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लेखक: Alka Singh

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Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

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मार्च 2026
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  • 😱 छत पर कोई था..!!😱(Last part-3)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    पूरा घर अंधेरे में डूब गया।

     

    राघव ने तुरंत मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    “माँ!”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    नंदिनी उसके पीछे खड़ी कांप रही थी।

     

    सीढ़ियों के नीचे माँ नहीं थीं।

     

    वहाँ सिर्फ उनकी चप्पलें पड़ी थीं।

     

    राघव ने चारों तरफ देखा।

     

    “माँ कहाँ गईं?”

     

    तभी ऊपर से आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    वही कदमों की आवाज।

     

    राघव ने धीरे से सिर उठाया।

     

    छत की सीढ़ियों पर कोई खड़ा था।

     

    लंबे बाल।

     

    सफेद कपड़े।

     

    झुका हुआ सिर।

     

    चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    नंदिनी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “भैया… वो कौन है?”

     

    राघव ने जवाब नहीं दिया।

     

    वह आकृति धीरे-धीरे नीचे उतरने लगी।

     

    एक सीढ़ी।

     

    फिर दूसरी।

     

    फिर तीसरी।

     

    हर कदम के साथ उसकी गर्दन थोड़ी ऊपर उठ रही थी।

     

    राघव ने नंदिनी का हाथ पकड़ा।

     

    “भागो!”

     

    दोनों नीचे की तरफ दौड़े।

     

    पीछे से तेज कदमों की आवाज आने लगी।

     

    ठक-ठक-ठक-ठक!

     

    वे नीचे कमरे में घुसे और दरवाज़ा बंद कर लिया।

     

    राघव ने कुर्सी लगाकर दरवाज़ा रोक दिया।

     

    कुछ सेकंड तक बाहर सन्नाटा रहा।

     

    फिर दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई।

     

    टक… टक…

     

    राघव और नंदिनी ने एक-दूसरे को देखा।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “राघव…”

     

    यह उनकी माँ की आवाज थी।

     

    राघव दरवाज़ा खोलने ही वाला था कि नंदिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “नहीं!”

     

    “माँ हैं!”

     

    “नहीं भैया।”

     

    नंदिनी ने कांपते हुए कहा—

     

    “माँ मुझे हमेशा नंदू कहती हैं। उसने आपका नाम लिया है।”

     

    राघव को पिता की डायरी याद आई।

     

    “जो चीज़ उस रात आई थी, उसने रिया का चेहरा पहन लिया।”

     

    दरवाज़े के बाहर आवाज फिर आई।

     

    इस बार वह नंदिनी की आवाज थी।

     

    “भैया, दरवाज़ा खोलो।”

     

    फिर राघव की अपनी आवाज—

     

    “दरवाज़ा खोलो।”

     

    फिर पिता की आवाज—

     

    “राघव…”

     

    फिर रिया की आवाज—

     

    “भैया…”

     

    राघव के शरीर में कंपकंपी होने लगी।

     

    बाहर खड़ी चीज़ उनके घर के हर सदस्य की आवाज निकाल सकती थी।

     

    लेकिन वह थी कौन?

     

    राघव ने डायरी के आखिरी पन्ने याद किए।

     

    वह दौड़कर स्टोर से लाई डायरी उठाने लगा।

     

    एक पन्ने के कोने में कुछ और लिखा था।

     

    “यह घर बनने से पहले यहाँ एक कुआँ था। उस कुएँ में एक लड़की ने आत्महत्या की थी। गाँव वाले कहते थे कि मरने के बाद उसकी आत्मा पानी में नहीं, बल्कि आईने में रहने लगी।”

     

    अगली लाइन थी—

     

    “रिया ने उस रात छत पर एक पुराना आईना देखा था।”

     

    राघव को अचानक कुछ याद आया।

     

    स्टोर रूम में एक टूटा हुआ आईना था।

     

    वह आईना…

     

    जिसे उसने कमरे के कोने में देखा था।

     

    राघव समझ गया।

     

    “नंदिनी, हमें स्टोर रूम वापस जाना होगा।”

     

    “क्या?”

     

    “उस आईने को तोड़ना होगा।”

     

    दोनों पीछे के रास्ते से छत पर पहुँचे।

     

    आश्चर्य की बात थी कि वहाँ अब कोई नहीं था।

     

    हवा बिल्कुल शांत थी।

     

    राघव स्टोर रूम में गया।

     

    आईना दीवार के सामने रखा था।

     

    उसके शीशे पर धुंध जमी हुई थी।

     

    राघव ने हाथ से धुंध हटाई।

     

    उसमें उसका चेहरा दिखाई दिया।

     

    फिर नंदिनी का।

     

    फिर…

     

    रिया का।

     

    राघव पीछे हट गया।

     

    आईने में रिया मुस्कुरा रही थी।

     

    “भैया…”

     

    उसकी आँखों से काला पानी बह रहा था।

     

    राघव ने पास पड़ी लोहे की रॉड उठाई।

     

    रिया ने आईने के अंदर से हाथ बाहर निकाल दिया।

     

    नंदिनी चीख पड़ी।

     

    राघव ने पूरी ताकत से आईने पर वार किया।

     

    छन्न्न्न्न!

     

    आईना टूट गया।

     

    एक साथ पूरे घर में चीख गूँज उठी।

     

    इतनी तेज कि खिड़कियाँ कांपने लगीं।

     

    आईने के टुकड़ों से काला धुआँ निकलने लगा।

     

    वह धुआँ छत पर घूमता हुआ एक आकृति में बदल गया।

     

    लंबे बाल।

     

    सफेद चेहरा।

     

    आँखों की जगह सिर्फ काले गड्ढे।

     

    वह आकृति राघव की तरफ बढ़ी।

     

    तभी पीछे से माँ की आवाज आई—

     

    “राघव!”

     

    माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं।

     

    राघव उनकी तरफ दौड़ा।

     

    “माँ!”

     

    माँ ने उसे गले लगा लिया।

     

    लेकिन उसी क्षण नंदिनी चिल्लाई—

     

    “भैया, पीछे देखो!”

     

    राघव ने पीछे देखा।

     

    वह काली आकृति गायब हो चुकी थी।

     

    सिर्फ आईने का एक टुकड़ा फर्श पर पड़ा था।

     

    राघव ने राहत की सांस ली।

     

    “सब खत्म हो गया।”

     

    माँ ने उसकी तरफ देखा।

     

    उनकी आँखों में आँसू थे।

     

    “नहीं बेटा…”

     

    “क्या?”

     

    माँ ने धीरे से कहा—

     

    “वह आईने में नहीं थी।”

     

    राघव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “तो कहाँ थी?”

     

    माँ ने छत की तरफ देखा।

     

    “वह हमेशा छत पर थी।”

     

    अचानक नंदिनी ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    “भैया…”

     

    “क्या हुआ?”

     

    नंदिनी की आँखें फैल गईं।

     

    “छत पर कोई खड़ा है।”

     

    राघव ने धीरे-धीरे पीछे देखा।

     

    छत की दीवार के पास रिया खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार उसका चेहरा साफ था।

     

    वह रो रही थी।

     

    “भैया…”

     

    राघव ने कांपती आवाज में पूछा—

     

    “रिया?”

     

    रिया ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे उसने नहीं मारा था।”

     

    राघव की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “फिर किसने?”

     

    रिया ने पीछे की तरफ इशारा किया।

     

    वहाँ…

     

    उनके पिता खड़े थे।

     

    लेकिन वह उनके पिता की आत्मा नहीं थी।

     

    उसके चेहरे पर वही काली मुस्कान थी।

     

    रिया ने कहा—

     

    “पापा ने उसे घर में बुलाया था।”

     

    माँ अचानक घुटनों के बल बैठ गईं।

     

    “नहीं…”

     

    राघव ने पिता की डायरी को देखा।

     

    आखिरी पन्ना अचानक अपने आप खुल गया।

     

    उस पर एक नई लाइन लिखी हुई थी—

     

    “मैंने उसे बुलाया नहीं था। मैंने सिर्फ उसे बाहर जाने से रोका था।”

     

    राघव ने सिर उठाया।

     

    काली आकृति अब उसके बिल्कुल सामने थी।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “दस साल पहले मैंने रिया का चेहरा पहना था…”

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “…आज मुझे तुम्हारा चेहरा चाहिए।”

     

    राघव पीछे हटने लगा।

     

    लेकिन तभी रिया उसके सामने आ गई।

     

    उसने उस काली आकृति का हाथ पकड़ लिया।

     

    आसमान में अचानक बिजली चमकी।

     

    एक भयानक चीख सुनाई दी।

     

    और अगले ही पल…

     

    सब कुछ शांत हो गया।

     

    सुबह पड़ोसियों ने शर्मा परिवार के घर का दरवाज़ा खुला पाया।

     

    घर के अंदर राघव, नंदिनी और उनकी माँ बेहोश मिले।

     

    छत पर सिर्फ टूटा हुआ आईना पड़ा था।

     

    और उसके पास…

     

    एक पुरानी चाँदी की पायल।

     

    रिया की।

     

    उस दिन के बाद उस घर की छत पर कभी कोई आवाज नहीं आई।

     

    कहानी यहीं खत्म हो जाती…

     

    अगर छह महीने बाद उस घर को खरीदने वाला नया परिवार वहाँ रहने न आया होता।

     

    पहली ही रात…

     

    नए घर का दस साल का बेटा आधी रात को अपनी माँ के कमरे में दौड़ता हुआ आया।

     

    वह कांप रहा था।

     

    माँ ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    बच्चे ने छत की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “मम्मी…”

     

    “हाँ?”

     

    “छत पर कोई है।”

     

    माँ ने हँसकर कहा—

     

    “बेटा, छत पर तो कोई नहीं है।”

     

    बच्चे ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “नहीं मम्मी…”

     

    फिर उसने फुसफुसाकर कहा—

     

    “वहाँ एक आदमी खड़ा है। वो बिल्कुल मेरे जैसा दिखता है।”

     

     

    END

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱 छत पर कोई था..!!😱(part-2)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    राघव कुछ सेकंड तक बिल्कुल स्थिर खड़ा रहा।

     

    ऊपर से फिर वही आवाज आई।

     

    “राघव…”

     

    उसके पैरों के नीचे जैसे जमीन खिसक गई।

     

    यह आवाज वह कैसे भूल सकता था?

     

    यह उसकी छोटी बहन रिया की आवाज थी।

     

    रिया…

     

    जो दस साल पहले मर चुकी थी।

     

    नंदिनी ने राघव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “भैया, ऊपर मत जाना।”

     

    राघव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसकी नजर छत की तरफ थी।

     

    कुछ देर बाद आवाज बंद हो गई।

     

    पूरा घर फिर शांत हो गया।

     

    राघव ने माँ को जगाया।

     

    माँ कमरे से बाहर आईं और जैसे ही राघव ने उन्हें सारी बात बताई, उनके चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “रिया का नाम मत लेना,” माँ ने कहा।

     

    “क्यों?”

     

    माँ ने सिर झुका लिया।

     

    “क्योंकि वह मरकर भी इस घर से गई नहीं थी।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    राघव ने माँ का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मुझे सब सच बताइए।”

     

    माँ बहुत देर तक चुप रहीं।

     

    फिर उन्होंने कहना शुरू किया।

     

    दस साल पहले रिया सिर्फ तेरह साल की थी।

     

    उसे रात में छत पर जाकर आसमान देखना बहुत पसंद था।

     

    एक रात वह अचानक छत से गायब हो गई थी।

     

    घर में सबने सोचा कि वह शायद सीढ़ियों से नीचे गई होगी।

     

    लेकिन वह कहीं नहीं मिली।

     

    सुबह उसकी लाश…

     

    माँ आगे नहीं बोल पाईं।

     

    राघव ने पूछा, “कहाँ मिली थी?”

     

    माँ ने कांपते हुए छत के स्टोर रूम की तरफ इशारा किया।

     

    “वहीं।”

     

    राघव के चेहरे पर डर उतर आया।

     

    “लेकिन वह कमरा तो हमेशा बंद रहा है।”

     

    माँ बोलीं, “उस रात से।”

     

    राघव ने पूछा, “दरवाज़ा बंद किसने किया था?”

     

    माँ ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “तुम्हारे पिता ने।”

     

    अचानक राघव को अपने पिता की आखिरी बात याद आई।

     

    मृत्यु से कुछ दिन पहले उन्होंने उसे चेतावनी दी थी—

     

    “अगर कभी रात में छत से किसी के चलने की आवाज आए… तो दरवाज़ा मत खोलना।”

     

    तब राघव ने इसे बीमारी के कारण कही गई बात समझा था।

     

    लेकिन अब…

     

    सब कुछ जुड़ रहा था।

     

    अगली सुबह राघव ने स्टोर रूम का ताला देखने का फैसला किया।

     

    वह छत पर गया।

     

    सूरज निकल चुका था।

     

    दिन की रोशनी में रात का डर थोड़ा कम लग रहा था।

     

    लेकिन स्टोर रूम के सामने पहुँचते ही उसकी सांस रुक गई।

     

    दरवाज़े पर खरोंच के निशान थे।

     

    बहुत सारे।

     

    ऐसे निशान जैसे किसी ने अंदर से बाहर निकलने के लिए लकड़ी को नाखूनों से खुरचा हो।

     

    राघव ने हाथ बढ़ाकर दरवाज़े को छुआ।

     

    दरवाज़ा बर्फ जैसा ठंडा था।

     

    उसने ताला देखा।

     

    ताला बाहर से बंद था।

     

    तभी उसकी नजर फर्श पर गई।

     

    वहाँ गीली मिट्टी के छोटे-छोटे पैरों के निशान थे।

     

    वे निशान स्टोर रूम से निकलकर…

     

    पानी की टंकी तक जा रहे थे।

     

    राघव ने टंकी की तरफ देखा।

     

    उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    वह टंकी के पास गया।

     

    ऊपर ढक्कन लगा था।

     

    उसने धीरे से ढक्कन उठाया।

     

    अंदर पानी बिल्कुल काला दिखाई दे रहा था।

     

    और पानी की सतह पर…

     

    एक लंबे बालों का गुच्छा तैर रहा था।

     

    राघव पीछे हट गया।

     

    उसी समय पीछे से आवाज आई—

     

    “भैया…”

     

    राघव पलटा।

     

    नंदिनी खड़ी थी।

     

    “आप यहाँ क्या कर रहे हो?”

     

    राघव ने तुरंत टंकी का ढक्कन बंद कर दिया।

     

    “कुछ नहीं। नीचे चलो।”

     

    लेकिन नंदिनी की नजर स्टोर रूम पर पड़ी।

     

    “भैया, ये दरवाज़ा तो खुला है।”

     

    राघव ने देखा।

     

    दरवाज़ा सचमुच थोड़ा खुला हुआ था।

     

    उसने तो उसे बंद देखा था।

     

    दोनों कुछ क्षण वहीं खड़े रहे।

     

    फिर अंदर से किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

     

    “मुझे बाहर निकालो…”

     

    नंदिनी के होंठ कांपने लगे।

     

    “भैया…”

     

    राघव ने दरवाज़ा थोड़ा और खोला।

     

    अंदर पूरा अंधेरा था।

     

    टॉर्च जलाकर उसने अंदर देखा।

     

    धूल से भरा कमरा।

     

    पुराना सामान।

     

    टूटी कुर्सी।

     

    एक लकड़ी की पेटी।

     

    और दीवार पर एक पुरानी तस्वीर।

     

    राघव ने तस्वीर उठाई।

     

    उसमें पूरा परिवार था।

     

    माँ।

     

    पिता।

     

    राघव।

     

    नंदिनी।

     

    और रिया।

     

    लेकिन तस्वीर में एक अजीब बात थी।

     

    रिया के चेहरे पर किसी ने काले रंग से गोल घेरा बना दिया था।

     

    राघव ने तस्वीर पलटी।

     

    पीछे कुछ लिखा था।

     

    “यह रिया नहीं है।”

     

    राघव की उंगलियाँ कांपने लगीं।

     

    तभी पेटी के अंदर से आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    नंदिनी पीछे हट गई।

     

    राघव ने पेटी खोली।

     

    अंदर पुराने कपड़े, कुछ खिलौने और एक डायरी थी।

     

    डायरी उसके पिता की थी।

     

    राघव ने जल्दी-जल्दी पन्ने पलटे।

     

    एक पन्ने पर लिखा था—

     

    “रिया की मौत दुर्घटना नहीं थी।”

     

    अगली लाइन पढ़ते ही राघव के हाथ से डायरी गिर गई।

     

    “उस रात छत पर रिया के साथ कोई और भी था।”

     

    राघव ने डायरी फिर उठाई।

     

    अगला पन्ना खाली था।

     

    उसके बाद एक वाक्य था—

     

    “जो चीज़ उस रात आई थी, उसने रिया का चेहरा पहन लिया।”

     

    राघव की सांस रुक गई।

     

    उसी समय कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    नंदिनी चीख उठी।

     

    अंदर अंधेरा छा गया।

     

    राघव ने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।

     

    कुंडी हिल नहीं रही थी।

     

    फिर…

     

    अंधेरे में किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “भैया…”

     

    राघव जम गया।

     

    नंदिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मेरी तरफ मत देखना,” नंदिनी ने कांपते हुए कहा।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि…”

     

    नंदिनी की आवाज टूट गई।

     

    “मेरे पीछे कोई खड़ा है।”

     

    राघव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    पीछे से ठंडी सांस उसकी गर्दन पर महसूस हुई।

     

    फिर किसी ने उसके कान के पास फुसफुसाया—

     

    “तुमने मुझे दस साल इंतजार कराया।”

     

    अचानक दरवाज़ा खुल गया।

     

    दोनों भागकर बाहर आए।

     

    राघव ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    स्टोर रूम खाली था।

     

    लेकिन फर्श पर गीले पैरों के निशान थे।

     

    वे निशान कमरे से बाहर निकलकर सीढ़ियों की तरफ जा रहे थे।

     

    और फिर…

     

    सीढ़ियों पर रुक गए।

     

    राघव ने नीचे देखा।

     

    घर के अंदर उसकी माँ खड़ी थीं।

     

    लेकिन उनकी आँखें बंद थीं।

     

    और उनके पीछे…

     

    एक लंबी काली परछाईं खड़ी थी।

     

    राघव चिल्लाया—

     

    “माँ!”

     

    माँ ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।

     

    उनके चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    लेकिन वह उनकी मुस्कान नहीं थी।

     

    उन्होंने बहुत धीमी आवाज में कहा—

     

    “अब वह नीचे आ गई है।”

     

    और उसी पल पूरे घर की सारी लाइटें बंद हो गईं।

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    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱 छत पर कोई था..!!😱(part-1)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    रात के करीब बारह बज रहे थे।लखनऊ की उस पुरानी कॉलोनी में दिन के समय सब कुछ सामान्य लगता था। बच्चे गलियों में खेलते, चाय की दुकानों पर लोग बातें करते और शाम होते ही हर घर की बालकनी में पीली रोशनी जल उठती। लेकिन रात के बाद वही कॉलोनी बिल्कुल बदल जाती थी।

     

    खासकर शर्मा परिवार का घर।

     

    तीन मंज़िला पुराना मकान था। सबसे ऊपर एक खुली छत, जिसके चारों तरफ करीब चार फीट ऊँची दीवार थी। छत के एक कोने में पानी की बड़ी काली टंकी थी और दूसरे कोने में एक पुराना स्टोर रूम, जिसका दरवाज़ा पिछले कई सालों से बंद पड़ा था।

     

    घर में उस समय सिर्फ तीन लोग थे—राघव, उसकी छोटी बहन नंदिनी और उनकी माँ।

     

    पिता की मृत्यु को दो साल हो चुके थे। पिता के जाने के बाद राघव ने ही घर की जिम्मेदारी संभाल ली थी।

     

    उस रात राघव अपने कमरे में बैठकर लैपटॉप पर काम कर रहा था।

     

    तभी…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    उसने स्क्रीन से नजर उठाई।

     

    आवाज़ ऊपर से आई थी।

     

    छत से।

     

    राघव कुछ सेकंड तक चुप बैठा रहा।

     

    फिर दोबारा आवाज आई।

     

    ठक… ठक…

     

    इस बार जैसे कोई छत की फर्श पर धीरे-धीरे चल रहा हो।

     

    राघव ने घड़ी देखी।

     

    12:07 AM.

     

    उसने खुद को समझाया, “शायद बिल्ली होगी।”

     

    वह वापस काम करने लगा।

     

    लेकिन तभी उसके कमरे की खिड़की पर हल्की-सी परछाईं दिखाई दी।

     

    राघव ने चौंककर खिड़की की तरफ देखा।

     

    कुछ नहीं था।

     

    उसने पर्दा हटाया।

     

    नीचे पूरी गली खाली थी।

     

    सड़क की लाइट के नीचे एक आवारा कुत्ता बैठा था, लेकिन वह भी ऊपर आसमान की तरफ देख रहा था।

     

    राघव के शरीर में हल्की सिहरन दौड़ गई।

     

    “अजीब है…”

     

    उसी समय पीछे से नंदिनी की आवाज आई।

     

    “भैया?”

     

    राघव पलटा।

     

    नंदिनी दरवाज़े पर खड़ी थी।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “आपने भी आवाज सुनी?”

     

    “कौन-सी आवाज?”

     

    नंदिनी ने छत की तरफ इशारा किया।

     

    “ऊपर कोई चल रहा है।”

     

    राघव कुछ बोलता, उससे पहले फिर आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज बिल्कुल साफ थी।

     

    जैसे किसी के नंगे पैर सीमेंट की फर्श पर पड़ रहे हों।

     

    नंदिनी ने धीरे से पूछा, “क्या ऊपर कोई है?”

     

    राघव ने कहा, “नहीं। माँ नीचे हैं और पड़ोसी अपने घर में। शायद बिल्ली होगी।”

     

    नंदिनी ने सिर हिलाया, लेकिन उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

     

    “भैया… मुझे बिल्ली के कदम इतने भारी नहीं लगते।”

     

    राघव ने टॉर्च उठाई।

     

    “चलो देखते हैं।”

     

    दोनों सीढ़ियों से ऊपर जाने लगे।

     

    जैसे-जैसे वे छत के करीब पहुँच रहे थे, आवाज बंद हो गई।

     

    राघव ने दरवाज़े की कुंडी पकड़ी।

     

    एक पल के लिए उसने सोचा कि वापस चला जाए।

     

    फिर उसने दरवाज़ा खोल दिया।

     

    छत खाली थी।

     

    ठंडी हवा चल रही थी।

     

    पानी की टंकी के पास कुछ सूखे पत्ते पड़े थे।

     

    स्टोर रूम का दरवाज़ा बंद था।

     

    राघव ने टॉर्च चारों तरफ घुमाई।

     

    “देखा? कोई नहीं है।”

     

    नंदिनी ने राहत की सांस ली।

     

    तभी…

     

    टंकी के पीछे से एक छोटी-सी आवाज आई।

     

    छन्न…

     

    जैसे किसी ने कांच की चीज़ गिरा दी हो।

     

    दोनों वहीं रुक गए।

     

    राघव धीरे-धीरे टंकी की तरफ बढ़ा।

     

    पीछे जाकर देखा तो वहाँ कुछ नहीं था।

     

    सिर्फ फर्श पर एक पुरानी चाँदी की पायल पड़ी थी।

     

    नंदिनी ने उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाया।

     

    राघव ने तुरंत उसका हाथ रोक दिया।

     

    “मत छूना।”

     

    “क्यों?”

     

    राघव खुद नहीं जानता था।

     

    उसने पायल को टॉर्च की रोशनी में देखा।

     

    उस पर काले रंग की मिट्टी लगी हुई थी।

     

    और सबसे अजीब बात…

     

    पायल बिल्कुल गीली थी।

     

    जबकि छत पूरी तरह सूखी थी।

     

    “चलो नीचे,” राघव ने कहा।

     

    दोनों वापस कमरे में आ गए।

     

    लेकिन उस रात किसी को नींद नहीं आई।

     

    सुबह राघव ने पायल माँ को दिखाई।

     

    पायल देखते ही माँ का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    उन्होंने उसे हाथ में लेने से इनकार कर दिया।

     

    “इसे घर से बाहर फेंक दो।”

     

    राघव ने पूछा, “आप इसे पहचानती हैं?”

     

    माँ कुछ देर चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं, “नहीं।”

     

    “माँ, आप झूठ बोल रही हैं।”

     

    माँ ने उसकी तरफ देखा।

     

    उनकी आँखों में डर था।

     

    “कुछ चीज़ों के बारे में जितना कम जानो, उतना अच्छा है।”

     

    उस रात राघव ने पायल घर से बाहर फेंक दी।

     

    लेकिन अगले दिन सुबह वही पायल फिर छत पर पड़ी मिली।

     

    इस बार वह पानी की टंकी के ठीक सामने थी।

     

    राघव ने उसे उठाया और गुस्से में नाली के बाहर फेंक दिया।

     

    नंदिनी ने कहा, “भैया, इसे किसी नदी में फेंक दो।”

     

    राघव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    रात आई।

     

    11:45 बजे तक सब सो चुके थे।

     

    राघव भी बिस्तर पर लेट गया।

     

    अचानक…

     

    ठक…

     

    उसकी आँख खुल गई।

     

    ठक… ठक…

     

    वही आवाज।

     

    लेकिन इस बार आवाज छत से नहीं आ रही थी।

     

    वह उसके कमरे की छत से आ रही थी।

     

    राघव बिस्तर पर बैठ गया।

     

    कुछ सेकंड बाद उसे ऐसा लगा जैसे कोई उसके कमरे की छत पर चल रहा हो।

     

    धीरे…

     

    बहुत धीरे…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    उसने मोबाइल उठाया और समय देखा।

     

    12:13 AM.

     

    तभी उसके मोबाइल पर एक अनजान नंबर से मैसेज आया।

     

    मैसेज में सिर्फ चार शब्द थे—

     

    “ऊपर मत आना। वो जाग गई है।”

     

    राघव का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    उसने तुरंत नंबर पर कॉल किया।

     

    फोन बंद था।

     

    तभी नंदिनी चीखती हुई उसके कमरे में आई।

     

    “भैया!”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “छत पर कोई है!”

     

    राघव ने पूछा, “तुमने देखा?”

     

    नंदिनी ने कांपते हुए सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “कौन था?”

     

    नंदिनी की आँखों से आँसू निकलने लगे।

     

    “एक औरत…”

     

    “कैसी औरत?”

     

    नंदिनी ने धीरे से कहा—

     

    “उसका चेहरा नहीं था।”

     

    उसी क्षण ऊपर से किसी चीज़ के घिसटने की आवाज आई।

     

    घ्र्र्र्र…

     

    फिर…

     

    छत का दरवाज़ा अपने आप बंद होने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    राघव और नंदिनी एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    और तभी…

     

    ऊपर से किसी औरत की बहुत धीमी आवाज आई—

     

    “राघव…”

     

    राघव का खून जम गया।

     

    क्योंकि वह आवाज…

     

    उसके पिता की मृत्यु के बाद से उसकी माँ की नहीं, बल्कि उसकी मरी हुई बहन की आवाज़ जैसी थी।

     

    उसकी बहन की मृत्यु दस साल पहले हो चुकी थी।

     

    और उस रात पहली बार राघव को समझ आया—

     

    छत पर कोई था।

     

    और शायद…

     

    वह कई सालों से वहीं था।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱जिस पेड़ को काटना मना था..!!😱

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    (भाग 3: आखिरी फैसला और सीख)

     

    रघु का पूरा घर डर से काँप रहा था।

     

    दीवार से निकलती काली शाखाएँ धीरे-धीरे कमरे में फैल रही थीं। बच्चों की चीखें सुनकर सीता उन्हें लेकर दूसरे कमरे में चली गई।

     

    रघु को हरिया की बात याद आई—

     

    “वह पेड़ नहीं है… वह एक दरवाजा है।”

     

    उसे समझ आ गया कि अगर इस श्राप को खत्म करना है, तो उसे वापस उसी जंगल में जाना होगा।

     

    लेकिन इस बार अकेले नहीं।

     

    सुबह होते ही रघु हरिया के पास गया।

     

    हरिया ने उसकी बात सुनी और बोला,

    “इस श्राप को खत्म करने का एक ही रास्ता है।”

     

    “क्या?”

     

    “जिस कुल्हाड़ी से तुमने पेड़ पर पहला वार किया था, उसी से आखिरी वार करना होगा।”

     

    रघु ने पूछा,

    “लेकिन मैं उस पेड़ को काटूँगा तो श्राप खत्म कैसे होगा?”

     

    हरिया बोला,

    “पेड़ को काटना नहीं है। उसके तने में जहाँ से खून निकला था, वहाँ जमीन के अंदर एक पुराना पत्थर दबा है। वही इस श्राप की जड़ है।”

     

    “उसे कैसे निकालेंगे?”

     

    हरिया ने कहा,

    “जिसने लालच में पहला वार किया था, वही अपनी गलती स्वीकार करके उस पत्थर को वापस जमीन में दबाएगा। तभी दरवाजा बंद होगा।”

     

    रघु ने अपनी कुल्हाड़ी उठाई और हरिया के साथ जंगल की ओर चल पड़ा।

     

    जैसे ही दोनों काले बरगद के पास पहुँचे, हवा तेज हो गई।

     

    पेड़ की शाखाएँ हिलने लगीं।

     

    लेकिन आसपास हवा नहीं चल रही थी।

     

    अचानक पेड़ के तने से आवाज आई—

     

    “रघु…”

     

    रघु रुक गया।

     

    आवाज फिर आई—

     

    “तुम्हारे बच्चों को बचाना है?”

     

    रघु ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “हाँ।”

     

    पेड़ बोला—

     

    “तो अपनी कुल्हाड़ी यहाँ छोड़ दो और चले जाओ।”

     

    रघु कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “मैं तुम्हारे सामने अपनी गलती मानता हूँ। मैंने लालच में आकर तुम्हें काटा। लेकिन अब मैं किसी और को नुकसान नहीं होने दूँगा।”

     

    अचानक पेड़ जोर से हिलने लगा।

     

    उसकी शाखाओं से काले धुएँ जैसी चीज निकलने लगी।

     

    हरिया चिल्लाया—

     

    “जल्दी! तने के नीचे!”

     

    रघु ने जमीन खोदनी शुरू की।

     

    कुछ ही देर में उसकी कुल्हाड़ी किसी कठोर चीज से टकराई।

     

    टन!

     

    मिट्टी हटाने पर एक काला पत्थर दिखाई दिया।

     

    उस पत्थर पर कई पुराने नाम खुदे हुए थे।

     

    हरिया ने उन नामों को देखा तो उसकी आँखों में आँसू आ गए।

     

    “ये वही लोग हैं… जो इस जंगल में गायब हुए थे।”

     

    रघु ने पत्थर उठाने की कोशिश की।

     

    लेकिन पत्थर बहुत भारी था।

     

    तभी उसके पीछे किसी ने कहा—

     

    “रघु…”

     

    उसने पीछे देखा।

     

    वहाँ उसकी बेटी गुड़िया खड़ी थी।

     

    रघु घबरा गया।

     

    “तुम यहाँ कैसे आई?”

     

    गुड़िया मुस्कुराई।

     

    “बाबा, मेरे साथ घर चलो।”

     

    हरिया चिल्लाया—

     

    “उसके पास मत जाना!”

     

    रघु ने ध्यान से देखा।

     

    वह गुड़िया जैसी दिख रही थी, लेकिन उसके पैरों के नीचे परछाई नहीं थी।

     

    रघु पीछे हट गया।

     

    वह आकृति अचानक डरावनी आवाज में हँसने लगी।

     

    उसका चेहरा बदल गया।

     

    आँखें काली हो गईं और शरीर धुएँ में बदलने लगा।

     

    पेड़ की शाखाएँ रघु की तरफ झपटने लगीं।

     

    हरिया ने कुल्हाड़ी से एक शाखा काट दी।

     

    उसी क्षण पेड़ से भयानक चीख निकली।

     

    रघु ने पूरी ताकत लगाकर काला पत्थर बाहर खींच लिया।

     

    जैसे ही पत्थर बाहर आया, जमीन के नीचे से तेज हवा निकलने लगी।

     

    हरिया चिल्लाया—

     

    “इसे वापस रख!”

     

    रघु ने पत्थर को उसी गड्ढे में वापस रख दिया।

     

    लेकिन इस बार उसने उसे मिट्टी से पूरी तरह ढक दिया।

     

    अचानक सब शांत हो गया।

     

    पेड़ की शाखाएँ रुक गईं।

     

    हवा बंद हो गई।

     

    और फिर काले बरगद की छाल पर बनी लाल धारियाँ धीरे-धीरे गायब होने लगीं।

     

    रघु ने देखा कि पेड़ की एक शाखा टूटकर जमीन पर गिर गई।

     

    उस शाखा के नीचे वही पुरानी कुल्हाड़ी पड़ी थी।

     

    रघु ने उसे उठाया और पेड़ से कहा—

     

    “मुझे माफ करना।”

     

    कुछ पल तक कोई आवाज नहीं आई।

     

    फिर पेड़ के अंदर से बहुत धीमी आवाज आई—

     

    “लालच से लिया था… समझदारी से लौटाया।”

     

    इसके बाद पेड़ बिल्कुल शांत हो गया।

     

    रघु और हरिया गाँव वापस लौट आए।

     

    घर पहुँचकर रघु ने देखा कि दीवार की सारी काली दरारें गायब हो चुकी थीं।

     

    उसके बच्चे सुरक्षित थे।

     

    गाँव वालों ने जब पूरी घटना सुनी तो उन्होंने जंगल के उस हिस्से के चारों ओर पत्थरों की सीमा बना दी।

     

    काले बरगद को किसी ने फिर कभी नहीं छुआ।

     

    कई साल बीत गए।

     

    रघु ने भी लकड़ी काटने का काम छोड़ दिया और गाँव में छोटी-सी दुकान खोल ली।

     

    उसने अपने बच्चों को हमेशा एक बात सिखाई—

     

    “जरूरत इंसान को मेहनत करने के लिए मजबूर कर सकती है, लेकिन लालच उसे गलत रास्ते पर ले जाता है।”

     

    कभी-कभी गाँव के लोग कहते थे कि अमावस्या की रात काले बरगद के पास से गुजरते समय अब भी किसी के कुल्हाड़ी रखने की आवाज सुनाई देती है।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    लेकिन कोई वहाँ जाने की हिम्मत नहीं करता।

     

    और बरवा गाँव में आज भी बुजुर्ग बच्चों को एक बात बताते हैं—

     

    सीख

     

    प्रकृति हमारे जीवन का हिस्सा है। अपनी जरूरत पूरी करने और लालच में फर्क समझना जरूरी है। हमें पेड़-पौधों और जंगलों का सम्मान करना चाहिए। किसी चेतावनी को सिर्फ अंधविश्वास समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, खासकर जब उसके पीछे पुराने अनुभव और किसी की सुरक्षा जुड़ी हो।

     

    क्योंकि कभी-कभी इंसान जिस चीज़ को अपना अधिकार समझकर छीन लेता है, वही चीज़ उसके लिए मुसीबत बन जाती है।

     

    और अगर आप कभी किसी पुराने जंगल में जाएँ…

     

    जहाँ सब लोग आपको किसी एक पेड़ से दूर रहने को कहें…

     

    तो याद रखना—

     

    हर पेड़ सिर्फ लकड़ी नहीं होता। कुछ पेड़ अपने अंदर पूरी कहानी छिपाए बैठे होते हैं। 🌳👻

     

     

    End

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    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱जिस पेड़ को काटना मना था..!!😱

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    (भाग 2: जंगल की वापसी)

     

    सुबह जब रघु की आँख खुली तो उसकी हालत देखकर सीता घबरा गई।

     

    उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था और आँखों के नीचे काले घेरे पड़ गए थे।

     

    सीता ने पूछा,

    “क्या हुआ तुम्हें?”

     

    रघु ने रात की पूरी घटना बता दी।

     

    सीता कुछ देर चुप रही।

     

    फिर उसने कहा,

    “आज जंगल मत जाना।”

     

    रघु ने हामी भर दी।

     

    लेकिन उसी समय दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    रघु ने दरवाजा खोला तो सामने गाँव का बूढ़ा हरिया खड़ा था।

     

    हरिया ने रघु को देखते ही पूछा,

    “तू कल जंगल गया था?”

     

    रघु चौंक गया।

     

    “हाँ… लेकिन आपको कैसे पता?”

     

    हरिया ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,

    “तू काले बरगद के पास गया था।”

     

    रघु के शरीर में ठंड दौड़ गई।

     

    हरिया ने अंदर आकर दरवाजा बंद किया।

     

    उसने धीमी आवाज में कहा,

    “मैंने तुझे मना नहीं किया था, क्योंकि मुझे लगा था तू गाँव की बात मानेगा। लेकिन अब देर हो चुकी है।”

     

    रघु ने पूछा,

    “उस पेड़ में क्या है?”

     

    हरिया ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसने सिर्फ इतना कहा,

    “वह पेड़ नहीं है… वह एक दरवाजा है।”

     

    रघु ने घबराकर पूछा,

    “किसका दरवाजा?”

     

    हरिया बोला,

    “जिस चीज़ का नाम लेना भी गाँव में मना है।”

     

    इतना कहकर वह चला गया।

     

    उस दिन के बाद अजीब घटनाएँ शुरू हो गईं।

     

    गाँव की गायें रात में अचानक जंगल की ओर देखकर रंभाने लगीं। कुएँ का पानी लाल रंग का दिखाई देने लगा। कई घरों के बाहर सुबह गीली मिट्टी में पैरों के निशान मिलते।

     

    और सबसे डरावनी बात—

     

    हर रात ठीक बारह बजे, पूरे गाँव में कुल्हाड़ी चलने की आवाज आती।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    लेकिन कोई लकड़ी नहीं काट रहा था।

     

    तीसरी रात रघु की बेटी गुड़िया अचानक नींद में उठकर दरवाजे की ओर चलने लगी।

     

    सीता ने उसे पकड़ लिया।

     

    गुड़िया की आँखें बंद थीं।

     

    वह नींद में बोल रही थी—

     

    “माँ… जंगल में दादी बुला रही हैं।”

     

    सीता का दिल बैठ गया।

     

    उनकी बेटी की दादी को मरे हुए छह साल हो चुके थे।

     

    सीता ने उसे जोर से हिलाया।

     

    गुड़िया की आँखें खुलीं।

     

    वह रोते हुए बोली,

    “माँ, बाहर कोई मुझे बुला रहा था।”

     

    रघु ने उसी समय तय कर लिया कि उसे हरिया से सच जानना होगा।

     

    अगली सुबह वह हरिया के घर पहुँचा।

     

    बहुत पूछने पर हरिया ने पुरानी लकड़ी की एक संदूकची निकाली।

     

    उसमें एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में करीब पचास साल पहले का वही काला बरगद दिखाई दे रहा था।

     

    पेड़ के सामने तीन लकड़हारे खड़े थे।

     

    हरिया ने तस्वीर में बीच वाले आदमी की तरफ इशारा किया।

     

    “यह मेरा बड़ा भाई था।”

     

    रघु चुप रहा।

     

    हरिया बोला,

    “उस समय गाँव में अकाल पड़ा था। मेरे भाई और दो दूसरे लकड़हारे उस पेड़ को काटने गए थे। उन्होंने पहला वार किया तो पेड़ से खून निकला। दूसरा वार किया तो मेरे भाई ने अपनी ही आवाज में किसी को चीखते सुना।”

     

    “फिर?”

     

    “उस रात तीनों घर लौट आए। लेकिन अगले दिन मेरे भाई की परछाई गायब थी।”

     

    रघु की आँखें फैल गईं।

     

    “परछाई?”

     

    हरिया ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ। धूप में भी उसकी परछाई जमीन पर नहीं पड़ती थी।”

     

    “फिर क्या हुआ?”

     

    हरिया की आवाज काँपने लगी।

     

    “सात दिन बाद वह जंगल में चला गया। जाते-जाते उसने कहा था—‘पेड़ भूखा है।’”

     

    रघु ने पूछा,

    “उसे रोक क्यों नहीं लिया?”

     

    हरिया बोला,

    “क्योंकि उस समय तक गाँव के चार लोग गायब हो चुके थे।”

     

    अचानक बाहर से किसी बच्चे के चीखने की आवाज आई।

     

    दोनों दौड़कर बाहर निकले।

     

    रघु का बेटा मोहन सड़क के किनारे खड़ा था।

     

    उसके सामने जंगल की दिशा में एक काली परछाई थी।

     

    हरिया ने चिल्लाकर कहा,

    “मोहन को पीछे खींच!”

     

    रघु दौड़ा।

     

    जैसे ही उसने मोहन का हाथ पकड़ा, वह काली परछाई गायब हो गई।

     

    मोहन रोते हुए बोला,

    “बाबा, वह आदमी मुझे जंगल ले जाने आया था।”

     

    “कैसा आदमी?”

     

    मोहन ने जवाब दिया—

     

    “उसके चेहरे पर चेहरा नहीं था।”

     

    रघु के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उस रात रघु ने घर के सभी दरवाजे बंद कर दिए।

     

    लेकिन ठीक बारह बजे खिड़की पर किसी ने दस्तक दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    सीता बच्चों को लेकर अंदर चली गई।

     

    रघु ने खिड़की नहीं खोली।

     

    तभी बाहर से उसकी अपनी आवाज आई—

     

    “रघु… दरवाजा खोल।”

     

    रघु जम गया।

     

    वह आवाज बिल्कुल उसकी थी।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “मैं जंगल से वापस आ गया हूँ।”

     

    रघु ने काँपते हुए सीता का हाथ पकड़ लिया।

     

    “दरवाजा मत खोलना।”

     

    कुछ देर शांति रही।

     

    फिर बाहर से किसी के हँसने की आवाज आई।

     

    धीरे-धीरे वह हँसी तेज होती गई।

     

    और अचानक दरवाजे पर कुल्हाड़ी का वार हुआ।

     

    धड़ाम!

     

    लकड़ी में गहरा निशान पड़ गया।

     

    दूसरा वार।

     

    धड़ाम!

     

    तीसरा वार।

     

    धड़ाम!

     

    बच्चे चीखने लगे।

     

    रघु ने खिड़की से बाहर देखने की कोशिश की।

     

    दरवाजे के सामने कोई खड़ा था।

     

    उसका शरीर इंसान जैसा था।

     

    हाथ में कुल्हाड़ी थी।

     

    लेकिन उसके चेहरे की जगह सिर्फ काली खाली जगह थी।

     

    और सबसे डरावनी बात—

     

    उसकी जमीन पर कोई परछाई नहीं थी।

     

    अचानक वह आकृति खिड़की की तरफ मुड़ी।

     

    रघु पीछे हट गया।

     

    उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “पेड़ की एक शाखा काटी थी… अब पूरा घर देना होगा।”

     

    रघु ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    लेकिन दीवार पर एक काली दरार बन चुकी थी।

     

    वह दरार धीरे-धीरे फैल रही थी।

     

    और उसके अंदर से जंगल के पेड़ों जैसी शाखाएँ बाहर निकल रही थीं।

     

    रघु समझ गया—

     

    अब खतरा सिर्फ जंगल में नहीं था।

     

    जंगल उसके घर तक आ चुका था।

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    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱 जिस पेड़ को काटना मना था 😱(A COMPLETE Horror Story)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    (भाग 1: जंगल की मनाही)

     

    उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से गाँव बरवा के किनारे एक घना जंगल था। गाँव के लोग उस जंगल से लकड़ी, फल और सूखी टहनियाँ लाकर अपना गुजारा करते थे। लेकिन जंगल के बीचों-बीच एक ऐसा पेड़ था, जिसके पास जाने से भी लोग डरते थे।

     

    वह पेड़ बाकी पेड़ों से बिल्कुल अलग था।

     

    उसका तना इतना मोटा था कि उसे चार आदमी मिलकर भी घेर नहीं सकते थे। उसकी शाखाएँ ऊपर जाकर पूरे आसमान को ढक लेती थीं। दिन में भी उसके नीचे अजीब-सा अँधेरा रहता था। पेड़ की छाल काली थी और उस पर लाल रंग की नसों जैसी धारियाँ दिखाई देती थीं।

     

    गाँव के बुजुर्ग उसे “काला बरगद” कहते थे।

     

    कहा जाता था कि लगभग पचास साल पहले एक लकड़हारा उस पेड़ को काटने गया था। वह वापस तो आया, लेकिन उसके बाद उसने कभी किसी से बात नहीं की। कुछ दिनों बाद उसने अपना घर छोड़ दिया और जंगल में गायब हो गया।

     

    तब से गाँव में एक नियम था—

     

    “काले बरगद को कोई हाथ नहीं लगाएगा।”

     

    लेकिन गरीबी इंसान से कई बार वह काम करवा देती है, जिससे वह डरता है।

     

    गाँव में रहने वाला रघु एक गरीब लकड़हारा था। उसकी पत्नी और दो छोटे बच्चे थे। कई दिनों से उसे जंगल में सूखी लकड़ी कम मिल रही थी। घर में अनाज खत्म होने वाला था और उसकी पत्नी सीता बार-बार बच्चों की तरफ देखकर चिंतित हो जाती थी।

     

    एक शाम सीता ने धीरे से कहा,

    “रघु, कल बच्चों के लिए कुछ आटा ले आना। घर में बस आज रात का खाना बचा है।”

     

    रघु ने चुपचाप सिर हिला दिया।

     

    अगली सुबह वह अपनी पुरानी कुल्हाड़ी लेकर जंगल चला गया।

     

    काफी देर तक घूमने के बाद उसे एक भी अच्छी लकड़ी नहीं मिली। अचानक उसकी नजर काले बरगद पर पड़ी।

     

    वह कुछ देर तक उसे देखता रहा।

     

    उसके मन में विचार आया—

    “अगर इसकी एक बड़ी शाखा काट लूँ तो कई दिनों की लकड़ी मिल जाएगी।”

     

    उसे गाँव की मनाही याद थी।

     

    फिर बच्चों के भूखे चेहरे उसकी आँखों के सामने आ गए।

     

    रघु ने खुद से कहा,

    “मैं पूरा पेड़ थोड़े ही काट रहा हूँ। बस एक शाखा।”

     

    वह धीरे-धीरे पेड़ के पास पहुँचा।

     

    जैसे ही उसने पहला कदम उसकी छाया में रखा, जंगल की सारी आवाजें बंद हो गईं।

     

    न पक्षियों की आवाज।

     

    न हवा की सरसराहट।

     

    न पत्तों की आवाज।

     

    पूरा जंगल जैसे अचानक मर गया था।

     

    रघु के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    उसने ऊपर देखा।

     

    काले बरगद की एक मोटी शाखा उसके ठीक ऊपर थी।

     

    उसने कुल्हाड़ी उठाई।

     

    ठक!

     

    पहला वार हुआ।

     

    पेड़ से कोई आवाज नहीं आई।

     

    दूसरा वार—

     

    ठक!

     

    तीसरा वार—

     

    ठाऽऽक!

     

    अचानक पेड़ के अंदर से ऐसी आवाज आई जैसे किसी ने बहुत दूर से कराहते हुए कहा हो—

     

    “मत काटो…”

     

    रघु के हाथ से कुल्हाड़ी छूटते-छूटते बची।

     

    वह पीछे हट गया।

     

    उसने चारों तरफ देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    “शायद मेरा भ्रम है,” उसने खुद को समझाया।

     

    उसने कुल्हाड़ी फिर उठाई।

     

    तभी उसके पीछे सूखे पत्तों पर किसी के चलने की आवाज आई।

     

    चर्र… चर्र… चर्र…

     

    रघु ने पीछे देखा।

     

    कुछ नहीं।

     

    आवाज बंद।

     

    वह फिर पेड़ की तरफ मुड़ा।

     

    अब उसकी शाखा पर कुछ लाल दिखाई दे रहा था।

     

    पहले रघु को लगा कि वह पेड़ का रस है।

     

    लेकिन जब वह पास गया तो उसकी साँस अटक गई।

     

    वह लाल तरल खून जैसा था।

     

    और वह तने से धीरे-धीरे नीचे बह रहा था।

     

    रघु डर गया।

     

    उसने कुल्हाड़ी जमीन पर फेंकी और भागने लगा।

     

    लेकिन कुछ दूर जाकर उसे अपने पीछे वही आवाज सुनाई दी—

     

    “कुल्हाड़ी… छोड़कर कहाँ जा रहे हो?”

     

    रघु के पैरों की रफ्तार बढ़ गई।

     

    वह पीछे देखने की हिम्मत नहीं कर पाया।

     

    जंगल से बाहर निकलते ही उसे लगा कि अब वह सुरक्षित है।

     

    लेकिन घर पहुँचकर उसने देखा कि उसकी कुल्हाड़ी उसके हाथ में थी।

     

    वह घबरा गया।

     

    उसे याद था कि उसने कुल्हाड़ी पेड़ के पास ही छोड़ दी थी।

     

    उसने कुल्हाड़ी जमीन पर फेंक दी।

     

    रात को जब पूरा परिवार सो गया, रघु की आँख अचानक खुली।

     

    कमरे में अँधेरा था।

     

    उसे लगा जैसे कोई खिड़की के बाहर खड़ा है।

     

    उसने ध्यान से सुना।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    वही आवाज।

     

    जैसे कोई कुल्हाड़ी से पेड़ काट रहा हो।

     

    रघु ने खिड़की खोली।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    लेकिन मिट्टी पर गीले पैरों के निशान बने हुए थे।

     

    वे निशान दरवाजे से शुरू होकर सीधे उसके घर के अंदर जा रहे थे।

     

    रघु का गला सूख गया।

     

    उसने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।

     

    कमरे के कोने में उसकी कुल्हाड़ी पड़ी थी।

     

    उसकी धार पर ताजा लाल खून लगा था।

     

    और तभी अँधेरे में एक धीमी फुसफुसाहट सुनाई दी—

     

    “एक वार तुमने किया था… अब एक वार मेरी बारी है…”

     

    रघु चीखना चाहता था।

     

    लेकिन उसकी आवाज गले में ही अटक गई।

     

    उस रात के बाद बरवा गाँव में कुछ ऐसा होने वाला था, जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।

     

    क्योंकि रघु ने सिर्फ एक पेड़ को नहीं छेड़ा था।

     

    उसने जंगल के अंदर सोई हुई किसी चीज़ को जगा दिया था।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • परछाई (भाग 3 — आख़िरी परछाई)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    कुएँ के सामने खड़ा विवेक काँप रहा था।

     

    उसके सामने सफेद चेहरे वाली औरत खड़ी थी।

     

    उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    उसके बाल हवा में नहीं, बल्कि पानी के अंदर की तरह धीरे-धीरे तैर रहे थे।

     

    विवेक ने पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    औरत ने जवाब दिया—

     

    “मेरा कोई नाम नहीं।”

     

    “फिर लोग तुम्हें क्या कहते हैं?”

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “परछाई।”

     

    कुएँ के अंदर से अचानक कई आवाज़ें आने लगीं।

     

    किसी बच्चे की रोने की आवाज़।

     

    किसी बूढ़े के कराहने की आवाज़।

     

    किसी औरत की चीख।

     

    विवेक पीछे हट गया।

     

    औरत ने कहा—

     

    “तीस साल पहले तुम्हारे दादा और गाँव के कुछ लोगों ने मुझे बुलाया था।”

     

    “क्यों?”

     

    “उन्हें लगा कि अगर वे अपनी परछाइयों को अलग कर लें, तो वे मौत से बच सकते हैं।”

     

    “फिर?”

     

    “उन्होंने गलती की।”

     

    औरत की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “परछाई शरीर से अलग होने के बाद आज़ाद हो सकती है। लेकिन उसे जीवित रहने के लिए किसी इंसान की आत्मा चाहिए।”

     

    विवेक को समझ आ गया।

     

    “इसलिए तुम लोगों की परछाइयाँ चुराती हो।”

     

    “हाँ।”

     

    तभी पीछे से शंकर चाचा की आवाज़ आई—

     

    “विवेक!”

     

    वह मुड़ा।

     

    शंकर चाचा हाथ में एक पुराना दीपक लिए खड़े थे।

     

    उनके साथ विवेक की दादा की परछाई भी थी।

     

    वह परछाई धीरे-धीरे आगे बढ़ी।

     

    सफेद चेहरे वाली औरत ने उसे देखते ही गुस्से में कहा—

     

    “तुम अब भी जीवित हो?”

     

    परछाई ने जवाब दिया—

     

    “शरीर नहीं… लेकिन वादा अभी बाकी है।”

     

    विवेक ने पूछा—

     

    “कौन सा वादा?”

     

    शंकर चाचा ने कहा—

     

    “तुम्हारे दादा ने मरने से पहले अपनी परछाई को आदेश दिया था कि जब तक इस शक्ति को खत्म न कर दे, वह आज़ाद नहीं होगी।”

     

    अचानक काली हवा चलने लगी।

     

    पेड़ों की शाखाएँ टूटने लगीं।

     

    कुएँ के अंदर से काली परछाइयाँ बाहर निकलने लगीं।

     

    एक।

     

    दो।

     

    दस।

     

    फिर दर्जनों।

     

    हर परछाई किसी इंसान का रूप ले रही थी।

     

    विवेक ने डरकर पूछा—

     

    “ये कौन हैं?”

     

    शंकर चाचा ने कहा—

     

    “जिनकी परछाइयाँ उसने चुराई थीं।”

     

    काली परछाइयाँ धीरे-धीरे गाँव की तरफ बढ़ने लगीं।

     

    विवेक ने पूछा—

     

    “इन्हें कैसे रोकेंगे?”

     

    शंकर चाचा ने दीपक उसकी तरफ बढ़ाया।

     

    “यह दीपक तुम्हारी दादी ने बनाया था।”

     

    “इससे क्या होगा?”

     

    “जिस इंसान की परछाई उसके शरीर से अलग हो चुकी है, उसके सामने यह दीपक जलाओ। अगर वह परछाई सच में उसकी है, तो वापस शरीर में चली जाएगी।”

     

    विवेक ने दीपक लिया।

     

    सबसे पहली परछाई उसके सामने आई।

     

    उसने दीपक जलाया।

     

    परछाई काँपने लगी।

     

    फिर वह जमीन पर गिरकर धीरे-धीरे गायब हो गई।

     

    अगले ही पल गाँव के एक घर से किसी आदमी के जागने की आवाज़ आई।

     

    शंकर चाचा ने कहा—

     

    “एक वापस आ गई।”

     

    विवेक ने दीपक लेकर दूसरी परछाई की तरफ बढ़ा।

     

    एक-एक करके परछाइयाँ अपने असली शरीरों में लौटने लगीं।

     

    लेकिन सफेद चेहरे वाली औरत अब भी कुएँ के पास खड़ी थी।

     

    उसने हाथ उठाया।

     

    अचानक दीपक बुझ गया।

     

    “बस!”

     

    उसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि पूरा गाँव काँप गया।

     

    “तुम मेरी बनाई दुनिया को खत्म नहीं कर सकते।”

     

    वह अचानक हवा में उठी।

     

    उसका शरीर फैलने लगा।

     

    उसके बाल पूरे कुएँ को ढकने लगे।

     

    अब वह इंसान नहीं थी।

     

    एक विशाल काली आकृति बन चुकी थी।

     

    विवेक पीछे गिर पड़ा।

     

    उसने देखा कि उसकी अपनी परछाई भी अब वापस जमीन पर आ गई थी।

     

    लेकिन वह विवेक की तरह नहीं दिख रही थी।

     

    उसके पीछे दो सिर थे।

     

    एक उसके दादा का।

     

    दूसरा…

     

    विवेक का।

     

    विवेक समझ गया कि अगर वह डर गया तो वह शक्ति उसके शरीर पर कब्ज़ा कर लेगी।

     

    उसने आँखें बंद कीं।

     

    और पहली बार उसने अपनी परछाई से कहा—

     

    “तुम मेरी दुश्मन नहीं हो।”

     

    परछाई शांत हो गई।

     

    “तुम मेरे अंदर का डर हो।”

     

    अंधेरा काँपने लगा।

     

    “और मैं अपने डर से भागूँगा नहीं।”

     

    विवेक ने दीपक फिर जलाया।

     

    इस बार लौ बुझी नहीं।

     

    बल्कि तेज़ होती गई।

     

    सफेद चेहरे वाली औरत चीखी।

     

    “नहीं!”

     

    विवेक ने दीपक कुएँ के अंदर फेंक दिया।

     

    एक तेज़ सफेद रोशनी पूरे गाँव में फैल गई।

     

    सभी परछाइयाँ एक साथ चीखने लगीं।

     

    फिर एक-एक करके वे कुएँ में खिंचने लगीं।

     

    सफेद चेहरे वाली औरत भी पीछे खिंचने लगी।

     

    उसने आखिरी बार विवेक की ओर देखा।

     

    “तुमने मुझे खत्म नहीं किया।”

     

    विवेक चुप रहा।

     

    वह हँसी।

     

    “क्योंकि परछाई को खत्म नहीं किया जा सकता।”

     

    और फिर वह कुएँ में गायब हो गई।

     

    सब कुछ शांत हो गया।

     

    सुबह हुई।

     

    गाँव वालों ने देखा कि पुराने कुएँ के चारों तरफ की जमीन काली पड़ चुकी थी।

     

    शंकर चाचा ने कहा—

     

    “अब यह कुआँ हमेशा के लिए बंद करना होगा।”

     

    गाँव वालों ने उसे पत्थरों से भर दिया।

     

    विवेक ने अपनी दादा-दादी की तस्वीर घर से निकालकर मंदिर में रख दी।

     

    वह गाँव छोड़ने ही वाला था कि उसकी नजर दीवार पर पड़ी।

     

    सुबह की तेज़ धूप में उसकी परछाई जमीन पर साफ दिखाई दे रही थी।

     

    विवेक मुस्कुराया।

     

    उसने हाथ उठाया।

     

    परछाई ने भी हाथ उठाया।

     

    सब सामान्य था।

     

    वह जाने लगा।

     

    लेकिन तभी…

     

    उसकी परछाई ने हाथ नीचे नहीं किया।

     

    विवेक रुक गया।

     

    उसने धीरे-धीरे पीछे देखा।

     

    परछाई अब भी हाथ उठाए खड़ी थी।

     

    विवेक ने अपना हाथ नीचे किया।

     

    परछाई ने नहीं किया।

     

    उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    फिर परछाई ने धीरे-धीरे अपना सिर घुमाया।

     

    वह विवेक की ओर नहीं…

     

    कुएँ की ओर देख रही थी।

     

    कुएँ के नीचे से हल्की लाल रोशनी दिखाई दे रही थी।

     

    और उसी समय विवेक के कान के पास किसी ने फुसफुसाया—

     

    “एक परछाई अभी बाकी है…”

     

    विवेक ने झटके से पीछे देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    उसने फिर जमीन की तरफ देखा।

     

    अब वहाँ उसकी परछाई अकेली नहीं थी।

     

    उसके बिल्कुल पीछे…

     

    एक दूसरी छोटी-सी परछाई खड़ी थी।

     

    विवेक का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    छोटी परछाई ने धीरे-धीरे अपना हाथ उठाया।

     

    और उसके हाथ में…

     

    एक पुरानी लाल चूड़ी थी।

     

    विवेक समझ गया—

     

    जिस शक्ति को उन्होंने कुएँ में बंद किया था…

     

    वह खत्म नहीं हुई थी।

     

    वह सिर्फ…

     

    एक नई परछाई की तलाश में थी।

     

    और इस बार…

     

    उसकी नजर विवेक पर नहीं थी।

     

    उसकी नजर थी—

     

    विवेक के आने वाले बच्चे पर।

     

    समाप्त।

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    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • परछाई (भाग 2 — तहखाने का रहस्य)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    विवेक घंटों तक अपनी परछाई को देखता रहा।

     

    सूरज ऊपर था।

     

    उसकी परछाई जमीन पर होनी चाहिए थी।

     

    लेकिन वह पाँच कदम दूर खड़ी थी।

     

    विवेक एक कदम आगे बढ़ा।

     

    परछाई वहीं रही।

     

    वह पीछे हटा।

     

    परछाई फिर भी नहीं हिली।

     

    विवेक का गला सूख गया।

     

    उसे शंकर चाचा की बात याद आई—

     

    “तुम्हारे दादा ने कहा था कि उनकी परछाई उनसे पहले घर पहुँच गई है।”

     

    विवेक ने तय किया कि अब वह घर में नहीं रहेगा।

     

    उसने अपना बैग उठाया और दरवाज़े की ओर बढ़ा।

     

    लेकिन जैसे ही उसने बाहर कदम रखा, उसकी परछाई अचानक उसके सामने आ गई।

     

    वह रास्ता रोककर खड़ी थी।

     

    विवेक पीछे हट गया।

     

    परछाई ने अपना हाथ उठाया और घर के तहखाने की तरफ इशारा किया।

     

    फिर जमीन पर एक शब्द उभरा—

     

    “सच।”

     

    विवेक समझ गया कि उसे तहखाने में जाना होगा।

     

    घर के पीछे पुराने स्टोर रूम में उसे एक लोहे का दरवाज़ा मिला।

     

    दरवाज़े पर मोटा ताला लगा था।

     

    उसे अपनी दादी की पुरानी चाबी याद आई।

     

    कुछ देर खोजने के बाद उसे एक लकड़ी के संदूक में चाबी मिल गई।

     

    ताला खुल गया।

     

    दरवाज़ा खोलते ही सड़ी हुई मिट्टी की गंध आई।

     

    सीढ़ियाँ नीचे जा रही थीं।

     

    विवेक मोबाइल की रोशनी जलाकर नीचे उतरने लगा।

     

    हर सीढ़ी के साथ ठंड बढ़ती जा रही थी।

     

    नीचे पहुँचकर उसे एक छोटा कमरा मिला।

     

    कमरे की दीवारों पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।

     

    विवेक ने पहली तस्वीर देखी।

     

    उसमें उसके दादा थे।

     

    दूसरी में उसकी दादी।

     

    तीसरी में…

     

    एक अजनबी आदमी।

     

    लेकिन हर तस्वीर में एक चीज़ समान थी।

     

    सबकी परछाई अलग थी।

     

    किसी की परछाई पीछे नहीं थी।

     

    किसी की बगल में थी।

     

    और एक तस्वीर में आदमी खड़ा था…

     

    लेकिन उसकी परछाई दीवार पर बैठी हुई थी।

     

    विवेक के हाथ काँपने लगे।

     

    तभी उसे एक पुरानी डायरी मिली।

     

    डायरी उसके दादा की थी।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “परछाई शरीर की नहीं, आत्मा की होती है।”

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “हर इंसान की परछाई उसके साथ जन्म लेती है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति अपनी परछाई से डरने लगे, तो वह परछाई धीरे-धीरे स्वतंत्र हो सकती है।”

     

    विवेक ने पन्ना पलटा।

     

    “मैंने उसे पहली बार कुएँ के पास देखा था।”

     

    अगले पन्ने पर—

     

    “वह मेरी नकल करती थी।”

     

    फिर—

     

    “कल रात उसने मुझसे पहले घर में प्रवेश किया।”

     

    विवेक की साँस रुक गई।

     

    फिर एक वाक्य था—

     

    “अगर मेरी परछाई अलग हो जाए तो मुझे मार देना, क्योंकि फिर मैं मैं नहीं रहूँगा।”

     

    डायरी उसके हाथ से गिर गई।

     

    अचानक तहखाने की लाइट जल गई।

     

    विवेक चौंक गया।

     

    सामने एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।

     

    “कौन?”

     

    आदमी धीरे-धीरे आगे आया।

     

    वह शंकर चाचा थे।

     

    विवेक ने राहत की साँस ली।

     

    “चाचा, आप यहाँ कैसे?”

     

    शंकर चाचा ने कहा—

     

    “क्योंकि अब समय आ गया है कि तुम्हें सब पता चले।”

     

    उन्होंने एक पुरानी तस्वीर दी।

     

    तस्वीर में पाँच लोग थे।

     

    विवेक के दादा, शंकर चाचा, गाँव का पुराना प्रधान और दो अजनबी लोग।

     

    पीछे एक पुराना कुआँ दिखाई दे रहा था।

     

    “ये कौन लोग हैं?”

     

    शंकर चाचा बोले—

     

    “तीस साल पहले गाँव में एक साधु आया था। उसने दावा किया था कि वह इंसान की परछाई को अलग करके उसे हमेशा के लिए नियंत्रित कर सकता है।”

     

    विवेक ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “धन और ताकत के लिए।”

     

    “क्या मेरे दादा ने उसकी मदद की?”

     

    “हाँ।”

     

    विवेक का चेहरा कठोर हो गया।

     

    “फिर?”

     

    शंकर चाचा ने कहा—

     

    “प्रयोग के दौरान कुछ गलत हो गया।”

     

    “क्या?”

     

    “साधु की अपनी परछाई उसके शरीर से अलग हो गई।”

     

    विवेक ने धीरे से पूछा—

     

    “और फिर?”

     

    “उसने बाकी लोगों की परछाइयाँ निगलना शुरू कर दिया।”

     

    तभी तहखाने में तेज़ हवा चली।

     

    दीवार पर लगी सभी तस्वीरें एक साथ हिलने लगीं।

     

    विवेक की अपनी परछाई दीवार पर दिखाई दी।

     

    लेकिन अब उसके पीछे एक दूसरी बड़ी परछाई खड़ी थी।

     

    शंकर चाचा ने घबराकर कहा—

     

    “वह आ गया।”

     

    अंधेरे में एक भारी आवाज़ गूँजी—

     

    “तुम्हारे दादा ने मुझे धोखा दिया था।”

     

    विवेक ने पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    दीवार पर एक विशाल काली आकृति बनी।

     

    “मैं वह हूँ जिसे तुम्हारे दादा ने जगाया था।”

     

    “तुमने उन्हें मारा?”

     

    “नहीं।”

     

    आवाज़ हँसी।

     

    “उन्होंने खुद अपनी परछाई मुझे दे दी थी।”

     

    विवेक पीछे हट गया।

     

    “मेरी परछाई तुमसे क्यों जुड़ी है?”

     

    “क्योंकि तुम उसी खून से हो।”

     

    अचानक विवेक की परछाई जमीन से उठकर दीवार पर चढ़ गई।

     

    वह धीरे-धीरे इंसान का आकार लेने लगी।

     

    फिर उसकी आवाज़ आई—

     

    “मुझे आज़ाद करो।”

     

    विवेक ने चौंककर कहा—

     

    “तुम बोल सकती हो?”

     

    परछाई ने सिर हिलाया।

     

    “मैं तुम्हारी परछाई नहीं हूँ।”

     

    “तो कौन हो?”

     

    उसने जवाब दिया—

     

    “मैं तुम्हारे दादा की परछाई हूँ।”

     

    विवेक स्तब्ध रह गया।

     

    “मेरे दादा की?”

     

    “उन्होंने अपनी आत्मा का एक हिस्सा मुझे देकर उस काली शक्ति को कैद किया था।”

     

    शंकर चाचा ने कहा—

     

    “लेकिन अब वह कैद टूट रही है।”

     

    तभी तहखाने का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    काली शक्ति की आवाज़ गूँजी—

     

    “आज तुम्हारे शरीर की बारी है।”

     

    अचानक विवेक की परछाई उसके शरीर से अलग होकर सामने आ गई।

     

    कमरे में दो परछाइयाँ थीं।

     

    एक विवेक की।

     

    दूसरी काली शक्ति की।

     

    दोनों एक-दूसरे पर टूट पड़ीं।

     

    दीवारें काँपने लगीं।

     

    शंकर चाचा चिल्लाए—

     

    “विवेक! कुएँ तक जाओ!”

     

    “क्यों?”

     

    “वहीं से इसे वापस भेजा जा सकता है!”

     

    विवेक दौड़कर सीढ़ियों की ओर गया।

     

    पीछे से काली परछाई उसका पीछा करने लगी।

     

    वह लगभग उसके पैरों तक पहुँच चुकी थी।

     

    विवेक बाहर निकला और पुराने कुएँ की तरफ भागा।

     

    लेकिन वहाँ पहुँचते ही उसने देखा—

     

    कुएँ के अंदर कोई खड़ा था।

     

    एक औरत।

     

    सफेद चेहरा।

     

    काले बाल।

     

    और उसकी परछाई…

     

    कुएँ की दीवार पर नहीं थी।

     

    वह सीधे विवेक की तरफ आ रही थी।

     

    औरत ने धीरे से कहा—

     

    “तुम्हारे दादा ने मुझे यहाँ बंद किया था।”

     

    विवेक ने काँपते हुए पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    औरत ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मैं वह परछाई हूँ… जिससे बाकी सारी परछाइयाँ पैदा हुई थीं।”

     

    कुएँ के अंदर से अचानक हजारों लोगों की फुसफुसाहट सुनाई देने लगी।

     

    और विवेक ने महसूस किया—

     

    उसकी अपनी परछाई अब पूरी तरह गायब हो चुकी थी।

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    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • परछाई (भाग 1 )

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

     

     

    शहर से लगभग चालीस किलोमीटर दूर एक छोटा-सा गाँव था—देवगढ़। गाँव देखने में बिल्कुल सामान्य था। चारों तरफ खेत, पुराने पेड़, मिट्टी के रास्ते और दूर तक फैले छोटे-छोटे घर। लेकिन गाँव की एक बात अजीब थी। यहाँ लोग सूर्यास्त के बाद अपने घरों के बाहर आईना नहीं रखते थे। और रात में अगर किसी की परछाई उसके शरीर से अलग दिशा में दिखाई दे… तो लोग उसे देखने की कोशिश भी नहीं करते थे। क्योंकि देवगढ़ में एक पुरानी मान्यता थी— “हर इंसान की एक परछाई होती है… लेकिन कभी-कभी किसी की परछाई इंसान की नहीं रहती।” इसी गाँव में कई साल बाद विवेक वापस आया था। वह शहर में नौकरी करता था और अपनी दादी की मृत्यु के बाद गाँव का पुराना घर बेचने आया था। घर लगभग बीस साल से बंद था। जैसे ही उसने मुख्य दरवाज़ा खोला, अंदर से धूल और सीलन की गंध आई। कमरे में पुराने फर्नीचर पड़े थे। दीवार पर उसके दादा-दादी की तस्वीर लगी थी। विवेक ने तस्वीर साफ की। तभी उसकी नजर तस्वीर के नीचे लगी एक छोटी-सी काली पट्टी पर पड़ी। उस पर लिखा था— “पीछे मत देखना।” विवेक हँस पड़ा। “दादी भी न…” उसे लगा शायद यह कोई पुरानी मज़ाकिया बात होगी। शाम तक उसने घर की सफाई कर ली। रात को बिजली चली गई। विवेक ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई और बरामदे में बैठ गया। आसमान में बादल थे। गाँव बिल्कुल शांत था। तभी उसे सामने की दीवार पर अपनी परछाई दिखाई दी। विवेक ने हाथ उठाया। परछाई ने भी हाथ उठाया। उसने सिर दाईं तरफ घुमाया। परछाई ने भी सिर घुमाया। विवेक मुस्कुराया। “सब ठीक है।” फिर उसने अपना हाथ नीचे कर लिया। परछाई ने भी हाथ नीचे कर लिया। कुछ सेकंड बाद… विवेक ने अचानक देखा कि परछाई ने अपना सिर ऊपर उठा लिया था। विवेक स्थिर खड़ा था। उसकी परछाई… उसे देख रही थी। विवेक की रीढ़ में ठंड उतर गई। उसने तुरंत मोबाइल की रोशनी बंद कर दी। अंधेरा छा गया। कुछ सेकंड बाद उसने फिर रोशनी जलाई। परछाई गायब थी। विवेक ने खुद को समझाया कि शायद रोशनी के कोण की वजह से ऐसा हुआ होगा। वह कमरे में जाकर सो गया। रात लगभग दो बजे उसकी आँख खुली। उसे लगा जैसे कोई उसके कमरे के बाहर चल रहा है। ठक… ठक… ठक… विवेक बिस्तर से उठा। दरवाज़े के नीचे से हल्की रोशनी आ रही थी। वह धीरे से दरवाज़े के पास गया। “कौन है?” कोई जवाब नहीं। उसने दरवाज़ा खोला। बाहर कोई नहीं था। लेकिन फर्श पर… एक लंबी काली परछाई दिखाई दे रही थी। विवेक ने ऊपर देखा। कोई इंसान वहाँ खड़ा नहीं था। परछाई अकेली थी। वह धीरे-धीरे दीवार पर चढ़ रही थी। विवेक पीछे हट गया। अचानक परछाई ने अपना सिर उसकी ओर घुमाया। विवेक ने डरकर दरवाज़ा बंद कर दिया। पूरी रात वह जागता रहा। सुबह उसने पड़ोसी शंकर चाचा से पूछा— “चाचा, इस घर में पहले कुछ हुआ था क्या?” शंकर चाचा कुछ देर उसे देखते रहे। “तुम्हारी दादी ने तुम्हें कुछ नहीं बताया?” “नहीं।” “तो अच्छा ही हुआ।” विवेक ने पूछा— “क्या हुआ था?” शंकर चाचा ने धीमी आवाज़ में कहा— “तुम्हारे दादा की मौत सामान्य नहीं थी।” विवेक चौंक गया। “क्या मतलब?” “जिस रात उनकी मौत हुई थी, उन्होंने पूरे गाँव में एक ही बात कही थी।” “क्या?” शंकर चाचा ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा— “मेरी परछाई मुझसे पहले घर पहुँच गई है।” विवेक के शरीर में सिहरन दौड़ गई। “फिर?” “सुबह तुम्हारे दादा मृत मिले।” “और उनकी परछाई?” शंकर चाचा ने कोई जवाब नहीं दिया। विवेक ने जोर देकर पूछा— “चाचा, बताइए।” शंकर चाचा ने कहा— “उनकी लाश के पास कोई परछाई नहीं थी।” विवेक के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसी रात उसने अपने कमरे में लगे पुराने आईने को देखा। आईने में उसका चेहरा दिखाई दे रहा था। लेकिन उसके पीछे… एक काली आकृति खड़ी थी। विवेक तुरंत पीछे मुड़ा। कमरा खाली था। उसने फिर आईने में देखा। आकृति अब भी वहीं थी। इस बार वह और करीब थी। विवेक ने डरते हुए आईने को कपड़े से ढक दिया। तभी पीछे से आवाज़ आई— “तुम्हें दादा ने चेतावनी दी थी।” विवेक का दिल रुकने जैसा हो गया। उसने धीरे-धीरे पीछे देखा। कमरे में कोई नहीं था। लेकिन दीवार पर उसकी परछाई दिखाई दे रही थी। विवेक स्थिर था। फिर भी परछाई… चल रही थी। उसने अपना हाथ उठाया। फिर दीवार पर लिखने लगी। धीरे-धीरे काली उँगली से दीवार पर एक शब्द उभरा— “भागो।” विवेक पीछे हट गया। तभी खिड़की अपने आप खुल गई। बाहर तेज़ हवा चलने लगी। और आँगन में उसे एक दूसरी परछाई दिखाई दी। वह किसी आदमी की थी। वह धीरे-धीरे घर की तरफ बढ़ रही थी। विवेक ने मोबाइल की रोशनी बाहर डाली। कोई इंसान नहीं था। सिर्फ परछाई। वह परछाई दरवाज़े तक आई। फिर दरवाज़े के नीचे से अंदर घुस गई। विवेक चीख पड़ा। परछाई फर्श पर रेंगती हुई उसके पैरों तक पहुँची। फिर अचानक उसके पैर की परछाई से जुड़ गई। विवेक ने महसूस किया कि उसका शरीर ठंडा पड़ रहा है। उसे लगा जैसे कोई उसके अंदर घुस रहा हो। तभी दीवार पर एक और शब्द उभरा— “दूसरी रात।” विवेक बेहोश होकर गिर पड़ा। सुबह जब उसकी आँख खुली तो वह फर्श पर पड़ा था। सब कुछ सामान्य था। लेकिन जब उसने सूरज की रोशनी में जमीन पर देखा… उसकी परछाई उसके पैरों के नीचे नहीं थी। वह उससे लगभग पाँच कदम दूर खड़ी थी। और… वह विवेक की तरफ नहीं देख रही थी। वह घर के बंद पड़े तहखाने की ओर देख रही थी। विवेक ने पहली बार महसूस किया— वह परछाई अब उसकी नहीं रही थी।

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    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • लाल चुड़ैल

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    (भाग 5 — तीसरे दरवाज़े के पीछे)

     

    अमन और रवि उस लोहे के दरवाज़े के सामने खड़े थे।

     

    दरवाज़े पर वही चेतावनी लिखी थी—

     

    “जो इसे खोलेगा, उसकी आत्मा कभी वापस नहीं आएगी।”

     

    चंद्रा कुछ दूरी पर खड़ी थी।

     

    उसके चेहरे पर पहली बार डर साफ दिखाई दे रहा था।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “अगर इसे खोलना इतना खतरनाक है, तो हमें यहाँ क्यों लाया गया?”

     

    चंद्रा ने जवाब दिया—

     

    “क्योंकि अब वह दरवाज़ा खुद खुलना चाहता है।”

     

    जैसे ही उसने यह कहा—

     

    ठक।

     

    दरवाज़े के अंदर से किसी ने दस्तक दी।

     

    रवि पीछे हट गया।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    तीन बार दस्तक।

     

    फिर एक आवाज़ आई—

     

    “अमन…”

     

    अमन का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    आवाज़ उसकी माँ जैसी थी।

     

    उसकी माँ की मृत्यु कई साल पहले हो चुकी थी।

     

    “बेटा… दरवाज़ा खोलो।”

     

    अमन की आँखों में आँसू आ गए।

     

    रवि ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “यह तुम्हारी माँ नहीं है।”

     

    अंदर से फिर आवाज़ आई—

     

    “अमन… मैं बहुत अकेली हूँ।”

     

    अमन कुछ कदम आगे बढ़ा।

     

    चंद्रा ने जोर से कहा—

     

    “नहीं!”

     

    अमन रुक गया।

     

    चंद्रा की आवाज़ काँप रही थी।

     

    “यह वही करती है।”

     

    “कौन?”

     

    “वह शक्ति लोगों की सबसे प्यारी आवाज़ बनकर उन्हें अपने पास बुलाती है।”

     

    अचानक दरवाज़े के नीचे से काला धुआँ बाहर निकलने लगा।

     

    रवि ने पूछा—

     

    “इसे रोकेंगे कैसे?”

     

    चंद्रा ने कहा—

     

    “जिस चीज़ से यह शक्ति बनी है, उसे वापस वहीं रखना होगा।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    चंद्रा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मेरा लॉकेट।”

     

    अमन ने लॉकेट निकाला।

     

    चंद्रा ने कहा—

     

    “इसमें मेरी और गौरी की आखिरी याद बंद है। देवेंद्र ने इसी याद को इस्तेमाल करके उस शक्ति को जगाया था।”

     

    अमन ने लॉकेट दरवाज़े के सामने रखा।

     

    अचानक दरवाज़ा काँपने लगा।

     

    अंदर से भयानक चीख सुनाई दी।

     

    “नहीं!”

     

    लोहे का दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

     

    अंदर कोई कमरा नहीं था।

     

    सिर्फ अंधेरा।

     

    ऐसा अंधेरा जिसमें टॉर्च की रोशनी भी गायब हो रही थी।

     

    फिर अंधेरे के बीच एक विशाल लाल आँख खुली।

     

    रवि चीख पड़ा।

     

    “भागो!”

     

    लेकिन अमन वहीं खड़ा रहा।

     

    उसे लगा जैसे कोई उसे अपनी ओर खींच रहा हो।

     

    उसने देखा कि उसके सामने उसकी माँ खड़ी है।

     

    “बेटा…”

     

    अमन की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    “माँ?”

     

    उसने हाथ आगे बढ़ाया।

     

    लेकिन तभी उसे चंद्रा की बात याद आई।

     

    यह असली नहीं था।

     

    अमन ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “तुम मेरी माँ नहीं हो।”

     

    उस आकृति का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    माँ का चेहरा पिघलकर एक भयानक लाल चेहरा बन गया।

     

    उसने चीखते हुए अमन पर हमला किया।

     

    अमन पीछे गिर पड़ा।

     

    रवि ने लाल लॉकेट उठाकर उस शक्ति की ओर फेंक दिया।

     

    लॉकेट हवा में चमकने लगा।

     

    चंद्रा ने अपनी पूरी शक्ति से कहा—

     

    “गौरी!”

     

    अचानक छोटी बच्ची की आवाज़ गूँजी—

     

    “माँ!”

     

    एक सफेद रोशनी कमरे में फैल गई।

     

    गौरी की आत्मा सामने दिखाई दी।

     

    वह धीरे-धीरे उस लाल शक्ति की ओर बढ़ी।

     

    लाल शक्ति पीछे हटने लगी।

     

    “नहीं…”

     

    गौरी ने कहा—

     

    “तूने मेरी माँ को मुझसे छीना था।”

     

    शक्ति गरजी—

     

    “तुम दोनों मेरी वजह से पैदा नहीं हुईं! तुम्हारे डर से मैं बनी हूँ!”

     

    चंद्रा ने कहा—

     

    “और अब तुम्हारा डर खत्म हो गया।”

     

    गौरी ने चंद्रा का हाथ पकड़ लिया।

     

    दोनों की आत्माएँ रोशनी में बदलने लगीं।

     

    लाल शक्ति चीखने लगी।

     

    “नहीं!”

     

    अमन ने देखा कि लॉकेट टूट गया।

     

    उसमें से एक तेज़ रोशनी निकली।

     

    पूरी सुरंग हिलने लगी।

     

    दीवारें टूटने लगीं।

     

    रवि ने अमन को खींचा।

     

    “हमें निकलना होगा!”

     

    दोनों भागते हुए सुरंग से बाहर निकले।

     

    पीछे से एक भयानक विस्फोट हुआ।

     

    लाल हवेली का एक बड़ा हिस्सा गिर गया।

     

    सुबह तक वहाँ सिर्फ टूटी हुई दीवारें बची थीं।

     

    गाँव वालों ने देखा कि बरगद के पेड़ के नीचे लाल साड़ी का एक टुकड़ा पड़ा था।

     

    लेकिन चंद्रा कहीं नहीं थी।

     

    उस दिन के बाद अमावस्या की रात पायल की आवाज़ कभी नहीं सुनाई दी।

     

    लाल हवेली हमेशा के लिए खामोश हो गई।

     

    अमन ने शहर लौटने से पहले बरगद के नीचे एक छोटा-सा दीपक जलाया।

     

    रवि उसके पास खड़ा था।

     

    “अब सब खत्म हो गया?”

     

    अमन ने कहा—

     

    “शायद।”

     

    दोनों वापस जाने लगे।

     

    लेकिन अमन ने अचानक पीछे मुड़कर देखा।

     

    बरगद के पेड़ की एक शाखा पर कुछ लटक रहा था।

     

    वही लाल चूड़ी।

     

    अमन धीरे-धीरे उसके पास गया।

     

    चूड़ी के अंदर एक छोटा कागज़ फँसा था।

     

    उसने कागज़ खोला।

     

    उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “चंद्रा चली गई है… लेकिन लाल चुड़ैल कभी एक नहीं थी।”

     

    अमन की साँस रुक गई।

     

    उसी समय गाँव के दूसरे छोर से किसी औरत के चीखने की आवाज़ आई।

     

    फिर पायल की आवाज़।

     

    छन… छन… छन…

     

    रवि ने डरते हुए पूछा—

     

    “यह आवाज़ कहाँ से आ रही है?”

     

    अमन ने दूर देखा।

     

    गाँव की एक बंद पड़ी हवेली की खिड़की में एक औरत खड़ी थी।

     

    लाल साड़ी में।

     

    उसके पीछे…

     

    एक नहीं…

     

    तीन परछाइयाँ थीं।

     

    अमन समझ गया।

     

    लाल चुड़ैल की कहानी खत्म नहीं हुई थी।

     

    शायद चंद्रा सिर्फ उस रहस्य का एक हिस्सा थी।

     

    और अब गाँव में एक नई अमावस्या आने वाली थी।

     

    खिड़की में खड़ी औरत ने धीरे-धीरे हाथ उठाया।

     

    फिर उसने दूर खड़े अमन की तरफ इशारा किया।

     

    उसके होंठ हिले—

     

    “अगली बार… मैं तुम्हें लेने आऊँगी।”

     

    अमन ने पलक झपकाई।

     

    खिड़की खाली थी।

     

    लेकिन उसके कानों में आखिरी आवाज़ अब भी गूँज रही थी—

     

    छन… छन… छन…

     

    समाप्त।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।