रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे।
शहर से लगभग चालीस किलोमीटर दूर स्थित उस छोटे-से कस्बे में सर्दियों की रातें कुछ ज्यादा ही खामोश हुआ करती थीं। सड़कें सुनसान थीं, पेड़ों की शाखाएँ तेज हवा में ऐसे हिल रही थीं, जैसे कोई अंधेरे में खड़ा होकर हाथ हिला रहा हो।
सौरभ अपनी बाइक से घर लौट रहा था।
उस दिन ऑफिस में काम कुछ ज्यादा ही हो गया था। ऊपर से बाइक रास्ते में दो बार बंद हो चुकी थी। जब वह कस्बे के आखिरी मोड़ पर पहुँचा, तभी उसकी नजर सड़क के किनारे खड़े एक पुराने मकान पर पड़ी।
मकान कई सालों से बंद लग रहा था।
दीवारों पर काई जमी थी। खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाजे पर जंग लगा बड़ा-सा ताला लटक रहा था।
लेकिन उस रात वहाँ कुछ अलग था।
ऊपर वाली मंजिल की एक खिड़की में हल्की पीली रोशनी जल रही थी।
सौरभ ने बाइक धीमी कर दी।
“इस घर में तो कोई रहता ही नहीं…” उसने खुद से कहा।
उसके पिता अक्सर इस मकान का जिक्र किया करते थे।
कहा करते थे कि लगभग पंद्रह साल पहले यहाँ रहने वाला पूरा परिवार एक ही रात गायब हो गया था। पुलिस ने बहुत खोजबीन की, लेकिन किसी का पता नहीं चला। उसके बाद से मकान बंद पड़ा था।
सौरभ ने कई बार उस घर को देखा था, लेकिन कभी वहाँ रोशनी नहीं देखी थी।
उसने बाइक रोकी।
कुछ पल तक वह खिड़की को देखता रहा।
फिर अचानक—
ठक… ठक… ठक…
आवाज आई।
सौरभ का दिल एक पल के लिए रुक-सा गया।
आवाज मकान के अंदर से नहीं, बल्कि उसके पीछे से आई थी।
वह तुरंत पलटा।
सड़क खाली थी।
हवा में सूखे पत्ते उड़ रहे थे।
“कौन है?”
कोई जवाब नहीं आया।
सौरभ ने चारों तरफ देखा और फिर बाइक स्टार्ट कर दी।
लेकिन जैसे ही उसने बाइक आगे बढ़ाई, पीछे से फिर आवाज आई—
ठक… ठक… ठक…
इस बार आवाज साफ थी।
जैसे कोई लकड़ी के दरवाजे पर दस्तक दे रहा हो।
सौरभ ने पीछे मुड़कर देखा।
पुराने मकान का मुख्य दरवाजा अब खुला हुआ था।
उसका शरीर ठंडा पड़ गया।
“ये… कैसे?”
कुछ सेकंड पहले वहाँ ताला लगा था।
वह वापस जाने वाला था, लेकिन तभी उसकी नजर दरवाजे के अंदर पड़े अंधेरे पर गई।
अंधेरे के बीच एक सफेद आकृति खड़ी थी।
सौरभ ने आँखें मलीं।
अगले ही पल वह आकृति गायब थी।
उसने बाइक तेज कर दी।
वह बिना पीछे देखे घर पहुँचा।
घर के बाहर बाइक खड़ी करके जैसे ही वह अंदर जाने लगा, उसकी माँ ने दरवाजा खोल दिया।
“इतनी देर क्यों हो गई?”
“ऑफिस में काम था।”
माँ ने उसे गौर से देखा।
“तुम ठीक तो हो?”
सौरभ ने उस पुराने मकान के बारे में बताना चाहा, लेकिन फिर चुप रह गया।
“हाँ… बस थक गया हूँ।”
रात को करीब दो बजे उसकी नींद खुली।
कमरे में अजीब-सी ठंड थी।
खिड़की बंद थी, फिर भी पर्दे हवा में हिल रहे थे।
सौरभ ने मोबाइल उठाया।
स्क्रीन पर समय था—
2:13 AM
तभी उसे आवाज सुनाई दी।
ठक… ठक… ठक…
उसने तुरंत सिर उठाया।
आवाज उसके कमरे के दरवाजे से आ रही थी।
सौरभ कुछ देर तक बिस्तर पर बैठा रहा।
उसका गला सूख गया था।
फिर आवाज दोबारा आई।
ठक… ठक… ठक…
“कौन है?”
बाहर कोई नहीं बोला।
सौरभ धीरे-धीरे बिस्तर से उठा।
दरवाजे के पास जाकर उसने नीचे की दरार से बाहर देखने की कोशिश की।
वहाँ कोई पैर नहीं थे।
उसने राहत की साँस ली।
तभी दरवाजे पर एक धीमी आवाज आई—
“सौरभ…”
वह पीछे हट गया।
आवाज किसी बूढ़ी औरत की थी।
“सौरभ… दरवाजा खोलो…”
उसने काँपते हुए पूछा—
“क… कौन?”
कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।
फिर आवाज आई—
“मैं… बहुत देर से इंतजार कर रही हूँ।”
सौरभ ने तुरंत पीछे हटकर कमरे की लाइट जला दी।
उसी क्षण दस्तक बंद हो गई।
उसने पूरी रात दरवाजा नहीं खोला।
सुबह जब उसने दरवाजा खोला, तो बाहर कोई नहीं था।
लेकिन फर्श पर कुछ पड़ा था।
एक पुरानी, काली-सफेद तस्वीर।
सौरभ ने तस्वीर उठाई।
तस्वीर में एक परिवार खड़ा था।
एक आदमी।
एक औरत।
और उनके बीच लगभग दस साल का एक लड़का।
सौरभ ने तस्वीर को पलटा।
पीछे लाल स्याही से एक तारीख लिखी थी—
13 दिसंबर 2011
और उसके नीचे सिर्फ चार शब्द थे—
“पहली दस्तक हो चुकी है।”
सौरभ के हाथ काँपने लगे।
उसे अचानक याद आया कि आज तारीख क्या थी।
13 दिसंबर 2026।
ठीक पंद्रह साल बाद।
वह तस्वीर लेकर अपनी माँ के पास गया।
“माँ, ये लोग कौन हैं?”
माँ ने तस्वीर देखते ही उसे हाथ से गिरा दिया।
उनका चेहरा सफेद पड़ गया।
“ये तस्वीर तुम्हें कहाँ मिली?”
“मेरे कमरे के बाहर।”
माँ कुछ बोल नहीं पाईं।
सौरभ ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“माँ, सच बताओ।”
कुछ देर बाद माँ ने धीमी आवाज में कहा—
“ये उसी पुराने मकान का परिवार है।”
सौरभ की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।
“लेकिन ये लोग गायब हुए थे, ना?”
माँ ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“तो फिर ये तस्वीर मेरे कमरे के बाहर कैसे आई?”
माँ की आँखों में डर था।
उन्होंने धीरे से कहा—
“क्योंकि शायद… वो लोग गायब नहीं हुए थे।”
“फिर?”
माँ ने कमरे का दरवाजा बंद किया।
“तुम्हारे पिता ने मरने से पहले मुझसे एक बात कही थी।”
“क्या?”
माँ की आवाज काँप रही थी।
“उन्होंने कहा था कि उस मकान में रहने वाला परिवार मौत का शिकार नहीं हुआ था… उन्होंने खुद मौत को घर में बुलाया था।”
सौरभ कुछ समझ नहीं पाया।
“लेकिन क्यों?”
माँ ने उसकी तरफ देखा।
“क्योंकि उस घर में एक दरवाजा था… जो किसी दूसरी जगह नहीं, बल्कि मौत तक खुलता था।”
अचानक कमरे के बाहर से आवाज आई—
ठक… ठक… ठक…
दोनों जम गए।
माँ ने सौरभ का हाथ कसकर पकड़ लिया।
फिर बाहर से वही बूढ़ी आवाज आई—
“सौरभ…”
इस बार आवाज बिल्कुल पास थी।
“कल रात तुमने मुझे दरवाजा नहीं खोला था…”
कुछ सेकंड की खामोशी।
फिर—
ठक… ठक… ठक…
“आज… मैं खुद अंदर आऊँगी।”
कमरे की लाइट अचानक बुझ गई।
और अंधेरे में सौरभ को किसी के धीरे-धीरे हँसने की आवाज सुनाई दी।
“अब दूसरी दस्तक बाकी है…”

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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