“हत्या…”
काली आकृति की आवाज पूरे तहखाने में गूँज उठी।
अर्जुन के कानों में जैसे किसी ने हजारों घंटियाँ बजा दी हों।
उसके सामने वही दृश्य बार-बार घूम रहा था।
एक सुनसान सड़क।
तेज बारिश।
एक कार।
और सड़क के बीच खड़ा एक बच्चा।
अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।
“नहीं… मुझे कुछ याद नहीं।”
काली आकृति हँसी।
“यादें कभी मरती नहीं। इंसान सिर्फ उन्हें दफना देता है।”
अचानक तहखाने की दीवारें गायब हो गईं।
अर्जुन फिर उसी सड़क पर खड़ा था।
बारिश उसके चेहरे पर पड़ रही थी।
सड़क के किनारे एक छोटी-सी लड़की खड़ी थी।
उसके हाथ में लाल गुब्बारा था।
अर्जुन ने उसे पहचानने की कोशिश की।
“तुम कौन हो?”
लड़की ने कुछ नहीं कहा।
दूर से कार की हेडलाइट दिखाई दी।
कार तेजी से उसकी तरफ आ रही थी।
अर्जुन चिल्लाया—
“हटो!”
लेकिन लड़की वहीं खड़ी रही।
कार करीब आई।
और अचानक अर्जुन ने देखा—
कार चला कोई और नहीं, वह खुद था।
उसने ब्रेक लगाने की कोशिश की।
लेकिन ब्रेक काम नहीं कर रहे थे।
एक जोरदार टक्कर हुई।
लड़की हवा में उछली।
लाल गुब्बारा आसमान में चला गया।
और सड़क पर खामोशी छा गई।
अर्जुन चीख उठा।
“नहीं!”
दृश्य बदल गया।
अब वह अस्पताल में था।
एक डॉक्टर किसी से कह रहा था—
“बच्ची की हालत बहुत गंभीर है।”
फिर एक आदमी अंदर आया।
अर्जुन ने उसे देखा।
वह उसका पिता था।
उसने डॉक्टर से कहा—
“इस मामले को यहीं खत्म कर दीजिए।”
अर्जुन ने अपने पिता की तरफ देखा।
“आपने ऐसा क्यों किया?”
उसके पिता ने कहा—
“क्योंकि अगर यह बात बाहर गई, तो तुम्हारी जिंदगी खत्म हो जाएगी।”
अर्जुन के चेहरे पर भय उतर आया।
“तो… वह लड़की?”
“वह मर गई।”
अर्जुन ने सिर पकड़ लिया।
“मैंने उसे मारा?”
पीछे से मीरा की आवाज आई—
“नहीं।”
अर्जुन ने पलटकर देखा।
मीरा खड़ी थी।
“तुमने उसे नहीं मारा।”
“फिर?”
“तुम्हारे पिता ने तुम्हें उस रात की पूरी सच्चाई कभी नहीं बताई।”
अचानक दृश्य फिर बदला।
इस बार अर्जुन ने देखा कि दुर्घटना से कुछ मिनट पहले कार में वह अकेला नहीं था।
उसके साथ एक आदमी बैठा था।
उस आदमी ने अर्जुन को शराब पिलाई थी।
और फिर…
उसने कार की ब्रेक लाइन काट दी थी।
अर्जुन की आँखें फैल गईं।
“यह कौन था?”
मीरा ने कहा—
“कालपुर का वह आदमी जिसने तुम्हारे पिता को ब्लैकमेल किया था।”
“कौन?”
मीरा ने जवाब नहीं दिया।
काली आकृति आगे बढ़ी।
“सच के पास पहुँचकर भी इंसान डरता है।”
उसने हाथ उठाया।
अर्जुन के सामने उस आदमी का चेहरा दिखाई दिया।
गोविंद।
अर्जुन पीछे हट गया।
“नहीं…”
उसने गोविंद की तरफ देखा।
बूढ़ा चुप खड़ा था।
अर्जुन ने पूछा—
“आपने मेरी कार की ब्रेक काटी थीं?”
गोविंद की आँखों से आँसू बहने लगे।
“हाँ।”
“क्यों?”
“क्योंकि तुम्हारे पिता ने मुझे धोखा दिया था।”
“उस बच्ची का क्या दोष था?”
गोविंद चुप रहा।
मीरा ने कहा—
“यही कालपुर का सबसे बड़ा पाप है।”
अर्जुन ने गुस्से में गोविंद को पकड़ लिया।
“तुमने उसे क्यों मारा?”
गोविंद चीख पड़ा—
“मैंने उसे मारना नहीं चाहा था!”
“लेकिन वह मर गई!”
“हाँ!”
गोविंद जमीन पर बैठ गया।
“और उस दिन से मैं हर रात उसकी चीख सुनता हूँ।”
अचानक लाल गुब्बारा हवा में दिखाई दिया।
वह धीरे-धीरे अर्जुन के सामने आकर रुक गया।
उस पर खून से एक नाम लिखा था—
“नैना।”
अर्जुन की आँखों से आँसू निकल आए।
“उस बच्ची का नाम नैना था?”
मीरा ने सिर हिलाया।
“और वह सिर्फ एक हादसे में नहीं मरी थी।”
“फिर?”
“उसे मरने के बाद भी इंसाफ नहीं मिला।”
“क्यों?”
“क्योंकि कालपुर के लोगों ने उसकी मौत को छिपा दिया।”
अर्जुन ने चारों तरफ देखा।
दीवारों पर हजारों चेहरे उभर आए।
हर चेहरा उस रात को देख रहा था।
किसी ने पुलिस को नहीं बताया।
किसी ने गवाही नहीं दी।
किसी ने उसके परिवार की मदद नहीं की।
हर कोई चुप रहा।
काली आकृति ने कहा—
“हत्या सिर्फ वह नहीं करता जो किसी की जान लेता है।”
“कई बार हत्या वह भी करता है जो सच जानते हुए चुप रहता है।”
अर्जुन ने सिर झुका लिया।
तभी तहखाने में एक तेज आवाज हुई।
धड़ाम!
सारी दीवारें हिलने लगीं।
काली आकृति पीछे हट गई।
मीरा ने अर्जुन से कहा—
“अब पाँचवाँ पाप जाग रहा है।”
“कौन सा?”
“लालच।”
अचानक शहर के हर घर में एक साथ रोशनी जल उठी।
लोग अपने घरों से बाहर निकलने लगे।
लेकिन उनके हाथों में सोने के सिक्के थे।
जमीन के कागज थे।
नोटों की गड्डियाँ थीं।
और हर व्यक्ति दूसरे से ज्यादा पाने के लिए लड़ रहा था।
अर्जुन समझ गया—
कालपुर सिर्फ लोगों के पाप दिखा नहीं रहा था।
वह उन्हें जगा रहा था।
मीरा ने कहा—
“जल्दी करो।”
“कहाँ?”
“शहर के पुराने मंदिर में।”
“वहाँ क्यों?”
“क्योंकि पाँचवें पाप की जड़ वहीं है।”
अर्जुन और मीरा सुरंग से बाहर निकलने लगे।
पीछे गोविंद बैठा रो रहा था।
अर्जुन ने उसे देखा।
“आप नहीं आएँगे?”
गोविंद ने कहा—
“मेरी सजा अभी बाकी है।”
अर्जुन आगे बढ़ गया।
लेकिन जैसे ही वह सुरंग से बाहर निकला, उसे एहसास हुआ कि पूरा शहर बदल चुका था।
सड़क पर कोई इंसान जैसा नहीं दिख रहा था।
हर व्यक्ति की आँखें लाल थीं।
हर हाथ में पैसा था।
और सब एक ही चीज के लिए लड़ रहे थे—
और ज्यादा।
दूर मंदिर की घंटी बजने लगी।
एक…
दो…
तीन…
और फिर तेरहवीं घंटी।
मंदिर के दरवाजे अपने आप खुल गए।
अंदर एक विशाल मूर्ति के सामने कोई खड़ा था।
वह आदमी अर्जुन को देखकर मुस्कुराया।
“आ गए?”
अर्जुन ने पूछा—
“तुम कौन हो?”
वह धीरे-धीरे प्रकाश में आया।
अर्जुन के पैरों तले जमीन खिसक गई।
वह आदमी…
उसके पिता थे।
लेकिन उनके पिता तो पाँच साल पहले मर चुके थे।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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