🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

😱SATVI RAAT KA SHRAP😱 (PART-1)

पढ़ने का समय : 5 मिनट

 

 

 

 

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव भैरवपुर में शाम के बाद लोग अपने घरों के दरवाज़े जल्दी बंद कर लेते थे। गाँव में बिजली की समस्या तो थी ही, लेकिन लोग अंधेरे से ज्यादा एक आवाज़ से डरते थे।

 

वह आवाज़ थी—

 

ठक… ठक… ठक…

 

गाँव के बुज़ुर्ग कहते थे कि अगर आधी रात के बाद किसी के दरवाज़े पर तीन बार दस्तक हो और बाहर से कोई उसका नाम पुकारे, तो दरवाज़ा कभी नहीं खोलना चाहिए।

 

क्योंकि वह इंसान नहीं होता।

 

उसे गाँव वाले कहते थे—

 

“मौत की दस्तक।”

 

कहानी के मुताबिक लगभग बीस साल पहले गाँव में एक बूढ़ा डाकिया रहता था, जिसका नाम हरिराम था। एक बरसाती रात वह एक चिट्ठी लेकर गाँव के आखिरी घर तक गया था। रात के करीब बारह बजे उसने उस घर का दरवाज़ा खटखटाया।

 

अंदर से एक आदमी ने पूछा—

 

“कौन?”

 

हरिराम ने कहा—

 

“डाकिया हूँ।”

 

दरवाज़ा खुला।

 

अगली सुबह उस घर में रहने वाले सभी लोग मृत मिले।

 

और हरिराम का शरीर गाँव से लगभग दो किलोमीटर दूर पुराने कुएँ के पास मिला।

 

उस दिन के बाद से हर कुछ वर्षों में आधी रात को किसी घर के दरवाज़े पर दस्तक होती।

 

और जिस घर के दरवाज़े पर वह दस्तक होती…

 

उस घर में अगले दिन मौत हो जाती।

 

गाँव के लोग इसे अंधविश्वास मानते थे, लेकिन किसी ने भी कभी उस दस्तक का सामना करने की हिम्मत नहीं की।

 

इसी गाँव में कई साल बाद विवान अपने पिता की मौत के बाद वापस आया।

 

विवान शहर में रहता था और भूत-प्रेत जैसी बातों पर बिल्कुल विश्वास नहीं करता था।

 

उसके पिता का पुराना घर गाँव के बिल्कुल आखिरी छोर पर था।

 

विवान ने घर की सफाई शुरू की।

 

शाम को उसका बचपन का दोस्त समीर उससे मिलने आया।

 

समीर ने घर में कदम रखते ही पूछा,

 

“तू यहाँ रात में अकेला रहेगा?”

 

विवान हँस पड़ा।

 

“क्यों? भूत आ जाएगा?”

 

समीर ने मज़ाक नहीं किया।

 

उसने धीरे से कहा,

 

“तेरे पिताजी की मौत से पहले भी तीन रात तक इस घर के बाहर दस्तक हुई थी।”

 

विवान कुछ पल चुप रहा।

 

“तुम्हें कैसे पता?”

 

“उन्होंने मुझे बताया था।”

 

विवान ने बात को टाल दिया।

 

रात करीब दस बजे समीर चला गया।

 

विवान ने खाना खाया और अपने पिता के कमरे में पुरानी चीज़ें देखने लगा।

 

अलमारी के नीचे उसे एक लोहे का छोटा संदूक मिला।

 

उसमें पुराने कागज़, कुछ तस्वीरें और एक डायरी थी।

 

डायरी उसके पिता की थी।

 

पहले पन्ने पर लिखा था—

 

“अगर कभी आधी रात को मेरे दरवाज़े पर दस्तक हो… दरवाज़ा मत खोलना।”

 

विवान ने भौंहें सिकोड़ लीं।

 

अगले पन्ने पर सिर्फ़ तीन शब्द लिखे थे—

 

“वह वापस आ गई।”

 

विवान को अजीब लगा।

 

वह डायरी लेकर बिस्तर पर बैठ गया।

 

रात के करीब 11:45 बजे अचानक घर की बिजली चली गई।

 

पूरा घर अंधेरे में डूब गया।

 

विवान ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

 

तभी बाहर कुत्ते जोर-जोर से भौंकने लगे।

 

फिर अचानक सभी कुत्ते एक साथ चुप हो गए।

 

घर में ऐसा सन्नाटा छा गया कि विवान को अपनी साँसों की आवाज़ तक सुनाई देने लगी।

 

घड़ी ने बारह बजाए।

 

टन… टन… टन…

 

और फिर—

 

ठक…

 

विवान जम गया।

 

कुछ सेकंड बाद—

 

ठक… ठक…

 

तीन दस्तक।

 

उसने पिता की डायरी की तरफ देखा।

 

उसके हाथ काँपने लगे।

 

फिर बाहर से आवाज़ आई—

 

“विवान…”

 

उसके शरीर में सिहरन दौड़ गई।

 

आवाज़ बिल्कुल उसके पिता की थी।

 

विवान धीरे-धीरे मुख्य दरवाज़े के पास गया।

 

बाहर से फिर आवाज़ आई—

 

“बेटा… दरवाज़ा खोल।”

 

विवान की आँखों में आँसू आ गए।

 

उसके पिता की मौत को केवल कुछ दिन हुए थे।

 

वह दरवाज़ा खोलने ही वाला था कि डायरी का एक पन्ना हवा से पलट गया।

 

उस पर लिखा था—

 

“वह तुम्हारी पहचान और आवाज़ दोनों चुरा सकती है। लेकिन वह घर के अंदर तभी आ सकती है जब तुम उसे बुलाओ।”

 

विवान ने तुरंत हाथ पीछे खींच लिया।

 

बाहर आवाज़ फिर आई।

 

इस बार आवाज़ गुस्से में थी।

 

“दरवाज़ा खोल!”

 

विवान पीछे हट गया।

 

कुछ देर तक दस्तक होती रही।

 

फिर अचानक सब शांत हो गया।

 

सुबह होने पर विवान ने दरवाज़ा खोला।

 

बाहर कोई नहीं था।

 

लेकिन दरवाज़े के सामने मिट्टी में गीले पैरों के निशान थे।

 

वे निशान दरवाज़े तक आए थे।

 

और फिर वापस नहीं गए थे।

 

विवान ने नीचे देखा।

 

दरवाज़े के ठीक सामने एक पुराना पीला लिफाफा पड़ा था।

 

उस पर उसके पिता का नाम लिखा था।

 

विवान ने लिफाफा खोला।

 

अंदर एक छोटी-सी चिट्ठी थी।

 

उसमें लिखा था—

 

“विवान, अगर तू यह चिट्ठी पढ़ रहा है, तो पहली दस्तक हो चुकी है। अब तीन रातें बाकी हैं।”

 

नीचे सिर्फ़ एक चेतावनी थी—

 

“दूसरी दस्तक पर वह घर के अंदर होगी।”

 

विवान के हाथ से चिट्ठी गिर गई।

 

तभी घर के अंदर से आवाज़ आई—

 

ठक… ठक… ठक…

 

विवान धीरे-धीरे पीछे मुड़ा।

 

मुख्य दरवाज़ा उसके सामने था।

 

लेकिन दस्तक…

 

घर के अंदर वाले कमरे के दरवाज़े से आ रही थी।

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *