🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

लेखक: Alka Singh

Avatar photo

Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

कृपया लॉग‑इन करें लेखक को मैसेज करने के लिए।

1 Follower
📝
232
रचनाएँ
👁️
8,638
व्यूज़
❤️
20
लाइक
💬
7
Comments
📅
मार्च 2026
सदस्य बने
👥 लेखक नेटवर्क
👥 Followers 1
  • आहट — उस बंद कमरे का राज़ (part-3)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

     

    आरव कुछ क्षणों तक उस अंधेरी सीढ़ी के सामने खड़ा रहा। नीचे से आती कदमों की आवाज़ धीरे-धीरे और साफ होती जा रही थी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    उसने टॉर्च नीचे की ओर की।

     

    सीढ़ियाँ पुरानी थीं। उन पर मोटी धूल जमी हुई थी, लेकिन कुछ जगहों पर ताज़ा गीले पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे।

     

    आरव ने खुद को संभाला और नीचे उतरना शुरू किया।

     

    पहली सीढ़ी…

     

    दूसरी…

     

    तीसरी…

     

    जैसे-जैसे वह नीचे जा रहा था, हवा ठंडी होती जा रही थी।

     

    तहखाने में पहुँचते ही उसकी नाक में मिट्टी और सड़न की तेज़ गंध आई।

     

    सामने एक लंबा कमरा था।

     

    दीवारों पर पुराने लालटेन लगे थे। कुछ टूटी कुर्सियाँ और लकड़ी के बक्से इधर-उधर पड़े थे।

     

    लेकिन सबसे अजीब चीज़ कमरे के बीच में रखी एक पुरानी मेज़ थी।

     

    उस मेज़ पर एक लाल कपड़ा बिछा था।

     

    और उसके ऊपर एक छोटा सा टेप रिकॉर्डर रखा था।

     

    आरव धीरे-धीरे उसके पास गया।

     

    टेप रिकॉर्डर अपने आप चलने लगा।

     

    पहले सिर्फ खरखराहट सुनाई दी।

     

    फिर एक आवाज़ आई।

     

    आरव ने तुरंत पहचान लिया।

     

    वह उसके पिता की आवाज़ थी।

     

    “अगर तुम यह रिकॉर्डिंग सुन रहे हो, आरव… तो इसका मतलब है कि तुम हवेली तक पहुँच चुके हो।”

     

    आरव की आँखें फैल गईं।

     

    रिकॉर्डिंग में उसके पिता बोल रहे थे—

     

    “मुझे पता था कि एक दिन तुम्हें सच बताना पड़ेगा। लेकिन मैं चाहता था कि वह दिन जितना देर से आए, उतना अच्छा हो।”

     

    कुछ सेकंड खामोशी रही।

     

    फिर आवाज़ आई—

     

    “मीरा की मौत के पीछे देवेंद्र था। लेकिन देवेंद्र अकेला नहीं था।”

     

    आरव ने टेप रिकॉर्डर को दोनों हाथों से पकड़ लिया।

     

    “उस रात मीरा ने एक बच्चे को जन्म दिया था। वह बच्चा…”

     

    रिकॉर्डिंग अचानक रुक गई।

     

    आरव ने टेप को थपथपाया।

     

    “नहीं… नहीं… आगे बोलो!”

     

    टेप फिर चला।

     

    “वह बच्चा ही इस पूरे राज़ की वजह था।”

     

    आरव के माथे पर पसीना आ गया।

     

    “देवेंद्र उस बच्चे को खत्म करना चाहता था। मैंने बच्चे को बचाने की कोशिश की, लेकिन मीरा को नहीं बचा पाया।”

     

    आरव की साँस रुक गई।

     

    “अगर तुम यह सुन रहे हो तो याद रखना… तुम्हारी माँ ने तुम्हें जन्म नहीं दिया था।”

     

    टेप अचानक बंद हो गया।

     

    आरव के हाथ सुन्न पड़ गए।

     

    “तो… मैं कौन हूँ?”

     

    तभी तहखाने के दूसरे कोने से एक बच्चे के रोने की आवाज़ आई।

     

    “माँ…”

     

    आरव धीरे-धीरे आवाज़ की ओर बढ़ा।

     

    वहाँ एक पुराना लकड़ी का पालना रखा था।

     

    पालना अपने आप हिल रहा था।

     

    चर्र… चर्र… चर्र…

     

    आरव ने काँपते हाथ से पालने के अंदर टॉर्च की रोशनी डाली।

     

    अंदर कोई बच्चा नहीं था।

     

    सिर्फ एक पुराना काला लॉकेट पड़ा था।

     

    आरव ने लॉकेट उठाया।

     

    उसके पीछे एक तारीख खुदी थी—

     

    17 जुलाई 1998।

     

    अचानक उसके पीछे दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    कमरे में अब वह अकेला नहीं था।

     

    एक आदमी दीवार के पास खड़ा था।

     

    उसका चेहरा अंधेरे में छिपा हुआ था।

     

    “तुम कौन हो?” आरव ने पूछा।

     

    आदमी धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    उसका चेहरा देखकर आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    वह बिल्कुल उसके पिता जैसा दिखता था।

     

    “पापा?”

     

    आदमी मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारे पिता नहीं।”

     

    उसकी आवाज़ भारी थी।

     

    “मैं देवेंद्र हूँ।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “लेकिन… देवेंद्र तो मर चुका है।”

     

    आदमी ने कहा—

     

    “कुछ लोग मरकर भी खत्म नहीं होते।”

     

    तभी कमरे की सारी लालटेन एक साथ बुझ गईं।

     

    अंधेरे में सिर्फ देवेंद्र की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें बचाने के लिए झूठ बोला था। लेकिन वह एक बात छिपाना भूल गए।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    देवेंद्र की हँसी गूँज उठी।

     

    “तुम इस हवेली के वारिस नहीं हो… तुम इसके कैदी हो।”

     

    अचानक आरव के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई।

     

    वह एक गड्ढे में गिर पड़ा।

     

    उसके सिर पर जोर से चोट लगी और उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया।

     

    जब उसे होश आया तो वह उसी बंद कमरे में था, जहाँ मीरा का आईना था।

     

    उसके सामने मीरा खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार उसकी आँखों में डर नहीं…

     

    गुस्सा था।

     

    उसने दीवार की ओर इशारा किया।

     

    दीवार पर एक-एक करके कई तस्वीरें दिखाई देने लगीं।

     

    पहली तस्वीर में उसके पिता थे।

     

    दूसरी में मीरा।

     

    तीसरी में देवेंद्र।

     

    और चौथी तस्वीर में…

     

    एक छोटा बच्चा।

     

    आरव उस तस्वीर को देखते ही समझ गया।

     

    बच्चे के गले में वही लॉकेट था जो अभी उसके हाथ में था।

     

    मीरा ने धीरे से कहा—

     

    “तुम्हें अपने जन्म का सच जानना होगा।”

     

    अचानक आईना टूट गया।

     

    छन्न्न!

     

    काँच के टुकड़ों के बीच एक आखिरी शब्द उभरा—

     

    “माँ तुम्हारी हत्या करने नहीं, तुम्हें बचाने आई है।”

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा—

     

    “लेकिन मेरी माँ कौन है?”

     

    मीरा की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    उसने आरव की ओर देखा और बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “मैं।”

     

    उसी क्षण कमरे की सारी खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं।

     

    बाहर बिजली चमकी।

     

    और आरव ने पहली बार उस चेहरे को साफ देखा।

     

    वह वही महिला थी जो उसके पिता की तस्वीर में खड़ी थी।

     

    मीरा।

     

    लेकिन इससे भी बड़ा सवाल अभी बाकी था—

     

    अगर मीरा उसकी माँ थी…

     

    तो फिर उसकी असली मौत कब हुई थी?

     

    और उसकी परवरिश किसने की थी?

     

    जवाब मिलने से पहले ही हवेली के नीचे से एक भयानक चीख सुनाई दी।

     

    “आरव!”

     

    आवाज़ उसके पिता की थी।

     

    मीरा अचानक गायब हो गई।

     

    आरव दरवाज़े की ओर भागा।

     

    लेकिन दरवाज़े के बाहर अब वही बूढ़ा दीनानाथ खड़ा था।

     

    उसके हाथ में एक पुरानी बंदूक थी।

     

    उसने आरव को देखते ही कहा—

     

    “अब बहुत देर हो चुकी है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “किस लिए?”

     

    दीनानाथ की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “क्योंकि आज रात देवेंद्र वापस आ गया है।”

     

    और उसी पल हवेली की घड़ी ने बारह बजाए।

     

    टन… टन… टन…

     

    लेकिन घड़ी की आवाज़ के साथ एक और आवाज़ आई—

     

    एक बच्चे की हँसी।

     

    आरव समझ गया…

     

    असली डर अब शुरू हुआ था।

    Avatar photo

    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱आहट😱 — उस बंद कमरे का राज़(part-2)

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    आरव पूरी रात सो नहीं पाया।

     

    हवेली के बाहर बारिश लगातार बरसती रही और अंदर पुरानी दीवारों से आती अजीब-अजीब आवाज़ें उसके डर को और बढ़ाती रहीं। कभी ऊपर की मंज़िल से किसी के चलने की आहट आती, कभी ऐसा लगता जैसे कोई उसके कमरे के बाहर आकर रुक गया हो।

     

    लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि हर बार जब वह दरवाज़ा खोलकर देखता, वहाँ कोई नहीं होता।

     

    सुबह होते ही बारिश कुछ कम हुई।

     

    आरव ने रात वाली डायरी फिर से खोली।

     

    उसके पिता की लिखावट में कई पन्ने भरे हुए थे, लेकिन ज्यादातर जगहों पर शब्द काट दिए गए थे। ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने कुछ लिखने के बाद जानबूझकर उसे मिटा दिया हो।

     

    एक पन्ने पर सिर्फ इतना लिखा था—

     

    “17 जुलाई 1998 को जो हुआ, वह दुर्घटना नहीं थी।”

     

    आरव ने तारीख पढ़कर अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    वही तारीख जो उसे पिछली रात तस्वीर के पीछे लिखी मिली थी।

     

    उसने डायरी का अगला पन्ना पलटा।

     

    वहाँ लिखा था—

     

    “मीरा को मैंने नहीं मारा।”

     

    आरव का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    मीरा कौन थी?

     

    क्या तस्वीर में उसके पिता के साथ खड़ी महिला का नाम मीरा था?

     

    उसने तुरंत अपना मोबाइल उठाया और गाँव में रहने वाले उस बूढ़े आदमी को फोन किया, जिसने उसे हवेली में रात न बिताने की चेतावनी दी थी।

     

    कुछ देर बाद बूढ़ा हवेली के बाहर आ गया।

     

    उसका नाम दीनानाथ था।

     

    आरव ने तस्वीर उसके सामने रख दी।

     

    “क्या आप इन्हें जानते हैं?”

     

    दीनानाथ ने तस्वीर देखते ही अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया।

     

    “मैं कुछ नहीं जानता।”

     

    “झूठ मत बोलिए।”

     

    आरव की आवाज़ में गुस्सा था।

     

    “यह मेरे पिता हैं। और यह महिला कौन है?”

     

    दीनानाथ कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने धीमे स्वर में कहा—

     

    “उसका नाम मीरा था।”

     

    “मेरे पिता उसे जानते थे?”

     

    “सिर्फ जानते नहीं थे…”

     

    दीनानाथ अचानक रुक गया।

     

    आरव ने पूछा, “क्या रिश्ता था उनका?”

     

    बूढ़े ने उसकी ओर देखा।

     

    “तुम्हारे पिता मीरा से शादी करना चाहते थे।”

     

    आरव जैसे पत्थर का हो गया।

     

    “लेकिन मेरे पिता की शादी तो मेरी माँ से हुई थी।”

     

    दीनानाथ ने सिर झुका लिया।

     

    “क्योंकि मीरा शादी के दिन मर गई थी।”

     

    कमरे में कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।

     

    आरव ने पूछा, “कैसे?”

     

    दीनानाथ ने हवेली की तीसरी मंज़िल की ओर देखा।

     

    “उसी कमरे में।”

     

    आरव की निगाहें तुरंत सीढ़ियों की ओर चली गईं।

     

    वही कमरा…

     

    जिसके बाहर लिखा था—

     

    “इसे मत खोलना।”

     

    “क्या हुआ था उस रात?”

     

    दीनानाथ ने जवाब नहीं दिया।

     

    वह वापस जाने लगा।

     

    आरव उसके पीछे दौड़ा।

     

    “रुकिए! मुझे सब जानना है।”

     

    दीनानाथ ने बिना पीछे देखे कहा—

     

    “अगर सच जानना है, तो आज रात बारह बजे से पहले हवेली छोड़ देना।”

     

    “और अगर मैं नहीं गया?”

     

    बूढ़ा वहीं रुक गया।

     

    उसने पलटकर आरव की आँखों में देखा।

     

    “तो फिर वह तुम्हें भी अपने साथ ले जाएगी।”

     

    यह कहकर वह चला गया।

     

    आरव देर तक वहीं खड़ा रहा।

     

    उसके मन में डर था, लेकिन उससे कहीं ज्यादा सवाल थे।

     

    आखिर उसके पिता ने इतने वर्षों तक मीरा का सच उससे क्यों छिपाया?

     

    और वह हर रात हवेली में क्यों आती थी?

     

    शाम होते-होते आरव ने फैसला कर लिया।

     

    वह आज रात उस कमरे का दरवाज़ा खोलेगा।

     

    रात के करीब ग्यारह बजे उसने टॉर्च, कैमरा और डायरी अपने बैग में रखी और सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।

     

    पहली मंज़िल पार करने के बाद दूसरी मंज़िल आई।

     

    यहाँ हवा अचानक बहुत ठंडी थी।

     

    उसने हाथों से साँस की गर्मी महसूस की।

     

    तीसरी मंज़िल की सीढ़ियाँ चढ़ते समय उसे फिर वही आवाज़ सुनाई दी।

     

    छप… छप… छप…

     

    आरव रुक गया।

     

    उसने नीचे देखा।

     

    सीढ़ियों पर गीले पैरों के निशान बने थे।

     

    लेकिन इस बार वे निशान नीचे से ऊपर नहीं आ रहे थे।

     

    वे उसके पीछे थे।

     

    जैसे कोई उसके ठीक पीछे खड़ा होकर चल रहा हो।

     

    आरव ने अचानक पीछे मुड़कर टॉर्च जलाई।

     

    कुछ नहीं था।

     

    उसने लंबी साँस ली और आगे बढ़ गया।

     

    बंद कमरा सामने था।

     

    लोहे की जंजीर अब भी दरवाज़े पर बंधी थी।

     

    आरव ने उसे खोलने की कोशिश की।

     

    जंजीर अपने आप नीचे गिर गई।

     

    खनन!

     

    आरव का दिल धड़क उठा।

     

    दरवाज़ा धीरे-धीरे खुल गया।

     

    अंदर घुप अंधेरा था।

     

    उसने टॉर्च जलाई।

     

    कमरे की दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे।

     

    एक तरफ लकड़ी की अलमारी थी।

     

    दूसरी तरफ टूटा हुआ आईना।

     

    और कमरे के बीचोंबीच एक पुराना पलंग।

     

    आरव धीरे-धीरे अंदर गया।

     

    अचानक दरवाज़ा उसके पीछे बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    वह तुरंत पलटा।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    उसने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।

     

    दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    तभी आईने में उसे कुछ दिखाई दिया।

     

    उसके पीछे एक महिला खड़ी थी।

     

    सफेद साड़ी…

     

    लंबे बाल…

     

    झुका हुआ सिर…

     

    आरव ने डरते हुए पीछे देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    उसने दोबारा आईने की तरफ देखा।

     

    महिला अब भी वहाँ थी।

     

    लेकिन इस बार उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

     

    वह मीरा थी।

     

    उसके माथे से खून बह रहा था।

     

    और उसकी आँखें सीधे आरव को देख रही थीं।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    तभी आईने पर अपने आप उंगली से शब्द लिखने लगे—

     

    “तुम्हारे पिता ने मुझे नहीं मारा…”

     

    आरव की साँस अटक गई।

     

    फिर दूसरा वाक्य उभरा—

     

    “लेकिन उन्होंने मुझे बचाया भी नहीं।”

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा—

     

    “किसने मारा तुम्हें?”

     

    आईने पर कुछ देर तक कोई हलचल नहीं हुई।

     

    फिर धीरे-धीरे एक नाम लिखा गया—

     

    “देवेंद्र।”

     

    आरव ने नाम पढ़ा।

     

    देवेंद्र?

     

    उसे यह नाम जाना-पहचाना लगा।

     

    तभी अलमारी के अंदर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।

     

    आरव ने अलमारी खोली।

     

    अंदर पुराने कपड़ों के नीचे एक लकड़ी का डिब्बा रखा था।

     

    डिब्बे पर उसके पिता के नाम का पहला अक्षर खुदा था।

     

    आरव ने डिब्बा खोला।

     

    उसमें एक पुरानी चिट्ठी थी।

     

    चिट्ठी पर लिखा था—

     

    “राघव के लिए — मीरा।”

     

    आरव के हाथ काँपने लगे।

     

    उसने चिट्ठी पढ़नी शुरू की।

     

    “राघव, अगर तुम यह चिट्ठी पढ़ रहे हो तो समझ लेना कि मैं खतरे में हूँ। देवेंद्र को सब पता चल गया है। वह हमें अलग करना चाहता है। अगर आज रात मेरे साथ कुछ हो जाए तो आरव को कभी इस हवेली में मत लाना…”

     

    आरव आगे पढ़ ही रहा था कि अचानक कमरे में किसी बच्चे के रोने की आवाज़ गूँज उठी।

     

    “माँ…”

     

    आरव जम गया।

     

    उसने धीरे से पूछा—

     

    “कौन है?”

     

    फिर वही आवाज़ आई।

     

    “माँ…”

     

    आवाज़ पलंग के नीचे से आ रही थी।

     

    आरव ने टॉर्च नीचे की।

     

    वहाँ एक छोटा सा लकड़ी का बक्सा था।

     

    उसने बक्सा बाहर खींचा।

     

    जैसे ही उसने ढक्कन खोला, अंदर एक पुरानी तस्वीर मिली।

     

    तस्वीर में मीरा थी।

     

    उसकी गोद में एक नवजात बच्चा था।

     

    और बच्चे के गले में वही लॉकेट था…

     

    जो आरव बचपन से अपनी माँ के पास देखा करता था।

     

    आरव के हाथ से तस्वीर गिर गई।

     

    तभी पीछे से किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    एक ठंडी फुसफुसाहट उसके कान में आई—

     

    “अब तुम्हें समझ आया कि तुम यहाँ क्यों बुलाए गए हो?”

     

    आरव ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।

     

    मीरा उसके सामने खड़ी थी।

     

    इस बार उसका चेहरा भयानक नहीं था।

     

    उसकी आँखों में आँसू थे।

     

    उसने अपना हाथ उठाकर दीवार की ओर इशारा किया।

     

    दीवार पर धीरे-धीरे एक छिपा हुआ दरवाज़ा दिखाई देने लगा।

     

    दरवाज़ा खुला।

     

    अंदर अंधेरी सीढ़ियाँ थीं जो नीचे की ओर जा रही थीं।

     

    और सीढ़ियों के नीचे से किसी आदमी की भारी आवाज़ सुनाई दी—

     

    “आरव… बहुत देर कर दी तुमने।”

     

    मीरा अचानक गायब हो गई।

     

    आरव अकेला खड़ा रह गया।

     

    उसके सामने अंधेरी सीढ़ियाँ थीं।

     

    और नीचे…

     

    किसी के कदम उसकी ओर बढ़ रहे थे।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव ने टॉर्च कसकर पकड़ी।

     

    उसे अब समझ आ चुका था—

     

    इस हवेली का सबसे बड़ा राज़ अभी बाकी था।

    Avatar photo

    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱आहट 😱— उस बंद कमरे का राज़ (part-1)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    रात के करीब बारह बज रहे थे। बाहर तेज़ बारिश हो रही थी और आसमान में बार-बार बिजली चमक रही थी। शहर से लगभग तीस किलोमीटर दूर, पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच एक पुरानी हवेली खड़ी थी—रुद्रपुर हवेली।

     

    कई सालों से उस हवेली में कोई नहीं रहता था।

     

    गाँव के लोग कहते थे कि रात के समय हवेली के अंदर से किसी के चलने की आवाज़ आती है। कभी किसी औरत के रोने की आवाज़ सुनाई देती, तो कभी ऐसा लगता जैसे कोई दरवाज़े पर खड़ा होकर धीरे-धीरे दस्तक दे रहा हो।

     

    लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि हवेली के मुख्य दरवाज़े पर हमेशा एक पुरानी लोहे की कुंडी लगी रहती थी।

     

    फिर भी…

     

    हर रात वहाँ से आहट आती थी।

     

    उसी हवेली को खरीदने के लिए उस रात आरव वहाँ पहुँचा था।

     

    आरव शहर का रहने वाला था और पेशे से फोटोग्राफर। कुछ महीनों पहले उसके पिता की मृत्यु हुई थी और उन्हें विरासत में रुद्रपुर हवेली मिली थी। पिता ने अपनी जिंदगी में कभी इस हवेली का ज़िक्र नहीं किया था।

     

    जब वकील ने कागज़ात देते हुए कहा था, “यह संपत्ति आपके पिता के नाम थी,” तो आरव को विश्वास ही नहीं हुआ था।

     

    उसने उसी दिन तय कर लिया था कि वह हवेली देखने जाएगा।

     

    गाँव में पहुँचते ही एक बूढ़े आदमी ने उसे रोक लिया।

     

    “बाबूजी, हवेली में रात मत बिताइएगा।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “क्यों? भूत है क्या?”

     

    बूढ़े के चेहरे का रंग अचानक उड़ गया।

     

    उसने धीमी आवाज़ में कहा, “भूत होता तो अच्छा था।”

     

    आरव की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “मतलब?”

     

    बूढ़े ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “वहाँ जो है… वह किसी को जाने नहीं देता।”

     

    आरव ने बात को मज़ाक समझकर अपनी कार आगे बढ़ा दी।

     

    कुछ देर बाद वह हवेली के सामने खड़ा था।

     

    हवेली देखकर ही उसके शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    तीन मंज़िल की विशाल इमारत, जिसकी दीवारों पर काई जम चुकी थी। खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाज़े के ऊपर एक पुरानी पत्थर की मूर्ति लगी थी।

     

    आरव ने जेब से चाबी निकाली।

     

    चाबी ताले में लगाते ही अचानक…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    अंदर से आवाज़ आई।

     

    आरव ठिठक गया।

     

    उसने दरवाज़े की ओर देखा।

     

    फिर आवाज़ आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    जैसे कोई दूसरी तरफ से दरवाज़ा खटखटा रहा हो।

     

    आरव ने धीरे से पूछा, “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    उसने दरवाज़ा खोला।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    मोबाइल की टॉर्च जलाकर वह अंदर गया।

     

    धूल से ढकी फर्श, दीवारों पर पुराने चित्र और छत से लटकता एक टूटा हुआ झूमर।

     

    हवा में एक अजीब सी गंध थी—जैसे कई वर्षों से बंद कमरे में नमी और पुराने कपड़ों की गंध मिली हुई हो।

     

    आरव ने अपना सामान नीचे रखा और हवेली का निरीक्षण करने लगा।

     

    तभी उसकी नज़र सीढ़ियों के पास टंगी एक तस्वीर पर पड़ी।

     

    तस्वीर में उसके पिता खड़े थे।

     

    लेकिन उनके साथ एक महिला भी थी।

     

    आरव उस महिला को पहचानता नहीं था।

     

    तस्वीर के पीछे तारीख लिखी थी—

     

    17 जुलाई 1998

     

    आरव के पिता उस समय अविवाहित थे।

     

    फिर यह महिला कौन थी?

     

    आरव ने तस्वीर उतारी और ध्यान से देखने लगा।

     

    तभी ऊपर की मंज़िल से कुछ गिरने की आवाज़ आई।

     

    धड़ाम!

     

    आरव चौंक गया।

     

    उसने टॉर्च ऊपर की ओर की।

     

    सीढ़ियों पर अंधेरा पसरा हुआ था।

     

    “शायद कोई लकड़ी गिरी होगी,” उसने खुद से कहा।

     

    वह ऊपर जाने लगा।

     

    पहली मंज़िल पर पहुँचते ही उसे एक लंबा गलियारा दिखाई दिया।

     

    गलियारे के आखिर में एक दरवाज़ा था।

     

    दरवाज़े पर मोटी जंजीर बंधी थी।

     

    आरव उसके पास गया।

     

    दरवाज़े के ऊपर लाल रंग से कुछ लिखा था।

     

    धूल हटाने पर शब्द साफ़ दिखाई दिए—

     

    “इसे मत खोलना।”

     

    आरव कुछ पल तक उस चेतावनी को देखता रहा।

     

    फिर उसने जंजीर को छुआ।

     

    उसी क्षण…

     

    उसके पीछे किसी के चलने की आवाज़ आई।

     

    छप… छप… छप…

     

    जैसे कोई गीले पैरों से फर्श पर चल रहा हो।

     

    आरव ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

     

    गलियारा खाली था।

     

    लेकिन फर्श पर…

     

    गीले पैरों के निशान थे।

     

    वे निशान धीरे-धीरे उसकी ओर आ रहे थे।

     

    एक…

     

    दो…

     

    तीन…

     

    आरव की साँसें तेज़ हो गईं।

     

    निशान उसके ठीक सामने आकर रुक गए।

     

    लेकिन वहाँ कोई नहीं था।

     

    अचानक उसके कान के पास किसी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “तुम… वापस क्यों आए?”

     

    आरव के पूरे शरीर में झटका लगा।

     

    वह पीछे हट गया।

     

    “क… कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    फिर नीचे से दरवाज़ा बंद होने की तेज़ आवाज़ आई।

     

    धड़ाम!

     

    आरव दौड़कर नीचे पहुँचा।

     

    मुख्य दरवाज़ा बंद था।

     

    उसने कुंडी खींची।

     

    दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    तभी उसकी नज़र सामने की दीवार पर पड़ी।

     

    वहाँ एक पुरानी घड़ी लगी थी।

     

    घड़ी की दोनों सुइयाँ बारह बजे पर अटकी हुई थीं।

     

    और तभी…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    वही आवाज़ फिर सुनाई दी।

     

    इस बार आवाज़ हवेली के अंदर से नहीं…

     

    बल्कि उसके पीछे वाले बंद कमरे से आ रही थी।

     

    आरव धीरे-धीरे उस कमरे की ओर बढ़ा।

     

    कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था।

     

    उसने टॉर्च अंदर की।

     

    कमरा बिल्कुल खाली था।

     

    सिर्फ बीच में एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी रखी थी।

     

    कुर्सी पर एक सफेद कपड़ा पड़ा था।

     

    आरव ने कपड़ा हटाया।

     

    नीचे एक पुरानी डायरी थी।

     

    उसने डायरी खोली।

     

    पहले पन्ने पर उसके पिता की लिखावट थी।

     

    सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “अगर आरव कभी इस हवेली में आए, तो उसे सच मत बताना।”

     

    आरव के हाथ काँपने लगे।

     

    उसने अगला पन्ना पलटा।

     

    उसमें लिखा था—

     

    “वह हर रात बारह बजे आती है।”

     

    आरव ने घड़ी की ओर देखा।

     

    बारह बजकर एक मिनट हो चुका था।

     

    अचानक पीछे से फिर आवाज़ आई—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज़ बहुत करीब थी।

     

    आरव ने धीरे-धीरे गर्दन घुमाई।

     

    दरवाज़े के बाहर कोई खड़ा था।

     

    सफेद कपड़ों में एक औरत।

     

    उसका चेहरा लंबे काले बालों से ढका हुआ था।

     

    आरव कुछ बोल पाता, उससे पहले वह औरत धीरे-धीरे सिर उठाने लगी।

     

    और उसी क्षण हवेली की सारी लाइटें एक साथ जल उठीं।

     

    आरव ने आँखें बंद कर लीं।

     

    जब उसने दोबारा आँखें खोलीं…

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    लेकिन उसके हाथ में पकड़ी डायरी के आखिरी पन्ने पर अब एक नई लाइन लिखी थी—

     

    “तुम्हें सच जानना है तो कल रात ऊपर वाले बंद कमरे का दरवाज़ा खोलना।”

     

    और उसके ठीक नीचे…

     

    आरव का नाम लिखा था।

     

    “आरव…”

     

    बाहर बारिश और तेज़ हो चुकी थी।

     

    और हवेली की तीसरी मंज़िल से एक बार फिर किसी के चलने की आवाज़ आने लगी।

     

    छप… छप… छप…

     

    आरव समझ चुका था…

     

    वह हवेली में अकेला नहीं था।

    Avatar photo

    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • भाग 4 — दहेज की पहली बेड़ियाँ

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    नंदिनी की हवेली अब शांत थी।

     

    वह हवेली, जहाँ कभी रात के सन्नाटे में चीखें सुनाई देती थीं…

     

    जहाँ पायल की आवाज लोगों की नींद उड़ा देती थी…

     

    जहाँ एक बेटी के सपनों को दहेज की आग में जला दिया गया था…

     

    आज वहाँ पहली बार सुबह की चिड़ियों की आवाज सुनाई दे रही थी।

     

    लेकिन आरती के मन में तूफान था।

     

    राघव गिरफ्तार हो चुका था।

     

    कमला ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था।

     

    नंदिनी की मौत का सच सबके सामने आ चुका था।

     

    फिर भी आरती को लगता था कि कहानी अभी खत्म नहीं हुई।

     

    उस रात वह अकेली हवेली में गई।

     

    विवेक ने उसे रोकना चाहा।

     

    “आरती, वहाँ अकेले मत जाओ।”

     

    आरती ने कहा—

     

    “मुझे जाना होगा।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि माँ ने कहा था कि उनकी आखिरी बेड़ी अभी टूटी नहीं है।”

     

    विवेक ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मैं भी चलूँगा।”

     

    दोनों हवेली में दाखिल हुए।

     

    अंदर अजीब शांति थी।

     

    न कोई आवाज…

     

    न कोई हवा…

     

    न कोई पायल।

     

    आरती उसी कमरे में पहुँची जहाँ उसे नंदिनी की डायरी मिली थी।

     

    उसने दीवार पर लगी तस्वीर के सामने दीपक जलाया।

     

    “माँ… मैं आ गई।”

     

    कुछ पल तक कुछ नहीं हुआ।

     

    फिर अचानक दीपक की लौ काँपने लगी।

     

    कमरे का तापमान गिर गया।

     

    आरती ने धीरे से कहा—

     

    “माँ?”

     

    पीछे से पायल की आवाज आई।

     

    छन…

     

    छन…

     

    छन…

     

    नंदिनी धीरे-धीरे कमरे में दिखाई दी।

     

    लेकिन आज वह पहले जैसी डरावनी नहीं थी।

     

    उसका चेहरा शांत था।

     

    जले हुए निशान गायब थे।

     

    लाल साड़ी बिल्कुल साफ थी।

     

    आरती की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    “माँ…”

     

    नंदिनी मुस्कुराई।

     

    “बेटी।”

     

    आरती उसके पास जाना चाहती थी, लेकिन डर रही थी।

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “डर मत।”

     

    आरती ने पूछा—

     

    “क्या अब आपको मुक्ति मिल गई?”

     

    नंदिनी ने सिर हिलाया।

     

    “अभी नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    नंदिनी ने हवेली की दीवारों की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि मेरी कहानी खत्म नहीं हुई।”

     

    आरती ने पूछा—

     

    “अब क्या बाकी है?”

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “जब तक इस गाँव में किसी बेटी के पिता से दहेज माँगा जाएगा, तब तक मेरी आत्मा को चैन नहीं मिलेगा।”

     

    आरती ने दृढ़ आवाज में कहा—

     

    “मैं दहेज के खिलाफ लड़ूँगी।”

     

    नंदिनी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अकेली?”

     

    “नहीं।”

     

    आरती ने विवेक का हाथ पकड़ लिया।

     

    “हम दोनों।”

     

    नंदिनी की आँखों में गर्व उतर आया।

     

    उसने कहा—

     

    “यही मेरी आखिरी इच्छा है।”

     

    अगली सुबह आरती ने एक फैसला किया।

     

    उसने गाँव के चौक में सभी लोगों को बुलाया।

     

    गाँव में चर्चा फैल गई।

     

    “नंदिनी की बेटी कुछ कहने वाली है।”

     

    “क्या वह हवेली बेचने वाली है?”

     

    “क्या वह राघव के खिलाफ बोलेगी?”

     

    दोपहर तक चौक लोगों से भर गया।

     

    आरती सामने खड़ी हुई।

     

    उसके हाथ में नंदिनी की पुरानी डायरी थी।

     

    उसने कहा—

     

    “आज मैं अपनी माँ की कहानी सुनाने आई हूँ।”

     

    पूरा चौक शांत हो गया।

     

    आरती ने डायरी का एक-एक पन्ना लोगों के सामने पढ़ना शुरू किया।

     

    दहेज की माँग…

     

    पिता की मजबूरी…

     

    मारपीट…

     

    धमकियाँ…

     

    और आखिर में वह रात…

     

    जब नंदिनी को जिंदा जला दिया गया था।

     

    कई औरतें रोने लगीं।

     

    एक बूढ़ा आदमी सिर झुकाकर बैठ गया।

     

    फिर आरती ने कहा—

     

    “मेरी माँ की हत्या सिर्फ एक आदमी ने नहीं की थी।”

     

    लोग उसकी तरफ देखने लगे।

     

    “उसकी हत्या उस सोच ने की थी, जो कहती है कि बेटी की शादी में पैसा देना जरूरी है।”

     

    “उस सोच ने की थी, जो कहती है कि लड़के वाले ज्यादा बड़े हैं।”

     

    “उस सोच ने की थी, जो कहती है कि अगर बेटी ससुराल में अत्याचार सह रही है तो उसे चुप रहना चाहिए।”

     

    आरती की आवाज तेज होती गई।

     

    “और सबसे ज्यादा दुख की बात यह है कि हम सब उस सोच को किसी न किसी रूप में जिंदा रखते हैं।”

     

    चौक में सन्नाटा छा गया।

     

    एक आदमी ने कहा—

     

    “लेकिन बेटी, समाज की परंपरा है।”

     

    आरती ने उसकी तरफ देखकर कहा—

     

    “हर पुरानी चीज परंपरा नहीं होती।”

     

    “अगर कोई परंपरा किसी इंसान की जिंदगी छीन ले, तो उसे बचाना नहीं चाहिए… उसे बदलना चाहिए।”

     

    तालियों की आवाज गूँज उठी।

     

    लेकिन तभी भीड़ के पीछे से एक लड़की आगे आई।

     

    उसकी आँखों में आँसू थे।

     

    “दीदी… मेरे घर वाले भी मेरी शादी में दहेज देने के लिए जमीन बेच रहे हैं।”

     

    आरती उसके पास गई।

     

    “तुम्हें क्या चाहिए?”

     

    लड़की ने कहा—

     

    “मुझे शादी नहीं रोकनी… बस ऐसा घर चाहिए जहाँ मुझे दहेज के लिए अपमानित न किया जाए।”

     

    आरती ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तो हम तुम्हारे साथ हैं।”

     

    एक के बाद एक कई लड़कियाँ सामने आने लगीं।

     

    किसी से बाइक माँगी जा रही थी।

     

    किसी से कार।

     

    किसी से सोना।

     

    किसी से लाखों रुपये।

     

    आरती ने उसी दिन एक अभियान शुरू किया—

     

    “बेटी की शादी, बिना दहेज की जिम्मेदारी।”

     

    गाँव के युवाओं ने साथ दिया।

     

    महिलाओं ने साथ दिया।

     

    धीरे-धीरे आसपास के गाँवों में भी यह अभियान फैलने लगा।

     

    लोगों ने तय किया कि जो परिवार दहेज माँगेगा, उसके साथ शादी नहीं की जाएगी।

     

    कई लड़कों ने खुले मंच पर कहा—

     

    “हम दहेज नहीं लेंगे।”

     

    उनमें विवेक भी था।

     

    उसने कहा—

     

    “मैंने अपनी पत्नी से एक रुपया भी दहेज नहीं लिया। क्योंकि मुझे पत्नी चाहिए थी, सामान नहीं।”

     

    आरती मुस्कुराई।

     

    उसे लगा जैसे उसकी माँ की आत्मा कहीं दूर से यह सब देख रही है।

     

    लेकिन उसी रात कुछ अजीब हुआ।

     

    हवेली के पुराने कमरे में एक आखिरी बार पायल की आवाज आई।

     

    छन…

     

    छन…

     

    छन…

     

    आरती अकेली कमरे में गई।

     

    वहाँ नंदिनी खड़ी थी।

     

    इस बार उसके हाथ में वही पुराना लाल कपड़ा था।

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “बेटी… तुमने मेरी बेड़ियाँ तोड़ दीं।”

     

    आरती रो पड़ी।

     

    “माँ, मैं तुम्हें बचा नहीं सकी।”

     

    नंदिनी ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुम बच्ची थीं। तुम्हारी कोई गलती नहीं थी।”

     

    “मुझे बहुत देर से पता चला कि आप मेरी माँ हैं।”

     

    “लेकिन तुम्हें मेरा दर्द समझने में एक पल भी नहीं लगा।”

     

    आरती ने नंदिनी को गले लगाने की कोशिश की।

     

    इस बार नंदिनी ने उसे रोक नहीं दिया।

     

    दोनों एक-दूसरे से लिपट गईं।

     

    आरती को पहली बार अपनी माँ का स्पर्श महसूस हुआ।

     

    वह स्पर्श ठंडा नहीं था।

     

    बहुत गर्म था।

     

    माँ की ममता जैसा।

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “अब मुझे जाना होगा।”

     

    आरती ने रोते हुए पूछा—

     

    “क्या आप फिर कभी नहीं आएँगी?”

     

    नंदिनी मुस्कुराई।

     

    “जब भी कोई बेटी दहेज के खिलाफ आवाज उठाएगी, समझ लेना मैं वहीं हूँ।”

     

    “जब भी कोई पिता अपनी बेटी को बोझ समझने से इनकार करेगा, समझ लेना मैं वहीं हूँ।”

     

    “और जब कोई लड़का कहेगा कि उसे दहेज नहीं, जीवनसाथी चाहिए… समझ लेना मेरी आत्मा मुस्कुरा रही है।”

     

    नंदिनी धीरे-धीरे प्रकाश में बदलने लगी।

     

    आरती चिल्लाई—

     

    “माँ!”

     

    नंदिनी की आखिरी आवाज आई—

     

    “बेटी… किसी की बेटी को मेरी तरह मत मरने देना।”

     

    और फिर सब शांत हो गया।

     

    पायल की आवाज हमेशा के लिए बंद हो गई।

     

    हवेली की दीवारों पर पड़े काले निशान धीरे-धीरे मिटने लगे।

     

    जिस कमरे में वर्षों से अंधेरा था, वहाँ सूरज की रोशनी भर गई।

     

    कुछ महीनों बाद उस हवेली को तोड़कर वहाँ एक नया भवन बनाया गया।

     

    उसका नाम रखा गया—

     

    “नंदिनी स्मृति केंद्र।”

     

    वहाँ गरीब परिवारों की बेटियों को पढ़ाई में मदद दी जाने लगी।

     

    दहेज के खिलाफ जागरूकता कार्यक्रम होने लगे।

     

    कानूनी सहायता दी जाने लगी।

     

    और सबसे महत्वपूर्ण—

     

    लड़कियों को यह सिखाया जाने लगा कि वे किसी भी अत्याचार को अपनी किस्मत समझकर स्वीकार न करें।

     

    एक साल बाद उसी गाँव में आरती एक शादी में गई।

     

    दूल्हा साधारण कपड़ों में आया था।

     

    न कोई महंगी गाड़ी…

     

    न बैंड-बाजा…

     

    न दहेज की लंबी सूची।

     

    लड़के के पिता ने सबके सामने कहा—

     

    “हमें दहेज नहीं चाहिए। हमें सिर्फ आपकी बेटी की खुशी चाहिए।”

     

    आरती की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसे लगा जैसे कहीं दूर से पायल की बहुत हल्की आवाज आई—

     

    छन…

     

    छन…

     

    फिर हवा में एक फुसफुसाहट सुनाई दी—

     

    “अब मैं खुश हूँ।”

     

    आरती ने आसमान की तरफ देखा।

     

    सूरज चमक रहा था।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “माँ… आपकी बेटी हार नहीं मानी।”

     

    हवा चली।

     

    नंदिनी की तस्वीर पर रखा लाल फूल जमीन पर गिरा।

     

    लेकिन इस बार वह डरावना संकेत नहीं था।

     

    वह एक आशीर्वाद था।

     

    कहानी की अंतिम सीख

     

    दहेज किसी बेटी की शादी की कीमत नहीं है।

     

    दहेज एक ऐसी सामाजिक बेड़ी है, जो केवल बेटी को नहीं, पूरे परिवार को जकड़ लेती है।

     

    हमें यह समझना होगा कि—

     

    – बेटी किसी पर बोझ नहीं है।

    – शादी कोई सौदा नहीं है।

    – दहेज लेना सम्मान नहीं, लालच है।

    – दहेज देना मजबूरी हो सकती है, लेकिन दहेज की माँग को सही मान लेना गलत है।

    – बेटियों को शिक्षा, आत्मनिर्भरता और अपने अधिकारों की जानकारी देना सबसे बड़ा उपहार है।

    – बेटों को बचपन से सिखाना चाहिए कि पत्नी जीवनसाथी है, दहेज लाने वाली नहीं।

     

    और सबसे जरूरी बात—

     

    अगर आपके सामने किसी बेटी के साथ दहेज के नाम पर अन्याय हो रहा है, तो चुप मत रहिए।

     

    क्योंकि नंदिनी की कहानी सिर्फ एक डरावनी कहानी नहीं है।

     

    यह उन हजारों बेटियों की आवाज है, जिनके सपने दहेज की आग में जल गए।

     

    और शायद इस कहानी की सबसे बड़ी हॉरर यही है कि—

     

    भूतों से डरने वाला इंसान कुछ समय बाद सामान्य हो जाता है,

    लेकिन दहेज जैसी बुराई को देखकर भी चुप रहने वाला समाज धीरे-धीरे अपनी इंसानियत खो देता है।

     

    इसलिए आज एक संकल्प लें—

     

    न दहेज लेंगे, न देंगे,

    और न किसी बेटी पर दहेज का अत्याचार होने देंगे।

     

    क्योंकि जिस दिन समाज यह संकल्प सच में निभा लेगा…

     

    उस दिन नंदिनी जैसी किसी माँ की आत्मा को फिर कभी भटकना नहीं पड़ेगा।

    Avatar photo

    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • भाग 3 — राघव का लौटना

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    हवेली के मुख्य दरवाजे पर लगातार दस्तक हो रही थी।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    फिर वही आवाज आई—

     

    “विवेक… बेटा, दरवाजा खोलो।”

     

    आवाज बिल्कुल किसी बूढ़े पिता जैसी थी।

     

    विवेक दरवाजे के पास खड़ा काँप रहा था।

     

    आरती ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “दरवाजा मत खोलना।”

     

    कमला जमीन पर बैठी बुदबुदा रही थी—

     

    “हे भगवान… वह वापस आ गया…”

     

    विवेक ने माँ की तरफ देखा।

     

    “माँ, आखिर सच क्या है?”

     

    कमला ने सिर उठाया।

     

    उसकी आँखों में पंद्रह साल पुराना डर फिर से लौट आया था।

     

    “तेरे पिता जिंदा थे।”

     

    “लेकिन आपने मुझे बताया कि उनकी मौत हो गई थी।”

     

    “मैंने झूठ बोला था।”

     

    “क्यों?”

     

    कमला रोने लगी।

     

    “क्योंकि अगर मैं सच बता देती तो शायद तू भी मर जाता।”

     

    आरती ने पूछा—

     

    “राघव ने नंदिनी को क्यों मारा?”

     

    कमला ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    “पैसों के लिए।”

     

    हवेली के बाहर दस्तक और तेज हो गई।

     

    ठक! ठक! ठक!

     

    “विवेक… मैं तुम्हारा पिता हूँ।”

     

    विवेक ने दरवाजे की तरफ देखा।

     

    फिर माँ से पूछा—

     

    “अगर वह मेरे पिता हैं, तो आप उन्हें अंदर आने से क्यों रोक रही हैं?”

     

    कमला ने काँपती आवाज में कहा—

     

    “क्योंकि राघव अब इंसान नहीं रहा।”

     

    अचानक दरवाजे के नीचे से काला धुआँ अंदर आने लगा।

     

    आरती पीछे हट गई।

     

    धुआँ धीरे-धीरे फर्श पर फैलने लगा।

     

    उसके बीच एक आकृति बनने लगी।

     

    एक आदमी…

     

    लंबा कद…

     

    झुका हुआ चेहरा…

     

    और आँखें पूरी तरह काली।

     

    आरती चीख पड़ी।

     

    कमला ने कहा—

     

    “मत देखो उसकी आँखों में!”

     

    लेकिन देर हो चुकी थी।

     

    विवेक ने उस आकृति की तरफ देख लिया।

     

    अचानक वह आदमी गायब हो गया।

     

    और विवेक जमीन पर गिर पड़ा।

     

    आरती उसके पास पहुँची।

     

    “विवेक!”

     

    उसकी आँखें बंद थीं।

     

    लेकिन उसके होंठ हिल रहे थे।

     

    “पिताजी… मुझे माफ कर दीजिए…”

     

    आरती घबरा गई।

     

    “विवेक! होश में आओ!”

     

    कुछ सेकंड बाद विवेक ने आँखें खोलीं।

     

    उसने डरते हुए कहा—

     

    “मैंने उन्हें देखा।”

     

    “किसे?”

     

    “अपने पिता को।”

     

    “उन्होंने क्या कहा?”

     

    विवेक का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    “उन्होंने कहा… नंदिनी को उन्होंने नहीं मारा।”

     

    कमला अचानक चिल्लाई—

     

    “झूठ!”

     

    विवेक ने माँ की तरफ देखा।

     

    “उन्होंने कहा कि नंदिनी की मौत के पीछे कोई और था।”

     

    आरती ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    विवेक कुछ बोलता, उससे पहले ऊपर से भारी चीज गिरने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    तीनों ऊपर की तरफ भागे।

     

    पुराने कमरे का दरवाजा खुला था।

     

    अंदर दीवार पर नंदिनी की तस्वीर लगी थी।

     

    लेकिन तस्वीर बदल चुकी थी।

     

    अब नंदिनी की गोद में एक छोटी बच्ची दिखाई दे रही थी।

     

    आरती के रोंगटे खड़े हो गए।

     

    “ये बच्ची कौन है?”

     

    कमला ने रोते हुए कहा—

     

    “नंदिनी की बेटी।”

     

    आरती ने चौंककर पूछा—

     

    “लेकिन आपने कहा था कि बच्चा पैदा होने से पहले ही मर गया था।”

     

    कमला ने सिर झुका लिया।

     

    “मैंने कहा था कि बच्चा मर गया था… लेकिन मुझे नहीं पता था कि सच क्या है।”

     

    तभी पीछे से नंदिनी की आवाज आई—

     

    “वह मरी नहीं थी।”

     

    कमरे में अचानक ठंडी हवा भर गई।

     

    नंदिनी सामने दिखाई दी।

     

    इस बार उसके चेहरे पर डरावनी मुस्कान नहीं थी।

     

    उसकी आँखों में माँ का दर्द था।

     

    “मेरी बेटी जिंदा थी।”

     

    आरती की आँखें भर आईं।

     

    “फिर कहाँ है वह?”

     

    नंदिनी ने अपनी उँगली हवेली के पुराने कुएँ की तरफ कर दी।

     

    “उस रात मुझे रसोई में ले जाया गया था।”

     

    उसकी आवाज काँपने लगी।

     

    “राघव ने मुझसे कहा था कि मेरे पिता पैसे नहीं देंगे, इसलिए मुझे इस घर में रहने का कोई अधिकार नहीं।”

     

    आरती सुनती रही।

     

    “मैंने उसके सामने हाथ जोड़कर कहा था कि मुझे मत मारो।”

     

    नंदिनी की आँखों से आँसू गिरने लगे।

     

    “लेकिन लालच इंसान से उसकी आत्मा छीन लेता है।”

     

    कमला रोते हुए बोली—

     

    “बस करो नंदिनी…”

     

    नंदिनी ने उसकी ओर देखा।

     

    “तुमने देखा था कमला।”

     

    कमला काँपने लगी।

     

    “हाँ… मैंने सब देखा था।”

     

    “फिर तुमने मुझे बचाया क्यों नहीं?”

     

    कमला जमीन पर गिर गई।

     

    “मैं डर गई थी।”

     

    नंदिनी की आवाज पूरे कमरे में गूँज उठी—

     

    “तुम डर गई थीं… और मेरी जिंदगी खत्म हो गई।”

     

    आरती ने नंदिनी से पूछा—

     

    “उस रात आखिर हुआ क्या था?”

     

    नंदिनी ने धीरे-धीरे कहना शुरू किया—

     

    “राघव ने मुझे रसोई में बंद कर दिया था। वह मुझसे दो लाख रुपये माँग रहा था। मैंने कहा कि मेरे पिता के पास कुछ नहीं है।”

     

    “फिर?”

     

    “उसने मेरे ऊपर मिट्टी का तेल डाल दिया।”

     

    कमरा अचानक धुएँ से भरने लगा।

     

    आरती ने अपनी नाक ढक ली।

     

    नंदिनी की आवाज और धीमी हो गई।

     

    “लेकिन आग लगने से पहले मैंने अपनी बेटी को बचा लिया।”

     

    आरती ने आश्चर्य से पूछा—

     

    “कैसे?”

     

    “मैंने उसे पुराने कपड़ों में लपेटकर पिछली खिड़की से बाहर फेंक दिया था।”

     

    आरती के आँसू निकल आए।

     

    “फिर बच्ची कहाँ गई?”

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “एक बूढ़ी औरत ने उसे उठा लिया।”

     

    कमला ने अचानक सिर उठाया।

     

    “नहीं…”

     

    आरती ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आप उस बूढ़ी औरत को जानती हैं?”

     

    कमला ने कुछ नहीं कहा।

     

    तभी हवेली के बाहर किसी के चलने की आवाज आई।

     

    धीरे…

     

    बहुत धीरे…

     

    जैसे कोई लकड़ी की छड़ी के सहारे चल रहा हो।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    विवेक ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    हवेली के कुएँ के पास एक बूढ़ी औरत खड़ी थी।

     

    उसके हाथ में एक पुराना लाल कपड़ा था।

     

    वह ऊपर देखकर हवेली की तरफ मुस्कुरा रही थी।

     

    आरती ने पूछा—

     

    “कौन है वह?”

     

    कमला के मुँह से धीरे से निकला—

     

    “वही…”

     

    “कौन?”

     

    “वही औरत… जिसने नंदिनी की बच्ची को बचाया था।”

     

    आरती नीचे जाने लगी।

     

    विवेक ने उसे रोकना चाहा।

     

    “रुको।”

     

    लेकिन आरती ने कहा—

     

    “अगर वह बच्ची आज भी जिंदा है, तो हमें उसे ढूँढना होगा।”

     

    तीनों हवेली से बाहर निकले।

     

    बूढ़ी औरत कुएँ के पास खड़ी थी।

     

    उसने आरती को देखकर कहा—

     

    “तुम नंदिनी की बहू हो?”

     

    आरती ने सिर हिलाया।

     

    बूढ़ी औरत मुस्कुराई।

     

    “नहीं… तुम उसकी बेटी जैसी हो।”

     

    आरती ने पूछा—

     

    “आप नंदिनी की बच्ची को जानती हैं?”

     

    बूढ़ी औरत ने अपनी मुट्ठी खोली।

     

    उसमें एक छोटा-सा चाँदी का लॉकेट था।

     

    “यह उसकी माँ ने मुझे दिया था।”

     

    आरती ने लॉकेट देखा।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “मेरी गुड़िया।”

     

    “वह बच्ची कहाँ है?”

     

    बूढ़ी औरत ने सामने सड़क की तरफ देखा।

     

    “बहुत दूर नहीं।”

     

    “कहाँ?”

     

    “शहर में।”

     

    “उसका नाम?”

     

    बूढ़ी औरत ने आरती की आँखों में देखा।

     

    फिर कहा—

     

    “उसका नाम… आरती है।”

     

    आरती का शरीर सुन्न पड़ गया।

     

    “क्या?”

     

    विवेक ने उसकी तरफ देखा।

     

    कमला के चेहरे पर डर जम गया।

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “हाँ बेटी… तुम ही नंदिनी की बेटी हो।”

     

    हवा जैसे एक पल के लिए रुक गई।

     

    आरती के हाथ से लॉकेट गिर गया।

     

    “नहीं… यह सच नहीं हो सकता।”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “तुम्हारी माँ ने तुम्हें मरने से बचाया था।”

     

    आरती की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “तो मेरे पिता कौन हैं?”

     

    बूढ़ी औरत ने जवाब देने के बजाय पीछे देखा।

     

    हवेली के दरवाजे पर एक काली आकृति खड़ी थी।

     

    राघव।

     

    वह मुस्कुरा रहा था।

     

    उसने कहा—

     

    “अब मेरी बेटी को कोई मुझसे नहीं छीन सकता।”

     

    आरती पीछे हट गई।

     

    “आप… मेरे पिता हैं?”

     

    राघव ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    आरती के भीतर वर्षों का खालीपन अचानक भर गया।

     

    लेकिन वह खुशी नहीं थी।

     

    वह डर था।

     

    नफरत थी।

     

    और सबसे बड़ा सवाल—

     

    अगर राघव उसका पिता था…

     

    तो उसने उसकी माँ को क्यों मारा?

     

    राघव धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    “तुम्हारी माँ ने तुम्हें मुझसे छीन लिया था।”

     

    आरती चिल्लाई—

     

    “आपने मेरी माँ को मारा!”

     

    राघव की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “नहीं।”

     

    “तो किसने?”

     

    राघव ने हवेली की तरफ देखा।

     

    “इस घर ने।”

     

    आरती कुछ समझ नहीं पाई।

     

    राघव ने कहा—

     

    “दहेज के लालच ने नंदिनी को मारा था। लेकिन उसके पीछे सिर्फ मैं नहीं था।”

     

    कमला रोते हुए बोली—

     

    “राघव, सच मत बताओ।”

     

    राघव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अब सच छिपाने का समय खत्म हो गया है।”

     

    वह आरती के पास आया।

     

    “तुम्हारी माँ को मारने के बाद मैंने उसकी आत्मा को हवेली में कैद कर दिया था।”

     

    आरती ने काँपते हुए पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “ताकि उसका दर्द हमेशा इस घर में रहे।”

     

    नंदिनी अचानक प्रकट हुई।

     

    उसने राघव की तरफ देखा।

     

    “तुमने मुझे कैद नहीं किया था।”

     

    राघव पीछे हट गया।

     

    नंदिनी बोली—

     

    “मेरे दर्द को इस घर की दीवारों ने कैद किया था।”

     

    फिर उसकी नजर आरती पर पड़ी।

     

    “लेकिन अब मेरी बेटी आ गई है।”

     

    नंदिनी ने हाथ बढ़ाया।

     

    आरती धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ी।

     

    माँ और बेटी के बीच केवल कुछ कदम का फासला था।

     

    आरती ने रोते हुए कहा—

     

    “माँ…”

     

    नंदिनी ने उसे गले लगाने की कोशिश की।

     

    लेकिन उसका शरीर धुएँ में बदल गया।

     

    आरती ने हवा को पकड़ने की कोशिश की।

     

    “माँ!”

     

    नंदिनी की आवाज दूर से आई—

     

    “बेटी… मुझे मुक्त करने के लिए मेरा बदला मत लेना।”

     

    आरती रोते हुए बोली—

     

    “फिर क्या करूँ?”

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “दहेज के खिलाफ लड़ना।”

     

    “लोगों को बताना कि मेरी मौत सिर्फ मेरी नहीं थी।”

     

    “हर उस बेटी की आवाज बनना, जो दहेज के कारण चुप है।”

     

    अचानक हवेली में तेज रोशनी हुई।

     

    राघव जमीन पर गिर पड़ा।

     

    कमला ने पुलिस को फोन कर दिया।

     

    कुछ ही देर में पुलिस हवेली पहुँच गई।

     

    पुराने कमरे की तलाशी ली गई।

     

    दीवार के पीछे से नंदिनी की डायरी, पुराने कागजात और कई ऐसे सबूत मिले जिनसे साबित हो गया कि नंदिनी की मौत हादसा नहीं थी।

     

    राघव को गिरफ्तार कर लिया गया।

     

    कमला ने अदालत में सच बयान दिया।

     

    पंद्रह साल बाद नंदिनी को इंसाफ मिलने की उम्मीद जगी।

     

    लेकिन आरती के लिए असली लड़ाई अब शुरू हुई थी।

     

    उसने अपने पति विवेक से कहा—

     

    “मैं इस घर में नहीं रहूँगी।”

     

    विवेक ने पूछा—

     

    “फिर कहाँ जाओगी?”

     

    आरती ने नंदिनी की तस्वीर हाथ में लेते हुए कहा—

     

    “जहाँ मेरी माँ का सपना पूरा हो सके।”

     

    “मैं उन बेटियों के लिए काम करूँगी जिन्हें दहेज के नाम पर डराया जाता है।”

     

    विवेक ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मैं तुम्हारे साथ हूँ।”

     

    आरती ने हवेली की तरफ आखिरी बार देखा।

     

    ऊपर की खिड़की में नंदिनी दिखाई दी।

     

    वह मुस्कुरा रही थी।

     

    उसकी पायल की आवाज धीरे-धीरे दूर होती गई।

     

    छन…

     

    छन…

     

    छन…

     

    और फिर हवेली हमेशा के लिए शांत हो गई।

     

    लेकिन जाते-जाते आरती को एक आवाज सुनाई दी—

     

    “बेटी… अब किसी और माँ को अपनी बेटी के लिए रोने मत देना।”

     

    आरती ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उसके आँसू गालों पर थे।

     

    लेकिन इस बार उन आँसुओं में डर नहीं था।

     

    एक संकल्प था।

     

    दहेज के खिलाफ लड़ने का संकल्प।

     

    क्रमशः… भाग 4 में।

     

    इस भाग की सीख

     

    किसी भी अन्याय को केवल इसलिए स्वीकार मत कीजिए क्योंकि वह वर्षों से चला आ रहा है।

     

    नंदिनी की सबसे बड़ी जीत यह नहीं थी कि उसके हत्यारे को सजा मिली।

     

    उसकी असली जीत यह थी कि उसकी बेटी ने उसके दर्द को अपनी ताकत बना लिया।

     

    दहेज की बेड़ियाँ तभी टूटेंगी, जब बेटियाँ अपने अधिकार के लिए आवाज उठाएँगी और परिवार उनका साथ देगा।

     

    याद रखिए—

     

    शादी दो परिवारों का रिश्ता है, सौदेबाजी नहीं।

    बेटी कोई सामान नहीं, एक इंसान है।

    और इंसान की कीमत कभी दहेज से नहीं लगाई जा सकती।

    Avatar photo

    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • भाग 2 — हवेली का बंद कमरा

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    सुबह की पहली किरण हवेली की टूटी हुई खिड़की से अंदर आई, लेकिन आरती की आँखों से रात का डर अभी तक नहीं गया था।

     

    वह पूरी रात सो नहीं पाई थी।

     

    उसके सामने बार-बार वही चेहरा आ रहा था—

     

    जला हुआ चेहरा…

     

    लाल साड़ी…

     

    आँखों में आँसू…

     

    और वह आवाज—

     

    “मेरी तरह अपनी जिंदगी को दहेज की आग में मत जलने देना।”

     

    आरती ने सोचा था कि सुबह होते ही वह अपने पति विवेक को सब कुछ बता देगी।

     

    लेकिन जब वह कमरे से बाहर निकली, तो हवेली बिल्कुल सामान्य लग रही थी।

     

    रसोई में उसकी सास कमला चाय बना रही थी।

     

    विवेक अखबार पढ़ रहा था।

     

    आरती ने काँपती आवाज में पूछा—

     

    “विवेक… क्या इस घर में पहले कभी नंदिनी नाम की कोई लड़की रहती थी?”

     

    अखबार पढ़ते-पढ़ते विवेक के हाथ रुक गए।

     

    उसने धीरे से आरती की तरफ देखा।

     

    “तुमने ये नाम कहाँ सुना?”

     

    आरती समझ गई कि कुछ तो छिपाया जा रहा है।

     

    “बस ऐसे ही…”

     

    कमला अचानक जोर से बोली—

     

    “इस घर में किसी नंदिनी का नाम मत लेना!”

     

    आरती चौंक गई।

     

    कमला की आँखों में डर था।

     

    सिर्फ डर नहीं…

     

    ऐसा डर, जैसे किसी पुराने जख्म को अचानक किसी ने छू लिया हो।

     

    विवेक ने माँ को शांत करते हुए कहा—

     

    “माँ, रहने दो।”

     

    फिर आरती से बोला—

     

    “तुमने शायद सपना देखा होगा।”

     

    आरती ने कुछ नहीं कहा।

     

    लेकिन उसके मन में एक सवाल पैदा हो चुका था—

     

    अगर नंदिनी केवल सपना थी, तो माँ इतनी डर क्यों गई?

     

    उस दिन दोपहर में आरती पूरे घर में घूम रही थी।

     

    हवेली बहुत बड़ी थी।

     

    पुरानी दीवारों पर जगह-जगह सीलन थी।

     

    कई कमरों पर ताले लगे थे।

     

    एक लंबा गलियारा हवेली की पिछली तरफ जाता था।

     

    वहीं उसे लोहे का एक पुराना दरवाजा दिखाई दिया।

     

    दरवाजे पर मोटा ताला लगा था।

     

    आरती ने हाथ बढ़ाकर ताले को छूना चाहा।

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “उस दरवाजे के पास मत जाना।”

     

    आरती पलटी।

     

    विवेक खड़ा था।

     

    “क्यों?”

     

    “बस मत जाना।”

     

    “उस कमरे में क्या है?”

     

    विवेक ने नजरें चुरा लीं।

     

    “पुराना सामान।”

     

    आरती ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “पुराने सामान से इतना डर क्यों लगता है?”

     

    विवेक चुप रहा।

     

    उस रात आरती ने फैसला किया कि वह सच्चाई जानकर रहेगी।

     

    आधी रात को जब पूरा घर सो गया, वह धीरे से उठी।

     

    उसने गलियारे में कदम रखा।

     

    हवा अचानक ठंडी हो गई।

     

    उसकी साँस से भाप निकलने लगी।

     

    फिर उसे वही आवाज सुनाई दी—

     

    छन…

     

    छन…

     

    छन…

     

    पायल की आवाज उसी बंद कमरे के पीछे से आ रही थी।

     

    आरती धीरे-धीरे दरवाजे तक पहुँची।

     

    अचानक ताला अपने आप गिर गया।

     

    धड़ाम!

     

    आरती पीछे हट गई।

     

    कुछ पल तक उसने दरवाजे को देखा।

     

    फिर साहस करके उसे खोल दिया।

     

    अंदर घना अंधेरा था।

     

    उसने मोबाइल की रोशनी जलाई।

     

    कमरे में पुराने संदूक, टूटी हुई कुर्सियाँ और धूल से ढके सामान पड़े थे।

     

    दीवार पर एक पुरानी तस्वीर लगी थी।

     

    आरती ने रोशनी तस्वीर पर डाली।

     

    वह नंदिनी की तस्वीर थी।

     

    लाल जोड़े में मुस्कुराती हुई नंदिनी।

     

    आरती की आँखें नम हो गईं।

     

    तस्वीर के नीचे कुछ लिखा था—

     

    “नंदिनी — इस घर की बहू।”

     

    लेकिन उसके ठीक नीचे किसी ने काले रंग से दूसरा वाक्य लिख दिया था—

     

    “इस घर की सबसे बड़ी गलती।”

     

    आरती का दिल काँप उठा।

     

    तभी पीछे से दरवाजा बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    आरती ने तुरंत दरवाजा खींचा।

     

    वह नहीं खुला।

     

    “कोई है?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    फिर कमरे में किसी के रोने की आवाज आई।

     

    “बाबा… मुझे घर ले चलो…”

     

    आरती का शरीर सुन्न पड़ गया।

     

    वह आवाज नंदिनी की थी।

     

    “बाबा… मैं घर जाना चाहती हूँ…”

     

    आरती रोने लगी।

     

    “नंदिनी… तुम यहाँ हो?”

     

    अचानक संदूक अपने आप खुल गया।

     

    उसके अंदर लाल कपड़े में लिपटी एक पुरानी डायरी पड़ी थी।

     

    आरती ने डायरी उठाई।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर कोई बेटी यह डायरी पढ़ रही है, तो समझ लेना कि मेरी कहानी अभी खत्म नहीं हुई।”

     

    आरती ने काँपते हाथों से पन्ने पलटे।

     

    नंदिनी ने अपनी जिंदगी का हर दर्द उसमें लिखा था।

     

    दहेज की माँग…

     

    मारपीट…

     

    भूखे रहना…

     

    पिता से पैसे माँगने का दबाव…

     

    और फिर आखिरी पन्ने पर लिखा था—

     

    “आज उन्होंने कहा है कि अगर पिताजी ने दो लाख रुपये नहीं दिए, तो मेरी जिंदगी खत्म कर देंगे।”

     

    आरती की आँखों से आँसू गिरने लगे।

     

    अगला पन्ना आधा जला हुआ था।

     

    उस पर केवल कुछ शब्द पढ़े जा सकते थे—

     

    “मुझे रसोई में बुलाया गया है… अगर मैं वापस न आऊँ तो…”

     

    इसके बाद कुछ नहीं था।

     

    आरती ने डायरी बंद कर दी।

     

    तभी कमरे में किसी महिला की धीमी हँसी गूँजी।

     

    “सच जानना चाहती हो?”

     

    आरती ने पलटकर देखा।

     

    नंदिनी उसके सामने खड़ी थी।

     

    इस बार उसका चेहरा पहले से ज्यादा भयानक था।

     

    लेकिन उसकी आँखों में गुस्सा नहीं…

     

    दर्द था।

     

    आरती ने कहा—

     

    “तुम्हें किसने मारा?”

     

    नंदिनी ने अपना हाथ उठाया।

     

    उसकी उँगली हवेली के बाहर बने पुराने कुएँ की तरफ थी।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “जिसे तुम अपना पति समझती हो… उसके परिवार ने मेरी जिंदगी छीनी थी।”

     

    आरती के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “विवेक?”

     

    नंदिनी ने सिर हिलाया।

     

    “विवेक उस समय पैदा भी नहीं हुआ था।”

     

    आरती ने राहत की साँस ली।

     

    लेकिन नंदिनी ने अगला वाक्य कहा—

     

    “लेकिन उसके पिता जानते हैं कि मेरे साथ क्या हुआ था।”

     

    आरती के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    तभी दरवाजा खुल गया।

     

    आरती भागकर अपने कमरे में पहुँची।

     

    विवेक जाग रहा था।

     

    उसने पूछा—

     

    “तुम कहाँ गई थीं?”

     

    आरती ने डायरी उसके सामने रख दी।

     

    विवेक का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “तुम्हें ये कहाँ मिली?”

     

    “उस कमरे में।”

     

    विवेक ने डायरी उठाई।

     

    कुछ देर तक उसे देखता रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “आरती, हमें यह घर छोड़ देना चाहिए।”

     

    “क्यों?”

     

    विवेक ने जवाब नहीं दिया।

     

    तभी नीचे से उसकी माँ की चीख सुनाई दी।

     

    “विवेक!”

     

    दोनों दौड़कर नीचे गए।

     

    कमला सीढ़ियों के पास खड़ी काँप रही थी।

     

    उसके सामने जमीन पर एक पुरानी तस्वीर पड़ी थी।

     

    वही तस्वीर जिसमें नंदिनी थी।

     

    लेकिन अब तस्वीर में नंदिनी अकेली नहीं थी।

     

    उसके पीछे एक आदमी खड़ा दिखाई दे रहा था।

     

    विवेक ने तस्वीर उठाई।

     

    उसका चेहरा बदल गया।

     

    “ये कौन है?” आरती ने पूछा।

     

    विवेक ने काँपती आवाज में कहा—

     

    “मेरे पिता।”

     

    आरती ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    तस्वीर में नंदिनी के पीछे खड़ा आदमी मुस्कुरा रहा था।

     

    लेकिन उसके हाथ में कुछ था।

     

    एक लाल रंग का कपड़ा।

     

    वही लाल कपड़ा जो नंदिनी ने अपनी डायरी में आखिरी दिन पहना था।

     

    कमला अचानक फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    “मैंने उसे नहीं मारा था…”

     

    आरती ने कहा—

     

    “तो किसने मारा?”

     

    कमला ने सिर उठाया।

     

    उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    “तुम्हारे ससुर ने।”

     

    हवेली में सन्नाटा छा गया।

     

    “लेकिन फिर पुलिस को क्यों नहीं बताया?”

     

    कमला ने काँपते हुए कहा—

     

    “क्योंकि मैं डर गई थी।”

     

    “किससे?”

     

    कमला ने हवेली की ऊपरी मंजिल की ओर देखा।

     

    “उससे… जो नंदिनी की मौत के बाद इस घर में आया था।”

     

    आरती ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    कमला ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “नंदिनी की आत्मा नहीं…”

     

    वह कुछ पल रुकी।

     

    “उसका बदला।”

     

    उसी समय ऊपर से जोरदार आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    तीनों ने ऊपर देखा।

     

    पुराना बंद कमरा फिर से खुल चुका था।

     

    और अंदर से किसी बच्ची के रोने की आवाज आ रही थी।

     

    “माँ… मुझे बचा लो…”

     

    कमला के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “नहीं… ये फिर शुरू हो गया।”

     

    विवेक ने पूछा—

     

    “माँ, बच्ची कौन है?”

     

    कमला ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    आरती ने उसकी ओर देखा।

     

    “माँजी… सच बताइए।”

     

    कमला की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    “नंदिनी मरने से पहले गर्भवती थी।”

     

    आरती के मुँह से चीख निकल गई।

     

    “क्या?”

     

    कमला ने कहा—

     

    “उस रात सिर्फ नंदिनी नहीं मरी थी… उसका अजन्मा बच्चा भी मर गया था।”

     

    अचानक हवेली की सारी खिड़कियाँ खुल गईं।

     

    तेज हवा अंदर आने लगी।

     

    ऊपर से पायल की आवाज आई।

     

    छन…

     

    छन…

     

    छन…

     

    फिर एक और आवाज गूँजी—

     

    “जिसने मेरी जिंदगी छीनी… उसकी नस्ल में कोई बेटी चैन से नहीं रहेगी।”

     

    विवेक ने आरती का हाथ पकड़ लिया।

     

    “हमें यहाँ से निकलना होगा।”

     

    दोनों दरवाजे की तरफ दौड़े।

     

    लेकिन दरवाजा बंद था।

     

    तभी आरती ने देखा—

     

    दीवार पर धीरे-धीरे लाल अक्षरों में कुछ लिखा जा रहा था।

     

    “भागने से पहले सच पूरा जानो।”

     

    और उसके नीचे एक नाम उभर आया—

     

    “राघव।”

     

    वही राघव…

     

    नंदिनी का पति।

     

    विवेक का पिता।

     

    जिसे पंद्रह साल पहले हवेली से गायब बताया गया था।

     

    आरती ने विवेक की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पिता मरे नहीं थे?”

     

    विवेक की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “नहीं…”

     

    “तो कहाँ हैं?”

     

    विवेक ने काँपते हुए कहा—

     

    “यही तो मैं आज तक नहीं जानता था।”

     

    उसी क्षण हवेली के बाहर से किसी के दरवाजा खटखटाने की आवाज आई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    तीनों जम गए।

     

    फिर बाहर से एक बूढ़ी आवाज आई—

     

    “दरवाजा खोलो… मैं राघव हूँ।”

     

    कमला ने चीखते हुए अपने कान बंद कर लिए।

     

    आरती ने विवेक की तरफ देखा।

     

    विवेक धीरे-धीरे दरवाजे की ओर बढ़ा।

     

    लेकिन जैसे ही उसने कुंडी पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया…

     

    उसके पीछे नंदिनी खड़ी थी।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “दरवाजा मत खोलना।”

     

    विवेक रुक गया।

     

    नंदिनी की आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    उसने कहा—

     

    “क्योंकि बाहर खड़ा आदमी तुम्हारा पिता नहीं है।”

     

    अचानक बाहर से वही आवाज फिर आई—

     

    “विवेक… दरवाजा खोलो बेटा…”

     

    और इस बार आवाज के पीछे किसी और की धीमी हँसी सुनाई दी।

     

    एक ऐसी हँसी…

     

    जिसमें इंसानियत का नामोनिशान नहीं था।

     

    क्रमशः… भाग 3 में।

     

    इस भाग की सीख

     

    दहेज केवल एक परिवार की समस्या नहीं है। यह चुप रहने वाले हर व्यक्ति की जिम्मेदारी बन जाती है।

     

    नंदिनी की सबसे बड़ी पीड़ा यह नहीं थी कि उससे पैसे माँगे गए। उसकी सबसे बड़ी पीड़ा यह थी कि लोग जानते थे कि उसके साथ गलत हो रहा है, फिर भी डर के कारण चुप रहे।

     

    इसलिए जब भी किसी बेटी पर दहेज का दबाव बनाया जाए, उसे अकेला मत छोड़िए।

     

    गलत के सामने चुप रहना भी कभी-कभी गलत का साथ देना बन जाता है।

     

    और याद रखिए—

     

    बेटी की कीमत दहेज से नहीं, उसके सपनों से होती है।

    जिस घर को बेटी की जरूरत है, उसे दहेज की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

    Avatar photo

    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • भाग 1 — दहेज की पहली बेड़ियाँ

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    रात के करीब बारह बज रहे थे।गाँव के आखिरी छोर पर बनी उस पुरानी हवेली में आज फिर वही आवाज गूँज रही थी—

     

    “मुझे मेरा दहेज वापस चाहिए…”

     

    हवेली की दीवारें जैसे उस आवाज को पकड़कर बार-बार दोहरा रही थीं।

     

    “मेरा दहेज… मेरा जीवन… मेरा इंसाफ…”

     

    लेकिन इस आवाज की कहानी आज से नहीं, लगभग पंद्रह साल पहले शुरू हुई थी।

     

    उस समय उस गाँव में रहने वाले रामदीन की बेटी नंदिनी की शादी तय हुई थी।

     

    नंदिनी बहुत साधारण लड़की थी। चेहरे पर हमेशा मुस्कान, आँखों में बड़े-बड़े सपने और दिल में अपने माता-पिता के लिए अथाह प्रेम।

     

    रामदीन गरीब किसान था। उसके पास ज्यादा जमीन नहीं थी, लेकिन उसने अपनी बेटी को कभी किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने दी।

     

    शादी की तारीख नजदीक आती गई।

     

    एक शाम लड़के वालों का फोन आया।

     

    “देखिए रामदीन जी,” लड़के के पिता ने कहा, “हमने तो कुछ माँगा नहीं है, लेकिन आजकल समाज में इज्जत भी कोई चीज होती है।”

     

    रामदीन चुप रहा।

     

    “बस एक मोटरसाइकिल, थोड़ा सोना और पचास हजार रुपये… इससे ज्यादा कुछ नहीं।”

     

    रामदीन के हाथ से फोन लगभग छूट गया।

     

    उसने धीमी आवाज में कहा, “भाई साहब… मैं गरीब आदमी हूँ। इतना सब कहाँ से लाऊँगा?”

     

    दूसरी तरफ कुछ पल खामोशी रही।

     

    फिर जवाब आया—

     

    “तो फिर शादी भी कहाँ से होगी?”

     

    फोन कट गया।

     

    उस रात रामदीन अपनी चारपाई पर बैठकर देर तक रोता रहा।

     

    नंदिनी ने पिता को देख लिया।

     

    “बाबा… क्या हुआ?”

     

    रामदीन ने आँसू पोंछते हुए कहा, “कुछ नहीं बेटी।”

     

    “आप मुझसे झूठ बोल रहे हैं।”

     

    रामदीन ने सिर झुका लिया।

     

    “तेरी शादी में दहेज माँग रहे हैं।”

     

    नंदिनी कुछ पल बिल्कुल शांत रही।

     

    फिर उसने पिता का हाथ पकड़कर कहा—

     

    “बाबा, अगर मेरी खुशी की कीमत आपकी जिंदगी है, तो मुझे ऐसी शादी नहीं करनी।”

     

    रामदीन ने बेटी की ओर देखा।

     

    “लेकिन समाज क्या कहेगा?”

     

    नंदिनी मुस्कुराई।

     

    “समाज मेरे साथ दुख बाँटने नहीं आएगा बाबा। फिर समाज के डर से मैं अपना जीवन क्यों बर्बाद करूँ?”

     

    रामदीन की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    लेकिन तभी नंदिनी की माँ बोली—

     

    “बेटी, बात इतनी आसान नहीं है। अगर रिश्ता टूट गया तो लोग तुझे ही दोष देंगे।”

     

    नंदिनी चुप हो गई।

     

    कुछ दिनों बाद रामदीन ने अपनी छोटी-सी जमीन का एक हिस्सा बेच दिया।

     

    मोटरसाइकिल खरीदी गई।

     

    गहने बनवाए गए।

     

    पचास हजार रुपये का इंतजाम करने के लिए उसने साहूकार से भारी ब्याज पर कर्ज लिया।

     

    शादी हो गई।

     

    ढोल बजे।

     

    बारात आई।

     

    नंदिनी लाल जोड़े में विदा हुई।

     

    लेकिन किसी को नहीं पता था कि जिस घर में वह दुल्हन बनकर जा रही थी, वही घर उसकी जिंदगी की सबसे डरावनी कैद बनने वाला था।

     

    ससुराल में पहले कुछ दिन सब ठीक रहा।

     

    फिर एक रात नंदिनी के पति राघव ने कहा—

     

    “पापा कह रहे थे कि तुम्हारे पिता ने कार का वादा किया था।”

     

    नंदिनी चौंक गई।

     

    “कार? बाबा ने तो अपनी जमीन बेचकर मोटरसाइकिल दी है।”

     

    राघव ने गुस्से से उसकी तरफ देखा।

     

    “मतलब तुम लोग हमें बेवकूफ बनाकर लाए हो?”

     

    उस रात पहली बार नंदिनी के चेहरे से मुस्कान गायब हुई।

     

    दिन बीतते गए।

     

    माँग बढ़ती गई।

     

    कभी कार।

     

    कभी दो लाख रुपये।

     

    कभी नया फर्नीचर।

     

    कभी सोने की चेन।

     

    नंदिनी हर बार कहती—

     

    “मेरे पिता अब कुछ नहीं दे सकते।”

     

    और हर बार उसे यही जवाब मिलता—

     

    “तो फिर तू भी यहाँ ज्यादा दिन नहीं रह पाएगी।”

     

    एक दिन नंदिनी ने अपने पिता को फोन किया।

     

    “बाबा… मुझे घर ले चलो।”

     

    रामदीन की आवाज काँप गई।

     

    “क्या हुआ बेटी?”

     

    “कुछ नहीं बाबा… बस आपकी बहुत याद आ रही है।”

     

    वह अपने पिता को सच्चाई नहीं बता पाई।

     

    क्योंकि वह जानती थी कि उसके पिता के पास अब देने के लिए कुछ नहीं था।

     

    कुछ सप्ताह बाद एक रात हवेली में जोरदार चीख सुनाई दी।

     

    “बचाओ!”

     

    फिर अचानक सब शांत हो गया।

     

    सुबह खबर फैली—

     

    नंदिनी रसोई में लगी आग में जल गई।

     

    उसकी मौत को हादसा बताया गया।

     

    रामदीन जब पहुँचा तो बेटी का चेहरा तक पहचान में नहीं आ रहा था।

     

    वह फूट-फूटकर रोया।

     

    “मेरी बेटी को जला दिया तुम लोगों ने!”

     

    लेकिन सबूत नहीं था।

     

    मामला धीरे-धीरे दब गया।

     

    हवेली फिर शांत हो गई।

     

    लेकिन नंदिनी शांत नहीं हुई।

     

    शादी के ठीक पंद्रहवें दिन से हवेली में अजीब घटनाएँ होने लगीं।

     

    रात को किसी के पायल पहनकर चलने की आवाज आती।

     

    रसोई में बंद बर्तन अपने आप गिरने लगते।

     

    और हर अमावस्या की रात हवेली की ऊपरी मंजिल से एक औरत की आवाज आती—

     

    “मेरा दहेज वापस करो…”

     

    राघव की माँ ने इसे वहम बताया।

     

    लेकिन एक रात राघव ने खुद वह आवाज सुनी।

     

    वह ऊपर गया।

     

    कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था।

     

    उसने दरवाजा तोड़ा।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    लेकिन दीवार पर राख से लिखा था—

     

    “बेटी की कीमत लगाने वालों का घर कभी आबाद नहीं होता।”

     

    राघव डरकर पीछे हट गया।

     

    तभी उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाया—

     

    “तुमने मेरी कीमत लगाई थी ना?”

     

    राघव पलटा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    लेकिन फर्श पर लाल साड़ी का एक टुकड़ा पड़ा था।

     

    उसी रात हवेली की सारी खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं।

     

    और बाहर तेज बारिश शुरू हो गई।

     

    राघव की माँ चीखती हुई नीचे भागी।

     

    तभी ऊपर से पायल की आवाज आई—

     

    छन…

     

    छन…

     

    छन…

     

    धीरे-धीरे वह आवाज सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी।

     

    एक कदम…

     

    फिर दूसरा…

     

    फिर तीसरा…

     

    राघव और उसकी माँ दरवाजे के पास खड़े काँप रहे थे।

     

    आवाज बिल्कुल उनके सामने आकर रुक गई।

     

    फिर एक धीमी आवाज आई—

     

    “जिस घर में दहेज माँगा जाता है… वहाँ दुल्हन नहीं आती… उसकी मजबूरी आती है।”

     

    और उसी क्षण हवेली की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।

     

    सुबह जब गाँव वाले हवेली पहुँचे, तो राघव की माँ बेहोश मिली।

     

    राघव गायब था।

     

    उस दिन के बाद वह कभी वापस नहीं आया।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

     

    पंद्रह साल बाद एक नई दुल्हन उस हवेली में आई।

     

    उसका नाम था आरती।

     

    उसे हवेली के पुराने इतिहास के बारे में कुछ नहीं पता था।

     

    वह अपने पति के साथ कमरे में पहुँची।

     

    रात को उसने अपने सामान में से लाल साड़ी निकाली।

     

    तभी उसे कमरे के कोने से पायल की आवाज सुनाई दी।

     

    छन…

     

    छन…

     

    आरती ने पलटकर देखा।

     

    एक औरत खिड़की के पास खड़ी थी।

     

    लाल साड़ी…

     

    जला हुआ चेहरा…

     

    और आँखों से बहते आँसू।

     

    आरती चीखने ही वाली थी कि वह औरत बोली—

     

    “डर मत बेटी… मैं तुझे डराने नहीं आई।”

     

    आरती काँपते हुए बोली—

     

    “आप… कौन हैं?”

     

    औरत ने धीरे से कहा—

     

    “मैं नंदिनी हूँ।”

     

    आरती के हाथ से साड़ी गिर गई।

     

    नंदिनी ने उसकी ओर देखकर कहा—

     

    “मेरी तरह अपनी जिंदगी को दहेज की आग में मत जलने देना।”

     

    आरती रोने लगी।

     

    “लेकिन मैं क्या करूँ?”

     

    नंदिनी की आवाज कठोर हो गई—

     

    “आवाज उठाओ।”

     

    फिर वह धीरे-धीरे धुएँ में बदलने लगी।

     

    जाते-जाते उसने कहा—

     

    “जिस दिन बेटियाँ डरना बंद कर देंगी… उस दिन दहेज की बेड़ियाँ टूट जाएँगी।”

     

    आरती ने उस रात फैसला कर लिया।

     

    वह चुप नहीं रहेगी।

     

    लेकिन उसे नहीं पता था कि सुबह होते ही उसके सामने ऐसा सच आने वाला है, जो नंदिनी की मौत से भी ज्यादा भयानक था…

     

    क्रमशः… भाग 2 में।

     

    इस भाग की सीख

     

    दहेज केवल पैसों की माँग नहीं है। यह किसी बेटी के आत्मसम्मान, सपनों और जीवन की कीमत लगाने की सोच है।

     

    बेटी बोझ नहीं है। दहेज परंपरा नहीं, सामाजिक बुराई है।

     

    अगर किसी रिश्ते की शुरुआत ही लालच से हो रही है, तो वहाँ प्रेम और सम्मान की उम्मीद करना अपने जीवन के साथ अन्याय है।

     

    डरकर चुप रहना समस्या को बढ़ाता है, जबकि आवाज उठाना बदलाव की पहली सीढ़ी है।

    Avatar photo

    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • काली हवेली का आख़िरी कमरा (Last part-3)

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    तेरहवीं घंटी की आवाज़ के बाद पूरी हवेली में सन्नाटा छा गया।

     

    आरव सामने खड़ी उस काली परछाईं को देख रहा था।

     

    उसकी आँखें लाल थीं और शरीर धुएँ की तरह हिल रहा था। उसके चेहरे पर कोई निश्चित आकार नहीं था। कभी वह बूढ़े आदमी जैसा दिखाई देता, कभी जवान, और कभी बिल्कुल आरव जैसा।

     

    आरव पीछे हटने लगा।

     

    “कबीर कहाँ है?”

     

    परछाईं हँसी।

     

    “जिसे तुम दोस्त समझते हो, वह अभी भी ज़िंदा है।”

     

    “तो उसे मेरे सामने लाओ!”

     

    परछाईं ने हाथ उठाया।

     

    अचानक कमरे की दीवार पर एक तस्वीर दिखाई दी।

     

    उसमें कबीर एक छोटे से कमरे में बंद था।

     

    वह दरवाज़ा पीट रहा था।

     

    “आरव! मुझे यहाँ से निकाल!”

     

    आरव ने तस्वीर पर हाथ मारा।

     

    “कबीर!”

     

    तस्वीर के अंदर कबीर ने आरव को देखा।

     

    “तेरहवीं चाबी!”

     

    आरव ने नीचे देखा।

     

    वही पुरानी चाबी उसकी मुट्ठी में थी।

     

    कबीर चिल्लाया—

     

    “दीवार के पीछे का दरवाज़ा खोलो!”

     

    तभी तस्वीर गायब हो गई।

     

    आरव ने दीवार को ध्यान से देखा।

     

    उस पर मीरा की तस्वीर बनी हुई थी।

     

    आरव ने चाबी तस्वीर के बीच लगा दी।

     

    क्लिक!

     

    दीवार दो हिस्सों में बँट गई।

     

    पीछे एक संकरी सीढ़ी थी।

     

    आरव नीचे उतरने लगा।

     

    हर सीढ़ी के साथ तापमान गिरता जा रहा था।

     

    नीचे पहुँचकर उसे एक विशाल कमरा दिखाई दिया।

     

    कमरे के बीचों-बीच कबीर बंधा हुआ था।

     

    “आरव!”

     

    आरव उसकी तरफ दौड़ा।

     

    लेकिन तभी कबीर ने चीखकर कहा—

     

    “रुको!”

     

    आरव वहीं रुक गया।

     

    कबीर के पीछे मीरा खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर था।

     

    “आरव, ये कबीर नहीं है।”

     

    आरव ने चौंककर कबीर को देखा।

     

    कबीर मुस्कुराने लगा।

     

    उसकी मुस्कान धीरे-धीरे फैलती गई।

     

    फिर उसका चेहरा बदलने लगा।

     

    कुछ ही सेकंड में वहाँ वही काली परछाईं खड़ी थी।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?”

     

    परछाईं ने कहा—

     

    “मैंने कुछ नहीं किया। तुम्हारे परिवार ने किया था।”

     

    तभी कमरे की दीवारों पर पुरानी घटनाएँ दिखाई देने लगीं।

     

    आरव ने देखा—

     

    तीस साल पहले रुद्र प्रताप ने इसी कमरे में एक अनुष्ठान किया था।

     

    उसकी बेटी मीरा गंभीर बीमारी से मर रही थी।

     

    रुद्र अपनी बेटी को बचाना चाहता था।

     

    उसने एक अजीब शक्ति को बुलाया।

     

    उस शक्ति ने कहा था—

     

    “मैं मीरा को जीवन दूँगा, लेकिन बदले में तुम्हारे परिवार की हर पीढ़ी से एक व्यक्ति मुझे अपना जीवन देगा।”

     

    रुद्र ने हामी भर दी।

     

    मीरा बच गई।

     

    लेकिन उसी रात रुद्र को अपनी गलती का एहसास हुआ।

     

    उसने उस शक्ति को कैद करने के लिए कमरा 13 बनवाया।

     

    लेकिन शक्ति ने पूरे परिवार को एक-एक करके मार दिया।

     

    मीरा को भी।

     

    मरने से पहले मीरा ने उस शक्ति को हवेली में बंद कर दिया।

     

    लेकिन एक शर्त थी—

     

    हर इक्कीस साल बाद रुद्र के परिवार का कोई वंशज हवेली में आएगा और उसकी जगह कैद हो जाएगा।

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तो मेरे पिता?”

     

    मीरा ने सिर झुका लिया।

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें बचाने के लिए अपना नाम और शहर बदल दिया था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और तुम?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “मैंने तुम्हें यहाँ इसलिए बुलाया क्योंकि मुझे लगा था कि तुम ही इस श्राप को खत्म कर सकते हो।”

     

    परछाईं जोर से हँसी।

     

    “वह श्राप खत्म नहीं कर सकता।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    परछाईं ने उसकी तरफ देखते हुए कहा—

     

    “क्योंकि अब तुम मेरे हो।”

     

    अचानक आरव के हाथ में जलन होने लगी।

     

    उसकी हथेली पर एक काला निशान बन गया।

     

    मीरा चिल्लाई—

     

    “आरव! चाबी को आग में डालो!”

     

    कमरे के बीच एक पुरानी लोहे की भट्टी जल रही थी।

     

    आरव ने चाबी उसमें फेंक दी।

     

    आग अचानक नीली हो गई।

     

    परछाईं दर्द से चीखने लगी।

     

    “नहीं!”

     

    पूरा कमरा काँपने लगा।

     

    दीवारों में दरारें पड़ गईं।

     

    मीरा ने आरव से कहा—

     

    “जल्दी! आख़िरी दरवाज़ा खोलो!”

     

    आरव ने सामने देखा।

     

    वहाँ एक छोटा-सा लकड़ी का दरवाज़ा था।

     

    उस पर कोई ताला नहीं था।

     

    लेकिन उसके ऊपर लिखा था—

     

    “जिसे सच स्वीकार है, वही इसे खोल सकता है।”

     

    आरव ने दरवाज़े पर हाथ रखा।

     

    उसके सामने उसके पिता दिखाई दिए।

     

    वह रो रहे थे।

     

    “बेटा, मुझे माफ करना।”

     

    आरव की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “आपने मुझे क्यों छोड़ा?”

     

    उसके पिता ने कहा—

     

    “क्योंकि अगर मैं तुम्हें अपने पास रखता, तो वह तुम्हें ढूँढ लेता।”

     

    दृश्य गायब हो गया।

     

    फिर आरव ने अपनी माँ को देखा।

     

    फिर बचपन की यादें।

     

    फिर वह रात जब उसके पिता अचानक घर छोड़कर चले गए थे।

     

    आरव समझ गया कि उसके माता-पिता ने उससे नफरत नहीं की थी।

     

    वे उसे बचा रहे थे।

     

    उसने दरवाज़ा खोल दिया।

     

    अंदर कुछ नहीं था।

     

    सिर्फ एक आईना।

     

    आरव आईने के सामने खड़ा हुआ।

     

    आईने में उसे अपना चेहरा दिखाई दिया।

     

    लेकिन उसके पीछे मीरा खड़ी थी।

     

    और उसके पीछे वह काली परछाईं।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “आरव, तुम्हें फैसला करना होगा।”

     

    “कैसा फैसला?”

     

    “या तो तुम हवेली से बाहर जाओ और श्राप हमेशा के लिए तुम्हारे परिवार के साथ रहेगा…”

     

    “या?”

     

    “या तुम यहीं रहकर इसे खत्म कर दो।”

     

    आरव ने परछाईं की तरफ देखा।

     

    “अगर मैं यहीं रह गया तो?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “तुम्हारा शरीर नहीं रहेगा। लेकिन तुम्हारी आत्मा इस हवेली को हमेशा के लिए बंद कर देगी।”

     

    आरव कुछ सेकंड तक चुप रहा।

     

    फिर उसने फैसला कर लिया।

     

    उसने आईने को उठाया और पूरी ताकत से जमीन पर पटक दिया।

     

    छन्न्न्न!

     

    आईना टूटते ही भयंकर चीख सुनाई दी।

     

    काली परछाईं टूटने लगी।

     

    उसका शरीर धुएँ में बदल गया।

     

    “तुम नहीं जानते कि तुमने क्या किया है!”

     

    आरव ने कहा—

     

    “अब इस हवेली में कोई नहीं फँसेगा।”

     

    परछाईं ने आख़िरी बार चीखते हुए कहा—

     

    “अगर मैं खत्म हुआ… तो तुम्हारी यादें भी खत्म होंगी!”

     

    अचानक आरव के सिर में तेज दर्द हुआ।

     

    उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    जब उसने आँखें खोलीं तो सुबह हो चुकी थी।

     

    वह जंगल के बाहर सड़क पर पड़ा था।

     

    उसके पास कबीर भी बेहोश पड़ा था।

     

    कुछ देर बाद कबीर ने आँखें खोलीं।

     

    “आरव…”

     

    “हाँ?”

     

    “हम बच गए?”

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    वहाँ अब कोई हवेली नहीं थी।

     

    सिर्फ एक जला हुआ खंडहर था।

     

    दोनों धीरे-धीरे सड़क की तरफ चलने लगे।

     

    लेकिन आरव को कुछ अजीब महसूस हो रहा था।

     

    उसे अपने बचपन की कोई याद नहीं आ रही थी।

     

    उसे अपने माता-पिता के चेहरे याद नहीं थे।

     

    उसे अपना पुराना घर याद नहीं था।

     

    यहाँ तक कि उसे यह भी याद नहीं था कि वह कबीर को कब से जानता था।

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    आरव ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हाँ।”

     

    फिर उसने अपनी जेब में हाथ डाला।

     

    उसके हाथ में एक छोटी-सी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में मीरा खड़ी थी।

     

    लेकिन अब वह मुस्कुरा रही थी।

     

    तस्वीर के पीछे एक आख़िरी वाक्य लिखा था—

     

    “धन्यवाद, आरव। अब मैं आज़ाद हूँ।”

     

    आरव ने तस्वीर को सीने से लगा लिया।

     

    तभी दूर जंगल के अंदर से किसी बच्ची की हँसी सुनाई दी।

     

    आरव और कबीर दोनों रुक गए।

     

    कबीर ने घबराकर पूछा—

     

    “तुमने भी सुना?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    दोनों ने पीछे मुड़कर जंगल की तरफ देखा।

     

    वहाँ कुछ नहीं था।

     

    सिर्फ पेड़ों के बीच हवा चल रही थी।

     

    आरव ने राहत की साँस ली और आगे बढ़ गया।

     

    लेकिन उसे पता नहीं था…

     

    कि उसकी जेब में रखी तस्वीर के अंदर मीरा अब अकेली नहीं थी।

     

    उसके पीछे एक नया चेहरा दिखाई दे रहा था।

     

    वही काली परछाईं।

     

    और तस्वीर के नीचे धीरे-धीरे नए शब्द उभर रहे थे—

     

    “हवेली खत्म हुई है… श्राप नहीं।”

     

    समाप्त।

    Avatar photo

    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • काली हवेली का आख़िरी कमरा — भाग 2: तेरहवीं चाबी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    आरव पूरी रात सो नहीं पाया।

     

    उसके हाथ में वही पुरानी चाबी थी, जिस पर 13 लिखा हुआ था।

     

    सुबह होते ही उसने अपने दोस्त कबीर को फोन किया।

     

    “कबीर, मुझे तुमसे मिलना है। अभी।”

     

    दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक खामोशी रही।

     

    फिर कबीर ने धीमी आवाज़ में पूछा—

     

    “तुम भैरवगढ़ गए थे?”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    कबीर ने जवाब नहीं दिया।

     

    बस इतना कहा—

     

    “तुम जहाँ हो, वहीं रहो। मैं आ रहा हूँ।”

     

    करीब एक घंटे बाद कबीर आरव के कमरे में पहुँचा।

     

    आरव ने बिना कुछ कहे उसके सामने चाबी रख दी।

     

    चाबी देखते ही कबीर का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “ये तुम्हें कहाँ मिली?”

     

    “काली हवेली में।”

     

    कबीर कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।

     

    “तुम वहाँ गए थे?”

     

    आरव ने पूरी घटना बता दी।

     

    मीरा…

     

    आख़िरी कमरा…

     

    तेरह नंबर की चाबी…

     

    और वह तस्वीर।

     

    कबीर चुपचाप सुनता रहा।

     

    फिर उसने अपने बैग से एक पुरानी डायरी निकाली।

     

    “मेरे दादा ने ये डायरी मुझे मरने से पहले दी थी।”

     

    उसने डायरी खोली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “भैरवगढ़ की हवेली में जो दिखाई देता है, वह सच नहीं होता। और जो दिखाई नहीं देता, वही सबसे खतरनाक है।”

     

    आरव ने अगला पन्ना पलटा।

     

    वहाँ रुद्र प्रताप सिंह का नाम था।

     

    कबीर बोला—

     

    “मेरे दादा इस हवेली में चौकीदार थे। उन्होंने बताया था कि रुद्र प्रताप की बेटी मीरा को बचपन से एक अजीब बीमारी थी। वह अक्सर कहती थी कि उसे घर की दीवारों के अंदर से कोई बुलाता है।”

     

    “कौन?”

     

    “उसे नहीं पता था।”

     

    कबीर ने डायरी का एक और पन्ना खोला।

     

    उसमें हवेली का नक्शा बना था।

     

    लेकिन नक्शे में एक ऐसी मंज़िल दिखाई दे रही थी जो हवेली में मौजूद ही नहीं थी।

     

    तहखाना — कमरा 13।

     

    आरव ने चाबी उठाई।

     

    “तो मुझे वहाँ जाना होगा।”

     

    कबीर ने तुरंत कहा—

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मेरे दादा ने लिखा है कि कमरा 13 का दरवाज़ा खोलने वाला कभी वापस नहीं आया।”

     

    कुछ पल दोनों के बीच खामोशी रही।

     

    फिर आरव ने कहा—

     

    “लेकिन मीरा ने मुझे बुलाया है।”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “और अगर मीरा तुम्हें बचाना नहीं, फँसाना चाहती हो तो?”

     

    आरव के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    शाम होते ही दोनों भैरवगढ़ के लिए निकल पड़े।

     

    रास्ते भर बारिश होती रही।

     

    जब वे उस जगह पहुँचे, जहाँ पिछली रात आरव को हवेली दिखाई दी थी, वहाँ अब भी सिर्फ घना जंगल था।

     

    कबीर ने डायरी निकालकर नक्शा देखा।

     

    “हवेली यहीं होनी चाहिए।”

     

    दोनों कुछ देर तक तलाश करते रहे।

     

    अचानक आरव की नजर एक पुराने कुएँ पर पड़ी।

     

    कुएँ के किनारे वही निशान बना था जो डायरी के नक्शे पर था।

     

    कबीर ने पत्थर हटाया।

     

    नीचे सीढ़ियाँ दिखाई दीं।

     

    दोनों नीचे उतरने लगे।

     

    लगभग पचास सीढ़ियों के बाद एक पत्थर की सुरंग सामने आई।

     

    सुरंग के अंत में लोहे का दरवाज़ा था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    13

     

    आरव ने चाबी ताले में लगाई।

     

    ताला अपने आप खुल गया।

     

    दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।

     

    अंदर एक बड़ा कमरा था।

     

    कमरे की दीवारों पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।

     

    हर तस्वीर में कोई न कोई इंसान था।

     

    कुछ लोग रो रहे थे।

     

    कुछ चिल्ला रहे थे।

     

    कुछ सीधे कैमरे की तरफ देख रहे थे।

     

    कबीर ने एक तस्वीर उठाई।

     

    उसका चेहरा अचानक बदल गया।

     

    “आरव…”

     

    “क्या हुआ?”

     

    कबीर ने तस्वीर आरव को दिखाई।

     

    उसमें एक छोटे बच्चे की तस्वीर थी।

     

    नीचे नाम लिखा था—

     

    “देवेंद्र — उम्र 8 वर्ष।”

     

    कबीर काँपने लगा।

     

    “ये मेरे दादा हैं।”

     

    आरव ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    तस्वीर में छोटा देवेंद्र उसी कमरे में खड़ा था।

     

    उसके पीछे मीरा खड़ी थी।

     

    लेकिन यह तस्वीर लगभग चालीस साल पुरानी थी।

     

    “ये कैसे हो सकता है?”

     

    कबीर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    तभी कमरे के अंदर से आवाज़ आई—

     

    “क्योंकि वह कभी यहाँ से गया ही नहीं।”

     

    दोनों ने पीछे देखा।

     

    मीरा खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार वह बच्ची नहीं लग रही थी।

     

    उसका चेहरा बूढ़ा दिखाई दे रहा था।

     

    बाल सफेद थे।

     

    आँखें काली।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “तुम मीरा नहीं हो।”

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “मैं मीरा हूँ।”

     

    “तो तुम्हारी उम्र…?”

     

    “इस हवेली में उम्र नहीं बढ़ती।”

     

    मीरा ने दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    “यहाँ हर इंसान की एक रात बंद है।”

     

    अचानक एक तस्वीर जमीन पर गिर गई।

     

    उसमें रुद्र प्रताप सिंह थे।

     

    उनके हाथ में वही तेरह नंबर की चाबी थी।

     

    आरव ने तस्वीर उठाई।

     

    पीछे कुछ लिखा था—

     

    “रुद्र ने दरवाज़ा खोला था, लेकिन बाहर कुछ और निकला।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “क्या निकला?”

     

    मीरा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे दादा जानते थे।”

     

    अचानक कमरे की दीवार पर एक दरवाज़ा दिखाई दिया।

     

    दरवाज़ा काला था।

     

    उसके ऊपर लाल अक्षरों में लिखा था—

     

    “जिसे अंदर बुलाया गया है, वही बाहर जा सकता है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “मुझे क्यों बुलाया गया?”

     

    मीरा चुप रही।

     

    फिर उसने धीरे से कहा—

     

    “क्योंकि तुम रुद्र के परिवार से जुड़े हो।”

     

    आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “क्या?”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुमने मुझे कभी नहीं बताया कि तुम्हारे परिवार का नाम क्या है।”

     

    आरव ने घबराकर कहा—

     

    “मेरा नाम आरव मल्होत्रा है। मेरा रुद्र प्रताप से कोई संबंध नहीं।”

     

    मीरा हँसने लगी।

     

    “नाम बदलने से खून नहीं बदलता।”

     

    कमरे की सारी तस्वीरें एक साथ हिलने लगीं।

     

    फिर एक तस्वीर दीवार से गिरकर आरव के पैरों के पास आ गिरी।

     

    उसमें एक नवजात बच्चा था।

     

    गोद में उसे पकड़े एक आदमी खड़ा था।

     

    वह आदमी रुद्र प्रताप था।

     

    और बच्चे के नीचे लिखा था—

     

    “आरव।”

     

    आरव के हाथ काँपने लगे।

     

    “ये झूठ है।”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें सच से दूर रखा।”

     

    कबीर ने तस्वीर पलटी।

     

    पीछे लिखा था—

     

    “जब आरव 21 साल का होगा, दरवाज़ा फिर खुलेगा।”

     

    आरव ने अपनी उम्र याद की।

     

    वह अगले दिन 21 साल का होने वाला था।

     

    उसी समय हवेली के अंदर से एक भयानक चीख सुनाई दी।

     

    फिर किसी आदमी की भारी आवाज़ गूँजी—

     

    “समय पूरा हो गया।”

     

    मीरा पीछे हट गई।

     

    उसके चेहरे पर पहली बार डर दिखाई दिया।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन है?”

     

    मीरा ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “वही… जिसने हम सबको कैद किया है।”

     

    अचानक काला दरवाज़ा खुल गया।

     

    अंदर घना अंधेरा था।

     

    उस अंधेरे में दो लाल आँखें चमक रही थीं।

     

    कबीर ने आरव का हाथ पकड़ा।

     

    “भागो!”

     

    दोनों पीछे मुड़े।

     

    लेकिन रास्ता गायब हो चुका था।

     

    कमरे की दीवारें धीरे-धीरे उनके करीब आने लगीं।

     

    मीरा चीखी—

     

    “आरव! अंदर जाओ!”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर तुम अंदर नहीं गए, तो वह बाहर आ जाएगा!”

     

    आरव ने काले दरवाज़े की तरफ देखा।

     

    अंधेरे से एक हाथ बाहर निकला।

     

    वह हाथ इंसान जैसा था…

     

    लेकिन उसकी उंगलियाँ असामान्य रूप से लंबी थीं।

     

    आरव ने हिम्मत जुटाई और दरवाज़े के अंदर कदम रख दिया।

     

    कबीर उसके पीछे गया।

     

    दरवाज़ा उनके पीछे बंद हो गया।

     

    अंदर एक लंबा कमरा था।

     

    कमरे के बीचों-बीच एक कुर्सी रखी थी।

     

    कुर्सी पर एक आदमी बैठा था।

     

    उसका चेहरा आरव जैसा था।

     

    लेकिन उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    वह धीरे से मुस्कुराया।

     

    “आख़िरकार तुम आ ही गए।”

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    आदमी ने सिर उठाया।

     

    “मैं वही हूँ…”

     

    उसने कहा,

     

    “…जिसे तुम्हारे परिवार ने तीस साल पहले इस हवेली में बंद किया था।”

     

    आरव कुछ बोल नहीं पाया।

     

    आदमी आगे झुका।

     

    “लेकिन अब मुझे आज़ाद होने के लिए सिर्फ तुम्हारे खून की जरूरत है।”

     

    अचानक पीछे से कबीर की चीख सुनाई दी।

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    कबीर गायब था।

     

    दरवाज़ा भी गायब था।

     

    और सामने बैठा वह आदमी धीरे-धीरे अपनी कुर्सी से उठ रहा था।

     

    “अब हम दोनों अकेले हैं, आरव।”

     

    तभी दूर कहीं घड़ी ने बारह बजने की आवाज़ की।

     

    टन… टन… टन…

     

    तेरहवीं घंटी बजते ही आदमी का चेहरा बदल गया।

     

    अब वह आदमी नहीं था।

     

    वह एक भयानक काली परछाईं बन चुका था।

     

    और उसके पीछे दीवार पर खून से एक वाक्य लिखा जा रहा था—

     

     

    Avatar photo

    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱 काली हवेली का आख़िरी कमरा 😱 (part-1)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    रात के करीब ग्यारह बजे आरव की कार सुनसान सड़क पर अचानक बंद हो गई।

     

    उसने कई बार चाबी घुमाई, लेकिन इंजन ने कोई आवाज़ नहीं की। चारों तरफ घना जंगल था। आसमान पर बादल इतने काले थे कि चाँद तक दिखाई नहीं दे रहा था। मोबाइल में नेटवर्क पहले ही गायब हो चुका था।

     

    आरव ने परेशान होकर कार से बाहर देखा।

     

    सड़क के दूसरी तरफ एक पुराना पत्थर लगा था, जिस पर धुंधली रोशनी में कुछ लिखा दिखाई दे रहा था—

     

    “भैरवगढ़ — 2 किलोमीटर।”

     

    आरव ने घड़ी देखी। रात के 11:07 बज रहे थे।

     

    उसे याद आया कि उसके दोस्त कबीर ने इस जगह के बारे में बताया था। भैरवगढ़ में एक पुरानी हवेली थी, जिसे लोग काली हवेली कहते थे। कहा जाता था कि लगभग तीस साल पहले उस हवेली में रहने वाला पूरा परिवार एक ही रात में गायब हो गया था।

     

    लोगों का मानना था कि परिवार का कोई सदस्य आज भी हवेली में रहता है।

     

    आरव ने इन बातों को हमेशा मज़ाक समझा था।

     

    लेकिन उस रात उसके पास हवेली के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

     

    उसने बैग उठाया और पैदल चल पड़ा।

     

    लगभग बीस मिनट बाद जंगल खत्म हुआ।

     

    सामने एक विशाल हवेली खड़ी थी।

     

    उसकी दीवारों पर काई जमी हुई थी। खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाज़ा आधा खुला था।

     

    सबसे अजीब बात यह थी कि हवेली के अंदर से हल्की पीली रोशनी आ रही थी।

     

    आरव रुक गया।

     

    “यहाँ कोई रहता है?”

     

    उसने आवाज़ लगाई—

     

    “कोई है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    वह धीरे-धीरे अंदर चला गया।

     

    दरवाज़ा उसके पीछे अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    उसने पीछे मुड़कर दरवाज़ा खोलने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं खुला।

     

    “बहुत बढ़िया…”

     

    उसने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    हॉल में पुरानी तस्वीरें लगी थीं। हर तस्वीर पर धूल की मोटी परत थी। उसने एक तस्वीर साफ की।

     

    उसमें एक आदमी, एक औरत और एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    तस्वीर के नीचे नाम लिखा था—

     

    “रुद्र प्रताप सिंह — पत्नी देविका — बेटी मीरा।”

     

    आरव ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    छोटी लड़की मीरा की आँखें अजीब थीं।

     

    ऐसा लग रहा था जैसे वह कैमरे में नहीं, सीधे आरव को देख रही हो।

     

    तभी ऊपर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।

     

    ठक!

     

    आरव ने फ्लैशलाइट ऊपर की।

     

    पहली मंज़िल पर एक लंबा गलियारा था।

     

    और गलियारे के आख़िरी सिरे पर एक दरवाज़ा।

     

    उस दरवाज़े के नीचे से वही पीली रोशनी बाहर आ रही थी।

     

    आरव ने सीढ़ियाँ चढ़नी शुरू कीं।

     

    पहली सीढ़ी…

     

    दूसरी…

     

    तीसरी…

     

    जैसे-जैसे वह ऊपर जा रहा था, उसे किसी बच्ची के गुनगुनाने की आवाज़ सुनाई देने लगी।

     

    “सो जा… सो जा…”

     

    आरव रुक गया।

     

    आवाज़ बंद हो गई।

     

    वह कुछ सेकंड तक खड़ा रहा।

     

    फिर आगे बढ़ा।

     

    गलियारे की दीवार पर एक घड़ी लगी थी।

     

    उसकी सुइयाँ 12 बजकर 13 मिनट पर रुकी हुई थीं।

     

    आरव ने अपनी घड़ी देखी।

     

    11:42।

     

    उसने राहत की साँस ली।

     

    लेकिन तभी घड़ी की सुइयाँ हिलने लगीं।

     

    टक… टक… टक…

     

    और अचानक वह 12:13 पर पहुँच गई।

     

    उसी क्षण हवेली की सारी लाइटें बुझ गईं।

     

    अंधेरा।

     

    पूरा अंधेरा।

     

    आरव ने मोबाइल की रोशनी जलाई।

     

    सामने वही आख़िरी कमरा था।

     

    दरवाज़ा अब खुला हुआ था।

     

    अंदर से एक बच्ची की आवाज़ आई—

     

    “आरव…”

     

    उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उसने किसी को अपना नाम नहीं बताया था।

     

    आवाज़ फिर आई—

     

    “आरव… तुम बहुत देर से आए।”

     

    आरव पीछे हटने लगा।

     

    “क… कौन हो तुम?”

     

    कमरे के अंदर से धीमी हँसी सुनाई दी।

     

    फिर एक छोटी-सी लड़की दरवाज़े के पीछे से बाहर आई।

     

    उसने सफेद फ्रॉक पहनी थी।

     

    उसके लंबे काले बाल चेहरे पर लटक रहे थे।

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा—

     

    “मीरा?”

     

    लड़की ने अपना चेहरा उठाया।

     

    उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “तुम्हें मेरा नाम कैसे पता?”

     

    आरव के हाथ से मोबाइल गिर गया।

     

    अंधेरे में लड़की उसके करीब आई।

     

    “क्योंकि तुम मेरे पापा को ढूँढने आए हो…”

     

    आरव ने घबराकर कहा—

     

    “मैं किसी को ढूँढने नहीं आया।”

     

    मीरा की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “झूठ।”

     

    अचानक पीछे से दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    आरव ने पूरी ताकत से उसे खींचा।

     

    लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    मीरा उसके बिल्कुल सामने खड़ी थी।

     

    “अगर बाहर जाना है…”

     

    वह फुसफुसाई,

     

    “…तो आख़िरी कमरा खोलना होगा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “आख़िरी कमरा?”

     

    मीरा ने गलियारे की तरफ इशारा किया।

     

    “यह कमरा आख़िरी नहीं है।”

     

    आरव ने धीरे-धीरे पीछे देखा।

     

    गलियारे में अब पहले से कहीं ज्यादा दरवाज़े थे।

     

    दस…

     

    बीस…

     

    शायद पचास।

     

    जबकि कुछ मिनट पहले वहाँ केवल तीन दरवाज़े थे।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “हर दरवाज़े के पीछे हमारे परिवार की एक रात बंद है।”

     

    आरव कुछ समझ पाता, उससे पहले हवेली की दीवारों से चीखें आने लगीं।

     

    एक आदमी चिल्ला रहा था।

     

    एक औरत रो रही थी।

     

    और एक बच्ची बार-बार कह रही थी—

     

    “दरवाज़ा मत खोलना…”

     

    आरव ने कान बंद कर लिए।

     

    लेकिन आवाज़ उसके सिर के अंदर गूँज रही थी।

     

    फिर मीरा ने उसके हाथ में एक पुरानी चाबी रख दी।

     

    “कल रात तक तुम्हें सच पता करना होगा।”

     

    आरव ने चाबी को देखा।

     

    उस पर खून जैसे लाल रंग से एक नंबर लिखा था—

     

    13

     

    “और अगर मैंने नहीं किया?”

     

    मीरा ने धीरे से सिर झुकाया।

     

    उसके चेहरे पर फिर वही डरावनी मुस्कान आ गई।

     

    “तो कल रात…”

     

    वह फुसफुसाई—

     

    “…तुम भी इस हवेली की तस्वीर में होंगे।”

     

    अचानक आरव की आँखों के सामने अंधेरा छा गया।

     

    जब उसकी आँख खुली, सुबह हो चुकी थी।

     

    वह हवेली के बाहर सड़क पर पड़ा था।

     

    उसकी कार बिल्कुल ठीक थी।

     

    आरव ने घबराकर हवेली की ओर देखा।

     

    वहाँ कोई हवेली नहीं थी।

     

    सिर्फ जंगल था।

     

    लेकिन उसके हाथ में अभी भी वह पुरानी चाबी थी।

     

    और चाबी पर लिखा नंबर—

     

    13

     

    उसने मोबाइल निकाला।

     

    गैलरी अपने आप खुली।

     

    उसमें एक नई तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में वही काली हवेली दिखाई दे रही थी।

     

    और पहली मंज़िल की खिड़की में एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    मीरा।

     

    लेकिन उसके पीछे एक दूसरा चेहरा भी था।

     

    एक आदमी का।

     

    जिसकी आँखें बिल्कुल काली थीं।

     

     

    Avatar photo

    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।