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  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 41 :

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 41 :

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 41 : डॉक्टर का आखिरी सच

     

     

    “अब असली खेल शुरू होगा।”

     

    शेखर की आवाज तहखाने की दीवारों से टकराकर गूंज उठी।

     

    लेकिन आरव का ध्यान शेखर पर नहीं था।

     

    उसके कानों में सिर्फ एक आवाज गूंज रही थी—

     

    “आरव!”

     

    माधवी की चीख।

     

    आरव का चेहरा अचानक सफेद पड़ गया।

     

    “मां!”

     

    वह सीढ़ियों की तरफ बढ़ा, लेकिन शेखर ने तुरंत उसके सामने बंदूक तान दी।

     

    “एक कदम भी आगे बढ़ाया तो तुम्हारी मां को खो दोगे।”

     

    आरव रुक गया।

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “आरव, पहले सोचो।”

     

    आरव ने शेखर को घूरते हुए कहा—

     

    “अगर मेरी मां को कुछ हुआ ना, तो मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करूंगा।”

     

    शेखर ने ठंडी हंसी हंसी।

     

    “मुझे तुम्हारी माफी चाहिए भी नहीं।”

     

    अमन आगे आया।

     

    “मां को क्यों लाए हो?”

     

    शेखर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि तुम तीनों को एक साथ लाने के लिए मुझे किसी ऐसे इंसान की जरूरत थी, जिसे तुम तीनों दिल से अपना मानते हो।”

     

    विहान ने गुस्से में कहा—

     

    “आपने उन्हें हाथ भी लगाया तो…”

     

    शेखर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम अभी भी मुझे अपना पिता नहीं मानते?”

     

    विहान ने कहा—

     

    “पिता वो होता है जो अपने बच्चों को बचाए, कैद नहीं करे।”

     

    शेखर के चेहरे पर कुछ पल के लिए दर्द आया।

     

    लेकिन उसने तुरंत अपना चेहरा कठोर कर लिया।

     

    “तुम्हें बहुत कुछ नहीं पता, विहान।”

     

     

     

    डॉक्टर का सच

     

    आरव ने डॉक्टर की तरफ देखा।

     

    “आपने कहा था कि आपने धोखा दिया।”

     

    डॉक्टर ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    “लेकिन शेखर के लिए नहीं।”

     

    “नहीं।”

     

    “तो किसके लिए?”

     

    डॉक्टर ने गहरी सांस ली।

     

    “तुम तीनों के लिए।”

     

    आरव की आंखों में गुस्सा था।

     

    “आपने हमें सच से दूर रखा।”

     

    “क्योंकि सच तुम्हारी जान ले सकता था।”

     

    “और झूठ?”

     

    डॉक्टर की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “झूठ ने तुम्हारी जिंदगी जरूर छीन ली… लेकिन तुम्हारी सांसें बचाए रखीं।”

     

    आरव कुछ नहीं बोला।

     

    डॉक्टर ने आगे कहा—

     

    “पच्चीस साल पहले शेखर को पता चल गया था कि उसकी तीनों संतानें उसके खिलाफ जा सकती हैं।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “इसलिए उसने हमें अलग कर दिया?”

     

    “हां।”

     

    “लेकिन आपने हमारी यादें क्यों मिटाईं?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “क्योंकि शेखर के लोग तुम्हारे पीछे लगे थे। अगर तुम्हें सब याद रहता तो वे तुम्हें ढूंढ लेते।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो आपने मेरी याददाश्त क्यों खत्म नहीं की?”

     

    डॉक्टर ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

     

    “मैंने तुम्हारी सारी यादें नहीं मिटाईं।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “क्या?”

     

    “मैंने सिर्फ कुछ खास यादों को दबाया।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मुझे पता था कि एक दिन तुम्हें उनकी जरूरत पड़ेगी।”

     

    डॉक्टर ने संदूक से छोटी चाबी उठाई।

     

    “और वो दिन आज है।”

     

     

     

    चाबी का रहस्य

     

    आरव ने चाबी को देखा।

     

    “ये किसकी है?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “उस कमरे की, जिसे शेखर ने पच्चीस साल से बंद रखा है।”

     

    शेखर अचानक गरज उठा—

     

    “चुप रहो!”

     

    डॉक्टर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अब बहुत देर हो चुकी है।”

     

    शेखर ने बंदूक उठा ली।

     

    “तुम्हें पता है मैं क्या कर सकता हूं।”

     

    डॉक्टर मुस्कुराया।

     

    “हां।”

     

    “तो डर नहीं लगता?”

     

    “अब नहीं।”

     

    शेखर ने गोली चलाने के लिए हाथ उठाया।

     

    लेकिन उसी वक्त रुद्र ने पीछे से उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    धांय!

     

    गोली छत में जा लगी।

     

    रुद्र ने शेखर को धक्का दिया।

     

    “अब तुम अकेले नहीं हो।”

     

    शेखर लड़खड़ाकर गिरा।

     

    आरव ने तुरंत चाबी उठा ली।

     

    “हमें मां के पास जाना होगा।”

     

    अमन और विहान उसके साथ हो लिए।

     

    आरोही भी उनके पीछे चल पड़ी।

     

    लेकिन डॉक्टर ने उसे रोक लिया।

     

    “आरोही।”

     

    “जी?”

     

    “आरव को अकेला मत छोड़ना।”

     

    आरोही ने गंभीरता से कहा—

     

    “कभी नहीं।”

     

     

     

    माधवी कहां है?

     

    आरव ऊपर पहुंचा तो पूरा कमरा अस्त-व्यस्त था।

     

    मेज टूटी हुई थी।

     

    कुर्सी जमीन पर पड़ी थी।

     

    लेकिन माधवी वहां नहीं थीं।

     

    “मां!”

     

    आरव ने पूरी हवेली में आवाज लगाई।

     

    “मां!”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    अमन ने कहा—

     

    “शायद उन्हें कहीं और ले गए।”

     

    विहान ने फर्श पर कुछ देखा।

     

    “भैया!”

     

    आरव उसकी तरफ दौड़ा।

     

    फर्श पर माधवी का दुपट्टा पड़ा था।

     

    आरव ने उसे उठाकर सीने से लगा लिया।

     

    उसकी आंखें भर आईं।

     

    “मां…”

     

    आरोही ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “हम उन्हें ढूंढ लेंगे।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मैंने बचपन में मां का हाथ खोया था।”

     

    उसकी आवाज टूट गई।

     

    “अब दोबारा नहीं खोऊंगा।”

     

    आरोही ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    “इस बार मैं तुम्हारे साथ हूं।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    दोनों की आंखों में एक-दूसरे के लिए वही भरोसा था, जो किसी वादे से कम नहीं था।

     

     

     

    बंद कमरा

     

    विहान ने अचानक कहा—

     

    “मुझे लगता है मां नीचे नहीं गईं।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि शेखर ने उन्हें कहीं जाने नहीं दिया होगा।”

     

    “तो?”

     

    विहान ने हवेली की दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    “इस घर में एक कमरा है, जिसका दरवाजा बाहर से नहीं खुलता।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “कहां?”

     

    विहान ने कहा—

     

    “पुरानी लाइब्रेरी के पीछे।”

     

    सब लोग वहां पहुंचे।

     

    लाइब्रेरी में सैकड़ों पुरानी किताबें थीं।

     

    विहान ने एक किताब खींची।

     

    टक!

     

    दीवार का एक हिस्सा पीछे हट गया।

     

    एक संकरा रास्ता दिखाई दिया।

     

    आरव ने कहा—

     

    “ये रास्ता मुझे याद क्यों नहीं?”

     

    डॉक्टर ने पीछे से कहा—

     

    “क्योंकि तुम्हारी इसी जगह की याद मैंने दबाई थी।”

     

    आरव ने उसे देखा।

     

    “क्यों?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “क्योंकि यहां तुम्हारे पिता की मौत हुई थी।”

     

    आरव ठिठक गया।

     

    “मेरे पिता?”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “अभय?”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

     

     

    अभय की आखिरी रात

     

    वे रास्ते से आगे बढ़े।

     

    अंदर एक छोटा कमरा था।

     

    कमरे की दीवार पर खून के पुराने निशान थे।

     

    आरव अचानक दीवार को छूते ही पीछे हट गया।

     

    उसके दिमाग में एक दृश्य कौंधा।

     

    एक आदमी जमीन पर गिरा हुआ था।

     

    एक महिला रो रही थी।

     

    एक छोटा बच्चा चिल्ला रहा था—

     

    “पापा उठो!”

     

    आरव ने अपना सिर पकड़ लिया।

     

    “नहीं…”

     

    आरोही ने उसे संभाला।

     

    “आरव!”

     

    “मुझे सब दिख रहा है।”

     

    “क्या?”

     

    “पापा…”

     

    आरव की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “अभय यहां मरे थे।”

     

    डॉक्टर ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    “किसने मारा?”

     

    डॉक्टर चुप रहा।

     

    आरव ने चीखकर पूछा—

     

    “किसने?”

     

    पीछे से शेखर की आवाज आई—

     

    “मैंने।”

     

    सबने पीछे देखा।

     

    शेखर धीरे-धीरे कमरे में आ रहा था।

     

    उसके हाथ में बंदूक थी।

     

    आरव की आंखों में नफरत भर गई।

     

    “तुमने मेरे पिता को मारा?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “हां।”

     

    अमन आगे बढ़ा।

     

    “क्यों?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “क्योंकि वो मुझे खत्म करना चाहता था।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “वो तुम्हें रोकना चाहता था।”

     

    “वो मेरे खिलाफ था।”

     

    “और इसलिए तुमने उसे मार दिया?”

     

    शेखर चुप रहा।

     

    आरव की मुट्ठियां कस गईं।

     

    “तुम इंसान नहीं हो।”

     

    शेखर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “शायद।”

     

    फिर उसने धीमे से कहा—

     

    “लेकिन उस रात मैंने सिर्फ अभय को नहीं मारा था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और किसे?”

     

    शेखर की आंखों में दर्द उभरा।

     

    “तुम्हारी मां माधवी वहीं थी।”

     

    आरव का दिल रुक-सा गया।

     

    “क्या?”

     

    “उसने सब देखा था।”

     

    “तो फिर वो जिंदा कैसे बचीं?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “क्योंकि अभय ने मरने से पहले मुझे एक बात बताई थी।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    शेखर ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

     

    “उसने कहा था कि अगर मैंने माधवी को कुछ किया, तो मेरे तीनों बेटे मुझे कभी माफ नहीं करेंगे।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

     

     

    माधवी का ठिकाना

     

    आरव ने पूछा—

     

    “मां कहां हैं?”

     

    शेखर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    आरोही आगे बढ़ी।

     

    “अगर आप सच में उन्हें नहीं मारना चाहते थे तो उन्हें कहां रखा?”

     

    शेखर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “वो जिंदा हैं।”

     

    आरव की आंखों में उम्मीद जगी।

     

    “कहां?”

     

    शेखर ने दीवार के पीछे बने एक और रास्ते की तरफ इशारा किया।

     

    “वहीं।”

     

    आरव तुरंत उस तरफ दौड़ा।

     

    दरवाजा बंद था।

     

    उसने जोर से धक्का दिया।

     

    “मां!”

     

    अंदर से धीमी आवाज आई—

     

    “आरव…”

     

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मां!”

     

    उसने दरवाजा तोड़ दिया।

     

    अंदर माधवी बैठी थीं।

     

    कमजोर।

     

    आंखों में आंसू।

     

    लेकिन जिंदा।

     

    आरव उनके पास जाकर घुटनों के बल बैठ गया।

     

    “मां…”

     

    माधवी ने उसका चेहरा दोनों हाथों में पकड़ लिया।

     

    “तू आ गया।”

     

    आरव उनके गले लग गया।

     

    “मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा।”

     

    माधवी ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

     

    फिर उनकी नजर अमन और विहान पर पड़ी।

     

    उनकी आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “तुम तीनों…”

     

    विहान उनके सामने घुटनों के बल बैठ गया।

     

    “मां…”

     

    माधवी ने उसका चेहरा छुआ।

     

    “मेरा बच्चा…”

     

    तीनों भाई माधवी से लिपट गए।

     

    कई सालों से बिखरा हुआ परिवार पहली बार एक साथ था।

     

    लेकिन तभी माधवी की नजर शेखर पर पड़ी।

     

    उनके चेहरे का रंग बदल गया।

     

    “तुम…”

     

    शेखर चुप रहा।

     

    माधवी ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “तुमने इन्हें सच बता दिया?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “अब छुपाने को कुछ नहीं बचा।”

     

    माधवी ने तुरंत आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “नहीं!”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या हुआ मां?”

     

    माधवी ने डरते हुए कहा—

     

    “तुम्हें अभी भी एक बात नहीं पता।”

     

    “क्या?”

     

    माधवी ने शेखर की तरफ देखा।

     

    फिर बोलीं—

     

    “तुम तीनों में से एक बच्चा मेरा बेटा नहीं है।”

     

    तीनों भाई स्तब्ध रह गए।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    विहान पीछे हट गया।

     

    आरव ने माधवी की तरफ देखा।

     

    “मां, आप क्या कह रही हैं?”

     

    माधवी की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “मुझे माफ कर देना।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “किसे आपने जन्म दिया?”

     

    माधवी ने कांपते हुए कहा—

     

    “सिर्फ एक को।”

     

    “किसे?”

     

    माधवी ने आरव की तरफ देखा।

     

    फिर अमन की तरफ।

     

    फिर विहान की तरफ।

     

    और आखिर में उन्होंने कांपते हुए उंगली उठाई—

     

    “आरव मेरा बेटा है।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    अमन और विहान एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    माधवी ने रोते हुए कहा—

     

    “लेकिन तुम दोनों की मां कौन है… ये सच मैंने पच्चीस साल से छुपा रखा है।”

     

    शेखर की आंखों में एक अजीब-सी मुस्कान आई।

     

    और तभी डॉक्टर ने धीरे से कहा—

     

    “अब आखिरी सच सामने आने का समय आ गया है।”

     

    जारी रहेगा…

     

     

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 40

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 40

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 40 : तीनों भाइयों का सबसे बड़ा राज

     

     

    “इस बार आपके सामने सिर्फ आपका बेटा नहीं, उसकी पत्नी भी खड़ी होगी।”

     

    आरोही की बात सुनकर शेखर कुछ पल तक उसे देखता रहा।

     

    उसकी आंखों में गुस्सा था, लेकिन आरोही पीछे नहीं हटी।

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “आरोही, मेरे पीछे रहो।”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। अब जो होगा, हम साथ मिलकर देखेंगे।”

     

    अमन ने विहान का हाथ पकड़ लिया।

     

    “चलो।”

     

    तीनों भाई नीचे जाने वाली सीढ़ियों की तरफ बढ़े।

     

    शेखर ने उन्हें रोकने के लिए हाथ उठाया, लेकिन तभी ऊपर से एक जोरदार धमाका हुआ।

     

    धड़ाम!

     

    पूरी हवेली हिल गई।

     

    छत से धूल गिरने लगी।

     

    रुद्र चिल्लाया—

     

    “जल्दी करो! नीचे का हिस्सा कभी भी गिर सकता है!”

     

    आरव ने विहान से पूछा—

     

    “डायरी कहां है?”

     

    विहान ने कहा—

     

    “नीचे पुराने तहखाने में।”

     

    “रास्ता?”

     

    “मुझे याद है।”

     

    तीनों भाई तेजी से सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे।

     

     

     

    तहखाने का बंद दरवाजा

     

    सीढ़ियों के आखिर में लोहे का एक बड़ा दरवाजा था।

     

    विहान उसके सामने रुक गया।

     

    “यही है।”

     

    अमन ने दरवाजा खींचा।

     

    “बंद है।”

     

    विहान ने कहा—

     

    “इसका ताला चाबी से नहीं खुलेगा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो कैसे?”

     

    विहान ने दीवार पर बने तीन निशानों की तरफ इशारा किया।

     

    वहां तीन हथेलियों के निशान बने थे।

     

    एक पर लिखा था—

     

    आर

     

    दूसरे पर—

     

     

    और तीसरे पर—

     

    वि

     

    आरव समझ गया।

     

    “तीनों को एक साथ हाथ रखना होगा।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “क्यों?”

     

    विहान ने धीमे से कहा—

     

    “क्योंकि मां कहती थीं कि यह दरवाजा सिर्फ तीन भाइयों के लिए बनाया गया है।”

     

    आरव ने अपनी हथेली पहले निशान पर रखी।

     

    अमन ने दूसरे पर।

     

    विहान ने तीसरे पर।

     

    कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।

     

    फिर अंदर से भारी आवाज आई—

     

    घर्ररर…

     

    दरवाजा धीरे-धीरे खुल गया।

     

    तीनों भाई एक-दूसरे की तरफ देखने लगे।

     

    आरव की आंखों में नमी थी।

     

    “मां ने सच में हमें अलग नहीं किया था।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “उन्होंने हमें वापस एक होने का रास्ता भी छोड़ दिया था।”

     

     

     

    सिया की डायरी

     

    तहखाने में एक छोटी मेज थी।

     

    उसके ऊपर कपड़े में लिपटी एक पुरानी डायरी रखी थी।

     

    विहान उसे देखते ही आगे बढ़ा।

     

    “यही है।”

     

    अमन ने कांपते हाथों से डायरी उठाई।

     

    उसने कवर पर हाथ फेरा।

     

    “मां…”

     

    आरव उसके पास खड़ा हो गया।

     

    “खोलो।”

     

    अमन ने डायरी खोली।

     

    पहले पन्ने पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

     

    “अगर मेरे तीनों बच्चे कभी एक साथ यह डायरी पढ़ें, तो समझना मेरा इंतजार खत्म हुआ।”

     

    अमन की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    आरव ने अगला पन्ना पलटा।

     

    उसमें लिखा था—

     

    “आरव, अमन और विहान… तुम तीनों को अलग-अलग नाम मिले, लेकिन तुम्हारे बीच का रिश्ता कभी अलग नहीं हुआ।”

     

    विहान ने रोते हुए कहा—

     

    “मां हमें भाई मानती थीं।”

     

    अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “हम भाई हैं।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “हमेशा रहेंगे।”

     

     

     

    नैना का सच

     

    अगले पन्ने पर नैना की तस्वीर लगी थी।

     

    आरव ने तस्वीर देखते हुए पूछा—

     

    “यही नैना थीं?”

     

    विहान ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    अमन ने डायरी पढ़नी शुरू की।

     

    सिया ने लिखा था—

     

    “नैना बहुत अच्छी औरत थी। लेकिन उसने शेखर से शादी करके अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा जोखिम लिया।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “शेखर ने उसे क्यों मारा?”

     

    अमन ने अगली लाइन पढ़ी—

     

    “नैना को शेखर के असली कारोबार का पता चल गया था।”

     

    विहान की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मेरी मां को इसलिए मारा गया?”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    फिर उसने अगली लाइन पढ़ी।

     

    उसका चेहरा अचानक बदल गया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव ने पूछा।

     

    अमन ने डायरी उसकी तरफ बढ़ा दी।

     

    आरव ने पढ़ा—

     

    “लेकिन नैना की मौत शेखर ने नहीं करवाई थी।”

     

    आरव चौंका।

     

    “तो किसने?”

     

    नीचे सिर्फ एक नाम था—

     

    “अभय।”

     

    विहान के हाथ कांपने लगे।

     

    “अभय?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “ये कैसे हो सकता है?”

     

    डॉक्टर, जो उनके पीछे खड़ा था, अचानक बोल पड़ा—

     

    “क्योंकि अभय नैना को बचाना चाहता था।”

     

    सब उसकी तरफ देखने लगे।

     

     

     

    डॉक्टर का नया सच

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “उस रात अभय नैना को शेखर के घर से निकालने आया था।”

     

    “लेकिन?”

     

    “शेखर के लोगों ने उसे घेर लिया।”

     

    “फिर?”

     

    “गोलियां चलीं।”

     

    विहान ने पूछा—

     

    “मेरी मां?”

     

    डॉक्टर ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “नैना को गोली लगी।”

     

    विहान की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “और अभय?”

     

    “उसने नैना को बचाने की कोशिश की।”

     

    “लेकिन वो बची नहीं?”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    विहान ने दीवार पर हाथ मार दिया।

     

    “मैंने इतने साल गलत आदमी से नफरत की!”

     

    आरव उसके पास गया।

     

    “तुम्हारी गलती नहीं थी।”

     

    विहान ने कहा—

     

    “मुझे हमेशा बताया गया कि अभय ने मेरी मां को मारा।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “हम सबको झूठ बताया गया।”

     

    आरव ने डायरी की तरफ देखा।

     

    “लेकिन अभी बहुत कुछ बाकी है।”

     

     

     

    लाल फाइल का असली पासवर्ड

     

    डायरी के आखिरी पन्ने पर एक अजीब निशान बना था।

     

    एक गोल घेरे के अंदर तीन अंक थे—

     

    1 – 4 – 0 – 8

     

    आरव उसे देखते ही ठिठक गया।

     

    “यही नंबर!”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “तुम्हें याद था।”

     

    “हां।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “इसका मतलब क्या है?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    विहान ने डायरी का अगला पन्ना खोला।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “14 अगस्त को जो हुआ, उसका सच सिर्फ वह व्यक्ति जानता है जिसने तीनों बच्चों को जन्म लेते देखा।”

     

    तीनों भाई डॉक्टर की तरफ देखने लगे।

     

    डॉक्टर पीछे हट गया।

     

    “मुझे जाना होगा।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “नहीं।”

     

    “आरव…”

     

    “अब आप कहीं नहीं जाएंगे।”

     

    “तुम नहीं जानते कि उस रात क्या हुआ था।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “तो बताइए।”

     

    डॉक्टर चुप रहा।

     

    आरव ने फिर पूछा—

     

    “तीनों बच्चों का जन्म किसने देखा था?”

     

    डॉक्टर ने धीरे से कहा—

     

    “मैंने।”

     

     

     

    जन्म की रात

     

    डॉक्टर ने कहना शुरू किया—

     

    “14 अगस्त की रात अस्पताल में तीन बच्चों का जन्म हुआ था।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “लेकिन रिकॉर्ड में तो सिर्फ दो बच्चों का नाम था।”

     

    “क्योंकि तीसरे बच्चे का रिकॉर्ड जानबूझकर मिटा दिया गया था।”

     

    विहान ने कहा—

     

    “मेरा?”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि शेखर चाहता था कि दुनिया को सिर्फ दो बच्चों के बारे में पता चले।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “क्योंकि तीनों बच्चों के जन्म के साथ एक भविष्यवाणी जुड़ी थी।”

     

    अमन ने हैरानी से पूछा—

     

    “कैसी भविष्यवाणी?”

     

    डॉक्टर ने धीमे स्वर में कहा—

     

    “तीनों में से जो बच्चा सबसे ज्यादा याद रखेगा, वही शेखर के साम्राज्य को खत्म करेगा।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “इसलिए मेरी याददाश्त?”

     

    “हां।”

     

    “शेखर ने मुझे इस्तेमाल किया क्योंकि उसे डर था कि मैं उसके खिलाफ जा सकता हूं।”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

     

     

    ऊपर शेखर का इंतजार

     

    उधर तहखाने के बाहर शेखर बेचैनी से टहल रहा था।

     

    विराज उसके पास खड़ा था।

     

    “वे नीचे क्या ढूंढ रहे हैं?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “सिया की डायरी।”

     

    “उसमें क्या है?”

     

    “मेरा अंत।”

     

    विराज ने चौंककर पूछा—

     

    “इतना बड़ा राज?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “उस डायरी में मेरे साम्राज्य की असली कुंजी है।”

     

    “कौन-सी?”

     

    शेखर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मेरी मौत के बाद सब कुछ किसके नाम होगा।”

     

    विराज की आंखों में लालच चमक उठा।

     

    “किसके?”

     

    शेखर मुस्कुराया।

     

    “यही तो मुझे भी जानना है।”

     

     

     

    तहखाने में छुपा संदूक

     

    आरव ने डायरी के नीचे हाथ लगाया।

     

    वहां लकड़ी का एक छोटा हिस्सा उठा हुआ था।

     

    उसने उसे खींचा।

     

    नीचे एक छोटा संदूक दिखाई दिया।

     

    अमन ने कहा—

     

    “इसे खोलो।”

     

    आरव ने संदूक खोला।

     

    अंदर तीन चीजें थीं।

     

    एक पुरानी अंगूठी।

     

    एक छोटी चाबी।

     

    और एक फोटो।

     

    फोटो देखकर तीनों भाई स्तब्ध रह गए।

     

    फोटो में उनकी तीनों माताएं साथ खड़ी थीं—

     

    माधवी, सिया और नैना।

     

    लेकिन उनके साथ एक चौथा व्यक्ति भी था।

     

    अभय।

     

    विहान ने फोटो उठाई।

     

    “ये चारों एक-दूसरे को जानते थे।”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “सिर्फ जानते नहीं थे।”

     

    “तो?”

     

    “ये चारों मिलकर शेखर के खिलाफ काम कर रहे थे।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “फिर सब बिखर क्यों गए?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “क्योंकि उनमें से किसी एक ने धोखा दिया था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    डॉक्टर ने जवाब देने के बजाय जमीन पर पड़ी अंगूठी की तरफ देखा।

     

    उस पर एक निशान बना था।

     

    रुद्र ने उसे देखते ही कहा—

     

    “ये निशान मैंने पहले भी देखा है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कहां?”

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “विराज की अंगूठी पर।”

     

    अमन चौंक गया।

     

    “विराज?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “तो क्या विराज ही वो आदमी था जिसने सबको धोखा दिया?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “शायद।”

     

    तभी ऊपर से शेखर की आवाज आई—

     

    “शायद नहीं, आरव।”

     

    सबने ऊपर देखा।

     

    शेखर सीढ़ियों पर खड़ा था।

     

    उसके हाथ में बंदूक थी।

     

    लेकिन इस बार उसके साथ कोई आदमी नहीं था।

     

    वह अकेला नीचे उतर रहा था।

     

    “सच जानना चाहते हो?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “हां।”

     

    शेखर धीरे-धीरे उनके सामने आया।

     

    उसकी नजर तीनों भाइयों पर गई।

     

    फिर बोला—

     

    “विराज ने किसी को धोखा नहीं दिया था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो किसने?”

     

    शेखर ने डायरी की तरफ देखा।

     

    उसकी आंखों में गुस्सा भर आया।

     

    “धोखा देने वाला…”

     

    वह कुछ पल रुका।

     

    फिर उसने डॉक्टर की तरफ इशारा किया।

     

    “यही आदमी था।”

     

    डॉक्टर का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    अमन ने हैरानी से कहा—

     

    “डॉक्टर?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “इसीने तुम्हारी तीनों मांओं को एक-दूसरे के खिलाफ किया था।”

     

    डॉक्टर पीछे हटने लगा।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या ये सच है?”

     

    डॉक्टर की आंखों में आंसू आ गए।

     

    फिर उसने धीरे से कहा—

     

    “हां… मैंने धोखा दिया था।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    लेकिन डॉक्टर ने अगली बात कही—

     

    “लेकिन मैंने ये सब शेखर के लिए नहीं किया था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो किसके लिए?”

     

    डॉक्टर ने संदूक से वह छोटी चाबी उठाई और कहा—

     

    “तुम्हें बचाने के लिए।”

     

    उसी समय ऊपर से माधवी की चीख सुनाई दी—

     

    “आरव!”

     

    आरव घबरा गया।

     

    “मां!”

     

    शेखर के चेहरे पर एक खतरनाक मुस्कान आ गई।

     

    “अब असली खेल शुरू होगा।”

     

    जारी रहेगा…

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 39 :

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 39 :

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 39 : विहान को बचाने की जंग

     

     

    हवेली के बाहर लगातार गोलियों की आवाज गूंज रही थी।

     

    धांय! धांय! धांय!

     

    खिड़कियों के शीशे टूटकर जमीन पर बिखरने लगे।

     

    आरव ने तुरंत आरोही को अपने पीछे कर लिया।

     

    “नीचे झुको!”

     

    अमन ने भी बंदूक संभाल ली।

     

    रुद्र खिड़की के पास जाकर बाहर देखने लगा।

     

    “हम चारों तरफ से घिरे हुए हैं।”

     

    डॉक्टर ने घबराकर पूछा—

     

    “कितने आदमी हैं?”

     

    रुद्र ने बाहर देखते हुए कहा—

     

    “कम से कम बीस।”

     

    शेखर वहीं खड़ा मुस्कुरा रहा था।

     

    आरव ने उसे घूरकर देखा।

     

    “तुम्हें पहले से पता था।”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “बिल्कुल।”

     

    “तुमने हमें यहां बुलाया ही इसलिए था?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    शेखर ने लाल फाइल उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा—

     

    “क्योंकि मुझे पता था कि तुम अपने भाई को बचाने के लिए कुछ भी करोगे।”

     

    आरव ने फाइल नहीं ली।

     

    “विहान कहां है?”

     

    “मेरे साथ चलो।”

     

    “पहले उसे दिखाओ।”

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “तुम अभी भी मुझ पर भरोसा नहीं करते।”

     

    आरव ने कड़वी हंसी हंसी।

     

    “जिस आदमी ने मेरी पूरी जिंदगी झूठ में रखी, उस पर भरोसा कैसे करूं?”

     

    शेखर की आंखों में दर्द की एक झलक आई।

     

    लेकिन अगले ही पल उसका चेहरा फिर कठोर हो गया।

     

    “तो फिर तुम्हारे पास सिर्फ एक रास्ता है।”

     

    “क्या?”

     

    “मुझे रोककर अपने भाई को ढूंढो।”

     

     

     

    अचानक हमला

     

    दरवाजा जोर से टूट गया।

     

    शेखर के आदमी अंदर घुस आए।

     

    रुद्र ने तुरंत गोली चलाई।

     

    एक आदमी जमीन पर गिर गया।

     

    “सब पीछे हटो!”

     

    आरव ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मेरे साथ रहना।”

     

    आरोही ने कहा—

     

    “मैं कहीं नहीं जा रही।”

     

    अमन ने दो आदमियों को रोकते हुए कहा—

     

    “भाई, तुम आगे बढ़ो!”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और तुम?”

     

    “मैं संभाल लूंगा।”

     

    “अमन!”

     

    “जाओ!”

     

    आरव, आरोही और डॉक्टर पीछे की तरफ भागे।

     

    लेकिन शेखर वहीं खड़ा रहा।

     

    विराज भी उसके पास था।

     

    विराज ने पूछा—

     

    “आपने इन्हें जाने क्यों दिया?”

     

    शेखर मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि उन्हें लगता है कि वे भाग रहे हैं।”

     

    “लेकिन?”

     

    “असल में वे वहीं जा रहे हैं जहां मैं उन्हें भेजना चाहता हूं।”

     

    विराज का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “पुरानी हवेली?”

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

     

     

    गुप्त रास्ता

     

    आरव एक पुराने गलियारे से गुजर रहा था।

     

    उसे अचानक बचपन की याद आई।

     

    एक छोटा बच्चा उसके साथ दौड़ रहा था।

     

    “भैया! जल्दी करो!”

     

    आरव रुक गया।

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव ने आंखें बंद कीं।

     

    “ये रास्ता… मुझे याद है।”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “तुम पहले भी यहां आए हो।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मैं और विहान यहां खेलते थे।”

     

    “विहान का कमरा कहां था?”

     

    आरव ने कुछ सेकंड सोचा।

     

    फिर दाईं तरफ मुड़ गया।

     

    “इधर।”

     

    आरोही उसके पीछे चली।

     

    डॉक्टर ने पूछा—

     

    “तुम्हें पक्का याद है?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “हां।”

     

    कुछ दूर जाकर एक लकड़ी का दरवाजा दिखाई दिया।

     

    आरव ने दरवाजा खोला।

     

    कमरे में धूल जमा थी।

     

    दीवार पर बच्चों के बनाए हुए चित्र थे।

     

    एक चित्र में तीन बच्चे हाथ पकड़े हुए थे।

     

    आरव ने चित्र को छुआ।

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “हम तीनों…”

     

    आरोही ने धीरे से कहा—

     

    “तुम्हें विहान से बहुत प्यार था।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “हां।”

     

    “फिर उसे तुमसे अलग क्यों किया गया?”

     

    आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसे याद करने की कोशिश करते ही उसके सिर में तेज दर्द होने लगा।

     

    अचानक एक आवाज उसके दिमाग में गूंजी—

     

    “आरव, अगर कभी विहान को ढूंढना हो तो नीली दीवार के पीछे देखना।”

     

    आरव ने आंखें खोल दीं।

     

    “नीली दीवार!”

     

    डॉक्टर ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    आरव ने कमरे की दीवारों को देखा।

     

    एक दीवार बाकी दीवारों से थोड़ी अलग थी।

     

    उस पर नीले रंग की पुरानी पपड़ी जमी थी।

     

    आरव ने दीवार पर हाथ फेरा।

     

    टक!

     

    अंदर से खोखली आवाज आई।

     

    “यही है।”

     

     

     

    छुपा हुआ कमरा

     

    आरव ने दीवार पर जोर से हाथ मारा।

     

    लकड़ी का एक हिस्सा टूट गया।

     

    पीछे छोटा-सा रास्ता दिखाई दिया।

     

    तीनों अंदर चले गए।

     

    कुछ कदम बाद उन्हें एक कमरा मिला।

     

    कमरे के बीचों-बीच एक कुर्सी थी।

     

    और उस कुर्सी पर कोई बैठा था।

     

    उसके हाथ बंधे थे।

     

    चेहरा नीचे झुका हुआ था।

     

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    “विहान?”

     

    वह आदमी धीरे-धीरे अपना चेहरा ऊपर उठाने लगा।

     

    आरव की सांस रुक गई।

     

    सामने एक जवान लड़का था।

     

    चेहरा थका हुआ।

     

    आंखों में दर्द।

     

    लेकिन चेहरे की बनावट…

     

    आरव जैसी।

     

    अमन जैसी।

     

    वह लड़का उन्हें देखता रहा।

     

    फिर उसकी नजर आरव पर टिक गई।

     

    उसकी आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “भैया…”

     

    आरव जैसे पत्थर का हो गया।

     

    उसके होंठ कांपने लगे।

     

    “विहान?”

     

    विहान मुस्कुराया।

     

    “आप सच में आ गए।”

     

    आरव दौड़कर उसके पास गया।

     

    उसके हाथ खोले।

     

    फिर दोनों भाई एक-दूसरे से लिपट गए।

     

    “मुझे पता था तुम मुझे लेने आओगे।”

     

    आरव की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    “मैं तुम्हें कभी छोड़कर नहीं जाऊंगा।”

     

    विहान ने कहा—

     

    “आपने बहुत देर कर दी।”

     

    “माफ कर दो।”

     

    “आपकी गलती नहीं थी।”

     

    आरोही की आंखें भी भर आईं।

     

    डॉक्टर चुपचाप दोनों भाइयों को देख रहा था।

     

     

     

    विहान की कहानी

     

    अमन भी वहां पहुंच गया।

     

    विहान ने उसे देखा।

     

    कुछ पल दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर विहान धीरे से बोला—

     

    “भैया?”

     

    अमन ने उसे गले लगा लिया।

     

    “हां।”

     

    तीनों भाई एक-दूसरे को पकड़कर खड़े रहे।

     

    विहान ने कहा—

     

    “मुझे हमेशा बताया गया कि मेरे दोनों भाई मुझे छोड़कर चले गए।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “हमने तुम्हें कभी नहीं छोड़ा।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “तुम्हें यहां किसने रखा?”

     

    विहान की आंखों में डर आ गया।

     

    “शेखर।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “उसने तुम्हें क्यों कैद किया?”

     

    विहान बोला—

     

    “क्योंकि उसे लगता है कि मेरे पास उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है।”

     

    आरव चौंका।

     

    “क्या?”

     

    विहान ने धीरे से कहा—

     

    “उसकी पत्नी की डायरी।”

     

    डॉक्टर ने तुरंत पूछा—

     

    “कौन-सी डायरी?”

     

    विहान ने कहा—

     

    “सिया की।”

     

    अमन की सांस रुक गई।

     

    “मेरी मां की डायरी?”

     

    विहान ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “वो तुम्हारे पास है?”

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    विहान ने कहा—

     

    “मैंने उसे छुपा दिया था।”

     

     

     

    डायरी कहां है?

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कहां?”

     

    विहान ने कमरे की छत की तरफ देखा।

     

    “इस हवेली के नीचे।”

     

    रुद्र अचानक कमरे में आ गया।

     

    “आरव!”

     

    आरव ने मुड़कर देखा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “हमें जल्दी निकलना होगा।”

     

    “क्यों?”

     

    “शेखर खुद यहां आ रहा है।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “तो आने दो।”

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “तुम उसे नहीं जानते।”

     

    विहान ने घबराकर कहा—

     

    “वो मुझे वापस ले जाएगा।”

     

    आरव ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “अब कोई तुम्हें नहीं ले जाएगा।”

     

    अचानक बाहर कदमों की आवाज सुनाई दी।

     

    धीरे-धीरे…

     

    कोई दरवाजे के पास आ रहा था।

     

    टक… टक… टक…

     

    विहान डरकर पीछे हट गया।

     

    डॉक्टर ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “वो आ गया।”

     

    दरवाजा खुला।

     

    सामने शेखर खड़ा था।

     

    उसके पीछे कई हथियारबंद लोग थे।

     

    शेखर ने तीनों भाइयों को एक साथ देखा।

     

    उसकी आंखें नम हो गईं।

     

    “आखिरकार… मेरे तीनों बच्चे एक साथ।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “हम तुम्हारे बच्चे नहीं हैं।”

     

    शेखर मुस्कुराया।

     

    “तुम अभी भी यही सोचते हो?”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “क्या मतलब?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “विहान से पूछो।”

     

    सभी की नजर विहान पर गई।

     

    विहान का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “विहान?”

     

    विहान कांपते हुए बोला—

     

    “मुझे… मुझे सब पता है।”

     

    “क्या?”

     

    विहान की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “मैं अभय का बेटा नहीं हूं।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरव ने हैरानी से पूछा—

     

    “क्या?”

     

    विहान ने कहा—

     

    “मेरे पिता का नाम अभय नहीं… शेखर है।”

     

    अमन चौंक गया।

     

    “लेकिन डॉक्टर ने कहा था—”

     

    शेखर ने बीच में कहा—

     

    “डॉक्टर ने बहुत कुछ झूठ बताया है।”

     

    डॉक्टर ने सिर झुका लिया।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या ये सच है?”

     

    डॉक्टर चुप रहा।

     

    आरव की आंखों में गुस्सा भर गया।

     

    “डॉक्टर!”

     

    डॉक्टर ने आखिरकार कहा—

     

    “हां।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “तो हम तीनों…”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “तीनों मेरे बेटे हो।”

     

    अमन ने सिर पकड़ लिया।

     

    “लेकिन मां?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “सिया सिर्फ तुम्हारी मां थी।”

     

    “और आरव की मां?”

     

    “माधवी।”

     

    “विहान की?”

     

    शेखर चुप हो गया।

     

    विहान ने खुद कहा—

     

    “मेरी मां… कोई और थी।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    विहान ने जवाब देने से पहले शेखर की तरफ देखा।

     

    शेखर की आंखों में पहली बार डर था।

     

    विहान ने कहा—

     

    “जिसका नाम आज तक किसी ने नहीं लिया।”

     

    “कौन?”

     

    विहान ने धीरे से कहा—

     

    “नैना।”

     

    डॉक्टर का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    रुद्र ने तुरंत पूछा—

     

    “नैना?”

     

    विहान ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन थी नैना?”

     

    डॉक्टर ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “नैना… शेखर की पहली पत्नी थी।”

     

    शेखर ने आंखें बंद कर लीं।

     

    विहान आगे बोला—

     

    “और उसकी मौत के पीछे भी…”

     

    वह रुक गया।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “किसका हाथ था?”

     

    विहान ने शेखर की तरफ देखा।

     

    शेखर ने नजरें झुका लीं।

     

    विहान ने कहा—

     

    “मेरे पिता का।”

     

    कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।

     

    आरव की आंखें शेखर पर टिक गईं।

     

    शेखर ने कुछ नहीं कहा।

     

    और तभी हवेली के नीचे से जोरदार धमाका हुआ।

     

    धड़ाम!

     

    पूरी जमीन हिल गई।

     

    रुद्र चिल्लाया—

     

    “नीचे बम लगाया गया है!”

     

    शेखर ने तुरंत कहा—

     

    “सब बाहर निकलो!”

     

    लेकिन आरव ने विहान का हाथ पकड़ लिया।

     

    “पहले डायरी।”

     

    विहान ने सिर हिलाया।

     

    “वो नीचे है।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “तो चलो।”

     

    तीनों भाई नीचे जाने लगे।

     

    शेखर ने उन्हें रोकने के लिए हाथ बढ़ाया।

     

    लेकिन उसी पल आरोही उसके सामने आकर खड़ी हो गई।

     

    “अगर आपने उन्हें रोकने की कोशिश की…”

     

    शेखर ने पूछा—

     

    “तो?”

     

    आरोही ने दृढ़ता से कहा—

     

    “इस बार आपके सामने सिर्फ आपका बेटा नहीं, उसकी पत्नी भी खड़ी होगी।”

     

    शेखर उसे घूरता रहा।

     

    और पहली बार…

     

    उसे समझ आया कि आरव अकेला नहीं है।

     

    जारी रहेगा…

     

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 38

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 38

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 38 : गोली के सामने प्यार

     

     

    विराज ने जैसे ही बंदूक आरव की तरफ तानी, आरोही का दिल दहल उठा।

     

    “आरव!”

     

    वह तुरंत उसके सामने आकर खड़ी हो गई।

     

    आरव ने हैरानी से उसे देखा।

     

    “आरोही, हटो!”

     

    “नहीं।”

     

    “वो गोली चला देगा।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

     

    “तो पहले मुझे लगेगी।”

     

    आरव की आंखें भर आईं।

     

    “तुम पागल हो गई हो?”

     

    आरोही हल्की मुस्कान के साथ बोली—

     

    “तुम्हारे प्यार में।”

     

    एक पल के लिए सब शांत हो गए।

     

    विराज ने बंदूक नीचे कर दी।

     

    शेखर ने उसे घूरकर देखा।

     

    “विराज, गोली चलाओ।”

     

    विराज ने आरव और आरोही को देखा।

     

    उसकी उंगली ट्रिगर पर थी।

     

    लेकिन वह गोली नहीं चला पाया।

     

    शेखर गरज उठा—

     

    “मैंने कहा गोली चलाओ!”

     

    विराज ने धीमे से कहा—

     

    “मैं नहीं कर सकता।”

     

    शेखर की आंखों में गुस्सा भर गया।

     

    “क्या कहा?”

     

    “मैं आरोही को नहीं मार सकता।”

     

    शेखर ने व्यंग्य से हंसते हुए कहा—

     

    “तुम्हें उससे प्यार है?”

     

    विराज ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    लेकिन उसकी खामोशी ही उसका जवाब थी।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “विराज…”

     

    विराज ने नजरें झुका लीं।

     

    “तुम नहीं समझोगे।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “प्यार समझने के लिए इंसान होना जरूरी है।”

     

    विराज ने उसकी तरफ देखा।

     

    “और शायद मैं इंसान रह ही नहीं गया।”

     

     

     

    शेखर का गुस्सा

     

    शेखर ने विराज के हाथ से बंदूक छीन ली।

     

    “कमजोरी।”

     

    फिर उसने खुद बंदूक आरव की तरफ तान दी।

     

    “अब देखता हूं कौन बचाता है तुम्हें।”

     

    डॉक्टर ने आगे बढ़कर कहा—

     

    “शेखर, बस करो।”

     

    शेखर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुमने बहुत साल मेरे खिलाफ खेल खेला है।”

     

    “मैंने बच्चों को बचाया था।”

     

    “तुमने मेरे वारिस को मुझसे दूर किया।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मैं तुम्हारा वारिस नहीं हूं।”

     

    शेखर मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें लगता है कि तुम मुझसे नफरत करके मेरी दुनिया से बाहर निकल जाओगे?”

     

    “हां।”

     

    “तुम गलत हो।”

     

    शेखर ने लाल फाइल जमीन पर फेंक दी।

     

    “क्योंकि तुम्हारे खून में मेरा साम्राज्य है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मेरे खून में तुम्हारा नाम नहीं, मेरे मां-बाप की परवरिश है।”

     

    शेखर की आंखों में गुस्सा चमका।

     

    “मां-बाप?”

     

    वह हंसा।

     

    “तुम्हारी मां ने तुम्हें मुझसे बचाया था।”

     

    “हां।”

     

    “और बदले में क्या मिला उसे?”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    शेखर ने कहा—

     

    “उसने अपनी पूरी जिंदगी झूठ में गुजार दी।”

     

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तुम्हारी वजह से।”

     

     

     

    लाल फाइल का राज

     

    अमन ने जमीन पर पड़ी फाइल उठा ली।

     

    शेखर ने तुरंत बंदूक उसकी तरफ कर दी।

     

    “फाइल नीचे रखो।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    “अमन!”

     

    आरव ने उसे रोकना चाहा।

     

    लेकिन अमन ने फाइल खोल दी।

     

    पहले पन्ने पर वही नाम थे।

     

    आरव।

     

    अमन।

     

    अभय।

     

    माधवी।

     

    सिया।

     

    शेखर।

     

    अमन ने पन्ने पलटने शुरू किए।

     

    फिर अचानक एक फोटो उसके हाथ में आई।

     

    वह फोटो देखकर उसकी सांस रुक गई।

     

    “आरव…”

     

    आरव उसके पास गया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    अमन ने फोटो उसे दे दी।

     

    फोटो में दो छोटे बच्चे थे।

     

    एक आरव।

     

    दूसरा अमन।

     

    लेकिन उनके साथ एक तीसरा बच्चा भी था।

     

    आरव ने तस्वीर को गौर से देखा।

     

    “ये कौन है?”

     

    डॉक्टर का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “इसे फाइल में नहीं होना चाहिए था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन है ये?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “तीसरा बच्चा।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “उसका नाम?”

     

    डॉक्टर ने जवाब नहीं दिया।

     

    शेखर अचानक चिल्लाया—

     

    “फाइल बंद करो!”

     

    आरव समझ गया।

     

    “यही राज है।”

     

    शेखर ने गोली चला दी।

     

    धांय!

     

    गोली आरव के पास से निकलकर दीवार में जा लगी।

     

    आरोही चीख पड़ी।

     

    “आरव!”

     

    आरव ने उसे पीछे किया।

     

    “मैं ठीक हूं।”

     

     

     

    तीसरा बच्चा

     

    आरव ने फिर तस्वीर देखी।

     

    तीसरे बच्चे के चेहरे पर हाथ से काली स्याही लगाई गई थी।

     

    जैसे किसी ने जानबूझकर उसकी पहचान मिटाई हो।

     

    आरव ने डॉक्टर से पूछा—

     

    “इस बच्चे को क्यों छुपाया गया?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “क्योंकि वही सबसे बड़ा राज है।”

     

    “कौन था वो?”

     

    डॉक्टर चुप रहा।

     

    अमन ने कहा—

     

    “बोलिए!”

     

    डॉक्टर ने धीरे से कहा—

     

    “वह शेखर का पहला बच्चा था।”

     

    शेखर ने आंखें बंद कर लीं।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “पहला बच्चा?”

     

    “हां।”

     

    “तो फिर उसका क्या हुआ?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “वह मर गया।”

     

    शेखर अचानक चिल्लाया—

     

    “झूठ!”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरव ने शेखर की तरफ देखा।

     

    “तो वो जिंदा है?”

     

    शेखर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    अमन ने कहा—

     

    “कौन है वो?”

     

    शेखर की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तुम नहीं जानते कि तुम किस दरवाजे को खोल रहे हो।”

     

     

     

    शेखर का दर्द

     

    पहली बार शेखर के चेहरे पर एक पिता का दर्द दिखाई दिया।

     

    उन्होंने धीरे से कहा—

     

    “वो मेरा बेटा था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कहां है?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    “आपने उसे ढूंढा नहीं?”

     

    “ढूंढा था।”

     

    “फिर?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “जिस रात उसे अस्पताल से ले जाया गया, उसी रात सिया गायब हो गई थी।”

     

    अमन चौंक गया।

     

    “सिया?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “हां।”

     

    “मेरी मां?”

     

    “हां।”

     

    अमन की आंखों में गुस्सा भर गया।

     

    “तो मेरी मां उस बच्चे को लेकर गई थी?”

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो क्या सिया ने तीसरे बच्चे को बचाया?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “शायद।”

     

     

     

    विराज का रहस्य

     

    अचानक विराज आगे आया।

     

    “बस।”

     

    सबकी नजर उस पर गई।

     

    उसने कहा—

     

    “अब ये कहानी आगे नहीं जाएगी।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम इतना डर क्यों रहे हो?”

     

    विराज चुप रहा।

     

    आरव ने कहा—

     

    “तुम इस बच्चे को जानते हो।”

     

    विराज की आंखें बदल गईं।

     

    अमन ने तुरंत पूछा—

     

    “तुम जानते हो?”

     

    विराज ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    रुद्र ने अचानक कहा—

     

    “मुझे समझ आ गया।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    रुद्र ने विराज की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “तीसरा बच्चा मरा नहीं था।”

     

    विराज ने आंखें बंद कर लीं।

     

    रुद्र आगे बढ़ा।

     

    “उसे किसी ने बचाया था।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “किसने?”

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “विराज ने।”

     

    सब स्तब्ध रह गए।

     

    आरव ने विराज की तरफ देखा।

     

    “तुमने?”

     

    विराज ने धीरे से कहा—

     

    “हां।”

     

    शेखर गरज उठा—

     

    “विराज!”

     

    विराज ने उसकी तरफ देखा।

     

    “उस रात मैंने उसे मरने से बचाया था।”

     

    “तुमने मेरे बेटे को मुझसे दूर किया!”

     

    “क्योंकि आप उसे भी अपनी तरह बनाना चाहते थे।”

     

    शेखर चुप हो गया।

     

     

     

    तीसरा बच्चा जिंदा है

     

    अमन ने पूछा—

     

    “वो बच्चा अब कहां है?”

     

    विराज ने उसकी तरफ देखा।

     

    उसकी आंखों में दर्द था।

     

    “बहुत दूर।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कहां?”

     

    विराज ने कहा—

     

    “जहां कोई उसे पहचानता नहीं।”

     

    “नाम?”

     

    विराज चुप रहा।

     

    आरव ने कहा—

     

    “नाम बताओ।”

     

    विराज ने धीरे से कहा—

     

    “विहान।”

     

    आरव के चेहरे पर अजीब-सी बेचैनी हुई।

     

    “विहान?”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव ने अपना सिर पकड़ लिया।

     

    अचानक उसके दिमाग में एक बचपन की याद चमकी।

     

    एक छोटा लड़का…

     

    उसका हाथ पकड़कर कह रहा था—

     

    “भैया, मुझे छोड़कर मत जाना।”

     

    आरव की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “वो…”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “क्या याद आया?”

     

    आरव ने कांपते हुए कहा—

     

    “विहान मेरा भाई था।”

     

    शेखर की आंखें फैल गईं।

     

    “तुम्हें याद आ गया?”

     

    आरव ने सिर उठाया।

     

    “हां।”

     

    “सब?”

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने अपनी कनपटी दबाई।

     

    “लेकिन इतना याद है कि विहान को किसी ने हमसे अलग किया था।”

     

    विराज ने कहा—

     

    “मैंने।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्यों?”

     

    विराज ने कहा—

     

    “क्योंकि अगर वह तुम्हारे साथ रहता तो शेखर तुम तीनों को अपने साम्राज्य का हिस्सा बना देता।”

     

     

     

    आरोही का सवाल

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “विहान अभी कहां है?”

     

    विराज चुप रहा।

     

    शेखर ने कहा—

     

    “वो मेरे पास है।”

     

    विराज तुरंत उसकी तरफ मुड़ा।

     

    “क्या?”

     

    शेखर मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें लगा मैंने उसे कभी ढूंढा नहीं?”

     

    विराज का चेहरा बदल गया।

     

    “आपने उसे ढूंढ लिया?”

     

    “बहुत पहले।”

     

    “तो फिर…”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “वो मेरे पास कैद है।”

     

    अमन ने गुस्से में कहा—

     

    “कहां?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “तुम्हारी मां की पुरानी हवेली में।”

     

    आरव ने तुरंत कहा—

     

    “हमें वहां ले चलो।”

     

    शेखर हंसा।

     

    “इतनी जल्दी?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “अगर उसे कुछ हुआ तो…”

     

    “तो?”

     

    आरव की आंखों में गुस्सा था।

     

    “मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करूंगा।”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “मुझे तुम्हारी माफी नहीं चाहिए।”

     

    फिर उसने विराज की तरफ देखा।

     

    “लेकिन तुम्हें एक बात जाननी चाहिए।”

     

    विराज चौंका।

     

    “क्या?”

     

    शेखर मुस्कुराया।

     

    “विहान सिर्फ मेरा बेटा नहीं है।”

     

    विराज की सांस रुक गई।

     

    “तो?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “वो तुम्हारा भी बेटा है।”

     

    पूरा कमरा स्तब्ध रह गया।

     

    विराज की आंखें फैल गईं।

     

    “ये झूठ है।”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने हैरानी से पूछा—

     

    “विराज का बेटा?”

     

    डॉक्टर ने धीरे से कहा—

     

    “ये सच हो सकता है।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “लेकिन कैसे?”

     

    डॉक्टर ने जवाब दिया—

     

    “क्योंकि पच्चीस साल पहले सिया ने जो राज छुपाया था…”

     

    वह रुक गया।

     

    “वो सिर्फ आरव और अमन से जुड़ा नहीं था।”

     

    सबकी नजर डॉक्टर पर टिक गई।

     

    डॉक्टर ने धीरे से कहा—

     

    “विहान की मां सिया थी।”

     

    अमन का चेहरा बदल गया।

     

    “मेरी मां?”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    अमन की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “तो विहान…”

     

    आरव ने उसका कंधा पकड़ लिया।

     

    “हमारा भाई है।”

     

    अचानक बाहर से कई गाड़ियों के इंजन की आवाज आई।

     

    रुद्र ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    “हम घिर चुके हैं।”

     

    शेखर ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब फैसला तुम्हें करना है।”

     

    “क्या?”

     

    “मेरे साथ चलो…”

     

    उसने लाल फाइल आरव की तरफ बढ़ाई।

     

    “या फिर अपने भाई विहान को हमेशा के लिए खो दो।”

     

    आरव ने फाइल की तरफ देखा।

     

    फिर आरोही की तरफ।

     

    फिर अमन की तरफ।

     

    और आखिर में शेखर की आंखों में देखते हुए बोला—

     

    “मैं तुम्हारे साथ नहीं चलूंगा।”

     

    शेखर की मुस्कान गायब हो गई।

     

    आरव ने आगे कहा—

     

    “लेकिन मैं अपने भाई को लेने जरूर आऊंगा।”

     

    उसी पल हवेली के बाहर गोलियों की बौछार शुरू हो गई।

     

    जारी रहेगा…

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 37

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 37

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

    ,एपिसोड – 37 : डॉक्टर का छुपा हुआ राज

     

     

    हवेली का दरवाजा जोर से बंद होते ही आरव, आरोही, अमन और रुद्र एक-दूसरे की तरफ देखने लगे।

     

    कुछ पल पहले तक उन्हें लगता था कि वे इस हवेली में शेखर और माधवी को ढूंढने आए हैं।

     

    लेकिन अब…

     

    उनके सामने एक ऐसा राज खड़ा था, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

     

    दीवार पर लगी पुरानी तस्वीर में शेखर और अभय के साथ खड़ा तीसरा आदमी वही था, जिसे वे अपना मददगार समझते आए थे।

     

    डॉक्टर।

     

    आरव ने तस्वीर को दीवार से उतार लिया।

     

    “रुद्र…”

     

    रुद्र चुप रहा।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा—

     

    “तुमने कहा था कि ये वही आदमी है जिसने हमारी जिंदगी बर्बाद करने की साजिश रची थी। इसका मतलब क्या है?”

     

    रुद्र ने कुछ बोलने के लिए मुंह खोला, लेकिन तभी अंधेरे कमरे से डॉक्टर की आवाज आई—

     

    “मत पूछो, आरव।”

     

    चारों तरफ सन्नाटा छा गया।

     

    अमन ने तुरंत अपनी बंदूक निकाल ली।

     

    “बाहर आ!”

     

    कुछ सेकंड बाद सामने की सीढ़ियों पर डॉक्टर दिखाई दिया।

     

    लेकिन इस बार उसके चेहरे पर वह नरमी नहीं थी, जो हमेशा दिखाई देती थी।

     

    उसकी आंखों में एक अजीब-सी कठोरता थी।

     

    आरव ने गुस्से से कहा—

     

    “आपने हमसे झूठ बोला।”

     

    डॉक्टर ने शांत स्वर में कहा—

     

    “हां।”

     

    “आपने कहा था कि आपने मुझे और अमन को बचाया था।”

     

    “मैंने बचाया था।”

     

    “तो फिर ये तस्वीर?”

     

    डॉक्टर ने तस्वीर की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि उस रात मैं वहां था।”

     

    अमन ने गुस्से में कहा—

     

    “मेरी मां को किसने मारा था?”

     

    डॉक्टर ने उसकी तरफ देखा।

     

    कुछ पल तक वह चुप रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “विराज ने गोली चलाई थी।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “और आदेश?”

     

    डॉक्टर ने जवाब नहीं दिया।

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

     

    “शेखर का?”

     

    डॉक्टर ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    अमन की मुट्ठियां कस गईं।

     

    “तो आप सब जानते थे!”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “मैं सब जानता था।”

     

     

     

    डॉक्टर की असली कहानी

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “फिर आपने इतने साल चुप्पी क्यों साधे रखी?”

     

    डॉक्टर ने गहरी सांस ली।

     

    “क्योंकि मुझे अपनी जान से ज्यादा दो बच्चों की जान की चिंता थी।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “हमारी?”

     

    “हां।”

     

    “लेकिन आपने हमारी यादें मिटाईं।”

     

    डॉक्टर की आंखों में दर्द आ गया।

     

    “अगर मैं ऐसा नहीं करता तो तुम दोनों आज जिंदा नहीं होते।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “हमें बचाने के लिए हमारी यादें छीन लीं?”

     

    “हां।”

     

    “और फिर हमें झूठ बोलते रहे?”

     

    “क्योंकि सच तुम्हें फिर उसी नरक में ले जाता।”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने पूछा—

     

    “उस रात आखिर हुआ क्या था?”

     

    डॉक्टर ने कमरे की एक पुरानी कुर्सी पर बैठते हुए कहा—

     

    “आज मैं तुम्हें पच्चीस साल पुरानी पूरी कहानी बताऊंगा।”

     

     

     

    पच्चीस साल पहले की रात

     

    डॉक्टर ने कहना शुरू किया—

     

    “उस रात अस्पताल में सिर्फ दो बच्चों का जन्म नहीं हुआ था।”

     

    “उस रात एक साम्राज्य का वारिस पैदा हुआ था।”

     

    आरव ध्यान से सुन रहा था।

     

    “शेखर उस समय एक बहुत बड़ा कारोबारी था। लेकिन उसके कारोबार के पीछे एक दूसरा चेहरा भी था।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “सम्राट?”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “शेखर ही सम्राट था।”

     

    आरव ने धीमे से कहा—

     

    “तो अभय?”

     

    डॉक्टर बोले—

     

    “अभय उसका छोटा भाई था।”

     

    “लेकिन हमें बताया गया कि अभय ही सम्राट है।”

     

    “यही तो शेखर की सबसे बड़ी चाल थी।”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “शेखर ने अपने अपराधों का इल्जाम अभय के ऊपर डाल दिया था।”

     

    आरव को सब समझ आने लगा।

     

    “इसलिए अभय ने खुद को खलनायक बना लिया।”

     

    “हां।”

     

    “ताकि शेखर का ध्यान मेरी तरफ से हट जाए।”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

     

     

    सिया को क्या पता था?

     

    अमन बेचैनी से पूछ बैठा—

     

    “लेकिन मेरी मां को क्या पता चला था?”

     

    डॉक्टर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “सिया को शेखर के गुप्त कारोबार के बारे में पता चल गया था।”

     

    “कैसे?”

     

    “क्योंकि वह शेखर की एक कंपनी में काम करती थी।”

     

    अमन चौंक गया।

     

    “मेरी मां?”

     

    “हां।”

     

    “लेकिन उन्होंने मुझे कभी नहीं बताया।”

     

    “क्योंकि उन्हें डर था कि तुम भी खतरे में आ जाओगे।”

     

    डॉक्टर ने आगे कहा—

     

    “सिया ने शेखर के खिलाफ सबूत इकट्ठा करना शुरू कर दिया।”

     

    “उसे लाल फाइल मिली।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा—

     

    “लाल फाइल में क्या था?”

     

    डॉक्टर बोले—

     

    “शेखर के सारे गैरकानूनी कारोबार, उसके गुप्त खातों की जानकारी, उसके लोगों के नाम और सबसे बड़ी बात…”

     

    वह रुक गया।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “उसके असली वारिस का नाम।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरव ने धीरे से पूछा—

     

    “मेरा?”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

     

     

    आरव क्यों खतरा था?

     

    “शेखर को डर था कि अगर उसकी मौत हो गई तो उसका साम्राज्य किसी और के हाथ चला जाएगा।”

     

    “इसलिए उसने आरव को अपना उत्तराधिकारी बनाया।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “लेकिन मैं तो बच्चा था।”

     

    “इसीलिए उसने तुम्हें इस्तेमाल किया।”

     

    “कैसे?”

     

    “तुम्हारी असाधारण याददाश्त का।”

     

    डॉक्टर ने बताया—

     

    “तुम्हें बचपन से ही चीजें याद रखने की आदत थी। शेखर तुम्हें कोड, रास्ते और जरूरी बातें दिखाता था।”

     

    “उसे पता था कि तुम भूलोगे नहीं।”

     

    आरव के चेहरे पर घृणा आ गई।

     

    “उसने मुझे इंसान नहीं समझा।”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “उसके लिए तुम उसका बेटा नहीं, उसकी सबसे सुरक्षित तिजोरी थे।”

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    आरोही की आंखों में उसके लिए सिर्फ प्यार था।

     

    “अब तुम्हें किसी के लिए तिजोरी बनने की जरूरत नहीं है।”

     

    आरव ने हल्की मुस्कान दी।

     

    “जब तुम मेरे साथ हो, मुझे किसी चीज से डर नहीं लगता।”

     

    अमन ने दोनों को देखा।

     

    “ये वक्त रोमांस करने का नहीं है।”

     

    आरोही ने उसे घूरकर देखा।

     

    “मैं तो बस उसे हिम्मत दे रही थी।”

     

    अमन मुस्कुरा दिया।

     

    “ठीक है, ठीक है।”

     

    कुछ पल के लिए माहौल हल्का हुआ।

     

    लेकिन डॉक्टर की अगली बात ने सबकी मुस्कान छीन ली।

     

     

     

    सबसे बड़ा धोखा

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “लेकिन लाल फाइल में सिर्फ शेखर के अपराध नहीं थे।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और क्या था?”

     

    “एक सच ऐसा था, जिसे शेखर दुनिया से छुपाना चाहता था।”

     

    “कौन सा?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “आरव का जन्म।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “मेरा जन्म?”

     

    “हां।”

     

    “मेरा जन्म इतना बड़ा राज क्यों था?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “क्योंकि शेखर तुम्हारा जैविक पिता नहीं था।”

     

    आरव की सांस रुक गई।

     

    “क्या?”

     

    अमन ने भी डॉक्टर की तरफ देखा।

     

    “लेकिन अभी तो…”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “यही भ्रम शेखर ने जानबूझकर फैलाया।”

     

    आरव की आवाज कांपने लगी।

     

    “तो मेरे पिता कौन हैं?”

     

    डॉक्टर ने धीरे से कहा—

     

    “अभय।”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “तो ये सच है?”

     

    “हां।”

     

    “और अमन?”

     

    डॉक्टर कुछ पल चुप रहा।

     

    “अमन…”

     

    अमन आगे बढ़ा।

     

    “मेरे पिता कौन हैं?”

     

    डॉक्टर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पिता भी अभय ही हैं।”

     

    अमन स्तब्ध रह गया।

     

    “तो हम दोनों…”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “सगे भाई हो।”

     

    अमन की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    उसने आरव की तरफ देखा।

     

    “भाई…”

     

    आरव ने उसे गले लगा लिया।

     

    दोनों कुछ पल तक चुपचाप एक-दूसरे को पकड़े रहे।

     

     

     

    लेकिन फिर सवाल उठा

     

    अमन ने अचानक पूछा—

     

    “अगर हम दोनों अभय के बेटे हैं तो शेखर ने क्यों कहा कि हम दोनों में से सिर्फ एक उसका बेटा है?”

     

    डॉक्टर चुप हो गया।

     

    आरव ने भी उसकी तरफ देखा।

     

    “हां।”

     

    “वो झूठ क्यों बोला?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “क्योंकि वह तुम्हें एक-दूसरे के खिलाफ करना चाहता था।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “ताकि हम आपस में लड़ें।”

     

    “हां।”

     

    आरव ने मुट्ठी भींच ली।

     

    “वो हमें कभी भाई नहीं बनना देना चाहता था।”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “लेकिन शेखर तुम्हारी एक बात नहीं समझ पाया।”

     

    “क्या?”

     

    “खून से बड़ा रिश्ता भरोसे का होता है।”

     

    आरव और अमन एक-दूसरे की तरफ देखने लगे।

     

     

     

    विराज कहां है?

     

    रुद्र ने अचानक पूछा—

     

    “डॉक्टर, विराज अभी कहां है?”

     

    डॉक्टर का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “शेखर के साथ।”

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “मुझे यही डर था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि विराज सिर्फ शेखर का आदमी नहीं है।”

     

    “तो?”

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “वो शेखर का उत्तराधिकारी बनना चाहता है।”

     

    आरोही ने कहा—

     

    “और अगर लाल फाइल उसे मिल गई तो?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “वो पूरा साम्राज्य अपने नाम कर लेगा।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “तो हमें लाल फाइल पहले ढूंढनी होगी।”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “लाल फाइल यहां नहीं है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “फिर कहां है?”

     

    डॉक्टर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पुराने कमरे में।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “मेरे कमरे में?”

     

    “हां।”

     

    “लेकिन वहां तो कुछ नहीं है।”

     

    डॉक्टर मुस्कुराया।

     

    “तुमने कभी अपनी पुरानी लकड़ी की घोड़े वाली खिलौना गाड़ी देखी?”

     

    आरव के चेहरे पर अचानक बचपन की याद चमकी।

     

    “हां।”

     

    “उसके अंदर क्या था?”

     

    आरव ने सिर पकड़ लिया।

     

    उसे एक दृश्य याद आया।

     

    छोटा आरव…

     

    लकड़ी का घोड़ा हाथ में लिए हुए…

     

    माधवी उसके सामने बैठी थीं।

     

    माधवी कह रही थीं—

     

    “इसे कभी किसी को मत देना।”

     

    आरव की आंखें खुल गईं।

     

    “मुझे याद है।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    “लाल फाइल उस खिलौने के अंदर थी।”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

    “लेकिन वो खिलौना अब वहां नहीं है।”

     

    आरव चौंका।

     

    “तो?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “शेखर उसे पहले ही ढूंढ चुका है।”

     

     

     

    आखिरी उम्मीद

     

    अचानक हवेली के बाहर गाड़ियों के रुकने की आवाज आई।

     

    रुद्र खिड़की के पास गया।

     

    बाहर कई काली गाड़ियां खड़ी थीं।

     

    “वे आ गए।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “शेखर के लोग।”

     

    डॉक्टर ने तुरंत कहा—

     

    “हमें पीछे के रास्ते से निकलना होगा।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “लेकिन लाल फाइल?”

     

    डॉक्टर ने आरव की तरफ देखा।

     

    “फाइल अभी भी तुम्हारे पास है।”

     

    आरव चौंका।

     

    “मेरे पास?”

     

    “हां।”

     

    “लेकिन आपने कहा था कि शेखर उसे ले गया।”

     

    डॉक्टर मुस्कुराया।

     

    “मैंने कहा था कि उसने खिलौना ले लिया।”

     

    “लेकिन फाइल?”

     

    डॉक्टर ने आरव के सीने की तरफ इशारा किया।

     

    “तुम्हारे अंदर छुपी यादों में।”

     

    आरव कुछ समझ नहीं पाया।

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “शेखर ने खिलौना लिया।”

     

    “लेकिन लाल फाइल की असली जानकारी तुमने बचपन में याद कर ली थी।”

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “तो फाइल की जरूरत ही नहीं?”

     

    “नहीं।”

     

    “सारा सच मेरे दिमाग में है?”

     

    “हां।”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    उसे अचानक लाल रंग का एक कमरा दिखाई दिया।

     

    एक मेज…

     

    लाल फाइल…

     

    शेखर…

     

    अभय…

     

    सिया…

     

    माधवी…

     

    और एक छोटा-सा तिजोरी का दरवाजा।

     

    फिर एक नंबर उसकी आंखों के सामने चमका—

     

    1408

     

    आरव ने अचानक आंखें खोल दीं।

     

    “मुझे पासवर्ड याद आ गया।”

     

    रुद्र ने पूछा—

     

    “कौन सा?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “1408।”

     

    डॉक्टर का चेहरा बदल गया।

     

    “नहीं…”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    डॉक्टर ने डरते हुए कहा—

     

    “1408 कोई पासवर्ड नहीं है।”

     

    “तो क्या है?”

     

    डॉक्टर ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “ये वो तारीख है जिस दिन तुम्हारे पिता ने पहली बार किसी को मरवाया था।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    तभी बाहर से गोली चलने की आवाज आई।

     

    धांय!

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “अब हमारे पास ज्यादा समय नहीं है।”

     

    आरव ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।

     

    “चलो।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “और डॉक्टर?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “मैं भी चलूंगा।”

     

    वे पीछे के दरवाजे की तरफ बढ़े।

     

    लेकिन जैसे ही आरव ने दरवाजा खोला…

     

    सामने शेखर खड़े थे।

     

    उनके साथ विराज भी था।

     

    शेखर के हाथ में लाल फाइल थी।

     

    उन्होंने फाइल ऊपर उठाई और मुस्कुराते हुए कहा—

     

    “जिस चीज को तुम ढूंढ रहे हो, वो मेरे पास है, आरव।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    शेखर चौंके।

     

    आरव की आंखों में अब डर नहीं था।

     

    “असली फाइल मेरे पास है।”

     

    शेखर की मुस्कान गायब हो गई।

     

    आरव ने आगे बढ़कर कहा—

     

    “क्योंकि मुझे सब याद आ गया है।”

     

    शेखर के चेहरे पर पहली बार डर दिखाई दिया।

     

    और विराज ने धीरे से अपनी बंदूक आरव की तरफ उठा दी।

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 36

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 36

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एपिसोड – 36 : शेखर का असली चेहरा

     

    “क्योंकि अब मेरा बेटा मुझे वापस चाहिए।”

     

    स्क्रीन पर शेखर की बदली हुई आवाज गूंजते ही कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरव की आंखें स्क्रीन पर जमी थीं।

     

    वह जिस आदमी को पूरी जिंदगी अपना पिता मानता आया था, वही आदमी अब किसी खतरनाक अपराधी की तरह उसके सामने था।

     

    आरोही ने धीरे से आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा भी नहीं।

     

    उसकी नजर सिर्फ स्क्रीन पर थी।

     

    “पापा… ये आप नहीं हो सकते।”

     

    स्क्रीन पर शेखर हल्का सा मुस्कुराए।

     

    “यही तो गलती है, आरव। तुमने मुझे कभी समझने की कोशिश ही नहीं की।”

     

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मैंने आपको अपना पिता समझा।”

     

    “और मैंने तुम्हें अपना बेटा।”

     

    “तो फिर ये सब क्यों?”

     

    शेखर कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “क्योंकि तुम सिर्फ मेरे बेटे नहीं हो, आरव।”

     

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    “तो क्या हूं मैं?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “तुम उस साम्राज्य के वारिस हो, जिसे मैंने पच्चीस साल पहले खड़ा किया था।”

     

    अमन ने गुस्से में कहा—

     

    “तुम्हें शर्म नहीं आती?”

     

    शेखर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम बीच में मत बोलो।”

     

    अमन चीखा—

     

    “मेरी मां की मौत में तुम्हारा हाथ था?”

     

    शेखर के चेहरे पर मुस्कान गायब हो गई।

     

    “तुम्हारी मां ने बहुत बड़ी गलती की थी।”

     

    “क्या गलती?”

     

    “उसने मेरे खिलाफ जाने की कोशिश की।”

     

    अमन की आंखें लाल हो गईं।

     

    “तुमने उसे मारा?”

     

    शेखर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    अमन ने फिर पूछा—

     

    “बोलो!”

     

    शेखर ने धीरे से कहा—

     

    “मैंने सिर्फ आदेश दिया था।”

     

    अमन जैसे पत्थर का हो गया।

     

    “तो हत्यारा कौन था?”

     

    शेखर की नजर विराज की तरफ गई।

     

    “वही।”

     

    विराज चुप खड़ा था।

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुमने मेरी मां को मारा?”

     

    विराज ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    अमन की मुट्ठियां कस गईं।

     

    लेकिन इस बार शेखर की आवाज आई—

     

    “लेकिन गोली चलाने का आदेश मेरा था।”

     

    अमन की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करूंगा।”

     

    शेखर हंसे।

     

    “मुझे तुम्हारी माफी की जरूरत नहीं।”

     

    आरव ने अभय की तरफ देखा।

     

    “तो आप कौन हैं?”

     

    अभय चुप था।

     

    “आपने मुझे इतने साल क्यों बचाया?”

     

    अभय ने धीरे से कहा—

     

    “क्योंकि तुम्हारी मां ने मुझसे वादा लिया था।”

     

    “कौन-सा वादा?”

     

    “कि मैं तुम्हें शेखर से बचाऊंगा।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “मतलब आप मेरे दुश्मन नहीं थे?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    “फिर सम्राट कौन था?”

     

    अभय ने स्क्रीन की तरफ देखा।

     

    “शेखर।”

     

    आरव की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “तो आपने खुद को सम्राट क्यों बताया?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “क्योंकि शेखर को लगा कि अगर दुनिया मुझे सम्राट समझेगी, तो वह तुम्हें मेरे पीछे भेज देगा।”

     

    “और आप?”

     

    “मैं तुम्हें बचाना चाहता था।”

     

    आरव ने दर्द से कहा—

     

    “लेकिन आपने भी मुझसे झूठ बोला।”

     

    अभय ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि कभी-कभी किसी की जान बचाने के लिए खुद को खलनायक बनना पड़ता है।”

     

    माधवी अब तक चुप थीं।

     

    आरव उनके पास गया।

     

    “मां, क्या आपको भी पता था?”

     

    माधवी ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “पापा असली सम्राट हैं?”

     

    “हां।”

     

    “और आपने मुझे उनसे बचाया?”

     

    माधवी रो पड़ीं।

     

    “मैंने तुम्हें सिर्फ उनसे नहीं…”

     

    वह रुक गईं।

     

    “पूरी दुनिया से बचाया।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    माधवी ने कहा—

     

    “क्योंकि तुम्हारे जन्म के समय शेखर ने तुम्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था।”

     

    “मैंने?”

     

    “हां।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    माधवी ने कहा—

     

    “क्योंकि तुम्हारे अंदर एक खास क्षमता थी।”

     

    आरव ने हैरानी से पूछा—

     

    “कैसी क्षमता?”

     

    माधवी ने जवाब नहीं दिया।

     

    अभय ने कहा—

     

    “तुम्हारी याददाश्त।”

     

    आरव चौंका।

     

    “मेरी?”

     

    “तुम बचपन में चीजें सिर्फ देखते नहीं थे।”

     

    “तो?”

     

    “तुम उन्हें कभी भूलते नहीं थे।”

     

    आरव को अचानक अपनी बचपन की धुंधली यादें समझ आने लगीं।

     

    लोगों के चेहरे।

     

    कमरों के रास्ते।

     

    कागजों पर लिखे शब्द।

     

    पासवर्ड।

     

    सब कुछ।

     

    अभय ने कहा—

     

    “शेखर ने तुम्हारी इसी क्षमता का इस्तेमाल किया।”

     

    आरव ने स्क्रीन की तरफ देखा।

     

    “कैसे?”

     

    शेखर ने जवाब दिया—

     

    “तुम्हें याद नहीं होगा।”

     

    “क्या?”

     

    “मैं तुम्हें छोटी-छोटी चीजें याद करवाता था।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम मेरे साम्राज्य के सारे गुप्त रास्ते, कोड और खातों को अपने दिमाग में सुरक्षित रखते थे।”

     

    आरव का चेहरा बदल गया।

     

    “तो मैं…”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “मेरी चलती-फिरती तिजोरी था।”

     

    आरोही ने आरव की तरफ देखा।

     

    उसकी आंखों में दर्द था।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने धीरे से कहा—

     

    “इसीलिए मुझे बचपन की बातें याद नहीं थीं।”

     

    अभय ने कहा—

     

    “तुम्हारी यादें मिटा दी गई थीं।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “किसने?”

     

    अभय ने शेखर की तरफ देखा।

     

    “उसने।”

     

    स्क्रीन पर शेखर मुस्कुराए।

     

    “तुम्हारी यादें वापस आ रही हैं, आरव।”

     

    “और मैं चाहता भी यही हूं।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मुझे अपनी आखिरी चाबी चाहिए।”

     

    “कौन-सी चाबी?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “तुम।”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    “तुम्हारे दिमाग में मेरे साम्राज्य की सबसे बड़ी तिजोरी का पासवर्ड है।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “लेकिन उसे कुछ याद नहीं।”

     

    शेखर हंसे।

     

    “याद आएगा।”

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “और अगर नहीं आया?”

     

    शेखर की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “तो उसकी मां मर जाएगी।”

     

    आरव का चेहरा सख्त हो गया।

     

    “मां को हाथ मत लगाना।”

     

    “फिर मेरे पास आओ।”

     

    “मैं आऊंगा।”

     

    आरोही ने तुरंत कहा—

     

    “आरव, नहीं!”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मुझे जाना होगा।”

     

    “वो जाल है।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “फिर भी?”

     

    आरव ने धीरे से कहा—

     

    “अगर मैं नहीं गया तो मां मर जाएंगी।”

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तो मैं भी चलूंगी।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं तुम्हें खतरे में नहीं डाल सकता।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

     

    “तुम्हें याद है तुमने मुझसे क्या कहा था?”

     

    आरव चुप रहा।

     

    आरोही बोली—

     

    “तुमने कहा था कि अब से मेरी जिंदगी में जो भी आएगा, उसका सामना हम दोनों करेंगे।”

     

    आरव की आंखें नम हो गईं।

     

    “आरोही…”

     

    “मैं तुम्हें अकेला नहीं जाने दूंगी।”

     

    अमन भी आगे आया।

     

    “और मैं भी।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “ये मेरा परिवार है।”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “अब हमारा।”

     

    अभय ने दोनों भाइयों को देखा।

     

    उसकी आंखों में हल्की नमी थी।

     

    स्क्रीन पर शेखर ने कहा—

     

    “ठीक है।”

     

    “तुम तीनों आ सकते हो।”

     

    “लेकिन एक शर्त है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    “अभय तुम्हारे साथ नहीं आएगा।”

     

    अभय ने तुरंत कहा—

     

    “क्यों?”

     

    शेखर हंसा।

     

    “क्योंकि अगर तुम मेरे सामने आए तो मैं माधवी को गोली मार दूंगा।”

     

    माधवी ने चिल्लाकर कहा—

     

    “अभय, मत आना!”

     

    अभय ने आंखें बंद कर लीं।

     

    आरव ने कहा—

     

    “मैं अकेला नहीं आऊंगा।”

     

    शेखर बोला—

     

    “तुम्हारे साथ सिर्फ आरोही और अमन आ सकते हैं।”

     

    “और रुद्र?”

     

    “नहीं।”

     

    रुद्र ने तुरंत कहा—

     

    “मैं फिर भी जाऊंगा।”

     

    शेखर मुस्कुराया।

     

    “मुझे पता था।”

     

    स्क्रीन बंद हो गई।

     

    कमरे में फिर खामोशी छा गई।

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “हमें शेखर की लोकेशन ढूंढनी होगी।”

     

    अभय ने कहा—

     

    “मुझे पता है।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “कहां?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “पुराना हवेली वाला घर।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “वही जहां मैं बचपन में रहता था?”

     

    “हां।”

     

    “वह तो बंद है।”

     

    “बाहर से।”

     

    अभय ने दीवार की तरफ देखा।

     

    “नीचे पूरा साम्राज्य चलता है।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “तो हमें वहीं जाना होगा।”

     

    माधवी ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “बेटा…”

     

    आरव ने मां की तरफ देखा।

     

    “मैं आपको वापस लेकर आऊंगा।”

     

    माधवी रोते हुए बोलीं—

     

    “अपने पिता पर भरोसा मत करना।”

     

    आरव चौंका।

     

    “किस पिता पर?”

     

    माधवी ने अभय की तरफ देखा।

     

    फिर बोलीं—

     

    “किसी पर नहीं।”

     

    आरव कुछ समझ नहीं पाया।

     

    रात और गहरी हो चुकी थी।

     

    आरव, आरोही, अमन और रुद्र हवेली की तरफ बढ़ रहे थे।

     

    अभय पीछे रह गया।

     

    उसने जाते हुए आरव को सिर्फ इतना कहा—

     

    “बेटा…”

     

    आरव पलटा।

     

    अभय ने कहा—

     

    “अगर वहां तुम्हें मेरी और शेखर की कोई तस्वीर मिले… तो उसे ध्यान से देखना।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उस तस्वीर में तुम्हारे सवाल का जवाब छिपा है।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “मैं वापस आऊंगा।”

     

    अभय ने कहा—

     

    “मैं इंतजार करूंगा।”

     

    हवेली का दरवाजा खुला था।

     

    आरव ने अंदर कदम रखा।

     

    अजीब सन्नाटा था।

     

    दीवारों पर पुरानी तस्वीरें लगी थीं।

     

    अमन एक तस्वीर के सामने रुक गया।

     

    “आरव… ये देखो।”

     

    आरव ने तस्वीर देखी।

     

    उसमें शेखर और अभय साथ खड़े थे।

     

    लेकिन उनके बीच एक तीसरा आदमी भी था।

     

    चेहरा आधा अंधेरे में था।

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “ये कौन है?”

     

    रुद्र ने तस्वीर देखते ही अपना चेहरा बदल लिया।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “रुद्र?”

     

    रुद्र चुप रहा।

     

    आरव ने फिर पूछा—

     

    “तुम इसे जानते हो?”

     

    रुद्र ने धीमे से कहा—

     

    “हां।”

     

    “कौन है?”

     

    रुद्र ने जवाब देने से पहले लंबी सांस ली।

     

    फिर बोला—

     

    “यही वो आदमी है, जिसने तुम दोनों की जिंदगी बर्बाद करने की पूरी साजिश रची थी।”

     

    आरव ने तस्वीर को और करीब से देखा।

     

    चेहरा धीरे-धीरे रोशनी में आया।

     

    अमन के हाथ से टॉर्च गिर गई।

     

    आरोही के मुंह से चीख निकल गई।

     

    क्योंकि तस्वीर में मौजूद तीसरा आदमी कोई अजनबी नहीं था।

     

    वह था—

     

    डॉक्टर।

     

    वही डॉक्टर…

     

    जिसने दावा किया था कि उसने आरव और अमन को बचाया था।

     

    और उसी पल पीछे से दरवाजा बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    अंधेरे में डॉक्टर की आवाज गूंजी—

     

    “अब तुम्हें मेरी पूरी कहानी सुननी होगी।”

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 35

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 35

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एपिसोड – 35 : दो भाइयों में से असली बेटा कौन?

     

    कमरे में अंधेरा था।

     

    अभय की आवाज चारों तरफ गूंज रही थी—

     

    “अब यही पता करना है कि तुम दोनों में से मेरा असली बेटा कौन है।”

     

    आरव ने तुरंत कहा—

     

    “ये कैसी बकवास है? हम दोनों की जिंदगी से खेलना बंद करो!”

     

    अभय की हंसी सुनाई दी।

     

    “मैं खेल नहीं रहा, आरव। मैं तुम्हें तुम्हारी पहचान बता रहा हूं।”

     

    अमन ने गुस्से में कहा—

     

    “हमें किसी पहचान की जरूरत नहीं है। हमारी मां ने हमें पाला है, वही हमारी पहचान है।”

     

    अभय कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “बहुत अच्छी बात कही।”

     

    अचानक कमरे की लाइट जल गई।

     

    सामने अभय खड़ा था।

     

    लेकिन इस बार उसके हाथ में बंदूक नहीं थी।

     

    उसके हाथ में एक पुरानी फाइल थी।

     

    वह धीरे-धीरे दोनों के पास आया।

     

    “इस फाइल में तुम्हारे जन्म का सच है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “तो खोलो।”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “इतनी जल्दी?”

     

    “हां।”

     

    “सच सुनने के लिए तैयार हो?”

     

    आरव ने बिना झिझक कहा—

     

    “हां।”

     

    अमन भी उसके पास आकर खड़ा हो गया।

     

    “मैं भी।”

     

    अभय ने फाइल खोली।

     

    पहले पन्ने पर दो जन्म प्रमाण-पत्र थे।

     

    एक पर लिखा था—

     

    आरव — जन्म: 14 अगस्त

     

    दूसरे पर—

     

    अमन — जन्म: 14 अगस्त

     

    आरोही हैरान रह गई।

     

    “दोनों की जन्मतिथि एक ही?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “लेकिन हमें हमेशा बताया गया कि हम अलग-अलग परिवारों में पैदा हुए थे।”

     

    अभय ने कहा—

     

    “तुम दोनों एक ही रात पैदा हुए थे।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और हमारी मां?”

     

    “अलग थीं।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “तो फिर तुम हम दोनों के पिता कैसे हो सकते हो?”

     

    अभय ने उसकी तरफ देखा।

     

    “यही तो इस कहानी का सबसे बड़ा रहस्य है।”

    अभय ने अगला पन्ना खोला।

     

    उसमें दो महिलाओं की तस्वीर थी।

     

    एक तस्वीर में माधवी थीं।

     

    दूसरी में सिया।

     

    आरव तस्वीर देखते ही चौंक गया।

     

    “तो मां और सिया एक-दूसरे को पहले से जानती थीं।”

     

    अभय ने कहा—

     

    “सिर्फ जानती नहीं थीं।”

     

    “तो?”

     

    “दोनों ने मिलकर तुम्हें बचाया था।”

     

    माधवी की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    आरव ने उनकी तरफ देखा।

     

    “मां?”

     

    माधवी चुप रहीं।

     

    अभय ने कहा—

     

    “तुम्हारी मां और सिया ने एक समझौता किया था।”

     

    “कैसा समझौता?”

     

    “अगर मेरे दुश्मनों को मेरे बच्चों के बारे में पता चलता, तो दोनों बच्चों की जान खतरे में पड़ जाती।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “तो हमें अलग क्यों रखा गया?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “ताकि कोई तुम्हें एक-दूसरे से जोड़ न सके।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “लेकिन फिर हमें भाई जैसा रिश्ता क्यों महसूस होता है?”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि खून का रिश्ता तुम्हें बार-बार एक-दूसरे तक खींचता रहा।”

     

    अभय ने एक और कागज निकाला।

     

    “ये तुम्हारी डीएनए रिपोर्ट है।”

     

    आरव ने कागज ले लिया।

     

    उसकी नजर रिपोर्ट पर गई।

     

    वह पढ़ने लगा।

     

    कुछ सेकंड बाद उसका चेहरा बदल गया।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव ने रिपोर्ट उसकी तरफ बढ़ा दी।

     

    अमन ने पढ़ा।

     

    उसकी आंखें फैल गईं।

     

    “ये…”

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “क्या लिखा है?”

     

    अमन कुछ नहीं बोला।

     

    आरव ने धीरे से कहा—

     

    “रिपोर्ट के मुताबिक…”

     

    वह रुक गया।

     

    अभय ने बात पूरी की—

     

    “तुम दोनों में से केवल एक मेरा बेटा है।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “लेकिन कौन?”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “यही तो तुम्हें खुद पता लगाना है।”

     

    आरव ने गुस्से में कहा—

     

    “तुम्हें पता है।”

     

    “बिल्कुल।”

     

    “तो बताओ।”

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “क्योंकि अगर मैंने बता दिया, तो तुम दोनों में से एक की जिंदगी हमेशा के लिए बदल जाएगी।”

     

    अमन ने आरव की तरफ देखा।

     

    “भाई…”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां?”

     

    “अगर मैं तुम्हारा भाई नहीं हुआ तो?”

     

    आरव ने तुरंत कहा—

     

    “तो भी तुम मेरे भाई रहोगे।”

     

    अमन की आंखें भर आईं।

     

    “और अगर तुम मेरे भाई नहीं हुए?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “तब भी।”

     

    दोनों ने एक-दूसरे को गले लगा लिया।

     

    आरोही की आंखों में भी आंसू आ गए।

     

    अभय उन्हें देखता रहा।

     

    उसके चेहरे पर पहली बार कोई भावना दिखाई दी।

     

    शायद गर्व।

     

    शायद दर्द।

     

    आरव मां के पास गया।

     

    “मां, आप जानती थीं कि हम दोनों में से कौन अभय का बेटा है?”

     

    माधवी ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    आरव की सांस रुक गई।

     

    “आपको पता है?”

     

    “हां।”

     

    “तो बताइए।”

     

    माधवी रोने लगीं।

     

    “मैं नहीं बता सकती।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैंने वादा किया था।”

     

    “किससे?”

     

    माधवी ने अभय की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पिता से।”

     

    आरव ने अभय की तरफ देखा।

     

    “आपने मां से भी सच छुपाने को कहा?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    माधवी ने तुरंत कहा—

     

    “अभय ने मुझे मजबूर नहीं किया था।”

     

    “तो फिर?”

     

    माधवी बोलीं—

     

    “मैंने खुद वादा किया था।”

     

    “क्यों?”

     

    माधवी ने आरव का चेहरा पकड़ लिया।

     

    “क्योंकि उस रात अगर मैंने सच बता दिया होता…”

     

    उनकी आवाज टूट गई।

     

    “तो तुम दोनों में से एक बच्चा आज जिंदा नहीं होता।”

     

    अचानक दीवार के पीछे से बीप की आवाज आने लगी।

     

    रुद्र तुरंत चौकन्ना हो गया।

     

    “ये क्या है?”

     

    अभय का चेहरा बदल गया।

     

    उसने तुरंत कहा—

     

    “सब पीछे हटो।”

     

    कुछ ही सेकंड बाद—

     

    धड़ाम!

     

    दीवार का एक हिस्सा टूट गया।

     

    धुआं कमरे में भर गया।

     

    आरोही खांसने लगी।

     

    आरव ने उसे अपनी तरफ खींच लिया।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    “हां।”

     

    रुद्र ने चारों तरफ देखा।

     

    “कोई बाहर से हमला कर रहा है।”

     

    अभय ने कहा—

     

    “विराज।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “उसे लाल फाइल चाहिए।”

     

    अभय ने सिर हिलाया।

     

    “उसे सिर्फ फाइल नहीं चाहिए।”

     

    “फिर?”

     

    “वो चाहता है कि तुम दोनों एक-दूसरे के खिलाफ हो जाओ।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “क्यों?”

     

    अभय ने जवाब दिया—

     

    “क्योंकि तुम दोनों मिलकर उससे ज्यादा ताकतवर हो।”

     

    अचानक कमरे की स्क्रीन चालू हो गई।

     

    विराज दिखाई दिया।

     

    उसके चेहरे पर वही खतरनाक मुस्कान थी।

     

    “अभय…”

     

    अभय ने स्क्रीन की तरफ देखा।

     

    “विराज।”

     

    विराज हंसा।

     

    “तुमने आखिरकार अपने बच्चों को सच बता ही दिया।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “तुम्हें हमसे क्या चाहिए?”

     

    विराज ने कहा—

     

    “मुझे सिर्फ लाल फाइल चाहिए।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उस फाइल में मेरी बर्बादी का राज है।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “तुमने मेरी मां को मारा।”

     

    विराज चुप हो गया।

     

    फिर बोला—

     

    “हां।”

     

    अमन की आंखें लाल हो गईं।

     

    “मैं तुम्हें छोड़ूंगा नहीं।”

     

    विराज हंसा।

     

    “पहले अपने पिता को तो पहचान लो।”

     

    अभय की आंखें सिकुड़ गईं।

     

    “विराज, तुम्हारा खेल खत्म हो चुका है।”

     

    विराज ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    फिर स्क्रीन पर एक वीडियो चला।

     

    उसमें शेखर दिखाई दे रहे थे।

     

    वो एक कुर्सी से बंधे हुए थे।

     

    आरव चौंक गया।

     

    “पापा!”

     

    विराज ने कहा—

     

    “अगर लाल फाइल नहीं मिली, तो शेखर मरेंगे।”

     

    शेखर ने कैमरे की तरफ देखा।

     

    “आरव… मेरी बात सुनो।”

     

    आरव स्क्रीन के पास चला गया।

     

    “पापा!”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “जो कुछ भी हो रहा है, उसमें अभय की हर बात पर भरोसा मत करना।”

     

    अभय ने भौंहें सिकोड़ लीं।

     

    शेखर ने आगे कहा—

     

    “और लाल फाइल…”

     

    वह रुक गए।

     

    विराज ने उन्हें थप्पड़ मारा।

     

    “बोलो!”

     

    शेखर ने फिर कहा—

     

    “लाल फाइल में जो लिखा है… वो पूरा सच नहीं है।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “क्या?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “उसमें एक नाम झूठा लिखा गया है।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “किसका?”

     

    शेखर ने स्क्रीन की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “अभय का।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरव ने धीरे से अभय की तरफ देखा।

     

    अभय के चेहरे पर पहली बार डर दिखाई दिया।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “पापा… मेरा मतलब… अभय…”

     

    वह खुद ही रुक गया।

     

    “क्या ये सच है?”

     

    अभय ने कुछ नहीं कहा।

     

    आरव ने जोर से पूछा—

     

    “क्या लाल फाइल में आपका नाम झूठा लिखा है?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “हां।”

     

    अमन चौंका।

     

    “तो तुम असली सम्राट नहीं हो?”

     

    अभय ने आंखें बंद कर लीं।

     

    कुछ पल बाद उसने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “तो असली सम्राट कौन है?”

     

    अभय ने जवाब नहीं दिया।

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “मुझे लगता है अब समय आ गया है।”

     

    अभय ने उसकी तरफ देखा।

     

    “रुद्र…”

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “तुम्हें सच बताना ही होगा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन है असली सम्राट?”

     

    रुद्र ने गहरी सांस ली।

     

    फिर धीरे-धीरे कहा—

     

    “जिसे तुमने इतने साल अपना सबसे बड़ा रक्षक समझा…”

     

    आरव की धड़कन तेज हो गई।

     

    रुद्र ने आगे कहा—

     

    “वही असली सम्राट है।”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा—

     

    “कौन?”

     

    रुद्र की नजर सीधे…

     

    शेखर पर गई।

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “पापा…?”

     

    अभय ने तुरंत कहा—

     

    “नहीं!”

     

    लेकिन उसी पल स्क्रीन पर बंधे शेखर मुस्कुराए।

     

    उनकी आंखों में एक अजीब चमक थी।

     

    उन्होंने कैमरे की तरफ देखा और कहा—

     

    “बहुत देर कर दी, अभय।”

     

    फिर शेखर ने अपना चेहरा ऊपर उठाया।

     

    और उनकी आवाज पूरी तरह बदल गई—

     

    “क्योंकि अब मेरा बेटा मुझे वापस चाहिए।”

     

    आरव के हाथ से लाल फाइल गिर गई।

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 34

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 34

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एपिसोड – 34 : पिता के रूप में सबसे बड़ा दुश्मन

     

    “कैसे हो, बेटा?”

     

    अभय की आवाज सुरंग में गूंज उठी।

     

    आरव उसे बस देखता रह गया।

     

    जिस चेहरे को उसने कभी नहीं देखा था, आज वही चेहरा उसके सामने था।

     

    वही आदमी…

     

    जिसे वह इतने सालों से अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझता रहा।

     

    वही आदमी…

     

    जिससे उसके परिवार ने उसे बचाकर रखा था।

     

    और अब उसकी मां खुद कह चुकी थी—

     

    “यही तुम्हारा पिता है।”

     

    आरव के होंठ कांपने लगे।

     

    “आप…”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “हां।”

     

    “आप ही सम्राट हैं?”

     

    “हां।”

     

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तो इतने सालों से मैं जिससे लड़ रहा था…”

     

    अभय ने बात पूरी की—

     

    “वो तुम्हारा अपना पिता था।”

     

    अमन ने तुरंत बंदूक तान दी।

     

    “तुमने सिया को मारा!”

     

    अभय ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारी मां ने खुद अपने लिए मौत चुनी थी।”

     

    अमन गुस्से में उसकी तरफ बढ़ा।

     

    “झूठ!”

     

    रुद्र ने उसे पकड़ लिया।

     

    “अमन, अभी नहीं।”

     

    अमन चीखा,

     

    “मुझे छोड़ो!”

     

    अभय शांत खड़ा रहा।

     

    उसके चेहरे पर डर का नाम तक नहीं था।

     

    आरव ने अपनी मां की तरफ देखा।

     

    “मां… आपने मुझे कभी क्यों नहीं बताया?”

     

    माधवी रोते हुए बोलीं,

     

    “क्योंकि मैं तुम्हें बचाना चाहती थी।”

     

    “लेकिन आप जानती थीं कि मेरे पिता कौन हैं।”

     

    “हां।”

     

    “और ये भी कि ये सम्राट हैं?”

     

    माधवी ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    आरव की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “तो आपने मुझे इतने साल झूठ में क्यों रखा?”

     

    माधवी उसके पास आईं।

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता को तुमसे एक खास चीज चाहिए थी।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    अभय खुद जवाब देने लगा।

     

    “तुम।”

     

    आरव उसकी तरफ देखने लगा।

     

    अभय ने कहा,

     

    “मुझे लाल फाइल से ज्यादा तुम्हारी जरूरत थी।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उस फाइल में जो सच था, वो तुम्हारे अंदर भी छिपा था।”

     

    आरव को कुछ समझ नहीं आया।

     

    “मेरे अंदर?”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें बचपन में जो कुछ भूलाया गया था, वो सिर्फ यादें नहीं थीं।”

     

    “तो क्या था?”

     

    “एक राज।”

     

    अचानक आरव के सिर में तेज दर्द होने लगा।

     

    उसकी आंखों के सामने तस्वीरें घूमने लगीं।

     

    एक छोटा कमरा…

     

    माधवी रो रही थीं…

     

    सिया उसके पास खड़ी थीं…

     

    अमन भी वहीं था।

     

    दोनों बच्चे एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए थे।

     

    और सामने अभय खड़ा था।

     

    छोटे आरव ने उससे पूछा था—

     

    “आप हमें क्यों मारना चाहते हो?”

     

    अभय की आवाज गूंजी—

     

    “क्योंकि तुम दोनों मेरे रास्ते में हो।”

     

    आरव ने आंखें खोल दीं।

     

    वह जमीन पर बैठ गया।

     

    आरोही तुरंत उसके पास आई।

     

    “आरव!”

     

    आरव ने सिर पकड़ लिया।

     

    “मुझे सब याद आ रहा है।”

     

    अमन उसके पास आ गया।

     

    “क्या याद आया?”

     

    आरव ने अभय की तरफ देखा।

     

    “तुमने हमें बचपन में मारने की कोशिश की थी।”

     

    अभय कुछ नहीं बोला।

     

    आरव की आंखों में नफरत भर गई।

     

    “तुम मेरे पिता हो… फिर भी तुमने मुझे मारना चाहा?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “क्योंकि उस वक्त तुम मेरे बेटे नहीं थे।”

     

    आरव चौंका।

     

    “क्या?”

     

    अभय धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    “तुम मेरे बेटे थे… लेकिन मेरे दुश्मन भी।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मैं एक बच्चा था!”

     

    “बच्चे कभी-कभी सबसे बड़े राज लेकर पैदा होते हैं।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “ये कैसी बकवास है?”

     

    अभय ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम भी उस राज का हिस्सा हो।”

     

    अमन चुप हो गया।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “आखिर वो राज है क्या?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “पच्चीस साल पहले एक समझौता हुआ था।”

     

    “किसके बीच?”

     

    “शेखर, सिया और मेरे बीच।”

     

    माधवी ने रोते हुए कहा,

     

    “अभय, अब बस करो।”

     

    अभय ने उनकी तरफ देखा।

     

    “नहीं माधवी। अब सच पूरा होगा।”

     

     

    अभय ने कहा,

     

    “उस समय मेरे पास बहुत ताकत थी।”

     

    “लेकिन सिया के पास मेरे खिलाफ सबूत थे।”

     

    “शेखर ने सिया का साथ दिया।”

     

    “माधवी ने बच्चों को छिपाया।”

     

    “और फिर…”

     

    वह रुक गया।

     

    “एक रात सब कुछ बदल गया।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “सिया ने तुम्हें और अमन को एक ऐसी चीज दिखाई थी, जिसे तुम दोनों ने अपनी आंखों से देखा।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “हमने क्या देखा था?”

     

    अभय ने जवाब दिया—

     

    “तुमने लाल फाइल देखी थी।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “बस?”

     

    “नहीं।”

     

    अभय की नजर दोनों पर गई।

     

    “तुमने उस फाइल के अंदर एक तस्वीर भी देखी थी।”

     

    अमन की आंखें सिकुड़ गईं।

     

    “कौन-सी तस्वीर?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “तुम दोनों के पिता की।”

     

    अमन स्तब्ध रह गया।

     

    “मेरे पिता की?”

     

    अभय ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो मेरे पिता कौन हैं?”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “मैं।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “और अमन के?”

     

    अभय ने अमन की तरफ देखा।

     

    कुछ पल चुप रहने के बाद बोला—

     

    “वो भी मैं हूं।”

     

    अमन का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “नहीं!”

     

    माधवी ने तुरंत कहा,

     

    “अभय, झूठ मत बोलो!”

     

    अभय ने कहा,

     

    “मैं झूठ नहीं बोल रहा।”

     

    अमन ने अपनी मां की डायरी याद की।

     

    सिया ने कभी उसके पिता का नाम साफ नहीं बताया था।

     

    बस इतना कहा था—

     

    “तुम्हारे पिता से दूर रहना।”

     

    अमन ने कांपती आवाज में पूछा,

     

    “तो मेरी मां और तुम…”

     

    अभय ने कहा,

     

    “हम एक-दूसरे से प्यार करते थे।”

     

    माधवी की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    आरव ने मां की तरफ देखा।

     

    “मां…”

     

    माधवी ने नजरें झुका लीं।

     

    अभय बोला—

     

    “लेकिन सिया ने मुझे छोड़ दिया।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उसे मेरे अंदर का राक्षस दिखाई देने लगा था।”

     

    अमन पीछे हट गया।

     

    “तो मेरी पूरी जिंदगी झूठ थी?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “हां।”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    उसकी आंखों में आंसू थे।

     

    “मेरी मां ऐसी नहीं थी।”

     

    अभय ने कहा,

     

    “तुम्हारी मां बहुत अच्छी थी।”

     

    “तो फिर तुमने उसे क्यों मारा?”

     

    अभय कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “मैंने नहीं मारा।”

     

    अमन चौंक गया।

     

    “क्या?”

     

    “सिया की मौत के पीछे कोई और था।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “विराज?”

     

    अभय ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    अमन की आंखों में गुस्सा भर गया।

     

    “तो तुमने उसे बचाया क्यों नहीं?”

     

    अभय की आंखों में पहली बार दर्द आया।

     

    “क्योंकि जब तक मुझे सच पता चला… बहुत देर हो चुकी थी।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “पापा कहां हैं?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “तुम्हारा मतलब शेखर से है?”

     

    “हां।”

     

    “वो अभी जिंदा हैं।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    “मुझे उनसे मिलना है।”

     

    अभय ने कहा,

     

    “मिलोगे।”

     

    “कहां?”

     

    “उसी जगह जहां ये कहानी शुरू हुई थी।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कहां?”

     

    अभय ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आरव के बचपन वाला घर।”

     

    आरव चौंका।

     

    “वो घर तो बीस साल पहले जल गया था।”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “घर जला था।”

     

    “लेकिन उसके नीचे का कमरा नहीं।”

     

    अभय ने सुरंग की दीवार पर हाथ रखा।

     

    एक गुप्त दरवाजा खुल गया।

     

    अंदर सीढ़ियां थीं।

     

    “नीचे चलो।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “वहां क्या है?”

     

    “तुम्हारे बचपन का आखिरी सच।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “और अगर ये जाल हुआ?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “तो तुम मुझे मार देना।”

     

    अमन ने बंदूक कसकर पकड़ ली।

     

    “मैं मार दूंगा।”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “मुझे पता है।”

     

    वे सब नीचे उतरने लगे।

     

    माधवी सबसे पीछे थीं।

     

    आरोही ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “आंटी, आप ठीक हैं?”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “मुझे डर लग रहा है।”

     

    “किससे?”

     

    माधवी ने धीमे से कहा—

     

    “सच से।”

     

     

    करीब दस मिनट बाद वे एक पुराने कमरे में पहुंचे।

     

    आरव कमरे को देखते ही रुक गया।

     

    “ये…”

     

    उसकी आंखों में बचपन की यादें लौटने लगीं।

     

    यही वह जगह थी जहां वह बचपन में खेलता था।

     

    दीवार पर एक पुरानी तस्वीर अभी भी लगी थी।

     

    उसमें आरव, माधवी और शेखर थे।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे एक और आदमी खड़ा था।

     

    अभय।

     

    आरव ने तस्वीर उतारी।

     

    पीछे एक छोटा कागज चिपका था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “जिस दिन आरव को सच पता चलेगा, उसी दिन दूसरा बच्चा वापस आएगा।”

     

    अमन ने पढ़ते ही कहा,

     

    “दूसरा बच्चा?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम?”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    “शायद।”

     

    अचानक कमरे की दूसरी दीवार खुल गई।

     

    अंदर एक पुराना बक्सा रखा था।

     

    आरव ने बक्सा खोला।

     

    उसमें…

     

    एक लाल फाइल थी।

     

    सबकी आंखें फैल गईं।

     

    आरव ने फाइल उठाई।

     

    अभय ने कहा—

     

    “यही है वो चीज जिसके लिए इतने सालों से लोग एक-दूसरे को मारते रहे।”

     

    आरव ने फाइल खोली।

     

    पहले पन्ने पर दो नाम थे—

     

    आरव

     

    अमन

     

    और नीचे एक तीसरा नाम।

     

    आरव की आंखें उस नाम पर टिक गईं।

     

    उसने धीरे से पढ़ा—

     

    “वास्तविक उत्तराधिकारी…”

     

    आगे का शब्द देखकर आरव के हाथ कांपने लगे।

     

    अमन ने पूछा,

     

    “क्या लिखा है?”

     

    आरव ने फाइल उसकी तरफ बढ़ा दी।

     

    अमन ने पढ़ा।

     

    उसका चेहरा अचानक बदल गया।

     

    क्योंकि वहां लिखा था—

     

    “आरव और अमन में से केवल एक ही अभय का जैविक पुत्र है।”

     

    आरोही ने हैरानी से कहा,

     

    “तो दूसरा…?”

     

    अचानक पीछे से दरवाजा बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    अभय की आवाज आई—

     

    “अब यही पता करना है कि तुम दोनों में से मेरा असली बेटा कौन है।”

     

    और उसी पल कमरे की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    अंधेरे में एक आवाज गूंजी—

     

    “और याद रखना… गलत जवाब देने वाले की मौत होगी।”

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 33

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 33

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 33 : विराज का नया चेहरा

     

    तहखाने में अचानक छाई खामोशी को विराज की धीमी हंसी ने तोड़ दिया।

     

    आरव की नजर सामने खड़े विराज पर थी।

     

    उसके पीछे कई हथियारबंद लोग खड़े थे।

     

    दूसरी तरफ रुद्र अपनी बंदूक ताने हुए था।

     

    अमन आरव के पास खड़ा था और आरोही ने डर के बावजूद खुद को संभाल रखा था।

     

    कुछ सेकंड तक कोई कुछ नहीं बोला।

     

    फिर आरव ने विराज से पूछा—

     

    “तुम यहां क्यों आए हो?”

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि इस कहानी का सबसे जरूरी हिस्सा अभी बाकी है।”

     

    अमन ने गुस्से में कहा,

     

    “तुमने मेरी मां को मरवाया!”

     

    विराज ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम अब भी वही गलती कर रहे हो।”

     

    “कौन-सी?”

     

    “हर मौत का जिम्मेदार मुझे समझना।”

     

    अमन उसकी तरफ बढ़ा।

     

    “अगर आज तुमने एक कदम भी आगे बढ़ाया तो—”

     

    रुद्र ने उसे रोक दिया।

     

    “अमन, रुक जाओ।”

     

    विराज ने रुद्र की तरफ देखा।

     

    “तुमने आखिरकार अपना असली पक्ष चुन ही लिया।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “मैंने कभी तुम्हारा पक्ष नहीं चुना था।”

     

    विराज की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “फिर आज देखता हूं तुम किसके लिए मरते हो।”

    अब तक घायल आर्यन दीवार के सहारे खड़ा था।

     

    उसने विराज को देखते ही कहा,

     

    “तुम यहां कैसे पहुंचे?”

     

    विराज ने उसकी तरफ देखा।

     

    “जिस रास्ते से तुम आए थे।”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “मैंने वह रास्ता बंद कर दिया था।”

     

    विराज हंसा।

     

    “तुम्हें लगता है तुम्हारे बनाए रास्ते सिर्फ तुम्हें पता हैं?”

     

    आर्यन की आंखों में गुस्सा आ गया।

     

    “लाल फाइल चाहिए थी तुम्हें।”

     

    “अभी भी चाहिए।”

     

    “लेकिन वो मेरे पास नहीं है।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “मुझे पता है।”

     

    आर्यन चौंका।

     

    “फिर?”

     

    विराज ने आरव की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि वो उसके पास है।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मेरे पास नहीं है।”

     

    “तुम्हें सच में कुछ याद नहीं?”

     

    “नहीं।”

     

    विराज धीरे-धीरे आरव के करीब आया।

     

    “तुम्हें अपने बचपन की कुछ बातें याद हैं?”

     

    आरव चुप रहा।

     

    “एक लाल रंग का कमरा?”

     

    आरव की आंखें सिकुड़ गईं।

     

    “एक महिला…”

     

    उसने अचानक अपना सिर पकड़ लिया।

     

    कुछ धुंधली तस्वीरें उसके दिमाग में घूमने लगीं।

     

    एक छोटा बच्चा…

     

    गोद में बैठी माधवी…

     

    एक लाल फाइल…

     

    और एक आवाज—

     

    “इसे कभी किसी को मत देना।”

     

    आरव ने आंखें खोल दीं।

     

    आरोही तुरंत उसके पास आई।

     

    “आरव!”

     

    आरव ने माथा पकड़ रखा था।

     

    “मुझे कुछ याद आया।”

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “मुझे पता था।”

     

    आरव ने धीरे-धीरे कहा,

     

    “मैं बहुत छोटा था।”

     

    “मां मेरे कमरे में आई थीं।”

     

    “उनके हाथ में एक फाइल थी।”

     

    “उन्होंने वो फाइल…”

     

    वह रुक गया।

     

    अमन ने पूछा,

     

    “कहां रखी थी?”

     

    आरव ने आंखें बंद कीं।

     

    “मेरे कमरे में।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “कहां?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    तभी आरोही ने पूछा,

     

    “क्या तुम्हें अपने कमरे की कोई और चीज याद है?”

     

    आरव ने कुछ पल सोचा।

     

    “एक लकड़ी का घोड़ा।”

     

    आरोही चौंकी।

     

    “लकड़ी का घोड़ा?”

     

    “हां।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “क्या उसके अंदर कुछ छिपाया गया था?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “शायद।”

     

    विराज की आंखें चमक उठीं।

     

    “अब हम सही रास्ते पर हैं।”

     

    अचानक आर्यन ने गोली चलाने की कोशिश की।

     

    रुद्र ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    दोनों के बीच हाथापाई शुरू हो गई।

     

    विराज पीछे हट गया।

     

    “आर्यन!”

     

    आर्यन चिल्लाया,

     

    “लाल फाइल तुम्हें नहीं मिलेगी!”

     

    विराज ने कहा,

     

    “तुम्हें लगता है मैं तुमसे डरता हूं?”

     

    “तुम मेरे बिना कुछ नहीं हो।”

     

    “गलत।”

     

    विराज ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “तुम मेरे रास्ते का सिर्फ पहला पत्थर थे।”

     

    आर्यन का चेहरा बदल गया।

     

    “क्या मतलब?”

     

    विराज ने कहा—

     

    “सम्राट की गद्दी अब मेरी है।”

     

    अमन चौंक गया।

     

    “तो तुम दोनों अलग हो?”

     

    विराज हंसा।

     

    “हम कभी एक नहीं थे।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “फिर तुम इतने साल साथ क्यों रहे?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “क्योंकि दुश्मन को हराने के लिए पहले उसके सबसे करीब जाना पड़ता है।”

     

    रुद्र ने अचानक कहा,

     

    “विराज, तुम्हें लाल फाइल नहीं मिलेगी।”

     

    विराज ने उसे देखा।

     

    “क्यों?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “क्योंकि शेखर ने उसे बहुत पहले ही नष्ट कर दिया था।”

     

    सब चौंक गए।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “लाल फाइल अब कागजों का बंडल नहीं है।”

     

    “फिर?”

     

    “उसमें जो जानकारी थी, वो दूसरी जगह सुरक्षित है।”

     

    विराज ने गुस्से में पूछा,

     

    “कहां?”

     

    रुद्र ने आरव की तरफ देखा।

     

    “उसके पास।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “मेरे पास?”

     

    रुद्र ने सिर हिलाया।

     

    “तुम्हें बचपन में जो यादें मिटा दी गईं… उन्हीं में लाल फाइल का पूरा सच छिपा है।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “यादें कैसे मिटाई गईं?”

     

    डॉक्टर ने धीमे से कहा,

     

    “दवाइयों से।”

     

    आरव ने डॉक्टर की तरफ देखा।

     

    “आपने?”

     

    डॉक्टर ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    आरव की आंखों में गुस्सा भर गया।

     

    “आपने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “क्योंकि अगर तुम्हें सब याद रहता तो तुम आठ साल की उम्र में ही मार दिए जाते।”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    अमन ने पूछा,

     

    “और मुझे?”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “तुम्हारी यादें भी मिटाई गई थीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम दोनों ने कुछ ऐसा देखा था जो किसी बच्चे को नहीं देखना चाहिए था।”

     

    अमन ने बेचैनी से पूछा,

     

    “क्या?”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “तुम दोनों ने सिया की हत्या होते देखी थी।”

     

    अमन जैसे पत्थर का हो गया।

     

    “मैं…”

     

    उसकी आंखों के सामने अचानक एक दृश्य चमका।

     

    सिया जमीन पर गिरी हुई थी।

     

    एक आदमी उसके सामने खड़ा था।

     

    और दो छोटे बच्चे एक कोने में छिपे हुए थे।

     

    एक बच्चा रो रहा था।

     

    दूसरा उसका हाथ पकड़े हुए था।

     

    अमन ने आंखें खोल दीं।

     

    “मैंने देखा था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    अमन ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “मां को गोली मारने वाला आदमी… आर्यन नहीं था।”

     

    सब चौंक गए।

     

    आर्यन भी स्तब्ध रह गया।

     

    “क्या?”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम कमरे में थे।”

     

    आर्यन का चेहरा बदल गया।

     

    “लेकिन गोली किसी और ने चलाई थी।”

     

    विराज अचानक शांत हो गया।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “विराज…”

     

    विराज की आंखों में पहली बार डर दिखाई दिया।

     

    अमन ने कहा—

     

    “वो आदमी…”

     

    उसने आंखें बंद कीं।

     

    “वो आदमी…”

     

    कुछ सेकंड बाद उसकी नजर सीधे विराज पर जाकर टिक गई।

     

    “तुम थे।”

     

    तहखाने में सन्नाटा छा गया।

     

    विराज ने कुछ नहीं कहा।

     

    आरव उसकी तरफ बढ़ा।

     

    “तुमने मेरी मां जैसी सिया को क्यों मारा?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “क्योंकि वो बहुत कुछ जानती थी।”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारे जन्म का सच।”

     

    अमन ने गुस्से में कहा,

     

    “तुमने मेरी मां को मारा!”

     

    विराज ने कहा,

     

    “हां।”

     

    अमन उसकी तरफ दौड़ा।

     

    लेकिन रुद्र ने उसे रोक लिया।

     

    “अमन!”

     

    अमन चीखा,

     

    “मुझे छोड़ो!”

     

    “अभी नहीं।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “तुम मुझे मार सकते हो।”

     

    अमन रुक गया।

     

    “लेकिन उससे तुम्हारी मां वापस नहीं आएगी।”

     

    अमन की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “तुम इंसान नहीं हो।”

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “इंसानियत ने मुझे बहुत पहले छोड़ दिया था।”

     

    आर्यन ने अचानक जमीन से अपनी बंदूक उठा ली।

     

    उसने विराज पर गोली चलाई।

     

    धांय!

     

    विराज एक तरफ झुक गया।

     

    गोली दीवार में लगी।

     

    रुद्र ने आर्यन को जमीन पर गिरा दिया।

     

    आर्यन चिल्लाया,

     

    “तुमने सिया को मारा था!”

     

    विराज ने कहा,

     

    “हां।”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “लेकिन लाल फाइल में तुम्हारे खिलाफ सबूत है।”

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “मुझे पता है।”

     

    “तो?”

     

    “इसलिए तो मुझे आरव चाहिए।”

     

    आरव चौंका।

     

    “मुझे?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “तुम्हारे दिमाग में वो जगह है जहां फाइल छिपी है।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “मैं तुम्हें कभी नहीं बताऊंगा।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “तुम्हें बताना नहीं पड़ेगा।”

     

    “फिर?”

     

    “मैं तुम्हें याद दिला दूंगा।”

     

    विराज ने हाथ उठाया।

     

    उसके आदमी तुरंत आरोही की तरफ बढ़े।

     

    आरव चिल्लाया—

     

    “उसे हाथ मत लगाना!”

     

    आरोही को दो लोगों ने पकड़ लिया।

     

    आरव आगे बढ़ा।

     

    “उसे छोड़ो!”

     

    विराज ने कहा,

     

    “अब तुम समझे?”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारी कमजोरी।”

     

    आरव की आंखों में गुस्सा था।

     

    “आरोही को छोड़ दो।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “लाल फाइल का सच बताओ।”

     

    “मुझे नहीं पता!”

     

    “तो इसे गोली मार दूंगा।”

     

    आरव चिल्लाया,

     

    “नहीं!”

     

    आरोही ने आरव की तरफ देखा।

     

    “मेरी चिंता मत करो।”

     

    “आरोही!”

     

    “तुम्हें सच ढूंढना है।”

     

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा।”

     

    आरोही मुस्कुराई।

     

    “मुझे तुम पर भरोसा है।”

     

    विराज ने बंदूक आरोही की तरफ कर दी।

     

    तभी…

     

    धांय!

     

    गोली चली।

     

    सबकी सांसें रुक गईं।

     

    आरोही नीचे गिर गई।

     

    आरव चीख पड़ा—

     

    “आरोही!”

     

    वह उसकी तरफ दौड़ा।

     

    लेकिन अगले ही पल सामने खड़ा आदमी गिर पड़ा।

     

    उसके हाथ से बंदूक जमीन पर जा गिरी।

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    रुद्र बंदूक पकड़े खड़ा था।

     

    “गोली मैंने चलाई।”

     

    विराज ने गुस्से में रुद्र की तरफ देखा।

     

    “तुम!”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “मैंने कहा था… मैं तुम्हारे साथ नहीं हूं।”

     

    रुद्र ने आरोही को उठाया।

     

    “उसे कुछ नहीं हुआ।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    गोली उसके पास खड़े आदमी को लगी थी।

     

    आरोही सुरक्षित थी।

     

    आरव ने उसे गले लगा लिया।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “मुझे लगा…”

     

    “कुछ नहीं हुआ।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “अब यहां से निकलना होगा।”

     

    अमन ने पूछा,

     

    “और विराज?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “उसे मैं संभालूंगा।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “क्या?”

     

    “ये कहानी सिर्फ मेरी नहीं है।”

     

    आरव ने विराज की तरफ देखा।

     

    “ये मेरी मां, अमन की मां और हमारे परिवार की कहानी है।”

     

    अमन उसके पास आकर खड़ा हो गया।

     

    “इस बार हम साथ लड़ेंगे।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “भाई?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “भाई।”

     

    दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

     

    लेकिन तभी…

     

    तहखाने की छत से जोरदार आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    दीवार का एक हिस्सा टूटकर गिरा।

     

    धूल के बीच एक छोटा लोहे का बॉक्स दिखाई दिया।

     

    आरव उसके पास गया।

     

    बॉक्स पर वही निशान था—

     

    A-17

     

    अमन ने कहा,

     

    “ये वही है।”

     

    आरव ने बॉक्स खोला।

     

    अंदर एक पुरानी फोटो थी।

     

    एक छोटी चाबी।

     

    और एक कागज।

     

    आरव ने कागज खोला।

     

    उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

     

    “अगर तुम ये पढ़ रहे हो, तो समझो कि तुम्हारा असली पिता अभी जिंदा है।”

     

    आरव के हाथ कांपने लगे।

     

    अमन ने पूछा,

     

    “क्या लिखा है?”

     

    आरव ने धीरे से कहा—

     

    “मेरा असली पिता…”

     

    उसने कागज नीचे कर दिया।

     

    और तभी पीछे से एक आवाज आई—

     

    “हां, आरव… तुम्हारा असली पिता जिंदा है।”

     

    सबने पीछे मुड़कर देखा।

     

    दरवाजे पर…

     

    शेखर खड़े थे।

     

    लेकिन उनके हाथ में बंदूक थी।

     

    और उनकी बंदूक का निशाना…

     

    आरव पर था।

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 32

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 32

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 32 : तहखाने में मां की आवाज

     

    “अमन…”

     

    तहखाने के अंधेरे से आई उस आवाज ने अमन के पैरों तले जमीन खिसका दी।

     

    वह सीढ़ियों के सामने खड़ा रह गया।

     

    उसकी आंखों में आंसू भर आए।

     

    “मां…?”

     

    आरव ने अमन के कंधे पर हाथ रखा।

     

    “अमन, हो सकता है ये कोई रिकॉर्डिंग हो।”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं…”

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    “क्योंकि मेरी मां मुझे इसी तरह बुलाती थी।”

     

    आरोही ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    अस्पताल के गलियारे में धुआं तेजी से भर रहा था।

     

    “हमें जल्दी करना होगा।”

     

    बूढ़े डॉक्टर ने कहा,

     

    “नीचे चलो। ऊपर ज्यादा देर रुकना सुरक्षित नहीं है।”

     

    आरव ने डॉक्टर की तरफ देखा।

     

    “आप भी हमारे साथ चलिए।”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

    “मैं इतने साल इसी दिन का इंतजार कर रहा था।”

     

    चारों लोग अंधेरी सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे।

     

    सीढ़ियां बहुत पुरानी थीं।

     

    हर कदम के साथ नीचे से ठंडी हवा ऊपर आ रही थी।

     

    अमन सबसे आगे था।

     

    उसकी आंखें अंधेरे में किसी चीज को खोज रही थीं।

     

    “मां…”

     

    फिर वही आवाज आई—

     

    “अमन…”

     

    इस बार आवाज बिल्कुल पास से आई।

     

    अमन दौड़ने लगा।

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “रुको!”

     

    “मुझे मेरी मां के पास जाना है।”

     

    “पहले सोचेंगे।”

     

    “मैंने पच्चीस साल इंतजार किया है!”

     

    अमन ने हाथ छुड़ा लिया।

     

    “अब अगर वो सच में मेरी मां हैं तो मैं उन्हें अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

     

    आरव उसके पीछे दौड़ा।

     

    आरोही भी साथ थी।

     

    तहखाने के आखिर में एक लोहे का दरवाजा दिखाई दिया।

     

    दरवाजे पर लिखा था—

     

    ROOM 00

     

    अमन दरवाजे के सामने जाकर रुक गया।

     

    “ये कमरा…”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “इसी कमरे में सिया को रखा गया था।”

     

    अमन की सांसें तेज हो गईं।

     

    “लेकिन उसकी मौत तो…”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “वही तो सबसे बड़ा झूठ था।”

     

    डॉक्टर ने दरवाजा खोला।

     

    कमरे के अंदर एक पुराना बेड था।

     

    एक टेबल।

     

    कुछ दवाइयां।

     

    और दीवार पर लगी एक बड़ी तस्वीर।

     

    तस्वीर में सिया थी।

     

    अमन धीरे-धीरे तस्वीर के पास गया।

     

    “मां…”

     

    उसने तस्वीर को छुआ।

     

    अचानक उसके पीछे लगी दीवार से हल्की आवाज आई।

     

    टिक… टिक…

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “ये कैसी आवाज है?”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “ये रिकॉर्डिंग सिस्टम है।”

     

    अमन ने तुरंत पूछा,

     

    “कहां?”

     

    डॉक्टर ने दीवार के एक हिस्से को दबाया।

     

    दीवार खुल गई।

     

    अंदर एक पुराना रिकॉर्डर रखा था।

     

    डॉक्टर ने उसे चालू किया।

     

    कुछ सेकंड तक शोर आया।

     

    फिर…

     

    सिया की आवाज सुनाई दी।

     

    “अगर ये रिकॉर्डिंग अमन तक पहुंची है, तो शायद मैं अब इस दुनिया में नहीं हूं।”

     

    अमन ने आंखें बंद कर लीं।

     

    उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    सिया की आवाज आगे आई—

     

    “अमन, तुम्हें मेरी मौत की बहुत सारी कहानियां सुनाई जाएंगी।”

     

    “कोई कहेगा कि तुम्हारे पिता ने मुझे मारा।”

     

    “कोई कहेगा कि शेखर जिम्मेदार था।”

     

    “कोई कहेगा कि आरव के परिवार की वजह से मैं मरी।”

     

    “लेकिन तुम किसी की बात पर विश्वास मत करना।”

     

    अमन ने कांपती आवाज में कहा,

     

    “मां…”

     

    रिकॉर्डिंग चलती रही।

     

    “सच सिर्फ एक है।”

     

    कुछ पल की खामोशी के बाद सिया बोली—

     

    “मेरी मौत के पीछे एक ऐसा इंसान है, जिसे मैंने अपना भाई समझा।”

     

    आरव ने डॉक्टर की तरफ देखा।

     

    आरोही ने धीरे से पूछा,

     

    “कौन?”

     

    रिकॉर्डिंग में सिया ने नाम लेने की कोशिश की।

     

    “वो…”

     

    फिर अचानक रिकॉर्डिंग में तेज आवाज आई।

     

    जैसे कोई दरवाजा तोड़कर अंदर आया हो।

     

    सिया चीखी—

     

    “तुम यहां कैसे आए?”

     

    फिर एक पुरुष की आवाज सुनाई दी।

     

    “तुम बहुत ज्यादा जान चुकी हो, सिया।”

     

    अमन ने रिकॉर्डर को कसकर पकड़ लिया।

     

    “ये आवाज…”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किसकी है?”

     

    अमन ने सिर उठाया।

     

    उसके चेहरे पर गुस्सा था।

     

    “मैंने ये आवाज पहले सुनी है।”

     

    “कहां?”

     

    “सम्राट की आवाज में।”

     

    रिकॉर्डिंग में पुरुष की आवाज फिर आई—

     

    “लाल फाइल कहां है?”

     

    सिया ने जवाब दिया,

     

    “तुम्हें कभी नहीं मिलेगी।”

     

    “तो तुम्हारे बच्चे मरेंगे।”

     

    “मेरे बच्चे?”

     

    सिया घबरा गई।

     

    “तुम्हें पता है?”

     

    “मुझे सब पता है।”

     

    “अमन को हाथ मत लगाना!”

     

    “और दूसरा बच्चा?”

     

    कुछ पल खामोशी रही।

     

    फिर सिया की आवाज कांप गई।

     

    “आरव को कुछ मत करना।”

     

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    सिया आगे बोली—

     

    “वो सिर्फ एक बच्चा है।”

     

    पुरुष ने कहा,

     

    “दोनों बच्चे मेरे रास्ते का सबसे बड़ा खतरा हैं।”

     

    अमन की आंखों से आंसू निकल रहे थे।

     

    “मां ने मुझे बचाने के लिए…”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हम दोनों को।”

     

    तभी रिकॉर्डिंग में सिया की चीख सुनाई दी।

     

    और रिकॉर्डिंग अचानक बंद हो गई।

     

    अमन ने रिकॉर्डर जमीन पर रख दिया।

     

    “तो मेरी मां ने हम दोनों को बचाने की कोशिश की थी।”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “लेकिन वो आदमी कौन था?”

     

    डॉक्टर चुप रहे।

     

    आरव ने कहा,

     

    “आप जानते हैं।”

     

    डॉक्टर ने नजरें झुका लीं।

     

    “हां।”

     

    “कौन?”

     

    डॉक्टर ने धीरे से कहा—

     

    “आर्यन।”

     

    अमन चौंका।

     

    “सम्राट?”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “लेकिन रुद्र ने कहा था कि सम्राट का असली नाम आर्यन है।”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “रुद्र ने तुम्हें आधा सच बताया।”

     

    “और पूरा सच?”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “आर्यन सिर्फ सम्राट का नाम नहीं था।”

     

    “तो?”

     

    “वो शेखर का छोटा भाई था।”

     

    आरव जैसे पत्थर का हो गया।

     

    “क्या?”

     

    डॉक्टर ने बताया,

     

    “शेखर और आर्यन दो भाई थे।”

     

    “आर्यन हमेशा से अपने बड़े भाई से ईर्ष्या करता था।”

     

    “शेखर के पास परिवार था, इज्जत थी और व्यापार था।”

     

    “आर्यन के पास सिर्फ लालच था।”

     

    अमन ने पूछा,

     

    “और सिया?”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “सिया आर्यन को अपना भाई मानती थी।”

     

    “लेकिन आर्यन ने ही उसे धोखा दिया।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “फिर पापा का नाम उस फाइल में क्यों था?”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “क्योंकि अस्पताल के रिकॉर्ड आर्यन ने शेखर के नाम पर बनवाए थे।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    “तो पापा निर्दोष हैं?”

     

    डॉक्टर ने तुरंत कहा,

     

    “इतना आसान नहीं है।”

     

    आरव चौंका।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि शेखर को सब पता था।”

     

    अमन ने गुस्से में कहा,

     

    “क्या पता था?”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “कि आर्यन अस्पताल में क्या करने वाला है।”

     

    “फिर उन्होंने रोका क्यों नहीं?”

     

    डॉक्टर ने सिर झुका लिया।

     

    “क्योंकि शेखर उस वक्त आर्यन के खिलाफ सबूत जुटा रहे थे।”

     

    अमन चिल्लाया,

     

    “लेकिन मेरी मां मर रही थी!”

     

    “शेखर ने उसे बचाने की कोशिश की।”

     

    “फिर?”

     

    “वो देर से पहुंचे।”

     

    अमन की आंखें लाल हो गईं।

     

    “देर से?”

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “क्योंकि उन्हें रास्ते में रोक लिया गया था।”

     

    “किसने?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “विराज ने।”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “तो विराज भी इसमें था?”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “हां।”

     

    अमन ने पूछा,

     

    “विराज ने शेखर को रोका?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उसे लाल फाइल चाहिए थी।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “मतलब विराज और आर्यन दोनों लाल फाइल के पीछे थे।”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

    “लेकिन एक और बात है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “लाल फाइल में सिर्फ विराज और आर्यन के अपराध नहीं थे।”

     

    “तो?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “उसमें शेखर का भी एक राज था।”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    “कौन सा राज?”

     

    डॉक्टर ने जवाब नहीं दिया।

     

    अचानक ऊपर से जोरदार धमाका हुआ।

     

    पूरा तहखाना हिल गया।

     

    छत से धूल गिरने लगी।

     

    आरोही चिल्लाई,

     

    “हमें यहां से निकलना होगा!”

     

    ऊपर से धुआं नीचे आने लगा।

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “अस्पताल में आग तेजी से फैल रही है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “दूसरा रास्ता?”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “एक रास्ता है।”

     

    उन्होंने कमरे के पीछे लगी दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    “वहां से बाहर निकल सकते हैं।”

     

    अमन ने पूछा,

     

    “और आप?”

     

    डॉक्टर ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “मैं भी चलूंगा।”

     

    वे सभी दीवार के पीछे बने रास्ते से आगे बढ़ने लगे।

     

    कुछ ही कदम चले थे कि पीछे से आवाज आई—

     

    “इतनी जल्दी जा रहे हो?”

     

    सब रुक गए।

     

    अंधेरे में किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।

     

    टॉर्च की रोशनी सामने गई।

     

    एक आदमी धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ रहा था।

     

    काले कपड़े।

     

    हाथ में बंदूक।

     

    चेहरे पर मुस्कान।

     

    अमन ने उसे देखते ही कहा—

     

    “आर्यन!”

     

    आदमी मुस्कुराया।

     

    “बहुत अच्छे, बेटा।”

     

    अमन का चेहरा गुस्से से भर गया।

     

    “मेरी मां को तुमने मारा।”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “तुम्हारी मां ने खुद अपनी मौत चुनी थी।”

     

    अमन उसकी तरफ बढ़ा।

     

    आरव ने रोक लिया।

     

    “अमन!”

     

    आर्यन हंसा।

     

    “तुम दोनों बिल्कुल अपनी मां जैसे हो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मां-पापा कहां हैं?”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “तुम्हारे माता-पिता सुरक्षित हैं।”

     

    “उन्हें छोड़ दो।”

     

    “छोड़ दूंगा।”

     

    “कब?”

     

    “जब मुझे लाल फाइल मिल जाएगी।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मेरे पास नहीं है।”

     

    आर्यन मुस्कुराया।

     

    “मुझे पता है।”

     

    “तो?”

     

    “क्योंकि लाल फाइल तुम्हारे पास कभी थी ही नहीं।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “फिर?”

     

    आर्यन ने कहा—

     

    “लाल फाइल तुम्हारी मां के पास है।”

     

    आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “मां?”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “लेकिन मां को तो…”

     

    “माधवी ने उसे पच्चीस साल से छुपा रखा है।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “झूठ!”

     

    आर्यन ने अपनी जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

     

    तस्वीर में माधवी थीं।

     

    उनके हाथ में लाल फाइल थी।

     

    आरव ने तस्वीर देखते ही कहा—

     

    “ये कब की है?”

     

    आर्यन मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारे जन्म की रात।”

     

    आरोही ने तस्वीर गौर से देखी।

     

    “आरव…”

     

    “क्या?”

     

    “तस्वीर के पीछे कुछ लिखा है।”

     

    आरव ने तस्वीर पलटी।

     

    पीछे सिर्फ एक लाइन थी—

     

    “जिसे बचाने के लिए झूठ बोला, उसी के हाथों सच छिपाया।”

     

    आरव की समझ में कुछ नहीं आया।

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “अब तुम समझ रहे होगे कि तुम्हारी मां ने तुमसे इतना कुछ क्यों छुपाया।”

     

    आरव ने गुस्से में कहा,

     

    “तुम मेरी मां को बदनाम कर रहे हो।”

     

    आर्यन हंसा।

     

    “मैं नहीं।”

     

    उसने अपनी जेब से फोन निकाला।

     

    स्क्रीन पर लाइव वीडियो चल रहा था।

     

    माधवी और शेखर एक कमरे में बंधे हुए थे।

     

    माधवी रो रही थीं।

     

    फिर आर्यन ने कैमरा उनकी तरफ किया।

     

    “माधवी।”

     

    माधवी ने कैमरे की तरफ देखा।

     

    उनकी आंखें आरव को देखते ही भर आईं।

     

    “आरव…”

     

    आरव चिल्लाया,

     

    “मां!”

     

    माधवी ने रोते हुए कहा—

     

    “बेटा, आर्यन की बात मत मानना!”

     

    आर्यन मुस्कुराया।

     

    “तो फिर तुम ही बता दो।”

     

    माधवी चुप हो गईं।

     

    आरव ने कहा,

     

    “मां, लाल फाइल कहां है?”

     

    माधवी की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    वह कुछ कहने ही वाली थीं कि…

     

    पीछे से शेखर ने जोर से कहा—

     

    “माधवी! नहीं!”

     

    माधवी ने शेखर की तरफ देखा।

     

    फिर आरव की तरफ।

     

    और आखिरकार बोलीं—

     

    “आरव… लाल फाइल मेरे पास नहीं है।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “तो किसके पास है?”

     

    माधवी ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “तुम्हारे पास।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    “मेरे?”

     

    माधवी बोलीं—

     

    “तुम्हारे जन्म के समय मैंने वो फाइल तुम्हारे साथ ही छुपा दी थी।”

     

    आरव ने अपनी तरफ देखा।

     

    “लेकिन मेरे पास तो कुछ नहीं।”

     

    माधवी ने कहा—

     

    “तुम्हारे पास है…”

     

    वह रो पड़ीं।

     

    “बस तुम्हें पता नहीं कि वो कहां है।”

     

    आर्यन ने कैमरा बंद कर दिया।

     

    फिर उसने आरव की तरफ देखकर कहा—

     

    “अब ढूंढो, आरव… क्योंकि अगर तुम्हें लाल फाइल नहीं मिली, तो अगली बार तुम्हारी मां जिंदा नहीं रहेगी।”

     

    आर्यन ने बंदूक उठाई।

     

    और तभी…

     

    पीछे से एक गोली चली।

     

    धांय!

     

    आर्यन के हाथ से बंदूक गिर गई।

     

    सबने पीछे मुड़कर देखा।

     

    अंधेरे में एक आदमी खड़ा था।

     

    हाथ में बंदूक।

     

    चेहरे पर खून के निशान।

     

    अमन ने पहचानते ही कहा—

     

    “रुद्र!”

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “आरव, अमन… मेरे पास ज्यादा समय नहीं है।”

     

    “क्यों?”

     

    रुद्र ने गंभीर आवाज में कहा—

     

    “क्योंकि मैं अकेला नहीं आया हूं।”

     

    अंधेरे में उसके पीछे कई हथियारबंद लोग दिखाई दिए।

     

    और उनमें सबसे आगे खड़ा था…

     

    विराज।

     

    जारी रहेगा…