सांझ के धुंधलके में जब रसोई की खिड़की से छनकर पीली धूप स्लैब पर रखी मसालदानी पर पड़ती, तो सुमित्रा जी अक्सर एक लंबी सांस लेकर रुक जातीं। उनके हाथ में सब्जी काटने वाला हसिया रुक जाता और वे तन्मयता से सोचने लगतीं आखिर एक औरत के जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता किसमें है? क्या वह आदर्श की उस मूरत में है जिसे युगों से ‘राम’ कहा गया है, या फिर उस शक्तिशाली, प्रतापी और महत्वाकांक्षी व्यक्तित्व में जिसे दुनिया ‘रावण’ के रूप में जानती है?
यह सवाल सुमित्रा जी ने अपनी बेटी शालिनी की शादी तय होने से ठीक पहले उठाया था। शालिनी आज के दौर की पढ़ी-लिखी, स्वतंत्र सोच वाली और एक सॉफ्टवेयर कंपनी में सीनियर लीड पद पर काम करने वाली लड़की थी। उसने जीवनसाथी चुनने के मामले में अपनी माँ के सामने एक अजीब सी उलझन रख दी थी।
शालिनी के सामने जब दो रिश्ते आए, तो उसकी उलझन बढ़ गई। पहला रिश्ता था आदर्श कुमार का। नाम की तरह ही आदर्श एक शांत, संभले हुए और हर नियम-कायदे को मानने वाले इंसान थे। वे बैंक में मैनेजर थे। उनका जीवन एक घड़ी के पेंडुलम की तरह अनुशासित था सुबह समय पर उठना, दफ्तर जाना, शाम को घर लौटना, बुजुर्गों का आदर करना और परिवार की हर छोटी-बड़ी इच्छा का खयाल रखना।
शालिनी की सहेलियों ने आदर्श को देखते ही कह दिया था, “अरे शालिनी, तुझे तो आधुनिक युग का राम मिल गया है! कितना संस्कारी, शांत और आज्ञाकारी पति है। इसके साथ तेरी जिंदगी स्वर्ग जैसी हो जाएगी।”
शादी के शुरुआती महीने बड़े सुकून से बीते। आदर्श वाकई एक आदर्श पति साबित हो रहे थे। वे घर के कामों में हाथ बंटाते, शालिनी की प्रोफेशनल महत्वाकांक्षाओं का सम्मान करते और कभी भी ऊंची आवाज में बात नहीं करते थे। लेकिन धीरे-धीरे, उस आदर्शवादिता के आवरण के पीछे छिपी एक अजीब सी घुटन शालिनी को महसूस होने लगी।
एक दिन, शालिनी दफ्तर से थकी-हारी लौटी। किसी प्रोजेक्ट की असफलता के कारण उसका मूड बेहद खराब था। वह चाहती थी कि कोई उसे सुने, उसके गुस्से को समझे, या कम से कम उसे थोड़ी देर के लिए अपने हाल पर छोड़ दे। लेकिन आदर्श अपनी चिर-परिचित शांत और न्यायप्रिय मुद्रा में बैठ गए।
उन्होंने बड़े ही संयमित और ठंडे स्वर में कहा, “शालिनी, जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। तुम्हें इतना विचलित नहीं होना चाहिए। संयम रखो, क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। कल सुबह जल्दी उठना, पूजा करना, सब ठीक हो जाएगा।”
उस रात शालिनी को नींद नहीं आई। उसने छत की तरफ़ देखते हुए सोचा—क्या एक सही पति वही है जो हमेशा ‘सही’ होने का ढोंग करे? राम का चरित्र मर्यादाओं में बंधा हुआ था। उन्होंने समाज के नियमों और मर्यादाओं की रक्षा के लिए अपनी रानी सीता तक का त्याग कर दिया था। क्या आधुनिक जीवन में एक ‘राम’ जैसा पति वह गर्माहट, वह बेबाक अपनापन और वह पागलपन दे सकता है जो एक औरत को यह महसूस करा सके कि वह इस दुनिया में सबसे खास है?
आदर्श के साथ रहते हुए शालिनी को ऐसा लगने लगा जैसे वह किसी मंदिर की मूर्ति के साथ रह रही हो—जो सुंदर है, पूजनीय है, लेकिन जिसके भीतर दिल की धड़कनें महसूस नहीं होतीं। वहाँ कोई गलती करने की गुंजाइश नहीं थी, क्योंकि राम की तरह आदर्श कभी कोई गलती नहीं कर सकते थे। और जो कभी गलती नहीं करता, वह शायद इंसान भी पूरी तरह नहीं हो पाता।
इस उधेड़बुन के बीच, शालिनी की जिंदगी में राजीव का प्रवेश हुआ। राजीव उस कंपनी का क्लाइंट था जिसके साथ शालिनी डील कर रही थी। राजीव को पहली नजर में देखने पर कोई भी सहम सकता था। वह बेहद महत्त्वाकांक्षी, अपने फैसलों पर अडिग, जरा-जरा सी बात पर गुस्सा हो जाने वाला और अपनी शर्तों पर दुनिया चलाने वाला इंसान था।
उसके भीतर एक अजीब सा अहंकार और अपार आकर्षण था। लोग उसकी पीठ पीछे उसे ‘रावण’ कहते थे—जो ज्ञानी तो बहुत था, संगीत और वेदों का प्रकांड पंडित था, लेकिन जिसकी इच्छाओं और अहंकार की कोई सीमा नहीं थी, जो हर कीमती चीज पर अपना अधिकार जमाना चाहता था।
एक दिन जब शालिनी ऑफिस के एक तनावपूर्ण प्रोजेक्ट को लेकर परेशान थी और आदर्श का फोन आया जिसमें वे सिर्फ ‘धैर्य रखने’ की सलाह दे रहे थे, तभी राजीव ने शालिनी केबिन में आकर सीधे कहा, “यह प्रोजेक्ट फेल होने की कगार पर है क्योंकि तुम्हारी टीम के उस मैनेजर में रीढ़ की हड्डी नहीं है। उसे अभी निकालो बाहर। मैं तुम्हें इस पोजीशन पर देखना चाहता हूँ और तुम इसके काबिल हो।”
शालिनी ने चौंककर कहा, “लेकिन राजीव, नियमों के मुताबिक…”
राजीव ने बीच में ही रोकते हुए हँसकर कहा, “नियम कमजोर लोग बनाते हैं ताकि वे अपनी कमियों को छुपा सकें। दुनिया ताकतवर की सुनती है, नियमों की नहीं।”
उस दिन शालिनी के मन में उथल-पुथल मच गई। क्या राजीव एक ‘राक्षस’ था? हाँ, उसके भीतर वह क्रूरता, वह स्वामित्व की भावना (possessiveness) और वह अहंकार था जो पौराणिक रावण में था। वह हर चीज को अपनी मुट्ठी में रखना चाहता था। लेकिन दूसरी तरफ, उस ‘राक्षस’ में एक ऐसी जीवंतता थी, एक ऐसा जुनून था जो राम जैसे शांत और तटस्थ चरित्र में कभी नहीं मिल सकता था।
राजीव अपनी पसंद को लेकर जुनूनी था। वह शालिनी की तारीफ करने से कतराता नहीं था, उसकी आंखों में आँखें डालकर बात करता था और उसके सपनों को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहता था—भले ही वह तरीका अनैतिक क्यों न हो।
समाज का तराजू और स्त्री का आंतरिक द्वंद्व
जब सुमित्रा जी को अपनी बेटी के इस मानसिक संघर्ष का पता चला, तो उन्होंने एक रात शालिनी को अपने पास बिठाया। उन्होंने प्यार से शालिनी के बालों में हाथ फेरते हुए कहा, “बेटी, सदियों से हमें यही सिखाया गया है कि पुरुष में ‘राम’ की तलाश करो। एक ऐसा पुरुष जो आज्ञाकारी हो, मर्यादा पुरुषोत्तम हो, जो समाज की नजरों में कभी दागदार न हो। लेकिन क्या तुमने कभी सोचा है कि उस राम के साथ रहने वाली सीता ने भीतर से कितनी अकेलेपन की आग झेली है?”
शालिनी ने अपनी माँ की आँखों में देखा। सुमित्रा जी आगे बोलीं, “राम ने राज्य के लिए, कुल की मर्यादा के लिए अपनी पत्नी को अग्निपरीक्षा देने को कहा और फिर जंगल में अकेले छोड़ दिया। वह पति के रूप में आदर्श थे, लेकिन क्या वे एक स्त्री के मन को पूरी तरह समझ पाए? इसके विपरीत, रावण भले ही एक राक्षस था, अपनी वासना और अहंकार के कारण नष्ट हुआ, लेकिन उसने अपनी रानी मंदोदरी को वह सम्मान और अधिकार दिया, उसकी बुद्धि का लोहा माना। हालांकि, रावण का अहंकार उसके विनाश का कारण बना क्योंकि वह किसी और की वस्तु को जबरन छीनना चाहता था।”
यह बात शालिनी के दिल को चीर गई। उसने महसूस किया कि आज की आधुनिक नारी के सामने यह सवाल बहुत गहरा है: क्या उसे एक ऐसा पति चाहिए जो समाज की नजरों में ‘संत’ हो लेकिन घर की चारदीवारी में बर्फ की तरह ठंडा और भावनाओं से विहीन हो? या फिर एक ऐसा पुरुष चाहिए जो अपनी ऊर्जा और जुनून से उसे जलाकर खाक कर दे, जो अहंकारी हो, जो नियंत्रण करना चाहता हो?
शालिनी ने कुछ दिनों का एकांत लिया। उसने न तो आदर्श के पास लौटना उचित समझा और न ही राजीव के उस खतरनाक सम्मोहन में पूरी तरह डूबने का फैसला किया। उसने महसूस किया कि मनुष्य का मन पौराणिक कथाओं के सांचे में पूरी तरह फिट नहीं बैठ सकता।
आदर्श में जहां शांति और स्थिरता थी, वहीं एक प्रकार की जड़ता भी थी जो इंसान को मशीन बना देती है। दूसरी ओर, राजीव में जो आग और महत्वाकांक्षा थी, वह रचनात्मक कम और विनाशकारी ज्यादा थी वह प्यार कम और अधिकार ज्यादा जताना चाहता था।
एक शाम, बालकनी में खड़े होकर शालिनी ने खुद से एक कड़ा सवाल पूछा। क्या प्रेम का कोई तीसरा विकल्प नहीं हो सकता? क्या एक पुरुष को या तो अपनी भावनाओं का गला घोंटकर ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ बनना होगा, या फिर अपनी वासना और अहंकार के रथ पर सवार होकर ‘राक्षस’ बनना होगा?
शालिनी को अहसास हुआ कि असल जिंदगी में न तो कोई पूर्ण राम होता है और न ही कोई पूर्ण रावण। हर इंसान के भीतर थोड़ा राम और थोड़ा रावण साथ-साथ वास करता है। जरूरत इस बात की है कि आप किसके किस पहलू को स्वीकार करते हैं।
यदि आप एक ऐसा जीवन चाहते हैं जहाँ सुरक्षा हो, शांति हो, कोई विवाद न हो, तो आपको राम जैसे शांत और रूखे व्यक्तित्व के साथ समझौता करना होगा। लेकिन यदि आप एक ऐसा रोमांचक, चुनौतीभरा और तीव्र जीवन चाहते हैं जहाँ हर पल एक युद्ध हो, जहाँ तीव्रता हो, तो आपको रावण जैसी ऊर्जा और उसके साथ आने वाले विनाश का जोखिम उठाना पड़ेगा।
रात गहरी हो चुकी थी। नीचे सड़क पर गाड़ियों की हेडलाइट्स की रोशनी दीवारों पर आ-जा रही थी। शालिनी ने अपनी चाय का कप उठाया और एक लंबी सांस ली।
उसकी उलझन अब थोड़ी सुलझ रही थी। उसे समझ आ गया था कि उसे न तो किसी ऐसे पति की तलाश है जो भगवान बनकर उस पर शासन करे और उसकी हर गलती को न्याय की तराजू में तौले, और न ही ऐसे किसी राक्षस की जो उसके वजूद को अपनी महात्वाकांक्षा के पाँव तले कुचल दे। उसे एक ऐसा इंसान चाहिए था जो गलती करे तो माफी मांग सके, जो ताकतवर हो लेकिन संवेदनशील भी हो, जो मर्यादाओं का गुलाम न हो बल्कि अपने विवेक से प्यार करना जानता हो।
शालिनी ने फोन उठाया और दोनों को अंतिम संदेश टाइप करने लगी। उसे पता था कि यह फैसला आसान नहीं होगा, क्योंकि समाज आज भी या तो राम को पूजता है या रावण को जलाता है
लेकिन इंसानी रिश्तों की असली खूबसूरती इन दोनों अतिियों के बीच की उस धुंधली सी रेखा में छिपी होती है, जहाँ एक आम इंसान अपनी तमाम कमजोरियों के साथ सिर्फ ‘इंसान’ बने रहने की कोशिश करता है।

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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