🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

टैग: प्यार#दर्द#रोमेंस

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 25

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 25

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 25 : जिसे देखकर विराज भी डर गया

     

    समुद्र किनारे उस सुनसान जगह पर एक पल के लिए सब कुछ थम गया था।

     

    शेखर जमीन पर पड़े थे।

     

    आरव उनके पास घुटनों के बल बैठा हुआ था।

     

    उनकी सफेद शर्ट पर खून फैलता जा रहा था।

     

    “पापा…!”

     

    आरव की आवाज कांप रही थी।

     

    “आंखें खोलिए… पापा, मेरी तरफ देखिए।”

     

    शेखर ने मुश्किल से आंखें खोलीं।

     

    “आरव…”

     

    “हां पापा, मैं यहीं हूं।”

     

    “तुम… यहां से चले जाओ।”

     

    आरव की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा।”

     

    तभी पीछे से बंदूक पकड़े वह आदमी आगे आया।

     

    उसके चेहरे पर ठंडी मुस्कान थी।

     

    विराज उसे देखते ही पीछे हट गया।

     

    “तुम…?”

     

    आदमी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां, विराज। मैं।”

     

    अभय ने भी उसे पहचान लिया।

     

    उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “ये यहां कैसे…?”

     

    राघव ने घबराकर पूछा,

     

    “कौन है ये?”

     

    किसी के मुंह से जवाब नहीं निकला।

     

    वह आदमी धीरे-धीरे आगे आया।

     

    “मेरा नाम सुनने के बाद शायद तुम्हें अपने पुराने पाप याद आ जाएंगे।”

     

    आरव ने गुस्से में उसकी तरफ बंदूक तान दी।

     

    “तुमने मेरे पिता को गोली मारी है।”

     

    आदमी मुस्कुराया।

     

    “और अगली गोली तुम्हारे लिए है।”

     

    आरोही तुरंत आरव के सामने आ गई।

     

    “उसे गोली मत मारना!”

     

    आदमी ने आरोही को देखा।

     

    कुछ पल तक वह उसे घूरता रहा।

     

    फिर उसके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “तुम…”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    उस आदमी ने धीरे से कहा—

     

    “तुम बिल्कुल अपनी मां जैसी दिखती हो।”

     

    नंदिनी की आंखें फैल गईं।

     

    “नहीं…”

     

    अभय ने गुस्से में पूछा,

     

    “तुम जिंदा कैसे हो?”

     

    आदमी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें लगा था कि तुमने मुझे खत्म कर दिया?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “तुम्हें मर जाना चाहिए था।”

     

    आदमी हंसा।

     

    “इस परिवार के लोगों ने मुझे कई बार मारने की कोशिश की।”

     

    फिर उसने अपनी बंदूक आरव की तरफ कर दी।

     

    “लेकिन मैं हर बार वापस आया।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “नाम बताओ अपना।”

     

    आदमी ने कहा,

     

    “तुम्हें मेरा नाम जानकर क्या मिलेगा?”

     

    “सच।”

     

    “सच?”

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “तुम सच सुनने के लिए तैयार नहीं हो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मैं सब सुनूंगा।”

     

    उस आदमी ने कहा—

     

    “मेरा नाम रुद्र है।”

     

    माधवी के हाथ कांपने लगे।

     

    राघव ने उन्हें संभाला।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “आप मुझे मेरी मां जैसा क्यों कह रहे थे?”

     

    रुद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि तुम्हारी मां…”

     

    वह रुक गया।

     

    “क्योंकि मैं उसे बहुत अच्छी तरह जानता था।”

     

    नंदिनी ने गुस्से में कहा,

     

    “रुद्र, मेरी बेटी से दूर रहो।”

     

    रुद्र हंसा।

     

    “अब भी डरती हो?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    नंदिनी ने कहा,

     

    “क्योंकि मैं जानती हूं तुम क्या कर सकते हो।

     

    आरव ने शेखर के घाव पर हाथ दबाया।

     

    “किसी को डॉक्टर बुलाना होगा।”

     

    कबीर ने तुरंत फोन निकाला।

     

    “मैं एंबुलेंस बुलाता हूं।”

     

    शेखर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “क्यों?”

     

    “अस्पताल मत ले जाना।”

     

    “लेकिन गोली लगी है।”

     

    शेखर ने धीमे से कहा,

     

    “वहां… उनके लोग हैं।”

     

    आरव समझ गया।

     

    “तो फिर हम आपको सुरक्षित जगह ले जाएंगे।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “मेरे पास एक पुराना फार्महाउस है।”

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “वहीं चलो।”

     

    राघव और कबीर ने शेखर को उठाया।

     

    लेकिन तभी रुद्र ने बंदूक उठाई।

     

    “कोई कहीं नहीं जाएगा।”

     

    आरव उसके सामने खड़ा हो गया।

     

    “तुम्हें पहले मुझसे गुजरना होगा।”

     

    रुद्र मुस्कुराया।

     

    “यही तो चाहता हूं।”

     

    आरव ने बंदूक तान दी।

     

    “तुमने मेरे पिता को गोली मारी है।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “वो तुम्हारे पिता हैं?”

     

    “हां।”

     

    “तो फिर तुम्हें भी मरना होगा।”

     

    आरोही चिल्लाई,

     

    “नहीं!”

     

    रुद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम बीच में मत आओ।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “मैं आरव को कुछ नहीं होने दूंगी।”

     

    रुद्र कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “तुम्हें पता है तुम किसे बचा रही हो?”

     

    “आरव को।”

     

    “वही आरव जिसने तुम्हारे परिवार की पूरी विरासत अपने नाम कर रखी है।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “मुझे उसकी संपत्ति नहीं चाहिए।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “फिर भी तुम उसके साथ हो।”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    आरोही ने आरव की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि मैं उससे प्यार करती हूं।”

     

    चारों तरफ खामोशी छा गई।

     

    आरव ने भी उसकी तरफ देखा।

     

    आरोही ने पहली बार सबके सामने अपने दिल की बात कह दी थी।

     

    रुद्र कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर उसने धीरे से कहा,

     

    “यही प्यार तुम्हारी सबसे बड़ी कमजोरी बनेगा।”

     

    आरव ने जवाब दिया,

     

    “और यही हमारा सबसे बड़ा हथियार भी है।”

     

    विराज ने अचानक रुद्र से कहा,

     

    “तुम्हारा असली मकसद क्या है?”

     

    रुद्र उसकी तरफ मुड़ा।

     

    “तुम्हें पता होना चाहिए।”

     

    “नहीं।”

     

    “झूठ।”

     

    “मैं सच कह रहा हूं।”

     

    रुद्र ने बंदूक नीचे की।

     

    “तुम्हें याद है वो रात?”

     

    विराज का चेहरा बदल गया।

     

    “कौन-सी रात?”

     

    “अस्पताल वाली।”

     

    नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “जिस रात दो बच्चों का जन्म हुआ था।”

     

    आरव और आरोही एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    “उस रात तुमने आदेश दिया था कि दोनों बच्चों को खत्म कर दिया जाए।”

     

    आरोही के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “क्या?”

     

    विराज चिल्लाया,

     

    “झूठ!”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “लेकिन नंदिनी ने एक बच्चे को बचा लिया।”

     

    नंदिनी रोते हुए बोलीं,

     

    “मैंने दोनों को बचाने की कोशिश की थी।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    फिर उसने आरव की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारी मां माधवी आरव को लेकर भाग गई थी।”

     

    माधवी की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “हां।”

     

    “और नंदिनी आरोही को लेकर।”

     

    “हां।”

     

    “लेकिन तीसरा आदमी कौन था?”

     

    सब चौंक गए।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तीसरा?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “उस रात वहां एक और बच्चा था।”

     

    अर्जुन ने तुरंत कहा,

     

    “ये झूठ है।”

     

    रुद्र मुस्कुराया।

     

    “तुम जानते हो कि मैं झूठ नहीं बोल रहा।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “तीसरा बच्चा कौन था?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “वही बच्चा जिसकी वजह से आज तुम दोनों की जिंदगी उलझी हुई है।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “सीधे-सीधे बताओ।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “उस बच्चे की पहचान कभी सामने नहीं आई।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उसके रिकॉर्ड बदल दिए गए थे।”

     

    “किसने?”

     

    रुद्र ने विराज की तरफ देखा।

     

    विराज चुप रहा।

     

    रुद्र बोला,

     

    “विराज ने।”

     

    आरोही ने अपने पिता की तरफ देखा।

     

    “आपने?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “मैंने किसी बच्चे को नहीं छुआ।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “तुमने आदेश दिया था।”

     

    विराज चुप रहा।

     

    आरव ने कहा,

     

    “उस बच्चे का क्या हुआ?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “वो बच्चा…”

     

    वह रुक गया।

     

    फिर उसने आरव की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे सामने खड़ा है।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    “क्या?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “तुम्हें हमेशा बताया गया कि तुम माधवी के बेटे हो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “लेकिन तुम्हारा जन्म रिकॉर्ड नकली है।”

     

    माधवी रो पड़ीं।

     

    “नहीं!”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “माधवी ने तुम्हें पाला जरूर है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो मेरी असली मां कौन है?”

     

    रुद्र ने नंदिनी की तरफ देखा।

     

    नंदिनी का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    आरोही ने हैरानी से अपनी मां की तरफ देखा।

     

    “मां?”

     

    नंदिनी ने कांपते हुए कहा,

     

    “आरव…”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “आप…?”

     

    नंदिनी की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “मैं तुम्हें सच बताना चाहती थी।”

     

    आरव की आवाज टूट गई।

     

    “क्या आप मेरी मां हैं?”

     

    नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “हां।”

     

    आरोही जैसे पत्थर बन गई।

     

    “तो…”

     

    उसकी नजर आरव पर गई।

     

    “आरव मेरे भाई हैं?”

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    कुछ पल तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर रुद्र हंस पड़ा।

     

    “अब समझ आया?”

    आरोही धीरे-धीरे आरव से दूर होने लगी।

     

    “नहीं…”

     

    आरव ने कहा,

     

    “आरोही, मेरी बात सुनो।”

     

    “नहीं!”

     

    “हम दोनों के बीच…”

     

    उसकी आवाज रुक गई।

     

    नंदिनी रोते हुए बोलीं,

     

    “तुम दोनों भाई-बहन नहीं हो।”

     

    आरव ने चौंककर उनकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन आपने कहा कि आप मेरी मां हैं।”

     

    नंदिनी ने सिर हिलाया।

     

    “मैं तुम्हारी जैविक मां नहीं हूं।”

     

    रुद्र चुप हो गया।

     

    आरव ने कहा,

     

    “तो फिर?”

     

    नंदिनी ने कांपते हुए कहा,

     

    “मैंने तुम्हें सिर्फ उस रात बचाया था।”

     

    आरव ने गहरी सांस ली।

     

    “तो मेरी असली मां कौन है?”

     

    नंदिनी ने माधवी की तरफ देखा।

     

    माधवी रो रही थीं।

     

    “माधवी ही तुम्हारी मां है।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन रुद्र हंस पड़ा।

     

    “अभी कहानी खत्म नहीं हुई।”

     

    आरव ने गुस्से में पूछा,

     

    “अब क्या?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “तुम्हें सच में लगता है कि मैं यहां सिर्फ तुम्हें डराने आया हूं?”

     

    उसने अपनी जेब से एक पुराना लॉकेट निकाला।

     

    लॉकेट देखकर माधवी अचानक चौंक गईं।

     

    “ये…”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “पहचानती हो?”

     

    माधवी की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “ये मेरे बेटे का था।”

     

    आरव ने लॉकेट की तरफ देखा।

     

    “मेरे पास भी बिल्कुल ऐसा ही लॉकेट था।”

     

    रुद्र मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि ये तुम्हारा था।”

     

    आरव ने लॉकेट अपने हाथ में लिया।

     

    उसके पीछे एक छोटा सा निशान बना था।

     

    ‘A.R.’

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “इसका मतलब?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “आरव राजवंशी।”

     

    रुद्र ने अचानक बंदूक नीचे कर दी।

     

    “मैं तुम्हें मारने नहीं आया।”

     

    आरव ने हैरानी से पूछा,

     

    “तो?”

     

    “मैं तुम्हें सच बताने आया हूं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता ने मेरे साथ भी धोखा किया था।”

     

    शेखर ने कमजोर आवाज में कहा,

     

    “रुद्र…”

     

    रुद्र उनकी तरफ मुड़ा।

     

    “तुम चुप रहो।”

     

    “तुम्हें पूरी सच्चाई नहीं पता।”

     

    “मुझे सब पता है।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    रुद्र चिल्लाया,

     

    “तो बताओ!”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “तुम्हारी बहन की मौत… मेरी वजह से नहीं हुई थी।”

     

    रुद्र के चेहरे पर गुस्सा जम गया।

     

    “क्या?”

     

    “उसकी हत्या विराज ने नहीं की थी।”

     

    विराज ने भी हैरानी से शेखर की तरफ देखा।

     

    “तो किसने?”

     

    शेखर ने कांपते हुए कहा “तुमने खुद।”

     

    रुद्र की आंखें फैल गईं।

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हें याद नहीं… लेकिन उस रात तुम नशे में थे।”

     

    रुद्र पीछे हट गया।

     

    “झूठ!”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “और तुम्हें सच बताने के लिए मैंने तुम्हारी याददाश्त से जुड़े सारे दस्तावेज छुपाए थे।”

     

    रुद्र का हाथ कांपने लगा।

     

    “नहीं…”

     

    अचानक दूर से पुलिस सायरन की आवाज सुनाई दी।

     

    कबीर ने कहा,

     

    “पुलिस आ रही है।”

     

    रुद्र ने चारों तरफ देखा।

     

    “नहीं…”

     

    विराज ने तुरंत अपने आदमियों को पीछे हटने का इशारा किया।

     

    अभय ने मौका देखकर नंदिनी और माधवी को दूसरी तरफ भेज दिया।

     

    आरव ने शेखर को संभाला।

     

    “चलो पापा।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “आरव… लाल फाइल।”

     

    “वो कहां है?”

     

    शेखर ने अपनी जेब से एक छोटी चाबी निकाली।

     

    “नीलगिरी हवेली… कमरा नंबर 17।”

     

    “उसमें क्या है?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “तुम्हारी जिंदगी का आखिरी राज।”

     

    आरव ने चाबी ले ली।

     

    तभी रुद्र ने पीछे से आवाज लगाई—

     

    “आरव!”

     

    आरव पलटा।

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “अगर कमरा नंबर 17 खोला…”

     

    वह कुछ पल रुका।

     

    “तो तुम्हें पता चल जाएगा कि तुम्हारे जन्म के समय तुम्हारी जिंदगी में सबसे बड़ा धोखा किसने दिया था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किसने?”

     

    रुद्र ने माधवी की तरफ देखा।

     

    माधवी के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    आरव ने अपनी मां की तरफ देखा।

     

    “मां…?”

     

    माधवी कुछ नहीं बोलीं।

     

    आरव की आंखों में शक उतर आया।

     

    और उसी समय…

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “जो भी सच होगा… हम साथ जानेंगे।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन अगर सच ने हमें अलग कर दिया तो?”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा “तो मैं उस सच को ही गलत साबित कर दूंगी।”

     

    दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ गए।

     

    पीछे समुद्र की लहरें जोर-जोर से चट्टानों से टकरा रही थीं।

     

    और नीलगिरी हवेली के अंदर…

     

    कमरा नंबर 17 का दरवाजा पहली बार खुलने वाला था।

     

    लेकिन उस कमरे के अंदर क्या था?

     

    एक तस्वीर… एक खून से लिखा खत… और ऐसा राज, जो आरव और आरोही के पूरे रिश्ते को बदलने वाला था।

     

    जारी रहेगा…

    Avatar photo

    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 24

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 24

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 24 : क्या विराज ही आरोही का असली पिता है?

     

    विराज की बात सुनकर समुद्र किनारे खड़े सभी लोगों के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “तुम्हारा असली पिता… मैं हूं।”

     

    आरोही की आंखें विराज के चेहरे पर जम गईं।

     

    उसके होंठ कांपने लगे।

     

    “नहीं…”

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “हां, आरोही।”

     

    “आप झूठ बोल रहे हैं।”

     

    “मैं झूठ क्यों बोलूंगा?”

     

    आरोही पीछे हट गई।

     

    “मेरे पिता अर्जुन थे।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “अर्जुन ने तुम्हें पाला था। लेकिन तुम्हें जन्म मैंने दिया।”

     

    अर्जुन अचानक आगे बढ़े।

     

    “विराज!”

     

    विराज ने उनकी तरफ देखा।

     

    “क्यों अर्जुन? अब सच सुनकर डर लग रहा है?”

     

    अर्जुन की आंखों में गुस्सा था।

     

    “तुम्हें पिता कहलाने का कोई अधिकार नहीं है।”

     

    विराज हंस पड़ा।

     

    “खून का रिश्ता अधिकार नहीं मांगता।”

     

    आरव तुरंत आरोही के सामने आकर खड़ा हो गया।

     

    “बस।”

     

    विराज ने उसे देखा।

     

    “तुम बीच में क्यों आ रहे हो?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “क्योंकि वो अकेली नहीं है।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    “आरव… मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “जो भी सच होगा, हम साथ जानेंगे।”

     

    आरव ने नंदिनी की तरफ देखा।

     

    “मां, आप बताइए।”

     

    नंदिनी चुप रहीं।

     

    “क्या विराज सच बोल रहा है?”

     

    नंदिनी की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    उन्होंने धीरे से सिर हिला दिया।

     

    आरोही का दिल टूट गया।

     

    “मतलब…?”

     

    नंदिनी ने कांपती आवाज में कहा,

     

    “हां… विराज तुम्हारा जैविक पिता है।”

     

    आरोही पीछे हट गई।

     

    “नहीं!”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ना चाहा, लेकिन आरोही ने अपना हाथ छुड़ा लिया।

     

    “मेरे पिता अर्जुन थे।”

     

    अर्जुन की आंखों में दर्द था।

     

    “और हमेशा रहेंगे।”

     

    विराज ने कड़वाहट से कहा,

     

    “तुम्हें क्या पता पिता होने का मतलब?”

     

    अर्जुन ने जवाब दिया,

     

    “उतना पता है जितना तुम्हें कभी नहीं होगा।”

     

    “तुमने मेरी बेटी को मुझसे दूर किया।”

     

    “क्योंकि तुम उसके लायक नहीं थे।”

     

    विराज की आंखों में गुस्सा आ गया।

     

    “तुम्हारी वजह से मैंने उसे पच्चीस साल दूर से देखा।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “और मैंने पच्चीस साल उसे तुम्हारी सच्चाई से बचाया।”

     

    आरोही ने दोनों की तरफ देखा।

     

    उसका सिर चकराने लगा।

     

    “मुझे अकेला छोड़ दीजिए…”

     

    वह पीछे हटने लगी।

     

    आरव उसके पास गया।

     

    “आरोही।”

     

    “नहीं आरव।”

     

    “मैं तुम्हारे साथ हूं।”

     

    “मुझे थोड़ी देर अकेले रहना है।”

     

    आरव रुक गया।

     

    लेकिन उसकी नजर आरोही से नहीं हटी।

     

    विराज ने समुद्र की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “तुम्हें लगता है मैं सिर्फ एक खलनायक हूं?”

     

    किसी ने जवाब नहीं दिया।

     

    “नंदिनी और मैं एक-दूसरे से प्यार करते थे।”

     

    नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “फिर?”

     

    “फिर अर्जुन हमारे बीच आ गया।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “झूठ।”

     

    विराज ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम हमेशा यही कहते रहे।”

     

    फिर वह आरोही की तरफ मुड़ा।

     

    “जब तुम्हारी मां को पता चला कि वो तुम्हारे साथ गर्भवती है, मैं उसे अपने साथ ले जाना चाहता था।”

     

    नंदिनी बोलीं,

     

    “तुम मुझे अपने साथ नहीं ले जाना चाहते थे। तुम मुझे अपने कारोबार और ताकत का हिस्सा बनाना चाहते थे।”

     

    विराज चुप हो गया।

     

    नंदिनी आगे बोलीं,

     

    “तुम्हें सिर्फ अपना नाम चाहिए था।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “लेकिन वो मेरी बेटी थी।”

     

    “तुम्हारी बेटी होने से ज्यादा उसे एक इंसान बनने का अधिकार था।”

     

    विराज की आंखों में कुछ पल के लिए दर्द दिखाई दिया।

     

    फिर उसने कहा,

     

    “और मैंने वो अधिकार उसे कभी नहीं दिया?”

     

    नंदिनी ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    आरोही ने अर्जुन की तरफ देखा।

     

    “अगर आप मेरे पिता नहीं थे… तो आपने मुझे इतना प्यार क्यों किया?”

     

    अर्जुन की आंखें भर आईं।

     

    “क्योंकि तुम्हारे जन्म के बाद मैंने तुम्हें पहली बार अपनी बाहों में लिया था।”

     

    “और?”

     

    “उस दिन मैंने तय कर लिया था कि चाहे दुनिया मुझे तुम्हारा पिता माने या न माने… मैं तुम्हारा पिता बनकर रहूंगा।”

     

    आरोही रोने लगी।

     

    “तो आपने मुझे कभी झूठ नहीं बताया?”

     

    अर्जुन चुप हो गए।

     

    आरोही ने फिर पूछा,

     

    “आपने मेरे पिता की सच्चाई मुझसे छुपाई।”

     

    अर्जुन ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मुझे डर था कि विराज तुम्हें ढूंढ लेगा।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “और उसने मुझे ढूंढने नहीं दिया।”

     

    अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि तुम खतरनाक थे।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “मैं आज भी हूं।”

     

    अचानक दूर से गोली चलने की आवाज आई।

     

    धांय!

     

    सब चौंक गए।

     

    गोली पास की चट्टान से टकराई।

     

    अभय ने तुरंत सबको नीचे झुकाया।

     

    “सब नीचे!”

     

    विराज के साथ आए लोग चारों तरफ फैल गए।

     

    कबीर ने बंदूक निकाली।

     

    “हमें यहां से निकलना होगा।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “पहले आरोही।”

     

    आरव ने तुरंत आरोही का हाथ पकड़ा।

     

    “मेरे साथ चलो।”

     

    आरोही इस बार उसके साथ चल पड़ी।

     

    दोनों एक चट्टान के पीछे छिप गए।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मुझे पता है।”

     

    “मेरे पिता…”

     

    “अर्जुन तुम्हारे पिता हैं।”

     

    “लेकिन खून से?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “खून से क्या होता है?”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे लिए?”

     

    “मेरे लिए जिसने मुझे पाला, वो मेरे पिता हैं।”

     

    “और अगर वो भी झूठ निकले?”

     

    आरव ने उसका चेहरा अपनी तरफ किया।

     

    “तो भी मैं तुम्हारे साथ रहूंगा।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू गिरने लगे।

     

    “तुम हमेशा मेरे साथ क्यों रहते हो?”

     

    आरव हल्का सा मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि शायद मैं तुम्हें छोड़ना चाहता ही नहीं।”

     

    आरोही ने धीरे से पूछा,

     

    “अगर हमारे परिवारों की वजह से हमारा रिश्ता गलत साबित हुआ तो?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तो दुनिया से लड़ेंगे।”

     

    “और अगर हमारे परिवार हमें अलग करना चाहें?”

     

    “तो उनसे भी लड़ेंगे।”

     

    “अगर तुम्हारे पिता?”

     

    “उनसे भी।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “और अगर मैं खुद कहूं कि मुझसे दूर चले जाओ?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तब भी पहले पूछूंगा कि तुम सच में चाहती हो या डर की वजह से कह रही हो।”

     

    आरोही हल्का सा मुस्कुराई।

     

    “तुम बहुत जिद्दी हो।”

     

    “तुम्हारे मामले में हूं।”

     

    तभी एक गोली उनके पास से निकल गई।

     

    दोनों तुरंत नीचे झुक गए।

     

    आरव ने आरोही को अपनी बाहों में ढक लिया।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    “हां।”

     

    “पक्का?”

     

    “हां।”

     

    “चलो।”

     

    दूसरी तरफ विराज ने शेखर को घेर लिया था।

     

    “अब भागने का कोई रास्ता नहीं है।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “तुम्हें क्या चाहिए?”

     

    “लाल फाइल।”

     

    शेखर चुप रहा।

     

    “मुझे पता है कि फाइल तुम्हारे पास है।”

     

    “नहीं।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “तो फिर आरव को मार दूंगा।”

     

    शेखर ने पहली बार घबराकर उसकी तरफ देखा।

     

    “उसे हाथ मत लगाना।”

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “यही तो तुम्हारी कमजोरी है।”

     

    “आरव को इसमें मत घसीटो।”

     

    “वो पहले से इसमें है।”

     

    विराज ने बंदूक शेखर की तरफ कर दी।

     

    “फाइल कहां है?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “मेरे पास नहीं।”

     

    “झूठ।”

     

    “मैं सच बोल रहा हूं।”

     

    विराज ने गोली चलाने के लिए उंगली ट्रिगर पर रखी।

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “बंदूक नीचे रखो।”

     

    विराज पलटा।

     

    आरव सामने खड़ा था।

     

    उसके हाथ में बंदूक थी।

     

    आरोही उसके पीछे थी।

     

    विराज हंस पड़ा।

     

    “तुम?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “तुम मुझे गोली मारोगे?”

     

    “अगर जरूरत पड़ी तो।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “अपने पिता के सामने?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मेरे पिता वो हैं जिन्होंने मुझे बचाया।”

     

    शेखर की आंखों में आंसू आ गए।

     

    शेखर ने आरव की तरफ देखा।

     

    “बंदूक नीचे कर दो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि आज कोई आपको नुकसान नहीं पहुंचाएगा।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “तुम्हें अपनी जिंदगी खतरे में नहीं डालनी चाहिए।”

     

    आरव ने जवाब दिया,

     

    “आपने मेरी जिंदगी बचाने के लिए पच्चीस साल अकेले गुजारे। आज मेरी बारी है।”

     

    शेखर की आंखों से आंसू गिर पड़े।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मैंने आपको पिता मान लिया है।”

     

    विराज ने ताना मारा,

     

    “इतनी जल्दी?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “खून से नहीं… कर्म से।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “बहुत भावुक हो गए।”

     

    फिर उसने आरोही की तरफ देखा।

     

    “लेकिन तुम्हें एक बात नहीं पता।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “लाल फाइल में सिर्फ तुम्हारे पिता का सच नहीं है।”

     

    “तो?”

     

    “उसमें तुम्हारी मां की मौत का सच भी है।”

     

    आरोही की सांस रुक गई।

     

    “मेरी मां?”

     

    विराज ने नंदिनी की तरफ देखा।

     

    “नंदिनी ने तुम्हें बताया कि वो तुमसे दूर क्यों हुई?”

     

    आरोही ने मां की तरफ देखा।

     

    नंदिनी चुप थीं।

     

    विराज ने कहा,

     

    “क्योंकि उसने तुम्हें बचाने के लिए नहीं…”

     

    वह थोड़ा रुका।

     

    “बल्कि क्योंकि उसने तुम्हारे जन्म की रात एक ऐसा काम किया था, जिसकी सजा उसे आज तक भुगतनी पड़ रही है।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या काम?”

     

    नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “आरोही…”

     

    “मां, सच बताइए।”

     

    नंदिनी रोते हुए बोलीं,

     

    “मैंने उस रात…”

     

    वह आगे बोल नहीं पाईं।

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “नंदिनी, अभी नहीं।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “नहीं! आज सब सच बताइए।”

     

    नंदिनी ने कांपती आवाज में कहा “तुम्हारे जन्म के कुछ मिनट बाद मैंने अस्पताल से एक और बच्चा उठाया था।”

     

    आरव और आरोही दोनों स्तब्ध रह गए।

     

    “दूसरा बच्चा?”

     

    नंदिनी ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किसका?”

     

    नंदिनी ने उसकी तरफ देखा।

     

    उनकी आंखों में डर था।

     

    “आरव का।”

     

    आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “मेरा?”

     

    नंदिनी ने कहा “तुम्हें तुम्हारी मां से अलग करके मैंने ही दूसरी जगह पहुंचाया था।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    माधवी की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “नंदिनी… तुमने ऐसा क्यों किया?”

     

    नंदिनी रोते हुए बोलीं “क्योंकि उस रात किसी ने मुझे मजबूर किया था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किसने?”

     

    नंदिनी ने कांपते हुए विराज की तरफ देखा।

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “अब सच सामने आ गया।”

     

    आरव की आंखों में गुस्सा भर गया।

     

    “तुमने मेरी मां से मुझे छीन लिया?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    उसने धीरे से कहा “मैंने सिर्फ आदेश दिया था।”

     

    आरव ने बंदूक कसकर पकड़ ली।

     

    और तभी…

     

    पीछे से एक और गोली चली।

     

    इस बार गोली…

     

    शेखर के सीने में जा लगी।

     

    “पापा!”

     

    आरव चीख उठा।

     

    शेखर जमीन पर गिर पड़े।

     

    आरोही ने भी चीख मार दी।

     

    नंदिनी रोने लगीं।

     

    विराज ने तुरंत पीछे देखा।

     

    लेकिन गोली चलाने वाला…

     

    विराज का आदमी नहीं था।

     

    वह आदमी अंधेरे से बाहर आया।

     

    उसके हाथ में बंदूक थी।

     

    और उसने कहा “अब अगला नंबर आरव का है।”

     

    आरव ने शेखर को संभालते हुए ऊपर देखा।

     

    उस आदमी का चेहरा देखकर…

     

    विराज भी स्तब्ध रह गया।

     

    “तुम…?”

     

    जारी रहेगा…

    Avatar photo

    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 23

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 23

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 23 : “जिसे पिता समझा, वही मेरा दुश्मन निकला?”

     

    नीलगिरी हवेली के उस गुप्त कमरे में चारों तरफ धुआं फैल चुका था।

     

    दरवाजा टूटकर जमीन पर पड़ा था।

     

    सामने खड़ा आदमी धीरे-धीरे कमरे के अंदर आया।

     

    उसकी नजर सबसे पहले आरोही पर पड़ी।

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “आखिरकार… इतने सालों बाद मेरी बेटी मेरे सामने खड़ी है।”

     

    आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “आप… मेरे पिता हैं?”

     

    उस आदमी ने कहा,

     

    “हां।”

     

    शेखर तुरंत आरोही के सामने आकर खड़े हो गए।

     

    “इसके पास मत जाना।”

     

    वह आदमी हंस पड़ा।

     

    “तुम अब भी मुझे इससे दूर रखोगे?”

     

    शेखर ने गुस्से में कहा,

     

    “तुमने इसे पैदा किया होगा, लेकिन पिता कहलाने का अधिकार तुम्हें नहीं है।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “मुझे सच चाहिए।”

     

    उस आदमी ने कहा,

     

    “सच यही है कि मैं तुम्हारा पिता हूं।”

     

    आरव ने गुस्से में कहा,

     

    “और इतने सालों तक कहां थे?”

     

    उस आदमी ने आरव की तरफ देखा।

     

    “तुम बीच में मत बोलो।”

     

    आरव एक कदम आगे बढ़ा।

     

    “ये मेरी जिंदगी है। मैं बीच में बोलूंगा।”

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “आरव…”

     

    वह आदमी मुस्कुराया।

     

    “तुम दोनों एक-दूसरे के बहुत करीब आ चुके हो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “इससे तुम्हें क्या?”

     

    “बहुत कुछ।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “आरोही, मेरी बात सुनो। ये आदमी तुम्हें सिर्फ अपने मकसद के लिए इस्तेमाल करना चाहता है।”

     

    आरोही ने शेखर की तरफ देखा।

     

    “लेकिन अगर ये सच में मेरे पिता हैं तो?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “खून का रिश्ता हमेशा पिता का रिश्ता नहीं बनाता।”

     

    उस आदमी ने गुस्से में शेखर की तरफ देखा।

     

    “तुमने ये अधिकार कब से हासिल कर लिया?”

     

    शेखर ने जवाब दिया,

     

    “जिस दिन मैंने इसकी जान बचाई थी।”

     

    आरोही ने कांपती आवाज में पूछा,

     

    “आपका नाम क्या है?”

     

    कुछ पल तक वह आदमी चुप रहा।

     

    फिर बोला “अभय राजवंशी।”

     

    कमरे में मौजूद राघव और अर्जुन दोनों चौंक गए।

     

    राघव के मुंह से निकला,

     

    “अभय…!”

     

    अभय ने उनकी तरफ देखा।

     

    “हां राघव। इतने साल बाद भी मेरा नाम याद है?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “तुम्हें मर जाना चाहिए था।”

     

    अभय हंस पड़ा।

     

    “ये बात तुम्हारे भाई शेखर ने भी कही थी।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा,

     

    “तुम शेखर के भाई हो?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    सब चौंक गए।

     

    अभय ने आगे कहा “मैं शेखर का सौतेला भाई हूं।”

     

    अभय ने धीरे-धीरे अपनी कहानी बतानी शुरू की।

     

    “मेरे पिता और शेखर के पिता अलग थे। लेकिन एक ही परिवार में पले-बढ़े।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “अभय, पुरानी बातें मत दोहराओ।”

     

    “क्यों नहीं?”

     

    अभय ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आज आरव और आरोही को सब पता चलना चाहिए।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “तुम दोनों की जिंदगी सिर्फ तुम्हारे माता-पिता की वजह से नहीं बदली।”

     

    “फिर किस वजह से?”

     

    “एक विरासत की वजह से।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कैसी विरासत?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “राजवंशी परिवार की ऐसी संपत्ति, जिसका राज सिर्फ परिवार के कुछ लोगों को पता था।”

     

    राघव ने कहा,

     

    “वो संपत्ति नहीं थी।”

     

    अभय हंसा।

     

    “तुम अब भी इसे छुपा रहे हो?”

     

    राघव चुप हो गए।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या छुपा रहे हैं?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “तुम्हारे जन्म से पहले राजवंशी परिवार के पास एक गुप्त ट्रस्ट था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “और उसका वारिस?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “तुम।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    “मैं?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “क्योंकि शेखर ने अपनी पूरी संपत्ति तुम्हारे नाम कर दी थी।”

     

    शेखर ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “मैंने वो संपत्ति इसलिए दी थी ताकि मेरे बाद आरव सुरक्षित रहे।”

     

    अभय ने कहा,

     

    “लेकिन मुझे वो सब चाहिए था।”

     

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “तो इसमें मेरा क्या संबंध है?”

     

    अभय उसकी तरफ देखकर बोला,

     

    “तुम्हारी मां नंदिनी उस ट्रस्ट की दूसरी संरक्षक थीं।”

     

    आरोही ने मां की तरफ देखा।

     

    “मां?”

     

    नंदिनी ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    “आपने मुझे कभी क्यों नहीं बताया?”

     

    “क्योंकि अगर तुम्हें पता चल जाता तो अभय तुम्हें ढूंढ लेता।”

     

    अभय ने कहा,

     

    “मैंने तुम्हें ढूंढ लिया।”

     

    नंदिनी ने गुस्से में कहा,

     

    “तुम्हें मेरी बेटी नहीं चाहिए। तुम्हें उसका अधिकार चाहिए।”

     

    अभय ने कहा,

     

    “मुझे दोनों चाहिए।”

     

    आरव आगे बढ़ा।

     

    “तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा।”

     

    अभय ने बंदूक उठाई।

     

    “आरव, मुझे मजबूर मत करो।”

     

    आरोही तुरंत आरव के सामने आ गई।

     

    “उन्हें गोली मत मारना।”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “यही तो जानता था।”

     

    आरव ने आरोही से कहा,

     

    “मेरे सामने मत आओ।”

     

    “मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगी।”

     

    “आरोही…”

     

    “नहीं।”

     

    अभय दोनों को देखता रहा।

     

    फिर अचानक उसने बंदूक नीचे कर दी।

     

    “तुम दोनों का प्यार मेरे लिए बहुत उपयोगी है।”

     

    आरव ने गुस्से में कहा,

     

    “हमारा प्यार तुम्हारे किसी काम नहीं आएगा।”

     

    अभय ने कहा,

     

    “देखते हैं।”

     

    अभय ने एक फाइल निकाली।

     

    “इसमें तुम्हारे जन्म के सारे दस्तावेज हैं।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मुझे नहीं चाहिए।”

     

    “लेकिन तुम्हें चाहिए।”

     

    अभय ने फाइल आरोही की तरफ बढ़ाई।

     

    “क्योंकि इसमें तुम्हारे रिश्ते का सच भी है।”

     

    आरोही ने फाइल लेने के लिए हाथ बढ़ाया।

     

    आरव ने उसका हाथ रोक दिया।

     

    “अभी नहीं।”

     

    अभय ने कहा,

     

    “क्यों डर रहे हो?”

     

    “मुझे किसी बात का डर नहीं।”

     

    “तो फिर सच देखने से क्यों बच रहे हो?”

     

    आरव ने फाइल ले ली।

     

    उसने पहला पन्ना खोला।

     

    आरोही उसके पास खड़ी थी।

     

    पन्ने पर उनके जन्म की तारीख लिखी थी।

     

    दोनों की तारीख एक ही थी।

     

    फिर अगला पन्ना।

     

    दोनों के जन्मस्थान का नाम एक ही था।

     

    फिर तीसरा पन्ना।

     

    उसमें लिखा था “दोनों बच्चों की सुरक्षा एक ही परिवार के जिम्मे रहेगी।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “इसमें तो कुछ गलत नहीं है।”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “आखिरी पन्ना पढ़ो।”

     

    आरव ने आखिरी पन्ना खोला।

     

    उस पर सिर्फ एक लाइन थी—

     

    “इन दोनों बच्चों को कभी यह नहीं बताया जाएगा कि वे एक-दूसरे से किस रिश्ते में जुड़े हैं।”

     

    आरोही का चेहरा बदल गया।

     

    “कौन-सा रिश्ता?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “यही तो तुम्हें जानना है।”

     

    शेखर अचानक बोले,

     

    “अभय, अब बहुत हो गया।”

     

    अभय ने उनकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें सच बताना पड़ेगा।”

     

    शेखर कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर उन्होंने आरव और आरोही की तरफ देखा।

     

    “तुम दोनों के बीच खून का कोई रिश्ता नहीं है।”

     

    आरोही ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन शेखर ने आगे कहा “लेकिन तुम दोनों के परिवारों के बीच एक बहुत पुराना रिश्ता है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कैसा?”

     

    “तुम्हारे पिता और आरोही के पिता…”

     

    शेखर रुक गए।

     

    अभय ने बात पूरी की “एक ही मां के बेटे थे।”

     

    आरोही चौंक गई।

     

    “मतलब?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “तुम्हारे पिता और मेरे पिता…”

     

    वह रुक गया।

     

    फिर बोला “एक ही परिवार से थे।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तो इससे हमारे रिश्ते पर क्या असर पड़ता है?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “कुछ नहीं।”

     

    अभय ने हंसकर कहा,

     

    “लेकिन आगे की बात सुनो।”

     

    उसने दूसरी फाइल खोली।

     

    “आरोही के पिता की पहचान अभी पूरी तरह सामने नहीं आई है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “क्योंकि उसके जन्म रिकॉर्ड में पिता का नाम बदला गया था।”

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    “किसने बदला?”

     

    अभय ने शेखर की तरफ देखा।

     

    “शेखर ने।”

     

    आरोही ने शेखर की तरफ देखा।

     

    “आपने?”

     

    शेखर ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    आरोही ने मां की तरफ देखा।

     

    “मां, सच क्या है?”

     

    नंदिनी की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “मैं तुम्हें सच बताना चाहती थी।”

     

    “तो बताइए।”

     

    “लेकिन तुम्हारी जान खतरे में थी।”

     

    “फिर भी… मुझे जानने का हक था।”

     

    नंदिनी ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    उन्होंने धीरे से कहा,

     

    “तुम्हारे जन्म के समय तुम्हारे पिता का नाम रिकॉर्ड में कुछ और था।”

     

    “कौन?”

     

    नंदिनी ने होंठ खोले।

     

    लेकिन अचानक बाहर गोली चली।

     

    धांय!

     

    कमरे की खिड़की का शीशा टूट गया।

     

    अभय ने तुरंत नंदिनी को पीछे खींच लिया।

     

    शेखर चिल्लाए “सब नीचे!”

     

    दूसरी गोली चली।

     

    इस बार अभय के कंधे को छूती हुई निकल गई।

     

    अभय पीछे हट गया।

     

    “वो यहां कैसे पहुंच गए?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “विराज!”

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    उन्होंने बाहर देखा।

     

    “ये विराज नहीं है।”

     

    हवेली के बाहर कई गाड़ियों की आवाज सुनाई देने लगी।

     

    कबीर ने खिड़की से देखा।

     

    “बहुत सारे लोग हैं।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “हमें यहां से निकलना होगा।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “पीछे का रास्ता बंद है।”

     

    राघव ने पूछा,

     

    “तो क्या करें?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “मेरे साथ आओ।”

     

    आरव ने तुरंत कहा,

     

    “मैं तुम्हारे साथ नहीं आऊंगा।”

     

    अभय ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें मेरी जरूरत पड़ेगी।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि जो लोग बाहर हैं, वो मुझे नहीं…”

     

    उसने आरोही की तरफ देखा।

     

    “उसे लेने आए हैं।”

     

    आरोही का चेहरा डर से सफेद पड़ गया।

     

    आरव उसके सामने खड़ा हो गया।

     

    “कोई उसे हाथ भी नहीं लगाएगा।”

     

    अभय ने कहा,

     

    “तो फिर मेरे साथ चलो।”

     

    आरव ने कुछ पल सोचा।

     

    फिर उसने आरोही का हाथ पकड़ा।

     

    “हम साथ चलेंगे।”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “यही सही फैसला है।”

     

    अभय उन्हें कमरे के पीछे एक और दरवाजे तक ले गया।

     

    दरवाजा खुला तो नीचे जाने वाली लंबी सुरंग दिखाई दी।

     

    नंदिनी ने हैरानी से कहा,

     

    “ये सुरंग अभी तक बंद थी।”

     

    अभय बोला,

     

    “मैंने इसे कभी बंद नहीं किया।”

     

    सब लोग सुरंग में उतरने लगे।

     

    आरव सबसे पीछे था।

     

    आरोही उसके साथ थी।

     

    अचानक आरोही का पैर फिसल गया।

     

    आरव ने उसे पकड़ लिया।

     

    “संभलकर।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अगर तुम नहीं होते तो मैं गिर जाती।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “मैं हूं ना।”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “हमेशा रहना।”

     

    आरव ने उसका हाथ अपने हाथ में लेकर कहा,

     

    “ये वादा है।”

     

    दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर आगे चलने लगे।

     

    लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उनके पीछे…

     

    कोई और भी सुरंग में उतर चुका था।

     

    कुछ देर बाद वे सुरंग के आखिरी हिस्से में पहुंचे।

     

    वहां एक बड़ा लोहे का दरवाजा था।

     

    अभय ने दरवाजा खोला।

     

    सामने समुद्र का किनारा था।

     

    सब बाहर निकल आए।

     

    राघव ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन तभी पीछे से आवाज आई “बहुत अच्छा रास्ता है।”

     

    सब पलट गए।

     

    सुरंग के मुहाने पर विराज खड़ा था।

     

    उसके हाथ में बंदूक थी।

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “तुम सब सोच रहे थे कि मुझसे बच जाओगे?”

     

    आरव ने आरोही को अपने पीछे कर लिया।

     

    विराज ने कहा,

     

    “आज सिर्फ एक चीज चाहिए मुझे।”

     

    “क्या?”

     

    विराज ने आरोही की तरफ इशारा किया।

     

    “ये लड़की।”

     

    अभय ने गुस्से में कहा,

     

    “विराज, उसे हाथ लगाया तो…”

     

    विराज हंस पड़ा।

     

    “अभय, तुम अब भी समझते हो कि फैसला तुम्हारा है?”

     

    अभय चौंक गया।

     

    “क्या मतलब?”

     

    विराज ने अपनी जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

     

    उसने तस्वीर अभय की तरफ फेंकी।

     

    अभय ने तस्वीर उठाई।

     

    तस्वीर देखकर उसका चेहरा बदल गया।

     

    “नहीं…”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या है?”

     

    अभय ने तस्वीर आरव को दी।

     

    तस्वीर में एक बच्चा था।

     

    और उसके साथ खड़ी थी…

     

    आरोही की मां नंदिनी।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे लिखा था “असली पिता – अभय नहीं।”

     

    आरव ने हैरानी से नंदिनी की तरफ देखा।

     

    नंदिनी रो पड़ीं।

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “अब बताओ आरोही…”

     

    वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    “क्या तुम जानना चाहती हो कि तुम्हारा असली पिता कौन है?”

     

    आरोही ने कांपती आवाज में पूछा “कौन?”

     

    विराज ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा “जिसे तुम आज तक अपना दुश्मन समझती रही हो…”

     

    आरव ने नंदिनी की तरफ देखा।

     

    नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    और विराज ने आखिरी शब्द कहे “तुम्हारा असली पिता… मैं हूं।”

     

    आरोही के हाथ से तस्वीर गिर गई।

     

    जारी रहेगा…

    Avatar photo

    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 22

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 22

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 22 : जिसे भाई समझा, वही सबसे बड़ा राज था

     

    नीलगिरी हवेली के उस गुप्त कमरे में अचानक ऐसी खामोशी छा गई थी कि सबकी सांसों की आवाज तक साफ सुनाई दे रही थी।

     

    सामने खड़ा आदमी खुद को शेखर का भाई बता रहा था।

     

    आरव उसकी तरफ देखता रह गया।

     

    “तुम… शेखर के भाई हो?”

     

    उस आदमी के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

     

    “हां।”

     

    राघव ने गुस्से में कहा,

     

    “झूठ बोलना बंद करो!”

     

    आदमी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “राघव, तुम अब भी मुझे पहचानने से इनकार कर रहे हो?”

     

    राघव की आंखें फैल गईं।

     

    “तुम…”

     

    माधवी ने कांपते हुए कहा,

     

    “विक्रम…”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “विक्रम कौन?”

     

    माधवी ने धीमे से कहा,

     

    “शेखर का छोटा भाई।”

     

    आरव की नजर उस आदमी पर टिक गई।

     

    “अगर तुम विक्रम हो… तो इतने सालों तक कहां थे?”

     

    विक्रम हंस पड़ा।

     

    “जहां मुझे होना चाहिए था।”

     

    “कहां?”

     

    “तुम्हारे आसपास।”

     

    आरव के चेहरे पर उलझन थी।

     

    “मतलब?”

     

    विक्रम ने एक कदम आगे बढ़ाया।

     

    “तुम्हें लगता है तुम्हारी जिंदगी में जो कुछ हुआ, वो सब अचानक हुआ?”

     

    आरव ने कुछ नहीं कहा।

     

    विक्रम बोला,

     

    “तुम्हारी हर परेशानी, हर हादसा, हर वो इंसान जो अचानक तुम्हारी जिंदगी में आया… उसके पीछे किसी न किसी का हाथ था।”

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तो तुमने हमें कब से देखा?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “बहुत पहले से।

     

    राघव ने गुस्से में कहा,

     

    “तुमने इतने सालों तक हमें क्यों नहीं छोड़ा?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “क्योंकि मुझे शेखर की तलाश थी।”

     

    “तुम्हें शेखर से क्या चाहिए था?”

     

    “उसकी मौत।”

     

    माधवी चौंक गईं।

     

    “तुम अपने ही भाई को मारना चाहते थे?”

     

    विक्रम की आंखों में गुस्सा भर आया।

     

    “क्योंकि उसने मेरे साथ धोखा किया था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कैसा धोखा?”

     

    विक्रम ने कुछ पल उसे देखा।

     

    “तुम्हें सच जानना है?”

     

    “हां।”

     

    “तो पहले ये समझो कि तुम्हारे पिता सिर्फ तुम्हारे पिता नहीं थे।”

     

    “फिर?”

     

    “वो उस संगठन के मुखिया थे जिसने हमारे पूरे परिवार की जिंदगी बदल दी।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन-सा संगठन?”

     

    विक्रम चुप रहा।

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “विक्रम, अब ये सब बताने का समय आ गया है।”

     

    विक्रम ने उनकी तरफ देखा।

     

    “तुम भी यहां हो?”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “हां।”

     

    विक्रम हंस पड़ा।

     

    “तो फिर आज बहुत सारे पुराने हिसाब पूरे होंगे।”

     

    विक्रम ने दीवार पर लगे पुराने प्रोजेक्टर को देखा।

     

    उसने एक बटन दबाया।

     

    स्क्रीन फिर से जल उठी।

     

    इस बार शेखर सामने नहीं थे।

     

    बल्कि एक पुरानी तस्वीर दिखाई दी।

     

    उसमें शेखर, विक्रम, राघव और अर्जुन एक साथ खड़े थे।

     

    आरव ने तस्वीर देखकर पूछा,

     

    “आप सब एक-दूसरे को पहले से जानते थे?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “कितने सालों से?”

     

    “तुम्हारे जन्म से भी पहले।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “फिर ये सब छुपाया क्यों गया?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “क्योंकि हम सबने एक गलती की थी।”

     

    “क्या?”

     

    राघव ने सिर झुका लिया।

     

    “हमने शेखर पर भरोसा किया।”

     

    विक्रम ने कड़वाहट से कहा,

     

    “और वही हमारी सबसे बड़ी गलती थी।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “शेखर ने क्या किया?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “उसने अपनी मौत का नाटक किया।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “क्या?”

     

    “हां।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    “क्योंकि उसे पता चल गया था कि कोई उसके पीछे पड़ा है।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “वो सिर्फ अपने लिए नहीं छिपा था।”

     

    विक्रम ने तुरंत कहा,

     

    “हां! वो आरव और आरोही को बचाने के लिए छिपा था।”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “मुझे भी?”

     

    विक्रम ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां।”

     

    विक्रम ने एक पुरानी फाइल निकाली।

     

    “तुम दोनों का जन्म एक ही रात हुआ था।”

     

    आरव और आरोही एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    “लेकिन तुम्हें नहीं पता कि उसी रात क्या हुआ था।”

     

    विक्रम ने फाइल खोली।

     

    “अस्पताल में आग लगाई गई थी।”

     

    माधवी की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “हां।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “किसने?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “विराज ने।”

     

    आरव ने गुस्से में कहा,

     

    “लेकिन वो क्यों?”

     

    “क्योंकि उस अस्पताल में तुम्हारे जन्म का रिकॉर्ड था।”

     

    “सिर्फ हमारा रिकॉर्ड?”

     

    “नहीं।”

     

    विक्रम ने फाइल का एक पन्ना उठाया।

     

    “एक ऐसा रिकॉर्ड भी था जो साबित कर सकता था कि विराज ने करोड़ों रुपये का घोटाला किया था।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “इसलिए उसने अस्पताल में आग लगाई।”

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “लेकिन हम दोनों को किसने बचाया?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “तुम्हारी मां माधवी और नंदिनी ने।”

     

    आरोही ने मां की तरफ देखा।

     

    “मां?”

     

    नंदिनी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “उस रात मैं तुम्हें लेकर भागी थी।”

     

    माधवी बोलीं,

     

    “और मैं आरव को लेकर।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “फिर?”

     

    नंदिनी ने कहा,

     

    “फिर हम अलग हो गए।”

     

    आरव ने अपनी मां का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मां, आपने मुझे इतने साल क्यों नहीं बताया?”

     

    माधवी ने रोते हुए कहा,

     

    “क्योंकि हमें डर था कि अगर तुम्हें सच पता चला तो वो लोग तुम्हें फिर ढूंढ लेंगे।”

     

    “कौन लोग?”

     

    माधवी ने विक्रम की तरफ देखा।

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “वही लोग जिनके लिए आज भी तुम दोनों सबसे बड़ा खतरा हो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “लेकिन अब मैं डरूंगा नहीं।”

     

    विक्रम मुस्कुराया।

     

    “यही तो देखना चाहता था।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “कि तुम दोनों डरते हो या लड़ते हो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “हम लड़ेंगे।”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “तो फिर तुम्हें शेखर तक पहुंचना होगा।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा,

     

    “वो कहां हैं?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “यहीं।”

     

    विक्रम उन्हें हवेली के एक पुराने हिस्से में ले गया।

     

    वहां एक बड़ी किताबों की अलमारी थी।

     

    उसने एक किताब निकाली।

     

    अलमारी धीरे-धीरे पीछे हट गई।

     

    पीछे एक संकरी सीढ़ी दिखाई दी।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “ये रास्ता कहां जाता है?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “उस कमरे तक जहां शेखर पिछले दो सालों से छिपा है।”

     

    आरव की धड़कन तेज हो गई।

     

    “दो साल?”

     

    “हां।”

     

    “और आपने हमें क्यों नहीं बताया?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “क्योंकि पहले मुझे यकीन करना था कि तुम सच में उसके बेटे हो।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम्हें अब यकीन है?”

     

    विक्रम ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “अब पूरा यकीन है।”

     

    सब लोग सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे।

     

    सबसे आगे विक्रम था।

     

    उसके पीछे आरव और आरोही।

     

    फिर राघव, माधवी, नंदिनी, अर्जुन और कबीर।

     

    सीढ़ियों के आखिर में एक लोहे का दरवाजा था।

     

    विक्रम ने दरवाजे पर तीन बार दस्तक दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    अंदर से कोई जवाब नहीं आया।

     

    विक्रम ने फिर दस्तक दी।

     

    इस बार अंदर से आवाज आई “कौन?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “मैं हूं।”

     

    कुछ पल खामोशी रही।

     

    फिर आवाज आई “तुम अकेले हो?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “कौन है?”

     

    विक्रम ने आरव की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारा बेटा।”

     

    दरवाजे के पीछे अचानक खामोशी छा गई।

     

    फिर…

     

    क्लिक।

     

    दरवाजा खुल गया।

     

    कमरे में बहुत कम रोशनी थी।

     

    एक आदमी खिड़की के पास खड़ा था।

     

    उसके बाल थोड़े सफेद हो चुके थे।

     

    चेहरा थका हुआ था।

     

    लेकिन आंखें…

     

    आरव की आंखों जैसी।

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “शेखर…”

     

    आदमी पलटा।

     

    आरव और शेखर की नजरें मिलीं।

     

    दोनों कुछ पल तक कुछ नहीं बोले।

     

    फिर शेखर की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “आरव…”

     

    आरव के कदम वहीं रुक गए।

     

    शेखर धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़े।

     

    “मैंने तुम्हें पहली बार देखा था… जब तुम सिर्फ कुछ घंटे के थे।”

     

    आरव की आंखें भर आईं।

     

    “फिर मुझे छोड़ क्यों दिया?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “मैंने तुम्हें नहीं छोड़ा।”

     

    “फिर?”

     

    “मैंने तुम्हें बचाया।”

     

    आरव की आवाज भर्रा गई।

     

    “मेरे बिना रहे?”

     

    “हर दिन।”

     

    शेखर ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।

     

    आरव कुछ पल खड़ा रहा।

     

    फिर उसने धीरे से उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    शेखर ने उसे अपने सीने से लगा लिया।

     

    दोनों की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    माधवी यह देखकर रो पड़ीं।

     

    राघव भी नजरें झुका गए।

     

    आरोही चुपचाप दोनों को देखती रही।

     

    कुछ देर बाद शेखर ने आरव से कहा,

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किस बात के लिए?”

     

    “तुम्हारा बचपन तुमसे छीनने के लिए।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “आपने मुझे बचाया था।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “लेकिन अब एक और सच तुम्हें जानना होगा।”

     

    आरव ने उनकी तरफ देखा।

     

    “क्या?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “तुम्हारे जन्म के बाद मैंने तुम्हें एक नाम दिया था।”

     

    “कौन सा?”

     

    शेखर ने कहा “आरव राजवंशी नहीं।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    शेखर ने आगे कहा,

     

    “तुम्हारा असली नाम था…”

     

    अचानक कमरे की लाइट बंद हो गई।

     

    सब चौंक गए।

     

    कबीर ने तुरंत दरवाजा बंद किया।

     

    बाहर से गोली चलने की आवाज आई।

     

    धांय!

     

    शेखर ने आरव को नीचे खींच लिया।

     

    “सब नीचे!”

     

    अगली गोली दीवार में जा लगी।

     

    आरोही चीख उठी।

     

    “आरव!”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मैं ठीक हूं।”

     

    शेखर ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    “वो यहां तक पहुंच गए।”

     

    विक्रम ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    शेखर ने गंभीर आवाज में कहा “विराज नहीं…”

     

    उन्होंने बाहर अंधेरे में देखा।

     

    “इस बार… खुद शेखर को मारने वाला आया है।”

     

    आरव ने चौंककर पूछा,

     

    “कौन?”

     

    शेखर ने धीरे से उसकी तरफ देखा।

     

    उनकी आंखों में डर था।

     

    “तुम्हारा दूसरा पिता।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    “दूसरा… पिता?”

     

    शेखर ने कहा “तुम्हें ये जानना होगा कि तुम्हें जन्म देने वाला कौन था… और तुम्हें पालने वाला कौन।”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “मतलब?”

     

    शेखर ने जवाब दिया “आरव का जन्म दो परिवारों के राज से हुआ था।”

     

    तभी दरवाजा जोर से हिलने लगा।

     

    धड़ाम!

     

    कोई बाहर से उसे तोड़ने की कोशिश कर रहा था।

     

    शेखर ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “अगर मैं आज नहीं बचा… तो नीलगिरी हवेली के नीचे छुपी लाल फाइल ढूंढना।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “उसमें क्या है?”

     

    शेखर ने कहा “तुम्हारे जन्म का वो सच… जो तुम्हें और आरोही को हमेशा के लिए एक-दूसरे से अलग भी कर सकता है।”

     

    आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “क्या?”

     

    और तभी…

     

    दरवाजा टूटकर जमीन पर गिर गया।

     

    धुएं के बीच एक परिचित चेहरा सामने आया।

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    वह आदमी मुस्कुराया और बोला “बहुत हो गया पिता-पुत्र का मिलन… अब मेरी बेटी को मेरे साथ भेज दो।”

     

    आरोही के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “बेटी…?”

     

    शेखर ने घबराकर कहा “आरोही… इसके पास मत जाना। यही तुम्हारा असली पिता है।”

     

    जारी रहेगा…

    Avatar photo

    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 21

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 21

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 21 : नीलगिरी हवेली का रहस्य

     

    माधवी की बात सुनते ही मंदिर के बाहर खड़े सभी लोग जैसे पत्थर के हो गए।

     

    “नीलगिरी हवेली में नंदिनी कैद है।”

     

    आरोही के होंठ कांपने लगे।

     

    “मां… आपको पक्का पता है?”

     

    माधवी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां बेटा। मुझे अपनी आंखों से नंदिनी को वहां जाते हुए देखा था।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “तो मेरी मां जिंदा है…”

     

    माधवी ने उसे गले लगा लिया।

     

    “हां।”

     

    आरोही उनके सीने से लगकर रोने लगी।

     

    “मुझे उन्हें बचाना है।”

     

    आरव उसके पास आया।

     

    “हम उन्हें बचाएंगे।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन तुम्हें अकेले बुलाया गया है।”

     

    “मैं अकेला नहीं जाऊंगा।”

     

    “लेकिन उस आदमी ने धमकी दी है।”

     

    आरव ने शांत आवाज में कहा,

     

    “अगर उसने नंदिनी मां को सच में कैद कर रखा है, तो वो चाहता है कि मैं अकेला जाऊं। लेकिन हम उसकी शर्तों पर नहीं चलेंगे।”

     

    अर्जुन ने सिर हिलाया।

     

    “बिल्कुल।”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “विराज और शेखर दोनों खेल खेल रहे हैं। हमें बहुत सावधानी से कदम उठाना होगा।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “और अगर शेखर सच में मेरे पिता हैं?”

     

    राघव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तो इस बार तुम्हें फैसला करना होगा कि तुम किसे अपना पिता मानते हो।”

     

    आरव की नजर राघव पर टिक गई।

     

    कुछ पल दोनों के बीच खामोशी रही।

     

    फिर आरव ने धीरे से कहा,

     

    “जिसने मुझे पाला… मेरे लिए वो हमेशा मेरे पिता रहेंगे।”

     

    राघव की आंखें भर आईं।

     

    उन्होंने आरव को गले लगा लिया।

     

    कुछ घंटों बाद सभी लोग नीलगिरी हवेली के लिए निकल पड़े।

     

    इस बार आरव ने साफ कह दिया था कि कोई भी उसे अकेला नहीं छोड़ेगा।

     

    अद्वैत गाड़ी चला रहा था।

     

    कबीर उसके साथ बैठा था।

     

    पीछे आरव, आरोही, राघव, माधवी और अर्जुन बैठे थे।

     

    रास्ते में अचानक आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम बहुत चुप हो।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “सोच रहा हूं।”

     

    “क्या?”

     

    “अगर वो आदमी सच में मेरा पिता निकला तो?”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “तब भी तुम वही रहोगे।”

     

    “क्या मतलब?”

     

    “आरव, तुम्हारी पहचान सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि तुम्हारे पिता कौन हैं।”

     

    वह उसका हाथ दबाते हुए बोली,

     

    “तुम्हारी पहचान तुम्हारे कर्मों से है।”

     

    आरव मुस्कुरा दिया।

     

    “तुम्हें पता है, तुम जब समझाती हो तो बहुत समझदार लगती हो।”

     

    “और?”

     

    “जब गुस्सा करती हो तो बिल्कुल नहीं।”

     

    आरोही ने उसे घूरा।

     

    “मैं अभी गुस्सा कर दूंगी।”

     

    आरव हंस पड़ा।

     

    “यही तो कह रहा था।”

     

    आरोही भी मुस्कुरा दी।

     

    लेकिन अगले ही पल उसकी नजर आरव के हाथ पर गई।

     

    “आरव…”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारा हाथ कांप रहा है।”

     

    आरव ने नजरें चुरा लीं।

     

    “थोड़ा डर लग रहा है।”

     

    आरोही ने अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया।

     

    “अब?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अब नहीं।”

     

    शाम ढलते-ढलते वे समुद्र के किनारे पहुंच गए।

     

    सामने एक बहुत बड़ी, पुरानी हवेली थी।

     

    चारों तरफ घना जंगल था।

     

    समुद्र की लहरें हवेली के पीछे चट्टानों से टकरा रही थीं।

     

    हवेली का मुख्य दरवाजा खुला हुआ था।

     

    कबीर ने गाड़ी रोक दी।

     

    “दरवाजा खुला है।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “ये अच्छी बात नहीं है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि इस हवेली का दरवाजा पिछले दस सालों से किसी ने नहीं खोला।”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “तो फिर आज किसने खोला?”

     

    किसी के पास जवाब नहीं था।

     

    आरव गाड़ी से उतर गया।

     

    “चलो।”

     

    राघव ने उसे रोकते हुए कहा,

     

    “सावधान रहना।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    सभी लोग हवेली के अंदर गए।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे।

     

    एक बड़ी घड़ी बंद पड़ी थी।

     

    फर्श पर धूल जमा थी।

     

    लेकिन बीच कमरे में…

     

    एक दीपक जल रहा था।

     

    आरोही ने कहा,

     

    “कोई यहां है।”

     

    तभी ऊपर से आवाज आई “स्वागत है, आरव।”

     

    सबने ऊपर देखा।

     

    बालकनी खाली थी।

     

    फिर आवाज आई “तुम्हें अकेले आना था।”

     

    आरव ने जवाब दिया,

     

    “मैं अकेला नहीं आया।”

     

    आवाज में हंसी थी।

     

    “मुझे पता था।”

     

    अचानक हवेली के दूसरे हिस्से से किसी महिला की चीख सुनाई दी।

     

    “बचाओ!”

     

    आरोही तुरंत उस तरफ दौड़ने लगी।

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “रुको!”

     

    “वो मां की आवाज थी।”

     

    “हो सकता है जाल हो।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू थे।

     

    “अगर सच में मां हुई तो?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “हम साथ जाएंगे।”

     

    दोनों आगे बढ़े।

     

    एक लंबे गलियारे के आखिर में लोहे का दरवाजा था।

     

    दरवाजे के पीछे से फिर आवाज आई “आरोही!”

     

    आरोही रो पड़ी।

     

    “मां!”

     

    उसने दरवाजा खोलने की कोशिश की।

     

    ताला लगा था।

     

    कबीर ने ताला तोड़ने की कोशिश की।

     

    लेकिन तभी राघव ने कहा,

     

    “रुको।”

     

    “क्यों?”

     

    “इस दरवाजे के नीचे बिजली की वायर जा रही है।”

     

    अद्वैत ने जमीन देखी।

     

    “ये जाल है।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तो असली कमरा कौन सा है?”

     

    तभी अर्जुन ने दीवार पर हाथ रखा।

     

    “यहां।”

     

    उन्होंने एक खास पत्थर दबाया।

     

    दीवार का एक हिस्सा खुल गया।

     

    पीछे एक गुप्त रास्ता था।

     

    आरोही ने हैरानी से कहा,

     

    “आपको ये कैसे पता?”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “क्योंकि मैंने ये हवेली बनवाई थी।”

     

    सब चौंक गए।

     

    गुप्त रास्ते से नीचे उतरने के बाद वे एक छोटे कमरे में पहुंचे।

     

    कमरे में एक कुर्सी थी।

     

    और उस कुर्सी पर…

     

    एक महिला बैठी थी।

     

    उसके हाथ बंधे हुए थे।

     

    बाल बिखरे हुए थे।

     

    लेकिन चेहरा…

     

    वही था।

     

    आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “मां…”

     

    महिला ने धीरे से सिर उठाया।

     

    कुछ पल तक वह आरोही को देखती रही।

     

    फिर उसकी आंखें भर आईं।

     

    “आरोही…”

     

    आरोही दौड़कर उनके पास गई।

     

    “मां!”

     

    नंदिनी ने उसे कसकर गले लगा लिया।

     

    दोनों रोने लगीं।

     

    “मुझे पता था तुम एक दिन मुझे ढूंढते हुए यहां जरूर आओगी।”

     

    आरोही रोते हुए बोली,

     

    “आपने मुझे छोड़ क्यों दिया?”

     

    नंदिनी ने उसके चेहरे को छुआ।

     

    “मैंने तुम्हें कभी नहीं छोड़ा।”

     

    “फिर इतने साल?”

     

    “मैं मजबूर थी।”

     

    आरव भी कुछ दूरी पर खड़ा उन्हें देख रहा था।

     

    नंदिनी की नजर आरव पर पड़ी।

     

    उनकी आंखें भर आईं।

     

    “आरव…”

     

    आरव चौंका।

     

    “आप मुझे जानती हैं?”

     

    नंदिनी ने कहा,

     

    “तुम्हें कैसे नहीं पहचानूंगी?”

     

    आरव उनके पास गया।

     

    नंदिनी ने उसका चेहरा दोनों हाथों में ले लिया।

     

    “तुम बिल्कुल अपने पिता जैसे दिखते हो।”

     

    आरव की आंखों में सवाल था।

     

    “मेरे पिता कौन हैं?”

     

    नंदिनी चुप हो गईं।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “मुझे सच बताइए।”

     

    नंदिनी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पिता का नाम शेखर है।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरव की सांस रुक गई।

     

    “तो शेखर सच में मेरे पिता हैं?”

     

    नंदिनी ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव ने पीछे मुड़कर राघव की तरफ देखा।

     

    राघव की आंखें नम थीं।

     

    “तो इतने सालों तक…”

     

    नंदिनी ने कहा,

     

    “राघव ने तुम्हें अपने बेटे से भी ज्यादा प्यार किया।”

     

    आरव ने राघव की तरफ देखा।

     

    राघव ने कहा,

     

    “मैंने तुम्हें कभी किसी और का बेटा नहीं समझा।”

     

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मुझे आपसे कभी शिकायत नहीं थी।”

     

    राघव ने कहा,

     

    “लेकिन अब तुम्हें अपने पिता को जानना होगा।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “शेखर कहां हैं?”

     

    नंदिनी ने नजरें झुका लीं।

     

    “यहीं।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “क्या?”

     

    नंदिनी ने कहा,

     

    “इस हवेली में।”

     

    अचानक कमरे की लाइट जल गई।

     

    सामने दीवार पर एक प्रोजेक्टर चल पड़ा।

     

    स्क्रीन पर एक आदमी दिखाई दिया।

     

    आरव उसे देखते ही ठहर गया।

     

    चेहरा गंभीर था।

     

    आंखों में अजीब-सी गहराई।

     

    नंदिनी ने धीमे से कहा,

     

    “शेखर।”

     

    स्क्रीन पर आदमी बोला “आरव…”

     

    आरव की आंखें भर आईं।

     

    “पापा?”

     

    शेखर कुछ पल उसे देखते रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “मुझे पता था तुम एक दिन यहां जरूर आओगे।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तो सामने क्यों नहीं आते?”

     

    शेखर ने जवाब दिया,

     

    “क्योंकि मैं चाहता हूं कि तुम पहले पूरी सच्चाई जानो।”

     

    “क्या सच्चाई?”

     

    “तुम्हारी मां माधवी ने तुमसे बहुत कुछ छुपाया।”

     

    माधवी आगे आईं।

     

    “शेखर, अब ये सब बंद करो।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “माधवी… तुमने आरव को बताया कि मैं मर गया हूं।”

     

    माधवी रोते हुए बोलीं,

     

    “मैंने उसे बचाने के लिए कहा था।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “और मैंने उसे दूर रहकर बचाया।”

     

    आरव ने गुस्से में कहा,

     

    “दोनों ने मुझे बचाने के नाम पर मुझसे मेरा बचपन छीन लिया।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    शेखर ने अचानक गंभीर आवाज में कहा,

     

    “आरव, मेरी बात ध्यान से सुनो।”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारे जन्म की रात अस्पताल से दो बच्चों को बाहर ले जाया गया था।”

     

    आरव ने आरोही की तरफ देखा।

     

    “हम दोनों?”

     

    “हां।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम्हारे जन्म के समय अस्पताल में एक ऐसा दस्तावेज तैयार हुआ था, जिसमें एक बहुत बड़े अपराध का सबूत था।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “किस अपराध का?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “एक ऐसा अपराध… जिसमें राजवंशी परिवार, सूद परिवार और कई बड़े लोग शामिल थे।”

     

    देवेंद्र ने सिर झुका लिया।

     

    विराज का नाम सुनते ही राघव की मुट्ठियां भींच गईं।

     

    शेखर ने कहा,

     

    “विराज उस अपराध का हिस्सा था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “और आप?”

     

    “मैं उस अपराध को रोकना चाहता था।”

     

    “फिर?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “मुझे धोखा दिया गया।”

     

    “किसने?”

     

    स्क्रीन कुछ सेकंड के लिए बंद हो गई।

     

    फिर दोबारा चालू हुई।

     

    शेखर ने कहा “जिसे तुम अपना सबसे भरोसेमंद दोस्त समझते हो।”

     

    आरव का चेहरा बदल गया।

     

    उसकी नजर धीरे-धीरे कबीर पर गई।

     

    कबीर चौंक गया।

     

    “आरव, मेरी तरफ ऐसे मत देखो।”

     

    आरव कुछ बोल पाता, उससे पहले शेखर ने कहा—

     

    “कबीर तुम्हारा दुश्मन नहीं है।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन अगली बात सुनकर सब स्तब्ध रह गए।

     

    “कबीर के पिता तुम्हारे पिता के दुश्मन थे।”

     

    कबीर ने सिर झुका लिया।

     

    “मुझे पता था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो तुम मेरे पास क्यों आए?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “क्योंकि मेरे पिता ने जो किया था… उसका प्रायश्चित मैं करना चाहता था।”

     

    नंदिनी अचानक घबरा गईं।

     

    “शेखर, उन्हें जल्दी यहां से निकालो।”

     

    शेखर ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    नंदिनी ने कांपती आवाज में कहा,

     

    “क्योंकि वो आ चुका है।”

     

    सबने उनकी तरफ देखा।

     

    “कौन?”

     

    नंदिनी ने धीरे से कहा “विराज नहीं…”

     

    वह दरवाजे की तरफ देखने लगीं।

     

    “वो आदमी… जिससे हम पच्चीस साल से भाग रहे हैं।”

     

    तभी ऊपर से जोरदार धमाका हुआ।

     

    धड़ाम!

     

    दीवार हिल गई।

     

    अर्जुन ने बंदूक निकाल ली।

     

    राघव ने कहा,

     

    “सब पीछे हटो।”

     

    फिर किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।

     

    धीरे-धीरे…

     

    सीढ़ियों से कोई नीचे उतर रहा था।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    कदमों की आवाज और करीब आई।

     

    फिर एक आदमी कमरे में दाखिल हुआ।

     

    उसे देखते ही शेखर की स्क्रीन पर मौजूद तस्वीर गायब हो गई।

     

    माधवी के मुंह से चीख निकल गई “नहीं…”

     

    आरव ने उस आदमी को देखा।

     

    वह आदमी मुस्कुराया।

     

    “बहुत सालों से तुम लोग मेरा नाम सुनते आए हो।”

     

    वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    “आज पहली बार मुझे देख भी लो।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम कौन हो?”

     

    आदमी ने मुस्कुराकर कहा “मैं शेखर का भाई हूं।”

     

    सबके चेहरे पर हैरानी छा गई।

     

    राघव ने कांपती आवाज में कहा “नहीं… ये संभव नहीं है।”

     

    आदमी हंसा।

     

    “क्यों राघव?”

     

    फिर उसने आरव की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि तुम्हें बचाने के लिए शेखर ने जिसे मरा हुआ बताया था… वो मैं था।”

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    और तभी उस आदमी ने आखिरी बात कही “आरव, तुम्हें अपने पिता की तलाश करने की जरूरत नहीं है…”

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि शेखर अभी इसी हवेली में है।”

     

    जारी रहेगा…

    Avatar photo

    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 20

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 20

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

    एपिसोड – 20 : विराज की वापसी और आरव की जिंदगी का सबसे बड़ा सच

     

    मंदिर के अंदर धुआं फैल चुका था।

     

    टूटा हुआ दरवाजा जमीन पर पड़ा था और उसके पीछे खड़ा था वही शख्स, जिसे सब पच्चीस साल पहले मर चुका समझते थे।

     

    विराज सूद।

     

    आरोही ने उसे देखते ही आरव का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    “आरव… ये वही है?”

     

    आरव की आंखें गुस्से से लाल हो गईं।

     

    “हां।”

     

    विराज धीरे-धीरे मंदिर के अंदर आया।

     

    उसके चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान थी।

     

    “इतने सालों बाद आखिर हम आमने-सामने हैं।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तुम्हें तो मर जाना चाहिए था।”

     

    विराज हंस पड़ा।

     

    “लोगों को यही विश्वास दिलाना जरूरी था।”

     

    अर्जुन उसके सामने आकर खड़े हो गए।

     

    “विराज, अब बहुत हो चुका।”

     

    विराज ने उनकी तरफ देखा।

     

    “अर्जुन… तुम अब भी जिंदा हो?”

     

    अर्जुन ने जवाब दिया,

     

    “तुम्हारी तरह।”

     

    विराज ने ताली बजाई।

     

    “वाह! पच्चीस साल बाद भी तुम्हारी हिम्मत कम नहीं हुई।”

     

    राघव ने गुस्से में कहा,

     

    “तुमने हमारे परिवार की जिंदगी बर्बाद कर दी।”

     

    विराज ने उसकी तरफ देखा।

     

    “नहीं राघव… मैंने सिर्फ वही किया जो मुझे करना था।”

     

    “तुमने माधवी को हमसे अलग किया।”

     

    “हां।”

     

    “नंदिनी को गायब किया।”

     

    “हां।”

     

    “और आरव और आरोही की जिंदगी बर्बाद की।”

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “अभी तो उनकी जिंदगी शुरू हुई है।”

     

    आरव ने उसकी तरफ कदम बढ़ाया।

     

    “अगर आरोही को छूने की कोशिश भी की तो…”

     

    विराज ने बीच में कहा,

     

    “तो क्या करोगे?”

     

    आरव कुछ कहता, उससे पहले आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “आरव, नहीं।”

     

    विराज दोनों को देखकर मुस्कुराया।

     

    “यही तो मुझे चाहिए था।”

     

    आरव ने भौंहें सिकोड़ लीं।

     

    “क्या?”

     

    “तुम दोनों का एक-दूसरे के लिए इतना प्यार।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “तुम्हें फाइल चाहिए, है ना?”

     

    विराज ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “तो यहां से चले जाओ।”

     

    “फाइल दो और मैं चला जाऊंगा।”

     

    अर्जुन ने लोहे का बॉक्स अपने पीछे कर लिया।

     

    “तुम्हें वो कभी नहीं मिलेगी।”

     

    विराज ने बंदूक निकाल ली।

     

    “फिर किसी एक की जान जाएगी।”

     

    माधवी आगे बढ़ीं।

     

    “विराज!”

     

    विराज ने उनकी तरफ देखा।

     

    “माधवी… तुम भी जिंदा हो।”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “तुमने बहुत कुछ छीन लिया।”

     

    “लेकिन तुम्हारा बेटा मैंने नहीं छीना।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मेरी जिंदगी में जो कुछ हुआ, उसके पीछे तुम थे।”

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारी जिंदगी में जो कुछ हुआ, उसके पीछे तुम्हारे अपने लोग थे।”

     

    आरव ने राघव की तरफ देखा।

     

    “क्या मतलब?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “तुम्हें सच अपने पिता से पूछना चाहिए।”

     

    राघव ने नजरें झुका लीं।

     

    आरव उनके पास गया।

     

    “पापा?”

     

    राघव चुप रहे।

     

    “आपको क्या पता है?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “उसे सब पता है।”

     

    आरव ने राघव का कंधा पकड़ लिया।

     

    “सच बताइए।”

     

    राघव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “आरव…”

     

    “हां?”

     

    “मैंने तुम्हें बचाने के लिए एक बहुत बड़ा झूठ बोला था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन सा?”

     

    राघव ने कहा “विराज तुम्हारा दुश्मन जरूर है… लेकिन तुम्हारे पिता का कातिल नहीं।”

     

    आरव जैसे पत्थर का हो गया।

     

    “तो मेरी जिंदगी किसने बर्बाद की?”

     

    राघव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “मैंने।”

     

    “आपने?”

     

    आरव की आवाज टूट गई।

     

    राघव ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    आरोही तुरंत आरव के पास आई।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया लेकिन उसकी नजरें राघव पर थीं।

     

    “आपने मुझसे क्या छुपाया?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “तुम्हारी असली पहचान।”

     

    “मैं कौन हूं?”

     

    “तुम मेरे बेटे हो।”

     

    “ये तो मुझे पता है।”

     

    “लेकिन तुम्हारे जन्म से पहले… तुम्हें लेकर एक फैसला हुआ था।”

     

    “कैसा फैसला?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “तुम्हें इस दुनिया से गायब कर देने का।”

     

    आरव की सांसें थम गईं।

     

    “किसने?”

     

    राघव ने जवाब देने से पहले अर्जुन की तरफ देखा।

     

    अर्जुन ने धीरे से कहा,

     

    “राघव, अब सच छुपाने का कोई फायदा नहीं।”

     

    राघव ने आखिरकार कहा “तुम्हें मारने का आदेश… तुम्हारे असली पिता ने दिया था।”

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “मेरे… असली पिता?”

     

    माधवी रो पड़ीं।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने उनकी तरफ देखा।

     

    “मां, मुझे सब जानना है।”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “तुम्हारे पिता का नाम…”

     

    वह रुक गईं।

     

    आरव ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “कहिए।”

     

    माधवी की आंखों से आंसू गिर पड़े।

     

    “तुम्हारे पिता… राघव नहीं हैं।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरोही ने हैरानी से राघव की तरफ देखा।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “तो आप मेरे पिता नहीं हैं?”

     

    राघव की आंखें भर आईं।

     

    “खून से नहीं… लेकिन दिल से तुम हमेशा मेरे बेटे रहे हो।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “मेरे असली पिता कौन हैं?”

     

    माधवी ने धीरे से कहा “शेखर राजवंशी।”

     

    अर्जुन ने आंखें बंद कर लीं।

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “शेखर कौन?”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “राजवंशी परिवार का वो आदमी… जिसे दुनिया ने पच्चीस साल पहले सबसे बड़ा अपराधी माना था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “उन्होंने क्या किया था?”

     

    विराज पहली बार गंभीर हुआ।

     

    “उन्होंने मेरी पूरी दुनिया खत्म करने की कोशिश की थी।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “और फिर?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “वो मारे गए।”

     

    माधवी ने धीरे से कहा,

     

    “नहीं।”

     

    सबने उनकी तरफ देखा।

     

    “शेखर मरे नहीं थे।”

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “तो?”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “वो गायब हो गए थे।”

     

    “कहां?”

     

    माधवी ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तो मेरे पिता जिंदा हैं?”

     

    माधवी ने जवाब दिया,

     

    “शायद।”

     

    विराज ने हंसकर कहा,

     

    “नहीं।”

     

    आरव उसकी तरफ मुड़ा।

     

    विराज ने कहा,

     

    “शेखर मर चुका है।”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “तुम झूठ बोल रहे हो।”

     

    विराज ने अपनी जेब से एक तस्वीर निकाली।

     

    “अगर मैं झूठ बोल रहा हूं तो ये देखो।”

     

    उसने तस्वीर आरव की तरफ फेंकी।

     

    आरव ने तस्वीर उठाई।

     

    तस्वीर में एक आदमी अस्पताल के बिस्तर पर लेटा था।

     

    और उसके नीचे तारीख लिखी थी दो साल पहले।

     

    आरव की सांसें रुक गईं।

     

    “ये…”

     

    माधवी ने तस्वीर देखी और पीछे हट गईं।

     

    “नहीं…”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “मां, आप इसे पहचानती हैं?”

     

    माधवी ने कांपते हुए कहा “हां… ये तुम्हारे पिता हैं।”

     

    आरव की आंखों के सामने जैसे सब धुंधला हो गया।

     

    उसने तस्वीर सीने से लगा ली।

     

    “तो वो जिंदा हैं।”

     

    आरोही उसके पास आई।

     

    “हम उन्हें ढूंढेंगे।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अगर उन्होंने मुझे कभी अपना बेटा माना ही नहीं तो?”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “तो भी तुम उनके बेटे हो।”

     

    “अगर उन्होंने मुझे छोड़ दिया हो?”

     

    “तो मैं तुम्हें नहीं छोड़ूंगी।”

     

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तुम हर बार मेरे टूटने से पहले मुझे संभाल लेती हो।”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “क्योंकि तुम मेरे लिए सिर्फ एक कहानी नहीं हो, आरव।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “फिर?”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा “तुम मेरी जिंदगी हो।”

     

    कुछ पल के लिए दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    मंदिर के उस डरावने माहौल में भी उनके बीच एक अजीब-सी शांति थी।

     

    विराज ने उन्हें देखते हुए कहा,

     

    “यही प्यार तुम्हारी सबसे बड़ी कमजोरी बनेगा।”

     

    आरव ने आरोही का हाथ और कसकर पकड़ लिया।

     

    “नहीं।”

     

    “क्या?”

     

    “यही हमारा सबसे बड़ा हथियार है।”

     

    कबीर ने अचानक फाइल के आखिरी पन्ने पलटे।

     

    “रुको।”

     

    सब उसकी तरफ देखने लगे।

     

    “यहां कुछ लिखा है।”

     

    उसने पन्ना आरव के सामने किया।

     

    उस पर लिखा था “शेखर राजवंशी – अंतिम लोकेशन: नीलगिरी हवेली।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “ये नाम यहां कैसे?”

     

    राघव ने फाइल देखते ही कहा,

     

    “ये रिकॉर्ड मैंने कभी नहीं देखा।”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “क्योंकि इसे आखिरी वक्त पर बदला गया था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “नीलगिरी हवेली कहां है?”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “समुद्र के किनारे।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “वहां कौन रहता है?”

     

    अर्जुन ने गंभीर आवाज में कहा,

     

    “कोई नहीं।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “फिर वहां जाएंगे।”

     

    अर्जुन ने तुरंत कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि नीलगिरी हवेली में जो भी गया… वापस नहीं आया।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मैं जाऊंगा।”

     

    राघव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “नहीं।”

     

    “इस बार कोई मुझे रोक नहीं सकता।”

     

    आरोही उसके पास आकर खड़ी हो गई।

     

    “मैं भी चलूंगी।”

     

    राघव ने कहा,

     

    “तुम दोनों नहीं समझते कि वहां कितना खतरा है।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “हमने अपने परिवार का सच जानने के लिए इतना कुछ सहा है।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “अब पीछे नहीं हटेंगे।”

     

    विराज चुपचाप उनकी बातें सुन रहा था।

     

    अचानक उसने बंदूक नीचे कर दी।

     

    “जाओ।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या?”

     

    “नीलगिरी हवेली जाओ।”

     

    “तुम हमें जाने दे रहे हो?”

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “हां।”

     

    आरव को शक हुआ।

     

    “क्यों?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “क्योंकि वहां तुम्हें वो मिलेगा जिसे तुम ढूंढ रहे हो।”

     

    “मेरे पिता?”

     

    “शायद।”

     

    “और अगर तुमने झूठ बोला?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “तो तुम वापस आकर मुझे मार देना।”

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “मैं जरूर लौटूंगा।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “मुझे पता है।”

     

    सुबह होने लगी थी।

     

    आसमान हल्का नीला हो चुका था।

     

    सभी मंदिर से बाहर निकल आए।

     

    आरव और आरोही थोड़ी दूरी पर खड़े थे।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “पता नहीं।”

     

    “तुम्हें डर लग रहा है?”

     

    “हां।”

     

    “मुझे भी।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “लेकिन हम जाएंगे।”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “साथ।”

     

    “साथ।”

     

    तभी मंदिर के अंदर से अचानक जोरदार आवाज आई।

     

    सब पलटकर देखने लगे।

     

    लोहे का बॉक्स अपने आप बंद हो गया था।

     

    और उसके ऊपर रखी फाइल के आखिरी पन्ने पर एक नई लाइन दिखाई दे रही थी।

     

    कबीर ने पन्ना उठाया।

     

    उस पर लिखा था “जिसे तुम अपना पिता समझ रहे हो, वह तुम्हारा पिता नहीं है।”

     

    आरव ने हैरानी से कहा,

     

    “ये अभी यहां नहीं था।”

     

    अर्जुन ने पन्ना देखा।

     

    उनके चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “ये…”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    अर्जुन ने कांपते हुए कहा “इस लिखावट को मैं पहचानता हूं।”

     

    “किसकी है?”

     

    अर्जुन ने धीरे से जवाब दिया “शेखर की।”

     

    आरव की धड़कन तेज हो गई।

     

    “मतलब?”

     

    अर्जुन ने फाइल को देखते हुए कहा “शेखर जिंदा है… और वो चाहता है कि तुम उसे ढूंढो।”

     

    उसी समय आरव के फोन पर एक वीडियो आया।

     

    वीडियो में एक अंधेरा कमरा था।

     

    कुर्सी पर एक आदमी बैठा था।

     

    चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    फिर उस आदमी ने धीरे-धीरे अपना चेहरा कैमरे की तरफ उठाया।

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    उस आदमी ने कहा “आरव… अगर तुम सच में अपने पिता को ढूंढना चाहते हो, तो नीलगिरी हवेली आओ।”

     

    कुछ सेकंड की खामोशी के बाद उसने कहा “लेकिन अकेले आना… क्योंकि आरोही को साथ लाए, तो अगली बार तुम्हारी मां जिंदा नहीं बचेगी।”

     

    वीडियो बंद हो गया।

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव ने कुछ नहीं कहा।

     

    उसने सिर्फ फोन उसकी तरफ बढ़ा दिया।

     

    वीडियो देखकर आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    और तभी पीछे खड़ी माधवी चीख उठीं “नहीं! आरव वहां अकेला नहीं जाएगा… क्योंकि नीलगिरी हवेली में सिर्फ शेखर नहीं है…”

     

    सब उनकी तरफ देखने लगे।

     

    माधवी ने कांपती आवाज में कहा “वहां नंदिनी भी कैद है।”

     

    जारी रहेगा…

    Avatar photo

    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 19

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 19

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 19 : पच्चीस साल बाद मंदिर की घंटी

     

    राजवंशी हवेली में हर कोई कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत खड़ा था।

     

    बाहर से मंदिर की घंटी की आवाज अब भी आ रही थी।

     

    टन…

     

    फिर कुछ सेकंड की खामोशी।

     

    टन…

     

    आरोही ने खिड़की की तरफ देखा।

     

    “ये आवाज सच में उसी मंदिर से आ रही है?”

     

    देवेंद्र ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “लेकिन आपने कहा था कि मंदिर पच्चीस साल से बंद है।”

     

    देवेंद्र की आंखें मंदिर की दिशा में टिकी थीं।

     

    “सिर्फ बंद नहीं… वहां किसी को जाने की इजाजत भी नहीं थी।”

     

    राघव ने गंभीर आवाज में कहा,

     

    “क्योंकि उस मंदिर में आखिरी बार तुम्हारे असली पिता को देखा गया था।”

     

    आरोही का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “अगर वो वहां थे… तो क्या वो आज भी…?”

     

    राघव ने उसकी बात पूरी नहीं होने दी।

     

    “हमें वहां जाना होगा।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “अभी?”

     

    राघव ने घड़ी देखी।

     

    “सुबह होने में ज्यादा वक्त नहीं है।”

     

    आरोही ने तुरंत कहा,

     

    “हम जाएंगे।”

     

    राघव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें नहीं पता कि वहां क्या मिलेगा।”

     

    आरोही की आंखों में दृढ़ता थी।

     

    “मुझे अपने पिता के बारे में जानना है।”

     

    आरव उसके पास आकर खड़ा हो गया।

     

    “और मैं तुम्हारे साथ चलूंगा।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हमेशा?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “हमेशा।”

     

    कुछ देर बाद आरव, आरोही, राघव, माधवी, कबीर और अद्वैत मंदिर की तरफ निकल पड़े।

     

    देवेंद्र भी उनके साथ था।

     

    रास्ते भर कोई कुछ नहीं बोल रहा था।

     

    सिर्फ गाड़ी के इंजन की आवाज सुनाई दे रही थी।

     

    आरोही खिड़की से बाहर देख रही थी।

     

    उसके मन में एक ही सवाल घूम रहा था मेरे असली पिता कौन हैं?

     

    कुछ देर बाद गाड़ी एक सुनसान रास्ते पर रुकी।

     

    सामने घने पेड़ों के बीच पुराना शिव मंदिर दिखाई दे रहा था।

     

    मंदिर के चारों तरफ बेलें उगी हुई थीं।

     

    दरवाजे पर जंग लगी लोहे की जंजीर लटक रही थी।

     

    लेकिन सबसे अजीब बात…

     

    मंदिर की घंटी लगातार हिल रही थी।

     

    आरव ने कहा,

     

    “हवा भी नहीं चल रही।”

     

    कबीर ने चारों तरफ देखा।

     

    “तो घंटी कौन बजा रहा है?”

     

    तभी घंटी फिर बजी।

     

    टन…

     

    आरोही की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।

     

    वह आरव के करीब आ गई।

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “डरो मत।”

     

    “मैं डर नहीं रही।”

     

    “झूठ।”

     

    “थोड़ा।”

     

    आरव हल्का सा मुस्कुराया।

     

    “मैं हूं ना।”

     

    राघव मंदिर के दरवाजे के पास गए।

     

    उन्होंने जंजीर हटाने की कोशिश की।

     

    जंजीर अपने आप नीचे गिर गई।

     

    सब चौंक गए।

     

    अद्वैत ने कहा,

     

    “ये अपने आप कैसे खुली?”

     

    देवेंद्र ने गंभीर आवाज में कहा,

     

    “क्योंकि कोई अंदर से हमारा इंतजार कर रहा है।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    देवेंद्र ने जवाब नहीं दिया।

     

    वे सभी मंदिर के अंदर गए।

     

    अंदर धूल जमी थी।

     

    शिवलिंग के सामने एक दीपक जल रहा था।

     

    आरोही ने हैरानी से कहा,

     

    “यहां तो कोई है।”

     

    आरव ने दीपक को देखा।

     

    “ये अभी-अभी जलाया गया है।”

     

    तभी मंदिर की दीवार पर बनी एक पुरानी तस्वीर पर आरोही की नजर पड़ी।

     

    वह तस्वीर के पास गई।

     

    उसमें एक महिला एक छोटे बच्चे को गोद में लिए खड़ी थी।

     

    आरोही की सांस रुक गई।

     

    “ये… मां हैं।”

     

    राघव ने तस्वीर देखते ही आंखें बंद कर लीं।

     

    “हां।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “और ये बच्चा?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “तुम।”

     

    आरोही ने तस्वीर को छुआ।

     

    “लेकिन ये मंदिर में कैसे?”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “क्योंकि तुम्हारी मां ने तुम्हें यहीं आखिरी बार सुरक्षित रखा था।”

     

    कबीर ने मंदिर की दीवारों को ध्यान से देखना शुरू किया।

     

    “यहां कुछ अजीब है।”

     

    एक पत्थर बाकी पत्थरों से थोड़ा बाहर निकला हुआ था।

     

    कबीर ने उसे दबाया।

     

    घर्रर…

     

    फर्श का एक हिस्सा खुल गया।

     

    नीचे सीढ़ियां थीं।

     

    आरव ने कहा,

     

    “नीचे चलते हैं।”

     

    राघव ने उसे रोकना चाहा।

     

    “रुको।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं नहीं चाहता कि तुम वो देखो।”

     

    आरव ने पिता की आंखों में देखा।

     

    “अब और कुछ मत छुपाइए।”

     

    राघव चुप हो गए।

     

    आखिरकार बोले,

     

    “ठीक है।”

     

    सब नीचे उतरने लगे।

     

    नीचे एक छोटा कमरा था।

     

    दीवारों पर पुराने दस्तावेज और तस्वीरें लगी थीं।

     

    बीच में एक लकड़ी की मेज थी।

     

    उस पर एक लाल कपड़ा रखा था।

     

    आरोही ने कपड़ा हटाया।

     

    नीचे एक पुराना डिब्बा था।

     

    डिब्बे पर लिखा था “आरोही के लिए।”

     

    उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    उसने डिब्बा खोला।

     

    अंदर एक चिट्ठी थी।

     

    आरोही ने कांपते हाथों से उसे खोला।

     

    चिट्ठी में लिखा था “मेरी बेटी आरोही, अगर तुम ये चिट्ठी पढ़ रही हो, तो शायद मैं तुम्हारे सामने नहीं हूं।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    वह पढ़ती गई।

     

    “मैं तुम्हें अपनी बेटी कहने का अधिकार रखता हूं या नहीं, ये फैसला तुम करना। लेकिन इतना जान लो कि मैंने तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ा।”

     

    आरोही के हाथ कांपने लगे।

     

    अगली लाइन थी “तुम्हारी मां नंदिनी ने तुम्हें बचाने के लिए बहुत कुछ खोया है। अगर कभी तुम्हें लगे कि उसने तुम्हें छोड़ दिया, तो उस पर भरोसा करना। उसने तुम्हें कभी नहीं छोड़ा।”

     

    आरोही ने चिट्ठी सीने से लगा ली।

     

    “मां…”

     

    आरव उसके पास बैठ गया।

     

    चिट्ठी का आखिरी हिस्सा पढ़ते हुए आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    “लेकिन सबसे बड़ा सच अभी बाकी है।”

     

    “तुम्हारा जन्म जिस रात हुआ, उसी रात एक दूसरा बच्चा भी पैदा हुआ था।”

     

    आरव ने धीमे से कहा,

     

    “फिर वही बात…”

     

    आरोही आगे पढ़ने लगी।

     

    “वो बच्चा आरव था।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    फिर अगली लाइन “आरव तुम्हारा भाई नहीं है।”

     

    आरोही ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन अगली लाइन पढ़ते ही उसका चेहरा बदल गया।

     

    “क्योंकि आरव… तुम्हारा बचपन का साथी ही नहीं, बल्कि तुम्हारी मां नंदिनी की आखिरी इच्छा से जुड़ा हुआ है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या मतलब?”

     

    आरोही ने चिट्ठी आगे बढ़ा दी।

     

    चिट्ठी में लिखा था “नंदिनी चाहती थी कि तुम दोनों बड़े होकर एक-दूसरे का साथ दो। उसने कहा था कि अगर दोनों बच्चे एक साथ रहे तो शायद वो राज खुल जाएगा जिसे हमने दुनिया से छुपाया है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन-सा राज?”

     

    चिट्ठी के आखिरी शब्द थे “तुम दोनों की जिंदगी एक-दूसरे से जुड़ी है, क्योंकि तुम दोनों के पास उस रात का आधा-आधा सच है।”

     

    आरोही ने सिर उठाया।

     

    “आधा-आधा सच?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “हां।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “लेकिन दूसरा आधा सच कहां है?”

     

    तभी पीछे से किसी ने कहा “मेरे पास।”

     

    सब पलटकर देखने लगे।

     

    मंदिर के अंधेरे कोने से एक आदमी बाहर आया।

     

    उसने सफेद कपड़े पहने थे।

     

    चेहरा आधा ढका हुआ था।

     

    आरव ने तुरंत आरोही को अपने पीछे कर लिया।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    वह आदमी धीरे-धीरे आगे आया।

     

    “जिसका इंतजार तुम इतने सालों से कर रहे थे।”

     

    आरोही की सांसें रुक गईं।

     

    “पापा?”

     

    आदमी ने चेहरा ऊपर किया।

     

    राघव पीछे हट गए।

     

    माधवी की आंखों में आंसू आ गए।

     

    देवेंद्र ने फुसफुसाकर कहा “अर्जुन…”

     

    आरोही उस आदमी को देखती रह गई।

     

    उसका चेहरा बिल्कुल वैसा ही था जैसा पुरानी तस्वीरों में था।

     

    “आप… मेरे पिता हैं?”

     

    अर्जुन की आंखें भर आईं।

     

    “हां, बेटी।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    वह धीरे-धीरे उनके पास गई।

     

    “आपने मुझे इतने साल अकेला क्यों छोड़ा?”

     

    अर्जुन ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।

     

    “मैंने तुम्हें कभी छोड़ा नहीं।”

     

    “फिर कहां थे?”

     

    “तुम्हें बचा रहा था।”

     

    “किससे?”

     

    अर्जुन की नजर देवेंद्र पर गई।

     

    फिर राघव पर।

     

    फिर कबीर पर।

     

    “उन लोगों से… जिन पर तुमने भरोसा किया।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “और मैं?”

     

    अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें भी बचाया गया था।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मेरे असली माता-पिता कौन हैं?”

     

    अर्जुन कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “तुम्हारी मां माधवी है।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “और पिता?”

     

    अर्जुन ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “तुम्हारे पिता…”

     

    अर्जुन अचानक रुक गए।

     

    “क्या हुआ?” आरव ने पूछा।

     

    अर्जुन ने धीरे से कहा “ये सच मैं यहां नहीं बता सकता।”

     

    आरव गुस्से में बोला,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि जिसने तुम्हारे परिवार को खत्म किया, वो अभी भी जिंदा है।”

     

    तभी मंदिर के बाहर किसी गाड़ी के रुकने की आवाज आई।

     

    अर्जुन ने तुरंत कहा,

     

    “सब लोग पीछे हटो।”

     

    राघव ने पूछा,

     

    “कौन आया है?”

     

    अर्जुन ने कहा “वही… जिसका हम पच्चीस साल से इंतजार कर रहे थे।”

     

    अचानक बाहर से गोलियों की आवाज आने लगी।

     

    धांय! धांय!

     

    मंदिर की खिड़की का शीशा टूट गया।

     

    आरव ने आरोही को नीचे झुका दिया।

     

    “नीचे!”

     

    अद्वैत ने दरवाजे की तरफ देखा।

     

    “बहुत लोग हैं।”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “हमें पीछे वाले रास्ते से निकलना होगा।”

     

    अर्जुन ने तुरंत कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “अगर हम भागे तो वो मंदिर के नीचे वाला कमरा ढूंढ लेंगे।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “वहां ऐसा क्या है?”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “तुम दोनों के जन्म का असली रिकॉर्ड।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “तो उसे लेकर चलते हैं।”

     

    अर्जुन ने सिर हिलाया।

     

    “वो रिकॉर्ड सिर्फ मैं खोल सकता हूं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उसकी चाबी मेरे पास नहीं…”

     

    उन्होंने आरोही के लॉकेट की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पास है।”

     

    आरोही ने अपना लॉकेट पकड़ लिया।

     

    “इसमें?”

     

    अर्जुन मुस्कुराए।

     

    “हां।”

     

    आरोही ने लॉकेट खोला।

     

    अंदर की तस्वीर के पीछे एक छोटा-सा बटन था।

     

    उसने बटन दबाया।

     

    लॉकेट के अंदर से एक बेहद छोटी चाबी बाहर निकल आई।

     

    आरव ने हैरानी से कहा,

     

    “इतनी छोटी चाबी?”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “यही वो चाबी है जो पच्चीस साल से छुपी हुई थी।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “किसकी चाबी?”

     

    अर्जुन ने मंदिर की दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    “उस कमरे की।”

     

    दीवार के पीछे एक छोटा ताला था।

     

    आरोही ने चाबी लगाई।

     

    ताला खुल गया।

     

    दीवार के अंदर एक लोहे का बॉक्स था।

     

    अर्जुन ने बॉक्स खोला।

     

    अंदर एक पुरानी फाइल थी।

     

    उसके ऊपर लिखा था “जन्म रिकॉर्ड – गोपनीय।”

     

    आरव और आरोही दोनों आगे बढ़े।

     

    आरव ने पहला पन्ना खोला।

     

    उस पर दो नाम थे बच्ची – आरोही

    बच्चा – आरव

     

    लेकिन पिता के नाम वाली जगह देखकर दोनों स्तब्ध रह गए।

     

    आरोही के सामने लिखा था अर्जुन राजवंशी

     

    और आरव के सामने लिखा था अज्ञात।

     

    आरव ने धीरे से पूछा,

     

    “मेरे पिता का नाम अज्ञात क्यों है?”

     

    अर्जुन की आंखों में दर्द था।

     

    “क्योंकि तुम्हारे जन्म का सच… तुम्हारी मां से भी छुपाया गया था।”

     

    आरव ने उनकी तरफ देखा।

     

    “तो फिर मेरे पिता कौन हैं?”

     

    अर्जुन ने होंठ खोले ही थे कि बाहर से किसी ने जोर से आवाज लगाई “अर्जुन! बाहर आ जाओ!”

     

    अर्जुन का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    वह आवाज सुनते ही राघव ने सिर झुका लिया।

     

    माधवी की आंखों में डर भर गया।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कौन है?”

     

    अर्जुन ने धीरे से कहा “तुम्हारा असली दुश्मन।”

     

    बाहर से वही आवाज फिर आई “और अगर आज तुम बाहर नहीं आए… तो इस बार तुम्हारी बेटी नहीं बचेगी।”

     

    आरव तुरंत आरोही के सामने खड़ा हो गया।

     

    अर्जुन ने आरव की तरफ देखा।

     

    उनकी आंखों में पहली बार पिता वाला गर्व दिखाई दिया।

     

    “अब समझ आया… तुम दोनों को अलग क्यों नहीं किया जा सकता।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    अर्जुन ने कहा “क्योंकि तुम दोनों सिर्फ एक-दूसरे की किस्मत नहीं हो… तुम दोनों मिलकर उस आदमी का साम्राज्य खत्म कर सकते हो।”

     

    बाहर से एक जोरदार धमाका हुआ।

     

    मंदिर का दरवाजा टूट गया।

     

    और धुएं के बीच एक आदमी अंदर आया।

     

    उसके चेहरे को देखते ही आरव के मुंह से निकला “चाचा…?”

     

    लेकिन इस बार चाचा अकेले नहीं थे।

     

    उनके पीछे…

     

    विराज सूद खड़ा था।

     

    जिसे सब पच्चीस साल पहले मर चुका समझते थे।

     

    विराज ने मुस्कुराकर कहा “बहुत ढूंढ लिया मुझे… अब मेरी बारी है तुम्हें ढूंढने की।”

     

    जारी रहेगा…

    Avatar photo

    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 18

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 18

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    तेरी मेरी दास्तान

     

    एपिसोड – 18  मां सामने थी, फिर इतने सालों तक कहां थी?

     

    राजवंशी हवेली के उस कमरे में जैसे वक्त थम गया था।

     

    दरवाजे पर खड़ी उस औरत को देखकर आरव की सांसें रुक गई थीं।

     

    राघव की आंखें नम थीं।

     

    उनके मुंह से सिर्फ एक ही शब्द निकला “माधवी…”

     

    आरव ने कांपती आवाज में कहा,

     

    “मां…?”

     

    उस औरत की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “हां बेटा… मैं तुम्हारी मां हूं।”

     

    आरव एक पल के लिए अपनी जगह से हिल ही नहीं पाया।

     

    जिस मां को वह पच्चीस साल पहले मर चुकी समझकर बड़ा हुआ था…

     

    वही मां आज उसके सामने जिंदा खड़ी थी।

     

    आरव धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ा।

     

    “आप… जिंदा थीं?”

     

    माधवी ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    “तो आपने मुझे ढूंढा क्यों नहीं?”

     

    माधवी के होंठ कांपने लगे।

     

    “मैंने बहुत कोशिश की थी।”

     

    “फिर?”

     

    “मुझे तुम्हारे पास आने नहीं दिया गया।”

     

    आरव की आंखों में दर्द उतर आया।

     

    “किसने?”

     

    माधवी ने पीछे खड़े देवेंद्र की तरफ देखा।

     

    देवेंद्र चुप था।

     

    फिर माधवी ने कबीर की तरफ देखा।

     

    कबीर भी नजरें झुका चुका था।

     

    आरव की आवाज तेज हो गई।

     

    “मां, मुझे सच चाहिए।”

     

    माधवी ने धीरे से कहा,

     

    “जिस रात तुम्हें मुझसे दूर किया गया था… उस रात मुझे बताया गया कि अगर मैंने तुम्हें ढूंढने की कोशिश की तो तुम्हारी जान ले ली जाएगी।”

     

    आरव की आंखों से आंसू गिरने लगे।

     

    “आपने मुझ पर भरोसा क्यों नहीं किया?”

     

    माधवी रोते हुए बोलीं,

     

    “मां अपने बच्चे पर भरोसा नहीं करती बेटा… मां अपने बच्चे की जिंदगी बचाती है।”

     

    आरव अब खुद को रोक नहीं पाया।

     

    वह दौड़कर अपनी मां के गले लग गया।

     

    माधवी ने उसे कसकर पकड़ लिया।

     

    “मेरा बच्चा…”

     

    दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    आरोही कुछ दूरी पर खड़ी यह सब देख रही थी।

     

    उसकी आंखें भी नम थीं।

     

    आरव ने इतने सालों बाद अपनी मां को पाया था।

     

    लेकिन आरोही के मन में एक सवाल था अगर आरव की मां जिंदा थीं, तो नंदिनी कहां गई थीं?

     

    कुछ देर बाद आरव ने अपनी मां का हाथ पकड़कर पूछा,

     

    “मां, मुझे बताया गया था कि आपकी मौत हो गई थी।”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “वो झूठ था।”

     

    “किसने फैलाया?”

     

    “तुम्हारे पिता ने।”

     

    आरव ने हैरानी से पूछा,

     

    “पापा?”

     

    राघव आगे आए।

     

    “मुझे मजबूर होना पड़ा था।”

     

    आरव ने गुस्से में कहा,

     

    “आप दोनों ने मिलकर मुझे इतने साल झूठ में रखा?”

     

    राघव की आंखें झुक गईं।

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “क्योंकि उस वक्त तुम्हारी जान से ज्यादा जरूरी कुछ नहीं था।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “लेकिन मैं हर साल अपनी मां की मौत पर रोता रहा।”

     

    माधवी ने उसके चेहरे को छुआ।

     

    “मुझे पता है।”

     

    “कैसे?”

     

    “क्योंकि मैं दूर से तुम्हें देखती थी।”

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “आपने मुझे देखा था?”

     

    माधवी ने सिर हिलाया।

     

    “जब तुम स्कूल जाते थे… जब तुम्हारा जन्मदिन होता था… जब तुम पहली बार कॉलेज गए… मैं तुम्हें दूर से देखती थी।”

     

    “फिर मेरे पास क्यों नहीं आईं?”

     

    “क्योंकि तुम्हारे आसपास हर वक्त निगरानी रहती थी।”

     

    आरव की मुट्ठियां भींच गईं।

     

    “किसकी?”

     

    माधवी ने देवेंद्र की तरफ देखा।

     

    देवेंद्र ने नजरें फेर लीं।

     

    आरव ने देवेंद्र की तरफ कदम बढ़ाया।

     

    “तुम्हारा इसमें क्या हाथ था?”

     

    देवेंद्र ने शांत स्वर में कहा,

     

    “मैं तुम्हें बचा रहा था।”

     

    आरव हंस पड़ा।

     

    “मेरी मां को मुझसे दूर रखकर?”

     

    “हां।”

     

    “इसे बचाना कहते हो?”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “तुम उस समय बच्चे थे। तुम्हें नहीं पता था कि तुम्हारे पीछे कितने लोग पड़े थे।”

     

    आरोही ने बीच में कहा,

     

    “और मेरे पीछे?”

     

    देवेंद्र उसकी तरफ मुड़ा।

     

    “तुम्हारे पीछे भी।”

     

    “क्यों?”

     

    देवेंद्र कुछ पल चुप रहा।

     

    “क्योंकि तुम्हारे जन्म की रात अस्पताल में जो हुआ था, उसका राज सिर्फ तुम्हारे माता-पिता नहीं जानते थे।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “तो कौन जानता था?”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “कबीर के पिता।”

     

    कबीर अचानक बोल पड़ा,

     

    “मेरे पिता उस रात वहां थे।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुमने ये बात पहले क्यों नहीं बताई?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “क्योंकि मुझे डर था कि अगर मैंने सच बताया तो तुम दोनों मुझे छोड़ दोगे।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “तुम्हें हमें सच बताना चाहिए था।”

     

    कबीर ने सिर झुका लिया।

     

    “मुझे पता है।”

     

    अद्वैत ने गुस्से में कहा,

     

    “तो तुम जानते थे कि देवेंद्र कौन है?”

     

    “हां।”

     

    “और राघव कौन हैं?”

     

    “हां।”

     

    “और माधवी जिंदा हैं?”

     

    कबीर ने कुछ पल चुप रहकर कहा,

     

    “हां।”

     

    अद्वैत ने उसे धक्का दे दिया।

     

    “तुमने हम सबके साथ झूठ किया!”

     

    कबीर ने विरोध नहीं किया।

     

    “मुझे जो आदेश मिला था, मैंने वही किया।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किसका आदेश?”

     

    कबीर ने धीरे से कहा,

     

    “तुम्हारे पिता का।”

     

    राघव चौंक गए।

     

    “मेरा?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “मैंने तुम्हें कभी नहीं कहा था कि आरव और आरोही से सब छुपाओ।”

     

    “आपने नहीं कहा था।”

     

    “फिर?”

     

    कबीर ने देवेंद्र की तरफ देखा।

     

    “उन्होंने कहा था।”

     

    आरोही ने तुरंत देवेंद्र की तरफ देखा।

     

    “आपने कबीर को हमारे पास क्यों भेजा?”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “ताकि तुम दोनों सुरक्षित रहो।”

     

    “लेकिन हमसे इतनी बातें छुपाईं क्यों?”

     

    देवेंद्र ने गंभीर स्वर में कहा,

     

    “क्योंकि तुम दोनों जितना सच जानते, उतना ही खतरा बढ़ता।”

     

    आरोही ने अचानक पूछा,

     

    “मेरी मां नंदिनी का क्या हुआ?”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    राघव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    माधवी ने धीरे से कहा,

     

    “नंदिनी आखिरी वक्त तक तुम्हें बचाने की कोशिश करती रही।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “फिर उनकी मौत कैसे हुई?”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “वो मरी नहीं थीं।”

     

    आरोही स्तब्ध रह गई।

     

    “क्या?”

     

    “नंदिनी को भी उसी तरह गायब किया गया था जैसे मुझे।”

     

    “तो वो जिंदा हैं?”

     

    माधवी ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    आरोही की सांसें तेज हो गईं।

     

    “आपको नहीं पता?”

     

    “नहीं।”

     

    “लेकिन आपने कहा कि वो मरी नहीं थीं।”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “क्योंकि मैंने अपनी आंखों से उन्हें आखिरी बार देखा था।”

     

    “कहां?”

     

    “एक पुराने आश्रम में।”

     

    “कब?”

     

    “दस साल पहले।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “वहां क्या हुआ?”

     

    माधवी की आंखों में डर उतर आया।

     

    “वहां नंदिनी किसी से मिल रही थीं।”

     

    “किससे?”

     

    माधवी ने धीरे से कहा “तुम्हारे असली पिता से।”

     

    आरोही का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    “अर्जुन?”

     

    माधवी ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “लेकिन अर्जुन तो मर चुके थे।”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “यही तो सवाल है।”

     

    कबीर ने तुरंत पूछा,

     

    “आप कहना क्या चाह रही हैं?”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “दस साल पहले मुझे नंदिनी और अर्जुन दोनों दिखाई दिए थे।”

     

    आरोही के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “मतलब मेरे पिता भी जिंदा थे?”

     

    “उस वक्त तक।”

     

    “फिर?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    राघव ने कहा,

     

    “माधवी, तुमने मुझे ये कभी क्यों नहीं बताया?”

     

    “क्योंकि उसके बाद मैं खुद कैद हो गई थी।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कहां?”

     

    माधवी ने देवेंद्र की तरफ देखा।

     

    देवेंद्र ने नजरें झुका लीं।

     

    “देवेंद्र के पास।”

     

    आरव का गुस्सा बढ़ गया।

     

    “तुमने मेरी मां को कैद करके रखा था?”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “मैंने उन्हें कैद नहीं किया था।”

     

    माधवी बोलीं,

     

    “तुमने मुझे जाने नहीं दिया था।”

     

    देवेंद्र चुप हो गया।

     

    आरव ने कहा,

     

    “अब तुम सब सच बताओ।”

     

    राघव ने अचानक कहा,

     

    “हमें यहां ज्यादा देर नहीं रुकना चाहिए।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर देवेंद्र यहां तक पहुंच सकता है, तो बाकी लोग भी पहुंच सकते हैं।”

     

    अद्वैत ने कहा,

     

    “लेकिन फाइल?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “फाइल अभी पूरी तरह नहीं मिली है।”

     

    आरव ने घड़ी की तरफ देखा।

     

    “इसमें तो डेटा है।”

     

    राघव ने सिर हिलाया।

     

    “ये सिर्फ पहला हिस्सा है।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “दूसरा हिस्सा कहां है?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “नंदिनी के पास।”

     

    आरोही का दिल धड़क उठा।

     

    “अगर नंदिनी जिंदा हैं… तो उनके पास होगा?”

     

    “हां।”

     

    “तो हमें उन्हें ढूंढना होगा।”

     

    राघव ने कहा,

     

    “लेकिन उन्हें ढूंढना आसान नहीं है।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि नंदिनी खुद नहीं चाहतीं कि कोई उन्हें ढूंढे।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “क्यों?”

     

    राघव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि वो तुम्हें बचाने के लिए खुद को दुनिया से छुपाए हुए हैं।”

     

    सब लोग नीचे जाने की तैयारी कर रहे थे।

     

    आरोही अकेली बालकनी में चली गई।

     

    आरव उसके पीछे आया।

     

    “क्या सोच रही हो?”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “मेरी मां जिंदा हो सकती हैं।”

     

    “हां।”

     

    “मेरे पिता भी शायद जिंदा थे।”

     

    “हां।”

     

    “और तुम…”

     

    वह रुक गई।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “मैं?”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “मुझे डर लग रहा है।”

     

    आरव उसके करीब आया।

     

    “किस बात से?”

     

    “कहीं ये सब खत्म होते-होते मैं तुम्हें खो न दूं।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम मुझे नहीं खोओगी।”

     

    “वादा?”

     

    “वादा।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “अगर हमारे परिवारों का कोई रिश्ता ऐसा निकला जिसकी वजह से हम…”

     

    आरव ने उसकी बात पूरी होने से पहले कहा,

     

    “तो भी मैं तुम्हारा हाथ नहीं छोड़ूंगा।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “लेकिन अगर किस्मत ने हमें अलग कर दिया तो?”

     

    आरव ने धीरे से उसका माथा छूते हुए कहा,

     

    “किस्मत ने बहुत कोशिश कर ली।”

     

    “अब?”

     

    “अब हमारी बारी है।”

     

    आरोही हल्का सा मुस्कुरा दी।

     

    “तुम हमेशा इतनी बड़ी-बड़ी बातें क्यों करते हो?”

     

    आरव हंस पड़ा।

     

    “क्योंकि तुम छोटी-छोटी बातों पर रोने लगती हो।”

     

    आरोही ने उसे हल्का सा धक्का दिया।

     

    “मैं रोती नहीं हूं।”

     

    “अभी भी आंखों में आंसू हैं।”

     

    “ये खुशी के हैं।”

     

    “अच्छा?”

     

    “हां।”

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “तो इन्हें संभालकर रखना।”

     

    तभी कबीर तेजी से उनके पास आया।

     

    “आरव!”

     

    दोनों ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    कबीर ने फोन आगे किया।

     

    “अभी एक वीडियो आया है।”

     

    आरव ने वीडियो चलाया।

     

    स्क्रीन पर एक अंधेरा कमरा था।

     

    फिर धीरे-धीरे एक महिला कैमरे के सामने आई।

     

    आरोही की सांस रुक गई।

     

    वही चेहरा…

     

    वही आंखें…

     

    वही मां।

     

    नंदिनी।

     

    वीडियो में नंदिनी रो रही थीं।

     

    “आरोही… अगर तुम ये वीडियो देख रही हो तो समझ लेना कि मैं जिंदा हूं।”

     

    आरोही के हाथ कांपने लगे।

     

    “मां…”

     

    वीडियो में नंदिनी आगे बोलीं “मैं तुमसे दूर इसलिए रही क्योंकि मेरे पास कोई रास्ता नहीं था।”

     

    फिर उन्होंने कैमरे के करीब आकर कहा,

     

    “लेकिन अब समय आ गया है कि तुम अपने जन्म का आखिरी सच जानो।”

     

    आरोही की सांसें तेज हो गईं।

     

    नंदिनी बोलीं “तुम्हारे पिता अर्जुन राजवंशी नहीं थे।”

     

    आरोही के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “क्या?”

     

    आरव भी स्तब्ध रह गया।

     

    वीडियो में नंदिनी ने कहा “अर्जुन ने तुम्हें अपनी बेटी की तरह पाला था… लेकिन तुम्हारे असली पिता कोई और हैं।”

     

    वीडियो अचानक बंद हो गया।

     

    आरोही की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “मेरे असली पिता… कौन हैं?”

     

    तभी फोन पर दूसरा संदेश आया।

     

    सिर्फ एक लाइन “कल सूर्योदय से पहले पुराने शिव मंदिर पहुंचो। वहां तुम्हें अपने पिता मिलेंगे।”

     

    आरव ने संदेश पढ़ा।

     

    उसने आरोही की तरफ देखा।

     

    “हम जाएंगे।”

     

    राघव ने तुरंत कहा,

     

    “नहीं!”

     

    सब उसकी तरफ देखने लगे।

     

    राघव के चेहरे पर भय था।

     

    “उस मंदिर में मत जाना।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    राघव ने कांपती आवाज में कहा “क्योंकि वही जगह है जहां पच्चीस साल पहले तुम्हारे असली पिता को आखिरी बार देखा गया था।”

     

    और तभी…

     

    बाहर से मंदिर की घंटी की आवाज सुनाई दी।

     

    एक बार…

     

    फिर दूसरी बार…

     

    फिर तीसरी बार।

     

    देवेंद्र ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “ये कैसे हो सकता है…?”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    देवेंद्र ने कांपते हुए कहा “क्योंकि उस मंदिर की घंटी पच्चीस साल से बंद है।”

     

    जारी रहेगा…

    Avatar photo

    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 17

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 17

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    तेरी मेरी दास्तान

     

    एपिसोड – 17 : जिससे पापा पच्चीस साल से भाग रहे थे

     

    हवेली की सारी लाइटें जल चुकी थीं।

     

    आरव की नजर सामने खड़े उस आदमी पर जमी हुई थी।

     

    वही आदमी…

     

    जिसे देखकर उसके पिता राघव के चेहरे पर डर और गुस्सा दोनों दिखाई दे रहे थे।

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “आरव… ये कौन है?”

     

    आरव ने राघव की तरफ देखा।

     

    “पापा, आप इसे जानते हैं?”

     

    राघव कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर उनकी आवाज गूंज उठी “हां बेटा… बहुत अच्छी तरह जानता हूं।”

     

    सामने खड़ा आदमी मुस्कुराया।

     

    “इतने साल बाद भी तुमने मुझे नहीं भुलाया, राघव?”

     

    राघव की आंखों में नफरत उतर आई।

     

    “तुम्हें भूलना इतना आसान नहीं है, देवेंद्र।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “देवेंद्र?”

     

    आरोही ने भी उस आदमी को गौर से देखा।

     

    देवेंद्र ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “आखिर मुझे अपना नाम बताने का मौका मिल ही गया।”

     

    कबीर ने धीरे से अद्वैत से कहा,

     

    “क्या तुम इसे जानते हो?”

     

    अद्वैत ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। लेकिन पापा की डायरी में देवेंद्र नाम कई बार आया था।”

     

    देवेंद्र ने उनकी बात सुन ली।

     

    “समीर की डायरी?”

     

    अद्वैत चौंक गया।

     

    “तुम मेरे पिता को जानते थे?”

     

    देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पिता मेरे बहुत पुराने साथी थे।”

     

    अद्वैत की आंखों में गुस्सा भर गया।

     

    “साथी या दुश्मन?”

     

    देवेंद्र हल्का सा हंसा।

     

    “ये तो तुम्हारे पिता से पूछना चाहिए था।”

     

    राघव सीढ़ियों से नीचे उतर आए।

     

    “देवेंद्र, इतने सालों बाद भी तुम्हें समझ नहीं आया कि मैं तुम्हारे सामने झुकने वाला नहीं हूं।”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “तुम्हें झुकाना मेरा मकसद कभी था ही नहीं।”

     

    “तो फिर?”

     

    “मुझे वो चाहिए जो तुमने छुपाकर रखा है।”

     

    राघव की आंखें सिकुड़ गईं।

     

    “वो चीज तुम्हें कभी नहीं मिलेगी।”

     

    देवेंद्र ने आरोही की तरफ देखा।

     

    “शायद तुम भूल रहे हो कि वो चीज अब तुम्हारे पास नहीं है।”

     

    राघव ने तुरंत आरोही की तरफ देखा।

     

    आरोही घबरा गई।

     

    “मेरे पास?”

     

    देवेंद्र मुस्कुराया।

     

    “हां, आरोही।”

     

    आरव उसके सामने आ गया।

     

    “उससे दूर रहो।”

     

    देवेंद्र हंस पड़ा।

     

    “यही तो समस्या है, आरव। तुम हमेशा इसके सामने दीवार बनकर खड़े हो जाते हो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “क्योंकि इसे बचाना मेरा काम है।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    उसकी आंखों में डर के साथ-साथ एक अजीब-सी गर्माहट भी थी।

     

    देवेंद्र ने दोनों को देखते हुए कहा,

     

    “तुम दोनों को बचपन से ही एक-दूसरे के करीब रखा गया।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    देवेंद्र ने जवाब दिया,

     

    “क्योंकि राघव और नंदिनी जानते थे कि तुम दोनों के मिलने से एक दिन वो राज खुल जाएगा।”

     

    आरोही ने राघव की तरफ देखा।

     

    “क्या ये सच है?”

     

    राघव ने नजरें झुका लीं।

     

    “हां।”

     

    “तो आपने मुझे बचपन से सब क्यों नहीं बताया?”

     

    “क्योंकि तुम बहुत छोटी थीं।”

     

    “मैं बड़ी हो गई हूं।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “फिर भी मुझसे सच क्यों छुपाया?”

     

    राघव ने दर्द भरी आवाज में कहा,

     

    “क्योंकि मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता था।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “लेकिन झूठ बोलकर आपने मुझे हर दिन खोया है।”

     

    राघव के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    आरव ने आरोही के कंधे पर हाथ रखा।

     

    “अभी हमें असली सवाल का जवाब चाहिए।”

     

    वह देवेंद्र की तरफ मुड़ा।

     

    “तुम हमारे पीछे क्यों पड़े हो?”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता ने मेरे साथ धोखा किया था।”

     

    राघव ने गुस्से में कहा,

     

    “धोखा मैंने नहीं दिया था।”

     

    “तो किसने दिया?”

     

    “तुमने खुद अपने परिवार को बेचा था।”

     

    देवेंद्र का चेहरा पहली बार गंभीर हो गया।

     

    “मैंने जो किया, अपने परिवार को बचाने के लिए किया।”

     

    राघव ने कहा,

     

    “झूठ।”

     

    देवेंद्र ने अचानक बंदूक निकाल ली।

     

    आरोही डरकर पीछे हट गई।

     

    आरव तुरंत उसके सामने आ गया।

     

    “बंदूक नीचे रखो।”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “अगर मुझे मारना होता तो अब तक मार चुका होता।”

     

    फिर उसने बंदूक राघव की तरफ कर दी।

     

    “मुझे सिर्फ फाइल चाहिए।”

     

    राघव ने कहा,

     

    “मेरे पास नहीं है।”

     

    देवेंद्र ने हंसते हुए कहा,

     

    “तुम्हारे पास नहीं है… लेकिन तुम्हारे बेटे के पास है।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “मेरे पास?”

     

    देवेंद्र ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव को अचानक अपनी कलाई पर बंधी पुरानी घड़ी याद आई।

     

    वह घड़ी उसे बचपन में उसके पिता ने दी थी।

     

    राघव की नजर घड़ी पर पड़ी।

     

    उनका चेहरा बदल गया।

     

    “आरव…”

     

    “क्या हुआ पापा?”

     

    राघव ने धीरे से कहा,

     

    “वो घड़ी मुझे दो।”

     

    आरव ने घड़ी उतारकर उन्हें दे दी।

     

    राघव ने पीछे का छोटा ढक्कन खोला।

     

    अंदर एक बेहद छोटा-सा चिप जैसा टुकड़ा था।

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    “इसमें क्या है?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “वही फाइल।”

     

    देवेंद्र मुस्कुराया।

     

    “आखिर मिल ही गई।”

     

    वह आगे बढ़ा।

     

    लेकिन तभी अद्वैत ने उस पर हमला कर दिया।

     

    बंदूक जमीन पर गिर गई।

     

    कमरे में अफरा-तफरी मच गई।

     

    देवेंद्र और अद्वैत के बीच हाथापाई शुरू हो गई।

     

    आरव ने तुरंत आरोही को पीछे किया।

     

    “तुम यहां से बाहर जाओ।”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “आरोही!”

     

    “मैं तुम्हें अकेला छोड़कर नहीं जाऊंगी।”

     

    आरव उसकी तरफ देखकर कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

     

    “तुम कभी मेरी बात मानती भी नहीं हो।”

     

    “कभी-कभी।”

     

    “आज नहीं?”

     

    “बिल्कुल नहीं।”

     

    अद्वैत देवेंद्र को रोकने की कोशिश कर रहा था।

     

    लेकिन देवेंद्र काफी ताकतवर था।

     

    उसने अद्वैत को धक्का दिया।

     

    अद्वैत जमीन पर गिर पड़ा।

     

    देवेंद्र ने बंदूक उठाई।

     

    “अब बहुत हो गया।”

     

    तभी राघव ने पीछे से उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    दोनों में संघर्ष शुरू हो गया।

     

    गोली चलने की आवाज आई।

     

    धांय!

     

    गोली दीवार में लगी।

     

    आरोही चीख पड़ी।

     

    आरव ने उसे अपनी तरफ खींच लिया।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    “हां।”

     

    लेकिन उसी वक्त देवेंद्र ने राघव को जोर से धक्का दिया।

     

    राघव नीचे गिर गए।

     

    देवेंद्र ने घड़ी उठाने की कोशिश की।

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “इसे हाथ मत लगाना।”

     

    देवेंद्र ने आरव की आंखों में देखा।

     

    “तुम्हें पता भी है इसमें क्या है?”

     

    “नहीं।”

     

    “तो फिर इसे बचाने की इतनी कोशिश क्यों?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “क्योंकि मेरे पिता ने इसे मुझे सौंपा है।”

     

    देवेंद्र हंसा।

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें बहुत कुछ नहीं बताया, आरव।”

     

    “क्या?”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “तुम्हें ये भी नहीं बताया कि तुम्हारी मां की मौत हादसा नहीं थी।”

     

    आरव जैसे जम गया।

     

    “क्या कहा?”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “तुम्हारी मां को मारा गया था।”

     

    आरव की आंखें लाल हो गईं।

     

    “किसने?”

     

    देवेंद्र ने जवाब देने के बजाय राघव की तरफ देखा।

     

    “पूछो अपने पिता से।”

     

     

    —

     

    राघव की मजबूरी

     

    आरव राघव के पास गया।

     

    “पापा… सच क्या है?”

     

    राघव की आंखों में आंसू थे।

     

    “माधवी को मैंने नहीं मारा।”

     

    “लेकिन किसने?”

     

    राघव ने धीरे से कहा,

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    देवेंद्र हंसा।

     

    “तुम्हें पता है।”

     

    राघव चुप रहे।

     

    आरव ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “पापा, मेरी तरफ देखिए।”

     

    राघव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मां को किसने मारा?”

     

    राघव ने कांपती आवाज में कहा “जिस आदमी पर मैंने सबसे ज्यादा भरोसा किया था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    राघव ने नजरें उठाईं।

     

    “समीर।”

     

    अद्वैत जैसे पत्थर का हो गया।

     

    “मेरे पिता?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “समीर ने माधवी को नहीं मारा था।”

     

    अद्वैत ने राहत की सांस ली।

     

    “तो?”

     

    राघव बोले,

     

    “लेकिन उसे पता था कि कौन मारने वाला है।”

     

    अद्वैत की आंखों में गुस्सा आ गया।

     

    “फिर उसने बताया क्यों नहीं?”

     

    “क्योंकि उसे डर था।”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “डर नहीं था, राघव। लालच था।”

     

    अद्वैत ने देवेंद्र की तरफ देखा।

     

    “तुम झूठ बोल रहे हो।”

     

    देवेंद्र मुस्कुराया।

     

    “तो फिर अपने पिता की डायरी पढ़ लेना।”

     

    कबीर ने आरव की घड़ी अपने लैपटॉप से कनेक्ट की।

     

    “इसमें डेटा है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “कुछ वीडियो फाइलें।”

     

    पहली फाइल खुली।

     

    स्क्रीन पर पच्चीस साल पुराना वीडियो चलने लगा।

     

    एक कमरे में अर्जुन, राघव, नंदिनी और समीर बैठे थे।

     

    आरोही ने स्क्रीन देखते ही कहा,

     

    “ये मां हैं।”

     

    वीडियो में नंदिनी रो रही थीं।

     

    “अगर हमें कुछ हो गया तो बच्चों को बचाना।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “हम दोनों बच्चों को अलग-अलग परिवारों में रखेंगे।”

     

    राघव ने पूछा,

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “क्योंकि दुश्मन सिर्फ मुझे नहीं ढूंढ रहा। वो दोनों बच्चों को ढूंढ रहा है।”

     

    समीर ने पूछा,

     

    “लेकिन बच्चे क्यों?”

     

    अर्जुन ने जवाब दिया,

     

    “क्योंकि उनके जन्म की रात जो हुआ था… उसका सबूत अस्पताल के रिकॉर्ड में है।”

     

    वीडियो अचानक रुक गया।

     

    दूसरी फाइल अपने आप खुल गई।

     

    इस बार कमरे में सिर्फ नंदिनी थीं।

     

    उनकी आंखों में आंसू थे।

     

    उन्होंने कैमरे की तरफ देखते हुए कहा “अगर मेरी बेटी ये वीडियो देख रही है तो उसे एक बात जरूर बताना…”

     

    आरोही स्क्रीन के सामने आ गई।

     

    नंदिनी की आवाज कांप रही थी।

     

    “बेटा, तुम अकेली नहीं हो। तुम्हारे साथ एक और बच्चा है… और उसकी जिंदगी तुम्हारी जिंदगी से जुड़ी हुई है।”

     

    आरोही ने आरव की तरफ देखा।

     

    नंदिनी आगे बोलीं “उस बच्चे को कभी छोड़ना मत।”

     

    वीडियो बंद हो गया।

     

    आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    आरव ने उसका हाथ थाम लिया।

     

    “मैं कहीं नहीं जा रहा।”

     

    अचानक देवेंद्र ने धीमी आवाज में कहा,

     

    “तुम लोग अभी भी नहीं समझे।”

     

    सभी उसकी तरफ देखने लगे।

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “मैं असली दुश्मन नहीं हूं।”

     

    आरव ने भौंहें सिकोड़ लीं।

     

    “तो कौन है?”

     

    देवेंद्र ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “वो आदमी जो इस वक्त इस कमरे में खड़ा है।”

     

    सबकी नजरें एक-दूसरे पर घूमने लगीं।

     

    अचानक राघव का चेहरा बदल गया।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “नहीं…”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “हां।”

     

    फिर उसने धीरे से उंगली उठाई।

     

    “कबीर।”

     

    सब स्तब्ध रह गए।

     

    आरोही ने तुरंत कहा,

     

    “कबीर?”

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    “तुम पागल हो गए हो?”

     

    देवेंद्र मुस्कुराया।

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने कबीर की तरफ देखा।

     

    “कबीर, तुम कुछ कहोगे?”

     

    कबीर कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने अपनी जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

     

    तस्वीर में वही अस्पताल था।

     

    पीछे एक आदमी खड़ा था।

     

    कबीर ने तस्वीर आरव की तरफ बढ़ाई।

     

    “मुझे लगता है अब तुम्हें खुद समझ जाना चाहिए।”

     

    आरव ने तस्वीर देखी।

     

    उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    क्योंकि तस्वीर में खड़ा आदमी…

     

    कबीर के पिता थे।

     

    और उनके हाथ में वही फाइल थी…

     

    जिसे पाने के लिए पच्चीस साल से इतनी हत्याएं होती आ रही थीं।

     

    आरोही ने कबीर की तरफ देखा।

     

    “तुम्हें पहले से सब पता था?”

     

    कबीर की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “हां…”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तो तुम हमारे साथ इतने सालों से क्यों थे?”

     

    कबीर ने जवाब दिया “क्योंकि मैं तुम्हारा दुश्मन बनकर नहीं… तुम्हें बचाने के लिए तुम्हारे पास आया था।”

     

    तभी पीछे से एक और आवाज आई “लेकिन कबीर ने तुमसे एक बात और छुपाई है।”

     

    सबने पलटकर देखा।

     

    दरवाजे पर…

     

    एक और शख्स खड़ा था।

     

    और उसे देखते ही राघव के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “माधवी…?”

     

    आरव की सांसें थम गईं।

     

    उसकी मां सामने खड़ी थी।

     

    जारी रहेगा…

    Avatar photo

    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 16

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 16

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 16 : आरव के असली पिता जिंदा हैं

     

    अंधेरे अस्पताल में गोली की आवाज गूंजते ही आरोही चीख पड़ी।

     

    “मां!”

     

    बूढ़ी नर्स जमीन पर गिर चुकी थी।

     

    आरव तुरंत उसके पास पहुंचा।

     

    “आपको गोली लगी है?”

     

    नर्स ने मुश्किल से आंखें खोलीं।

     

    “नहीं… गोली मुझे नहीं लगी।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    “तो फिर…?”

     

    नर्स ने कांपते हुए कहा,

     

    “गोली मेरे पास से निकल गई थी।”

     

    आरोही ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “आपने अभी क्या कहा था?”

     

    नर्स ने आरव की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे… असली पिता… जिंदा हैं।”

     

    आरव जैसे जम गया।

     

    “क्या?”

     

    “हां।”

     

    “आपको पक्का पता है?”

     

    नर्स ने सिर हिलाया।

     

    “मैंने उन्हें अपनी आंखों से देखा था।”

     

    आरव की आवाज कांपने लगी।

     

    “कहां हैं वो?”

     

    नर्स कुछ बोल पाती, उससे पहले बाहर से किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।

     

    कबीर ने फुसफुसाकर कहा,

     

    “कोई हमारी तरफ आ रहा है।”

     

    अद्वैत ने तुरंत कहा,

     

    “हमें यहां से निकलना होगा।”

     

    आरव ने नर्स को सहारा दिया।

     

    “पहले इन्हें सुरक्षित जगह ले चलते हैं।”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    चारों पीछे के रास्ते से बाहर निकलने लगे।

     

    अंधेरे गलियारे में सिर्फ उनके कदमों की आवाज सुनाई दे रही थी।

     

    आरोही बार-बार पीछे देख रही थी।

     

    “कोई हमारा पीछा तो नहीं कर रहा?”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मैं हूं ना।”

     

    “लेकिन आरव…”

     

    “कुछ नहीं होगा।”

     

    तभी पीछे से किसी ने गोली चलाई।

     

    धांय!

     

    गोली दीवार से टकराई।

     

    अद्वैत ने कहा,

     

    “तेज चलो!”

     

    वे एक पुराने स्टोर रूम में घुस गए।

     

    कबीर ने दरवाजा अंदर से बंद कर दिया।

     

    बाहर कुछ लोग उन्हें ढूंढ रहे थे।

     

    “पूरे अस्पताल को छान मारो!”

     

    आरोही की सांसें तेज हो गईं।

     

    आरव ने उसके मुंह पर हाथ रखकर धीरे से कहा,

     

    “आवाज मत करना।”

     

    कुछ सेकंड बाद कदमों की आवाज दूर चली गई।

     

    आरोही ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन तभी उसे महसूस हुआ कि आरव का हाथ अब भी उसके चेहरे के पास था।

     

    दोनों की नजरें मिलीं।

     

    कुछ पल के लिए दोनों उस डरावने माहौल को भूल गए।

     

    आरव ने धीरे से हाथ हटा लिया।

     

    “सॉरी।”

     

    आरोही ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

     

    “कोई बात नहीं।”

     

    अद्वैत ने उन्हें देखकर कहा,

     

    “अगर तुम दोनों का रोमांस खत्म हो गया हो तो बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ लें?”

     

    आरोही झेंप गई।

     

    “चुप करो।”

     

    आरव भी हल्का सा मुस्कुरा दिया।

     

    अस्पताल से बाहर निकलने के बाद उन्होंने नर्स को एक सुरक्षित जगह पहुंचाया।

     

    नर्स अभी भी कमजोर थीं।

     

    आरव उनके सामने बैठ गया।

     

    “अब मुझे सब सच बताइए।”

     

    नर्स ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे असली पिता का नाम…”

     

    उन्होंने एक लंबी सांस ली।

     

    “राघव राजवंशी।”

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “राघव राजवंशी?”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या वो अर्जुन राजवंशी के भाई थे?”

     

    नर्स ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव ने हैरानी से पूछा,

     

    “तो मेरे पिता अर्जुन नहीं थे?”

     

    “नहीं।”

     

    “फिर इतने सालों तक मुझे राजवीर का बेटा क्यों माना गया?”

     

    नर्स ने कहा,

     

    “क्योंकि राघव को उस रात मारने की कोशिश की गई थी। तुम्हारी मां भी खतरे में थीं।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “मेरी मां कौन थीं?”

     

    नर्स कुछ पल चुप रहीं।

     

    “उनका नाम… माधवी था।”

     

    आरव की आंखें भर आईं।

     

    “क्या वो जिंदा हैं?”

     

    नर्स ने धीरे से कहा,

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    उसे पहली बार अपनी मां का नाम पता चला था।

     

    “उनके साथ क्या हुआ?”

     

    “तुम्हारे जन्म के कुछ महीनों बाद उनकी मौत हो गई।”

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    आरोही ने बिना कुछ कहे उसका हाथ थामे रखा।

     

    नर्स ने कहना शुरू किया,

     

    “राघव बहुत ईमानदार आदमी थे। उन्होंने विराज और उसके साथियों के खिलाफ सबूत इकट्ठा किए थे।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “लेकिन फिर उन्हें गायब क्यों होना पड़ा?”

     

    “क्योंकि उन्हें पता चल गया था कि उनके अपने ही लोग उन्हें धोखा दे रहे हैं।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    नर्स ने जवाब दिया,

     

    “समीर।”

     

    अद्वैत चौंक गया।

     

    “मेरे पिता?”

     

    नर्स ने कहा,

     

    “समीर पूरी तरह गद्दार नहीं था। लेकिन उस समय वह डर गया था।”

     

    अद्वैत की आंखों में दर्द आ गया।

     

    “मेरे पिता ने क्या किया?”

     

    “उन्होंने राघव की लोकेशन दुश्मनों को बता दी थी।”

     

    अद्वैत ने सिर झुका लिया।

     

    “फिर?”

     

    “राघव वहां से बच निकले।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा,

     

    “तो वो अब कहां हैं?”

     

    नर्स ने कहा,

     

    “यही तो मुझे नहीं पता।”

     

    आरव की उम्मीद फिर टूटने लगी।

     

    “आपने कहा था कि वो जिंदा हैं।”

     

    “हां।”

     

    “फिर कहां हैं?”

     

    नर्स ने अपनी मुट्ठी खोली।

     

    उसमें एक छोटी चाबी थी।

     

    “उन्होंने मुझे ये चाबी दी थी।”

     

    आरव ने चाबी ले ली।

     

    “किसकी चाबी है?”

     

    नर्स ने कहा,

     

    “एक लॉकर की।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “कहां?”

     

    नर्स ने एक नाम बताया “सूर्यगढ़ रेलवे स्टेशन।”

     

    अगली सुबह वे सूर्यगढ़ रेलवे स्टेशन पहुंचे।

     

    पुराना स्टेशन अब लगभग बंद पड़ा था।

     

    लॉकर रूम स्टेशन के एक पुराने हिस्से में था।

     

    चाबी नंबर 117

     

    आरव ने ताला खोला।

     

    अंदर एक बैग रखा था।

     

    बैग में कुछ कपड़े, एक पुरानी डायरी और एक फोटो थी।

     

    आरव ने फोटो उठाई।

     

    उसमें एक आदमी एक छोटी बच्ची को गोद में लिए था।

     

    आरोही ने तस्वीर देखी।

     

    “ये बच्ची…”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तुम हो?”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “लेकिन ये आदमी कौन है?”

     

    फोटो के पीछे लिखा था “राघव और छोटी आरोही।”

     

    आरोही स्तब्ध रह गई।

     

    “मैं इन्हें जानती तक नहीं थी।”

     

    नर्स ने पीछे से कहा,

     

    “तुम बहुत छोटी थीं।”

     

    आरोही ने फोटो को सीने से लगा लिया।

     

    “उन्होंने मुझे गोद में लिया था?”

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो राघव और आरोही का रिश्ता क्या था?”

     

    नर्स ने कहा,

     

    “राघव तुम्हें अपनी बेटी की तरह मानते थे।”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “लेकिन मैं तो अर्जुन की बेटी थी?”

     

    नर्स ने उसकी तरफ देखा।

     

    “यही तो सबसे बड़ा रहस्य है।”

     

    कबीर ने बैग में रखी डायरी खोली।

     

    पहले कई पन्ने खाली थे।

     

    फिर एक पन्ने पर लिखा था “अगर ये डायरी किसी के हाथ लगे, तो समझ लेना कि मैं अपनी बेटी को बचाने में सफल हो गया।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “बेटी?”

     

    कबीर ने आगे पढ़ा।

     

    “आरोही मेरी बेटी नहीं है, लेकिन उसकी रक्षा करना मेरा कर्तव्य है।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “हर कोई मुझे किसी न किसी का बच्चा क्यों बना रहा है?”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम किसी की चीज नहीं हो।”

     

    वह उसकी आंखों में देखते हुए बोला,

     

    “तुम खुद अपनी पहचान हो।”

     

    आरोही ने सिर उसके कंधे पर रख दिया।

     

    कबीर ने डायरी का अगला पन्ना पढ़ा।

     

    “जिस दिन आरोही और आरव अपने जन्म का सच जानेंगे, उस दिन उन्हें एक-दूसरे से दूर करने की कोशिश की जाएगी।”

     

    आरव ने चौंककर कहा,

     

    “क्यों?”

     

    अगली लाइन थी “क्योंकि इन दोनों का मिलना उस राज को खोल देगा, जिसे हमने सालों से छुपाकर रखा है।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कौन-सा राज?”

     

    अगले पन्ने पर सिर्फ एक नक्शा था।

     

    नक्शे में एक जगह लाल निशान लगा था।

     

    “राजवंशी हवेली।”

     

    तभी आरव के फोन पर एक अनजान नंबर से मैसेज आया।

     

    “अगर अपने पिता को देखना चाहते हो, तो आज रात 10 बजे अकेले राजवंशी हवेली आना।”

     

    आरव ने मैसेज पढ़कर फोन बंद कर दिया।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “किसका मैसेज है?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “कुछ नहीं।”

     

    आरोही ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुमने वादा किया था।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां।”

     

    उसने फोन आरोही को दे दिया।

     

    आरोही ने मैसेज पढ़ा।

     

    उसका चेहरा बदल गया।

     

    “तुम अकेले नहीं जाओगे।”

     

    “लेकिन उन्होंने साफ लिखा है “मुझे परवाह नहीं।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “अगर मेरे पिता सच में जिंदा हैं तो?”

     

    “तो मैं भी चलूंगी।”

     

    “आरोही, ये खतरनाक हो सकता है।”

     

    “तुम्हारी जिंदगी खतरे में होगी और मैं घर पर बैठी रहूंगी?”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “तुमने कहा था ना… हम साथ हैं।”

     

    आरव ने धीरे से मुस्कुराकर कहा,

     

    “हां। साथ हैं।”

     

    रात के ठीक दस बजे आरव, आरोही, कबीर और अद्वैत राजवंशी हवेली पहुंचे।

     

    हवेली का मुख्य दरवाजा खुला हुआ था।

     

    अंदर पूरी तरह अंधेरा था।

     

    आरोही ने आरव का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    “यहां कोई है।”

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “मुझे भी ऐसा लग रहा है।”

     

    वे अंदर गए।

     

    तभी पीछे से दरवाजा बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    कबीर ने दरवाजा खोलने की कोशिश की।

     

    “ये लॉक हो चुका है।”

     

    अचानक सामने लगी बड़ी स्क्रीन जल उठी।

     

    स्क्रीन पर एक आदमी दिखाई दिया।

     

    दाढ़ी बढ़ी हुई…

     

    चेहरा थोड़ा बूढ़ा…

     

    लेकिन आंखें बिल्कुल जिंदा।

     

    आरव की सांस रुक गई।

     

    “पापा…?”

     

    स्क्रीन पर मौजूद आदमी ने कहा “आरव…”

     

    आरव की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “पापा!”

     

    आरोही ने भी स्क्रीन की तरफ देखा।

     

    वो आदमी मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें देखकर अच्छा लगा, बेटा।”

     

    आरव की आवाज कांप रही थी।

     

    “आप जिंदा हैं?”

     

    उस आदमी ने कहा “हां।”

     

    “आप इतने साल कहां थे?”

     

    “तुम्हें बचाने के लिए छुपा हुआ था।”

     

    आरव रो पड़ा।

     

    “आपने मुझे अकेला क्यों छोड़ दिया?”

     

    राघव की आंखें नम हो गईं।

     

    “क्योंकि अगर मैं तुम्हारे पास रहता… तो तुम भी मारे जाते।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “मेरी मां?”

     

    राघव कुछ पल चुप रहे।

     

    “माधवी…”

     

    उनकी आवाज टूट गई।

     

    “मैं उसे बचा नहीं पाया।”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    आरोही उसके पास आकर खड़ी हो गई।

     

    तभी राघव ने आरोही को देखा।

     

    उनकी आंखों में अजीब-सी चमक आ गई।

     

    “और तुम…”

     

    आरोही ने धीमे से कहा,

     

    “मैं आरोही हूं।”

     

    राघव ने कहा,

     

    “मुझे पता है।”

     

    “आप मुझे कैसे जानते हैं?”

     

    राघव ने जवाब दिया “क्योंकि तुम्हें तुम्हारी मां की गोद से मैंने ही उठाया था।”

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    “क्या?”

     

    “हां।”

     

    “तो मेरी मां नंदिनी…”

     

    राघव ने कहा,

     

    “नंदिनी ने तुम्हें मुझे सौंपा था।”

     

    “क्यों?”

     

    राघव की आवाज गंभीर हो गई।

     

    “क्योंकि उसे पता था कि जिस इंसान से हम बच रहे हैं… वो तुम्हारे जन्म से पहले ही हमारे परिवार में घुस चुका था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    राघव ने कैमरे की तरफ देखा।

     

    उनका चेहरा अचानक डर से भर गया।

     

    “वो अभी भी तुम्हारे आसपास है।”

     

    तभी पीछे से किसी ने गोली चला दी।

     

    धांय!

     

    स्क्रीन टूटकर बंद हो गई।

     

    आरोही चीख पड़ी।

     

    आरव ने उसे अपनी बांहों में खींच लिया।

     

    कबीर ने कहा,

     

    “कोई हमारे साथ अंदर है!”

     

    अद्वैत ने बंदूक उठाई।

     

    “किधर?”

     

    तभी ऊपर की मंजिल से किसी की आवाज आई “राघव को ढूंढने की जरूरत नहीं है…”

     

    सबने ऊपर देखा।

     

    सीढ़ियों पर एक परछाईं खड़ी थी।

     

    आवाज फिर आई “क्योंकि अब वो खुद तुम्हारे पास आने वाला है।”

     

    और अगले ही पल…

     

    हवेली की सारी लाइटें जल उठीं।

     

    सामने खड़ा आदमी देखकर आरव और आरोही दोनों के होश उड़ गए।

     

    क्योंकि वो आदमी राघव के बिल्कुल सामने खड़ा था… और दोनों एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे।

     

    आरव ने अविश्वास से कहा “पापा… आप इसे जानते हैं?”

     

    राघव ने गंभीर आवाज में जवाब दिया “हां बेटा… यही वो आदमी है, जिससे मैं पिछले पच्चीस साल से भाग रहा हूं।”

     

    जारी रहेगा…

    Avatar photo

    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇