओ।”

     

    “वहाँ कोई है।”

     

    “वह कोई इंसान नहीं है।”

     

    लेकिन अर्जुन हाथ छुड़ाकर सीढ़ियों से नीचे उतर गया।

     

    होटल का तहखाना वर्षों से बंद था।

     

    फिर भी उसका दरवाजा खुला हुआ था।

     

    अंदर से ठंडी हवा आ रही थी।

     

    दीवारों पर काले हाथों के निशान बने थे।

     

    अर्जुन ने मोबाइल की रोशनी आगे की।

     

    एक कमरे के बीचोंबीच एक औरत बैठी थी।

     

    वह लगातार रो रही थी।

     

    “आप ठीक हैं?”

     

    औरत ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

     

    उसका चेहरा देखकर अर्जुन पीछे हट गया।

     

    उसकी आँखें पूरी तरह सफेद थीं।

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “तुम मुझे बचाने आए हो?”

     

    अर्जुन ने कुछ नहीं कहा।

     

    औरत ने पूछा—

     

    “क्या तुमने कभी किसी निर्दोष को दोषी बनाया है?”

     

    अर्जुन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उसके सामने दीवार पर दृश्य उभरने लगे।

     

    एक अदालत।

     

    एक निर्दोष आदमी।

     

    और अर्जुन की पुरानी रिपोर्ट।

     

    उसकी रिपोर्ट के कारण उस आदमी को जेल हुई थी।

     

    अर्जुन ने तब कभी यह जानने की कोशिश नहीं की थी कि वह वास्तव में दोषी था या नहीं।

     

    क्योंकि उसे खबर चाहिए थी।

     

    सच नहीं।

     

    उसने आँखें बंद कर लीं।

     

    “मैं गलत था।”

     

    औरत की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “सच बोलना आसान है।”

     

    “लेकिन क्या तुम उसका परिणाम सहोगे?”

     

    अचानक तहखाने की दीवार पर एक नाम उभरा—

     

    “अर्जुन मिश्रा।”

     

    और उसके नीचे—

     

    “पाप — सच बेचने का।”

     

    अर्जुन का शरीर काँपने लगा।

     

    तभी गोविंद नीचे पहुँचा।

     

    उसने अर्जुन को खींचकर पीछे किया।

     

    “इसे मत देखो!”

     

    लेकिन देर हो चुकी थी।

     

    औरत गायब हो चुकी थी।

     

    कमरे के बीच सिर्फ एक पुरानी कुर्सी थी।

     

    कुर्सी पर वही लाल डायरी रखी थी।

     

    अर्जुन ने डायरी खोली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “कालपुर में सात पाप हैं।”

     

    दूसरे पन्ने पर—

     

    “पहला पाप — लालच।”

     

    तीसरे पर—

     

    “दूसरा पाप — झूठ।”

     

    चौथे पन्ने पर—

     

    “तीसरा पाप — विश्वासघात।”

     

    और आखिरी पन्ने पर—

     

    “सातवाँ पाप तुम्हारा है।”

     

    अर्जुन ने घबराकर डायरी बंद कर दी।

     

    गोविंद का चेहरा सफेद पड़ चुका था।

     

    “क्या हुआ?”

     

    गोविंद ने जवाब नहीं दिया।

     

    “आप जानते हैं मेरा सातवाँ पाप क्या है?”

     

    बूढ़े ने धीरे से कहा—

     

    “हाँ।”

     

    “क्या?”

     

    गोविंद ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “तुम्हारा सातवाँ पाप वह है जिसकी वजह से मीरा गायब हुई थी।”

     

    अर्जुन के शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।

     

    “मैं मीरा को जानता तक नहीं था।”

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “तुम नहीं जानते।”

     

    “लेकिन तुम्हारा परिवार जानता था।”

     

    अर्जुन कुछ बोल नहीं पाया।

     

    गोविंद ने संदूक से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

     

    तस्वीर में मीरा खड़ी थी।

     

    उसके बगल में एक आदमी था।

     

    अर्जुन की साँस रुक गई।

     

    वह आदमी उसके पिता थे।

     

    और तस्वीर के पीछे लिखा था—

     

    “जिस सच को तुम्हारे पिता ने दफनाया था, वही अब तुम्हें खोज रहा है।”

     

    अचानक होटल के बाहर से जोरदार चीख सुनाई दी।

     

    फिर वही तेरहवीं घंटी।

     

    गोविंद ने काँपते हुए कहा—

     

    “अब तीसरा पाप जाग गया है।”

     

    अर्जुन ने खिड़की की तरफ देखा।

     

    पूरे शहर की सड़क पर लोग खड़े थे।

     

    लेकिन उनके चेहरे नहीं थे।

     

    सिर्फ काली, खाली जगह।

     

    और उन सबके पीछे एक लड़की खड़ी थी।

     

    मीरा।

     

    वह सीधे अर्जुन को देख रही थी।

     

    फिर उसने अपने होंठ हिलाए—

     

    “अपने पिता से पूछो… मैं मरी कैसे थी।”

     

    अचानक सारे चेहरे गायब हो गए।

     

    सड़क खाली थी।

     

    लेकिन अर्जुन के हाथ में अब एक पुरानी चाबी थी।

     

    चाबी पर लिखा था—

     

    “कमरा नंबर 13।”

     

    और होटल में कमरा नंबर 13 था ही नहीं।

  • पापों का शहर (part -1)

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

     

    शहर का नाम था कालपुर।नक्शे पर वह एक छोटा-सा शहर था, लेकिन आसपास के गाँवों में उसके बारे में अजीब-अजीब बातें कही जाती थीं। लोग कहते थे कि कालपुर में रात होने के बाद कोई अकेला बाहर नहीं निकलता।

     

    क्योंकि वहाँ रात सिर्फ अँधेरा लेकर नहीं आती थी।

     

    वह इंसान के पापों को जगा देती थी।

     

    शहर के बीचोंबीच एक पुरानी घड़ी लगी थी। वह घड़ी दिन में ठीक चलती थी, लेकिन रात के बारह बजते ही उसकी सुइयाँ रुक जाती थीं।

     

    ठीक बारह बजे।

     

    और उसी समय पूरे शहर में एक घंटी बजती थी।

     

    टन… टन… टन…

     

    कहा जाता था कि घंटी की तेरहवीं आवाज सुनने वाला व्यक्ति अपने जीवन का सबसे बड़ा पाप देख लेता था।

     

    इसी शहर में एक रात अर्जुन पहुँचा।

     

    अर्जुन पेशे से पत्रकार था। उसे कालपुर में हो रही रहस्यमयी घटनाओं की खबर मिली थी। पिछले छह महीनों में शहर से सात लोग गायब हो चुके थे।

     

    अजीब बात यह थी कि उनके घरों के दरवाजे अंदर से बंद मिले थे।

     

    किसी घर में चोरी नहीं हुई।

     

    किसी घर में संघर्ष के निशान नहीं थे।

     

    बस एक चीज हर जगह मिली—

     

    काली राख।

     

    अर्जुन ने शहर के पुराने होटल में कमरा लिया।

     

    होटल का मालिक एक बूढ़ा आदमी था, जिसका नाम गोविंद था।

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “यहाँ लोग गायब क्यों हो रहे हैं?”

     

    गोविंद ने उसकी तरफ देखा और धीमे से बोला—

     

    “आप बाहर से आए हैं, इसलिए आपको अभी कुछ पता नहीं।”

     

    “क्या?”

     

    “कालपुर में लोग नहीं गायब होते।”

     

    “फिर?”

     

    “उनके पाप उन्हें ले जाते हैं।”

     

    अर्जुन हँस पड़ा।

     

    “मैं भूत-प्रेत की कहानियों पर विश्वास नहीं करता।”

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “कल रात बारह बजे तक कर लीजिएगा।”

     

    अर्जुन ने बात को मजाक समझकर छोड़ दिया।

     

    रात करीब ग्यारह बजे वह अपने कमरे में बैठकर पुराने दस्तावेज पढ़ रहा था।

     

    बाहर बिल्कुल सन्नाटा था।

     

    अचानक दूर से घड़ी की घंटी सुनाई दी।

     

    टन…

     

    अर्जुन ने घड़ी देखी।

     

    12:00 बजे थे।

     

    टन…

     

    दूसरी घंटी।

     

    टन…

     

    तीसरी।

     

    वह गिनने लगा।

     

    आठ…

     

    नौ…

     

    दस…

     

    ग्यारह…

     

    बारह…

     

    फिर कुछ सेकंड की खामोशी।

     

    अर्जुन ने सोचा कि अब सब खत्म।

     

    लेकिन तभी—

     

    टन…

     

    तेरहवीं घंटी।

     

    कमरे का तापमान अचानक गिर गया।

     

    अर्जुन की साँस से धुआँ निकलने लगा।

     

    उसके सामने रखा लैपटॉप अपने आप बंद हो गया।

     

    फिर कमरे के कोने में किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

     

    “मुझे बचाओ…”

     

    अर्जुन धीरे-धीरे उस दिशा में बढ़ा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    लेकिन दीवार पर एक काली परछाईं दिखाई दे रही थी।

     

    परछाईं धीरे-धीरे एक आदमी का आकार लेने लगी।

     

    अर्जुन पीछे हट गया।

     

    तभी परछाईं ने कहा—

     

    “तुम सच खोजने आए हो?”

     

    अर्जुन ने काँपते हुए पूछा—

     

    “कौन हो?”

     

    परछाईं ने जवाब दिया—

     

    “सच से ज्यादा डरावनी चीज यहाँ कुछ नहीं।”

     

    अचानक कमरे की दीवार पर कई दृश्य दिखाई देने लगे।

     

    एक आदमी पैसे चुरा रहा था।

     

    एक महिला किसी निर्दोष पर झूठा आरोप लगा रही थी।

     

    एक पुलिस वाला रिश्वत ले रहा था।

     

    एक डॉक्टर किसी गरीब मरीज को पैसे के लिए मना कर रहा था।

     

    और फिर…

     

    अर्जुन ने खुद को देखा।

     

    तीन साल पहले की एक घटना।

     

    उसके हाथ में एक फाइल थी।

     

    उसने एक अपराधी के खिलाफ सबूत छिपा दिए थे।

     

    क्योंकि उस अपराधी ने उसे पैसे दिए थे।

     

    अर्जुन का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    “नहीं…”

     

    परछाईं हँसी।

     

    “हर आदमी दूसरों के पाप गिनता है।”

     

    “लेकिन अपने?”

     

    अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

     

    जब उसने आँखें खोलीं, कमरा सामान्य था।

     

    सुबह होते ही वह होटल से बाहर निकला।

     

    लेकिन बाहर का दृश्य देखकर उसके कदम रुक गए।

     

    सड़क के बीचोंबीच एक आदमी खड़ा था।

     

    वही आदमी जिसे अर्जुन ने रात को दीवार पर देखा था।

     

    लेकिन अब वह आदमी असली था।

     

    लोग उसके चारों तरफ खड़े थे।

     

    अचानक वह आदमी चीखने लगा—

     

    “मैंने नहीं किया!”

     

    फिर उसके मुँह से खून निकलने लगा।

     

    वह जमीन पर गिर पड़ा।

     

    लोग पीछे हट गए।

     

    और जहाँ वह गिरा था, वहाँ राख का एक काला निशान रह गया।

     

    गोविंद अर्जुन के पास आया।

     

    “अब समझे?”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “यह कौन था?”

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “शहर का सबसे बड़ा साहूकार।”

     

    “उसने क्या किया?”

     

    गोविंद ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “गरीबों की जमीन हड़पता था।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “उसे किसने मारा?”

     

    गोविंद ने घड़ी की तरफ देखा।

     

    “किसी ने नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    बूढ़े ने धीमे से कहा—

     

    “कालपुर ने।”

     

    अर्जुन के हाथ में पकड़ी फाइल जमीन पर गिर गई।

     

    और उसी समय उसके पीछे किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “अभी छह पाप बाकी हैं।”

     

    अर्जुन ने पलटकर देखा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    लेकिन सड़क की दीवार पर काले अक्षरों में लिखा था—

     

    “पापों का शहर तुम्हारा इंतजार कर रहा है।”

  • भूत बंगला — पार्ट 5

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    अमन अपनी परछाई को देखकर पत्थर की तरह खड़ा रह गया।

     

    उसकी परछाई जमीन पर थी, लेकिन वह अमन जैसी नहीं थी। उसके सिर पर दो लंबे सींग थे और उसकी गर्दन असामान्य रूप से लंबी दिखाई दे रही थी।

     

    अमन धीरे-धीरे पीछे हटने लगा।

     

    “ये… ये मेरी परछाई नहीं है।”

     

    समीर उसके सामने आकर खड़ा हो गया।

     

    उसके चेहरे पर अब वह डर नहीं था जो कुछ देर पहले दिखाई दे रहा था।

     

    वह बिल्कुल शांत था।

     

    “तुम्हें आखिरी कमरा खोलना होगा।”

     

    अमन ने पूछा, “अगर मैंने कमरा नहीं खोला तो?”

     

    समीर की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “तो तुम्हारे पिता हमेशा के लिए वहीं कैद रहेंगे।”

     

    अमन ने बंगले की तरफ देखा।

     

    उसके मन में हजारों सवाल घूम रहे थे।

     

    अगर उसके पिता सच में इस बंगले में थे, तो इतने सालों से कहाँ थे?

     

    और अगर वह जिंदा थे, तो उन्होंने कभी घर लौटने की कोशिश क्यों नहीं की?

     

    अचानक पीछे से बच्चे की आवाज आई—

     

    “क्योंकि वह जिंदा नहीं हैं।”

     

    अमन ने मुड़कर देखा।

     

    ठाकुर का बच्चा उसके पीछे खड़ा था।

     

    “तुम झूठ बोल रहे हो,” अमन ने कहा।

     

    बच्चे ने सिर हिलाया।

     

    “तुम्हारे पिता की आत्मा यहाँ है। उनका शरीर बहुत पहले खत्म हो चुका है।”

     

    अमन की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तो मुझे बंगले में क्यों जाना है?”

     

    बच्चे ने कहा—

     

    “क्योंकि उनकी आत्मा के पास तुम्हारी आखिरी परछाई है।”

     

    उसी समय जंगल में तेज हवा चलने लगी।

     

    पेड़ों की शाखाएँ एक-दूसरे से टकराने लगीं।

     

    दूर बंगले का दरवाजा अपने आप खुल गया।

     

    किर्रर्र…

     

    अंदर से पीली रोशनी बाहर आ रही थी।

     

    अमन ने फैसला कर लिया।

     

    “मैं जाऊँगा।”

     

    समीर ने कहा, “मैं भी।”

     

    दोनों बंगले की तरफ चल पड़े।

     

    बंगले के पास पहुँचते ही अमन ने महसूस किया कि हवा बिल्कुल शांत हो गई थी।

     

    इतनी शांति थी कि उनके कदमों की आवाज बहुत तेज सुनाई दे रही थी।

     

    वे अंदर गए।

     

    मुख्य हॉल पहले जैसा नहीं था।

     

    दीवारों पर लगी तस्वीरें गायब थीं।

     

    उनकी जगह काले पर्दे लगे थे।

     

    हॉल के बीचोंबीच एक पुरानी घड़ी थी।

     

    घड़ी की सुइयाँ उल्टी दिशा में घूम रही थीं।

     

    अचानक घड़ी ने बारह बार घंटी बजाई।

     

    टन… टन… टन…

     

    हर घंटी के साथ कमरे की एक-एक खिड़की बंद होती गई।

     

    बारहवीं घंटी के बाद अंधेरा छा गया।

     

    फिर सामने एक दरवाजा दिखाई दिया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “केवल वही अंदर आए, जिसने अपनी परछाई खोई हो।”

     

    अमन ने दरवाजा खोला।

     

    अंदर एक लंबा गलियारा था।

     

    गलियारे के अंत में एक लाल दरवाजा था।

     

    दरवाजे के पीछे से किसी आदमी के रोने की आवाज आ रही थी।

     

    “अमन…”

     

    अमन वहीं रुक गया।

     

    यह आवाज उसके पिता की थी।

     

    वही आवाज जो उसने बचपन में सुनी थी।

     

    “पापा?”

     

    अंदर से जवाब आया—

     

    “बेटा… मुझे यहाँ से निकालो।”

     

    अमन ने दरवाजा खोल दिया।

     

    कमरे के बीच में एक कुर्सी थी।

     

    कुर्सी पर एक आदमी बैठा था।

     

    उसका चेहरा झुका हुआ था।

     

    बाल सफेद हो चुके थे।

     

    अमन की सांस रुक गई।

     

    “पापा…”

     

    आदमी ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

     

    चेहरा बिल्कुल उसके पिता जैसा था।

     

    अमन उसके पास दौड़ा।

     

    लेकिन समीर ने उसे रोक लिया।

     

    “रुको!”

     

    अमन चिल्लाया—

     

    “ये मेरे पापा हैं!”

     

    समीर ने कहा—

     

    “पहले उनकी परछाई देखो।”

     

    अमन ने जमीन की तरफ देखा।

     

    कुर्सी पर बैठे आदमी की कोई परछाई नहीं थी।

     

    अचानक आदमी हँसने लगा।

     

    उसकी आवाज बदल गई।

     

    “तुम्हें अब भी विश्वास नहीं होता?”

     

    उसका चेहरा धीरे-धीरे विकृत होने लगा।

     

    त्वचा काली पड़ गई।

     

    आँखें लाल हो गईं।

     

    और उसके पीछे वही काली औरत दिखाई दी।

     

    वह औरत आगे बढ़ी।

     

    “तुम्हारे पिता ने अपनी परछाई देकर तुम्हें बचाया था।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “किससे?”

     

    औरत ने कहा—

     

    “मुझसे नहीं… उससे।”

     

    कमरे की दीवार अचानक फट गई।

     

    दीवार के पीछे एक विशाल काली आकृति दिखाई दी।

     

    उसका शरीर धुएँ से बना था।

     

    उसके चेहरे पर कोई आँखें नहीं थीं।

     

    फिर भी वह अमन को देख रही थी।

     

    अमन समझ गया।

     

    यही वह शक्ति थी जिसे पचास साल पहले ठाकुर ने बंद किया था।

     

    काली आकृति ने कहा—

     

    “पाँचवीं परछाई पूरी हो चुकी है।”

     

    अमन के पैरों के नीचे उसकी सींगों वाली परछाई फैलने लगी।

     

    कमरे में रखे सारे आईने टूटने लगे।

     

    समीर ने चिल्लाकर कहा—

     

    “अमन! अपनी परछाई से मत डरना!”

     

    “मैं क्या करूँ?”

     

    “उसे स्वीकार मत करना!”

     

    अमन ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उसे अपने पिता की बातें याद आने लगीं।

     

    बचपन में पिता अक्सर कहते थे—

     

    “डर हमेशा अंधेरे में नहीं होता, बेटा। कभी-कभी डर हमारे अंदर छिपा होता है।”

     

    अमन ने आँखें खोलीं।

     

    उसने अपनी परछाई की तरफ देखा।

     

    वह अब धीरे-धीरे उसके शरीर से अलग हो रही थी।

     

    अमन ने जमीन पर हाथ रख दिया।

     

    “तू मेरी नहीं है।”

     

    परछाई रुक गई।

     

    अमन ने जोर से कहा—

     

    “मेरी परछाई मेरे डर की नहीं, मेरी पहचान है।”

     

    अचानक कमरे में तेज रोशनी फैल गई।

     

    काली आकृति पीछे हटने लगी।

     

    औरत चीखने लगी।

     

    दीवारें कांपने लगीं।

     

    फिर एक जोरदार आवाज हुई।

     

    धड़ाम!

     

    पूरा कमरा सफेद रोशनी से भर गया।

     

    अमन ने देखा कि उसके पिता की आत्मा उसके सामने खड़ी थी।

     

    उन्होंने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मुझे तुम पर गर्व है।”

     

    अमन रो पड़ा।

     

    “पापा, मेरे साथ चलिए।”

     

    उसके पिता ने सिर हिलाया।

     

    “अब मेरा समय खत्म हो चुका है।”

     

    “नहीं!”

     

    “बेटा, घर जाना।”

     

    उन्होंने हाथ उठाया।

     

    अमन की सींगों वाली परछाई अचानक गायब हो गई।

     

    उसकी जगह उसकी सामान्य परछाई वापस आ गई।

     

    काली आकृति चीखते हुए दीवार के अंदर खिंच गई।

     

    बंगला जोर-जोर से हिलने लगा।

     

    समीर ने अमन का हाथ पकड़ा।

     

    “हमें अभी निकलना होगा!”

     

    दोनों बाहर की तरफ भागे।

     

    बाहर पहुंचते ही पूरा बंगला पीछे से धूल के बादल में बदलने लगा।

     

    ऊपरी मंजिल की खिड़की में वही औरत आखिरी बार दिखाई दी।

     

    उसने अमन की तरफ देखा।

     

    लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं था।

     

    उसने मुस्कुराकर हाथ जोड़ दिए।

     

    फिर बंगला धीरे-धीरे जमीन के अंदर धँस गया।

     

    सुबह जब गाँव वाले वहाँ पहुंचे तो जंगल के बीच सिर्फ एक खाली मैदान था।

     

    न बंगला।

     

    न खंडहर।

     

    न कुआँ।

     

    बस जमीन पर एक पुरानी तस्वीर पड़ी थी।

     

    अमन ने तस्वीर उठाई।

     

    तस्वीर में ठाकुर का परिवार खड़ा था।

     

    उनके पीछे अब कोई काली परछाई नहीं थी।

     

    लेकिन तस्वीर के एक कोने में अमन और उसके पिता खड़े थे।

     

    अमन ने हैरानी से तस्वीर देखी।

     

    “ये कैसे…?”

     

    समीर ने कुछ नहीं कहा।

     

    अमन ने तस्वीर पलट दी।

     

    पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “दरवाजा बंद हो गया है… लेकिन कहानी खत्म नहीं हुई।”

     

    अमन ने ऊपर आसमान की तरफ देखा।

     

    सूरज निकल चुका था।

     

    सब कुछ सामान्य लग रहा था।

     

    लेकिन तभी उसकी नजर जमीन पर पड़ी।

     

    उसकी परछाई बिल्कुल सामान्य थी।

     

    समीर की भी।

     

    फिर अमन ने धीरे से पूछा—

     

    “कबीर कहाँ है?”

     

    समीर का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    दोनों ने पीछे मुड़कर जंगल की तरफ देखा।

     

    दूर एक पेड़ के नीचे कबीर खड़ा था।

     

    वह मुस्कुरा रहा था।

     

    अमन ने राहत की सांस ली और उसकी तरफ बढ़ा।

     

    लेकिन जैसे ही कबीर ने अपना चेहरा ऊपर उठाया…

     

    उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    और उसके पीछे जमीन पर पाँच परछाइयाँ खड़ी थीं।

     

    तभी जंगल के अंदर से एक धीमी आवाज गूँजी—

     

    “एक बंगला खत्म हुआ है… दूसरा अभी बाकी है।”

     

    और उसी क्षण दूर किसी अनजान जगह पर…

     

    एक पुराने दरवाजे के खुलने की आवाज आई।

     

    किर्रर्र…

     

    समाप्त।

  • भूत बंगला — पार्ट 4

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    अमन की परछाई जमीन पर नहीं थी।

     

    वह घबराकर इधर-उधर देखने लगा। उसके सामने समीर और कबीर खड़े थे, लेकिन दोनों की परछाइयाँ जमीन पर साफ दिखाई दे रही थीं।

     

    “मेरी परछाई कहाँ गई?” अमन ने कांपती आवाज में पूछा।

     

    समीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “यहाँ से निकलो! अभी!”

     

    तीनों जंगल की तरफ दौड़ने लगे।

     

    पीछे बंगला अंधेरे में खड़ा था। उसकी ऊपरी खिड़की में अब कोई दिखाई नहीं दे रहा था। लेकिन अमन को ऐसा लग रहा था जैसे कोई लगातार उन्हें देख रहा हो।

     

    कुछ दूर जाने के बाद वे एक पुराने कुएँ के पास पहुंचे।

     

    कुआँ बहुत पुराना था। उसके चारों ओर टूटी हुई पत्थर की दीवार थी और पास ही एक सूखा पेड़ खड़ा था।

     

    कबीर वहीं बैठ गया।

     

    “अब हम यहाँ से गाँव तक पहुँच सकते हैं।”

     

    अमन ने पूछा, “तुम दोनों मुझे उस राघव के बारे में सच क्यों नहीं बता रहे?”

     

    समीर और कबीर एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    आखिर समीर ने कहा—

     

    “क्योंकि हमें खुद नहीं पता कि वह राघव था या नहीं।”

     

    “मतलब?”

     

    कबीर ने धीरे से कहा—

     

    “जब हम जंगल में भाग रहे थे, हमें एक आदमी मिला। उसने कहा कि वह राघव है। उसने हमें बताया कि बंगले से बाहर निकलने का रास्ता कुएँ के पीछे से जाता है।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    “हम उसके साथ यहाँ आए। लेकिन अचानक वह गायब हो गया।”

     

    अमन ने कुएँ की तरफ देखा।

     

    “और तुमने कहा था कि तुमने राघव को कुएँ के पास देखा था?”

     

    कबीर ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    तभी कुएँ के अंदर से हल्की-सी आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    तीनों चुप हो गए।

     

    आवाज फिर आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    जैसे कोई कुएँ की दीवार के अंदर से दरवाजा खटखटा रहा हो।

     

    समीर पीछे हट गया।

     

    “यहाँ से चलो।”

     

    लेकिन अमन कुएँ के पास चला गया।

     

    उसे नीचे से किसी के रोने की आवाज सुनाई दे रही थी।

     

    “बचाओ…”

     

    अमन ने झुककर कुएँ के अंदर देखा।

     

    नीचे बहुत गहरा अंधेरा था।

     

    फिर अचानक उसे नीचे एक चेहरा दिखाई दिया।

     

    राघव का चेहरा।

     

    “अमन!”

     

    अमन पीछे हट गया।

     

    राघव नीचे से चिल्ला रहा था—

     

    “मुझे बाहर निकाल!”

     

    कबीर ने कहा, “यह वही चाल है। हमें इसे नहीं सुनना चाहिए।”

     

    लेकिन अमन को यकीन था कि आवाज असली थी।

     

    “अगर वह सच में राघव हुआ तो?”

     

    समीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “हम रस्सी ढूँढते हैं।”

     

    पास ही एक पुरानी रस्सी पड़ी थी। उन्होंने उसे पेड़ से बांधा और अमन नीचे उतरने लगा।

     

    जैसे-जैसे वह नीचे जा रहा था, हवा ठंडी होती जा रही थी।

     

    कुछ ही देर में उसके पैर जमीन पर पहुंच गए।

     

    कुएँ के नीचे पानी नहीं था।

     

    बल्कि वहाँ एक संकरी सुरंग थी।

     

    सुरंग के अंदर दीवारों पर अजीब निशान बने थे।

     

    अमन ने टॉर्च आगे की।

     

    दीवार पर खून से लिखा था—

     

    “जो अपनी परछाई खो देता है, वह वापस इंसान नहीं बनता।”

     

    अमन का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    तभी सुरंग के अंदर से राघव की आवाज आई—

     

    “अमन… जल्दी आ।”

     

    अमन आवाज की दिशा में बढ़ गया।

     

    कुछ कदम बाद उसे एक छोटा कमरा दिखाई दिया।

     

    कमरे के बीच में राघव बैठा था।

     

    उसके हाथ-पैर बंधे हुए थे।

     

    अमन दौड़कर उसके पास पहुंचा।

     

    “राघव!”

     

    राघव ने सिर उठाया।

     

    “अमन… तुम आ गए।”

     

    अमन ने रस्सी खोलनी शुरू की।

     

    तभी राघव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “रुको।”

     

    “क्या हुआ?”

     

    राघव ने बहुत डरते हुए कहा—

     

    “पहले मेरी परछाई देखो।”

     

    अमन ने टॉर्च नीचे की।

     

    राघव की परछाई थी।

     

    लेकिन वह राघव की तरफ नहीं, बल्कि उल्टी दिशा में बनी हुई थी।

     

    अमन पीछे हट गया।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    राघव मुस्कुराया।

     

    “तुमने देर कर दी।”

     

    अचानक कमरे की दीवारें हिलने लगीं।

     

    राघव का चेहरा बदलने लगा।

     

    कुछ ही सेकंड में उसके चेहरे की जगह एक काली, धुंधली आकृति दिखाई देने लगी।

     

    अमन चीखकर पीछे भागा।

     

    उसी समय ऊपर से समीर की आवाज आई—

     

    “अमन! बाहर आओ!”

     

    अमन सुरंग की तरफ दौड़ा।

     

    लेकिन तभी उसके सामने वही छोटी उम्र का बच्चा खड़ा हो गया।

     

    ठाकुर का बेटा।

     

    उसने अमन की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “तुम्हें अपनी परछाई चाहिए?”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    बच्चे ने कहा—

     

    “तो मेरे साथ आओ।”

     

    “कहाँ?”

     

    “जहाँ तुम्हारी परछाई कैद है।”

     

    बच्चा सुरंग की दूसरी तरफ चल पड़ा।

     

    अमन कुछ पल रुका।

     

    फिर उसके पीछे चल दिया।

     

    सुरंग अचानक एक बड़े कमरे में खुली।

     

    कमरे की दीवारों पर दर्जनों पुराने आईने लगे थे।

     

    हर आईने में अलग-अलग लोग दिखाई दे रहे थे।

     

    कुछ रो रहे थे।

     

    कुछ चीख रहे थे।

     

    और कुछ बिल्कुल चुप थे।

     

    बच्चे ने एक आईने की तरफ इशारा किया।

     

    “वहाँ देखो।”

     

    अमन ने आईने में देखा।

     

    उसमें उसकी परछाई दिखाई दे रही थी।

     

    लेकिन वह अकेली नहीं थी।

     

    उसके पीछे एक काली औरत खड़ी थी।

     

    अमन ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    फिर आईने में मौजूद औरत ने अपना चेहरा अमन के बिल्कुल पास ला दिया।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम्हारी माँ ने मुझे बहुत पहले बुलाया था।”

     

    अमन की आँखें फैल गईं।

     

    “मेरी माँ?”

     

    औरत हँसी।

     

    “तुम्हें लगता है कि तुम्हारे पिता की मृत्यु दुर्घटना थी?”

     

    अमन कुछ बोल नहीं पाया।

     

    उसने बचपन से यही सुना था कि उसके पिता की मौत सड़क दुर्घटना में हुई थी।

     

    औरत ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता इसी बंगले में आए थे।”

     

    अमन ने आईने पर हाथ रख दिया।

     

    “झूठ!”

     

    औरत ने धीरे से कहा—

     

    “उन्होंने तुम्हें बचाने के लिए अपनी परछाई दे दी थी।”

     

    अचानक सारे आईने टूटने लगे।

     

    छन्न्न्न!

     

    बच्चे ने अमन का हाथ पकड़ लिया।

     

    “भागो!”

     

    दोनों सुरंग की ओर दौड़े।

     

    पीछे से सैकड़ों आवाजें आने लगीं—

     

    “अमन…”

     

    “अमन…”

     

    “अमन…”

     

    जैसे पूरा जंगल उसका नाम पुकार रहा हो।

     

    अमन कुएँ की तरफ भागा।

     

    ऊपर समीर और कबीर उसे खींचने के लिए तैयार थे।

     

    लेकिन जैसे ही अमन ऊपर पहुंचा, उसने देखा कि वहाँ केवल समीर खड़ा था।

     

    कबीर गायब था।

     

    “कबीर कहाँ है?”

     

    समीर ने घबराकर कहा—

     

    “वह… अभी यहीं था।”

     

    तभी कुएँ के अंदर से कबीर की चीख सुनाई दी—

     

    “अमन! मुझे बचाओ!”

     

    अमन नीचे देखने ही वाला था कि समीर ने उसे रोक लिया।

     

    “मत देखना!”

     

    “लेकिन वह नीचे है!”

     

    समीर ने कांपते हुए कहा—

     

    “नहीं… कबीर नीचे नहीं है।”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    समीर ने धीरे से अपनी गर्दन उठाई।

     

    उसकी आँखें लाल थीं।

     

    और उसके चेहरे पर एक अजीब मुस्कान थी।

     

    “क्योंकि कबीर तो…”

     

    वह कुछ कह पाता, उससे पहले जंगल में घंटी बजने लगी।

     

    टन… टन… टन…

     

    बंगले की दिशा से।

     

    अमन ने पीछे देखा।

     

    दूर अंधेरे में बंगला दिखाई दे रहा था।

     

    उसकी सारी खिड़कियों में अब रोशनी जल चुकी थी।

     

    और हर खिड़की में एक-एक इंसाàन खड़ा था।

     

    कुल मिलाकर पाँच लोग।

     

    तभी समीर ने अमन के कान में फुसफुसाया—

     

    “अब तुम्हें आखिरी कमरा खोलना होगा।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “कौन-सा कमरा?”

     

    समीर मुस्कुराया।

     

    “जिसमें तुम्हारे पिता अभी भी जिंदा हैं।”

     

    अमन के शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।

     

    और उसी पल उसके पीछे जमीन पर उसकी परछाई वापस दिखाई दी।

     

    लेकिन…

     

    उसकी परछाई के सिर पर दो सींग थे।