तीसरी रात के बाद सब कुछ बदल गया।
आरव और कबीर ने गाँव छोड़ने की कोशिश की, लेकिन हर बार उन्हें रास्ता वापस उसी हवेली तक ले आता।
चौथी रात आरव ने आईने में सावित्री को देखा।
वह उसके पीछे खड़ी थी।
आरव ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।
वहाँ कोई नहीं था।
लेकिन आईने में सावित्री अब भी खड़ी थी।
उसने अपने होंठों पर उंगली रखी और फुसफुसाई—
“चुप रहो…”
पाँचवीं रात सावित्री ने कबीर की माँ की आवाज़ में बात की।
“कबीर… बेटा, मुझे बचा लो।”
कबीर रो पड़ा।
वह आवाज़ के पीछे जाने लगा।
आरव ने उसे पकड़ लिया।
“ये तेरी माँ नहीं है!”
अचानक सामने खड़ी परछाई ने अपना चेहरा बदला।
वह सावित्री नहीं थी।
उसका चेहरा किसी इंसान जैसा ही नहीं था।
दोनों आँखें काली थीं और मुँह असामान्य रूप से चौड़ा।
फिर वह चीखी।
पूरी हवेली हिल गई।
छठी रात सबसे भयानक थी।
रात करीब दो बजे कबीर अचानक गायब हो गया।
आरव उसे ढूँढते हुए नीचे तहखाने में पहुँचा।
वहाँ एक पुराना कुआँ था।
कुएँ के चारों तरफ वही सात निशान बने थे जो नाना की डायरी में बनाए गए थे।
कबीर कुएँ के सामने खड़ा था।
उसकी आँखें बंद थीं।
आरव ने उसे आवाज़ दी।
“कबीर!”
कबीर ने आँखें खोलीं।
लेकिन उसकी आवाज़ बदल चुकी थी।
“सातवीं रात पूरी होने वाली है।”
आरव पीछे हट गया।
“तुम कौन हो?”
कबीर मुस्कुराया।
“जिसे तुम्हारे नाना ने चालीस साल तक बंद रखा।”
आरव को समझ आ गया।
असली आत्मा सावित्री नहीं थी।
वह शक्ति अब कबीर के शरीर में प्रवेश कर चुकी थी।
कबीर ने कहा,
“तुम्हारे नाना ने मुझे रोकने के लिए सातवीं रात का नियम बनाया था। लेकिन वह मर गया। अब कोई मुझे नहीं रोक सकता।”
आरव ने नाना की डायरी निकाली।
उसके आख़िरी पन्ने पर एक मंत्र लिखा था।
नीचे लिखा था—
“सावित्री को मुक्त करो, तभी श्राप समाप्त होगा।”
आरव ने समझ लिया कि उन्हें उस बुरी शक्ति से लड़ना नहीं था।
उन्हें सावित्री की आत्मा को मुक्त करना था।
उसने चाँदी की अंगूठी कुएँ में फेंक दी।
अचानक कुएँ से भयानक चीख निकली।
कबीर ज़मीन पर गिर पड़ा।
उसके शरीर से काले धुएँ जैसा कुछ निकलने लगा।
धुआँ धीरे-धीरे एक औरत का आकार लेने लगा।
सफेद साड़ी।
लंबे बाल।
सावित्री।
लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर था।
उसने आरव से कहा,
“मुझे माफ़ कर दो…”
आरव ने पूछा,
“तुमने मेरे नाना को क्यों नहीं बताया?”
सावित्री ने कहा,
“मैंने कोशिश की थी। लेकिन वह भी डर गया था। उसने मुझे इस हवेली में बाँध दिया था।”
“कैसे?”
“सातवीं रात के श्राप को खत्म करने के लिए किसी एक इंसान को अपनी जान देनी पड़ती थी।”
आरव चौंक गया।
“तो नाना ने…?”
सावित्री ने सिर हिलाया।
“तुम्हारे नाना ने अपनी जान देने की कोशिश की थी। लेकिन वह शक्ति उनसे भी अधिक ताकतवर थी।”
अचानक काले धुएँ ने फिर से आकार लिया।
इस बार वह बहुत बड़ा था।
उसकी आवाज़ पूरी हवेली में गूँज उठी—
“सातवीं रात मेरी है!”
दीवारों पर दरारें पड़ने लगीं।
कुएँ से काला धुआँ बाहर आने लगा।
सावित्री ने आरव से कहा,
“अगर इसे रोकना है तो इसे उसी जगह वापस भेजना होगा जहाँ से यह आया था।”
आरव ने कुएँ की तरफ देखा।
“कैसे?”
सावित्री ने कहा,
“सातवाँ नाम बोलो।”
आरव ने नाना की डायरी खोली।
उसमें छह नाम लिखे थे।
लेकिन सातवाँ नाम खाली था।
तभी उसे समझ आया।
सातवाँ नाम किसी मरे हुए इंसान का नहीं था।
सातवाँ नाम उसे खुद लिखना था।
आरव ने काँपते हाथ से अपना नाम लिखा।
“आरव।”
अचानक हवेली में भयंकर तूफ़ान उठ गया।
काले धुएँ ने उसे पकड़ लिया।
कबीर चिल्लाया,
“आरव! भाग!”
लेकिन आरव ने कुएँ की तरफ कदम बढ़ा दिए।
वह चिल्लाया—
“जिस श्राप की शुरुआत मेरे परिवार से हुई थी, उसका अंत भी मेरे नाम से होगा!”
और उसने डायरी कुएँ में फेंक दी।
तेज़ सफेद रोशनी हुई।
एक भयानक चीख के साथ काला धुआँ कुएँ में खिंचने लगा।
सावित्री की आत्मा भी धीरे-धीरे रोशनी में बदलने लगी।
उसने आरव की तरफ देखा।
“धन्यवाद…”
फिर वह गायब हो गई।
सुबह गाँव वालों ने देखा कि काली हवेली का आधा हिस्सा गिर चुका था।
कबीर बेहोश पड़ा था।
लेकिन आरव कहीं नहीं था।
कुएँ के पास सिर्फ़ उसकी घड़ी मिली।
गाँव वालों ने मान लिया कि आरव मर चुका है।
सात दिन बाद हवेली पूरी तरह तोड़ दी गई।
कुएँ को पत्थरों से बंद कर दिया गया।
लोगों ने सोचा कि श्राप खत्म हो गया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
ठीक एक साल बाद, शहर में रहने वाली आरव की माँ को एक लिफाफा मिला।
लिफाफे पर कोई पता नहीं था।
अंदर सिर्फ़ एक तस्वीर थी।
तस्वीर में आरव खड़ा था।
उसके पीछे वही काली हवेली दिखाई दे रही थी।
लेकिन हवेली तो एक साल पहले टूट चुकी थी।
तस्वीर के पीछे सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी—
“सातवीं रात खत्म नहीं हुई…”
उस रात आरव की माँ ने अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया।
रात के ठीक 12 बजकर 7 मिनट पर—
ठक… ठक… ठक…
दरवाज़े पर दस्तक हुई।
उन्होंने काँपते हुए पूछा,
“कौन?”
बाहर से एक जानी-पहचानी आवाज़ आई—
“माँ… दरवाज़ा खोलो।”
वह आरव की आवाज़ थी।
लेकिन उसी समय घर के अंदर रखी पुरानी घड़ी बंद हो गई।
उसकी सुइयाँ 12:07 पर रुक गईं।
और आईने में आरव की माँ के पीछे एक औरत खड़ी दिखाई दी।
सफेद साड़ी।
लंबे काले बाल।
और हाथ में वही पुरानी डायरी।
उसने धीरे से डायरी खोली।
आख़िरी पन्ने पर अब एक नया वाक्य लिखा था—
“अगली सातवीं रात… तुम्हारी होगी।”
और आईने के अंदर से किसी ने धीरे से मुस्कुराकर कहा—
“श्राप कभी खत्म नहीं होता… वह सिर्फ़ अपना घर बदलता है।”
END

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
प्रातिक्रिया दे