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😱 SATVI RAAT KA SHRAP😱 (part-2)

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

 

कमरे में अंधेरा था।

 

सौरभ अपनी माँ का हाथ पकड़े खड़ा था। बाहर से आती ठंडी हवा के साथ दरवाजे के नीचे से धुआँ-सा अंदर घुस रहा था।

 

फिर अचानक लाइट वापस जल गई।

 

दरवाजे के बाहर कोई नहीं था।

 

माँ ने काँपते हुए पूछा—

 

“वो चली गई?”

 

सौरभ ने जवाब नहीं दिया।

 

उसकी नजर दरवाजे पर थी।

 

दरवाजे की लकड़ी पर तीन गहरे निशान बने हुए थे।

 

जैसे किसी ने नुकीले नाखूनों से उसे खरोंचा हो।

 

माँ ने तुरंत कहा—

 

“इस घर से दूर रहो, सौरभ।”

 

“लेकिन मुझे सच जानना है।”

 

“कुछ सच ऐसे होते हैं जिन्हें जानने के बाद इंसान पहले जैसा नहीं रहता।”

 

सौरभ ने तस्वीर जेब में रख ली।

 

अगली सुबह वह सीधे पुराने मकान की तरफ निकल गया।

 

दिन का उजाला था, फिर भी मकान अजीब लग रहा था।

 

मुख्य दरवाजा बंद था।

 

लेकिन इस बार ताला बाहर नहीं लगा था।

 

सौरभ ने दरवाजा धक्का देकर खोला।

 

अंदर धूल की मोटी परत थी।

 

दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे। कुछ जगहों पर मकड़ी के जाले थे।

 

लेकिन सबसे अजीब बात थी—

 

घर के अंदर धूल के बीच पैरों के निशान बने हुए थे।

 

एक छोटे बच्चे के पैरों के निशान।

 

वे सीढ़ियों से ऊपर जा रहे थे।

 

सौरभ ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई और उनके पीछे चल पड़ा।

 

ऊपर एक लंबा गलियारा था।

 

गलियारे के अंत में एक दरवाजा था।

 

दरवाजे पर मोटे अक्षरों में लिखा था—

 

“इसे कभी मत खोलना।”

 

सौरभ ने दरवाजे को छुआ।

 

उसी समय उसके मोबाइल की स्क्रीन अपने आप बंद हो गई।

 

और पीछे से बच्चे की आवाज आई—

 

“आप भी आए हो?”

 

सौरभ तेजी से पलटा।

 

गलियारा खाली था।

 

“कौन है?”

 

कोई जवाब नहीं।

 

फिर वही आवाज—

 

“मुझे बाहर निकाल दो।”

 

सौरभ का दिल जोर से धड़कने लगा।

 

आवाज उस बंद कमरे के अंदर से आ रही थी।

 

उसने दरवाजे के पास कान लगाया।

 

अंदर से हल्की सिसकियाँ सुनाई दे रही थीं।

 

“कौन हो तुम?”

 

“मैं… आरव हूँ।”

 

सौरभ को तस्वीर में दिख रहा बच्चा याद आया।

 

“तुम इस घर में रहते थे?”

 

“हाँ।”

 

“तुम्हारे परिवार को क्या हुआ था?”

 

कुछ देर तक खामोशी रही।

 

फिर बच्चे ने कहा—

 

“हमने दरवाजा खोला था।”

 

सौरभ ने पूछा—

 

“कौन सा दरवाजा?”

 

अंदर से उत्तर आया—

 

“मौत का।”

 

अचानक दरवाजा जोर से हिलने लगा।

 

धड़ाम!

 

सौरभ पीछे गिर गया।

 

अंदर से किसी औरत के चीखने की आवाज आई—

 

“भागो!”

 

सौरभ उठकर नीचे भागा।

 

जैसे ही वह मुख्य दरवाजे तक पहुँचा, उसने देखा कि दरवाजा गायब था।

 

उसकी जगह केवल एक खाली दीवार थी।

 

“नहीं…!”

 

उसने दीवार को पीटना शुरू कर दिया।

 

तभी पीछे से किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

 

सौरभ ने डरकर पलटकर देखा।

 

एक बूढ़ी औरत खड़ी थी।

 

सफेद साड़ी।

 

पीला चेहरा।

 

गहरी काली आँखें।

 

और होंठों पर हल्की मुस्कान।

 

“तुम्हें दरवाजा नहीं मिल रहा?”

 

सौरभ पीछे हट गया।

 

“तुम कौन हो?”

 

वह औरत मुस्कुराई।

 

“जिसे तुम्हारे परिवार ने पंद्रह साल पहले धोखा दिया था।”

 

“मेरे परिवार ने?”

 

“तुम्हारे पिता जानते थे।”

 

सौरभ के चेहरे का रंग उड़ गया।

 

“क्या जानते थे?”

 

औरत ने अपनी उंगली होंठों पर रखी।

 

“आज रात… अपने पिता की पुरानी डायरी पढ़ना।”

 

अगले ही पल वह गायब हो गई।

 

और मुख्य दरवाजा वापस अपनी जगह पर था।

 

सौरभ भागकर घर पहुँचा।

 

उसने माँ से पिता की डायरी के बारे में पूछा।

 

माँ ने बहुत मना किया।

 

लेकिन आखिरकार उन्होंने एक पुराना संदूक खोला।

 

उसमें कपड़ों के नीचे एक काली डायरी रखी थी।

 

सौरभ ने डायरी खोली।

 

पहले कई पन्नों पर सामान्य बातें थीं।

 

फिर एक पन्ने पर लिखा था—

 

“13 दिसंबर 2011”

 

“आज हम उस मकान में पहुँचे। स्थानीय लोग कहते हैं कि घर अशुभ है। लेकिन हमें विश्वास नहीं।”

 

अगला पन्ना।

 

“आज रात पहली बार दस्तक सुनाई दी।”

 

अगला पन्ना।

 

“दस्तक हमेशा तीन बार होती है।”

 

अगला।

 

“जो व्यक्ति तीसरी दस्तक के बाद दरवाजा खोलता है, वह वापस नहीं लौटता।”

 

सौरभ का हाथ काँपने लगा।

 

फिर अगले पन्ने पर लिखा था—

 

“हमने गलती कर दी।”

 

उसके बाद कई पन्ने खाली थे।

 

फिर एक आखिरी पन्ना।

 

“अगर कभी मेरी संतान इस डायरी को पढ़े, तो उसे सच बताना होगा।”

 

सौरभ ने पन्ना पलटा।

 

“मौत का दरवाजा केवल खून के रिश्ते से खुलता है।”

 

नीचे लिखा था—

 

“वह अब सौरभ को लेने आएगी।”

 

सौरभ की साँस रुक गई।

 

तभी घर की सारी घड़ियाँ एक साथ बंद हो गईं।

 

समय था—

 

2:13 AM

 

माँ चीख पड़ीं।

 

“सौरभ!”

 

मुख्य दरवाजे पर दस्तक हुई।

 

ठक… ठक… ठक…

 

दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।

 

फिर दस्तक दोबारा हुई।

 

ठक… ठक… ठक…

 

इस बार घर की सभी खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं।

 

बाहर घना अंधेरा था।

 

और उस अंधेरे में वही पुराना मकान दिखाई दे रहा था।

 

लेकिन अब उसके ऊपर की खिड़की में रोशनी नहीं थी।

 

बल्कि वहाँ कोई खड़ा था।

 

एक बच्चा।

 

सौरभ ने ध्यान से देखा।

 

वह वही बच्चा था—

 

आरव।

 

बच्चे ने हाथ उठाकर उसे इशारा किया।

 

फिर अपने गले पर उंगली फेरते हुए संकेत किया—

 

“वह आ गई।”

 

सौरभ ने पीछे देखा।

 

कमरे के कोने में एक काली परछाईं खड़ी थी।

 

धीरे-धीरे वह परछाईं इंसानी आकार लेने लगी।

 

एक औरत का चेहरा उभरा।

 

वही सफेद साड़ी।

 

वही काली आँखें।

 

माँ ने चीखते हुए सौरभ को खींच लिया।

 

“भागो!”

 

दोनों बाहर की ओर दौड़े।

 

लेकिन जैसे ही उन्होंने दरवाजा खोला, सामने वही पुराना मकान था।

 

उनका अपना घर गायब हो चुका था।

 

सौरभ ने पीछे मुड़कर देखा।

 

अब वहाँ उसकी माँ नहीं थी।

 

वह अकेला खड़ा था।

 

पुराने मकान के सामने।

 

और मुख्य दरवाजे पर वही बूढ़ी औरत खड़ी थी।

 

उसने मुस्कुराकर कहा—

 

“तुम्हारे पिता ने मुझे वादा किया था कि पंद्रह साल बाद उनका बेटा खुद यहाँ आएगा।”

 

सौरभ ने काँपते हुए पूछा—

 

“मेरी माँ कहाँ है?”

 

औरत ने ऊपर की मंजिल की तरफ इशारा किया।

 

“जहाँ तुम्हारा परिवार पंद्रह साल पहले गया था।”

 

सौरभ ने ऊपर देखा।

 

एक खिड़की में उसकी माँ खड़ी थी।

 

वह शीशे पर हाथ मार रही थीं।

 

लेकिन उनकी आवाज बाहर नहीं आ रही थी।

 

औरत ने धीरे से दरवाजा खोला।

 

“अंदर आओ, सौरभ।”

 

सौरभ पीछे हटने लगा।

 

तभी उसके पीछे से उसके पिता की आवाज आई—

 

“बेटा… दरवाजा मत खोलना।”

 

सौरभ जम गया।

 

उसने पीछे देखा।

 

अंधेरे में उसके पिता की परछाईं खड़ी थी।

 

वे उसे देखकर बोले—

 

“क्योंकि जो अंदर है… वह तुम्हारी माँ नहीं है।”

 

सौरभ ने वापस ऊपर खिड़की की तरफ देखा।

 

वहाँ खड़ी उसकी माँ धीरे-धीरे मुस्कुराने लगी थीं।

 

उनकी आँखें अब पूरी तरह काली थीं।

 

और उनके पीछे वही बच्चा खड़ा था।

 

आरव।

 

उसने शीशे पर उंगली से तीन शब्द लिखे—

 

“तीसरी दस्तक बाकी।”

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