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SATVI RAAT KA SHRAP (LAST PART-3)

पढ़ने का समय : 7 मिनट

 

 

सौरभ की नजर खिड़की पर जमी हुई थी।

 

उसकी माँ वहाँ खड़ी थीं।

 

लेकिन वह उसकी माँ नहीं थीं।

 

काली आँखें।

 

सफेद चेहरा।

 

और होंठों पर ऐसी मुस्कान, जिसे देखकर सौरभ के शरीर का हर रोम काँप उठा।

 

उसके पीछे उसके पिता की परछाईं खड़ी थी।

 

“सौरभ,” आवाज आई, “तुम्हारे पास बहुत कम समय है।”

 

“पापा… आप?”

 

“मैं मर चुका हूँ।”

 

सौरभ की आँखों से आँसू निकल आए।

 

“फिर आप यहाँ कैसे?”

 

“क्योंकि मौत के बाद भी कुछ वादे खत्म नहीं होते।”

 

“मुझे सब सच बताइए।”

 

परछाईं कुछ देर शांत रही।

 

फिर उसने कहा—

 

“पंद्रह साल पहले तुम्हारे पिता, आरव के पिता और कुछ दूसरे लोगों ने इस मकान में एक पुरानी रस्म के बारे में पढ़ा था। उनका मानना था कि इस रस्म से इंसान को मृत्यु से बचाया जा सकता है।”

 

“उन्होंने क्या किया?”

 

“उन्होंने मौत को बुलाने की कोशिश की।”

 

सौरभ ने डरते हुए पूछा—

 

“और?”

 

“मौत आई… लेकिन वह किसी एक व्यक्ति को लेने नहीं आई। उसने कहा कि जिस परिवार ने उसे बुलाया है, उसकी एक पीढ़ी उसे देनी होगी।”

 

सौरभ की साँस अटक गई।

 

“फिर आपने क्या किया?”

 

“हमने सौदा करने की कोशिश की।”

 

“किसके साथ?”

 

परछाईं ने सामने खड़ी बूढ़ी औरत की ओर देखा।

 

“उससे।”

 

सौरभ ने औरत की तरफ देखा।

 

वह शांत खड़ी थी।

 

“वह इंसान नहीं है?”

 

“नहीं।”

 

“फिर कौन है?”

 

“मौत की रखवाली करने वाली।”

 

बूढ़ी औरत हँसी।

 

“तुम्हारे पिता ने मुझे धोखा दिया था, सौरभ। उन्होंने तुम्हें शहर भेज दिया और सोचा कि मैं तुम्हें भूल जाऊँगी।”

 

सौरभ ने पूछा—

 

“आपको मुझसे क्या चाहिए?”

 

“तुम्हारा जीवन।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि तुम्हारे पिता ने तुम्हारे बदले अपनी जान दी थी। लेकिन सौदा पूरा नहीं हुआ।”

 

सौरभ के पिता की परछाईं बोली—

 

“मैंने उसे रोकने के लिए खुद को दे दिया था। लेकिन वह जानती थी कि एक दिन तुम वापस आओगे।”

 

“तो मैं क्या करूँ?”

 

परछाईं ने धीरे से कहा—

 

“मौत का दरवाजा बंद करो।”

 

“कैसे?”

 

“तीन दस्तकें पूरी होने से पहले।”

 

सौरभ ने पुराने मकान की तरफ देखा।

 

“लेकिन दो दस्तक तो हो चुकी हैं।”

 

“हाँ।”

 

“और तीसरी?”

 

परछाईं ने सिर झुका लिया।

 

“तीसरी दस्तक तुम खुद दोगे।”

 

सौरभ समझ नहीं पाया।

 

तभी बूढ़ी औरत ने अपनी हथेली खोली।

 

उसमें एक पुरानी चाबी थी।

 

“इसे लो।”

 

सौरभ ने चाबी नहीं ली।

 

“किसकी है?”

 

“उस कमरे की, जिसे तुम्हारे पिता ने कभी नहीं खोला।”

 

सौरभ ने ऊपर देखा।

 

वही कमरा।

 

जिसके दरवाजे पर लिखा था—

 

“इसे कभी मत खोलना।”

 

बूढ़ी औरत ने कहा—

 

“अगर तुमने दरवाजा खोला, तो तुम्हें अपनी माँ मिल जाएगी।”

 

“और अगर नहीं खोला?”

 

“तो तुम्हारी माँ हमेशा के लिए मेरे साथ रहेगी।”

 

सौरभ ने चाबी उठा ली।

 

वह सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।

 

हर कदम के साथ घर की दीवारों से फुसफुसाहट आने लगी।

 

“सौरभ…”

 

“वापस जाओ…”

 

“दरवाजा मत खोलना…”

 

लेकिन वह आगे बढ़ता रहा।

 

ऊपर पहुँचकर उसने दरवाजे में चाबी लगाई।

 

चाबी घूम गई।

 

दरवाजा खुला।

 

अंदर एक छोटा-सा कमरा था।

 

बीच में लकड़ी की कुर्सी पर उसकी माँ बैठी थीं।

 

उनके हाथ बंधे थे।

 

सौरभ दौड़कर उनके पास गया।

 

“माँ!”

 

उन्होंने सिर उठाया।

 

“सौरभ… भाग जाओ।”

 

“मैं आपको लेने आया हूँ।”

 

“मैं तुम्हारी माँ नहीं हूँ।”

 

सौरभ रुक गया।

 

“क्या?”

 

उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

 

“सौरभ, मैं तुम्हारी माँ हूँ… लेकिन मेरे अंदर अब कुछ और भी है।”

 

कमरे की दीवारें काँपने लगीं।

 

पीछे से बूढ़ी औरत की आवाज आई—

 

“अब तीसरी दस्तक का समय है।”

 

दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

 

ठक…

 

सौरभ ने दरवाजे की ओर देखा।

 

ठक…

 

उसकी माँ ने चीखकर कहा—

 

“मत खोलना!”

 

फिर तीसरी आवाज आने वाली थी।

 

सौरभ ने अचानक पिता की डायरी याद की।

 

“जो व्यक्ति तीसरी दस्तक के बाद दरवाजा खोलता है, वह वापस नहीं लौटता।”

 

उसने कमरे में चारों तरफ देखा।

 

दीवार पर वही निशान बना था, जो तस्वीर के पीछे था।

 

एक गोल घेरे के अंदर तीन रेखाएँ।

 

उसे समझ आया।

 

मौत का दरवाजा कोई साधारण दरवाजा नहीं था।

 

वह पूरा कमरा ही दरवाजा था।

 

और उस दरवाजे को बंद करने के लिए किसी को अंदर रहना था।

 

सौरभ ने अपनी माँ की रस्सियाँ खोल दीं।

 

“माँ, आप बाहर जाएँ।”

 

“और तुम?”

 

“मैं इसे खत्म करूँगा।”

 

“नहीं!”

 

सौरभ ने दरवाजा खोला और माँ को बाहर धकेल दिया।

 

बूढ़ी औरत गलियारे में खड़ी थी।

 

वह मुस्कुराई।

 

“बहुत अच्छा।”

 

“अब मेरा क्या होगा?”

 

“तुम्हें मेरे साथ आना होगा।”

 

सौरभ ने दरवाजा बंद कर दिया।

 

अंदर पूरी तरह अंधेरा हो गया।

 

कुछ सेकंड बाद—

 

ठक… ठक… ठक…

 

तीसरी दस्तक पूरी हो चुकी थी।

 

लेकिन सौरभ ने दरवाजा नहीं खोला।

 

वह कमरे के बीच खड़ा होकर पिता की डायरी से वह आखिरी मंत्र पढ़ने लगा, जो आखिरी पन्ने पर लिखा था।

 

हवा तेज हो गई।

 

दीवारों से चीखें आने लगीं।

 

किसी ने उसके कान के पास फुसफुसाया—

 

“तुम अपने पिता जैसे ही हो।”

 

सौरभ ने आँखें बंद कर लीं।

 

“लेकिन मैं उनका सौदा पूरा करने नहीं आया।”

 

अचानक कमरे के बीच एक काला दरवाजा दिखाई दिया।

 

उसके पीछे अनगिनत चेहरे थे।

 

कुछ बूढ़े।

 

कुछ जवान।

 

कुछ बच्चे।

 

और सबसे आगे—

 

आरव।

 

वह सौरभ को देखकर मुस्कुराया।

 

“अब इसे बंद कर दो।”

 

सौरभ ने आगे बढ़कर दरवाजे को धक्का दिया।

 

लेकिन वह बंद नहीं हुआ।

 

तभी उसे पिता की आवाज सुनाई दी—

 

“दरवाजा बाहर से नहीं, अंदर से बंद होता है।”

 

सौरभ समझ गया।

 

उसे उस दरवाजे के दूसरी तरफ जाना था।

 

उसने आखिरी बार अपनी माँ के बारे में सोचा।

 

फिर वह दरवाजे के अंदर चला गया।

 

अगले ही पल—

 

पूरा मकान हिलने लगा।

 

बाहर खड़ी उसकी माँ ने देखा कि पुराना मकान आग के बिना ही जलने लगा।

 

कुछ ही सेकंड में वह धुएँ में बदल गया।

 

सुबह तक वहाँ केवल जली हुई जमीन बची थी।

 

सौरभ नहीं मिला।

 

पुलिस आई।

 

मकान की तलाशी हुई।

 

कुछ नहीं मिला।

 

सिर्फ एक पुरानी काली डायरी मिली।

 

उसके आखिरी पन्ने पर एक नई लाइन लिखी थी—

 

“दरवाजा बंद हो चुका है।”

 

पंद्रह साल बाद तक उस कस्बे में उस मकान का नाम कोई नहीं लेता था।

 

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

 

कई साल बाद, एक रात सौरभ की माँ अपने घर में अकेली बैठी थीं।

 

रात के ठीक 2:13 बजे दरवाजे पर आवाज हुई।

 

ठक… ठक… ठक…

 

वह डर गईं।

 

उन्होंने दरवाजे के पास जाकर पूछा—

 

“कौन?”

 

बाहर से कोई जवाब नहीं आया।

 

फिर आवाज आई—

 

ठक… ठक… ठक…

 

माँ की आँखों में आँसू आ गए।

 

“सौरभ?”

 

कुछ देर खामोशी रही।

 

फिर बाहर से एक धीमी आवाज आई—

 

“माँ… दरवाजा मत खोलना।”

 

माँ पीछे हट गईं।

 

लेकिन तभी दरवाजे के नीचे से एक पुरानी काली डायरी अंदर सरक आई।

 

माँ ने काँपते हाथों से उसे उठाया।

 

डायरी अपने आप खुल गई।

 

आखिरी पन्ने पर लिखा था—

 

“मैंने मौत का दरवाजा बंद कर दिया था।”

 

नीचे एक और वाक्य दिखाई दिया।

 

स्याही अभी गीली थी।

 

“लेकिन माँ… किसी ने अंदर से उसे फिर खोल दिया है।”

 

और उसी क्षण—

 

घर के अंदर, ठीक उनके पीछे…

 

ठक… ठक… ठक…

 

दस्तक हुई।

 

माँ ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।

 

कमरे के बीच एक काला दरवाजा खड़ा था।

 

उस दरवाजे के पीछे सौरभ खड़ा था।

 

लेकिन उसके चेहरे पर इंसानी मुस्कान नहीं थी।

 

उसने धीरे से कहा—

 

“माँ… अब मेरी बारी खत्म हुई।”

 

एक पल की खामोशी।

 

फिर उसने मुस्कुराकर कहा—

 

“अब आपकी बारी है।”

 

 

End

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