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लेखक: Alka Singh

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Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

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मार्च 2026
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  • मुझमें समाया तू…!!

    मुझमें समाया तू…!!

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

     

    मुझमें समाया तू,

    या मैं ही तुझमें कहीं खो गई,

    तेरी चाहत की उस ख़ामोश रात में

    मैं अपनी ही परछाईं से जुदा हो गई।

     

    तेरे जाने के बाद भी

    तेरी आहटें मेरे कमरे में रहती हैं,

    बुझी हुई आँखों में मेरी

    तेरी तस्वीरें रात-भर जलती हैं।

     

    मैंने तुझे भूलने की बहुत कोशिश की,

    मगर हर कोशिश तुझ तक ले आई,

    जिस दिल से तेरा नाम मिटाना चाहा,

    उसी दिल ने तेरी याद सजाई।

     

    तू मिला भी तो ऐसे,

    जैसे कोई अधूरा ख़्वाब मिला हो,

    छूकर भी जिसे रख न सकूँ पास,

    और छोड़कर भी जिसे भुला न सकूँ।

     

    अब दर्द मेरा अपना नहीं रहा,

    हर टीस में तेरा नाम आता है,

    मैं रोती नहीं अब तेरे लिए—

    मेरा अँधेरा ही मुझे रुलाता है।

     

    और आज जब ख़ुद से पूछती हूँ—

    आख़िर तू मुझसे इतना दूर क्यों है?

    तो भीतर से कोई धीमे से कहता है—

    “दूर कहाँ है वो तुझसे…

    मुझमें समाया तू।”

     

     

    Rachna pasand aai ho to like,comment jarur kare||🙏

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • तेरे इश्क़ में….!!

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

    महानगर के सबसे प्रतिष्ठित महाविद्यालय में उस दिन नए विद्यार्थियों के स्वागत का समारोह था। पूरा परिसर रंग-बिरंगे फूलों और रोशनी से सजा हुआ था। चारों ओर हँसी, संगीत और युवाओं की चहल-पहल थी।

     

    उसी भीड़ में एक युवक अपने मित्र के साथ प्रवेश कर रहा था।

     

    नाम था—आरव सिंह।

     

    लंबा कद, तेजस्वी व्यक्तित्व और आँखों में आत्मविश्वास। वह महाविद्यालय में अपनी पढ़ाई के साथ-साथ मार्शल आर्ट्स का भी अभ्यास करता था। लेकिन उसके स्वभाव में एक अजीब-सी शांति थी। वह बिना कारण किसी से उलझता नहीं था।

     

    दूसरी ओर, पुस्तकालय की सीढ़ियों से एक युवती नीचे उतर रही थी।

     

    नंदिनी शर्मा।

     

    लंबे काले बाल, शांत चेहरा और आँखों में ऐसी मासूमियत, जिसे देखकर कोई भी कुछ पल के लिए ठहर जाए।

     

    नंदिनी के हाथ में पुस्तकों का ढेर था।

     

    अचानक पीछे से किसी ने उसे धक्का दे दिया।

     

    पुस्तकें हवा में उछलकर फर्श पर बिखर गईं।

     

    नंदिनी घबरा गई।

     

    तभी एक हाथ आगे बढ़ा और सबसे पहले उसकी पुस्तक उठा ली।

     

    “आपकी पुस्तक।”

     

    नंदिनी ने ऊपर देखा।

     

    सामने आरव खड़ा था।

     

    “धन्यवाद।”

     

    आरव मुस्कराया।

     

    “केवल धन्यवाद से काम नहीं चलेगा।”

     

    नंदिनी ने भौंहें सिकोड़ लीं।

     

    “और क्या चाहिए?”

     

    “परिचय।”

     

    नंदिनी हँस पड़ी।

     

    “आप बहुत अजीब हैं।”

     

    “और आप बहुत जल्दी हँसती हैं।”

     

    “तो?”

     

    “तो अच्छा है।”

     

    दोनों कुछ क्षण एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    उन्हें तब नहीं पता था कि यह कुछ सेकंड उनके पूरे जीवन को बदलने वाले थे।

     

    —

     

    अगले कुछ सप्ताहों में दोनों की मित्रता गहरी होती चली गई।

     

    कभी पुस्तकालय में मुलाकात होती, कभी कैंटीन में।

     

    कभी दोनों घंटों महाविद्यालय के पुराने बरगद के नीचे बैठकर बातें करते।

     

    नंदिनी को बारिश पसंद थी।

     

    आरव को बारिश में भीगना।

     

    एक दिन अचानक तेज वर्षा शुरू हो गई।

     

    नंदिनी बरामदे में खड़ी होकर वर्षा को देखने लगी।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “भीगना है?”

     

    नंदिनी ने सिर हिलाया।

     

    “लेकिन कपड़े खराब हो जाएँगे।”

     

    आरव मुस्कराया।

     

    “कभी-कभी जीवन में कपड़ों की चिंता छोड़कर बारिश में भीग लेना चाहिए।”

     

    नंदिनी ने उसकी ओर देखा।

     

    “और कभी-कभी?”

     

    “कभी-कभी किसी का हाथ पकड़कर भीगना चाहिए।”

     

    नंदिनी मुस्करा दी।

     

    दोनों बारिश में उतर गए।

     

    उस दिन पहली बार आरव ने उसका हाथ थामा था।

     

    और नंदिनी ने अपना हाथ वापस नहीं खींचा।

     

    —

     

    समय बीतता गया।

     

    दोनों के बीच मित्रता कब प्रेम में बदल गई, उन्हें स्वयं पता नहीं चला।

     

    एक शाम महाविद्यालय की छत पर सूर्य अस्त हो रहा था।

     

    नंदिनी रेलिंग के पास खड़ी थी।

     

    आरव उसके पास पहुँचा।

     

    “नंदिनी।”

     

    “हूँ?”

     

    “अगर मैं तुमसे एक बात कहूँ तो क्या तुम नाराज़ होगी?”

     

    “कहकर देखो।”

     

    आरव ने गहरी साँस ली।

     

    “मैं तुम्हें पसंद करता हूँ।”

     

    नंदिनी चुप रही।

     

    आरव घबरा गया।

     

    “कुछ कहोगी?”

     

    नंदिनी ने उसकी ओर देखकर धीरे से कहा,

     

    “मैं तो सोच रही थी कि तुम यह बात कहने में इतनी देर क्यों कर रहे हो।”

     

    आरव की आँखों में चमक आ गई।

     

    “तो इसका अर्थ…?”

     

    नंदिनी ने मुस्कराते हुए कहा,

     

    “हाँ, आरव। मुझे भी तुमसे प्रेम है।”

     

    उस क्षण दोनों के बीच कोई वादा नहीं हुआ।

     

    लेकिन दोनों ने मन ही मन जीवन भर साथ रहने का निर्णय कर लिया।

     

    —

     

    लेकिन उनकी प्रेम कहानी में एक ऐसा रहस्य छिपा था, जिसकी उन्हें कोई जानकारी नहीं थी।

     

    नंदिनी के पिता शहर के बड़े उद्योगपति थे।

     

    उनके व्यवसाय पर कई लोगों की निगाह थी।

     

    उनके पुराने साझेदार का बेटा विक्रम नंदिनी से विवाह करना चाहता था। लेकिन नंदिनी ने उसे स्पष्ट रूप से मना कर दिया था।

     

    विक्रम को यह बात स्वीकार नहीं थी।

     

    जब उसे पता चला कि नंदिनी आरव से प्रेम करती है, तो उसके भीतर क्रोध भड़क उठा।

     

    एक रात उसने अपने साथियों से कहा,

     

    “अगर आरव रास्ते से हट गया तो नंदिनी स्वयं मेरे पास लौट आएगी।”

     

    उसके साथियों ने पूछा,

     

    “और अगर नहीं लौटी?”

     

    विक्रम ने ठंडी मुस्कान के साथ कहा,

     

    “तो उसे भी समझा देंगे कि मेरे विरुद्ध जाने की कीमत क्या होती है।”

     

    —

     

    कुछ ही दिनों बाद आरव और नंदिनी की तस्वीरें नंदिनी के घर पहुँच गईं।

     

    घर में तूफान आ गया।

     

    नंदिनी के पिता ने क्रोध में पूछा,

     

    “यह लड़का कौन है?”

     

    नंदिनी ने साहस करके उत्तर दिया,

     

    “जिससे मैं प्रेम करती हूँ।”

     

    एक पल के लिए पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    “तुम्हें पता भी है तुम क्या कह रही हो?”

     

    “हाँ, पिताजी।”

     

    “आज से महाविद्यालय बंद। उस लड़के से कोई संबंध नहीं रहेगा।”

     

    नंदिनी की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “आप मुझे उससे दूर कर सकते हैं, लेकिन मेरे मन से उसका प्रेम नहीं निकाल सकते।”

     

    यह सुनकर पिता और अधिक क्रोधित हो गए।

     

    उधर आरव के घर में भी उसे कड़ी डाँट पड़ी।

     

    “तुम्हें अपने भविष्य की चिंता है या नहीं?”

     

    आरव ने शांत स्वर में कहा,

     

    “मुझे अपने भविष्य की चिंता है। और मैं चाहता हूँ कि उस भविष्य में नंदिनी मेरे साथ हो।”

     

    उसके पिता ने कहा,

     

    “यदि वह लड़की तुम्हारे जीवन में आई तो हमसे संबंध तोड़ने पड़ेंगे।”

     

    आरव की आँखें नम हो गईं।

     

    “मैं नंदिनी को पाने के लिए अपने माता-पिता को नहीं खोना चाहता। मैं चाहता हूँ कि एक दिन आप दोनों स्वयं हमारा हाथ मिलाएँ।”

     

    —

     

    दोनों को अलग कर दिया गया।

     

    फोन छीन लिए गए।

     

    मुलाकात बंद कर दी गई।

     

    लेकिन प्रेम की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि दूरी उसे समाप्त नहीं करती—कई बार और गहरा कर देती है।

     

    एक रात नंदिनी की सहेली ने चुपके से आरव तक संदेश पहुँचाया।

     

    “मैं तुम्हारा इंतज़ार करूँगी।”

     

    आरव ने उत्तर दिया—

     

    “मैं तुम्हें लेने नहीं, तुम्हारे साथ अपना जीवन माँगने आऊँगा।”

     

    —

     

    इसी बीच विक्रम ने अपनी योजना का अगला चरण शुरू कर दिया।

     

    एक शाम नंदिनी के पिता को एक आवश्यक बैठक के बहाने शहर से बाहर बुलाया गया।

     

    वहाँ उन्हें धमकी दी गई कि यदि उन्होंने नंदिनी का विवाह विक्रम से नहीं किया तो उनका व्यवसाय बर्बाद कर दिया जाएगा।

     

    नंदिनी को जब यह पता चला तो उसने घर से निकलने का निर्णय लिया।

     

    लेकिन रास्ते में उसकी गाड़ी रोक ली गई।

     

    कुछ लोग उसे जबरन दूसरी गाड़ी में बैठाने लगे।

     

    नंदिनी ने संघर्ष किया।

     

    “मुझे छोड़ दो!”

     

    एक व्यक्ति ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    तभी पीछे से एक आवाज़ आई—

     

    “उसका हाथ छोड़।”

     

    सबने पलटकर देखा।

     

    आरव खड़ा था।

     

    उसके चेहरे पर क्रोध था।

     

    एक युवक ने उसकी ओर दौड़कर हमला किया।

     

    आरव ने उसका वार रोककर उसे जमीन पर गिरा दिया।

     

    दूसरा युवक पीछे से आया।

     

    आरव ने घूमकर उसका हाथ पकड़ा और उसे दूर धकेल दिया।

     

    लेकिन संख्या अधिक थी।

     

    चारों ओर से लोग आरव पर टूट पड़े।

     

    नंदिनी चीख उठी—

     

    “आरव!”

     

    आरव लड़ता रहा।

     

    उसे चोटें लगीं, लेकिन उसने हार नहीं मानी।

     

    अंततः उसने नंदिनी को अपने पीछे किया और कहा,

     

    “जब तक मैं खड़ा हूँ, कोई तुम्हें छू भी नहीं सकता।”

     

    तभी दूर से पुलिस के सायरन की आवाज़ सुनाई दी।

     

    हमलावर भागने लगे।

     

    लेकिन विक्रम वहाँ नहीं था।

     

    पुलिस ने कुछ लोगों को पकड़ लिया।

     

    पूछताछ में विक्रम का नाम सामने आया।

     

    —

     

    अब दोनों परिवारों को समझ आ गया कि मामला केवल प्रेम का नहीं था।

     

    नंदिनी के पिता ने पहली बार आरव से कहा,

     

    “तुम्हें चोट लगी है।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “चोट की चिंता मत कीजिए। नंदिनी सुरक्षित है, मेरे लिए यही पर्याप्त है।”

     

    नंदिनी के पिता ने उसकी ओर लंबे समय तक देखा।

     

    उनकी कठोरता धीरे-धीरे पिघल रही थी।

     

    उन्होंने पूछा,

     

    “तुम मेरी बेटी से इतना प्रेम क्यों करते हो?”

     

    आरव ने उत्तर दिया,

     

    “क्योंकि वह मेरे जीवन को सुंदर बनाती है। लेकिन मैं उससे केवल इसलिए प्रेम नहीं करता कि वह मुझे खुश करती है। मैं इसलिए प्रेम करता हूँ क्योंकि मैं उसकी खुशी को अपनी खुशी से पहले रखना चाहता हूँ।”

     

    नंदिनी की माँ की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    —

     

    लेकिन कहानी अभी समाप्त नहीं हुई थी।

     

    विक्रम ने अंतिम चाल चली।

     

    उसने नंदिनी के पिता के कार्यालय से महत्वपूर्ण दस्तावेज चुरा लिए और उन पर ऐसा आरोप लगाने की तैयारी की, जिससे पूरा व्यवसाय संकट में पड़ सकता था।

     

    आरव को इसकी भनक लग गई।

     

    वह अकेला उन दस्तावेजों को वापस लेने पहुँचा।

     

    एक पुराने गोदाम में विक्रम उसका इंतज़ार कर रहा था।

     

    “तुम्हें क्या लगता है, नायक बन जाओगे?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मैं नायक बनने नहीं आया। केवल यह बताने आया हूँ कि नंदिनी तुम्हारी कभी नहीं होगी।”

     

    विक्रम ने क्रोध में हमला कर दिया।

     

    दोनों के बीच भयंकर संघर्ष हुआ।

     

    गोदाम की खिड़कियाँ टूट गईं।

     

    टेबल उलट गए।

     

    लेकिन आरव पीछे नहीं हटा।

     

    अंततः उसने दस्तावेज़ अपने हाथ में ले लिए।

     

    तभी पुलिस वहाँ पहुँच गई।

     

    विक्रम गिरफ्तार कर लिया गया।

     

    नंदिनी के पिता के विरुद्ध रचा गया पूरा षड्यंत्र सामने आ गया।

     

    —

     

    उस रात दोनों परिवार एक ही घर में बैठे थे।

     

    नंदिनी के पिता ने आरव के पिता की ओर देखा।

     

    “हम दोनों ने अपने बच्चों को अलग करने की कोशिश की।”

     

    आरव के पिता ने गहरी साँस ली।

     

    “हाँ। शायद हम दोनों डर गए थे।”

     

    नंदिनी के पिता ने कहा,

     

    “लेकिन इन दोनों ने हमें दिखा दिया कि प्रेम केवल भावुकता नहीं होता। यदि उसमें विश्वास और जिम्मेदारी हो, तो वह कठिन से कठिन परिस्थिति का सामना कर सकता है।”

     

    आरव की माँ ने नंदिनी को अपने पास बुलाया।

     

    “बेटी, क्या तुम सचमुच हमारे बेटे के साथ जीवन बिताना चाहती हो?”

     

    नंदिनी की आँखों में आँसू थे।

     

    उसने सिर झुका लिया।

     

    “जी।”

     

    आरव के पिता ने मुस्कराकर कहा,

     

    “तो फिर हमें अब कोई आपत्ति नहीं।”

     

    आरव ने आश्चर्य से अपने पिता की ओर देखा।

     

    “सच?”

     

    पिता ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “हाँ। लेकिन एक शर्त है।”

     

    आरव मुस्कराया।

     

    “क्या?”

     

    “नंदिनी को हमेशा खुश रखना।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “यह शर्त मैं जीवन भर निभाऊँगा।”

     

    —

     

    कुछ महीनों बाद उसी महाविद्यालय में विवाह का भव्य आयोजन हुआ जहाँ दोनों पहली बार मिले थे।

     

    उसी बरगद के पेड़ के नीचे फूलों की सजावट की गई थी।

     

    नंदिनी लाल जोड़े में अत्यंत सुंदर लग रही थी।

     

    आरव ने उसे देखा तो कुछ पल के लिए उसकी आँखें वहीं ठहर गईं।

     

    नंदिनी ने मुस्कराकर पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “सोच रहा हूँ, जिस दिन तुम्हारी किताबें जमीन पर गिरी थीं, उसी दिन मेरा पूरा जीवन तुम्हारे कदमों में आ गया था।”

     

    नंदिनी की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “और आज?”

     

    आरव ने उसका हाथ थाम लिया।

     

    “आज मेरा पूरा जीवन तुम्हारे साथ खड़ा है।”

     

    मंडप में दोनों ने सात फेरे लिए।

     

    हर फेरे के साथ दोनों परिवारों की आँखों में खुशी थी।

     

    विवाह के बाद नंदिनी ने आरव से कहा,

     

    “हमारी कहानी कितनी कठिन थी।”

     

    आरव मुस्कराया।

     

    “हाँ।”

     

    “फिर भी हम जीत गए।”

     

    आरव ने उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा,

     

    “हम किसी के विरुद्ध नहीं जीते, नंदिनी। हमने बस अपने प्रेम को हारने नहीं दिया।”

     

    नंदिनी ने अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया।

     

    आकाश में आतिशबाज़ी चमक रही थी।

     

    नीचे दोनों परिवार एक साथ खड़े थे।

     

    और उसी रात आरव ने नंदिनी से कहा—

     

    “आज से तुम्हारा घर मेरा घर है और मेरा घर तुम्हारा।”

     

    नंदिनी मुस्कराई।

     

    “और हमारा प्रेम?”

     

    आरव ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “वह हमारी सबसे बड़ी दौलत है।”

     

    दूर कहीं मंदिर की घंटियाँ बज रही थीं।

     

    जिस प्रेम की शुरुआत एक महाविद्यालय की सीढ़ियों पर बिखरी हुई पुस्तकों से हुई थी, वह आज सात जन्मों के वचन में बदल चुका था।

     

    क्योंकि सच्चा प्रेम वह नहीं जो कठिनाइयों से बचकर निकल जाए।

    सच्चा प्रेम वह है जो हर तूफ़ान के सामने खड़ा होकर कहे—

     

    “तुम मेरे साथ हो, तो मुझे किसी तूफ़ान से डर नहीं।”

     

    और आरव तथा नंदिनी की कहानी इस बात की गवाही बन गई कि जब प्रेम में विश्वास हो, तो सबसे बड़ी दूरी भी छोटी पड़ जाती है और सबसे कठिन रास्ता भी मंज़िल तक पहुँचा देता है।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😂 पप्पू की खतरनाक शादी 😂

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

     

     

    पप्पू अपने मोहल्ले का सबसे बड़ा आलसी और सबसे ज्यादा आत्मविश्वासी लड़का था। उसे लगता था कि दुनिया में उससे ज्यादा समझदार कोई नहीं है। एक दिन उसकी माँ ने कहा, “पप्पू, अब तुम्हारी शादी कर देनी चाहिए।”

     

    पप्पू ने तुरंत बालों में कंघी करते हुए कहा, “माँ, लड़की सुंदर होनी चाहिए, खाना अच्छा बनाती होनी चाहिए और मेरी हर बात माननी चाहिए।”

     

    माँ बोली, “बेटा, लड़की चाहिए या रोबोट?”

     

    पप्पू ने कहा, “रोबोट भी चलेगा, बस रिमोट मेरे हाथ में होना चाहिए!” 😂

     

    कुछ दिनों बाद पप्पू की शादी तय हो गई। शादी वाले दिन पप्पू घोड़ी पर बैठकर इतना अकड़ रहा था जैसे बारात नहीं, प्रधानमंत्री की रैली हो।

     

    रास्ते में उसके दोस्त चिंटू ने पूछा, “पप्पू, डर तो नहीं लग रहा?”

     

    पप्पू बोला, “बिल्कुल नहीं! मैं अपनी पत्नी को पहली रात ही बता दूँगा कि घर में मेरी चलती है।”

     

    चिंटू हँसकर बोला, “भाई, पहले शादी हो जाने दे, फिर देखना किसकी चलती है।”

     

    शादी धूमधाम से हुई। पप्पू ने दुल्हन को देखा और मुस्कुराते हुए बोला, “अब से तुम मेरी हर बात मानोगी।”

     

    दुल्हन ने प्यार से पूछा, “सच?”

     

    पप्पू बोला, “हाँ!”

     

    दुल्हन ने कहा, “तो आज से तुम खाना बनाओगे, कपड़े धोओगे और सुबह चाय भी बनाओगे।”

     

    पप्पू के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई। उसने धीरे से पूछा, “ये नियम कब बने?”

     

    पत्नी बोली, “अभी-अभी। और तुमने खुद कहा था कि मैं तुम्हारी हर बात मानूँगी।” 😂

     

    अगली सुबह पप्पू नींद में था। तभी पत्नी ने आवाज लगाई, “पप्पू जी, उठिए!”

     

    पप्पू बोला, “आज रविवार है, मुझे सोने दो।”

     

    पत्नी बोली, “ठीक है, फिर मैं तुम्हारे दोस्तों को फोन करके बता देती हूँ कि शादी के बाद पप्पू सुबह आठ बजे तक सोता है।”

     

    पप्पू तुरंत बिस्तर से कूदकर बोला, “नहीं-नहीं! मैं तो बस आँखों का व्यायाम कर रहा था!”

     

    कुछ दिनों बाद पप्पू का दोस्त चिंटू मिलने आया। उसने देखा कि पप्पू रसोई में सब्जी काट रहा है।

     

    चिंटू ने पूछा, “क्या हुआ भाई? तू तो कहता था कि घर में तेरी चलती है!”

     

    पप्पू ने चाकू चलाते हुए कहा, “चलती तो मेरी ही है।”

     

    चिंटू बोला, “कैसे?”

     

    पप्पू ने मुस्कुराकर कहा, “मैं जहाँ मेरी पत्नी कहती है, वहीं चलता हूँ!” 🤣

     

    तभी पीछे से पत्नी की आवाज आई, “पप्पू जी, चाय बन गई?”

     

    पप्पू तुरंत बोला, “जी मैडम!”

     

    चिंटू जोर-जोर से हँसने लगा।

     

    पप्पू ने उसे घूरकर कहा, “हँस मत! शादी के बाद असली खतरनाक चीज़ भूत नहीं, पत्नी की आवाज होती है!”

     

    चिंटू बोला, “भाई, अब समझ आया कि तू शादी को ‘खतरनाक’ क्यों कहता है!”

     

    पप्पू ने सिर हिलाते हुए कहा, “शादी से पहले मैं राजा था… और शादी के बाद मैं राजा का ड्राइवर बन गया!” 😂😂

     

    और इस तरह पप्पू की खतरनाक शादी पूरे मोहल्ले में मशहूर हो गई।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • वो अजनबी मेरा हमसफ़र

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

     

    रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे। आसमान में बादल इस तरह गरज रहे थे, जैसे किसी पुराने राज़ को उजागर करने की जिद पर हों। सुनसान पहाड़ी रास्ते पर आर्या की कार तेज़ी से आगे बढ़ रही थी। बारिश इतनी तेज़ थी कि कुछ मीटर आगे का रास्ता भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    आर्या ने घबराकर फोन देखा।

     

    कोई नेटवर्क नहीं।

     

    उसने गहरी साँस ली और कार की रफ्तार थोड़ी कम कर दी।

     

    तभी अचानक…

     

    धड़ाम!

     

    कार का पिछला पहिया फट गया।

     

    आर्या ने किसी तरह कार संभाली और सड़क के किनारे रोक दी। उसने बाहर देखा। चारों तरफ घना जंगल था। दूर-दूर तक कोई घर, कोई रोशनी, कोई इंसान नहीं।

     

    उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई।

     

    वह कार से बाहर निकलने ही वाली थी कि उसे पीछे से किसी के कदमों की आवाज़ सुनाई दी।

     

    छप… छप… छप…

     

    बारिश में कोई उसकी तरफ बढ़ रहा था।

     

    आर्या का गला सूख गया।

     

    “क… कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    कुछ ही सेकंड बाद एक लंबा, भीगा हुआ आदमी उसकी कार के सामने आकर खड़ा हो गया। काले रंग की शर्ट, चेहरे पर बारिश की बूंदें और आँखों में एक अजीब-सी गंभीरता।

     

    उसने कार की तरफ देखा और शांत आवाज़ में कहा—

     

    “आप यहाँ अकेली नहीं रह सकतीं।”

     

    आर्या ने तुरंत दरवाज़ा लॉक कर लिया।

     

    “आप… कौन हैं?”

     

    अजनबी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “अभी के लिए इतना समझ लीजिए कि मैं आपकी मदद करने आया हूँ।”

     

    “मुझे आपकी मदद नहीं चाहिए।”

     

    वह हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “अगर मदद नहीं चाहिए होती, तो आप इतनी देर से मुझे देखकर काँप नहीं रही होतीं।”

     

    आर्या चुप हो गई।

     

    उस आदमी ने कार का पिछला टायर देखा और कहा—

     

    “टायर बदलने में वक्त लगेगा। और ये जगह सुरक्षित नहीं है।”

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    उसने सड़क के दूसरी तरफ अंधेरे जंगल की ओर देखा।

     

    “क्योंकि मैं इस रास्ते को आपसे बेहतर जानता हूँ।”

     

    उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जिसने आर्या को बेचैन कर दिया।

     

    “आपका नाम?”

     

    कुछ पल की खामोशी के बाद उसने कहा—

     

    “कबीर।”

     

    “और मैं आप पर भरोसा क्यों करूँ?”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आपको भरोसा करने की जरूरत नहीं है। बस मेरे साथ चलिए।”

     

    आर्या ने मना करने के लिए मुँह खोला ही था कि अचानक जंगल की तरफ से किसी गाड़ी की हेडलाइट दिखाई दी।

     

    कबीर का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

     

    “अब आपके पास मेरे साथ चलने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वो लोग आपको ढूँढ रहे हैं।”

     

    आर्या के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “कौन लोग?”

     

    कबीर ने उसका हाथ पकड़ा और उसे कार से बाहर खींच लिया।

     

    “चलो!”

     

    “मेरा हाथ छोड़िए!”

     

    “अगर जिंदा रहना है तो अभी सवाल मत कीजिए।”

     

    दोनों बारिश में जंगल के अंदर भागने लगे।

     

    आर्या का पैर फिसला और वह गिरते-गिरते बची। कबीर ने तुरंत उसकी कमर थाम ली।

     

    एक पल के लिए दोनों एक-दूसरे के बेहद करीब थे।

     

    बारिश की ठंडी बूंदों के बीच आर्या ने पहली बार उसकी आँखों को इतनी करीब से देखा।

     

    उन आँखों में अजीब-सी बेचैनी थी।

     

    जैसे वह उसे बहुत पहले से जानता हो।

     

    कबीर ने धीरे से कहा—

     

    “ठीक हो?”

     

    आर्या ने उसकी बाँह से खुद को अलग किया।

     

    “हाँ।”

     

    “तो चलो।”

     

    कुछ दूर चलने के बाद दोनों एक पुरानी हवेली के सामने पहुँचे।

     

    हवेली बाहर से डरावनी थी, लेकिन अंदर पहुँचते ही आर्या को हैरानी हुई। कमरों में बिजली थी, आग जल रही थी और सब कुछ व्यवस्थित था।

     

    कबीर ने उसे एक तौलिया दिया।

     

    “कपड़े सुखा लीजिए। आपको सर्दी लग जाएगी।”

     

    आर्या ने तौलिया लेते हुए पूछा—

     

    “ये घर आपका है?”

     

    कबीर ने कुछ नहीं कहा।

     

    “कबीर?”

     

    “हाँ।”

     

    “और आप यहाँ अकेले रहते हैं?”

     

    उसने उसकी तरफ देखा।

     

    “पहले अकेला रहता था।”

     

    “पहले?”

     

    कबीर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    आर्या ने ध्यान दिया कि दीवार पर कई पुरानी तस्वीरें लगी थीं।

     

    एक तस्वीर के सामने जाकर वह रुक गई।

     

    तस्वीर में एक जवान लड़की थी।

     

    चेहरा देखकर आर्या के कदम जैसे जमीन में जम गए।

     

    वह लड़की…

     

    बिल्कुल उसी जैसी दिख रही थी।

     

    “ये कौन है?”

     

    कबीर चुप रहा।

     

    आर्या ने उसकी ओर देखा।

     

    “कबीर, ये लड़की कौन है?”

     

    वह धीरे-धीरे तस्वीर के पास आया।

     

    “मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा।”

     

    “और अब?”

     

    “अब… सिर्फ एक याद।”

     

    आर्या ने तस्वीर को गौर से देखा।

     

    “इसका नाम?”

     

    कबीर ने धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “आर्या।”

     

    उसके हाथ से तौलिया गिर गया।

     

    “क्या?”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “उसका नाम भी आर्या था।”

     

    आर्या के भीतर जैसे तूफान उठ गया।

     

    “ये मजाक है?”

     

    “काश होता।”

     

    कुछ देर तक दोनों के बीच खामोशी रही।

     

    फिर अचानक बाहर गोली चलने की आवाज़ आई।

     

    धाँय!

     

    आर्या चीख पड़ी।

     

    कबीर ने तुरंत लाइट बंद कर दी।

     

    “नीचे झुको।”

     

    कुछ सेकंड बाद हवेली के मुख्य दरवाज़े पर जोरदार चोट हुई।

     

    कबीर ने आर्या का हाथ पकड़ा और उसे एक गुप्त कमरे में ले गया।

     

    “यहाँ रहो। जब तक मैं वापस न आऊँ, बाहर मत आना।”

     

    “आप कहाँ जा रहे हैं?”

     

    “उन लोगों को रोकने।”

     

    “लेकिन आप अकेले—”

     

    “मुझ पर भरोसा करो।”

     

    कबीर चला गया।

     

    करीब दस मिनट तक बाहर संघर्ष की आवाज़ें आती रहीं।

     

    फिर अचानक सब शांत हो गया।

     

    आर्या डरते-डरते बाहर आई।

     

    कबीर सीढ़ियों के पास खड़ा था। उसके माथे पर हल्की चोट थी।

     

    आर्या दौड़कर उसके पास पहुँची।

     

    “आप ठीक हैं?”

     

    कबीर ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तुम्हें मेरी चिंता हो रही है?”

     

    आर्या कुछ पल उसे देखती रही।

     

    “हाँ… शायद।”

     

    कबीर की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “यही तो डर है।”

     

    “किस बात का?”

     

    “कि इतिहास खुद को दोहरा न दे।”

     

    आर्या ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मुझे सच बताइए।”

     

    कबीर ने लंबी साँस ली।

     

    “तीन साल पहले मेरी जिंदगी में एक लड़की थी। उसका नाम आर्या था। हम एक-दूसरे से प्यार करते थे। लेकिन एक रात उसे उन लोगों ने मारने की कोशिश की, जिनसे मैं आज भी लड़ रहा हूँ।”

     

    “और वो?”

     

    “वो मर गई।”

     

    आर्या की आँखें भर आईं।

     

    “आपने उसकी मौत देखी?”

     

    कबीर ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “फिर मैं…?”

     

    कबीर ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “तुम उसके जैसी दिखती हो। बहुत ज्यादा।”

     

    आर्या के दिल में एक अजीब-सी हलचल हुई।

     

    “और अगर मैं वो नहीं हूँ?”

     

    कबीर ने धीरे से कहा—

     

    “तो शायद तुम मेरी जिंदगी में आई दूसरी आर्या हो।”

     

    उस रात दोनों हवेली की बालकनी में बैठे रहे। बारिश धीरे-धीरे थम चुकी थी। बादलों के पीछे से चाँद निकल आया था।

     

    आर्या ने पूछा—

     

    “कबीर, अगर मैं कल यहाँ से चली गई तो?”

     

    “तो मैं तुम्हें रोकूँगा नहीं।”

     

    “और अगर मैं रुकना चाहूँ?”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तो मैं तुम्हें फिर कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।”

     

    आर्या मुस्कुरा दी।

     

    “आप जानते हैं? जब मैं पहली बार आपसे मिली थी, मुझे लगा था आप बहुत अजीब हैं।”

     

    “और अब?”

     

    “अब लगता है… आप खतरनाक हैं।”

     

    कबीर हँस पड़ा।

     

    “बस?”

     

    आर्या ने धीरे से कहा—

     

    “और थोड़े अच्छे भी।”

     

    दोनों की आँखें मिलीं।

     

    उस पल में जैसे पूरी दुनिया थम गई।

     

    लेकिन तभी आर्या की नजर कबीर के कमरे में रखी एक पुरानी डायरी पर पड़ी।

     

    उसने डायरी उठाई।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर कभी आर्या वापस आए, तो उसे सच जरूर बताना।”

     

    आर्या के हाथ काँपने लगे।

     

    “कबीर… ये क्या है?”

     

    कबीर ने डायरी देखी और उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “इसे मत पढ़ो।”

     

    “क्यों?”

     

    आर्या ने अगला पन्ना खोला।

     

    वहाँ उसकी तस्वीर थी।

     

    लेकिन तस्वीर आज से तीन साल पुरानी थी।

     

    आर्या की साँस रुक गई।

     

    “ये… मैं हूँ।”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन ये कैसे संभव है?”

     

    कबीर कुछ कहता, उससे पहले हवेली के बाहर कार रुकने की आवाज़ आई।

     

    इस बार कबीर नहीं घबराया।

     

    उसने सिर्फ इतना कहा—

     

    “वे लोग आ गए हैं।”

     

    “कौन?”

     

    “तुम्हारे अतीत का सच।”

     

    दरवाज़ा खुला।

     

    एक बुजुर्ग आदमी अंदर आया। उसे देखते ही कबीर पीछे हट गया।

     

    बुजुर्ग ने आर्या को देखा और उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    “मेरी बेटी… तुम जिंदा हो।”

     

    आर्या स्तब्ध रह गई।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    बुजुर्ग ने काँपती आवाज़ में कहा—

     

    “तुम्हारा पिता।”

     

    आर्या ने कबीर की ओर देखा।

     

    “ये क्या हो रहा है?”

     

    कबीर की आँखों में दर्द था।

     

    “तीन साल पहले जो लड़की मरी थी… वो तुम नहीं थी।”

     

    “फिर कौन थी?”

     

    “तुम्हारी हमशक्ल बहन।”

     

    आर्या के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “मेरी… बहन?”

     

    बुजुर्ग ने सिर झुका लिया।

     

    “तुम्हें बचाने के लिए हमने तुम्हारी मौत की झूठी खबर फैलाई थी। लेकिन तुम्हारी याददाश्त चली गई थी। तुम्हें दूर भेज दिया गया।”

     

    आर्या की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    उसने कबीर की ओर देखा।

     

    “और तुम?”

     

    कबीर धीरे-धीरे उसके पास आया।

     

    “मैंने तुम्हें पहली नजर में पहचान लिया था।”

     

    “फिर तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?”

     

    “क्योंकि मुझे डर था कि सच तुम्हें फिर खतरे में डाल देगा।”

     

    आर्या ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “और अगर मुझे कुछ हो जाता?”

     

    कबीर ने उसका हाथ थाम लिया।

     

    “तो इस बार मैं खुद को कभी माफ नहीं करता।”

     

    आर्या कुछ पल चुप रही।

     

    फिर उसने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    “मैं तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगी।”

     

    कबीर की आँखों में पहली बार सुकून दिखाई दिया।

     

    “पक्का?”

     

    आर्या मुस्कुराई।

     

    “हाँ। क्योंकि अजनबी तो तुम उस रात थे…”

     

    वह उसके करीब आई।

     

    “लेकिन अब तुम मेरे हमसफ़र हो।”

     

    बाहर फिर बारिश शुरू हो गई।

     

    मगर इस बार उस बारिश में डर नहीं था।

     

    सिर्फ मोहब्बत थी।

     

    और दो ऐसे दिल थे, जिन्होंने अतीत के अंधेरे को पीछे छोड़कर एक नई कहानी लिखने का फैसला किया था।

     

    कभी-कभी जिंदगी हमें जिस अजनबी से मिलाती है, वही इंसान हमारी पूरी दुनिया बन जाता है।

     

    और आर्या की कहानी में…

     

    वो अजनबी उसका हमसफ़र बन चुका था।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • ऑनलाइन फ्रेंडशिप — एक अधूरी दास्तान

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

     

    कभी-कभी ज़िंदगी हमें कुछ ऐसे लोगों से मिलाती है, जिनसे मिलने की हमने कभी कोई दुआ तक नहीं की होती। वे अचानक हमारी दुनिया में आते हैं, धीरे-धीरे हमारी आदत बन जाते हैं और फिर एक दिन… उसी खामोशी में खो जाते हैं, जहाँ से उन्हें ढूँढना भी मुमकिन नहीं होता।

     

    मेरी कहानी भी कुछ ऐसी ही है।

    यह कहानी किसी कॉलेज की कैंटीन से शुरू नहीं हुई थी, न किसी सफ़र में हुई मुलाकात से और न ही किसी जान-पहचान वाले के ज़रिए। मेरी कहानी शुरू हुई थी एक ऐसे प्लेटफ़ॉर्म से, जहाँ लोग अपनी भावनाओं को शब्दों में ढालते थे।

     

    मैं एक लेखिका हूँ।

     

    मुझे लिखना हमेशा से पसंद था। अपने मन की बातें कागज़ पर उतार देना, अपनी खामोशियों को शब्द दे देना और कभी-कभी अपनी ही लिखी हुई पंक्तियों में खुद को ढूँढ लेना… यही मेरी दुनिया थी।

     

    उसी दुनिया में एक दिन मेरी नज़र एक ऐसे शख्स की लिखी हुई रचना पर पड़ी, जो मेरी ही तरह लिखता था। उसकी बातों में भी वही एहसास था, वही गहराई थी और शायद वही अकेलापन भी, जिसे मैं अपनी लिखाई में अक्सर छुपा दिया करती थी।

     

    मैंने उसकी कुछ रचनाएँ पढ़ीं।

     

    फिर कुछ और पढ़ीं।

     

    और पता नहीं कब उसकी लिखाई मुझे अच्छी लगने लगी।

     

    लेकिन उस वक्त कहाँ पता था कि एक लेखक की लिखाई पसंद आना, एक दिन उसी लेखक को अपनी ज़िंदगी का इतना अहम हिस्सा बना देगा।

     

    एक दिन अचानक उसका संदेश मेरे इनबॉक्स में आया।

     

    संदेश बहुत साधारण था।

     

    शायद किसी बात को लेकर उसने मुझसे कुछ पूछा था।

     

    मैंने भी सामान्य-सा जवाब दे दिया।

     

    बस… यहीं से हमारी कहानी शुरू हुई।

     

    शुरुआत में हमारी बातें सिर्फ़ लिखने-पढ़ने तक सीमित थीं। कौन-सी रचना अच्छी लगी, क्या लिखना चाहिए, किस एहसास को किस तरह शब्द देना चाहिए… बातें छोटी थीं, मगर धीरे-धीरे उन छोटी बातों ने हमारे बीच एक बड़ा रिश्ता बना दिया।

     

    हम दोनों को शायद पता ही नहीं चला कि कब “आप” से “तुम” हो गया।

     

    कब औपचारिक बातों की जगह बेवजह की बातें होने लगीं।

     

    कब सुबह की शुरुआत एक-दूसरे के संदेश से होने लगी और रात तब तक अधूरी लगने लगी, जब तक बात न हो जाए।

     

    वह सिर्फ़ मेरी दोस्त नहीं रही थी।

     

    वह मेरी आदत बन चुकी थी।

     

    मेरे दिन का एक ऐसा हिस्सा, जिसके बिना दिन पूरा नहीं लगता था।

     

    अगर किसी दिन बात न हो तो मन बार-बार मोबाइल उठाता।

     

    “शायद उसका मैसेज आया हो…”

     

    फिर स्क्रीन देखती और खाली इनबॉक्स देखकर खुद से कहती—“शायद व्यस्त होगी।”

     

    और कुछ देर बाद फिर मोबाइल देखती।

     

    हमारी दोस्ती इतनी गहरी हो गई थी कि एक दिन बिना बात किए रहना मुश्किल लगता था।

     

    हम अपनी खुशियाँ बाँटते थे।

     

    अपनी परेशानियाँ बाँटते थे।

     

    कभी वह उदास होती तो मैं उसे हँसाने की कोशिश करती और कभी मेरा मन भारी होता तो वह बिना पूछे समझ जाती कि कुछ ठीक नहीं है।

     

    अजीब बात थी…

     

    हम एक-दूसरे से कभी आमने-सामने नहीं मिले थे, फिर भी वह मुझे उन लोगों से ज्यादा समझती थी, जो मेरे आसपास रहते थे।

     

    कभी-कभी मैं सोचती थी कि आखिर एक ऑनलाइन मुलाकात इतनी सच्ची कैसे हो सकती है?

     

    फिर खुद ही जवाब मिलता—

     

    रिश्ते दूरी से नहीं, एहसास से करीब होते हैं।

     

    हमारी दोस्ती में कोई स्वार्थ नहीं था।

     

    बस एक-दूसरे का साथ था।

     

    एक-दूसरे की बातें सुनने की चाह थी।

     

    और शायद यही वजह थी कि धीरे-धीरे वह मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा बन गई।

     

    लेकिन हर खूबसूरत कहानी के हिस्से में खुशियाँ हमेशा नहीं रहतीं।

     

    एक दिन मेरी ज़िंदगी में ऐसा मोड़ आया, जिसके बारे में मैंने कभी सोचा भी नहीं था।

     

    मेरे परिवार को हमारी दोस्ती के बारे में पता चल गया।

     

    और फिर सवाल मेरी दोस्ती का नहीं, परिवार की सोच का बन गया।

     

    मेरे घर में यह बात स्वीकार नहीं थी कि मैं किसी लड़की से इस तरह बात करूँ, उससे इतनी गहरी दोस्ती रखूँ और उसके साथ अपना इतना समय बाँटूँ।

     

    मुझे समझाया गया।

     

    रोका गया।

     

    और आखिरकार मुझसे कहा गया कि मुझे उससे बात करना बंद करना होगा।

     

    मैंने बहुत कुछ कहना चाहा।

     

    बहुत कुछ समझाना चाहा।

     

    मैं कहना चाहती थी कि वह सिर्फ़ एक ऑनलाइन दोस्त है।

     

    कि इस रिश्ते में कुछ गलत नहीं है।

     

    कि उसने कभी मेरा बुरा नहीं चाहा।

     

    कि वह मेरे लिए बहुत खास है।

     

    लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिनके सामने हमारी आवाज़ बहुत छोटी पड़ जाती है।

     

    मैं चाहकर भी उसे सब कुछ नहीं बता पाई।

     

    सबसे ज्यादा दर्द इस बात का था कि वह शायद मेरा इंतज़ार कर रही होगी।

     

    शायद उसे लग रहा होगा कि मैं अचानक क्यों बदल गई?

     

    कल तक जो इंसान घंटों बातें करता था, आज उसके पास दो शब्द बोलने का वक्त क्यों नहीं?

     

    वह शायद मेरे संदेश का इंतज़ार करती रही होगी।

     

    शायद बार-बार अपना इनबॉक्स खोलती होगी।

     

    शायद उसने सोचा होगा कि मुझसे कोई गलती हो गई।

     

    और मैं…

     

    मैं चाहकर भी उसे सच नहीं बता पा रही थी।

     

    कितनी अजीब मजबूरी थी।

     

    मैं उससे बात करना चाहती थी, लेकिन कर नहीं सकती थी।

     

    मैं उसे कारण बताना चाहती थी, लेकिन बता नहीं सकती थी।

     

    मैं उसे यह कहना चाहती थी कि—

     

    “मैं तुमसे दूर अपनी मर्ज़ी से नहीं जा रही हूँ।”

     

    लेकिन मेरे होंठों तक ये शब्द कभी पहुँच ही नहीं पाए।

     

    दिन बीतते गए।

     

    फिर हफ्ते।

     

    और धीरे-धीरे हमारी बातचीत पूरी तरह बंद हो गई।

     

    लेकिन एक चीज़ बंद नहीं हुई—

     

    मेरी यादें।

     

    आज भी कभी-कभी कोई खूबसूरत बात पढ़ती हूँ तो उसकी याद आ जाती है।

     

    किसी की लिखी हुई कोई पंक्ति दिल को छू जाए तो लगता है, जैसे वह सामने बैठी हो और कह रही हो—

     

    “देखो, यह पंक्ति कितनी अच्छी है।”

     

    कभी मोबाइल हाथ में लेकर पुरानी बातचीत देखने का मन करता है।

     

    पुराने संदेश पढ़ती हूँ।

     

    कुछ शब्दों पर मुस्कुराती हूँ।

     

    कुछ बातों पर आँखें नम हो जाती हैं।

     

    और फिर खुद से एक ही सवाल करती हूँ—

     

    “क्या उसे कभी पता चलेगा कि मैं उससे दूर क्यों हुई थी?”

     

    शायद नहीं।

     

    शायद वह आज भी मुझे गलत समझती होगी।

     

    शायद उसे लगता होगा कि मैंने उसे भुला दिया।

     

    लेकिन सच यह है कि कुछ लोगों को भुलाया नहीं जाता।

     

    वे बस हमारी ज़िंदगी से दूर हो जाते हैं।

     

    उनकी जगह कोई और नहीं लेता।

     

    वे हमारे साथ नहीं होते, फिर भी हमारी यादों में हमेशा रहते हैं।

     

    आज मेरे पास उससे बात करने का कोई रास्ता नहीं है।

     

    मेरे पास उसके साथ बिताए हुए नए पल नहीं हैं।

     

    मेरे पास उसके संदेशों का इंतज़ार नहीं है।

     

    मेरे पास रोज़ की वो बातें नहीं हैं, जिनके बिना कभी दिन पूरा नहीं होता था।

     

    मेरे पास अगर कुछ है…

     

    तो बस उसकी यादें हैं।

     

    कुछ अधूरी बातें।

     

    कुछ पुराने संदेश।

     

    कुछ मुस्कुराहटें।

     

    और एक ऐसा रिश्ता, जिसका अंत कभी हमने तय ही नहीं किया था।

     

    कभी-कभी सोचती हूँ, काश उस दिन मैं उसे सब बता पाती।

     

    काश मैं बस इतना कह पाती—

     

    “मुझसे नाराज़ मत होना… मैं तुम्हें छोड़ नहीं रही, बस हालात मुझे तुमसे दूर कर रहे हैं।”

     

    शायद वह समझ जाती।

     

    शायद नहीं भी समझती।

     

    लेकिन कम से कम मेरे दिल पर यह बोझ तो नहीं रहता कि मैंने उसे बिना वजह छोड़ दिया।

     

    अब जब कभी मैं कुछ लिखती हूँ, तो मेरी हर कहानी में कहीं न कहीं उसका ज़िक्र आ ही जाता है।

     

    नाम नहीं लिखती…

     

    क्योंकि कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते।

     

    बस एहसास होते हैं।

     

    और वह एहसास आज भी मेरे भीतर ज़िंदा है।

     

    लोग अक्सर कहते हैं कि ऑनलाइन बने रिश्ते ज्यादा दिनों तक नहीं चलते।

     

    मैं उनसे बस इतना कहना चाहती हूँ—

     

    रिश्ता ऑनलाइन था, लेकिन एहसास बिल्कुल असली थे।

     

    दूरी ऑनलाइन थी, मगर अपनापन बिल्कुल सच्चा था।

     

    हम कभी मिले नहीं थे, फिर भी उसने मेरे दिल में एक ऐसी जगह बना ली, जहाँ आज भी कोई दूसरा नहीं पहुँच पाया।

     

    शायद हमारी कहानी अधूरी है।

     

    शायद हमारी दोस्ती का आखिरी पन्ना बहुत जल्दी बंद हो गया।

     

    लेकिन हर अधूरी कहानी बेकार नहीं होती।

     

    कुछ अधूरी कहानियाँ हमें उम्र भर याद रहती हैं।

     

    और मेरी कहानी भी उन्हीं में से एक है।

     

    आज वह मेरे साथ नहीं है।

     

    हमारी बातें नहीं होतीं।

     

    एक-दूसरे की खबर नहीं मिलती।

     

    लेकिन जब कभी कोई पूछता है—

     

    “क्या तुम्हारी ज़िंदगी में कभी कोई ऐसा इंसान आया था, जिसे तुमने खोना नहीं चाहा?”

     

    तो मेरे पास उस सवाल का जवाब आज भी है।

     

    हाँ…

     

    एक दोस्त थी।

     

    ऑनलाइन मिली थी।

     

    मेरी तरह लिखती थी।

     

    मेरी बातों को समझती थी।

     

    मेरी खामोशियों को पढ़ लेती थी।

     

    और फिर एक दिन हालात ने उसे मुझसे छीन लिया।

     

    मैं उसे रोक नहीं पाई।

     

    उसे अपना सच बता नहीं पाई।

     

    लेकिन शायद वह यह कभी जान पाए…

     

    कि मैंने उसे भुलाया नहीं था।

     

    मैंने बस उसे अपनी यादों में रख लिया था।

     

    और कुछ लोग ज़िंदगी से चले जाने के बाद भी कहाँ जाते हैं?

     

    वे हमारे अंदर कहीं बस जाते हैं।

     

    वह भी आज मेरी ज़िंदगी में नहीं है…

     

    मगर मेरी हर उस कहानी में है,

     

    जिसे लिखते हुए मेरी आँखें नम हो जाती हैं।

     

    क्योंकि मेरे पास अब उससे जुड़ी कोई नई बात नहीं है…

     

    बस पुरानी यादें हैं।

     

    और शायद यही हमारी दोस्ती की सबसे खूबसूरत बात है—

     

    हमारी कहानी खत्म हो गई,

     

    लेकिन मेरी यादों में…

     

    हमारी दोस्ती आज भी जारी है।

     

     

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 🐦 नन्ही चिड़िया और बारिश की बूँद 🌧️

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

     

     

    एक घने जंगल में चिंकी नाम की एक नन्ही चिड़िया रहती थी। वह बहुत प्यारी और चंचल थी, लेकिन उसे अपनी छोटी-सी ताकत पर बिल्कुल भरोसा नहीं था।

     

    एक दिन जंगल में बहुत तेज़ बारिश हुई। बारिश इतनी ज़ोरदार थी कि पेड़ों की डालियाँ हिलने लगीं। चिंकी डरकर अपने घोंसले में छिप गई।

     

    बारिश रुकने के बाद उसने देखा कि एक छोटी-सी चींटी पानी की धारा में फँस गई है।

     

    चींटी चिल्लाई,

    “बचाओ! कोई मेरी मदद करो!”

     

    चिंकी ने सोचा,

    “मैं तो इतनी छोटी हूँ। मैं इसे कैसे बचा सकती हूँ?”

     

    फिर उसने हिम्मत जुटाई। उसने अपनी चोंच से एक छोटा-सा पत्ता उठाया और उसे चींटी के पास पानी में डाल दिया।

     

    चींटी किसी तरह उस पत्ते पर चढ़ गई और बहते-बहते किनारे तक पहुँच गई।

     

    चींटी ने मुस्कुराकर कहा,

    “धन्यवाद चिंकी! तुमने मेरी जान बचा ली।”

     

    चिंकी बहुत खुश हुई। उसने आसमान की ओर देखा और मन ही मन कहा,

    “मैं छोटी जरूर हूँ, लेकिन किसी के काम तो आ सकती हूँ!”

     

    कुछ दिनों बाद जंगल में एक शिकारी आया। उसने चिंकी को पकड़ने के लिए जाल बिछाया। चिंकी जैसे ही जाल के पास पहुँची, चींटी ने उसे देख लिया।

     

    चींटी तुरंत अपने साथियों को बुलाकर आई। सभी चींटियों ने मिलकर शिकारी के पैरों पर काटना शुरू कर दिया। शिकारी घबरा गया और वहाँ से भाग गया।

     

    चिंकी की आँखों में खुशी के आँसू आ गए।

     

    वह बोली,

    “आज समझ आया कि छोटी-सी मदद भी कभी बेकार नहीं जाती।”

     

    चींटी मुस्कुराई और बोली,

    “और सच्ची दोस्ती में कोई छोटा या बड़ा नहीं होता।”

     

     सीख:

     

    हमें कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि हम छोटे हैं या हमारी मदद छोटी है। सच्चे मन से की गई छोटी-सी मदद भी किसी के लिए बहुत बड़ी बन सकती है। 

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • जिसे चाहा था अपनी जान से भी ज़्यादा

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    जिसे चाहा था अपनी जान से भी ज़्यादा,

    वही आज अनजान सा लगता है,

    जिसके बिना एक पल भी मुश्किल था,

    आज उसके बिना जीना आसान सा लगता है।

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  • हमने तो मोहब्बत में अपना सब कुछ हार दिया

    हमने तो मोहब्बत में अपना सब कुछ हार दिया

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    हमने तो मोहब्बत में अपना सब कुछ हार दिया,

    उसने बस मुस्कुराकर हमें किनारे कर दिया,

    जिसे समझा था अपनी ज़िंदगी की आख़िरी मंज़िल,

    उसने हमें रास्ते में ही छोड़ दिया।

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    Alka Singh

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  • तुझे भुलाने में पूरी उम्र लग गई

    तुझे भुलाने में पूरी उम्र लग गई

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    तेरे बाद किसी से दिल लगाने की हिम्मत नहीं हुई,

    टूटे हुए दिल को फिर सजाने की हिम्मत नहीं हुई,

    तूने तो पल भर में भुला दिया हमें,

    और हमें तुझे भुलाने में पूरी उम्र लग गई।

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    Alka Singh

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  • तुमसे बिछड़कर

    तुमसे बिछड़कर

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    दर्द इतना है कि आँखें भी नम नहीं होतीं,

    यादें इतनी हैं कि रातें कम नहीं होतीं,

    तुमसे बिछड़कर समझ आया ये इश्क़,

    हर किसी के नसीब में मोहब्बत पूरी नहीं होती।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇

    चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं

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