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टैग: प्यार#दर्द#रोमेंस

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 5

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 5

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

    तेरी मेरी दास्तान

     

    एपिसोड 5 — एक सच, दो दिल

     

    आरोही अपनी मां के सामने बिल्कुल खामोश बैठी थी।

     

    मां के मुंह से निकले शब्द उसके कानों में बार-बार गूंज रहे थे “आरव के परिवार की वजह से ही तुम्हारे पापा की मौत हुई थी।”

     

    आरोही को लग रहा था जैसे उसके आसपास की सारी आवाजें अचानक बंद हो गई हों।

     

    उसने मां की तरफ देखा।

     

    “मां… आप क्या कह रही हैं?”

     

    उसकी आवाज कांप रही थी।

     

    मां ने नजरें झुका लीं।

     

    “मैं वही कह रही हूं जो इतने सालों से अपने दिल में दबाकर बैठी हूं।”

     

    “लेकिन पापा की मौत तो एक एक्सीडेंट में हुई थी।”

     

    “हां… यही मैंने तुम्हें बताया था।”

     

    “तो फिर सच क्या है?”

     

    मां की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “सच ये है कि तुम्हारे पापा का एक्सीडेंट करवाया गया था।”

     

    आरोही की सांस अटक गई।

     

    “किसने?”

     

    मां ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    “मां!”

     

    आरोही ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मुझे सच जानना है।”

     

    मां ने अपनी आंखें बंद कर लीं।

     

    “तुम्हारे पापा और आरव के पिता के बीच बहुत पुरानी दुश्मनी थी।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    “बिजनेस।”

     

    “बस बिजनेस के लिए कोई किसी को मार देगा?”

     

    मां ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “बात सिर्फ बिजनेस की नहीं थी।”

     

    आरोही ध्यान से उनकी तरफ देखने लगी।

     

    “तो फिर?”

     

    मां कुछ कहने ही वाली थीं कि अचानक उनकी नजर दरवाजे की तरफ चली गई।

     

    वह तुरंत चुप हो गईं।

     

    आरोही ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    दरवाजा बंद था।

     

    “क्या हुआ मां?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “आप कुछ छुपा रही हैं।”

     

    “आरोही, मेरी बात सुन।”

     

    मां ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया।

     

    “आरव से दूर रहो।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मैं ऐसा नहीं कर सकती।”

     

    “क्यों?”

     

    आरोही चुप हो गई।

     

    उसके पास कोई जवाब नहीं था।

     

    वह कैसे कहती कि आरव अब उसके लिए सिर्फ एक दोस्त नहीं था?

     

    कि उसकी आवाज सुनते ही उसके दिल की धड़कन बदल जाती थी।

     

    कि उसके साथ बिताया हर पल उसे याद रहता था।

     

    कि आज पहली बार जब आरव ने कहा था “तुम मेरे लिए बहुत खास हो।”

     

    तो उसके दिल ने उसी पल उसे अपना मान लिया था।

     

    मां उसकी खामोशी समझ गईं।

     

    उन्होंने धीरे से पूछा,

     

    “तुम उससे प्यार करने लगी हो?”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    उसने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    लेकिन उसकी खामोशी ही उसका जवाब थी।

     

    मां ने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

     

    “नहीं…”

     

    आरोही ने मां का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मां, प्यार को मैं आदेश देकर खत्म नहीं कर सकती।”

     

    “लेकिन ये प्यार तुम्हारी जिंदगी बर्बाद कर देगा।”

     

    “अगर आरव दोषी नहीं हुआ तो?”

     

    मां चुप हो गईं।

     

    आरोही ने कहा,

     

    “आपने कहा कि उसके परिवार की वजह से पापा की मौत हुई। लेकिन क्या आरव उस वक्त वहां था?”

     

    मां ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “तो फिर उसकी क्या गलती है?”

     

    मां के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    आरोही उठकर अपने कमरे की तरफ चली गई।

     

    दरवाजे पर पहुंचकर वह रुकी।

     

    “मां।”

     

    “हां?”

     

    “मैं आरव से दूर नहीं जाऊंगी… जब तक मुझे खुद ये यकीन न हो जाए कि वो मेरे पापा की मौत के लिए जिम्मेदार है।”

     

    मां ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “तुम नहीं जानती कि तुम किस आग से खेल रही हो।”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “शायद।”

     

    फिर वह कमरे में चली गई।

     

    अपने कमरे में पहुंचते ही आरोही ने दरवाजा बंद कर लिया।

     

    उसने खुद को आईने में देखा।

     

    आंखों में आंसू थे।

     

    उसने मोबाइल उठाया।

     

    आरव का नाम स्क्रीन पर था।

     

    कुछ पल तक वह उसे देखती रही।

     

    फिर कॉल कर दिया।

     

    पहली घंटी।

     

    दूसरी घंटी।

     

    तीसरी घंटी।

     

    आरव ने फोन उठा लिया।

     

    “आरोही?”

     

    उसकी आवाज सुनते ही आरोही की आंखों से आंसू गिर पड़े।

     

    “हां।”

     

    आरव तुरंत समझ गया कि कुछ गड़बड़ है।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “तुम कहां हो?”

     

    “घर पर।”

     

    “मुझसे मिलोगे?”

     

    कुछ पल की खामोशी रही।

     

    फिर आरव ने पूछा,

     

    “अभी?”

     

    “हां।”

     

    “सब ठीक है?”

     

    आरोही ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “नहीं।”

     

    आरव की आवाज गंभीर हो गई।

     

    “मैं आ रहा हूं।”

     

    करीब आधे घंटे बाद आरव अपनी कार लेकर आरोही के घर के बाहर पहुंच गया।

     

    आरोही पहले से बाहर खड़ी थी।

     

    उसने आरव को देखते ही महसूस किया कि उसके अंदर का सारा डर अचानक थोड़ा कम हो गया।

     

    आरव उसके पास आया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    कुछ सेकंड तक वह कुछ बोल नहीं पाई।

     

    फिर अचानक उसकी आंखों से आंसू बह निकले।

     

    आरव घबरा गया।

     

    “आरोही!”

     

    वह उसके करीब आया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरोही ने कांपती आवाज में पूछा,

     

    “क्या तुम्हारे परिवार ने मेरे पापा को मारा था?”

     

    आरव बिल्कुल जम गया।

     

    उसने उसे देखा।

     

    आरोही की आंखों में दर्द था।

     

    “मेरी मां ने कहा है कि मेरे पापा की मौत के पीछे तुम्हारे परिवार का हाथ था।”

     

    आरव ने धीरे से सांस छोड़ी।

     

    “मुझे इसका अंदाजा था।”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “तुम्हें पता था?”

     

    “आज ही कुछ बातें पता चली थीं।”

     

    “और तुमने मुझे बताया नहीं?”

     

    “मैं तुम्हें डराना नहीं चाहता था।”

     

    “लेकिन मुझे सच जानने का हक था।”

     

    “हां।”

     

    आरव ने सिर झुका लिया।

     

    “मुझे बताना चाहिए था।”

     

    आरोही ने आंसू पोंछे।

     

    “अब बताओ।”

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “मुझे नहीं पता कि तुम्हारे पापा की मौत के पीछे कौन था।”

     

    “लेकिन?”

     

    “इतना जरूर जानता हूं कि मेरे पिता और तुम्हारे पिता के बीच बहुत बड़ा विवाद था।”

     

    “किस बात पर?”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    “आरव!”

     

    “एक प्रोजेक्ट को लेकर।”

     

    “कौन सा प्रोजेक्ट?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “एक ऐसी जमीन का मामला था जिस पर दोनों परिवारों की नजर थी।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “और मेरे पापा हार गए?”

     

    “नहीं।”

     

    आरव की आवाज भारी हो गई।

     

    “तुम्हारे पापा ने वो जमीन मेरे पिता से बचा ली थी।”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “फिर?”

     

    “उसके कुछ ही दिन बाद उनका एक्सीडेंट हुआ।”

     

    दोनों के बीच खामोशी छा गई।

     

    आरोही की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    “तो क्या मेरे पापा को तुम्हारे पिता ने मरवाया?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैं नहीं जानता।”

     

    “लेकिन शक है?”

     

    “हां।”

     

    आरोही ने नजरें झुका लीं।

     

    कुछ पल बाद उसने पूछा,

     

    “और अगर सच में ऐसा हुआ?”

     

    आरव की आंखों में दर्द उतर आया।

     

    “तो मैं तुम्हारे सामने खड़ा होकर अपने परिवार का बचाव नहीं करूंगा।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या मतलब?”

     

    “अगर मेरे परिवार ने तुम्हारे साथ अन्याय किया है… तो मैं उसका हिस्सा नहीं बनूंगा।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “तुम अपने परिवार के खिलाफ जाओगे?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “सच के खिलाफ नहीं जा सकता।”

     

    आरोही उसके पास आ गई।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “एक बात कहूं?”

     

    “हां।”

     

    “तुम मुझसे नाराज हो सकती हो।”

     

    “हम्म।”

     

    “मुझसे दूर भी जा सकती हो।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “लेकिन?”

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “मुझ पर उस गलती की सजा मत देना जो मैंने की ही नहीं।”

     

    आरोही कुछ नहीं बोली।

     

    उसने बस अपना हाथ उसके हाथ में रहने दिया।

     

    उस पल दोनों के बीच शब्दों की जरूरत नहीं थी।

     

    अचानक आरोही के फोन पर एक मैसेज आया।

     

    उसने स्क्रीन देखी।

     

    Unknown Number:

    “अगर आरव पर भरोसा किया, तो अपनी मां को खो दोगी।”

     

    आरोही के हाथ कांपने लगे।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरोही ने फोन उसे दिखा दिया।

     

    मैसेज पढ़ते ही आरव का चेहरा सख्त हो गया।

     

    “ये नंबर मुझे दो।”

     

    “क्यों?”

     

    “मैं पता लगाऊंगा कि ये कौन है।”

     

    आरव ने नंबर अपने फोन में सेव कर लिया।

     

    तभी पीछे से एक कार तेजी से उनके पास से गुजरी।

     

    आरव ने तुरंत आरोही को अपनी तरफ खींच लिया।

     

    “सावधान!”

     

    कार कुछ दूर जाकर रुक गई।

     

    दोनों ने उसकी तरफ देखा।

     

    कार की खिड़की थोड़ी खुली।

     

    अंदर कोई बैठा था।

     

    लेकिन चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    कुछ सेकंड बाद कार वहां से चली गई।

     

    आरव ने तुरंत कहा,

     

    “तुम अंदर जाओ।”

     

    “लेकिन”

     

    “आरोही, अभी।”

     

    उसकी आवाज में ऐसी सख्ती थी कि आरोही बिना कुछ कहे घर के अंदर चली गई।

     

    आरव वहीं खड़ा कार को जाते हुए देखता रहा।

     

    उसने नंबर नोट करने की कोशिश की।

     

    लेकिन कार इतनी दूर निकल चुकी थी कि नंबर साफ नहीं दिखा।

     

    उसने कबीर को फोन किया।

     

    “कबीर, मुझे अभी तुम्हारी मदद चाहिए।”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “आरोही को धमकी मिल रही है।”

     

    “क्या?”

     

    “और कोई हमारा पीछा कर रहा है।”

     

    कबीर कुछ पल चुप रहा।

     

    “मैं अभी आता हूं।”

     

    रात के करीब ग्यारह बजे।

     

    आरोही अपने कमरे में बैठी थी।

     

    मां सो चुकी थीं।

     

    लेकिन आरोही की आंखों में नींद नहीं थी।

     

    वह बार-बार आरव के बारे में सोच रही थी।

     

    उसने मोबाइल उठाया।

     

    आरव का मैसेज था “सो जाना। मैं हूं।”

     

    आरोही ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया “तुम हमेशा रहोगे?”

     

    कुछ ही सेकंड बाद जवाब आया “अगर तुमने साथ दिया तो।”

     

    आरोही के दिल की धड़कन तेज हो गई।

     

    उसने लिखा “और अगर मैंने साथ नहीं दिया?”

     

    आरव का जवाब आया “फिर भी।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने फोन सीने से लगा लिया।

     

    उसे अब खुद से सच स्वीकार करना पड़ा।

     

    वह आरव से प्यार करने लगी थी।

     

    लेकिन उसी प्यार के साथ एक डर भी था।

     

    अगर उसकी मां की बात सच हुई…

     

    अगर सच में आरव के परिवार ने उसके पिता को मारा था…

     

    तो क्या उनका प्यार इस सच के सामने टिक पाएगा?

     

    उधर आरव और कबीर एक सुनसान ऑफिस में बैठे थे।

     

    कबीर ने लैपटॉप पर कुछ तस्वीरें खोल रखी थीं।

     

    “ये देख।”

     

    आरव स्क्रीन के करीब आया।

     

    एक पुरानी फोटो थी।

     

    उसमें आरव के पिता राजवीर सिंह और आरोही के पिता विनय मेहरा एक साथ खड़े थे।

     

    लेकिन फोटो के पीछे एक तीसरा आदमी भी था।

     

    आरव ने उसे गौर से देखा।

     

    “इसे मैं पहचानता हूं।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    “मेरे पिता का पुराना बिजनेस पार्टनर… विक्रम सूद।”

     

    कबीर ने दूसरी फाइल खोली।

     

    “और सबसे बड़ी बात?”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारे पिता की मौत के बाद कंपनी का सबसे बड़ा फायदा इसी आदमी को हुआ था।”

     

    आरव की आंखें सिकुड़ गईं।

     

    “मतलब?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “हो सकता है हम इतने सालों से गलत इंसान पर शक कर रहे हों।”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर धीरे से बोला,

     

    “अगर विक्रम सूद ने ये सब किया है… तो उसने मेरे परिवार और आरोही के परिवार के बीच दुश्मनी क्यों पैदा की?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “यही पता करना होगा।”

     

    आरव ने कुर्सी से उठते हुए कहा,

     

    “कल से नहीं।”

     

    कबीर ने उसे देखा।

     

    “क्या?”

     

    “अभी से।”

     

    उसी समय शहर के दूसरे हिस्से में एक आलीशान घर के अंदर एक आदमी खिड़की के पास खड़ा था।

     

    उसके हाथ में वही तस्वीर थी जिसमें आरव और आरोही कैफे में बैठे थे।

     

    वह तस्वीर को देखकर मुस्कुराया।

     

    “तुम दोनों जितना करीब आओगे…”

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “मेरे लिए खेल उतना ही आसान होता जाएगा।”

     

    तभी पीछे से एक आदमी ने पूछा,

     

    “सर, क्या करें?”

     

    उसने तस्वीर टेबल पर रख दी।

     

    “पहले आरव को उसके पिता के खिलाफ करो।”

     

    “और लड़की?”

     

    उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

     

    “आरोही को उसके पिता के सच तक पहुंचने दो।”

     

    “अगर वो सच तक पहुंच गई तो?”

     

    उस आदमी की मुस्कान और गहरी हो गई।

     

    “तभी तो असली खेल शुरू होगा।”

     

    अगली सुबह आरोही की मां अपने कमरे में पुरानी अलमारी खोल रही थीं।

     

    अचानक उन्हें नीचे रखा एक छोटा-सा लकड़ी का डिब्बा दिखाई दिया।

     

    उन्होंने उसे बाहर निकाला।

     

    डिब्बे में कुछ पुराने कागज और एक चाबी थी।

     

    लेकिन सबसे नीचे एक लिफाफा था।

     

    लिफाफे पर लिखा था “आरोही के लिए जब उसे सच्चाई जानने का समय आए।”

     

    मां की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उन्होंने लिफाफा हाथ में लिया।

     

    “शायद अब वो समय आ गया है।”

     

    लेकिन उन्हें नहीं पता था उस लिफाफे के अंदर सिर्फ आरोही के पिता की मौत का राज नहीं था।

     

    उसमें एक ऐसा सच था जो आरव और आरोही के रिश्ते की पूरी नींव हिला देने वाला था।

     

    और शायद उस सच के सामने आने के बाद दोनों के लिए एक-दूसरे से प्यार करना सबसे मुश्किल काम होने वाला था।

     

    जारी रहेगा…

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 4

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 4

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    तेरी मेरी दास्तान

     

    एपिसोड 4 — एक अनकहा एहसास

     

    आरव कुछ देर तक अपने हाथ में पकड़ी तस्वीर को देखता रहा।

     

    तस्वीर में वह और आरोही आमने-सामने बैठे थे।

     

    दोनों के चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    उन्हें देखकर कोई भी कह सकता था कि दोनों के बीच कुछ खास है।

     

    लेकिन आरव की नजर तस्वीर पर नहीं, उसके पीछे लिखे शब्दों पर अटक गई थी “अगली बार तस्वीर नहीं… कहानी बदलेगी।”

     

    उसकी मुट्ठी कस गई।

     

    “कबीर ने जो कहा… उसका मतलब क्या है?”

     

    आरव ने तुरंत अपना फोन उठाया और कबीर को कॉल किया।

     

    “कबीर, तुम अभी कहां हो?”

     

    “अपने ऑफिस में।”

     

    “मैं आ रहा हूं।”

     

    “आरव, अकेले मत आना।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि जो पता चला है, वो थोड़ा गंभीर है।”

     

    आरव ने बिना कुछ कहे फोन काट दिया।

     

    वह कुर्सी से उठा और ऑफिस से बाहर निकल गया।

     

    लेकिन जैसे ही वह लिफ्ट की तरफ बढ़ा, उसके फोन पर आरोही का मैसेज आया।

     

    “आज शाम झील चलोगे?”

     

    आरव के कदम रुक गए।

     

    कुछ सेकंड तक वह उस मैसेज को देखता रहा।

     

    उसके चेहरे पर तनाव के बीच हल्की मुस्कान आ गई।

     

    उसने जवाब लिखा “तुम बुलाओ और मैं ना आऊं, ऐसा हो सकता है?”

     

    कुछ ही सेकंड बाद जवाब आया “तो फिर शाम 6 बजे।”

     

    आरव ने लिखा “पक्का।”

     

    फोन जेब में रखते ही उसकी मुस्कान गायब हो गई।

     

    उसे कबीर से मिलने जाना था।

     

    क्योंकि अब उसे जानना था आखिर आरोही कौन थी?

     

    कबीर के ऑफिस में पहुंचते ही आरव ने बिना समय गंवाए पूछा,

     

    “क्या पता चला?”

     

    कबीर ने दरवाजा बंद किया।

     

    फिर टेबल पर एक फाइल रख दी।

     

    “पहले बैठ।”

     

    आरव ने फाइल खोली।

     

    अंदर कुछ पुराने दस्तावेज और तस्वीरें थीं।

     

    सबसे ऊपर एक तस्वीर लगी थी।

     

    एक छोटी बच्ची की।

     

    आरव ने तस्वीर हाथ में उठाई।

     

    “ये कौन है?”

     

    कबीर ने धीमी आवाज में कहा,

     

    “आरोही।”

     

    आरव ने तस्वीर को गौर से देखा।

     

    बच्ची की आंखें बिल्कुल वैसी ही थीं।

     

    “ये कितने साल पुरानी है?”

     

    “लगभग बीस साल।”

     

    आरव ने अगला कागज उठाया।

     

    “यहां नाम… आरोही मेहरा लिखा है।”

     

    कबीर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन आरोही ने मुझे बताया था कि उसका नाम आरोही शर्मा है।”

     

    “यही तो समस्या है।”

     

    कबीर ने दूसरी फाइल खोली।

     

    “लगभग दस साल पहले उसके पिता की मौत एक कार दुर्घटना में हुई थी। उसके बाद उसकी मां उसे लेकर शहर छोड़कर चली गईं।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “फिर?”

     

    “फिर कुछ साल बाद दोनों वापस आईं। लेकिन उन्होंने अपना सरनेम बदल लिया।”

     

    “क्यों?”

     

    कबीर ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “यही हमें पता नहीं।”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    कबीर ने एक और फोटो उसके सामने रखी।

     

    आरव की आंखें अचानक ठहर गईं।

     

    फोटो में एक आदमी था।

     

    वह आदमी उसे पहचानता था।

     

    “ये…”

     

    “हां।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “इसी आदमी का नाम पिछले कई सालों से तुम्हारे परिवार के दुश्मनों की लिस्ट में है।”

     

    आरव ने फोटो को कसकर पकड़ लिया।

     

    “लेकिन इसका आरोही से क्या संबंध है?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “यही सबसे बड़ा सवाल है।”

     

    कुछ पल दोनों चुप रहे।

     

    फिर आरव ने धीरे से कहा,

     

    “मुझे आरोही से मिलना होगा।”

     

    कबीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “आरव, सोच-समझकर।”

     

    “मैं सोच चुका हूं।”

     

    “तू भावनाओं में फैसला मत ले।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अगर वो इस सब में फंसी है, तो मैं उसे अकेला नहीं छोड़ सकता।”

     

    कबीर ने गहरी सांस ली।

     

    “और अगर वही इस कहानी की वजह निकली तो?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “तो सच सामने आने तक मैं उसका साथ नहीं छोड़ूंगा।”

     

    शाम के छह बजने में कुछ मिनट बाकी थे।

     

    आरोही झील के किनारे खड़ी आरव का इंतजार कर रही थी।

     

    आज उसने हल्के गुलाबी रंग का सूट पहना था।

     

    उसके हाथ में वही डायरी थी।

     

    वह बार-बार घड़ी देख रही थी।

     

    “छह बजने वाले हैं…”

     

    उसने धीरे से कहा।

     

    तभी पीछे से आवाज आई “किसका इंतजार हो रहा है?”

     

    आरोही ने पलटकर देखा।

     

    आरव खड़ा था।

     

    सफेद शर्ट और काली जींस में।

     

    चेहरे पर वही मुस्कान थी।

     

    आरोही ने राहत की सांस ली।

     

    “आपका।”

     

    आरव ने भौंह उठाई।

     

    “इतनी आसानी से मान लिया?”

     

    “क्या?”

     

    “कि आप मेरा इंतजार कर रही थीं।”

     

    आरोही ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “आपको कोई गलतफहमी है तो मैं जा सकती हूं।”

     

    वह जाने के लिए मुड़ी ही थी कि आरव ने कहा,

     

    “रुको।”

     

    आरोही रुक गई।

     

    आरव उसके पास आया।

     

    “मजाक कर रहा था।”

     

    “बहुत खराब मजाक है आपका।”

     

    “लेकिन तुम मुस्कुरा रही हो।”

     

    आरोही ने महसूस किया कि सच में उसके चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    “आपको हर चीज कैसे पता चल जाती है?”

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “तुम्हें देखकर पता चल जाता है।”

     

    आरोही कुछ पल चुप रही।

     

    दोनों झील के किनारे चलने लगे।

     

    कुछ दूर जाने के बाद आरोही ने अपनी डायरी आरव की तरफ बढ़ाई।

     

    “ये पढ़ोगे?”

     

    आरव ने हैरानी से पूछा,

     

    “तुम्हारी डायरी?”

     

    “हां।”

     

    “मैं तुम्हारी निजी बातें नहीं पढ़ूंगा।”

     

    आरोही मुस्कुराई।

     

    “जिस पन्ने पर मैंने तुम्हारे बारे में लिखा है, वो पढ़ सकते हो।”

     

    आरव ने डायरी ले ली।

     

    पन्ना खोला।

     

    उस पर लिखा था “कुछ लोग जिंदगी में अचानक आते हैं।

    पहले अजनबी लगते हैं,

    फिर दोस्त बन जाते हैं।

    और पता ही नहीं चलता कि कब उनकी मौजूदगी आदत बन गई।”

     

    आरव ने पढ़ना बंद कर दिया।

     

    उसने धीरे से पूछा,

     

    “ये मेरे बारे में है?”

     

    आरोही ने नजरें झुका लीं।

     

    “शायद।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारा ये ‘शायद’ बहुत खतरनाक है।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि हर बार मुझे उम्मीद दे देता है।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “किस चीज की उम्मीद?”

     

    आरव कुछ बोलने ही वाला था कि उसका फोन बज उठा।

     

    कबीर का कॉल था।

     

    आरव ने फोन देखा और कॉल काट दी।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “किसका फोन था?”

     

    “कबीर का।”

     

    “उठाया क्यों नहीं?”

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “क्योंकि आज मैं तुम्हारे साथ हूं।”

     

    आरोही का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “आरव…”

     

    “हम्म?”

     

    “तुम्हें कभी लगता है कि हम बहुत जल्दी करीब आ रहे हैं?”

     

    आरव ने कुछ पल सोचा।

     

    “हां।”

     

    “और डर नहीं लगता?”

     

    “किससे?”

     

    “कि अगर ये रिश्ता टूट गया तो?”

     

    आरव की आंखों में अचानक गंभीरता आ गई।

     

    “हर खूबसूरत चीज के खत्म होने का डर होता है।”

     

    “फिर?”

     

    “फिर भी इंसान उसे जीता है।”

     

    आरोही की आंखें नम हो गईं।

     

    “तुम बहुत अजीब हो।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “तुम भी।”

     

    तभी अचानक तेज हवा चली।

     

    आरोही के हाथ से डायरी छूटकर नीचे गिर गई।

     

    आरव उसे उठाने झुका।

     

    लेकिन उसी वक्त उसे डायरी के अंदर से एक पुरानी तस्वीर दिखाई दी।

     

    एक आदमी और एक छोटी बच्ची।

     

    आरव की नजर उस आदमी के चेहरे पर पड़ी।

     

    उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    वही आदमी।

     

    वही चेहरा।

     

    जो कुछ देर पहले कबीर की फाइल में था।

     

    आरोही के पिता।

     

    आरव ने तस्वीर हाथ में उठा ली।

     

    “ये कौन हैं?”

     

    आरोही अचानक घबरा गई।

     

    उसने तस्वीर उसके हाथ से ले ली।

     

    “मेरे पापा।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम्हारे पापा का नाम क्या था?”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली,

     

    “विनय मेहरा।”

     

    आरव के दिल की धड़कन तेज हो गई।

     

    “तुमने मुझे कभी नहीं बताया कि तुम्हारा सरनेम मेहरा है।”

     

    आरोही का चेहरा उतर गया।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “आरव… तुम्हें क्या पता चला है?”

     

    आरव उसे देखता रहा।

     

    वह सच बताना चाहता था।

     

    लेकिन उसी वक्त उसका फोन फिर बजा।

     

    इस बार एक अनजान नंबर था।

     

    आरव ने कॉल उठाई।

     

    “हैलो?”

     

    दूसरी तरफ वही भारी आवाज थी।

     

    “मैंने कहा था ना… लड़की से दूर रहो।”

     

    आरव की आंखों में गुस्सा आ गया।

     

    “तुम हो कौन?”

     

    “जिस सच की तलाश तुम कर रहे हो, वो तुम्हें बहुत महंगा पड़ेगा।”

     

    “सामने आकर बात करो।”

     

    “जल्द ही।”

     

    कॉल कट हो गई।

     

    आरोही ने घबराकर पूछा,

     

    “कौन था?”

     

    आरव ने फोन नीचे किया।

     

    “कोई नहीं।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “झूठ मत बोलो।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आरोही…”

     

    “तुम कुछ जानते हो।”

     

    “हां।”

     

    “क्या?”

     

    आरव ने गहरी सांस ली।

     

    “तुम्हारे पिता के बारे में।”

     

    आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “मेरे पापा?”

     

    “हां।”

     

    “क्या हुआ था उन्हें?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “मुझे अभी पूरी बात नहीं पता।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “लेकिन तुम कुछ जानते हो।”

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “इतना जानता हूं कि तुम्हारे पापा की मौत सिर्फ एक हादसा नहीं थी।”

     

    आरोही जैसे पत्थर की मूर्ति बन गई।

     

    “क्या?”

     

    “मुझे शक है कि उनकी मौत के पीछे वही लोग हैं जो आज हमें धमका रहे हैं।”

     

    आरोही ने अपना सिर पकड़ लिया।

     

    “नहीं…”

     

    “आरोही, मेरी बात सुनो।”

     

    “नहीं!”

     

    वह पीछे हट गई।

     

    “मेरी मां ने हमेशा कहा था कि वो हादसा था।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “हो सकता है उन्हें भी पूरी सच्चाई न पता हो।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू गिरने लगे।

     

    “तो इतने सालों से… मैं जिस सच को मानती आई… वो झूठ था?”

     

    आरव उसके पास आया।

     

    “मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्यों?”

     

    आरव ने बिना सोचे जवाब दिया,

     

    “क्योंकि अब तुम सिर्फ मेरी दोस्त नहीं हो।”

     

    आरोही की सांस रुक गई।

     

    “तो क्या हूं?”

     

    आरव कुछ पल उसकी आंखों में देखता रहा।

     

    उसके पास जवाब था।

     

    लेकिन शब्द नहीं थे।

     

    वह बस इतना कह पाया “तुम… मेरे लिए बहुत खास हो।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू थे, लेकिन होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “बस खास?”

     

    आरव भी मुस्कुरा दिया।

     

    “शायद उससे भी ज्यादा।”

     

    दोनों के बीच कुछ पल की खामोशी छा गई।

     

    इस बार वह खामोशी अजीब नहीं थी।

     

    उसमें एक नया एहसास था।

     

    एक ऐसा एहसास जिसे दोनों महसूस कर रहे थे…

     

    लेकिन कोई नाम नहीं दे रहा था।

     

    उसी रात आरोही घर पहुंची तो उसकी मां ड्राइंग रूम में बैठी थीं।

     

    आरोही को देखते ही उन्होंने पूछा,

     

    “कहां थी?”

     

    “झील के पास।”

     

    मां का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    “किसके साथ?”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “आरव के साथ।”

     

    मां के हाथ से चाय का कप लगभग गिर गया।

     

    “आरव?”

     

    “हां।”

     

    “उससे दूर रहो।”

     

    आरोही चौंक गई।

     

    “आप भी यही क्यों कह रही हैं?”

     

    मां की आंखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।

     

    “क्योंकि मैं उसे जानती हूं।”

     

    “कैसे?”

     

    मां चुप हो गईं।

     

    आरोही उनके पास आकर बैठ गई।

     

    “मां, सच बताइए।”

     

    मां ने उसकी तरफ देखा।

     

    उनकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “आरव के परिवार की वजह से ही तुम्हारे पापा की मौत हुई थी।”

     

    आरोही जैसे सुनकर जम गई।

     

    “क्या?”

     

    मां ने कांपती आवाज में कहा,

     

    “तुम्हें उससे दूर रहना होगा।”

     

    आरोही के हाथ कांपने लगे।

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    मां ने सिर्फ इतना कहा “क्योंकि अगर तुम्हें पता चल गया कि तुम्हारे पापा और आरव के परिवार के बीच क्या हुआ था… तो तुम खुद उससे नफरत करने लगोगी।”

     

    आरोही की आंखों के सामने आरव का चेहरा घूमने लगा।

     

    उसकी मुस्कान…

     

    उसकी बातें…

     

    उसका हाथ पकड़कर कहना “मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

     

    और अब…

     

    उसके पिता की मौत का संबंध उसी परिवार से था।

     

    आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    उसने खुद से पूछा “क्या मैं आरव से प्यार करने लगी हूं?”

     

    और इस सवाल का जवाब…

     

    उसके दिल ने बिना किसी झिझक के दे दिया।

     

    “हां।”

     

    लेकिन अब एक नई मुश्किल सामने थी।

     

    जिस इंसान से उसका दिल प्यार करने लगा था… शायद उसी के परिवार ने उसके पिता को उससे छीन लिया था।

     

    जारी रहेगा…

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 3

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 3

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    तेरी मेरी दास्तान

     

    एपिसोड 3 — वो लड़की कुछ अलग थी

     

    रात काफी गहरा चुकी थी।

     

    शहर की सड़कों पर गाड़ियों की आवाजाही कम हो गई थी, लेकिन आरव के कमरे की बालकनी में अभी भी रोशनी जल रही थी।

     

    वह रेलिंग के सहारे खड़ा था।

     

    हाथ में मोबाइल था और स्क्रीन पर वही अनजान नंबर मौजूद था, जिससे कुछ देर पहले उसे धमकी भरी कॉल आई थी।

     

    “तुम्हें उस लड़की से दूर रहना होगा।”

     

    आरव के दिमाग में बार-बार वही आवाज गूंज रही थी।

     

    उसने नंबर पर दोबारा कॉल किया।

     

    फोन बंद था।

     

    आरव ने जबड़े भींच लिए।

     

    “आखिर कौन हो तुम?”

     

    उसने खुद से कहा।

     

    तभी पीछे से कबीर की आवाज आई।

     

    “किससे बात कर रहा है?”

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    कबीर कमरे के दरवाजे पर खड़ा था।

     

    “कोई नहीं।”

     

    कबीर उसकी तरफ बढ़ा।

     

    “आरव, मैं तुझे बचपन से जानता हूं। जब तू परेशान होता है ना, तो ‘कोई नहीं’ बोलता है।”

     

    आरव चुप रहा।

     

    कबीर ने उसके हाथ से मोबाइल लिया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव ने सारी बात बता दी।

     

    कबीर का चेहरा भी गंभीर हो गया।

     

    “आरोही को जानता है वो?”

     

    “उसने उसका नाम लिया था।”

     

    “फिर मामला साधारण नहीं है।”

     

    आरव ने गहरी सांस ली।

     

    “मुझे भी यही लग रहा है।”

     

    “आरोही के बारे में कुछ पता किया?”

     

    “नहीं।”

     

    “करना चाहिए।”

     

    आरव ने तुरंत कहा,

     

    “नहीं।”

     

    कबीर ने हैरानी से पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर उसने कुछ छुपाया है तो शायद उसकी कोई वजह होगी।”

     

    कबीर ने उसे देखा।

     

    “तुझे उसकी इतनी चिंता कब से होने लगी?”

     

    आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    कबीर मुस्कुराया।

     

    “भाई… तू फंस चुका है।”

     

    आरव ने उसे घूरकर देखा।

     

    “बकवास बंद कर।”

     

    “ठीक है।”

     

    कबीर हंसते हुए बोला,

     

    “लेकिन एक बात याद रखना—जिस लड़की के आने से तेरे चेहरे पर महीनों बाद मुस्कान आई है, उसे खोने की गलती मत करना।”

     

    आरव ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    “मैं उसे खोना नहीं चाहता।”

     

    कबीर की मुस्कान गायब हो गई।

     

    आरव खुद अपनी बात सुनकर कुछ पल के लिए चुप हो गया।

     

    उसे एहसास हुआ कि उसने पहली बार किसी के लिए ये शब्द कहे थे।

     

    मैं उसे खोना नहीं चाहता।

     

    अगली सुबह।

     

    आरोही ऑफिस पहुंची तो नैना पहले से उसका इंतजार कर रही थी।

     

    जैसे ही आरोही अपनी सीट पर बैठी, नैना उसके पास आ गई।

     

    “तो?”

     

    आरोही ने लैपटॉप खोला।

     

    “तो क्या?”

     

    “कल क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “झील गई थी?”

     

    आरोही ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

     

    “हां।”

     

    “आरव मिला?”

     

    “हां।”

     

    “फिर?”

     

    “कॉफी पी।”

     

    नैना की आंखें चमक उठीं।

     

    “अकेले?”

     

    “हां।”

     

    “और?”

     

    आरोही ने उसे घूरा।

     

    “और कुछ नहीं।”

     

    नैना ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “तुम्हारी आवाज बता रही है कि कुछ तो है।”

     

    “हम दोस्त बन गए।”

     

    “बस?”

     

    “बस।”

     

    “पक्का?”

     

    “हां।”

     

    नैना ने लंबी सांस ली।

     

    “चलो, कम से कम शुरुआत तो हुई।”

     

    आरोही ने भौंहें चढ़ाईं।

     

    “किसकी शुरुआत?”

     

    “दोस्ती की।”

     

    नैना ने आंख मारी।

     

    आरोही हंस पड़ी।

     

    लेकिन उसी समय उसके मोबाइल पर एक मैसेज आया।

     

    उसने स्क्रीन देखी।

     

    Unknown Number:

    “आरव से दूर रहो।”

     

    आरोही की मुस्कान तुरंत गायब हो गई।

     

    उसने मैसेज दोबारा पढ़ा।

     

    नैना ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरोही ने फोन लॉक कर दिया।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “किसका मैसेज था?”

     

    “कोई गलत नंबर होगा।”

     

    नैना ने उसे ध्यान से देखा।

     

    “तू ठीक है?”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    लेकिन उसके दिल में हलचल शुरू हो चुकी थी।

     

    उसे पहली बार डर लगा।

     

    कौन था ये इंसान?

     

    और उसे आरव के बारे में कैसे पता था?

     

    दोपहर के समय आरव की कंपनी में एक महत्वपूर्ण मीटिंग चल रही थी।

     

    कांच की बड़ी टेबल के आसपास कई लोग बैठे थे।

     

    आरव अपनी फाइल देख रहा था।

     

    लेकिन उसका ध्यान काम पर नहीं था।

     

    उसके सामने लैपटॉप पर एक ही सवाल घूम रहा था “आरोही को भी धमकी मिली होगी?”

     

    मीटिंग खत्म होते ही उसने अपना फोन उठाया और आरोही को कॉल किया।

     

    फोन बजता रहा।

     

    आरोही ने फोन नहीं उठाया।

     

    आरव ने दोबारा कॉल किया।

     

    फिर भी कोई जवाब नहीं।

     

    उसने मैसेज किया “सब ठीक है?”

     

    कुछ देर बाद जवाब आया “हां।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा “पक्का?”

     

    कुछ सेकंड बाद जवाब आया “हां, पक्का।”

     

    आरव ने फोन नीचे रख दिया।

     

    लेकिन उसका मन नहीं माना।

     

    उसे लग रहा था कि आरोही कुछ छुपा रही है।

     

    शाम को ऑफिस से निकलते समय आरोही पार्किंग में अपनी कार के पास पहुंची।

     

    उसने कार खोली।

     

    तभी पीछे से किसी ने कहा,

     

    “आरोही।”

     

    वह तुरंत पलटी।

     

    एक अनजान आदमी कुछ दूरी पर खड़ा था।

     

    काले कपड़े, काली टोपी और चेहरे पर मास्क।

     

    आरोही के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    वह आदमी कुछ कदम आगे बढ़ा।

     

    “तुम्हें मैसेज मिला था।”

     

    आरोही पीछे हट गई।

     

    “आपने किया था?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “बस इतना समझ लो कि आरव तुम्हारे लिए सही नहीं है।”

     

    आरोही ने हिम्मत जुटाकर पूछा,

     

    “आप आरव को कैसे जानते हैं?”

     

    वह आदमी मुस्कुराया।

     

    “आरव को मैं जितना जानता हूं… उतना शायद तुम कभी नहीं जान पाओगी।”

     

    आरोही का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

     

    “आप कहना क्या चाहते हैं?”

     

    “उससे दूर रहो।”

     

    “नहीं।”

     

    आदमी चौंका।

     

    आरोही ने पहली बार दृढ़ आवाज में कहा,

     

    “वो मेरा दोस्त है।”

     

    “दोस्त?”

     

    वह आदमी हंसा।

     

    “तुम्हें पता भी है वो कौन है?”

     

    “हां।”

     

    “नहीं। तुम कुछ नहीं जानती।”

     

    वह मुड़ा और वहां से जाने लगा।

     

    आरोही ने पीछे से पूछा,

     

    “रुकिए!”

     

    लेकिन वह बिना रुके आगे बढ़ता गया।

     

    कुछ ही सेकंड में वह पार्किंग से बाहर निकल गया।

     

    आरोही वहीं खड़ी रह गई।

     

    उसने तुरंत आरव को फोन किया।

     

    इस बार आरव ने पहली ही घंटी पर फोन उठा लिया।

     

    “हैलो?”

     

    आरोही की आवाज कांप रही थी।

     

    “आरव…”

     

    आरव तुरंत गंभीर हो गया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “मुझे… अभी किसी ने धमकी दी।”

     

    कुछ सेकंड तक आरव बिल्कुल चुप रहा।

     

    फिर उसकी आवाज आई,

     

    “तुम वहीं हो?”

     

    “हां।”

     

    “मेरी बात ध्यान से सुनो। कार में बैठो और तुरंत घर जाओ।”

     

    “लेकिन—”

     

    “आरोही!”

     

    उसकी आवाज में इतनी चिंता थी कि आरोही चुप हो गई।

     

    “हां।”

     

    “घर पहुंचकर मुझे कॉल करना।”

     

    “ठीक है।”

     

    करीब आधे घंटे बाद आरोही घर पहुंची।

     

    उसने जैसे ही कमरे का दरवाजा बंद किया, फोन पर आरव का कॉल आ गया।

     

    “पहुंच गई?”

     

    “हां।”

     

    “अकेली हो?”

     

    “मां घर पर हैं।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    “ठीक है।”

     

    आरोही कुछ देर चुप रही।

     

    फिर बोली,

     

    “आरव…”

     

    “हम्म?”

     

    “वो आदमी तुम्हारे बारे में कुछ कह रहा था।”

     

    आरव की आंखें बंद हो गईं।

     

    “क्या?”

     

    “उसने कहा कि तुम वो नहीं हो जो मैं समझ रही हूं।”

     

    आरव कुछ नहीं बोला।

     

    “सच क्या है?”

     

    लंबी खामोशी।

     

    आरोही की आवाज थोड़ी कांप गई।

     

    “आरव?”

     

    “हां।”

     

    “क्या तुम मुझसे कुछ छुपा रहे हो?”

     

    आरव ने आंखें खोलकर सामने देखा।

     

    वह जानता था कि एक दिन ये सवाल उससे जरूर पूछा जाएगा।

     

    लेकिन इतनी जल्दी?

     

    “हां।”

     

    आरोही का दिल बैठ गया।

     

    “क्या?”

     

    “मैंने तुमसे कुछ बातें नहीं बताईं।”

     

    “कौन सी?”

     

    “मेरी जिंदगी के बारे में।”

     

    आरोही चुप रही।

     

    आरव ने आगे कहा,

     

    “लेकिन मैं तुमसे झूठ नहीं बोलना चाहता।”

     

    “तो सच बताओ।”

     

    आरव ने गहरी सांस ली।

     

    “मैं सिर्फ एक साधारण बिजनेसमैन नहीं हूं।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “फिर?”

     

    “मेरी कंपनी के अलावा… मेरे परिवार का एक बहुत पुराना दुश्मन है।”

     

    “कौन?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    “तुम्हें नहीं पता?”

     

    “नहीं।”

     

    “और वो मुझे क्यों धमका रहा है?”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    कुछ सेकंड बाद उसने कहा,

     

    “क्योंकि शायद उसे लगता है कि तुम मेरे लिए खास हो।”

     

    आरोही का दिल एक पल को रुक-सा गया।

     

    “मैं… खास?”

     

    आरव ने महसूस किया कि उसके मुंह से क्या निकल गया था।

     

    वह तुरंत बोला,

     

    “मेरा मतलब… दोस्त के तौर पर।”

     

    आरोही के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

     

    “सिर्फ दोस्त?”

     

    आरव चुप।

     

    आरोही ने पहली बार उसे छेड़ा,

     

    “बोलिए।”

     

    “हां… फिलहाल।”

     

    “फिलहाल?”

     

    “हां।”

     

    आरोही की मुस्कान और गहरी हो गई।

     

    “ठीक है।”

     

    कुछ पल दोनों चुप रहे।

     

    फिर आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “आरव?”

     

    “हां?”

     

    “मुझे डर लग रहा है।”

     

    आरव का चेहरा नरम पड़ गया।

     

    “डरो मत।”

     

    “लेकिन”

     

    “जब तक मैं हूं, तुम्हें कुछ नहीं होगा।”

     

    आरोही की आंखें नम हो गईं।

     

    “इतना भरोसा है खुद पर?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “खुद पर नहीं।”

     

    “तो?”

     

    “तुम पर।”

     

    आरोही कुछ नहीं बोल पाई।

     

    उस रात पहली बार उसे लगा…

     

    कि शायद आरव सिर्फ उसका दोस्त नहीं रहा था।

     

    शायद उसके दिल में उसके लिए कुछ और बनने लगा था।

     

    अगली सुबह आरव अपने ऑफिस पहुंचा ही था कि उसके टेबल पर एक लिफाफा पड़ा मिला।

     

    उसने लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक फोटो थी।

     

    फोटो देखकर आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    वो उसकी और आरोही की थी।

     

    कल शाम की।

     

    जब दोनों कैफे में बैठे थे।

     

    फोटो के पीछे सिर्फ एक लाइन लिखी थी “अगली बार तस्वीर नहीं… कहानी बदलेगी।”

     

    आरव की मुट्ठी कस गई।

     

    उसी समय उसका फोन बजा।

     

    कबीर का फोन था।

     

    “आरव, तुरंत मेरे ऑफिस वाले कमरे में आ।”

     

    “क्यों?”

     

    कबीर की आवाज गंभीर थी।

     

    “मुझे आरोही के बारे में कुछ पता चला है।”

     

    आरव के कदम वहीं रुक गए।

     

    “क्या?”

     

    कबीर ने धीमे से कहा “उसका पूरा नाम आरोही शर्मा नहीं है।”

     

    आरव की आंखें सिकुड़ गईं।

     

    “क्या मतलब?”

     

    कबीर बोला,

     

    “उसके बारे में जो जानकारी हमें मिली है… उसके मुताबिक उसकी असली पहचान कुछ और है।”

     

    आरव ने फोटो को फिर से देखा।

     

    उसके चेहरे पर चिंता साफ थी।

     

    एक तरफ आरोही थी…

     

    दूसरी तरफ उसका रहस्यमयी अतीत।

     

    और अब पहली बार आरव को एहसास हुआ जिस लड़की को वह एक मासूम, शांत और उदास लड़की समझ रहा था… शायद उसकी कहानी भी उतनी ही रहस्यमयी थी जितनी उसकी अपनी।

     

    लेकिन इस राज की सबसे बड़ी कीमत…

     

    शायद दोनों को अपने प्यार से चुकानी थी।

     

    जारी रहेगा…

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 2

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 2

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

     

    एपिसोड 2 — अजनबी से दोस्ती तक

     

    सुबह की हल्की धूप खिड़की के पर्दों से होते हुए कमरे में दाखिल हो रही थी।

     

    आरोही अभी तक अपने बिस्तर पर बैठी अपनी डायरी को देख रही थी।

     

    रात में उसने जो कुछ लिखा था, वो बार-बार उसकी आंखों के सामने घूम रहा था।

     

    “आज एक अजनबी मिला। नाम आरव।”

     

    आरोही ने डायरी बंद की और खुद से बोली,

     

    “पता नहीं मैं भी ना… किसी अजनबी के बारे में इतनी क्यों सोच रही हूं?”

     

    तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    “आरोही, उठ गई बेटा?”

     

    मां की आवाज सुनकर आरोही ने जल्दी से डायरी तकिए के नीचे रख दी।

     

    “हां मां, उठ गई।”

     

    दरवाजा खुला और उसकी मां कमरे में आ गईं।

     

    “आज ऑफिस नहीं जाना है क्या?”

     

    “जाना है मां।”

     

    “तो फिर इतनी देर से यहां बैठी क्या कर रही हो?”

     

    आरोही ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “कुछ नहीं मां।”

     

    मां ने उसे ध्यान से देखा।

     

    “कुछ नहीं?”

     

    “हां।”

     

    “चेहरा तो कुछ और ही बता रहा है।”

     

    आरोही का दिल एक पल के लिए धड़क उठा।

     

    “मां… आप भी ना!”

     

    मां मुस्कुरा दीं।

     

    “अच्छा चल, जल्दी तैयार हो जा। नाश्ता लगा दिया है।”

     

    मां के जाते ही आरोही ने राहत की सांस ली।

     

    उसने फिर तकिए के नीचे से डायरी निकाली।

     

    कुछ सेकंड उसे देखा और फिर बैग में रख लिया।

     

    पता नहीं क्यों…

     

    आज उसे लग रहा था कि शायद वो झील के किनारे फिर जाएगी।

     

    लेकिन उसने खुद को समझाया “नहीं! मैं सिर्फ कल की वजह से वहां नहीं जाने वाली।”

     

    उधर दूसरी तरफ…

     

    आरव अपने कमरे की बालकनी में खड़ा कॉफी पी रहा था।

     

    उसके हाथ में मोबाइल था।

     

    स्क्रीन पर उसके दोस्त कबीर का नाम चमक रहा था।

     

    कबीर ने वीडियो कॉल किया।

     

    आरव ने कॉल उठाते ही कहा,

     

    “बोल।”

     

    दूसरी तरफ से कबीर की आवाज आई,

     

    “भाई, आज ऑफिस आ रहा है या फिर अपनी नई मोहब्बत के साथ झील किनारे बैठने का प्लान है?”

     

    आरव ने भौंहें चढ़ाईं।

     

    “कौन सी मोहब्बत?”

     

    कबीर जोर से हंसा।

     

    “कल जिस लड़की से तू मिला था।”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “वो मोहब्बत नहीं है।”

     

    “अच्छा?”

     

    “हां।”

     

    “तो फिर उसका नाम याद है?”

     

    आरव चुप।

     

    कबीर ने तुरंत कहा,

     

    “समझ गया।”

     

    “क्या समझ गया?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “बोल।”

     

    “तुझे लड़की पसंद आ गई।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “ऐसा कुछ नहीं है।”

     

    “तो उसका नाम बता।”

     

    आरव के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    “आरोही।”

     

    कबीर कुछ सेकंड चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “भाई, तू गया।”

     

    आरव हंस पड़ा।

     

    “पागल है क्या?”

     

    “नहीं। लेकिन तेरे चेहरे पर जो मुस्कान आई है, वो मैंने पिछले कई महीनों से नहीं देखी।”

     

    आरव की मुस्कान धीरे-धीरे फीकी पड़ गई।

     

    कबीर ने भी उसकी खामोशी महसूस कर ली।

     

    “आरव…”

     

    “हम्म।”

     

    “सब ठीक है?”

     

    आरव ने सामने आसमान की तरफ देखा।

     

    “हां।”

     

    “पक्का?”

     

    आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    कबीर समझ गया।

     

    वो जानता था कि आरव के अतीत में कुछ ऐसा था जिसके बारे में आरव बात नहीं करना चाहता था।

     

    इसलिए उसने बात बदल दी।

     

    “चल, ऑफिस निकल। आज मीटिंग है।”

     

    “हां।”

     

    कॉल कट हो गई।

     

    आरव ने मोबाइल टेबल पर रखा।

     

    फिर कुछ देर बाद खुद से बोला “आरोही…”

     

    और उसके चेहरे पर फिर वही हल्की मुस्कान लौट आई।

     

    —

     

    दोपहर के करीब आरोही ऑफिस पहुंची।

     

    लेकिन आज उसका मन काम में बिल्कुल नहीं लग रहा था।

     

    कंप्यूटर स्क्रीन पर फाइल खुली थी।

     

    लेकिन उसकी नजर बार-बार स्क्रीन से हटकर खिड़की के बाहर चली जाती।

     

    उसकी दोस्त नैना काफी देर से उसे देख रही थी।

     

    आखिर उसने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरोही ने चौंककर कहा,

     

    “क्या?”

     

    “तू सुबह से मुस्कुरा रही है।”

     

    “मैं?”

     

    “हां, तू।”

     

    आरोही ने तुरंत अपना चेहरा सामान्य किया।

     

    “ऐसा कुछ नहीं है।”

     

    नैना उसकी कुर्सी के पास आकर खड़ी हो गई।

     

    “कुछ तो हुआ है।”

     

    “कुछ नहीं हुआ।”

     

    “कल शाम कहां गई थी?”

     

    आरोही चुप हो गई।

     

    नैना ने आंखें छोटी करते हुए पूछा,

     

    “झील के पास?”

     

    आरोही ने धीरे से सिर हिला दिया।

     

    “हां।”

     

    “और?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “वहां कोई मिला?”

     

    आरोही ने फाइल उठाकर पढ़ने का नाटक किया।

     

    “नहीं।”

     

    नैना मुस्कुराई।

     

    “झूठ बोलते समय तू बहुत खराब एक्टिंग करती है।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “ठीक है, एक लड़का मिला था।”

     

    “ओहो!”

     

    नैना की आवाज इतनी तेज थी कि आसपास बैठे लोग उनकी तरफ देखने लगे।

     

    आरोही ने तुरंत कहा,

     

    “धीरे बोल!”

     

    नैना कुर्सी खींचकर उसके पास बैठ गई।

     

    “नाम?”

     

    “आरव।”

     

    “क्या करता है?”

     

    “पता नहीं।”

     

    “कहां रहता है?”

     

    “पता नहीं।”

     

    “नंबर?”

     

    आरोही चुप।

     

    नैना ने माथे पर हाथ रख लिया।

     

    “मतलब तुझे उसका सिर्फ नाम पता है?”

     

    “हां।”

     

    “और तू उसके बारे में सोच रही है?”

     

    आरोही ने तुरंत कहा,

     

    “मैं उसके बारे में नहीं सोच रही।”

     

    नैना मुस्कुराई।

     

    “अच्छा।”

     

    “सच में।”

     

    “ठीक है। नहीं सोच रही।”

     

    कुछ पल बाद नैना ने पूछा,

     

    “फिर आज झील के पास जाने का प्लान किसका है?”

     

    आरोही ने चौंककर उसकी तरफ देखा।

     

    “किसने कहा मैं जा रही हूं?”

     

    “तेरी आंखों ने।”

     

    आरोही कुछ नहीं बोली।

     

    शाम हुई।

     

    ऑफिस से निकलते समय आरोही काफी देर तक अपनी कार के पास खड़ी रही।

     

    उसने कार का दरवाजा खोला।

     

    फिर बंद कर दिया।

     

    उसने खुद से कहा,

     

    “घर जाना है।”

     

    कुछ सेकंड बाद उसने मोबाइल निकाला।

     

    समय देखा।

     

    फिर झील की तरफ जाने वाली सड़क को देखा।

     

    “बस पांच मिनट।”

     

    उसने खुद को समझाया।

     

    “मैं सिर्फ झील देखने जा रही हूं।”

     

    और फिर कार उसी रास्ते पर चल पड़ी।

     

    उधर आरव भी उसी झील के पास पहुंच चुका था।

     

    वह खुद से भी यही कह रहा था कि वह वहां सिर्फ इसलिए आया है क्योंकि उसे शाम का मौसम पसंद है।

     

    लेकिन सच कुछ और था।

     

    वह किसी का इंतजार कर रहा था।

     

    वह लड़की…

     

    जिसका नाम कल ही जाना था।

     

    आरोही।

     

    आरव जेट्टी के पास खड़ा झील को देख रहा था।

     

    तभी पीछे से किसी ने कहा,

     

    “आप यहां क्या कर रहे हैं?”

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    आरोही सामने खड़ी थी।

     

    सफेद कुर्ती और हल्के नीले रंग की चुन्नी हवा में लहरा रही थी।

     

    आरव के चेहरे पर तुरंत मुस्कान आ गई।

     

    “मुझे लगा था आप नहीं आएंगी।”

     

    आरोही ने तुरंत पूछा,

     

    “आप मेरा इंतजार कर रहे थे?”

     

    “नहीं।”

     

    “तो?”

     

    “मैं झील का इंतजार कर रहा था।”

     

    आरोही ने आंखें घुमाईं।

     

    “बहुत मजाक करते हैं आप।”

     

    “आप आई हैं, तो मजाक तो बनता है।”

     

    आरोही ने मुस्कुराकर पूछा,

     

    “आप रोज यहां आते हैं?”

     

    “नहीं।”

     

    “तो आज क्यों?”

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “शायद किस्मत ने बुलाया।”

     

    आरोही ने नजरें झुका लीं।

     

    “आप हर बात में किस्मत को क्यों ले आते हैं?”

     

    “क्योंकि कुछ चीजें हमारे हाथ में नहीं होतीं।”

     

    दोनों कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर आरव ने पूछा,

     

    “कॉफी?”

     

    आरोही ने उसे देखा।

     

    “क्या?”

     

    “कॉफी पीएंगी?”

     

    “आप हर लड़की को ऐसे कॉफी के लिए बुलाते हैं?”

     

    आरव ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “तो मुझे क्यों?”

     

    “क्योंकि आप बाकी लड़कियों जैसी नहीं हैं।”

     

    आरोही ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “ये लाइन आपने कल भी मारी थी।”

     

    “काम कर गई थी।”

     

    “किसने कहा?”

     

    “आप आज फिर यहां आई हैं।”

     

    आरोही हंस पड़ी।

     

    दोनों झील के पास बने छोटे-से कैफे की तरफ चल पड़े।

     

    कैफे बहुत छोटा था।

     

    लकड़ी की मेजें थीं और खिड़की से झील का खूबसूरत नजारा दिखाई देता था।

     

    दोनों सामने-सामने बैठे।

     

    वेटर ने पूछा,

     

    “मैडम, क्या लेंगी?”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “कॉफी।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मेरे लिए भी।”

     

    वेटर चला गया।

     

    कुछ पल खामोशी रही।

     

    फिर आरव ने पूछा,

     

    “आप क्या करती हैं?”

     

    “एक कंपनी में काम करती हूं।”

     

    “मतलब?”

     

    “मार्केटिंग।”

     

    “अच्छा।”

     

    “और आप?”

     

    आरव थोड़ा मुस्कुराया।

     

    “मैं भी काम करता हूं।”

     

    आरोही ने उसे घूरा।

     

    “ये कौन सा जवाब है?”

     

    “सही जवाब है।”

     

    “किस तरह का काम?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “बिजनेस।”

     

    “किस चीज का?”

     

    “कई चीजों का।”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “आप बहुत रहस्यमयी हैं।”

     

    “और आप बहुत सवाल करती हैं।”

     

    “क्योंकि मैं अजनबियों पर भरोसा नहीं करती।”

     

    आरव गंभीर हो गया।

     

    “मत कीजिए।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या?”

     

    “मुझ पर भी भरोसा मत कीजिए।”

     

    “क्यों?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर धीमे से बोला,

     

    “क्योंकि भरोसा बहुत खूबसूरत चीज है… लेकिन टूट जाए तो इंसान अंदर से बदल जाता है।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में कुछ देखा।

     

    शायद दर्द।

     

    उसने धीरे से पूछा,

     

    “आपका भरोसा टूटा है?”

     

    आरव ने नजरें झुका लीं।

     

    “कभी।”

     

    आरोही ने आगे सवाल नहीं किया।

     

    वेटर कॉफी रख गया।

     

    दोनों चुपचाप कॉफी पीने लगे।

     

    कुछ देर बाद आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “अगर कभी मन हो तो बता सकते हैं।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या?”

     

    “जिसने आपका भरोसा तोड़ा… उसके बारे में।”

     

    आरव कुछ सेकंड उसे देखता रहा।

     

    फिर हल्की मुस्कान के साथ बोला,

     

    “शायद किसी दिन।”

     

    आरोही ने सिर हिला दिया।

     

    “ठीक है।”

     

    उस शाम दोनों ने बहुत सारी बातें कीं।

     

    पसंद-नापसंद से लेकर बचपन की यादों तक।

     

    आरव को पता चला कि आरोही को बारिश बहुत पसंद थी।

     

    आरोही को पता चला कि आरव को पहाड़ पसंद थे।

     

    आरोही को किताबें पढ़ना अच्छा लगता था।

     

    आरव को रात में लंबी ड्राइव करना।

     

    दोनों की पसंद अलग थी।

     

    फिर भी बातचीत खत्म नहीं हो रही थी।

     

    जब कैफे बंद होने का समय हुआ, तो आरोही उठ खड़ी हुई।

     

    “मुझे जाना चाहिए।”

     

    आरव भी खड़ा हो गया।

     

    “कल मिलें?”

     

    आरोही ने कुछ नहीं कहा।

     

    “शायद?”

     

    आरोही ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “आपको ‘शायद’ बहुत पसंद है ना?”

     

    “हां।”

     

    “तो जवाब भी वही है।”

     

    “मतलब?”

     

    “शायद।”

     

    आरोही वहां से जाने लगी।

     

    आरव ने आवाज दी,

     

    “आरोही!”

     

    वह पलटी।

     

    आरव ने कहा,

     

    “दोस्ती करेंगे?”

     

    आरोही कुछ पल उसे देखती रही।

     

    फिर मुस्कुराकर बोली,

     

    “सिर्फ दोस्ती।”

     

    आरव ने हाथ आगे बढ़ाया।

     

    “सिर्फ दोस्ती।”

     

    आरोही ने अपना हाथ उसके हाथ में रख दिया।

     

    उस पल दोनों के बीच कुछ नहीं था।

     

    न कोई प्यार।

     

    न कोई रिश्ता।

     

    सिर्फ एक नई दोस्ती की शुरुआत।

     

    लेकिन दोनों में से कोई नहीं जानता था…

     

    कि यही दोस्ती धीरे-धीरे उनके दिलों की सबसे खूबसूरत जरूरत बनने वाली थी।

     

    आरोही ने हाथ पीछे खींच लिया।

     

    “अब चलती हूं।”

     

    “ठीक है।”

     

    वह कार की तरफ चली गई।

     

    आरव वहीं खड़ा उसे देखता रहा।

     

    कार दूर निकल गई।

     

    आरव ने अपनी हथेली की तरफ देखा।

     

    जहां कुछ पल पहले आरोही का हाथ था।

     

    उसने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “सिर्फ दोस्ती…”

     

    फिर धीरे से बोला,

     

    “देखते हैं, मैडम… ये दोस्ती कितनी दूर तक जाती है।”

     

    कार चलाते हुए आरोही के चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    उसने रेडियो बंद कर दिया।

     

    आज उसे किसी गाने की जरूरत नहीं थी।

     

    उसके दिमाग में बस आरव की बातें घूम रही थीं।

     

    उसकी मुस्कान…

     

    उसकी आंखों में छिपा दर्द…

     

    और जाते समय उसका वो सवाल “दोस्ती करेंगे?”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “हां आरव… दोस्ती।”

     

    लेकिन दिल ने चुपके से एक और शब्द जोड़ दिया “शायद…”

     

    उसी वक्त आरव के मोबाइल पर एक अनजान नंबर से कॉल आया।

     

    उसने कार किनारे लगाई और कॉल उठाया।

     

    “हैलो?”

     

    दूसरी तरफ कुछ सेकंड खामोशी रही।

     

    फिर एक भारी आवाज आई “तुम्हें उस लड़की से दूर रहना होगा।”

     

    आरव के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “कौन?”

     

    “आरोही।”

     

    आरव की आंखें सिकुड़ गईं।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    सामने से सिर्फ इतना कहा गया “अगर तुमने उससे दोस्ती जारी रखी… तो इस बार नुकसान सिर्फ तुम्हारा नहीं होगा।”

     

    कॉल कट हो गई।

     

    आरव कुछ सेकंड मोबाइल को देखता रहा।

     

    फिर उसकी नजर उस सड़क पर चली गई जिस तरफ आरोही की कार गई थी।

     

    उसके चेहरे पर पहली बार चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

     

    उसे नहीं पता था कि आरोही के अतीत में क्या छिपा था।

     

    और उसे ये भी नहीं पता था…

     

    कि उनकी नई-नई शुरू हुई दोस्ती के रास्ते में कोई ऐसा इंसान खड़ा था…

     

    जो दोनों को एक-दूसरे से दूर करने के लिए कुछ भी कर सकता था।

     

    जारी रहेगा…

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड -1

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड -1

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एपिसोड 1 — पहली मुलाकात

    शाम का वक्त था।

    सूरज धीरे-धीरे झील के उस पार डूब रहा था। आसमान पर नारंगी और गुलाबी रंग ऐसे बिखरे हुए थे, जैसे किसी चित्रकार ने अपनी पूरी जिंदगी की खूबसूरत यादें एक ही कैनवास पर उतार दी हों।

     

    झील का पानी बिल्कुल शांत था।

    हल्की-सी ठंडी हवा चल रही थी और हवा के साथ पेड़ों से टूटकर कुछ पीले पत्ते उड़ते हुए पानी की सतह पर आकर ठहर जाते।

     

    झील के किनारे बनी लकड़ी की छोटी-सी जेट्टी पर एक लड़की अकेली खड़ी थी।

     

    उसका नाम था आरोही।

    सफेद रंग की लंबी ड्रेस हवा में लहरा रही थी। उसके खुले बाल बार-बार उसके चेहरे पर आ रहे थे और वह उन्हें कान के पीछे करते हुए सामने डूबते सूरज को देख रही थी।

    उसकी आंखों में एक अजीब-सी उदासी थी।

    ऐसी उदासी जिसे देखकर कोई भी समझ सकता था कि लड़की मुस्कुराना जानती जरूर है, लेकिन पिछले कुछ समय से उसने दिल से मुस्कुराना भूल दिया है।

    आरोही ने अपनी आंखें बंद कीं।

    “काश… जिंदगी भी इस झील की तरह शांत होती।”

    उसने धीरे से कहा।

    तभी पीछे से किसी की आवाज आई।

    “अगर जिंदगी झील जैसी शांत हो गई ना, तो शायद जिंदगी कहलाएगी ही नहीं।”

    आरोही ने चौंककर पीछे देखा।

    कुछ दूरी पर एक लड़का खड़ा था।

    सफेद शर्ट की आस्तीनें उसकी कोहनियों तक मुड़ी हुई थीं। काले बाल हवा में हल्के-से बिखरे हुए थे। चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी और आंखों में एक अजीब-सा आत्मविश्वास।

    उसका नाम था आरव।

    आरोही ने उसे कुछ पल देखा, फिर भौंहें सिकोड़ लीं।

    “आप मेरी बातें सुन रहे थे?”

    आरव ने मुस्कुराते हुए कहा,

    “नहीं।”

    “तो फिर?”

    “मैंने आपकी बातें सुनी ही नहीं।”

    आरोही ने हैरानी से उसे देखा।

    “अभी आपने जो कहा…”

    “वो मैंने नहीं कहा था।”

    आरोही कुछ समझ नहीं पाई।

    आरव हंस पड़ा।

    “आपने कहा था जिंदगी झील जैसी शांत होनी चाहिए। मैंने बस उसके जवाब में अपनी राय दी।”

    आरोही ने आंखें घुमाईं।

    “आप हर अजनबी को ऐसे जवाब देते हैं?”

    “नहीं।”

    “तो मुझे क्यों?”

    आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

    फिर उसने बहुत सहजता से कहा,

    “शायद इसलिए क्योंकि आप बाकी अजनबियों जैसी नहीं लगीं।”

    आरोही कुछ बोल नहीं पाई।

    उसने तुरंत अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

    “अजीब इंसान हैं आप।”

    “धन्यवाद।”

    “मैंने तारीफ नहीं की।”

    “मुझे पता है।”

    आरव की मुस्कान और गहरी हो गई।

    आरोही चाहकर भी अपनी मुस्कान नहीं रोक पाई।

    लेकिन अगले ही पल उसने खुद को संभाल लिया।

    “आपको हर बात में मजाक सूझता है?”

    “और आपको हर बात में नाराजगी।”

    “मैं नाराज नहीं हूं।”

    “तो मुस्कुरा क्यों नहीं रही?”

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

    “क्योंकि हर वक्त मुस्कुराना जरूरी नहीं होता।”

    आरव की मुस्कान अचानक गायब हो गई।

    उसने पहली बार आरोही की आंखों को ध्यान से देखा।

    वहां सचमुच कोई गहरी तकलीफ थी।

    “सही कहा।”

    आरव ने धीमी आवाज में कहा।

    “हर इंसान जो मुस्कुराता है, जरूरी नहीं कि वो खुश भी हो।”

    आरोही ने उसे देखा।

    इस बार उसकी आंखों में नाराजगी नहीं थी।

    बस एक सवाल था।

    “आपको कैसे पता?”

    आरव कुछ सेकंड चुप रहा।

    फिर झील की तरफ देखते हुए बोला,

    “क्योंकि मैं भी हमेशा खुश नहीं रहता।”

    आरोही पहली बार चुप हो गई।

    दोनों के बीच कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।

    अजीब बात थी।

    दोनों एक-दूसरे को जानते तक नहीं थे।

    फिर भी उस खामोशी में एक अजीब-सी सहजता थी।

    जैसे दोनों के बीच कोई पुराना रिश्ता हो।

    जैसे दोनों की खामोशियां एक-दूसरे की भाषा समझती हों।

    तभी अचानक तेज हवा चली।

    आरोही के हाथ में पकड़ी डायरी नीचे गिर गई।

    “ओह!”

    वह डायरी उठाने के लिए झुकी ही थी कि हवा के झोंके से उसके कुछ पन्ने उड़ गए।

    “मेरी डायरी!”

    आरोही घबराकर पन्नों के पीछे भागी।

    आरव भी तुरंत उसकी मदद करने लगा।

    एक पन्ना उड़ते-उड़ते झील के किनारे बने पेड़ की शाखा में अटक गया।

    आरव ने उसे निकाल लिया।

    लेकिन जैसे ही उसने पन्ने को देखा, उसकी नजर उस पर लिखी कुछ पंक्तियों पर पड़ी।

    “कुछ लोग हमारी जिंदगी में देर से आते हैं, लेकिन आते ही हमारी पूरी जिंदगी बदल देते हैं।”

    आरव ने पन्ना आरोही की तरफ बढ़ाते हुए कहा,

    “शायद ये पन्ना सच कहता है।”

    आरोही ने पन्ना उसके हाथ से लिया।

    “क्या?”

    “कुछ लोग देर से आते हैं…”

    आरव मुस्कुराया।

    “लेकिन जिंदगी बदल देते हैं।”

    आरोही ने उसे घूरा।

    “आपको हर चीज में डायलॉग क्यों दिखता है?”

    “क्योंकि जिंदगी खुद एक कहानी है।”

    “और आप?”

    आरव ने कुछ पल सोचा।

    “शायद अभी तक अपनी कहानी का हीरो बनने की कोशिश कर रहा हूं।”

    आरोही हंस पड़ी।

    “बहुत घमंड है आपको।”

    “और आपको?”

    “मुझे क्या?”

    “आप अपनी कहानी की हीरोइन हैं?”

    आरोही कुछ बोलती, उससे पहले उसका फोन बज उठा।

    उसने स्क्रीन पर नजर डाली।

    उसके चेहरे की मुस्कान तुरंत गायब हो गई।

    “मां का फोन है।”

    उसने फोन उठाया।

    “हां मां… मैं बस थोड़ी देर में घर आ रही हूं।”

    कुछ देर सुनने के बाद उसने कहा,

    “नहीं मां, मैं ठीक हूं।”

    फिर फोन काट दिया।

    आरव ने पूछा,

    “सब ठीक है?”

    आरोही ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

    “हां।”

    “पक्का?”

    “आपको हर बात पर शक होता है?”

    “नहीं। बस आपकी आंखें आपकी बातों पर भरोसा नहीं करतीं।”

    आरोही उसकी तरफ देखती रह गई।

    कोई पहली बार उससे इतनी आसानी से उसके दिल की बात कैसे समझ सकता था?

    उसने धीरे से कहा,

    “आप अजीब हैं।”

    आरव ने मुस्कुराकर जवाब दिया,

    “और आप खूबसूरत हैं।”

    आरोही के चेहरे पर अचानक शर्म उतर आई।

    “क्या?”

    आरव ने तुरंत बात संभाल ली।

    “मेरा मतलब… आपकी डायरी की लिखावट खूबसूरत है।”

    आरोही ने उसे घूरा।

    “झूठ बोल रहे हैं।”

    “थोड़ा।”

    दोनों हंस पड़े।

    शाम अब रात में बदलने लगी थी।

    आरोही ने अपनी डायरी बैग में रखी।

    “मुझे जाना चाहिए।”

    “ठीक है।”

    वह कुछ कदम आगे बढ़ी।

    फिर अचानक रुक गई।

    पीछे मुड़कर आरव को देखा।

    आरव अभी भी वहीं खड़ा था।

    आरोही ने पूछा,

    “आपका नाम क्या है?”

    आरव के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

    “आपने आखिर पूछ ही लिया।”

    “बस नाम पूछा है।”

    “आरव।”

    “आरोही।”

    आरव ने उसका नाम दोहराया।

    “आरोही…”

    पता नहीं क्यों, अपने ही नाम को उसकी आवाज में सुनकर आरोही के दिल की धड़कन कुछ तेज हो गई।

    उसने नजरें झुका लीं।

    “ठीक है… चलती हूं।”

    “फिर मिलेंगे?”

    आरोही ने बिना पीछे देखे कहा,

    “शायद।”

    आरव मुस्कुराया।

    “मैं इस ‘शायद’ को ‘हां’ मान लेता हूं।”

    आरोही ने पीछे मुड़कर देखा।

    “इतना भरोसा?”

    “आप पर नहीं।”

    “तो?”

    आरव ने झील की तरफ देखते हुए कहा,

    “किस्मत पर।”

    आरोही बिना कुछ बोले वहां से चली गई।

    आरव उसे जाते हुए देखता रहा।

    कुछ ही देर में वह रास्ते के मोड़ के पीछे गायब हो गई।

    लेकिन उसके जाने के बाद भी आरव की नजर उसी रास्ते पर टिकी रही।

    उसने खुद से कहा,

    “अजीब लड़की है।”

    फिर हल्के से मुस्कुराया।

    “लेकिन अच्छी है।”

    उधर घर जाते हुए आरोही बार-बार पीछे मुड़कर देख रही थी।

    वह खुद भी नहीं समझ पा रही थी कि वह ऐसा क्यों कर रही है।

    आज से पहले उसने किसी अजनबी से इतनी बातें नहीं की थीं।

    और सबसे अजीब बात…

    उसे उस अजनबी की बातें बुरी भी नहीं लगी थीं।

    उसने चलते-चलते अपनी डायरी निकाली।

    एक खाली पन्ना खोला।

    कुछ पल तक कलम उसके हाथ में रुकी रही।

    फिर उसने लिखा—

    “आज एक अजनबी मिला।

    नाम—आरव।

    पता नहीं क्यों, उसकी बातें दिल में उतर गईं।

    शायद वो सिर्फ एक अजनबी था…

    या शायद मेरी कहानी का कोई नया किरदार।”

    आरोही ने डायरी बंद कर दी।

    लेकिन उसे नहीं पता था…

    कि आज की ये छोटी-सी मुलाकात आने वाले दिनों में उसकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत और सबसे दर्दनाक हिस्सा बनने वाली थी।

    क्योंकि कुछ मुलाकातें सिर्फ मुलाकातें नहीं होतीं।

    वो किस्मत का पहला पन्ना होती हैं।

    और आरोही की जिंदगी में…

    आरव उस पन्ने पर लिखा पहला नाम था।

    जारी रहेगा…. 

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • राम जैसा पति या रावण जैसा राक्षस

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

     

    सांझ के धुंधलके में जब रसोई की खिड़की से छनकर पीली धूप स्लैब पर रखी मसालदानी पर पड़ती, तो सुमित्रा जी अक्सर एक लंबी सांस लेकर रुक जातीं। उनके हाथ में सब्जी काटने वाला हसिया रुक जाता और वे तन्मयता से सोचने लगतीं आखिर एक औरत के जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता किसमें है? क्या वह आदर्श की उस मूरत में है जिसे युगों से ‘राम’ कहा गया है, या फिर उस शक्तिशाली, प्रतापी और महत्वाकांक्षी व्यक्तित्व में जिसे दुनिया ‘रावण’ के रूप में जानती है?

    यह सवाल सुमित्रा जी ने अपनी बेटी शालिनी की शादी तय होने से ठीक पहले उठाया था। शालिनी आज के दौर की पढ़ी-लिखी, स्वतंत्र सोच वाली और एक सॉफ्टवेयर कंपनी में सीनियर लीड पद पर काम करने वाली लड़की थी। उसने जीवनसाथी चुनने के मामले में अपनी माँ के सामने एक अजीब सी उलझन रख दी थी।

     

    शालिनी के सामने जब दो रिश्ते आए, तो उसकी उलझन बढ़ गई। पहला रिश्ता था आदर्श कुमार का। नाम की तरह ही आदर्श एक शांत, संभले हुए और हर नियम-कायदे को मानने वाले इंसान थे। वे बैंक में मैनेजर थे। उनका जीवन एक घड़ी के पेंडुलम की तरह अनुशासित था सुबह समय पर उठना, दफ्तर जाना, शाम को घर लौटना, बुजुर्गों का आदर करना और परिवार की हर छोटी-बड़ी इच्छा का खयाल रखना।

    शालिनी की सहेलियों ने आदर्श को देखते ही कह दिया था, “अरे शालिनी, तुझे तो आधुनिक युग का राम मिल गया है! कितना संस्कारी, शांत और आज्ञाकारी पति है। इसके साथ तेरी जिंदगी स्वर्ग जैसी हो जाएगी।”

     

    शादी के शुरुआती महीने बड़े सुकून से बीते। आदर्श वाकई एक आदर्श पति साबित हो रहे थे। वे घर के कामों में हाथ बंटाते, शालिनी की प्रोफेशनल महत्वाकांक्षाओं का सम्मान करते और कभी भी ऊंची आवाज में बात नहीं करते थे। लेकिन धीरे-धीरे, उस आदर्शवादिता के आवरण के पीछे छिपी एक अजीब सी घुटन शालिनी को महसूस होने लगी।

    एक दिन, शालिनी दफ्तर से थकी-हारी लौटी। किसी प्रोजेक्ट की असफलता के कारण उसका मूड बेहद खराब था। वह चाहती थी कि कोई उसे सुने, उसके गुस्से को समझे, या कम से कम उसे थोड़ी देर के लिए अपने हाल पर छोड़ दे। लेकिन आदर्श अपनी चिर-परिचित शांत और न्यायप्रिय मुद्रा में बैठ गए।

     

    उन्होंने बड़े ही संयमित और ठंडे स्वर में कहा, “शालिनी, जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। तुम्हें इतना विचलित नहीं होना चाहिए। संयम रखो, क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। कल सुबह जल्दी उठना, पूजा करना, सब ठीक हो जाएगा।”

     

    उस रात शालिनी को नींद नहीं आई। उसने छत की तरफ़ देखते हुए सोचा—क्या एक सही पति वही है जो हमेशा ‘सही’ होने का ढोंग करे? राम का चरित्र मर्यादाओं में बंधा हुआ था। उन्होंने समाज के नियमों और मर्यादाओं की रक्षा के लिए अपनी रानी सीता तक का त्याग कर दिया था। क्या आधुनिक जीवन में एक ‘राम’ जैसा पति वह गर्माहट, वह बेबाक अपनापन और वह पागलपन दे सकता है जो एक औरत को यह महसूस करा सके कि वह इस दुनिया में सबसे खास है?

     

    आदर्श के साथ रहते हुए शालिनी को ऐसा लगने लगा जैसे वह किसी मंदिर की मूर्ति के साथ रह रही हो—जो सुंदर है, पूजनीय है, लेकिन जिसके भीतर दिल की धड़कनें महसूस नहीं होतीं। वहाँ कोई गलती करने की गुंजाइश नहीं थी, क्योंकि राम की तरह आदर्श कभी कोई गलती नहीं कर सकते थे। और जो कभी गलती नहीं करता, वह शायद इंसान भी पूरी तरह नहीं हो पाता।

     

    इस उधेड़बुन के बीच, शालिनी की जिंदगी में राजीव का प्रवेश हुआ। राजीव उस कंपनी का क्लाइंट था जिसके साथ शालिनी डील कर रही थी। राजीव को पहली नजर में देखने पर कोई भी सहम सकता था। वह बेहद महत्त्वाकांक्षी, अपने फैसलों पर अडिग, जरा-जरा सी बात पर गुस्सा हो जाने वाला और अपनी शर्तों पर दुनिया चलाने वाला इंसान था।

    उसके भीतर एक अजीब सा अहंकार और अपार आकर्षण था। लोग उसकी पीठ पीछे उसे ‘रावण’ कहते थे—जो ज्ञानी तो बहुत था, संगीत और वेदों का प्रकांड पंडित था, लेकिन जिसकी इच्छाओं और अहंकार की कोई सीमा नहीं थी, जो हर कीमती चीज पर अपना अधिकार जमाना चाहता था।

    एक दिन जब शालिनी ऑफिस के एक तनावपूर्ण प्रोजेक्ट को लेकर परेशान थी और आदर्श का फोन आया जिसमें वे सिर्फ ‘धैर्य रखने’ की सलाह दे रहे थे, तभी राजीव ने शालिनी केबिन में आकर सीधे कहा, “यह प्रोजेक्ट फेल होने की कगार पर है क्योंकि तुम्हारी टीम के उस मैनेजर में रीढ़ की हड्डी नहीं है। उसे अभी निकालो बाहर। मैं तुम्हें इस पोजीशन पर देखना चाहता हूँ और तुम इसके काबिल हो।”

    शालिनी ने चौंककर कहा, “लेकिन राजीव, नियमों के मुताबिक…”

     

    राजीव ने बीच में ही रोकते हुए हँसकर कहा, “नियम कमजोर लोग बनाते हैं ताकि वे अपनी कमियों को छुपा सकें। दुनिया ताकतवर की सुनती है, नियमों की नहीं।”

    उस दिन शालिनी के मन में उथल-पुथल मच गई। क्या राजीव एक ‘राक्षस’ था? हाँ, उसके भीतर वह क्रूरता, वह स्वामित्व की भावना (possessiveness) और वह अहंकार था जो पौराणिक रावण में था। वह हर चीज को अपनी मुट्ठी में रखना चाहता था। लेकिन दूसरी तरफ, उस ‘राक्षस’ में एक ऐसी जीवंतता थी, एक ऐसा जुनून था जो राम जैसे शांत और तटस्थ चरित्र में कभी नहीं मिल सकता था।

    राजीव अपनी पसंद को लेकर जुनूनी था। वह शालिनी की तारीफ करने से कतराता नहीं था, उसकी आंखों में आँखें डालकर बात करता था और उसके सपनों को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहता था—भले ही वह तरीका अनैतिक क्यों न हो।

    समाज का तराजू और स्त्री का आंतरिक द्वंद्व

    जब सुमित्रा जी को अपनी बेटी के इस मानसिक संघर्ष का पता चला, तो उन्होंने एक रात शालिनी को अपने पास बिठाया। उन्होंने प्यार से शालिनी के बालों में हाथ फेरते हुए कहा, “बेटी, सदियों से हमें यही सिखाया गया है कि पुरुष में ‘राम’ की तलाश करो। एक ऐसा पुरुष जो आज्ञाकारी हो, मर्यादा पुरुषोत्तम हो, जो समाज की नजरों में कभी दागदार न हो। लेकिन क्या तुमने कभी सोचा है कि उस राम के साथ रहने वाली सीता ने भीतर से कितनी अकेलेपन की आग झेली है?”

    शालिनी ने अपनी माँ की आँखों में देखा। सुमित्रा जी आगे बोलीं, “राम ने राज्य के लिए, कुल की मर्यादा के लिए अपनी पत्नी को अग्निपरीक्षा देने को कहा और फिर जंगल में अकेले छोड़ दिया। वह पति के रूप में आदर्श थे, लेकिन क्या वे एक स्त्री के मन को पूरी तरह समझ पाए? इसके विपरीत, रावण भले ही एक राक्षस था, अपनी वासना और अहंकार के कारण नष्ट हुआ, लेकिन उसने अपनी रानी मंदोदरी को वह सम्मान और अधिकार दिया, उसकी बुद्धि का लोहा माना। हालांकि, रावण का अहंकार उसके विनाश का कारण बना क्योंकि वह किसी और की वस्तु को जबरन छीनना चाहता था।”

    यह बात शालिनी के दिल को चीर गई। उसने महसूस किया कि आज की आधुनिक नारी के सामने यह सवाल बहुत गहरा है: क्या उसे एक ऐसा पति चाहिए जो समाज की नजरों में ‘संत’ हो लेकिन घर की चारदीवारी में बर्फ की तरह ठंडा और भावनाओं से विहीन हो? या फिर एक ऐसा पुरुष चाहिए जो अपनी ऊर्जा और जुनून से उसे जलाकर खाक कर दे, जो अहंकारी हो, जो नियंत्रण करना चाहता हो?

     

    शालिनी ने कुछ दिनों का एकांत लिया। उसने न तो आदर्श के पास लौटना उचित समझा और न ही राजीव के उस खतरनाक सम्मोहन में पूरी तरह डूबने का फैसला किया। उसने महसूस किया कि मनुष्य का मन पौराणिक कथाओं के सांचे में पूरी तरह फिट नहीं बैठ सकता।

    आदर्श में जहां शांति और स्थिरता थी, वहीं एक प्रकार की जड़ता भी थी जो इंसान को मशीन बना देती है। दूसरी ओर, राजीव में जो आग और महत्वाकांक्षा थी, वह रचनात्मक कम और विनाशकारी ज्यादा थी वह प्यार कम और अधिकार ज्यादा जताना चाहता था।

     

    एक शाम, बालकनी में खड़े होकर शालिनी ने खुद से एक कड़ा सवाल पूछा। क्या प्रेम का कोई तीसरा विकल्प नहीं हो सकता? क्या एक पुरुष को या तो अपनी भावनाओं का गला घोंटकर ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ बनना होगा, या फिर अपनी वासना और अहंकार के रथ पर सवार होकर ‘राक्षस’ बनना होगा?

     

    शालिनी को अहसास हुआ कि असल जिंदगी में न तो कोई पूर्ण राम होता है और न ही कोई पूर्ण रावण। हर इंसान के भीतर थोड़ा राम और थोड़ा रावण साथ-साथ वास करता है। जरूरत इस बात की है कि आप किसके किस पहलू को स्वीकार करते हैं।

    यदि आप एक ऐसा जीवन चाहते हैं जहाँ सुरक्षा हो, शांति हो, कोई विवाद न हो, तो आपको राम जैसे शांत और रूखे व्यक्तित्व के साथ समझौता करना होगा। लेकिन यदि आप एक ऐसा रोमांचक, चुनौतीभरा और तीव्र जीवन चाहते हैं जहाँ हर पल एक युद्ध हो, जहाँ तीव्रता हो, तो आपको रावण जैसी ऊर्जा और उसके साथ आने वाले विनाश का जोखिम उठाना पड़ेगा।

     

     

    रात गहरी हो चुकी थी। नीचे सड़क पर गाड़ियों की हेडलाइट्स की रोशनी दीवारों पर आ-जा रही थी। शालिनी ने अपनी चाय का कप उठाया और एक लंबी सांस ली।

    उसकी उलझन अब थोड़ी सुलझ रही थी। उसे समझ आ गया था कि उसे न तो किसी ऐसे पति की तलाश है जो भगवान बनकर उस पर शासन करे और उसकी हर गलती को न्याय की तराजू में तौले, और न ही ऐसे किसी राक्षस की जो उसके वजूद को अपनी महात्वाकांक्षा के पाँव तले कुचल दे। उसे एक ऐसा इंसान चाहिए था जो गलती करे तो माफी मांग सके, जो ताकतवर हो लेकिन संवेदनशील भी हो, जो मर्यादाओं का गुलाम न हो बल्कि अपने विवेक से प्यार करना जानता हो।

     

    शालिनी ने फोन उठाया और दोनों को अंतिम संदेश टाइप करने लगी। उसे पता था कि यह फैसला आसान नहीं होगा, क्योंकि समाज आज भी या तो राम को पूजता है या रावण को जलाता है

    लेकिन इंसानी रिश्तों की असली खूबसूरती इन दोनों अतिियों के बीच की उस धुंधली सी रेखा में छिपी होती है, जहाँ एक आम इंसान अपनी तमाम कमजोरियों के साथ सिर्फ ‘इंसान’ बने रहने की कोशिश करता है।

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • शामिल

    शामिल

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    शामिल था वो किसी और के दिल में,

    फिर मेरे दिल में घर क्यों बनाने लगा?

    जब छोड़कर ही जाना था उसे,

    तो मेरे ख़्वाब क्यों सजाने लगा?

    जाते-जाते ऐसा अँधेरा कर गया,

    कि इस दिल में अब कोई रौशनी नहीं बची।

    घर तो आज भी उसी का है,

    मगर अफ़सोस…

    अब इस घर में मैं भी नहीं बचा।

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • बस महसूस होती है अब…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    फिर एक दिन सब धूमिल हो जायेगा..जैसे कुछ कहानियां पूरी होने के लिए नहीं, 

    *बस महसूस करने के लिए लिखी जाती हैं….😐🌻*

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    Rani Thakur

    NSW अनुभवी लेखक -🥇 जो हमसे दूर हुए.. हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏

  • महफ़िल से गुजर गए…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    कभी एक जान होने का दावा करने वाले,

    *आज अनजान बनकर महफ़िल से गुज़र गए।*💕💕💕

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    Rani Thakur

    NSW अनुभवी लेखक -🥇 जो हमसे दूर हुए.. हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏

  • ” बस एक सनम चाहिए “…💖💖

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    शाम का वक्त था। हल्की-हल्की ठंडी हवा बह रही थी, और आसमान में ढलता हुआ सूरज जैसे किसी अधूरी कहानी का आख़िरी पन्ना लिख रहा हो। शहर की भीड़-भाड़ से दूर, उस पुराने पार्क की एक बेंच पर आरव चुपचाप बैठा था। उसकी आँखों में एक अजीब-सी खालीपन था—जैसे बहुत कुछ खो चुका हो, या शायद अभी तक कुछ पाया ही न हो।

    आरव हमेशा से ही थोड़ा अलग था। उसे भीड़ में रहना पसंद नहीं था, पर अकेलापन भी उसे खा जाता था। वह अक्सर सोचता था—क्या ज़िंदगी में सच में किसी “एक” इंसान की ज़रूरत होती है? कोई ऐसा, जो सिर्फ तुम्हारा हो… जो बिना कहे सब समझ जाए।

    उसी सोच में डूबा हुआ वह आसमान को देख रहा था कि तभी पास से एक मधुर आवाज़ आई—

    “क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ?”

    आरव ने चौंक कर देखा। सामने एक लड़की खड़ी थी—सफेद सूट में, बालों को हल्के से बांधे हुए, और आँखों में एक अजीब-सी चमक। वह मुस्कुरा रही थी।

    “हाँ… हाँ, बिल्कुल,” आरव ने थोड़ा झिझकते हुए कहा।

    लड़की उसके पास बैठ गई। कुछ देर तक दोनों चुप रहे। फिर उसने कहा,

    “आप रोज़ यहाँ आते हैं, ना?”

    आरव ने हैरानी से पूछा, “आपको कैसे पता?”

    “मैं भी रोज़ आती हूँ,” उसने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा, “बस… आप शायद ध्यान नहीं देते।”

    आरव को थोड़ा अजीब लगा, लेकिन अच्छा भी। “मैं आरव हूँ,” उसने कहा।

    “मीरा,” उसने जवाब दिया।

    उस दिन के बाद से दोनों की मुलाकातें रोज़ होने लगीं। पहले छोटी-छोटी बातें होती थीं—मौसम, किताबें, पसंद-नापसंद। फिर धीरे-धीरे बातों का दायरा बढ़ता गया। अब वे अपने सपनों, डर, और बीते हुए दर्द तक की बातें करने लगे थे।

    मीरा बहुत अलग थी। वह हर छोटी चीज़ में खुशी ढूंढ लेती थी—गिरते हुए पत्ते, उड़ते हुए परिंदे, या फिर बारिश की पहली बूंद। आरव को उसके साथ समय बिताना अच्छा लगने लगा था। उसकी ज़िंदगी में जैसे रंग वापस आने लगे थे।

    एक दिन मीरा ने पूछा,

    “तुम्हें सबसे ज्यादा किस चीज़ की कमी महसूस होती है?”

    आरव कुछ देर चुप रहा, फिर बोला,

    “एक ऐसा इंसान… जो बिना शर्त प्यार करे। जो मुझे जैसे हूँ वैसे ही अपनाए। बस… एक सनम चाहिए।”

    मीरा ने उसकी तरफ देखा, उसकी आँखों में कुछ अलग था उस दिन।

    “अगर वो मिल जाए, तो क्या करोगे?” उसने धीरे से पूछा।

    “उसे कभी जाने नहीं दूंगा,” आरव ने तुरंत जवाब दिया।

    मीरा मुस्कुराई, लेकिन उसकी मुस्कान में हल्की-सी उदासी थी।

    “हर किसी की किस्मत में वो नहीं होता, आरव।”

    दिन बीतते गए। अब आरव को मीरा का इंतज़ार रहने लगा था। अगर वह एक दिन भी नहीं आती, तो उसे बेचैनी होने लगती। उसे एहसास हो रहा था कि वो मीरा से प्यार करने लगा है।

    एक शाम, जब हल्की बारिश हो रही थी, आरव ने हिम्मत जुटाई।

    “मीरा, मुझे तुमसे कुछ कहना है।”

    “हम्म?” मीरा ने उसकी तरफ देखा।

    “मुझे लगता है… नहीं, मैं यकीन से कह सकता हूँ… कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ।”

    बारिश की बूंदें तेज़ हो गई थीं। मीरा चुप थी। उसकी आँखें नम हो गई थीं।

    “कुछ तो कहो, मीरा…” आरव ने घबराते हुए कहा।

    मीरा ने गहरी सांस ली।

    “काश… तुम ये बात पहले कहते।”

    “क्या मतलब?” आरव का दिल धड़कने लगा।

    “मतलब ये कि… अब बहुत देर हो चुकी है,” मीरा की आवाज़ कांप रही थी।

    “देर? क्यों? क्या हुआ?” आरव ने बेचैनी से पूछा।

    मीरा ने अपने बैग से एक लिफाफा निकाला और उसे दे दिया।

    “ये पढ़ लेना… सब समझ आ जाएगा।”

    इतना कहकर वह उठी और धीरे-धीरे बारिश में भीगती हुई वहाँ से चली गई। आरव उसे रोक भी नहीं पाया।

    कंपकंपाते हाथों से उसने लिफाफा खोला। उसमें एक चिट्ठी थी—

    “प्रिय आरव,

    जब तुम ये चिट्ठी पढ़ रहे होगे, तब शायद मैं तुमसे बहुत दूर जा चुकी होऊँगी।

    मुझे तुमसे पहली मुलाकात में ही लग गया था कि तुम वही इंसान हो, जिसकी मुझे तलाश थी। लेकिन मेरी ज़िंदगी में एक सच्चाई थी, जिसे मैं तुम्हें बताने से डरती रही।

    मुझे एक गंभीर बीमारी है… डॉक्टरों ने कहा है कि मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं है।

    मैं नहीं चाहती थी कि तुम मुझसे प्यार करो, क्योंकि मैं तुम्हें अधूरा छोड़कर जाना नहीं चाहती थी। लेकिन मैं खुद को तुमसे दूर भी नहीं रख पाई।

    तुम्हारे साथ बिताया हर पल मेरे लिए जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा रहा है।

    तुम कहते थे ना—‘बस एक सनम चाहिए’?

    काश… मैं वही बन पाती, हमेशा के लिए।

    लेकिन अब मुझे जाना होगा।

    एक वादा करना—मेरे जाने के बाद भी तुम जीना मत छोड़ना। किसी और को अपनी जिंदगी में आने देना। क्योंकि तुम प्यार के लायक हो… पूरा, सच्चा और हमेशा रहने वाला प्यार।

    तुम्हारी,

    मीरा”

    चिट्ठी पढ़ते ही आरव की दुनिया जैसे रुक गई। उसकी आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। वह उसी बेंच पर बैठा रहा, घंटों तक… जैसे समय थम गया हो।

    अगले दिन वह अस्पतालों में, सड़कों पर, हर जगह मीरा को ढूंढता रहा। लेकिन वह कहीं नहीं मिली। जैसे वो कभी थी ही नहीं—सिर्फ एक खूबसूरत सपना।

    महीने बीत गए। आरव फिर उसी पार्क में जाने लगा, उसी बेंच पर बैठने लगा। लेकिन अब वह पहले जैसा नहीं था। उसके चेहरे पर एक दर्द था, लेकिन साथ ही एक सुकून भी—क्योंकि उसने सच्चा प्यार महसूस किया था, भले ही थोड़े समय के लिए।

    एक दिन, जब वह बेंच पर बैठा था, एक छोटी-सी लड़की उसके पास आई।

    “भैया, ये आपके लिए है,” उसने एक छोटा सा फूल देते हुए कहा।

    “किसने भेजा?” आरव ने पूछा।

    लड़की ने मुस्कुराकर आसमान की तरफ इशारा किया और दौड़ती हुई चली गई।

    आरव ने फूल को देखा और हल्के से मुस्कुरा दिया। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार वो दर्द के नहीं, बल्कि यादों के थे।

    उसने आसमान की तरफ देखा और धीरे से कहा—

    “तुमने कहा था ना, मुझे जीना होगा… मैं जी रहा हूँ, मीरा। लेकिन तुम्हें कभी भूल नहीं पाऊँगा।”

    हवा फिर से बहने लगी थी। पेड़ के पत्ते सरसराने लगे थे, जैसे कोई धीमे से गुनगुना रहा हो—

    “बस एक सनम चाहिए…”

    और उस दिन आरव को समझ आया—

    कभी-कभी ज़िंदगी हमें वो नहीं देती जो हम चाहते हैं…

    लेकिन वो हमें वो एहसास ज़रूर देती है, जो हमें हमेशा के लिए बदल देता है।

    मीरा उसकी ज़िंदगी में आई, थोड़े समय के लिए…

    लेकिन उसने उसे सिखा दिया कि सच्चा प्यार वक्त का मोहताज नहीं होता।

    आरव अब भी उस पार्क में जाता है। कभी-कभी मुस्कुराता है, कभी आँखें नम हो जाती हैं।

    लेकिन अब वह अकेला नहीं है—

    क्योंकि उसके दिल में एक कहानी बस गई है…

    एक अधूरी, लेकिन बेहद खूबसूरत कहानी—

    जिसमें उसे सच में “बस एक सनम” मिला 

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।