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  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 31

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 31

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 31 : पुराने अस्पताल का बंद कमरा

     

    रात के करीब ग्यारह बज चुके थे।

     

    पुराने सिटी अस्पताल की इमारत अंधेरे में किसी डरावने खंडहर जैसी दिखाई दे रही थी। जगह-जगह टूटी खिड़कियां, दीवारों पर उखड़ा हुआ प्लास्टर और चारों तरफ फैली खामोशी उस रात को और भी भयावह बना रही थी।

     

    आरव अस्पताल के मुख्य गेट के सामने खड़ा था।

     

    उसके हाथ में वही फोन था, जिसमें कुछ देर पहले उसके माता-पिता की तस्वीर आई थी।

     

    माधवी और शेखर दोनों कुर्सियों से बंधे हुए थे।

     

    आरव के अंदर गुस्सा उबल रहा था।

     

    आरोही उसके पास आकर खड़ी हुई।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां?”

     

    “तुम अंदर अकेले नहीं जाओगे।”

     

    आरव ने तुरंत कहा,

     

    “लेकिन उसने साफ कहा है कि मुझे अकेले आना है।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “और तुम उसकी बात मानोगे?”

     

    “अगर मां-पापा की जान खतरे में हो तो हां।”

     

    आरोही ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम्हें अगर कुछ हो गया तो?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा,

     

    “तुम्हें पता है, जब से तुम मेरी जिंदगी में आई हो… मुझे पहली बार किसी को खोने का डर लगा है।”

     

    आरोही की आंखें नम हो गईं।

     

    “तो मुझे छोड़कर मत जाना।”

     

    आरव ने उसके माथे पर हल्का सा हाथ रखा।

     

    “मैं वापस आऊंगा।”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “वादा?”

     

    “वादा।”

     

    पीछे खड़ा अमन उन्हें देख रहा था।

     

    उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    “तुम दोनों को देखकर लगता है कि इस दुनिया में अभी भी कुछ अच्छा बचा है।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “और तुम?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “मैं भी कोशिश करूंगा कि कुछ अच्छा बचा रहे।”

     

    तीनों धीरे-धीरे अस्पताल के अंदर दाखिल हुए।

     

    रुद्र बाहर ही रुक गया।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम अंदर नहीं आ रहे?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “मुझे बाहर से निगरानी करनी है।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि सम्राट सिर्फ अंदर नहीं है।”

     

    रुद्र ने चारों तरफ देखा।

     

    “उसके लोग पूरे इलाके में हैं।”

     

    अमन ने पूछा,

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “क्योंकि मैं उनमें से कई को पहचानता हूं।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “सावधान रहना।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “तुम भी।”

     

    आरव, आरोही और अमन अंदर चले गए।

     

    अंदर जाते ही अमन रुक गया।

     

    उसकी आंखों के सामने जैसे धुंधली-सी तस्वीरें घूमने लगीं।

     

    एक महिला…

     

    गोद में बच्चा…

     

    जलता हुआ कमरा…

     

    लोगों की चीखें…

     

    और एक आवाज—

     

    “अमन को लेकर भागो!”

     

    अमन ने अपना सिर पकड़ लिया।

     

    आरव तुरंत उसके पास आया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “मुझे… कुछ याद आया।”

     

    “क्या?”

     

    “मैं यहां पहले भी आया हूं।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “लेकिन तुम तो बहुत छोटे थे।”

     

    अमन ने दीवार को छूते हुए कहा,

     

    “कुछ जगहें यादों को संभालकर रखती हैं।”

     

    फिर उसने धीरे से कहा,

     

    “मेरी मां यहीं मरी थी।”

     

    आरव ने उसका कंधा पकड़ लिया।

     

    “इस बार तुम अकेले नहीं हो।”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां।”

     

     

    वे अस्पताल की पहली मंजिल पर पहुंचे।

     

    वहां पुराने मरीजों के रिकॉर्ड वाले कमरे थे।

     

    अमन ने एक दरवाजा देखा।

     

    उस पर लिखा था—

     

    RECORD ROOM

     

    उसने दरवाजा खोला।

     

    अंदर सैकड़ों पुरानी फाइलें थीं।

     

    आरोही ने कहा,

     

    “हमें सिया की फाइल ढूंढनी होगी।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “इतनी सारी फाइलों में कैसे?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “मुझे तारीख याद है।”

     

    “कौन सी?”

     

    “14 अगस्त।”

     

    आरव ने फाइलें देखना शुरू किया।

     

    कुछ देर बाद आरोही को एक फाइल मिली।

     

    उस पर लिखा था—

     

    Patient: Siya

     

    अमन के हाथ कांपने लगे।

     

    “मां…”

     

    उसने फाइल खोली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    स्थिति: गंभीर

     

    दूसरे पन्ने पर—

     

    बच्चा सुरक्षित।

     

    तीसरे पन्ने पर एक लाल मुहर थी—

     

    DEAD

     

    अमन की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “ये सब झूठ था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “मेरी मां की मौत की रिपोर्ट।”

     

    “क्यों?”

     

    अमन ने फाइल का आखिरी पन्ना दिखाया।

     

    उस पर डॉक्टर के हस्ताक्षर थे।

     

    लेकिन उसके नीचे लिखा था—

     

    “मृत्यु की पुष्टि नहीं हुई।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “मतलब…”

     

    अमन ने फाइल बंद कर दी।

     

    “मेरी मां शायद उस रात मरी ही नहीं थी।”

    तभी कमरे के पीछे से हल्की आवाज आई।

     

    ठक… ठक…

     

    तीनों चौंक गए।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “ये आवाज कहां से आई?”

     

    अमन ने दीवार की तरफ देखा।

     

    “वहां।”

     

    आरव ने दीवार पर हाथ मारा।

     

    आवाज अंदर से आ रही थी।

     

    “यहां कोई कमरा है।”

     

    उन्होंने दीवार के पास रखी पुरानी अलमारी हटाई।

     

    पीछे एक छोटा दरवाजा दिखाई दिया।

     

    दरवाजे पर कोई ताला नहीं था।

     

    आरव ने उसे खोला।

     

    अंदर पूरी तरह अंधेरा था।

     

    अमन ने टॉर्च जलाई।

     

    कमरे के बीच में एक पुरानी कुर्सी थी।

     

    और कुर्सी पर…

     

    एक टेप रिकॉर्डर रखा था।

     

    अमन धीरे-धीरे उसके पास गया।

     

    उसने रिकॉर्डर उठाया।

     

    उस पर एक कागज चिपका था—

     

    “मेरे बेटे अमन के लिए।”

     

    अमन की सांस रुक गई।

     

    “मां…”

     

    उसने रिकॉर्डर चलाया।

     

    कुछ सेकंड तक सिर्फ शोर आया।

     

    फिर एक महिला की कांपती आवाज सुनाई दी।

     

    “अमन… अगर तुम कभी ये आवाज सुन रहे हो, तो इसका मतलब है कि मैं तुम्हारे पास नहीं हूं।”

     

    अमन की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    आरव और आरोही भी चुपचाप सुनने लगे।

     

    सिया की आवाज आगे आई—

     

    “मैं चाहती हूं कि तुम नफरत में अपनी जिंदगी बर्बाद मत करना।”

     

    अमन ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “मां…”

     

    रिकॉर्डिंग में सिया कह रही थी—

     

    “तुम्हें शायद बताया जाएगा कि तुम्हारी मां की मौत के लिए आरव का परिवार जिम्मेदार था।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    अमन ने रिकॉर्डर कसकर पकड़ लिया।

     

    “लेकिन ये सच नहीं है।”

     

    अमन की सांस तेज हो गई।

     

    “तो फिर कौन?”

     

    रिकॉर्डिंग में सिया की आवाज आई—

     

    “जिसने मुझे सबसे ज्यादा धोखा दिया… वो वही था जिस पर मैंने सबसे ज्यादा भरोसा किया।”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “कौन?”

     

    सिया आगे बोली—

     

    “उसका नाम है…”

     

    रिकॉर्डिंग अचानक बंद हो गई।

     

    अमन ने रिकॉर्डर को थपथपाया।

     

    “नहीं!”

     

    आरव ने कहा,

     

    “शायद टेप खराब है।”

     

    अमन ने उसे दोबारा चलाया।

     

    कुछ नहीं हुआ।

     

    तभी कमरे के कोने में एक छोटी लाल बत्ती जल उठी।

     

    आरोही ने कहा,

     

    “आरव…”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या?”

     

    “हमें यहां से निकलना चाहिए।”

     

    अमन ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि ये कमरा हमें रिकॉर्डिंग सुनाने के लिए नहीं खोला गया था।”

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    “तो?”

     

    आरोही ने ऊपर लगे कैमरे की तरफ इशारा किया।

     

    “हमें देखने के लिए खोला गया था।”

     

    अचानक कमरे की लाइट जल गई।

     

    दीवार पर लगा स्क्रीन चालू हुआ।

     

    स्क्रीन पर एक आदमी दिखाई दिया।

     

    काला सूट।

     

    चेहरे पर हल्की मुस्कान।

     

    आरव ने कहा,

     

    “सम्राट।”

     

    आदमी मुस्कुराया।

     

    “आखिर तुम यहां पहुंच ही गए।”

     

    अमन गुस्से में बोला,

     

    “मेरी मां की रिकॉर्डिंग पूरी क्यों नहीं होने दी?”

     

    सम्राट ने कहा,

     

    “क्योंकि कुछ सच समय से पहले सुनना खतरनाक होता है।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “सामने आ!”

     

    “जल्द।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “मेरे माता-पिता कहां हैं?”

     

    सम्राट ने स्क्रीन पर दूसरी तस्वीर दिखाई।

     

    माधवी और शेखर अभी भी बंधे हुए थे।

     

    लेकिन इस बार उनके पास एक और आदमी खड़ा था।

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “रुद्र?”

     

    अमन भी चौंक गया।

     

    सम्राट हंसा।

     

    “तुम्हें लगता है तुम्हारा रक्षक तुम्हारे साथ है?”

     

    आरव ने तुरंत फोन निकाला और रुद्र को कॉल किया।

     

    फोन नहीं उठा।

     

    आरोही ने कहा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “रुद्र फोन नहीं उठा रहा।”

     

    स्क्रीन पर सम्राट बोला—

     

    “क्योंकि रुद्र अब मेरे साथ है।”

     

    अमन ने गुस्से में कहा,

     

    “झूठ!”

     

    सम्राट मुस्कुराया।

     

    “तो खुद जाकर देख लो।”

     

    आरव, आरोही और अमन तेजी से दूसरी मंजिल की तरफ दौड़े।

     

    वहां एक कमरे का दरवाजा खुला था।

     

    अंदर कोई नहीं था।

     

    लेकिन फर्श पर खून के निशान थे।

     

    आरोही ने घबराकर कहा,

     

    “आरव…”

     

    आरव नीचे झुका।

     

    उसने खून को छुआ।

     

    “ये ताजा है।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “रुद्र का?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “पता नहीं।”

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “रुद्र का नहीं।”

     

    तीनों पलटे।

     

    दरवाजे पर एक बूढ़ा डॉक्टर खड़ा था।

     

    उसके हाथ में पुरानी फाइल थी।

     

    अमन ने पूछा,

     

    “आप कौन हैं?”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “मैं वही डॉक्टर हूं जिसने तुम्हें जन्मते देखा था।”

     

    अमन की आंखें फैल गईं।

     

    “आप…”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “हां।”

     

    आरव आगे बढ़ा।

     

    “हमें सच्चाई चाहिए।”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “सच्चाई सुनने के लिए तुम्हें तैयार रहना होगा।”

     

    “मैं तैयार हूं।”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “तुम दोनों के जन्म की रात अस्पताल में आग नहीं लगी थी।”

     

    अमन ने पूछा,

     

    “तो?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “आग लगाई गई थी।”

     

    “किसने?”

     

    डॉक्टर ने आरव और अमन दोनों को देखा।

     

    फिर कहा—

     

    “तुम्हारे जन्म से पहले ही तुम्हें मारने का आदेश दिया गया था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किसने?”

     

    डॉक्टर ने जवाब दिया—

     

    “जिसने आदेश दिया था, उसका नाम रिकॉर्ड में है।”

     

    उसने फाइल आरव को दी।

     

    आरव ने फाइल खोली।

     

    पहले पन्ने पर कई नाम थे।

     

    लेकिन आखिरी नाम देखकर उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    उसने फाइल हाथ से गिरा दी।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव कुछ नहीं बोला।

     

    आरोही ने फाइल उठाई।

     

    उसकी आंखें भी फैल गईं।

     

    क्योंकि उस फाइल में लिखा था—

     

    आदेश देने वाला: शेखर।

     

    अमन ने फाइल छीन ली।

     

    “नहीं!”

     

    डॉक्टर चुपचाप खड़ा रहा।

     

    आरव की आंखों में आंसू थे।

     

    “पापा ऐसा नहीं कर सकते।”

     

    तभी डॉक्टर ने कहा—

     

    “कागज पर नाम शेखर का है।”

     

    “लेकिन असली आदेश…”

     

    वह रुक गया।

     

    “किसका था?”

     

    डॉक्टर ने धीमे से कहा—

     

    “ये जानने के लिए तुम्हें तहखाने में जाना होगा।”

     

    अमन ने पूछा,

     

    “वहां क्या है?”

     

    डॉक्टर ने दरवाजे की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “सिया की आखिरी गवाही।”

     

    उसी वक्त ऊपर से जोरदार धमाका हुआ।

     

    धड़ाम!

     

    पूरी इमारत हिल गई।

     

    आरव ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।

     

    डॉक्टर चिल्लाया—

     

    “जल्दी करो! सम्राट ने अस्पताल में आग लगा दी है!”

     

    धुआं पूरे गलियारे में फैलने लगा।

     

    अमन ने कहा—

     

    “तहखाना कहां है?”

     

    डॉक्टर ने फर्श की तरफ इशारा किया।

     

    “यहीं नीचे।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “लेकिन रास्ता?”

     

    डॉक्टर ने फर्श पर एक छिपा हुआ लीवर दबाया।

     

    फर्श का एक हिस्सा धीरे-धीरे खुलने लगा।

     

    नीचे अंधेरी सीढ़ियां दिखाई दीं।

     

    और उसी समय…

     

    अंधेरे तहखाने से एक महिला की आवाज आई—

     

    “अमन…”

     

    अमन वहीं जम गया।

     

    उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “ये…”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    अमन ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “ये मेरी मां की आवाज है।”

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 30

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 30

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एपिसोड – 30 : दो मिनट का फैसला

     

    पुराने रेलवे स्टेशन की अंधेरी सुरंग में लगी लाल बत्ती लगातार जल-बुझ रही थी।

     

    01:59…

     

    01:58…

     

    01:57…

     

    आरव की नजर घड़ी पर टिक गई।

     

    आरोही का चेहरा डर से सफेद पड़ चुका था।

     

    अमन दीवार के पास खड़ा होकर बम के तारों को ध्यान से देख रहा था।

     

    आरव ने बेचैनी से पूछा,

     

    “अमन, कुछ करो!”

     

    अमन ने बिना उसकी तरफ देखे कहा,

     

    “चिल्लाने से बम बंद नहीं होगा।”

     

    “तो क्या करना होगा?”

     

    “सोचना होगा।”

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    “कितने बम हैं?”

     

    “कम से कम चार।”

     

    “और इन्हें बंद करने का तरीका?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “एक मुख्य कंट्रोल बॉक्स होगा। अगर वो बंद हो गया तो बाकी बम भी निष्क्रिय हो जाएंगे।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कंट्रोल बॉक्स कहां है?”

     

    अमन ने सुरंग की दीवार पर नजर दौड़ाई।

     

    “यहीं कहीं।”

     

    01:32…

     

    आरव ने टॉर्च उठाई।

     

    “सब अलग-अलग जगह देखो।”

     

    आरोही एक तरफ चली गई।

     

    अमन दूसरी तरफ।

     

    आरव दीवारों को ध्यान से देखने लगा।

     

    तभी उसे एक छोटी-सी लोहे की प्लेट दिखाई दी।

     

    उस पर लिखा था—

     

    A-17

     

    आरव चौंक गया।

     

    “अमन!”

     

    अमन दौड़कर आया।

     

    “क्या मिला?”

     

    आरव ने प्लेट दिखाई।

     

    अमन ने कहा,

     

    “यही है।”

     

    उसने प्लेट खोलने की कोशिश की।

     

    लेकिन वह लॉक थी।

     

    आरव ने जेब से शेखर की दी हुई चाबी निकाली।

     

    “शायद ये काम आए।”

     

    चाबी ताले में लगी।

     

    क्लिक!

     

    प्लेट खुल गई।

     

    अंदर तारों का जाल था।

     

    लाल, पीले और काले तार…

     

    और बीच में एक डिजिटल टाइमर।

     

    01:05…

     

    आरोही घबराकर बोली,

     

    “अब सिर्फ एक मिनट!”

     

    अमन ने तारों को देखा।

     

    “कोई भी तार गलत काटा तो सब खत्म।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन सा काटना है?”

     

    अमन चुप रहा।

     

    फिर उसने एक तार पर उंगली रखी।

     

    “ये।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम्हें यकीन है?”

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “मुझे पक्का यकीन नहीं है।”

     

    “तो तुम काटोगे कैसे?”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “कभी-कभी जिंदगी में सौ प्रतिशत यकीन का इंतजार करने का समय नहीं होता।”

     

    00:42…

     

    अमन ने चाकू निकाला।

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “अगर कुछ हुआ तो?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “कुछ नहीं होगा।”

     

    “तुम इतने भरोसे से कैसे कह सकते हो?”

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखकर कहा,

     

    “क्योंकि अभी मुझे तुम्हारे साथ बहुत लंबी जिंदगी जीनी है।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “आरव…”

     

    “कुछ नहीं होगा।”

     

    अमन ने दोनों को देखा।

     

    “तुम दोनों का प्यार देखकर मुझे अपनी मां याद आती है।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “फिर हमें बचा लो।”

     

    अमन ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “कोशिश करता हूं।”

     

    00:30…

     

    अमन ने तार काटने के लिए चाकू आगे बढ़ाया।

     

    लेकिन तभी…

     

    उसका हाथ रुक गया।

     

    “रुको!”

     

    आरव चौंका।

     

    “क्या हुआ?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “ये जाल है।”

     

    “मतलब?”

     

    “ये टाइमर असली नहीं है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “असल बम कहीं और है।”

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “बिल्कुल सही।”

     

    तीनों पलटे।

     

    सुरंग के अंधेरे में एक आदमी खड़ा था।

     

    काले कपड़े।

     

    चेहरे पर मास्क।

     

    हाथ में बंदूक।

     

    आरव ने तुरंत बंदूक उठा ली।

     

    “कौन हो तुम?”

     

    उस आदमी ने मास्क उतार दिया।

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    अमन भी पीछे हट गया।

     

    क्योंकि सामने खड़ा था—

     

    रुद्र।

     

    आरव ने गुस्से में कहा,

     

    “तुम यहां?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “तुम्हें बचाने आया हूं।”

     

    अमन हंस पड़ा।

     

    “तुम्हारे जैसे लोग हमेशा यही कहते हैं।”

     

    रुद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अमन, अगर मैं तुम्हारा दुश्मन होता तो तुम अभी जिंदा नहीं होते।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “फिर ये बम?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “ये बम मैंने नहीं लगाए।”

     

    “किसने?”

     

    “सम्राट ने।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “तो इसे बंद कैसे करेंगे?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “हम नहीं कर सकते।”

     

    आरव चौंका।

     

    “क्या?”

     

    “क्योंकि असली बम स्टेशन में नहीं है।”

     

    रुद्र ने दीवार पर लगी घड़ी की तरफ इशारा किया।

     

    “ये पूरा टाइमर सिर्फ तुम्हें डराने के लिए है।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “तो असली खतरा क्या है?”

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “स्टेशन के नीचे गैस पाइपलाइन है।”

     

    “अगर उसमें धमाका हुआ तो?”

     

    “पूरा इलाका तबाह हो जाएगा।”

     

    अचानक रुद्र के फोन पर कॉल आया।

     

    उसने फोन उठाया।

     

    दूसरी तरफ से सम्राट की आवाज आई—

     

    “रुद्र… तुम फिर मेरे रास्ते में आ गए।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “इस बार तुम्हें रोकूंगा।”

     

    सम्राट हंसा।

     

    “तुम्हें लगता है मैं अकेला हूं?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “तुम कहीं भी छुप जाओ, मैं तुम्हें ढूंढ लूंगा।”

     

    “मुझे ढूंढने की जरूरत नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं तुम्हारे बहुत करीब हूं।”

     

    रुद्र की आंखें सिकुड़ गईं।

     

    “क्या मतलब?”

     

    सम्राट ने कहा—

     

    “तुम्हारे साथ जो लोग खड़े हैं… उनमें से एक मेरा आदमी है।”

     

    कॉल कट गया।

     

    सब एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    आरव ने कहा,

     

    “कौन?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “पता नहीं।”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “लेकिन अब किसी पर भरोसा नहीं कर सकते।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “अगर सिया की रिकॉर्डिंग सच में पुराने अस्पताल में है, तो हमें वहां जाना होगा।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “अभी?”

     

    “हां।”

     

    “और स्टेशन?”

     

    “मैं संभाल लूंगा।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    सब उसकी तरफ देखने लगे।

     

    “मैं भी चलूंगा।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “तुम घायल हो।”

     

    “मेरी मां की आखिरी रिकॉर्डिंग है।”

     

    “तुम्हें आराम करना चाहिए।”

     

    अमन ने बंदूक उठाई।

     

    “मैं अपनी मां के लिए मर भी सकता हूं।”

     

    आरव उसके सामने आ गया।

     

    “मरने की बात बंद करो।”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “ठीक है, भाई।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “अब सही है।”

     

    वे सुरंग से बाहर निकलने ही वाले थे कि अचानक गोली चली।

     

    धांय!

     

    रुद्र ने आरव को नीचे खींच लिया।

     

    गोली दीवार में लगी।

     

    दूसरी गोली चली।

     

    अमन ने तुरंत जवाबी गोली चलाई।

     

    सामने अंधेरे में एक आदमी भागता दिखाई दिया।

     

    रुद्र उसके पीछे दौड़ा।

     

    “रुको!”

     

    वह आदमी सुरंग के दूसरे रास्ते से भाग गया।

     

    रुद्र वापस आया।

     

    उसके हाथ में एक छोटा-सा कार्ड था।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन था?”

     

    “भाग गया।”

     

    “कार्ड पर क्या है?”

     

    रुद्र ने कार्ड आरव को दिया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    BLACK CROWN

     

    और नीचे एक फोटो।

     

    आरव ने फोटो देखते ही सांस रोक ली।

     

    फोटो में…

     

    शेखर और सम्राट एक साथ खड़े थे।

     

    आरोही ने हैरानी से कहा,

     

    “ये कब की तस्वीर है?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “पच्चीस साल पुरानी।”

     

    अमन ने फोटो को घूरते हुए कहा,

     

    “तो मेरे पिता और सम्राट एक साथ काम करते थे?”

     

    आरव ने शेखर की तरफ देखा।

     

    शेखर वहां नहीं थे।

     

    “पापा कहां हैं?”

     

    किसी ने जवाब नहीं दिया।

     

    आरव ने तुरंत फोन निकाला।

     

    शेखर को कॉल किया।

     

    फोन बंद था।

     

    फिर माधवी को कॉल किया।

     

    इस बार भी फोन बंद।

     

    आरव की बेचैनी बढ़ गई।

     

    “कुछ गलत हुआ है।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “हमें तुरंत हवेली लौटना चाहिए।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि सम्राट हमें यही करवाना चाहता है।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “अमन सही कह रहा है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो हम कहां जाएं?”

     

    अमन ने सिया की डायरी निकाली।

     

    उसके आखिरी पन्ने को फिर से देखा।

     

    अचानक उसने डायरी को पलटा।

     

    पीछे के कवर में एक छोटी-सी तस्वीर चिपकी थी।

     

    तस्वीर देखकर अमन की सांस थम गई।

     

    उसमें सिया थी।

     

    उसके साथ एक आदमी खड़ा था।

     

    अमन की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “ये…”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    अमन ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “ये मेरे पिता हैं।”

     

    रुद्र ने तस्वीर देखते ही चेहरा फेर लिया।

     

    आरव ने ध्यान दिया।

     

    “रुद्र… तुम इस आदमी को जानते हो?”

     

    रुद्र चुप रहा।

     

    आरव ने उसका कंधा पकड़ लिया।

     

    “बताओ।”

     

    रुद्र ने धीरे से कहा—

     

    “हां।”

     

    “कौन है?”

     

    रुद्र ने तस्वीर की तरफ देखा।

     

    फिर धीमी आवाज में बोला—

     

    “ये शेखर नहीं हैं।”

     

    अमन की आंखें फैल गईं।

     

    “तो कौन हैं?”

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “ये आदमी… सम्राट का असली नाम है।”

     

    आरव और आरोही दोनों स्तब्ध रह गए।

     

    “क्या?”

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “सम्राट कोई दूसरा इंसान नहीं।”

     

    वह कुछ पल रुका।

     

    फिर बोला—

     

    “सम्राट का असली नाम है… आर्यन।”

     

    अमन के हाथ से तस्वीर गिर गई।

     

    और उसी वक्त आरव के फोन पर एक मैसेज आया।

     

    मैसेज में सिर्फ एक तस्वीर थी।

     

    माधवी और शेखर बंधे हुए थे।

     

    नीचे लिखा था—

     

    “अगर अपने माता-पिता को जिंदा देखना चाहते हो, तो आज रात पुराने सिटी अस्पताल आओ।”

     

    और उसके नीचे…

     

    “अकेले।”

     

    आरव ने फोन कसकर पकड़ लिया।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    उसकी आंखों में गुस्सा और डर दोनों थे।

     

    “मां-पापा को अगवा कर लिया गया है।”

     

    अमन ने तस्वीर देखी।

     

    फिर उसकी नजर आरव पर टिक गई।

     

    “हम जाएंगे।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “लेकिन उसने अकेले आने को कहा है।”

     

    अमन ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “उसे लगता है कि अब भी हम उसके नियमों पर चलेंगे।”

     

    रुद्र ने बंदूक लोड की।

     

    “आज रात पुराने सिटी अस्पताल में सिर्फ सच नहीं मिलेगा।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो क्या मिलेगा?”

     

    रुद्र ने अस्पताल की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “पच्चीस साल पहले शुरू हुई इस कहानी का असली खूनी।”

     

    जारी रहेगा…

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 29

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 29

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 29 : अपने ही पिता के खिलाफ

     

    पुराने रेलवे स्टेशन के बाहर दर्जनों गाड़ियों की हेडलाइट्स एक साथ जल उठीं।

     

    चारों तरफ हथियारबंद लोग खड़े थे।

     

    अंदर खड़े आरव, आरोही और अमन को घेर लिया गया था।

     

    बाहर से आवाज आई—

     

    “आरव! अमन को हमारे हवाले कर दो, वरना दस मिनट में ये पूरा स्टेशन मलबे में बदल जाएगा!”

     

    आरोही ने घबराकर आरव की तरफ देखा।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “डरो मत।”

     

    “लेकिन बाहर इतने लोग हैं।”

     

    “हम निकल जाएंगे।”

     

    अमन जमीन पर बैठा हुआ था। उसके कंधे से अभी भी खून बह रहा था।

     

    उसने धीमे से कहा,

     

    “हम नहीं निकल पाएंगे।”

     

    आरव उसकी तरफ गया।

     

    “क्यों?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “क्योंकि बाहर सिर्फ आदमी नहीं हैं।”

     

    “तो?”

     

    “वहां बम भी हैं।”

     

    आरोही के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “क्या?”

     

    अमन ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    “मुझे इन लोगों का तरीका पता है।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तुम्हें कैसे?”

     

    अमन हल्का सा मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि मैं सालों से इनके बीच रहा हूं।”

     

    आरव ने पलटकर शेखर को देखा।

     

    “पापा…”

     

    शेखर चुप थे।

     

    आरव उनके पास गया।

     

    “आप इन लोगों को जानते हैं?”

     

    शेखर ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    “ये आपके आदमी हैं?”

     

    “हां।”

     

    आरव की आंखों में अविश्वास था।

     

    “तो ये हमें मारने क्यों आए हैं?”

     

    शेखर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    आरव ने गुस्से में कहा,

     

    “मैंने आपसे पूछा!”

     

    शेखर ने धीरे से कहा,

     

    “क्योंकि अब मैं उनके लिए भी खतरा बन चुका हूं।”

     

    आरव कुछ समझ नहीं पाया।

     

    “मतलब?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “जिस संगठन को मैंने सालों पहले खत्म करने की कोशिश की थी… वो आज फिर खड़ा हो चुका है।”

     

    अर्जुन ने हैरानी से पूछा,

     

    “कौन-सा संगठन?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “ब्लैक क्राउन।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “ये क्या है?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “एक ऐसा संगठन जो पैसे, राजनीति और अपराध के बीच काम करता है।”

     

    “और इसका मुखिया?”

     

    शेखर ने विराज की तरफ देखा।

     

    लेकिन विराज वहां नहीं था।

     

    “विराज?”

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “फिर कौन?”

     

    शेखर की आंखों में डर उतर आया।

     

    “जिसका नाम मैंने पच्चीस साल से किसी के सामने नहीं लिया।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “नाम बताइए।”

     

    शेखर ने धीरे से कहा—

     

    “सम्राट।”

     

    अमन ने अचानक सिर उठाया।

     

    “सम्राट?”

     

    शेखर ने उसकी तरफ देखा।

     

    अमन की आंखों में गुस्सा भर गया।

     

    “तो वो अभी भी जिंदा है?”

     

    आरव ने अमन की तरफ देखा।

     

    “तुम उसे जानते हो?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “वही आदमी जिसने मेरी मां की हत्या का आदेश दिया था।”

     

    अमन की मुट्ठियां कस गईं।

     

    “मैंने सालों तक विराज को दोषी समझा।”

     

    “लेकिन असली आदेश सम्राट ने दिया था।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “हां।”

     

    अमन ने पूछा,

     

    “तो आपने मुझे ये पहले क्यों नहीं बताया?”

     

    “क्योंकि तुम बदला लेने के पीछे भागते हुए मर जाते।”

     

    अमन हंस पड़ा।

     

    “और अब?”

     

    “अब तुम्हें सच पता है।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “अब मैं सम्राट को ढूंढूंगा।”

     

    आरव ने उसका कंधा पकड़ लिया।

     

    “पहले तुम्हारा इलाज होगा।”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम सच में मुझे भाई मानते हो?”

     

    आरव ने बिना सोचे कहा,

     

    “हां।”

     

    अमन की आंखें नम हो गईं।

     

    “तो फिर मुझे बचाना।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें मरने नहीं दूंगा।”

     

     

    फिर से बाहर से आवाज आई—

     

    “पांच मिनट बाकी हैं!”

     

    कबीर ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    “हमें कोई रास्ता निकालना होगा।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “पीछे का रास्ता?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “पुरानी सुरंग है।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कहां जाती है?”

     

    “रेलवे यार्ड तक।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “वह रास्ता बंद है।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    “मैं कई बार यहां से भाग चुका हूं।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तो दूसरा रास्ता?”

     

    अमन ने कुछ पल सोचा।

     

    “एक रास्ता है।”

     

    “कहां?”

     

    “पुराने कंट्रोल रूम के नीचे।”

     

    शेखर अचानक बोले,

     

    “नहीं।”

     

    सब उनकी तरफ देखने लगे।

     

    “वह रास्ता इस्तेमाल नहीं कर सकते।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “क्योंकि वहां…”

     

    वह रुक गए।

     

    “क्या?”

     

    “वहां ब्लैक क्राउन का पुराना हथियारघर है।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “मतलब?”

     

    “अगर वहां कोई गोली चली…”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “पूरा स्टेशन उड़ सकता है।”

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    “तो हमें स्टेशन से बाहर नहीं जाना।”

     

    सब उसे देखने लगे।

     

    “हमें उन्हें स्टेशन के अंदर बुलाना होगा।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “तुम पागल हो?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “अगर हम बाहर गए तो वे हमें गोली मार देंगे।”

     

    “और अंदर बुलाए तो?”

     

    “तब उनके बम हमारे नियंत्रण में होंगे।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “लेकिन ये बहुत खतरनाक है।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैं जानता हूं।”

     

    “फिर भी?”

     

    “हां।”

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तो मैं भी साथ हूं।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं तुम्हें खतरे में नहीं डालना चाहता।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “तुम्हें लगता है मैं तुम्हें अकेला छोड़ दूंगी?”

     

    आरव कुछ नहीं बोला।

     

    आरोही ने कहा,

     

    “हमने तय किया था ना… सच कितना भी खतरनाक हो, साथ जानेंगे।”

     

    आरव ने धीरे से मुस्कुराकर कहा,

     

    “ठीक है।”

     

    कबीर ने अपनी बंदूक उठाई।

     

    “मैं बाहर जाऊंगा।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वो मुझे अपना आदमी समझते हैं।”

     

    “और?”

     

    “मैं उन्हें गलत दिशा में भेज सकता हूं।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम्हें खुद को खतरे में डालने की जरूरत नहीं।”

     

    कबीर मुस्कुराया।

     

    “भाई के लिए इतना तो कर सकता हूं।”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम सच में आरव के दोस्त हो?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “भाई से ज्यादा।”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    “तो जाओ।”

     

    कबीर बाहर जाने लगा।

     

    आरव ने पीछे से कहा,

     

    “कबीर!”

     

    कबीर रुका।

     

    “वापस आना।”

     

    कबीर ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “जरूर।”

    कबीर ने स्टेशन का दरवाजा खोला और हाथ ऊपर कर दिए।

     

    “गोली मत चलाना!”

     

    बाहर खड़े लोग उसकी तरफ दौड़े।

     

    एक आदमी ने पूछा,

     

    “बाकी लोग कहां हैं?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “अंदर।”

     

    “आरव?”

     

    “हां।”

     

    “अमन?”

     

    “वो भी।”

     

    “तुम्हें बाहर क्यों भेजा?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “समझौते के लिए।”

     

    वह आदमी हंसा।

     

    “समझौता अब नहीं होगा।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “अगर तुमने स्टेशन उड़ाया तो आरव भी मरेगा और अमन भी।”

     

    “हमें वही चाहिए।”

     

    कबीर चौंका।

     

    “दोनों?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    वह आदमी मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि दोनों जिंदा रहे तो सम्राट की गद्दी खतरे में है।”

     

    कबीर को पहली बार समझ आया—

     

    सम्राट आरव और अमन दोनों से डरता था।

     

    इधर आरव और आरोही पुराने कंट्रोल रूम की तरफ बढ़ रहे थे।

     

    अमन भी उनके साथ था।

     

    शेखर पीछे से चिल्लाए,

     

    “आरव!”

     

    आरव पलटा।

     

    “क्या?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “अगर तुम वहां जा रहे हो तो ये ले जाओ।”

     

    उन्होंने आरव को एक पुरानी चाबी दी।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “ये क्या है?”

     

    “सम्राट के हथियारघर की चाबी।”

     

    आरव ने हैरानी से कहा,

     

    “आपके पास ये कब से है?”

     

    “पच्चीस साल से।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “आपने इसे कभी इस्तेमाल क्यों नहीं किया?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “क्योंकि मुझे डर था कि एक दिन मेरे बच्चों के खिलाफ यही इस्तेमाल होगा।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “अब यही हमारी रक्षा करेगा।”

     

    तीनों सुरंग में उतर गए।

     

    अंधेरा बहुत गहरा था।

     

    आरोही आरव का हाथ पकड़े हुए थी।

     

    अमन आगे चल रहा था।

     

    अचानक उसने हाथ उठाकर सबको रोक दिया।

     

    “रुको।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    अमन ने दीवार पर हाथ रखा।

     

    “यहां कैमरा है।”

     

    कबीर की आवाज वायरलेस पर आई—

     

    “आरव, सुन रहे हो?”

     

    “हां।”

     

    “मैंने बाहर वालों को कुछ देर रोक लिया है।”

     

    “कितना समय?”

     

    “लगभग पांच मिनट।”

     

    “बहुत है।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “क्या?”

     

    “हमारे पास सिर्फ दो मिनट हैं।”

     

    “क्यों?”

     

    अमन ने दीवार के नीचे लगा लाल बल्ब दिखाया।

     

    “ये बम का संकेत है।”

     

    आरोही डर गई।

     

    “कितने बम हैं?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “पूरी सुरंग में।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “उन्हें निष्क्रिय कैसे करेंगे?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तो?”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “लेकिन मेरी मां जानती थी।”

     

     

    अमन ने अपनी जेब से एक छोटा कागज निकाला।

     

    “ये मुझे आज से दस साल पहले मिला था।”

     

    आरव ने उसे लिया।

     

    उस पर एक नक्शा बना था।

     

    नक्शे में सुरंग और एक छोटा कमरा दिखाया गया था।

     

    आरोही ने कहा,

     

    “यहां!”

     

    “क्या?”

     

    “ये कमरा।”

     

    “हां।”

     

    “इसके नीचे कुछ लिखा है।”

     

    आरव ने ध्यान से देखा।

     

    नीचे लिखा था—

     

    “जहां पहला सच दफन है, वहीं आखिरी रास्ता खुलेगा।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “पहला सच?”

     

    आरव ने सोचा।

     

    “कमरा नंबर 17?”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    आरोही ने अचानक कहा,

     

    “अस्पताल!”

     

    आरव उसकी तरफ मुड़ा।

     

    “क्या?”

     

    “तुम दोनों का जन्म अस्पताल में हुआ था।”

     

    अमन की आंखें फैल गईं।

     

    “पुराना सिटी अस्पताल…”

     

    आरव ने कहा,

     

    “वही जगह जहां सिया मरी थी।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “और जहां हमारे जन्म के रिकॉर्ड बदले गए थे।”

     

    तभी सुरंग में अचानक स्पीकर चालू हो गया।

     

    एक भारी आवाज गूंजी—

     

    “बहुत होशियार हो गए हो तुम लोग।”

     

    आरव रुक गया।

     

    “कौन?”

     

    आवाज आई—

     

    “जिसे तुम ढूंढ रहे हो।”

     

    आरोही ने अमन का हाथ पकड़ लिया।

     

    “सम्राट?”

     

    आवाज में हंसी थी।

     

    “आखिरकार तुमने मेरा नाम तो लिया।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “सामने आओ।”

     

    “इतनी जल्दी क्या है?”

     

    “तुमने मेरी जिंदगी बर्बाद की।”

     

    “नहीं आरव।”

     

    आवाज शांत थी।

     

    “तुम्हारी जिंदगी मैंने नहीं… तुम्हारे पिता ने बर्बाद की।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “मेरे पिता?”

     

    “हां।”

     

    शेखर की आवाज पीछे से आई—

     

    “सम्राट, चुप हो जाओ।”

     

    सम्राट हंसा।

     

    “शेखर, अब सच छुपाने का समय खत्म हो गया है।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “क्या सच?”

     

    सम्राट बोला—

     

    “तुम्हारे पिता ने ही सिया को मरने के लिए छोड़ा था।”

     

    अमन का चेहरा बदल गया।

     

    “झूठ!”

     

    सम्राट ने कहा,

     

    “अगर यकीन नहीं है तो पुराने सिटी अस्पताल के तहखाने में जाना।”

     

    “वहां तुम्हें सिया की आखिरी रिकॉर्डिंग मिलेगी।”

     

    अमन कांपने लगा।

     

    “मेरी मां की?”

     

    “हां।”

     

    सम्राट ने कहा—

     

    “और उस रिकॉर्डिंग में सिया ने खुद बताया है कि उसकी मौत के लिए जिम्मेदार कौन था।”

     

    अमन ने आरव की तरफ देखा।

     

    आरव की आंखों में भी बेचैनी थी।

     

    तभी सम्राट की आवाज फिर आई—

     

    “और आरव… उस रिकॉर्डिंग में तुम्हारे बारे में भी एक ऐसा सच है, जिसे सुनने के बाद तुम खुद अपने पिता से नफरत करने लगोगे।”

     

    स्पीकर बंद हो गया।

     

    सुरंग में फिर सन्नाटा छा गया।

     

    अमन ने मुट्ठी कस ली।

     

    “हम अस्पताल जाएंगे।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “हां।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “लेकिन पहले ये बम?”

     

    अमन ने लाल बल्ब की तरफ देखा।

     

    “अगर हम दो मिनट में इसे नहीं रोक पाए…”

     

    वह रुक गया।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो?”

     

    अमन ने कहा—

     

    “तो पुराने रेलवे स्टेशन के साथ हम सब भी हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगे।”

     

    और उसी पल…

     

    घड़ी में सिर्फ 01:59 मिनट बाकी थे।

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 28

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 28

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 28 : अमन आखिर है कौन?

     

    पुराने रेलवे स्टेशन पर सन्नाटा पसरा हुआ था।

     

    कुछ पल पहले चली गोली की आवाज अभी भी आरव के कानों में गूंज रही थी।

     

    अमन जमीन पर गिरा हुआ था और उसके कंधे से खून बह रहा था।

     

    आरव उसके पास घुटनों के बल बैठ गया।

     

    “अमन!”

     

    आरोही भी उसके पास आ गई।

     

    “आरव, खून बहुत निकल रहा है।”

     

    आरव ने अपनी शर्ट का कपड़ा फाड़कर अमन के कंधे पर दबाया।

     

    “आंखें खोलो!”

     

    अमन ने मुश्किल से आंखें खोलीं।

     

    उसकी नजर आरव पर पड़ी।

     

    “तुम… मुझे बचा रहे हो?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम मेरे भाई हो।”

     

    अमन की आंखों में दर्द के साथ एक अजीब-सी हंसी आ गई।

     

    “मैंने… तुम्हें मारने की कोशिश की।”

     

    “लेकिन मैंने नहीं की।”

     

    तभी पीछे से शेखर की आवाज आई—

     

    “आरव, उससे दूर हटो।”

     

    आरव तुरंत पलटा।

     

    शेखर अभी भी बंदूक पकड़े हुए थे।

     

    आरव की आंखों में अविश्वास था।

     

    “पापा… आपने इसे गोली क्यों मारी?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “क्योंकि ये अमन नहीं है।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    “क्या?”

     

    आरोही ने भी शेखर की तरफ देखा।

     

    “आप कहना क्या चाहते हैं?”

     

    शेखर धीरे-धीरे आगे बढ़े।

     

    “जिसे तुम अमन समझ रहे हो… वो असली अमन नहीं है।”

     

     

    आरव खड़ा हो गया।

     

    “तो असली अमन कहां है?”

     

    शेखर चुप रहे।

     

    “पापा!”

     

    “आरव, अभी तुम्हें मेरी बात माननी होगी।”

     

    “नहीं।”

     

    आरव की आवाज में गुस्सा था।

     

    “हर बार आप मुझे यही कहते हैं कि मुझ पर भरोसा करो। लेकिन हर बार आप कोई नया राज छुपा लेते हैं।”

     

    शेखर की आंखें झुक गईं।

     

    “मुझे मजबूर होना पड़ा।”

     

    “किसने मजबूर किया?”

     

    शेखर ने विराज की तरफ देखा।

     

    लेकिन वहां कोई नहीं था।

     

    आरव चौंक गया।

     

    “विराज कहां गया?”

     

    कबीर ने चारों तरफ देखा।

     

    “वो यहां नहीं है।”

     

    आरव समझ गया।

     

    “वो हमें यहां लाकर गायब हो गया।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “विराज नहीं…”

     

    वह कुछ पल रुके।

     

    “इस पूरे खेल का असली मास्टरमाइंड कोई और है।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    शेखर ने जवाब नहीं दिया।

     

    अमन जमीन पर पड़ा सब सुन रहा था।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “शेखर…”

     

    सब उसकी तरफ देखने लगे।

     

    “तुम मुझे पहचानते हो।”

     

    शेखर उसके पास गए।

     

    “हां।”

     

    “तो फिर आरव को सच क्यों नहीं बताते?”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम कौन हो?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “मैं…”

     

    उसने आंखें बंद कर लीं।

     

    “मैं वही हूं… जिसे तुम ढूंढ रहे हो।”

     

    आरव की धड़कन तेज हो गई।

     

    “मतलब?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “मैं अमन हूं।”

     

    शेखर अचानक चौंक गए।

     

    “नहीं!”

     

    अमन ने दर्द में मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “आपने मुझे पहचान लिया था।”

     

    आरव ने शेखर की तरफ देखा।

     

    “तो फिर आपने गोली क्यों चलाई?”

     

    शेखर चुप रहे।

     

    आरव ने फिर पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    शेखर की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “क्योंकि…”

     

    उनकी आवाज टूट गई।

     

    “क्योंकि मुझे डर था कि अमन तुम्हें मार देगा।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “मैं तुम्हें मारना चाहता था।”

     

    आरव उसकी तरफ देखने लगा।

     

    “लेकिन अब?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “अब नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    अमन ने अपनी मुट्ठी में पकड़ी डायरी दिखाई।

     

    “क्योंकि मेरी मां ने मुझे कुछ और सिखाया था।”

     

    अमन ने डायरी खोली।

     

    “मेरी मां ने लिखा था…”

     

    वह पढ़ने लगा।

     

    “‘अमन, अगर कभी तुम्हें लगे कि पूरी दुनिया तुम्हारी दुश्मन है, तो अपने दिल से पूछना कि सच में तुम्हें किसने नुकसान पहुंचाया।’”

     

    अमन की आवाज भर्रा गई।

     

    “मैंने कभी नहीं पूछा।”

     

    आरव उसके पास बैठ गया।

     

    “अब पूछो।”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैंने सालों तक तुम्हें अपना दुश्मन समझा।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि विराज ने मुझे बताया कि मेरी मां की मौत तुम्हारे परिवार की वजह से हुई।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तुम्हारी मां को मेरे परिवार ने नहीं मारा।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “अब मुझे समझ आ रहा है।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “तुम्हें कैसे?”

     

    अमन ने डायरी का आखिरी पन्ना दिखाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “मेरी मौत का जिम्मेदार वह नहीं है जिसे तुम अपना दुश्मन समझोगे।”

     

    नीचे एक नाम आधा लिखा हुआ था।

     

    सिर्फ अक्षर दिखाई दे रहे थे—

     

    “वि…”

     

    अमन ने कहा,

     

    “मैंने हमेशा इसे विराज समझा।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “लेकिन?”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    “लेकिन यहां नाम पूरा नहीं है।”

    आरोही ने डायरी हाथ में ली।

     

    “ये देखो।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “स्याही का रंग अलग है।”

     

    “मतलब?”

     

    “पहली लाइन पुरानी है। लेकिन ये नाम बाद में लिखा गया है।”

     

    शेखर ने तुरंत डायरी छीन ली।

     

    “इसे मुझे दो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    शेखर ने पहली बार गुस्से में कहा,

     

    “आरव!”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “आप इतना डर क्यों रहे हैं?”

     

    शेखर की आंखों में बेचैनी थी।

     

    “क्योंकि अगर ये नाम गलत हाथों में चला गया… तो कई लोगों की जान जा सकती है।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “किसका नाम है इसमें?”

     

    शेखर चुप रहे।

     

    आरव ने कहा,

     

    “आपको पता है।”

     

    शेखर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    अमन की हालत बिगड़ने लगी।

     

    उसका चेहरा पीला पड़ गया।

     

    आरव ने कहा,

     

    “पहले इसे अस्पताल ले चलते हैं।”

     

    शेखर ने मना किया।

     

    “अस्पताल सुरक्षित नहीं है।”

     

    “तो क्या करें?”

     

    अर्जुन, जो कुछ दूरी पर खड़े थे, आगे आए।

     

    “मेरे पुराने डॉक्टर को बुलाता हूं।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “जल्दी कीजिए।”

     

    आरोही ने अमन का हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम ठीक हो जाओगे।”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम आरोही हो?”

     

    “हां।”

     

    “आरव तुमसे बहुत प्यार करता है।”

     

    आरोही चौंक गई।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    अमन हल्का सा मुस्कुराया।

     

    “उसकी आंखों से।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तुम अभी भी बातें कर रहे हो?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “मरने से पहले कुछ अच्छी बातें कर लेने में क्या बुराई है?”

     

    आरव ने गुस्से में कहा,

     

    “मरने की बात मत करो।”

     

    अमन पहली बार मुस्कुराया।

     

    “ठीक है… भाई।”

     

    आरव की आंखें भर आईं।

     

    उसने अमन का हाथ पकड़ लिया।

     

    “फिर से बोलो।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “भाई।”

     

    आरव ने उसे गले लगा लिया।

     

    दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    आरोही उन्हें देखती रही।

     

    तभी आरव के फोन पर कॉल आया।

     

    स्क्रीन पर नाम देखकर वह चौंक गया।

     

    मां।

     

    उसने फोन उठाया।

     

    “हां मां?”

     

    दूसरी तरफ माधवी की घबराई हुई आवाज थी।

     

    “आरव, तुम जहां भी हो, तुरंत वहां से निकल जाओ।”

     

    “क्यों?”

     

    “विराज तुम्हें ढूंढ रहा है।”

     

    “उसे ढूंढने दो।”

     

    “नहीं बेटा!”

     

    माधवी की आवाज कांप रही थी।

     

    “तुम्हें समझ नहीं आ रहा। विराज से भी ज्यादा खतरनाक कोई और है।”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    “कौन?”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “जिसे तुम अपना सबसे भरोसेमंद इंसान समझते हो।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    कुछ सेकंड तक खामोशी रही।

     

    फिर फोन कट गया।

     

    आरव ने तुरंत वापस कॉल किया।

     

    फोन बंद था।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मां ने कहा है कि हमारे बीच कोई ऐसा है जिस पर हमें सबसे ज्यादा भरोसा है… लेकिन वही सबसे बड़ा दुश्मन है।”

     

    आरोही ने चारों तरफ देखा।

     

    अर्जुन, शेखर, कबीर, राघव…

     

    सब एक-दूसरे को देख रहे थे।

     

    अमन ने कमजोर आवाज में कहा,

     

    “आरव…”

     

    “हां?”

     

    “तुम्हारी मां सही कह रही हैं।”

     

    “तुम्हें पता है कौन है?”

     

    अमन ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “हां।”

     

    आरव उसके पास झुक गया।

     

    “कौन?”

     

    अमन ने धीरे से कहा—

     

    “जिसके पास…”

     

    वह अचानक रुक गया।

     

    “क्या?”

     

    “लाल फाइल।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “लाल फाइल तो हमारे पास है।”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “क्या मतलब?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “तुम्हारे पास सिर्फ उसकी कॉपी है।”

     

    आरव और आरोही दोनों चौंक गए।

     

    “क्या?”

     

    “असली लाल फाइल…”

     

    अमन ने आंखें खोलीं।

     

    “उस इंसान के पास है।”

     

    “किस इंसान के?”

     

    अमन ने चारों तरफ देखा।

     

    उसकी नजर अचानक…

     

    कबीर पर जाकर रुक गई।

     

    कबीर का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    आरव ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

     

    “कबीर?”

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    “अमन क्या बकवास कर रहा है?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “तुम्हें पता है… मैं झूठ नहीं बोल रहा।”

     

    कबीर ने बंदूक निकाल ली।

     

    आरव ने भी तुरंत अपनी बंदूक निकाल ली।

     

    “बंदूक नीचे रखो।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “आरव, मेरी बात सुनो।”

     

    “पहले बंदूक नीचे।”

     

    कबीर ने बंदूक जमीन पर रख दी।

     

    “मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूं।”

     

    अमन हंसा।

     

    “फिर तुम्हारी जेब में ये क्या है?”

     

    कबीर के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    अमन ने कहा—

     

    “लाल फाइल की चाबी।”

     

    आरव ने कबीर की तरफ देखा।

     

    “कबीर…”

     

    कबीर चुप था।

     

    आरव ने आगे बढ़कर उसकी जेब से चाबी निकाल ली।

     

    चाबी पर वही निशान था—

     

    A-17

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    “ये वही चाबी है जो कमरे नंबर 17 की थी!”

     

    कबीर ने अचानक कहा—

     

    “रुको!”

     

    आरव पलटा।

     

    कबीर की आंखों में आंसू थे।

     

    “मैंने तुम्हें धोखा नहीं दिया।”

     

    “तो फिर ये चाबी?”

     

    “मुझे ये विराज ने दी थी।”

     

    सब चौंक गए।

     

    “विराज ने?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “क्योंकि उसने मुझे आदेश दिया था कि अगर तुम लाल फाइल तक पहुंच जाओ…”

     

    वह रुक गया।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो?”

     

    कबीर ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “तो मुझे तुम्हें खत्म कर देना था।”

     

    आरोही ने आरव का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    अमन उठने की कोशिश करने लगा।

     

    तभी स्टेशन के बाहर कई गाड़ियों के रुकने की आवाज आई।

     

    कबीर ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    उसका चेहरा बदल गया।

     

    “वो आ गए।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    कबीर ने धीमे से कहा—

     

    “विराज के लोग नहीं…”

     

    “तो कौन?”

     

    कबीर ने खिड़की की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “शेखर के लोग।”

     

    आरव धीरे-धीरे अपने पिता की तरफ मुड़ा।

     

    शेखर के चेहरे पर अजीब-सी खामोशी थी।

     

    और उसी वक्त…

     

    बाहर से एक आदमी ने चिल्लाकर कहा—

     

    “आरव! अमन को हमारे हवाले कर दो… वरना ये पूरा स्टेशन उड़ा दिया जाएगा!”

     

    आरव ने अमन की तरफ देखा।

     

    अमन ने धीरे से कहा—

     

    “अब समझे… असली खेल किसका है?”

     

    जारी है।

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 27

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 27

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 27 : अमन कौन है?

     

    कमरा नंबर 17 में अचानक छाया अंधेरा सबके दिलों में डर भर रहा था।

     

    कुछ पल पहले तक जहां आरव अपने कथित जुड़वां भाई के बारे में जानने की कोशिश कर रहा था, वहीं अब शेखर की बात ने सबको उलझा दिया था।

     

    “अमन तुम्हारा भाई नहीं, तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन है।”

     

    आरव ने शेखर की तरफ देखा।

     

    “पापा… आप अमन को जानते हैं?”

     

    शेखर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    “आप उसे जानते हैं ना?”

     

    शेखर ने धीरे से आंखें बंद कर लीं।

     

    “हां।”

     

    आरव की आवाज में बेचैनी थी।

     

    “तो फिर वो कौन है?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “ये बात मैं तुम्हें बताना नहीं चाहता था।”

     

    “लेकिन अब मुझे जानना है।”

     

    “आरव…”

     

    “नहीं पापा।”

     

    आरव ने उनकी तरफ देखते हुए कहा,

     

    “मेरी पूरी जिंदगी झूठ में बीती है। हर बार कोई न कोई मुझे बचाने के नाम पर सच छुपाता रहा। अब और नहीं।”

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “उसे सच बता दीजिए।”

     

    शेखर ने आरोही की तरफ देखा।

     

    फिर उन्होंने धीरे से कहा—

     

    “अमन वही लड़का है जिसे मैंने पच्चीस साल पहले तुम्हारे सामने से उठा लिया था।”

     

    आरव की सांस रुक गई।

     

    “क्या?”

     

    शेखर ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा,

     

    “जिस रात तुम्हारा जन्म हुआ था, उसी रात अस्पताल में एक और बच्चा था।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मेरा जुड़वां?”

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    “वो अमन था।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “वो अस्पताल में क्यों था?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “क्योंकि उसकी मां भी उसी अस्पताल में भर्ती थी।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “उसकी मां कौन थी?”

     

    शेखर कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “उसका नाम था… सिया।”

     

    आरव ने पहली बार यह नाम सुना था।

     

    “सिया कौन थी?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “वो मेरी सबसे करीबी दोस्त थी।”

     

    राघव ने तुरंत कहा,

     

    “शेखर, क्या तुम सच में ये सब बताना चाहते हो?”

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “अब वक्त आ गया है।”

     

    “सिया एक बहुत बहादुर लड़की थी। उसने कई सालों तक विराज के खिलाफ सबूत इकट्ठा किए थे।”

     

    विराज ने तुरंत कहा,

     

    “झूठ!”

     

    शेखर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें डर है ना कि सिया का नाम फिर से सामने आ रहा है?”

     

    विराज चुप हो गया।

     

    शेखर आगे बोले,

     

    “सिया के पास लाल फाइल थी।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “वही लाल फाइल?”

     

    “हां।”

     

    “तो वो फाइल उसके पास कैसे आई?”

     

    “सिया ने उसे चुराया नहीं था।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “वो फाइल उसी ने तैयार की थी।”

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “मतलब उसमें विराज के सारे अपराध थे?”

     

    “हां।”

     

    विराज गुस्से में बोला,

     

    “शेखर, बहुत हो गया।”

     

    “नहीं विराज।”

     

    शेखर की आवाज मजबूत थी।

     

    “आज सच सामने आएगा।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “सिया उस रात अपने बच्चे को जन्म देने आई थी।”

     

    “अमन?”

     

    “हां।”

     

    “फिर क्या हुआ?”

     

    “अस्पताल में आग लग गई।”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “वही रात…”

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “उसी रात।”

     

    “सिया ने अमन को बचाने की कोशिश की।”

     

    “क्या वो बच गई?”

     

    शेखर की आंखें नम हो गईं।

     

    “नहीं।”

     

    कमरे में खामोशी छा गई।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो अमन?”

     

    “मैंने उसे बचाया।”

     

    “फिर?”

     

    “मैं उसे लेकर भाग गया।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मुझे पता था कि अगर विराज को पता चला कि सिया का बच्चा जिंदा है, तो वो उसे भी मार देगा।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “फिर आपने उसे कहां रखा?”

     

    शेखर चुप हो गए।

     

    “पापा?”

     

    “मैंने उसे एक अनाथालय में भेज दिया।”

     

    आरव ने हैरानी से पूछा,

     

    “आपने उसे छोड़ दिया?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “मैं मजबूर था।”

     

    “लेकिन वो बच्चा था!”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “फिर?”

     

    शेखर की आंखों में दर्द था।

     

    “कुछ साल बाद मुझे पता चला कि अमन को एक परिवार ने गोद ले लिया था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन सा परिवार?”

     

    शेखर ने जवाब देने से पहले विराज की तरफ देखा।

     

    विराज का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    “नहीं…”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “विराज ने।”

     

    आरोही ने हैरानी से विराज की तरफ देखा।

     

    “आपने अमन को गोद लिया था?”

     

    विराज चुप रहा।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “मुझे नहीं पता था कि वो सिया का बच्चा है।”

     

    शेखर हंस पड़ा।

     

    “तुम झूठ बोल रहे हो।”

     

    “मैं सच बोल रहा हूं।”

     

    “तुम्हें पता था।”

     

    विराज ने गुस्से में कहा,

     

    “अगर मुझे पता होता तो मैं उसे जिंदा क्यों रखता?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “क्योंकि तुम्हें लाल फाइल चाहिए थी।”

     

    विराज चुप हो गया।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “अमन के पास फाइल थी?”

     

    “नहीं।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “लेकिन उसके पास एक चाबी थी।”

     

    “किसकी?”

     

    “उस कमरे की… जिसमें लाल फाइल छुपी थी।”

     

    आरव की नजर कमरे के चारों तरफ घूम गई।

     

    “तो अमन को चाबी के बारे में पता था?”

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    “सिया ने चाबी उसके कपड़े में सिल दी थी।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “अगर अमन को ये सब पता चला तो?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “वो पच्चीस साल से बदला ले रहा है।”

     

    “किससे?”

     

    “विराज से।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “लेकिन आपने कहा था कि अमन आरव का दुश्मन है।”

     

    शेखर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि अब अमन को लगता है कि आरव की वजह से उसकी मां मरी।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “मेरी वजह से?”

     

    “अमन को बताया गया कि उस रात तुम्हारे परिवार ने उसकी मां को मरने के लिए छोड़ दिया था।”

     

    “किसने बताया?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “विराज ने।”

     

    विराज ने तुरंत कहा,

     

    “मैंने सिर्फ वही बताया जो सच था।”

     

    शेखर बोले,

     

    “तुमने आधा सच बताया।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “पूरा सच क्या है?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “उस रात सिया को बचाने के लिए मैं गया था।”

     

    “फिर?”

     

    “लेकिन वहां पहले से कोई मौजूद था।”

     

    “कौन?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “रुद्र।”

     

    सब चौंक गए।

     

    राघव ने कहा,

     

    “रुद्र वहां था?”

     

    “हां।”

     

    “फिर?”

     

    “उसने सिया को बचाने की कोशिश की।”

     

    “तो सिया की मौत कैसे हुई?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “विराज के आदमियों ने अस्पताल में आग लगा दी।”

     

    विराज चिल्लाया,

     

    “झूठ!”

     

    “तुम्हारे पास कोई दूसरा सच है तो बोलो।”

     

    विराज चुप हो गया।

     

    आरव कमरे से बाहर जाने लगा।

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “कहां जा रहे हो?”

     

    “अमन को ढूंढने।”

     

    “अभी?”

     

    “हां।”

     

    “लेकिन कल रात उसने खुद बुलाया है।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “अगर वो मुझे दुश्मन समझता है तो मैं उसे सच बताऊंगा।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “तुम्हें डर नहीं लगता?”

     

    “लगता है।”

     

    “फिर?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम साथ हो।”

     

    आरोही की आंखों में हल्की मुस्कान आई।

     

    “हां।”

     

    तभी नंदिनी ने अपनी साड़ी के पल्लू से एक छोटी डायरी निकाली।

     

    “आरव।”

     

    आरव पलटा।

     

    “ये क्या है?”

     

    “सिया की डायरी।”

     

    सबकी नजरें उस डायरी पर टिक गईं।

     

    आरव ने डायरी ली।

     

    “ये आपके पास कैसे?”

     

    नंदिनी ने कहा,

     

    “सिया ने मुझे दी थी।”

     

    “कब?”

     

    “तुम्हारे जन्म से एक दिन पहले।”

     

    आरव ने डायरी खोली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर मुझे कुछ हो जाए, तो मेरे बेटे अमन को सच बताना।”

     

    आरव का दिल तेज धड़कने लगा।

     

    आगे लिखा था—

     

    “अमन को कभी ये मत बताना कि उसके पिता कौन हैं।”

     

    आरव रुक गया।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    आरव ने अगला पन्ना पलटा।

     

    वहां सिर्फ एक नाम लिखा था।

     

    “शेखर।”

     

    आरव ने चौंककर शेखर की तरफ देखा।

     

    “पापा…”

     

    शेखर की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “हां।”

     

    आरव की आवाज कांप गई।

     

    “क्या अमन आपका बेटा है?”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    विराज भी हैरान होकर शेखर को देखने लगा।

     

    शेखर ने धीरे से सिर झुका लिया।

     

    “हां… अमन मेरा बेटा है।”

     

    आरोही के मुंह से निकला,

     

    “तो अमन… आरव का भाई नहीं?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    “वो मेरा बेटा है… लेकिन उसकी मां सिया थी।”

     

    आरव स्तब्ध था।

     

    “तो आपने मुझे और उसे अलग क्यों रखा?”

     

    शेखर की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “क्योंकि अगर विराज को पता चल जाता कि तुम दोनों मेरे बच्चे हो… तो वो तुम दोनों को मार देता।”

    रात बहुत गहरी हो चुकी थी।

     

    सभी लोग हवेली के एक सुरक्षित कमरे में बैठे थे।

     

    आरव चुप था।

     

    आरोही उसके पास बैठी थी।

     

    “क्या सोच रहे हो?”

     

    “अमन के बारे में।”

     

    “तुम उसे क्या कहोगे?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “भाई।”

     

    आरोही मुस्कुराई।

     

    “अगर वो तुम्हें भाई मानने से इनकार कर दे?”

     

    “तो भी मैं उसे भाई मानूंगा।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उसने अपनी मां खोई है।”

     

    आरव की आवाज भर्रा गई।

     

    “मैं नहीं चाहता कि वो अपने पिता को भी खो दे।”

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम सच में बहुत अच्छे हो।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “और तुम?”

     

    “मैं?”

     

    “तुम मेरे साथ कल चलोगी?”

     

    आरोही मुस्कुराई।

     

    “क्या तुम्हें अब भी पूछने की जरूरत है?”

     

    आरव हल्का सा मुस्कुराया।

     

    “नहीं।”

    अगली रात दोनों पुराने रेलवे स्टेशन पहुंचे।

     

    स्टेशन कई सालों से बंद था।

     

    चारों तरफ सन्नाटा था।

     

    टूटी हुई बेंचें, जंग लगी पटरियां और अंधेरे में जलती एक पीली लाइट…

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    “कोई नहीं है।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “हमें बुलाया है, आएगा जरूर।”

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “मैं आ गया।”

     

    दोनों पलटे।

     

    एक युवक अंधेरे से बाहर आया।

     

    लंबा कद।

     

    काले कपड़े।

     

    चेहरे पर हल्की दाढ़ी।

     

    आंखों में गुस्सा।

     

    वह धीरे-धीरे उनके सामने आकर रुका।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम अमन हो?”

     

    युवक ने कहा,

     

    “हां।”

     

    आरव ने आगे बढ़कर कहा,

     

    “मैं आरव हूं।”

     

    अमन हंसा।

     

    “मुझे पता है।”

     

    “तुम्हें मेरे बारे में क्या पता है?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “इतना कि तुम्हारी वजह से मेरी मां मरी।”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    “ये सच नहीं है।”

     

    अमन ने बंदूक निकाल ली।

     

    आरोही तुरंत आरव के सामने आ गई।

     

    “बंदूक नीचे रखो।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “तुम बीच में मत आओ।”

     

    आरव ने आरोही को पीछे किया।

     

    “नहीं। जो कहना है मुझसे कहो।”

     

    अमन ने बंदूक आरव की तरफ कर दी।

     

    “तुम्हें पता है मैं कौन हूं?”

     

    “हां।”

     

    “कौन?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मेरे पिता का बेटा।”

     

    अमन के चेहरे पर हैरानी फैल गई।

     

    “तुम्हें पता चल गया?”

     

    “हां।”

     

    “तो फिर तुम्हें ये भी पता होगा कि हमारी मां कौन थी?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “सिया।”

     

    अमन की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तुमने उसका नाम कैसे लिया?”

     

    आरव ने डायरी आगे कर दी।

     

    “ये उसकी डायरी है।”

     

    अमन ने डायरी देखते ही बंदूक नीचे कर दी।

     

    वह कांपते हाथों से डायरी लेने लगा।

     

    लेकिन जैसे ही उसने पहला पन्ना पढ़ा…

     

    उसकी आंखें भर आईं।

     

    “मां…”

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “तुम अकेले नहीं हो।”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मुझे भाई मत कहना।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैंने तुम्हें मारने की कसम खाई है।”

     

    आरव चुप रहा।

     

    अमन ने बंदूक फिर उठा ली।

     

    “और आज वो कसम पूरी होगी।”

     

    आरोही चिल्लाई—

     

    “अमन!”

     

    अमन की उंगली ट्रिगर पर थी।

     

    लेकिन तभी पीछे से किसी ने अमन पर गोली चला दी।

     

    धांय!

     

    अमन के कंधे से खून निकल आया।

     

    आरव उसे संभालने के लिए दौड़ा।

     

    “अमन!”

     

    अमन जमीन पर गिर पड़ा।

     

    आरव ने ऊपर देखा।

     

    दूर खड़ा एक नकाबपोश आदमी उन्हें देख रहा था।

     

    उसके हाथ में बंदूक थी।

     

    वह मुस्कुराया।

     

    फिर उसने अपना नकाब उतार दिया।

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    आरोही भी स्तब्ध रह गई।

     

    क्योंकि सामने खड़ा आदमी था—

     

    शेखर।

     

    आरव चीख उठा—

     

    “पापा… आपने अमन को गोली क्यों मारी?”

     

    शेखर ने बंदूक नीचे की।

     

    उनके चेहरे पर दर्द था।

     

    और उन्होंने सिर्फ इतना कहा—

     

    “क्योंकि अमन वो नहीं है जो तुम समझ रहे हो।”

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 26

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 26

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 26 : कमरा नंबर 17 का रहस्य

     

     

    नीलगिरी हवेली के बाहर पुलिस की गाड़ियों की आवाज लगातार करीब आती जा रही थी।

     

    लेकिन आरव के कानों में इस वक्त कुछ भी नहीं पड़ रहा था।

     

    उसके हाथ में शेखर की दी हुई छोटी-सी चाबी थी।

     

    वही चाबी…

     

    जो कमरा नंबर 17 का दरवाजा खोलने वाली थी।

     

    आरव ने अपनी मुट्ठी कस ली।

     

    उसकी नजर सामने खड़ी माधवी पर थी।

     

    “मां…”

     

    माधवी ने उसकी तरफ देखा।

     

    उनकी आंखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।

     

    “हां बेटा…”

     

    “आप मुझसे कुछ छुपा रही हैं?”

     

    माधवी की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “मैं…”

     

    वह कुछ कह पातीं, उससे पहले आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “अभी नहीं।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “पहले कमरा नंबर 17 देखते हैं। शायद वहां हमें सारे सवालों के जवाब मिल जाएं।”

     

    आरव ने सिर हिला दिया।

     

    “ठीक है।”

     

    सभी लोग तेजी से हवेली के अंदर जाने लगे।

     

    शेखर को राघव और कबीर सहारा देकर ले जा रहे थे।

     

    उनके कंधे पर गोली लगी थी और खून अभी भी बह रहा था।

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “पहले शेखर का इलाज जरूरी है।”

     

    शेखर ने मना कर दिया।

     

    “नहीं।”

     

    “आपकी हालत खराब है।”

     

    “जब तक आरव को सच नहीं मिल जाता, मैं अस्पताल नहीं जाऊंगा।”

     

    आरव ने उनकी तरफ देखा।

     

    “पापा, आप मेरे लिए अपनी जान खतरे में मत डालिए।”

     

    शेखर हल्का सा मुस्कुराए।

     

    “तुम्हारे लिए तो पच्चीस साल से खतरे में है।”

     

    आरव की आंखें भर आईं।

     

    “अब और नहीं।”

     

    शेखर ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “बस एक आखिरी काम।”

     

    “कमरा नंबर 17?”

     

    “हां।”

     

    हवेली की दूसरी मंजिल बिल्कुल सुनसान थी।

     

    पुरानी दीवारों पर जाले लगे थे।

     

    गलियारे में अंधेरा था।

     

    कबीर ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    आखिर में एक दरवाजा दिखाई दिया।

     

    दरवाजे पर पीतल की प्लेट लगी थी—

     

    कमरा नंबर 17

     

    आरव उसके सामने जाकर रुक गया।

     

    उसने जेब से चाबी निकाली।

     

    आरोही उसके पास आकर खड़ी हो गई।

     

    “डर लग रहा है?”

     

    आरव ने सच कहा,

     

    “हां।”

     

    आरोही मुस्कुराई।

     

    “मुझे भी।”

     

    “फिर?”

     

    “फिर भी खोलेंगे।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम हमेशा मेरे साथ क्यों खड़ी रहती हो?”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “क्योंकि जब पूरी दुनिया तुम्हारे खिलाफ हो, तब भी मैं तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं।”

     

    आरव की आंखों में हल्की मुस्कान आ गई।

     

    “चलो।”

     

    उसने चाबी ताले में डाली।

     

    क्लिक।

     

    दरवाजा खुल गया।

     

     

    कमरा बाकी हवेली से बिल्कुल अलग था।

     

    यहां धूल नहीं थी।

     

    सामान करीने से रखा हुआ था।

     

    बीच में एक बड़ी लकड़ी की मेज थी।

     

    उस पर कई पुरानी फाइलें रखी थीं।

     

    दीवार पर तस्वीरें लगी थीं।

     

    आरव ने पहली तस्वीर देखी।

     

    उसमें माधवी थीं।

     

    दूसरी में शेखर।

     

    तीसरी में नंदिनी और अर्जुन।

     

    लेकिन चौथी तस्वीर देखकर आरव की सांस रुक गई।

     

    उसमें…

     

    माधवी एक नवजात बच्चे को गोद में लिए खड़ी थीं।

     

    आरव धीरे-धीरे तस्वीर के पास गया।

     

    “ये… मैं हूं?”

     

    माधवी पीछे से कमरे में आईं।

     

    उनका चेहरा सफेद पड़ चुका था।

     

    आरव ने तस्वीर उनकी तरफ बढ़ाई।

     

    “मां, ये तस्वीर कब की है?”

     

    माधवी ने नजरें झुका लीं।

     

    “तुम्हारे जन्म की।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “लेकिन यहां तारीख गलत क्यों है?”

     

    माधवी चुप रहीं।

     

    आरोही ने तस्वीर ध्यान से देखी।

     

    “आरव…”

     

    “क्या?”

     

    “बच्चे के हाथ में ये निशान देखो।”

     

    आरव ने तस्वीर को करीब किया।

     

    बच्चे की कलाई पर एक छोटा सा जन्मचिह्न था।

     

    आरव ने अपनी कलाई देखी।

     

    उसकी कलाई पर भी वही निशान था।

     

    “ये मेरा है।”

     

    मेज पर एक लिफाफा रखा था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “आरव के लिए — जब वह सच जानने के लायक हो जाए।”

     

    आरव के हाथ कांपने लगे।

     

    उसने लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक पुराना खत था।

     

    उसने पढ़ना शुरू किया—

     

    “आरव,

     

    अगर तुम ये खत पढ़ रहे हो, तो इसका मतलब है कि मेरे पास तुमसे सच छुपाने का कोई अधिकार नहीं बचा।

     

    तुम्हारे जन्म की रात जो हुआ, वो सिर्फ एक हादसा नहीं था।

     

    उस रात तुम्हें मारने का आदेश दिया गया था।

     

    लेकिन तुम्हें बचा लिया गया।

     

    तुम्हें एक ऐसी जगह भेजा गया जहां कोई तुम्हें पहचान न सके।

     

    तुम्हारी मां माधवी ने तुम्हें अपनी जान से भी ज्यादा बचाया।

     

    लेकिन इस कहानी में एक और इंसान था…

     

    जिसने तुम्हारी जिंदगी बदल दी।”

     

    आरव पढ़ते-पढ़ते रुक गया।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “आगे क्या लिखा है?”

     

    आरव ने कांपती आवाज में पढ़ा—

     

    “वो इंसान तुम्हारा दुश्मन नहीं था।

     

    वो तुम्हारा सबसे बड़ा रक्षक था।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “कौन?”

     

    आरव ने अगली लाइन पढ़ी।

     

    उसके हाथ से खत लगभग गिर गया।

     

    “नंदिनी।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

     

    आरोही ने अपनी मां की तरफ देखा।

     

    “मां?”

     

    नंदिनी धीरे-धीरे आगे आईं।

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “आपने मुझे बचाया था?”

     

    नंदिनी की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “हां बेटा।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    “क्योंकि उस रात तुम्हें मारने का आदेश दिया गया था।”

     

    “किसने दिया था?”

     

    नंदिनी ने जवाब नहीं दिया।

     

    आरव ने जोर से पूछा,

     

    “किसने?”

     

    नंदिनी ने विराज की तरफ देखा।

     

    विराज इस वक्त कमरे के दरवाजे पर खड़ा था।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “मैंने।”

     

    आरोही पलटकर उसे देखने लगी।

     

    “आपने?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “हां।”

     

    आरोही की आंखों में नफरत उतर आई।

     

    “आप मेरे पिता होकर भी इतने निर्दयी कैसे हो सकते हैं?”

     

    विराज कुछ नहीं बोला।

     

    आरव उसके सामने जाकर खड़ा हो गया।

     

    “तुमने मुझे क्यों मारना चाहा?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “क्योंकि तुम मेरे लिए खतरा थे।”

     

    “मैं तो बच्चा था।”

     

    “बच्चे नहीं… तुम्हारे नाम का अधिकार खतरा था।”

     

    विराज ने कमरे की एक तस्वीर उठाई।

     

    “तुम्हें पता है तुम्हारे जन्म के बाद क्या हुआ?”

     

    आरव चुप रहा।

     

    “शेखर ने अपनी पूरी विरासत तुम्हारे नाम कर दी।”

     

    “तो?”

     

    “और मैं उस विरासत का असली वारिस बनना चाहता था।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “इसलिए आपने एक बच्चे को मारने का आदेश दे दिया?”

     

    विराज ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैंने सिर्फ आदेश दिया था।”

     

    नंदिनी चीख पड़ीं,

     

    “और मैंने उसी आदेश को नकार दिया!”

     

    विराज ने कहा,

     

    “तुम्हें उसकी कीमत चुकानी पड़ी।”

     

    नंदिनी ने कहा,

     

    “मैंने अपनी बेटी को बचाया।”

     

    “और मेरा बच्चा मुझसे छीन लिया।”

     

    नंदिनी ने गुस्से में कहा,

     

    “तुम्हें बेटी नहीं चाहिए थी, विराज! तुम्हें सिर्फ अपनी ताकत चाहिए थी।”

     

    आरव ने मेज पर रखी दूसरी फाइल उठाई।

     

    उसके ऊपर लिखा था—

     

    “Project A-17”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “ये क्या है?”

     

    आरव ने फाइल खोली।

     

    अंदर अस्पताल के दस्तावेज थे।

     

    एक पन्ने पर तीन नाम लिखे थे।

     

    बच्चा 1 — आरव

     

    बच्चा 2 — आरोही

     

    और…

     

    बच्चा 3 — अज्ञात

     

    आरव चौंक गया।

     

    “तीसरा बच्चा!”

     

    रुद्र की बात सच थी।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “ये बच्चा कौन था?”

     

    शेखर धीरे-धीरे कमरे में आए।

     

    उनके चेहरे पर दर्द था।

     

    “वही राज जिसे हमने सबसे ज्यादा छुपाया।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन था वो?”

     

    शेखर ने जवाब नहीं दिया।

     

    आरव ने फाइल का अगला पन्ना खोला।

     

    वहां बच्चे के पिता का नाम खाली था।

     

    लेकिन मां के नाम के सामने लिखा था—

     

    माधवी।

     

    आरव का दिल रुक गया।

     

    “मां?”

     

    माधवी रोने लगीं।

     

    आरव उनकी तरफ देखने लगा।

     

    “आपके… तीन बच्चे थे?”

     

    माधवी ने कांपते हुए कहा,

     

    “नहीं बेटा।”

     

    “फिर?”

     

    “वो तीसरा बच्चा…”

     

    वह रुक गईं।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन था?”

     

    माधवी ने सिर उठाया।

     

    उनकी आंखों में ऐसा दर्द था, जिसे देखकर सब खामोश हो गए।

     

    “वो बच्चा…”

     

    उन्होंने धीरे से कहा—

     

    “तुम्हारा जुड़वां भाई था।”

     

     

    कमरे में जैसे विस्फोट हो गया।

     

    “क्या?”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “मेरा… जुड़वां भाई?”

     

    माधवी ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    आरव की आवाज कांप रही थी।

     

    “फिर वो कहां है?”

     

    माधवी रोते हुए बोलीं,

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    “आपको नहीं पता?”

     

    “हमें लगा था वो मर गया।”

     

    आरव ने फाइल उठाई।

     

    “लेकिन यहां लिखा है कि उसकी मौत की पुष्टि नहीं हुई।”

     

    माधवी चुप रहीं।

     

    आरोही ने फाइल अपने हाथ में ली।

     

    “यहां एक कोड है।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “A-18।”

     

    शेखर का चेहरा बदल गया।

     

    “नहीं…”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “ये कोड…”

     

    उन्होंने फाइल छीन ली।

     

    “ये संभव नहीं है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    शेखर ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “A-18 का मतलब है… बच्चा जिंदा था।”

     

    आरव की सांसें तेज हो गईं।

     

    “तो मेरा भाई जिंदा था?”

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “फिर कहां गया?”

     

    “उसे किसी ने अस्पताल से निकाल लिया।”

     

    “किसने?”

     

    शेखर चुप रहे।

     

    आरव ने उनका कंधा पकड़ लिया।

     

    “पापा, बताइए।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “उसका नाम…”

     

    तभी अचानक कमरे की खिड़की टूट गई।

     

    धड़ाम!

     

    एक गोली फाइल के पास आकर लगी।

     

    सब नीचे झुक गए।

     

    कबीर ने खिड़की की तरफ गोली चलाई।

     

    बाहर से कोई भागता हुआ दिखाई दिया।

     

    आरव ने फाइल उठाई।

     

    लेकिन तभी किसी ने पीछे से आकर उसके हाथ पर वार किया।

     

    फाइल जमीन पर गिर गई।

     

    आरोही चीख उठी—

     

    “आरव!”

     

    एक नकाबपोश आदमी फाइल उठाकर भागने लगा।

     

    आरव उसके पीछे दौड़ा।

     

    “रुको!”

     

    आरोही भी उसके पीछे भागी।

     

    गलियारे में नकाबपोश आदमी तेजी से सीढ़ियों की तरफ भाग रहा था।

     

    आरव ने उसे पकड़ लिया।

     

    दोनों के बीच हाथापाई होने लगी।

     

    नकाबपोश ने आरव को धक्का दिया।

     

    आरव दीवार से टकराया।

     

    आरोही ने उसके हाथ से फाइल छीन ली।

     

    नकाबपोश ने आरोही को पकड़ लिया।

     

    “फाइल दो!”

     

    आरोही ने मना कर दिया।

     

    “नहीं!”

     

    आरव उठकर उसकी तरफ दौड़ा।

     

    नकाबपोश ने आरोही को छोड़ दिया और खिड़की से बाहर कूद गया।

     

    आरव खिड़की तक पहुंचा।

     

    लेकिन नीचे कोई नहीं था।

     

    सिर्फ…

     

    एक छोटा सा कागज पड़ा था।

     

    आरव ने उसे उठाया।

     

    उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

     

    “अपने जुड़वां भाई को ढूंढना है तो कल रात पुराने रेलवे स्टेशन आना।”

     

    नीचे एक नाम लिखा था—

     

    “अमन।”

     

    आरव का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “अमन…”

     

    आरोही उसके पास आ गई।

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव ने कागज उसे दिया।

     

    आरोही ने पढ़ा।

     

    उसकी आंखें फैल गईं।

     

    “क्या ये तुम्हारे भाई का नाम है?”

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “शायद।”

     

    तभी पीछे से शेखर की आवाज आई—

     

    “नहीं, आरव… अमन तुम्हारा भाई नहीं है।”

     

    आरव पलटा।

     

    “तो कौन है?”

     

    शेखर की आंखों में डर था।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “अमन… तुम्हारा जुड़वां भाई नहीं, तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन है।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    और तभी कमरे की लाइट बंद हो गई।

     

    अंधेरे में किसी की आवाज गूंजी—

     

    “भाई से मिलने के लिए तैयार हो जाओ, आरव…”

     

    “क्योंकि कल रात तुम्हारी जिंदगी का सबसे बड़ा राज तुम्हारे सामने खड़ा होगा।”

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 25

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 25

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 25 : जिसे देखकर विराज भी डर गया

     

    समुद्र किनारे उस सुनसान जगह पर एक पल के लिए सब कुछ थम गया था।

     

    शेखर जमीन पर पड़े थे।

     

    आरव उनके पास घुटनों के बल बैठा हुआ था।

     

    उनकी सफेद शर्ट पर खून फैलता जा रहा था।

     

    “पापा…!”

     

    आरव की आवाज कांप रही थी।

     

    “आंखें खोलिए… पापा, मेरी तरफ देखिए।”

     

    शेखर ने मुश्किल से आंखें खोलीं।

     

    “आरव…”

     

    “हां पापा, मैं यहीं हूं।”

     

    “तुम… यहां से चले जाओ।”

     

    आरव की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा।”

     

    तभी पीछे से बंदूक पकड़े वह आदमी आगे आया।

     

    उसके चेहरे पर ठंडी मुस्कान थी।

     

    विराज उसे देखते ही पीछे हट गया।

     

    “तुम…?”

     

    आदमी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां, विराज। मैं।”

     

    अभय ने भी उसे पहचान लिया।

     

    उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “ये यहां कैसे…?”

     

    राघव ने घबराकर पूछा,

     

    “कौन है ये?”

     

    किसी के मुंह से जवाब नहीं निकला।

     

    वह आदमी धीरे-धीरे आगे आया।

     

    “मेरा नाम सुनने के बाद शायद तुम्हें अपने पुराने पाप याद आ जाएंगे।”

     

    आरव ने गुस्से में उसकी तरफ बंदूक तान दी।

     

    “तुमने मेरे पिता को गोली मारी है।”

     

    आदमी मुस्कुराया।

     

    “और अगली गोली तुम्हारे लिए है।”

     

    आरोही तुरंत आरव के सामने आ गई।

     

    “उसे गोली मत मारना!”

     

    आदमी ने आरोही को देखा।

     

    कुछ पल तक वह उसे घूरता रहा।

     

    फिर उसके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “तुम…”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    उस आदमी ने धीरे से कहा—

     

    “तुम बिल्कुल अपनी मां जैसी दिखती हो।”

     

    नंदिनी की आंखें फैल गईं।

     

    “नहीं…”

     

    अभय ने गुस्से में पूछा,

     

    “तुम जिंदा कैसे हो?”

     

    आदमी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें लगा था कि तुमने मुझे खत्म कर दिया?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “तुम्हें मर जाना चाहिए था।”

     

    आदमी हंसा।

     

    “इस परिवार के लोगों ने मुझे कई बार मारने की कोशिश की।”

     

    फिर उसने अपनी बंदूक आरव की तरफ कर दी।

     

    “लेकिन मैं हर बार वापस आया।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “नाम बताओ अपना।”

     

    आदमी ने कहा,

     

    “तुम्हें मेरा नाम जानकर क्या मिलेगा?”

     

    “सच।”

     

    “सच?”

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “तुम सच सुनने के लिए तैयार नहीं हो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मैं सब सुनूंगा।”

     

    उस आदमी ने कहा—

     

    “मेरा नाम रुद्र है।”

     

    माधवी के हाथ कांपने लगे।

     

    राघव ने उन्हें संभाला।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “आप मुझे मेरी मां जैसा क्यों कह रहे थे?”

     

    रुद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि तुम्हारी मां…”

     

    वह रुक गया।

     

    “क्योंकि मैं उसे बहुत अच्छी तरह जानता था।”

     

    नंदिनी ने गुस्से में कहा,

     

    “रुद्र, मेरी बेटी से दूर रहो।”

     

    रुद्र हंसा।

     

    “अब भी डरती हो?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    नंदिनी ने कहा,

     

    “क्योंकि मैं जानती हूं तुम क्या कर सकते हो।

     

    आरव ने शेखर के घाव पर हाथ दबाया।

     

    “किसी को डॉक्टर बुलाना होगा।”

     

    कबीर ने तुरंत फोन निकाला।

     

    “मैं एंबुलेंस बुलाता हूं।”

     

    शेखर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “क्यों?”

     

    “अस्पताल मत ले जाना।”

     

    “लेकिन गोली लगी है।”

     

    शेखर ने धीमे से कहा,

     

    “वहां… उनके लोग हैं।”

     

    आरव समझ गया।

     

    “तो फिर हम आपको सुरक्षित जगह ले जाएंगे।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “मेरे पास एक पुराना फार्महाउस है।”

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “वहीं चलो।”

     

    राघव और कबीर ने शेखर को उठाया।

     

    लेकिन तभी रुद्र ने बंदूक उठाई।

     

    “कोई कहीं नहीं जाएगा।”

     

    आरव उसके सामने खड़ा हो गया।

     

    “तुम्हें पहले मुझसे गुजरना होगा।”

     

    रुद्र मुस्कुराया।

     

    “यही तो चाहता हूं।”

     

    आरव ने बंदूक तान दी।

     

    “तुमने मेरे पिता को गोली मारी है।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “वो तुम्हारे पिता हैं?”

     

    “हां।”

     

    “तो फिर तुम्हें भी मरना होगा।”

     

    आरोही चिल्लाई,

     

    “नहीं!”

     

    रुद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम बीच में मत आओ।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “मैं आरव को कुछ नहीं होने दूंगी।”

     

    रुद्र कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “तुम्हें पता है तुम किसे बचा रही हो?”

     

    “आरव को।”

     

    “वही आरव जिसने तुम्हारे परिवार की पूरी विरासत अपने नाम कर रखी है।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “मुझे उसकी संपत्ति नहीं चाहिए।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “फिर भी तुम उसके साथ हो।”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    आरोही ने आरव की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि मैं उससे प्यार करती हूं।”

     

    चारों तरफ खामोशी छा गई।

     

    आरव ने भी उसकी तरफ देखा।

     

    आरोही ने पहली बार सबके सामने अपने दिल की बात कह दी थी।

     

    रुद्र कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर उसने धीरे से कहा,

     

    “यही प्यार तुम्हारी सबसे बड़ी कमजोरी बनेगा।”

     

    आरव ने जवाब दिया,

     

    “और यही हमारा सबसे बड़ा हथियार भी है।”

     

    विराज ने अचानक रुद्र से कहा,

     

    “तुम्हारा असली मकसद क्या है?”

     

    रुद्र उसकी तरफ मुड़ा।

     

    “तुम्हें पता होना चाहिए।”

     

    “नहीं।”

     

    “झूठ।”

     

    “मैं सच कह रहा हूं।”

     

    रुद्र ने बंदूक नीचे की।

     

    “तुम्हें याद है वो रात?”

     

    विराज का चेहरा बदल गया।

     

    “कौन-सी रात?”

     

    “अस्पताल वाली।”

     

    नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “जिस रात दो बच्चों का जन्म हुआ था।”

     

    आरव और आरोही एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    “उस रात तुमने आदेश दिया था कि दोनों बच्चों को खत्म कर दिया जाए।”

     

    आरोही के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “क्या?”

     

    विराज चिल्लाया,

     

    “झूठ!”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “लेकिन नंदिनी ने एक बच्चे को बचा लिया।”

     

    नंदिनी रोते हुए बोलीं,

     

    “मैंने दोनों को बचाने की कोशिश की थी।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    फिर उसने आरव की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारी मां माधवी आरव को लेकर भाग गई थी।”

     

    माधवी की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “हां।”

     

    “और नंदिनी आरोही को लेकर।”

     

    “हां।”

     

    “लेकिन तीसरा आदमी कौन था?”

     

    सब चौंक गए।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तीसरा?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “उस रात वहां एक और बच्चा था।”

     

    अर्जुन ने तुरंत कहा,

     

    “ये झूठ है।”

     

    रुद्र मुस्कुराया।

     

    “तुम जानते हो कि मैं झूठ नहीं बोल रहा।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “तीसरा बच्चा कौन था?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “वही बच्चा जिसकी वजह से आज तुम दोनों की जिंदगी उलझी हुई है।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “सीधे-सीधे बताओ।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “उस बच्चे की पहचान कभी सामने नहीं आई।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उसके रिकॉर्ड बदल दिए गए थे।”

     

    “किसने?”

     

    रुद्र ने विराज की तरफ देखा।

     

    विराज चुप रहा।

     

    रुद्र बोला,

     

    “विराज ने।”

     

    आरोही ने अपने पिता की तरफ देखा।

     

    “आपने?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “मैंने किसी बच्चे को नहीं छुआ।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “तुमने आदेश दिया था।”

     

    विराज चुप रहा।

     

    आरव ने कहा,

     

    “उस बच्चे का क्या हुआ?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “वो बच्चा…”

     

    वह रुक गया।

     

    फिर उसने आरव की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे सामने खड़ा है।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    “क्या?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “तुम्हें हमेशा बताया गया कि तुम माधवी के बेटे हो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “लेकिन तुम्हारा जन्म रिकॉर्ड नकली है।”

     

    माधवी रो पड़ीं।

     

    “नहीं!”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “माधवी ने तुम्हें पाला जरूर है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो मेरी असली मां कौन है?”

     

    रुद्र ने नंदिनी की तरफ देखा।

     

    नंदिनी का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    आरोही ने हैरानी से अपनी मां की तरफ देखा।

     

    “मां?”

     

    नंदिनी ने कांपते हुए कहा,

     

    “आरव…”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “आप…?”

     

    नंदिनी की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “मैं तुम्हें सच बताना चाहती थी।”

     

    आरव की आवाज टूट गई।

     

    “क्या आप मेरी मां हैं?”

     

    नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “हां।”

     

    आरोही जैसे पत्थर बन गई।

     

    “तो…”

     

    उसकी नजर आरव पर गई।

     

    “आरव मेरे भाई हैं?”

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    कुछ पल तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर रुद्र हंस पड़ा।

     

    “अब समझ आया?”

    आरोही धीरे-धीरे आरव से दूर होने लगी।

     

    “नहीं…”

     

    आरव ने कहा,

     

    “आरोही, मेरी बात सुनो।”

     

    “नहीं!”

     

    “हम दोनों के बीच…”

     

    उसकी आवाज रुक गई।

     

    नंदिनी रोते हुए बोलीं,

     

    “तुम दोनों भाई-बहन नहीं हो।”

     

    आरव ने चौंककर उनकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन आपने कहा कि आप मेरी मां हैं।”

     

    नंदिनी ने सिर हिलाया।

     

    “मैं तुम्हारी जैविक मां नहीं हूं।”

     

    रुद्र चुप हो गया।

     

    आरव ने कहा,

     

    “तो फिर?”

     

    नंदिनी ने कांपते हुए कहा,

     

    “मैंने तुम्हें सिर्फ उस रात बचाया था।”

     

    आरव ने गहरी सांस ली।

     

    “तो मेरी असली मां कौन है?”

     

    नंदिनी ने माधवी की तरफ देखा।

     

    माधवी रो रही थीं।

     

    “माधवी ही तुम्हारी मां है।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन रुद्र हंस पड़ा।

     

    “अभी कहानी खत्म नहीं हुई।”

     

    आरव ने गुस्से में पूछा,

     

    “अब क्या?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “तुम्हें सच में लगता है कि मैं यहां सिर्फ तुम्हें डराने आया हूं?”

     

    उसने अपनी जेब से एक पुराना लॉकेट निकाला।

     

    लॉकेट देखकर माधवी अचानक चौंक गईं।

     

    “ये…”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “पहचानती हो?”

     

    माधवी की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “ये मेरे बेटे का था।”

     

    आरव ने लॉकेट की तरफ देखा।

     

    “मेरे पास भी बिल्कुल ऐसा ही लॉकेट था।”

     

    रुद्र मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि ये तुम्हारा था।”

     

    आरव ने लॉकेट अपने हाथ में लिया।

     

    उसके पीछे एक छोटा सा निशान बना था।

     

    ‘A.R.’

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “इसका मतलब?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “आरव राजवंशी।”

     

    रुद्र ने अचानक बंदूक नीचे कर दी।

     

    “मैं तुम्हें मारने नहीं आया।”

     

    आरव ने हैरानी से पूछा,

     

    “तो?”

     

    “मैं तुम्हें सच बताने आया हूं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता ने मेरे साथ भी धोखा किया था।”

     

    शेखर ने कमजोर आवाज में कहा,

     

    “रुद्र…”

     

    रुद्र उनकी तरफ मुड़ा।

     

    “तुम चुप रहो।”

     

    “तुम्हें पूरी सच्चाई नहीं पता।”

     

    “मुझे सब पता है।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    रुद्र चिल्लाया,

     

    “तो बताओ!”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “तुम्हारी बहन की मौत… मेरी वजह से नहीं हुई थी।”

     

    रुद्र के चेहरे पर गुस्सा जम गया।

     

    “क्या?”

     

    “उसकी हत्या विराज ने नहीं की थी।”

     

    विराज ने भी हैरानी से शेखर की तरफ देखा।

     

    “तो किसने?”

     

    शेखर ने कांपते हुए कहा “तुमने खुद।”

     

    रुद्र की आंखें फैल गईं।

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हें याद नहीं… लेकिन उस रात तुम नशे में थे।”

     

    रुद्र पीछे हट गया।

     

    “झूठ!”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “और तुम्हें सच बताने के लिए मैंने तुम्हारी याददाश्त से जुड़े सारे दस्तावेज छुपाए थे।”

     

    रुद्र का हाथ कांपने लगा।

     

    “नहीं…”

     

    अचानक दूर से पुलिस सायरन की आवाज सुनाई दी।

     

    कबीर ने कहा,

     

    “पुलिस आ रही है।”

     

    रुद्र ने चारों तरफ देखा।

     

    “नहीं…”

     

    विराज ने तुरंत अपने आदमियों को पीछे हटने का इशारा किया।

     

    अभय ने मौका देखकर नंदिनी और माधवी को दूसरी तरफ भेज दिया।

     

    आरव ने शेखर को संभाला।

     

    “चलो पापा।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “आरव… लाल फाइल।”

     

    “वो कहां है?”

     

    शेखर ने अपनी जेब से एक छोटी चाबी निकाली।

     

    “नीलगिरी हवेली… कमरा नंबर 17।”

     

    “उसमें क्या है?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “तुम्हारी जिंदगी का आखिरी राज।”

     

    आरव ने चाबी ले ली।

     

    तभी रुद्र ने पीछे से आवाज लगाई—

     

    “आरव!”

     

    आरव पलटा।

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “अगर कमरा नंबर 17 खोला…”

     

    वह कुछ पल रुका।

     

    “तो तुम्हें पता चल जाएगा कि तुम्हारे जन्म के समय तुम्हारी जिंदगी में सबसे बड़ा धोखा किसने दिया था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किसने?”

     

    रुद्र ने माधवी की तरफ देखा।

     

    माधवी के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    आरव ने अपनी मां की तरफ देखा।

     

    “मां…?”

     

    माधवी कुछ नहीं बोलीं।

     

    आरव की आंखों में शक उतर आया।

     

    और उसी समय…

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “जो भी सच होगा… हम साथ जानेंगे।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन अगर सच ने हमें अलग कर दिया तो?”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा “तो मैं उस सच को ही गलत साबित कर दूंगी।”

     

    दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ गए।

     

    पीछे समुद्र की लहरें जोर-जोर से चट्टानों से टकरा रही थीं।

     

    और नीलगिरी हवेली के अंदर…

     

    कमरा नंबर 17 का दरवाजा पहली बार खुलने वाला था।

     

    लेकिन उस कमरे के अंदर क्या था?

     

    एक तस्वीर… एक खून से लिखा खत… और ऐसा राज, जो आरव और आरोही के पूरे रिश्ते को बदलने वाला था।

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 24

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 24

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 24 : क्या विराज ही आरोही का असली पिता है?

     

    विराज की बात सुनकर समुद्र किनारे खड़े सभी लोगों के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “तुम्हारा असली पिता… मैं हूं।”

     

    आरोही की आंखें विराज के चेहरे पर जम गईं।

     

    उसके होंठ कांपने लगे।

     

    “नहीं…”

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “हां, आरोही।”

     

    “आप झूठ बोल रहे हैं।”

     

    “मैं झूठ क्यों बोलूंगा?”

     

    आरोही पीछे हट गई।

     

    “मेरे पिता अर्जुन थे।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “अर्जुन ने तुम्हें पाला था। लेकिन तुम्हें जन्म मैंने दिया।”

     

    अर्जुन अचानक आगे बढ़े।

     

    “विराज!”

     

    विराज ने उनकी तरफ देखा।

     

    “क्यों अर्जुन? अब सच सुनकर डर लग रहा है?”

     

    अर्जुन की आंखों में गुस्सा था।

     

    “तुम्हें पिता कहलाने का कोई अधिकार नहीं है।”

     

    विराज हंस पड़ा।

     

    “खून का रिश्ता अधिकार नहीं मांगता।”

     

    आरव तुरंत आरोही के सामने आकर खड़ा हो गया।

     

    “बस।”

     

    विराज ने उसे देखा।

     

    “तुम बीच में क्यों आ रहे हो?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “क्योंकि वो अकेली नहीं है।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    “आरव… मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “जो भी सच होगा, हम साथ जानेंगे।”

     

    आरव ने नंदिनी की तरफ देखा।

     

    “मां, आप बताइए।”

     

    नंदिनी चुप रहीं।

     

    “क्या विराज सच बोल रहा है?”

     

    नंदिनी की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    उन्होंने धीरे से सिर हिला दिया।

     

    आरोही का दिल टूट गया।

     

    “मतलब…?”

     

    नंदिनी ने कांपती आवाज में कहा,

     

    “हां… विराज तुम्हारा जैविक पिता है।”

     

    आरोही पीछे हट गई।

     

    “नहीं!”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ना चाहा, लेकिन आरोही ने अपना हाथ छुड़ा लिया।

     

    “मेरे पिता अर्जुन थे।”

     

    अर्जुन की आंखों में दर्द था।

     

    “और हमेशा रहेंगे।”

     

    विराज ने कड़वाहट से कहा,

     

    “तुम्हें क्या पता पिता होने का मतलब?”

     

    अर्जुन ने जवाब दिया,

     

    “उतना पता है जितना तुम्हें कभी नहीं होगा।”

     

    “तुमने मेरी बेटी को मुझसे दूर किया।”

     

    “क्योंकि तुम उसके लायक नहीं थे।”

     

    विराज की आंखों में गुस्सा आ गया।

     

    “तुम्हारी वजह से मैंने उसे पच्चीस साल दूर से देखा।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “और मैंने पच्चीस साल उसे तुम्हारी सच्चाई से बचाया।”

     

    आरोही ने दोनों की तरफ देखा।

     

    उसका सिर चकराने लगा।

     

    “मुझे अकेला छोड़ दीजिए…”

     

    वह पीछे हटने लगी।

     

    आरव उसके पास गया।

     

    “आरोही।”

     

    “नहीं आरव।”

     

    “मैं तुम्हारे साथ हूं।”

     

    “मुझे थोड़ी देर अकेले रहना है।”

     

    आरव रुक गया।

     

    लेकिन उसकी नजर आरोही से नहीं हटी।

     

    विराज ने समुद्र की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “तुम्हें लगता है मैं सिर्फ एक खलनायक हूं?”

     

    किसी ने जवाब नहीं दिया।

     

    “नंदिनी और मैं एक-दूसरे से प्यार करते थे।”

     

    नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “फिर?”

     

    “फिर अर्जुन हमारे बीच आ गया।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “झूठ।”

     

    विराज ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम हमेशा यही कहते रहे।”

     

    फिर वह आरोही की तरफ मुड़ा।

     

    “जब तुम्हारी मां को पता चला कि वो तुम्हारे साथ गर्भवती है, मैं उसे अपने साथ ले जाना चाहता था।”

     

    नंदिनी बोलीं,

     

    “तुम मुझे अपने साथ नहीं ले जाना चाहते थे। तुम मुझे अपने कारोबार और ताकत का हिस्सा बनाना चाहते थे।”

     

    विराज चुप हो गया।

     

    नंदिनी आगे बोलीं,

     

    “तुम्हें सिर्फ अपना नाम चाहिए था।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “लेकिन वो मेरी बेटी थी।”

     

    “तुम्हारी बेटी होने से ज्यादा उसे एक इंसान बनने का अधिकार था।”

     

    विराज की आंखों में कुछ पल के लिए दर्द दिखाई दिया।

     

    फिर उसने कहा,

     

    “और मैंने वो अधिकार उसे कभी नहीं दिया?”

     

    नंदिनी ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    आरोही ने अर्जुन की तरफ देखा।

     

    “अगर आप मेरे पिता नहीं थे… तो आपने मुझे इतना प्यार क्यों किया?”

     

    अर्जुन की आंखें भर आईं।

     

    “क्योंकि तुम्हारे जन्म के बाद मैंने तुम्हें पहली बार अपनी बाहों में लिया था।”

     

    “और?”

     

    “उस दिन मैंने तय कर लिया था कि चाहे दुनिया मुझे तुम्हारा पिता माने या न माने… मैं तुम्हारा पिता बनकर रहूंगा।”

     

    आरोही रोने लगी।

     

    “तो आपने मुझे कभी झूठ नहीं बताया?”

     

    अर्जुन चुप हो गए।

     

    आरोही ने फिर पूछा,

     

    “आपने मेरे पिता की सच्चाई मुझसे छुपाई।”

     

    अर्जुन ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मुझे डर था कि विराज तुम्हें ढूंढ लेगा।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “और उसने मुझे ढूंढने नहीं दिया।”

     

    अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि तुम खतरनाक थे।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “मैं आज भी हूं।”

     

    अचानक दूर से गोली चलने की आवाज आई।

     

    धांय!

     

    सब चौंक गए।

     

    गोली पास की चट्टान से टकराई।

     

    अभय ने तुरंत सबको नीचे झुकाया।

     

    “सब नीचे!”

     

    विराज के साथ आए लोग चारों तरफ फैल गए।

     

    कबीर ने बंदूक निकाली।

     

    “हमें यहां से निकलना होगा।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “पहले आरोही।”

     

    आरव ने तुरंत आरोही का हाथ पकड़ा।

     

    “मेरे साथ चलो।”

     

    आरोही इस बार उसके साथ चल पड़ी।

     

    दोनों एक चट्टान के पीछे छिप गए।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मुझे पता है।”

     

    “मेरे पिता…”

     

    “अर्जुन तुम्हारे पिता हैं।”

     

    “लेकिन खून से?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “खून से क्या होता है?”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे लिए?”

     

    “मेरे लिए जिसने मुझे पाला, वो मेरे पिता हैं।”

     

    “और अगर वो भी झूठ निकले?”

     

    आरव ने उसका चेहरा अपनी तरफ किया।

     

    “तो भी मैं तुम्हारे साथ रहूंगा।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू गिरने लगे।

     

    “तुम हमेशा मेरे साथ क्यों रहते हो?”

     

    आरव हल्का सा मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि शायद मैं तुम्हें छोड़ना चाहता ही नहीं।”

     

    आरोही ने धीरे से पूछा,

     

    “अगर हमारे परिवारों की वजह से हमारा रिश्ता गलत साबित हुआ तो?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तो दुनिया से लड़ेंगे।”

     

    “और अगर हमारे परिवार हमें अलग करना चाहें?”

     

    “तो उनसे भी लड़ेंगे।”

     

    “अगर तुम्हारे पिता?”

     

    “उनसे भी।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “और अगर मैं खुद कहूं कि मुझसे दूर चले जाओ?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तब भी पहले पूछूंगा कि तुम सच में चाहती हो या डर की वजह से कह रही हो।”

     

    आरोही हल्का सा मुस्कुराई।

     

    “तुम बहुत जिद्दी हो।”

     

    “तुम्हारे मामले में हूं।”

     

    तभी एक गोली उनके पास से निकल गई।

     

    दोनों तुरंत नीचे झुक गए।

     

    आरव ने आरोही को अपनी बाहों में ढक लिया।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    “हां।”

     

    “पक्का?”

     

    “हां।”

     

    “चलो।”

     

    दूसरी तरफ विराज ने शेखर को घेर लिया था।

     

    “अब भागने का कोई रास्ता नहीं है।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “तुम्हें क्या चाहिए?”

     

    “लाल फाइल।”

     

    शेखर चुप रहा।

     

    “मुझे पता है कि फाइल तुम्हारे पास है।”

     

    “नहीं।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “तो फिर आरव को मार दूंगा।”

     

    शेखर ने पहली बार घबराकर उसकी तरफ देखा।

     

    “उसे हाथ मत लगाना।”

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “यही तो तुम्हारी कमजोरी है।”

     

    “आरव को इसमें मत घसीटो।”

     

    “वो पहले से इसमें है।”

     

    विराज ने बंदूक शेखर की तरफ कर दी।

     

    “फाइल कहां है?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “मेरे पास नहीं।”

     

    “झूठ।”

     

    “मैं सच बोल रहा हूं।”

     

    विराज ने गोली चलाने के लिए उंगली ट्रिगर पर रखी।

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “बंदूक नीचे रखो।”

     

    विराज पलटा।

     

    आरव सामने खड़ा था।

     

    उसके हाथ में बंदूक थी।

     

    आरोही उसके पीछे थी।

     

    विराज हंस पड़ा।

     

    “तुम?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “तुम मुझे गोली मारोगे?”

     

    “अगर जरूरत पड़ी तो।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “अपने पिता के सामने?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मेरे पिता वो हैं जिन्होंने मुझे बचाया।”

     

    शेखर की आंखों में आंसू आ गए।

     

    शेखर ने आरव की तरफ देखा।

     

    “बंदूक नीचे कर दो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि आज कोई आपको नुकसान नहीं पहुंचाएगा।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “तुम्हें अपनी जिंदगी खतरे में नहीं डालनी चाहिए।”

     

    आरव ने जवाब दिया,

     

    “आपने मेरी जिंदगी बचाने के लिए पच्चीस साल अकेले गुजारे। आज मेरी बारी है।”

     

    शेखर की आंखों से आंसू गिर पड़े।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मैंने आपको पिता मान लिया है।”

     

    विराज ने ताना मारा,

     

    “इतनी जल्दी?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “खून से नहीं… कर्म से।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “बहुत भावुक हो गए।”

     

    फिर उसने आरोही की तरफ देखा।

     

    “लेकिन तुम्हें एक बात नहीं पता।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “लाल फाइल में सिर्फ तुम्हारे पिता का सच नहीं है।”

     

    “तो?”

     

    “उसमें तुम्हारी मां की मौत का सच भी है।”

     

    आरोही की सांस रुक गई।

     

    “मेरी मां?”

     

    विराज ने नंदिनी की तरफ देखा।

     

    “नंदिनी ने तुम्हें बताया कि वो तुमसे दूर क्यों हुई?”

     

    आरोही ने मां की तरफ देखा।

     

    नंदिनी चुप थीं।

     

    विराज ने कहा,

     

    “क्योंकि उसने तुम्हें बचाने के लिए नहीं…”

     

    वह थोड़ा रुका।

     

    “बल्कि क्योंकि उसने तुम्हारे जन्म की रात एक ऐसा काम किया था, जिसकी सजा उसे आज तक भुगतनी पड़ रही है।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या काम?”

     

    नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “आरोही…”

     

    “मां, सच बताइए।”

     

    नंदिनी रोते हुए बोलीं,

     

    “मैंने उस रात…”

     

    वह आगे बोल नहीं पाईं।

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “नंदिनी, अभी नहीं।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “नहीं! आज सब सच बताइए।”

     

    नंदिनी ने कांपती आवाज में कहा “तुम्हारे जन्म के कुछ मिनट बाद मैंने अस्पताल से एक और बच्चा उठाया था।”

     

    आरव और आरोही दोनों स्तब्ध रह गए।

     

    “दूसरा बच्चा?”

     

    नंदिनी ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किसका?”

     

    नंदिनी ने उसकी तरफ देखा।

     

    उनकी आंखों में डर था।

     

    “आरव का।”

     

    आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “मेरा?”

     

    नंदिनी ने कहा “तुम्हें तुम्हारी मां से अलग करके मैंने ही दूसरी जगह पहुंचाया था।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    माधवी की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “नंदिनी… तुमने ऐसा क्यों किया?”

     

    नंदिनी रोते हुए बोलीं “क्योंकि उस रात किसी ने मुझे मजबूर किया था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किसने?”

     

    नंदिनी ने कांपते हुए विराज की तरफ देखा।

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “अब सच सामने आ गया।”

     

    आरव की आंखों में गुस्सा भर गया।

     

    “तुमने मेरी मां से मुझे छीन लिया?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    उसने धीरे से कहा “मैंने सिर्फ आदेश दिया था।”

     

    आरव ने बंदूक कसकर पकड़ ली।

     

    और तभी…

     

    पीछे से एक और गोली चली।

     

    इस बार गोली…

     

    शेखर के सीने में जा लगी।

     

    “पापा!”

     

    आरव चीख उठा।

     

    शेखर जमीन पर गिर पड़े।

     

    आरोही ने भी चीख मार दी।

     

    नंदिनी रोने लगीं।

     

    विराज ने तुरंत पीछे देखा।

     

    लेकिन गोली चलाने वाला…

     

    विराज का आदमी नहीं था।

     

    वह आदमी अंधेरे से बाहर आया।

     

    उसके हाथ में बंदूक थी।

     

    और उसने कहा “अब अगला नंबर आरव का है।”

     

    आरव ने शेखर को संभालते हुए ऊपर देखा।

     

    उस आदमी का चेहरा देखकर…

     

    विराज भी स्तब्ध रह गया।

     

    “तुम…?”

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 23

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 23

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 23 : “जिसे पिता समझा, वही मेरा दुश्मन निकला?”

     

    नीलगिरी हवेली के उस गुप्त कमरे में चारों तरफ धुआं फैल चुका था।

     

    दरवाजा टूटकर जमीन पर पड़ा था।

     

    सामने खड़ा आदमी धीरे-धीरे कमरे के अंदर आया।

     

    उसकी नजर सबसे पहले आरोही पर पड़ी।

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “आखिरकार… इतने सालों बाद मेरी बेटी मेरे सामने खड़ी है।”

     

    आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “आप… मेरे पिता हैं?”

     

    उस आदमी ने कहा,

     

    “हां।”

     

    शेखर तुरंत आरोही के सामने आकर खड़े हो गए।

     

    “इसके पास मत जाना।”

     

    वह आदमी हंस पड़ा।

     

    “तुम अब भी मुझे इससे दूर रखोगे?”

     

    शेखर ने गुस्से में कहा,

     

    “तुमने इसे पैदा किया होगा, लेकिन पिता कहलाने का अधिकार तुम्हें नहीं है।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “मुझे सच चाहिए।”

     

    उस आदमी ने कहा,

     

    “सच यही है कि मैं तुम्हारा पिता हूं।”

     

    आरव ने गुस्से में कहा,

     

    “और इतने सालों तक कहां थे?”

     

    उस आदमी ने आरव की तरफ देखा।

     

    “तुम बीच में मत बोलो।”

     

    आरव एक कदम आगे बढ़ा।

     

    “ये मेरी जिंदगी है। मैं बीच में बोलूंगा।”

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “आरव…”

     

    वह आदमी मुस्कुराया।

     

    “तुम दोनों एक-दूसरे के बहुत करीब आ चुके हो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “इससे तुम्हें क्या?”

     

    “बहुत कुछ।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “आरोही, मेरी बात सुनो। ये आदमी तुम्हें सिर्फ अपने मकसद के लिए इस्तेमाल करना चाहता है।”

     

    आरोही ने शेखर की तरफ देखा।

     

    “लेकिन अगर ये सच में मेरे पिता हैं तो?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “खून का रिश्ता हमेशा पिता का रिश्ता नहीं बनाता।”

     

    उस आदमी ने गुस्से में शेखर की तरफ देखा।

     

    “तुमने ये अधिकार कब से हासिल कर लिया?”

     

    शेखर ने जवाब दिया,

     

    “जिस दिन मैंने इसकी जान बचाई थी।”

     

    आरोही ने कांपती आवाज में पूछा,

     

    “आपका नाम क्या है?”

     

    कुछ पल तक वह आदमी चुप रहा।

     

    फिर बोला “अभय राजवंशी।”

     

    कमरे में मौजूद राघव और अर्जुन दोनों चौंक गए।

     

    राघव के मुंह से निकला,

     

    “अभय…!”

     

    अभय ने उनकी तरफ देखा।

     

    “हां राघव। इतने साल बाद भी मेरा नाम याद है?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “तुम्हें मर जाना चाहिए था।”

     

    अभय हंस पड़ा।

     

    “ये बात तुम्हारे भाई शेखर ने भी कही थी।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा,

     

    “तुम शेखर के भाई हो?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    सब चौंक गए।

     

    अभय ने आगे कहा “मैं शेखर का सौतेला भाई हूं।”

     

    अभय ने धीरे-धीरे अपनी कहानी बतानी शुरू की।

     

    “मेरे पिता और शेखर के पिता अलग थे। लेकिन एक ही परिवार में पले-बढ़े।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “अभय, पुरानी बातें मत दोहराओ।”

     

    “क्यों नहीं?”

     

    अभय ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आज आरव और आरोही को सब पता चलना चाहिए।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “तुम दोनों की जिंदगी सिर्फ तुम्हारे माता-पिता की वजह से नहीं बदली।”

     

    “फिर किस वजह से?”

     

    “एक विरासत की वजह से।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कैसी विरासत?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “राजवंशी परिवार की ऐसी संपत्ति, जिसका राज सिर्फ परिवार के कुछ लोगों को पता था।”

     

    राघव ने कहा,

     

    “वो संपत्ति नहीं थी।”

     

    अभय हंसा।

     

    “तुम अब भी इसे छुपा रहे हो?”

     

    राघव चुप हो गए।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या छुपा रहे हैं?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “तुम्हारे जन्म से पहले राजवंशी परिवार के पास एक गुप्त ट्रस्ट था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “और उसका वारिस?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “तुम।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    “मैं?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “क्योंकि शेखर ने अपनी पूरी संपत्ति तुम्हारे नाम कर दी थी।”

     

    शेखर ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “मैंने वो संपत्ति इसलिए दी थी ताकि मेरे बाद आरव सुरक्षित रहे।”

     

    अभय ने कहा,

     

    “लेकिन मुझे वो सब चाहिए था।”

     

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “तो इसमें मेरा क्या संबंध है?”

     

    अभय उसकी तरफ देखकर बोला,

     

    “तुम्हारी मां नंदिनी उस ट्रस्ट की दूसरी संरक्षक थीं।”

     

    आरोही ने मां की तरफ देखा।

     

    “मां?”

     

    नंदिनी ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    “आपने मुझे कभी क्यों नहीं बताया?”

     

    “क्योंकि अगर तुम्हें पता चल जाता तो अभय तुम्हें ढूंढ लेता।”

     

    अभय ने कहा,

     

    “मैंने तुम्हें ढूंढ लिया।”

     

    नंदिनी ने गुस्से में कहा,

     

    “तुम्हें मेरी बेटी नहीं चाहिए। तुम्हें उसका अधिकार चाहिए।”

     

    अभय ने कहा,

     

    “मुझे दोनों चाहिए।”

     

    आरव आगे बढ़ा।

     

    “तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा।”

     

    अभय ने बंदूक उठाई।

     

    “आरव, मुझे मजबूर मत करो।”

     

    आरोही तुरंत आरव के सामने आ गई।

     

    “उन्हें गोली मत मारना।”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “यही तो जानता था।”

     

    आरव ने आरोही से कहा,

     

    “मेरे सामने मत आओ।”

     

    “मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगी।”

     

    “आरोही…”

     

    “नहीं।”

     

    अभय दोनों को देखता रहा।

     

    फिर अचानक उसने बंदूक नीचे कर दी।

     

    “तुम दोनों का प्यार मेरे लिए बहुत उपयोगी है।”

     

    आरव ने गुस्से में कहा,

     

    “हमारा प्यार तुम्हारे किसी काम नहीं आएगा।”

     

    अभय ने कहा,

     

    “देखते हैं।”

     

    अभय ने एक फाइल निकाली।

     

    “इसमें तुम्हारे जन्म के सारे दस्तावेज हैं।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मुझे नहीं चाहिए।”

     

    “लेकिन तुम्हें चाहिए।”

     

    अभय ने फाइल आरोही की तरफ बढ़ाई।

     

    “क्योंकि इसमें तुम्हारे रिश्ते का सच भी है।”

     

    आरोही ने फाइल लेने के लिए हाथ बढ़ाया।

     

    आरव ने उसका हाथ रोक दिया।

     

    “अभी नहीं।”

     

    अभय ने कहा,

     

    “क्यों डर रहे हो?”

     

    “मुझे किसी बात का डर नहीं।”

     

    “तो फिर सच देखने से क्यों बच रहे हो?”

     

    आरव ने फाइल ले ली।

     

    उसने पहला पन्ना खोला।

     

    आरोही उसके पास खड़ी थी।

     

    पन्ने पर उनके जन्म की तारीख लिखी थी।

     

    दोनों की तारीख एक ही थी।

     

    फिर अगला पन्ना।

     

    दोनों के जन्मस्थान का नाम एक ही था।

     

    फिर तीसरा पन्ना।

     

    उसमें लिखा था “दोनों बच्चों की सुरक्षा एक ही परिवार के जिम्मे रहेगी।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “इसमें तो कुछ गलत नहीं है।”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “आखिरी पन्ना पढ़ो।”

     

    आरव ने आखिरी पन्ना खोला।

     

    उस पर सिर्फ एक लाइन थी—

     

    “इन दोनों बच्चों को कभी यह नहीं बताया जाएगा कि वे एक-दूसरे से किस रिश्ते में जुड़े हैं।”

     

    आरोही का चेहरा बदल गया।

     

    “कौन-सा रिश्ता?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “यही तो तुम्हें जानना है।”

     

    शेखर अचानक बोले,

     

    “अभय, अब बहुत हो गया।”

     

    अभय ने उनकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें सच बताना पड़ेगा।”

     

    शेखर कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर उन्होंने आरव और आरोही की तरफ देखा।

     

    “तुम दोनों के बीच खून का कोई रिश्ता नहीं है।”

     

    आरोही ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन शेखर ने आगे कहा “लेकिन तुम दोनों के परिवारों के बीच एक बहुत पुराना रिश्ता है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कैसा?”

     

    “तुम्हारे पिता और आरोही के पिता…”

     

    शेखर रुक गए।

     

    अभय ने बात पूरी की “एक ही मां के बेटे थे।”

     

    आरोही चौंक गई।

     

    “मतलब?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “तुम्हारे पिता और मेरे पिता…”

     

    वह रुक गया।

     

    फिर बोला “एक ही परिवार से थे।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तो इससे हमारे रिश्ते पर क्या असर पड़ता है?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “कुछ नहीं।”

     

    अभय ने हंसकर कहा,

     

    “लेकिन आगे की बात सुनो।”

     

    उसने दूसरी फाइल खोली।

     

    “आरोही के पिता की पहचान अभी पूरी तरह सामने नहीं आई है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “क्योंकि उसके जन्म रिकॉर्ड में पिता का नाम बदला गया था।”

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    “किसने बदला?”

     

    अभय ने शेखर की तरफ देखा।

     

    “शेखर ने।”

     

    आरोही ने शेखर की तरफ देखा।

     

    “आपने?”

     

    शेखर ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    आरोही ने मां की तरफ देखा।

     

    “मां, सच क्या है?”

     

    नंदिनी की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “मैं तुम्हें सच बताना चाहती थी।”

     

    “तो बताइए।”

     

    “लेकिन तुम्हारी जान खतरे में थी।”

     

    “फिर भी… मुझे जानने का हक था।”

     

    नंदिनी ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    उन्होंने धीरे से कहा,

     

    “तुम्हारे जन्म के समय तुम्हारे पिता का नाम रिकॉर्ड में कुछ और था।”

     

    “कौन?”

     

    नंदिनी ने होंठ खोले।

     

    लेकिन अचानक बाहर गोली चली।

     

    धांय!

     

    कमरे की खिड़की का शीशा टूट गया।

     

    अभय ने तुरंत नंदिनी को पीछे खींच लिया।

     

    शेखर चिल्लाए “सब नीचे!”

     

    दूसरी गोली चली।

     

    इस बार अभय के कंधे को छूती हुई निकल गई।

     

    अभय पीछे हट गया।

     

    “वो यहां कैसे पहुंच गए?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “विराज!”

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    उन्होंने बाहर देखा।

     

    “ये विराज नहीं है।”

     

    हवेली के बाहर कई गाड़ियों की आवाज सुनाई देने लगी।

     

    कबीर ने खिड़की से देखा।

     

    “बहुत सारे लोग हैं।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “हमें यहां से निकलना होगा।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “पीछे का रास्ता बंद है।”

     

    राघव ने पूछा,

     

    “तो क्या करें?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “मेरे साथ आओ।”

     

    आरव ने तुरंत कहा,

     

    “मैं तुम्हारे साथ नहीं आऊंगा।”

     

    अभय ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें मेरी जरूरत पड़ेगी।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि जो लोग बाहर हैं, वो मुझे नहीं…”

     

    उसने आरोही की तरफ देखा।

     

    “उसे लेने आए हैं।”

     

    आरोही का चेहरा डर से सफेद पड़ गया।

     

    आरव उसके सामने खड़ा हो गया।

     

    “कोई उसे हाथ भी नहीं लगाएगा।”

     

    अभय ने कहा,

     

    “तो फिर मेरे साथ चलो।”

     

    आरव ने कुछ पल सोचा।

     

    फिर उसने आरोही का हाथ पकड़ा।

     

    “हम साथ चलेंगे।”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “यही सही फैसला है।”

     

    अभय उन्हें कमरे के पीछे एक और दरवाजे तक ले गया।

     

    दरवाजा खुला तो नीचे जाने वाली लंबी सुरंग दिखाई दी।

     

    नंदिनी ने हैरानी से कहा,

     

    “ये सुरंग अभी तक बंद थी।”

     

    अभय बोला,

     

    “मैंने इसे कभी बंद नहीं किया।”

     

    सब लोग सुरंग में उतरने लगे।

     

    आरव सबसे पीछे था।

     

    आरोही उसके साथ थी।

     

    अचानक आरोही का पैर फिसल गया।

     

    आरव ने उसे पकड़ लिया।

     

    “संभलकर।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अगर तुम नहीं होते तो मैं गिर जाती।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “मैं हूं ना।”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “हमेशा रहना।”

     

    आरव ने उसका हाथ अपने हाथ में लेकर कहा,

     

    “ये वादा है।”

     

    दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर आगे चलने लगे।

     

    लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उनके पीछे…

     

    कोई और भी सुरंग में उतर चुका था।

     

    कुछ देर बाद वे सुरंग के आखिरी हिस्से में पहुंचे।

     

    वहां एक बड़ा लोहे का दरवाजा था।

     

    अभय ने दरवाजा खोला।

     

    सामने समुद्र का किनारा था।

     

    सब बाहर निकल आए।

     

    राघव ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन तभी पीछे से आवाज आई “बहुत अच्छा रास्ता है।”

     

    सब पलट गए।

     

    सुरंग के मुहाने पर विराज खड़ा था।

     

    उसके हाथ में बंदूक थी।

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “तुम सब सोच रहे थे कि मुझसे बच जाओगे?”

     

    आरव ने आरोही को अपने पीछे कर लिया।

     

    विराज ने कहा,

     

    “आज सिर्फ एक चीज चाहिए मुझे।”

     

    “क्या?”

     

    विराज ने आरोही की तरफ इशारा किया।

     

    “ये लड़की।”

     

    अभय ने गुस्से में कहा,

     

    “विराज, उसे हाथ लगाया तो…”

     

    विराज हंस पड़ा।

     

    “अभय, तुम अब भी समझते हो कि फैसला तुम्हारा है?”

     

    अभय चौंक गया।

     

    “क्या मतलब?”

     

    विराज ने अपनी जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

     

    उसने तस्वीर अभय की तरफ फेंकी।

     

    अभय ने तस्वीर उठाई।

     

    तस्वीर देखकर उसका चेहरा बदल गया।

     

    “नहीं…”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या है?”

     

    अभय ने तस्वीर आरव को दी।

     

    तस्वीर में एक बच्चा था।

     

    और उसके साथ खड़ी थी…

     

    आरोही की मां नंदिनी।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे लिखा था “असली पिता – अभय नहीं।”

     

    आरव ने हैरानी से नंदिनी की तरफ देखा।

     

    नंदिनी रो पड़ीं।

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “अब बताओ आरोही…”

     

    वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    “क्या तुम जानना चाहती हो कि तुम्हारा असली पिता कौन है?”

     

    आरोही ने कांपती आवाज में पूछा “कौन?”

     

    विराज ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा “जिसे तुम आज तक अपना दुश्मन समझती रही हो…”

     

    आरव ने नंदिनी की तरफ देखा।

     

    नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    और विराज ने आखिरी शब्द कहे “तुम्हारा असली पिता… मैं हूं।”

     

    आरोही के हाथ से तस्वीर गिर गई।

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 22

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 22

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 22 : जिसे भाई समझा, वही सबसे बड़ा राज था

     

    नीलगिरी हवेली के उस गुप्त कमरे में अचानक ऐसी खामोशी छा गई थी कि सबकी सांसों की आवाज तक साफ सुनाई दे रही थी।

     

    सामने खड़ा आदमी खुद को शेखर का भाई बता रहा था।

     

    आरव उसकी तरफ देखता रह गया।

     

    “तुम… शेखर के भाई हो?”

     

    उस आदमी के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

     

    “हां।”

     

    राघव ने गुस्से में कहा,

     

    “झूठ बोलना बंद करो!”

     

    आदमी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “राघव, तुम अब भी मुझे पहचानने से इनकार कर रहे हो?”

     

    राघव की आंखें फैल गईं।

     

    “तुम…”

     

    माधवी ने कांपते हुए कहा,

     

    “विक्रम…”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “विक्रम कौन?”

     

    माधवी ने धीमे से कहा,

     

    “शेखर का छोटा भाई।”

     

    आरव की नजर उस आदमी पर टिक गई।

     

    “अगर तुम विक्रम हो… तो इतने सालों तक कहां थे?”

     

    विक्रम हंस पड़ा।

     

    “जहां मुझे होना चाहिए था।”

     

    “कहां?”

     

    “तुम्हारे आसपास।”

     

    आरव के चेहरे पर उलझन थी।

     

    “मतलब?”

     

    विक्रम ने एक कदम आगे बढ़ाया।

     

    “तुम्हें लगता है तुम्हारी जिंदगी में जो कुछ हुआ, वो सब अचानक हुआ?”

     

    आरव ने कुछ नहीं कहा।

     

    विक्रम बोला,

     

    “तुम्हारी हर परेशानी, हर हादसा, हर वो इंसान जो अचानक तुम्हारी जिंदगी में आया… उसके पीछे किसी न किसी का हाथ था।”

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तो तुमने हमें कब से देखा?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “बहुत पहले से।

     

    राघव ने गुस्से में कहा,

     

    “तुमने इतने सालों तक हमें क्यों नहीं छोड़ा?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “क्योंकि मुझे शेखर की तलाश थी।”

     

    “तुम्हें शेखर से क्या चाहिए था?”

     

    “उसकी मौत।”

     

    माधवी चौंक गईं।

     

    “तुम अपने ही भाई को मारना चाहते थे?”

     

    विक्रम की आंखों में गुस्सा भर आया।

     

    “क्योंकि उसने मेरे साथ धोखा किया था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कैसा धोखा?”

     

    विक्रम ने कुछ पल उसे देखा।

     

    “तुम्हें सच जानना है?”

     

    “हां।”

     

    “तो पहले ये समझो कि तुम्हारे पिता सिर्फ तुम्हारे पिता नहीं थे।”

     

    “फिर?”

     

    “वो उस संगठन के मुखिया थे जिसने हमारे पूरे परिवार की जिंदगी बदल दी।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन-सा संगठन?”

     

    विक्रम चुप रहा।

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “विक्रम, अब ये सब बताने का समय आ गया है।”

     

    विक्रम ने उनकी तरफ देखा।

     

    “तुम भी यहां हो?”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “हां।”

     

    विक्रम हंस पड़ा।

     

    “तो फिर आज बहुत सारे पुराने हिसाब पूरे होंगे।”

     

    विक्रम ने दीवार पर लगे पुराने प्रोजेक्टर को देखा।

     

    उसने एक बटन दबाया।

     

    स्क्रीन फिर से जल उठी।

     

    इस बार शेखर सामने नहीं थे।

     

    बल्कि एक पुरानी तस्वीर दिखाई दी।

     

    उसमें शेखर, विक्रम, राघव और अर्जुन एक साथ खड़े थे।

     

    आरव ने तस्वीर देखकर पूछा,

     

    “आप सब एक-दूसरे को पहले से जानते थे?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “कितने सालों से?”

     

    “तुम्हारे जन्म से भी पहले।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “फिर ये सब छुपाया क्यों गया?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “क्योंकि हम सबने एक गलती की थी।”

     

    “क्या?”

     

    राघव ने सिर झुका लिया।

     

    “हमने शेखर पर भरोसा किया।”

     

    विक्रम ने कड़वाहट से कहा,

     

    “और वही हमारी सबसे बड़ी गलती थी।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “शेखर ने क्या किया?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “उसने अपनी मौत का नाटक किया।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “क्या?”

     

    “हां।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    “क्योंकि उसे पता चल गया था कि कोई उसके पीछे पड़ा है।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “वो सिर्फ अपने लिए नहीं छिपा था।”

     

    विक्रम ने तुरंत कहा,

     

    “हां! वो आरव और आरोही को बचाने के लिए छिपा था।”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “मुझे भी?”

     

    विक्रम ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां।”

     

    विक्रम ने एक पुरानी फाइल निकाली।

     

    “तुम दोनों का जन्म एक ही रात हुआ था।”

     

    आरव और आरोही एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    “लेकिन तुम्हें नहीं पता कि उसी रात क्या हुआ था।”

     

    विक्रम ने फाइल खोली।

     

    “अस्पताल में आग लगाई गई थी।”

     

    माधवी की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “हां।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “किसने?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “विराज ने।”

     

    आरव ने गुस्से में कहा,

     

    “लेकिन वो क्यों?”

     

    “क्योंकि उस अस्पताल में तुम्हारे जन्म का रिकॉर्ड था।”

     

    “सिर्फ हमारा रिकॉर्ड?”

     

    “नहीं।”

     

    विक्रम ने फाइल का एक पन्ना उठाया।

     

    “एक ऐसा रिकॉर्ड भी था जो साबित कर सकता था कि विराज ने करोड़ों रुपये का घोटाला किया था।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “इसलिए उसने अस्पताल में आग लगाई।”

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “लेकिन हम दोनों को किसने बचाया?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “तुम्हारी मां माधवी और नंदिनी ने।”

     

    आरोही ने मां की तरफ देखा।

     

    “मां?”

     

    नंदिनी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “उस रात मैं तुम्हें लेकर भागी थी।”

     

    माधवी बोलीं,

     

    “और मैं आरव को लेकर।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “फिर?”

     

    नंदिनी ने कहा,

     

    “फिर हम अलग हो गए।”

     

    आरव ने अपनी मां का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मां, आपने मुझे इतने साल क्यों नहीं बताया?”

     

    माधवी ने रोते हुए कहा,

     

    “क्योंकि हमें डर था कि अगर तुम्हें सच पता चला तो वो लोग तुम्हें फिर ढूंढ लेंगे।”

     

    “कौन लोग?”

     

    माधवी ने विक्रम की तरफ देखा।

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “वही लोग जिनके लिए आज भी तुम दोनों सबसे बड़ा खतरा हो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “लेकिन अब मैं डरूंगा नहीं।”

     

    विक्रम मुस्कुराया।

     

    “यही तो देखना चाहता था।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “कि तुम दोनों डरते हो या लड़ते हो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “हम लड़ेंगे।”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “तो फिर तुम्हें शेखर तक पहुंचना होगा।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा,

     

    “वो कहां हैं?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “यहीं।”

     

    विक्रम उन्हें हवेली के एक पुराने हिस्से में ले गया।

     

    वहां एक बड़ी किताबों की अलमारी थी।

     

    उसने एक किताब निकाली।

     

    अलमारी धीरे-धीरे पीछे हट गई।

     

    पीछे एक संकरी सीढ़ी दिखाई दी।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “ये रास्ता कहां जाता है?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “उस कमरे तक जहां शेखर पिछले दो सालों से छिपा है।”

     

    आरव की धड़कन तेज हो गई।

     

    “दो साल?”

     

    “हां।”

     

    “और आपने हमें क्यों नहीं बताया?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “क्योंकि पहले मुझे यकीन करना था कि तुम सच में उसके बेटे हो।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम्हें अब यकीन है?”

     

    विक्रम ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “अब पूरा यकीन है।”

     

    सब लोग सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे।

     

    सबसे आगे विक्रम था।

     

    उसके पीछे आरव और आरोही।

     

    फिर राघव, माधवी, नंदिनी, अर्जुन और कबीर।

     

    सीढ़ियों के आखिर में एक लोहे का दरवाजा था।

     

    विक्रम ने दरवाजे पर तीन बार दस्तक दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    अंदर से कोई जवाब नहीं आया।

     

    विक्रम ने फिर दस्तक दी।

     

    इस बार अंदर से आवाज आई “कौन?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “मैं हूं।”

     

    कुछ पल खामोशी रही।

     

    फिर आवाज आई “तुम अकेले हो?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “कौन है?”

     

    विक्रम ने आरव की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारा बेटा।”

     

    दरवाजे के पीछे अचानक खामोशी छा गई।

     

    फिर…

     

    क्लिक।

     

    दरवाजा खुल गया।

     

    कमरे में बहुत कम रोशनी थी।

     

    एक आदमी खिड़की के पास खड़ा था।

     

    उसके बाल थोड़े सफेद हो चुके थे।

     

    चेहरा थका हुआ था।

     

    लेकिन आंखें…

     

    आरव की आंखों जैसी।

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “शेखर…”

     

    आदमी पलटा।

     

    आरव और शेखर की नजरें मिलीं।

     

    दोनों कुछ पल तक कुछ नहीं बोले।

     

    फिर शेखर की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “आरव…”

     

    आरव के कदम वहीं रुक गए।

     

    शेखर धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़े।

     

    “मैंने तुम्हें पहली बार देखा था… जब तुम सिर्फ कुछ घंटे के थे।”

     

    आरव की आंखें भर आईं।

     

    “फिर मुझे छोड़ क्यों दिया?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “मैंने तुम्हें नहीं छोड़ा।”

     

    “फिर?”

     

    “मैंने तुम्हें बचाया।”

     

    आरव की आवाज भर्रा गई।

     

    “मेरे बिना रहे?”

     

    “हर दिन।”

     

    शेखर ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।

     

    आरव कुछ पल खड़ा रहा।

     

    फिर उसने धीरे से उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    शेखर ने उसे अपने सीने से लगा लिया।

     

    दोनों की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    माधवी यह देखकर रो पड़ीं।

     

    राघव भी नजरें झुका गए।

     

    आरोही चुपचाप दोनों को देखती रही।

     

    कुछ देर बाद शेखर ने आरव से कहा,

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किस बात के लिए?”

     

    “तुम्हारा बचपन तुमसे छीनने के लिए।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “आपने मुझे बचाया था।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “लेकिन अब एक और सच तुम्हें जानना होगा।”

     

    आरव ने उनकी तरफ देखा।

     

    “क्या?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “तुम्हारे जन्म के बाद मैंने तुम्हें एक नाम दिया था।”

     

    “कौन सा?”

     

    शेखर ने कहा “आरव राजवंशी नहीं।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    शेखर ने आगे कहा,

     

    “तुम्हारा असली नाम था…”

     

    अचानक कमरे की लाइट बंद हो गई।

     

    सब चौंक गए।

     

    कबीर ने तुरंत दरवाजा बंद किया।

     

    बाहर से गोली चलने की आवाज आई।

     

    धांय!

     

    शेखर ने आरव को नीचे खींच लिया।

     

    “सब नीचे!”

     

    अगली गोली दीवार में जा लगी।

     

    आरोही चीख उठी।

     

    “आरव!”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मैं ठीक हूं।”

     

    शेखर ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    “वो यहां तक पहुंच गए।”

     

    विक्रम ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    शेखर ने गंभीर आवाज में कहा “विराज नहीं…”

     

    उन्होंने बाहर अंधेरे में देखा।

     

    “इस बार… खुद शेखर को मारने वाला आया है।”

     

    आरव ने चौंककर पूछा,

     

    “कौन?”

     

    शेखर ने धीरे से उसकी तरफ देखा।

     

    उनकी आंखों में डर था।

     

    “तुम्हारा दूसरा पिता।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    “दूसरा… पिता?”

     

    शेखर ने कहा “तुम्हें ये जानना होगा कि तुम्हें जन्म देने वाला कौन था… और तुम्हें पालने वाला कौन।”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “मतलब?”

     

    शेखर ने जवाब दिया “आरव का जन्म दो परिवारों के राज से हुआ था।”

     

    तभी दरवाजा जोर से हिलने लगा।

     

    धड़ाम!

     

    कोई बाहर से उसे तोड़ने की कोशिश कर रहा था।

     

    शेखर ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “अगर मैं आज नहीं बचा… तो नीलगिरी हवेली के नीचे छुपी लाल फाइल ढूंढना।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “उसमें क्या है?”

     

    शेखर ने कहा “तुम्हारे जन्म का वो सच… जो तुम्हें और आरोही को हमेशा के लिए एक-दूसरे से अलग भी कर सकता है।”

     

    आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “क्या?”

     

    और तभी…

     

    दरवाजा टूटकर जमीन पर गिर गया।

     

    धुएं के बीच एक परिचित चेहरा सामने आया।

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    वह आदमी मुस्कुराया और बोला “बहुत हो गया पिता-पुत्र का मिलन… अब मेरी बेटी को मेरे साथ भेज दो।”

     

    आरोही के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “बेटी…?”

     

    शेखर ने घबराकर कहा “आरोही… इसके पास मत जाना। यही तुम्हारा असली पिता है।”

     

    जारी रहेगा…