रात के करीब बारह बज रहे थे।
सौरभ अपनी बाइक से गाँव की सुनसान सड़क पर चला जा रहा था। शहर से गाँव तक का रास्ता करीब पैंतीस किलोमीटर का था, लेकिन उस रात उसे यह रास्ता पहले से कहीं ज्यादा लंबा लग रहा था।
आसमान पर बादल छाए हुए थे।
चाँद कभी बादलों के पीछे छिप जाता और कभी अचानक निकलकर सड़क को हल्की सफेद रोशनी से भर देता।
सौरभ ने बाइक की रफ्तार थोड़ी बढ़ा दी।
तभी उसकी नजर सड़क के किनारे लगे एक पुराने बरगद के पेड़ पर पड़ी।
पेड़ के नीचे कोई बच्ची खड़ी थी।
सौरभ ने बाइक धीमी कर दी।
बच्ची की उम्र मुश्किल से आठ या नौ साल होगी।
उसने लाल रंग की पुरानी-सी फ्रॉक पहन रखी थी।
उसके बाल बहुत लंबे थे और चेहरा बालों से आधा ढका हुआ था।
सौरभ ने बाइक रोक दी।
“बेटा… इतनी रात को यहाँ अकेली क्या कर रही हो?”
बच्ची ने कोई जवाब नहीं दिया।
सौरभ ने चारों तरफ देखा।
आसपास कोई घर नहीं था।
सिर्फ जंगल, खेत और वह पुराना बरगद का पेड़।
“तुम्हारा घर कहाँ है?”
बच्ची ने धीरे से हाथ उठाया और सड़क के दूसरी तरफ इशारा किया।
“वहाँ।”
सौरभ ने उस दिशा में देखा।
अंधेरे में एक टूटा हुआ मकान दिखाई दे रहा था।
“चलो, मैं छोड़ देता हूँ।”
बच्ची ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“क्यों?”
उसने पहली बार अपना चेहरा ऊपर उठाया।
उसकी आँखें बिल्कुल काली थीं।
सौरभ का दिल जोर से धड़कने लगा।
बच्ची मुस्कुराई।
“आप मुझे घर नहीं छोड़ सकते।”
“क्यों?”
उसने बहुत धीमी आवाज में कहा—
“क्योंकि मेरा घर अब वहाँ नहीं है।”
सौरभ कुछ समझ नहीं पाया।
अचानक तेज हवा चली।
पेड़ की शाखाएँ जोर-जोर से हिलने लगीं।
सौरभ ने एक पल के लिए आँखें बंद कीं।
जब उसने दोबारा देखा…
बच्ची गायब थी।
वहाँ सिर्फ उसकी लाल फ्रॉक का एक छोटा-सा टुकड़ा पड़ा था।
सौरभ ने तुरंत बाइक स्टार्ट की और गाँव की ओर निकल गया।
घर पहुँचने के बाद भी वह घटना उसके दिमाग से नहीं निकली।
उसने माँ को सब कुछ बताया।
माँ का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
“कहाँ देखा उसे?”
“पुराने बरगद के पास।”
माँ कुछ सेकंड चुप रहीं।
फिर बोलीं—
“तुमने उससे बात की?”
“हाँ।”
“उसने तुम्हें छुआ तो नहीं?”
“नहीं।”
माँ ने राहत की साँस ली।
“भगवान का शुक्र है।”
सौरभ ने पूछा—
“आप उसे जानती हैं?”
माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।
“माँ?”
“उस पेड़ के पास दोबारा मत जाना।”
“लेकिन क्यों?”
माँ ने धीमी आवाज में कहा—
“क्योंकि वहाँ एक छोटी लड़की मरी थी।”
सौरभ चौंक गया।
“कैसे?”
“करीब बीस साल पहले। उसका नाम राधिका था।”
“क्या हुआ था उसे?”
माँ ने दरवाजा बंद कर दिया।
“कहते हैं कि वह रात में घर से निकल गई थी। सुबह उसका शव उसी बरगद के पेड़ से लटका मिला।”
सौरभ की रीढ़ में ठंड दौड़ गई।
“लेकिन लोग उसे चुड़ैल क्यों कहते हैं?”
माँ ने उसकी तरफ देखा।
“क्योंकि उसकी मौत के बाद गाँव में बच्चों के गायब होने की घटनाएँ शुरू हो गई थीं।”
सौरभ चुप हो गया।
उसी रात करीब तीन बजे उसे नींद खुली।
कमरे में अजीब ठंड थी।
उसने मोबाइल देखा।
3:03 AM
तभी खिड़की पर हल्की आवाज हुई।
टक… टक…
सौरभ ने ध्यान नहीं दिया।
फिर आवाज आई—
टक… टक… टक…
उसने पर्दा हटाया।
खिड़की के बाहर वही छोटी लड़की खड़ी थी।
सौरभ के मुँह से चीख निकलते-निकलते रह गई।
बच्ची मुस्कुरा रही थी।
उसने शीशे पर अपनी उंगली से कुछ लिखा।
सौरभ ने गौर से देखा।
शीशे पर भाप जम गई थी।
और उस पर लिखा था—
“मुझे ढूँढो।”
सौरभ पीछे हट गया।
अचानक लड़की ने अपना सिर एक तरफ झुका लिया।
उसकी गर्दन असामान्य तरीके से मुड़ गई।
फिर उसने अपना हाथ उठाया और घर के पीछे की तरफ इशारा किया।
सौरभ ने खिड़की से बाहर देखा।
वहाँ अंधेरे में एक पुराना कुआँ था।
उसे अचानक लगा कि कोई उसे बुला रहा है।
“सौरभ…”
वह आवाज लड़की की थी।
“सौरभ… मुझे वहाँ से निकालो…”
सौरभ ने खिड़की बंद कर दी।
सुबह जब उसने खिड़की खोली, वहाँ कोई नहीं था।
लेकिन फर्श पर छोटे-छोटे गीले पैरों के निशान बने हुए थे।
वे निशान खिड़की से शुरू होकर उसके बिस्तर तक जा रहे थे।
और बिस्तर के पास आकर खत्म हो रहे थे।
उस रात सौरभ ने तय कर लिया कि वह इस रहस्य का पता लगाएगा।
शाम होते ही वह गाँव के सबसे बुजुर्ग आदमी, दीनानाथ बाबा, के पास पहुँचा।
बाबा ने राधिका का नाम सुनते ही सौरभ को घूरकर देखा।
“तुमने उसे देख लिया?”
“हाँ।”
बाबा ने सिर झुका लिया।
“फिर अब वह तुम्हें भी देख चुकी है।”
“मुझे क्या करना चाहिए?”
बाबा ने एक पुरानी तस्वीर निकाली।
तस्वीर में एक छोटी लड़की खड़ी थी।
वही लाल फ्रॉक।
वही लंबे बाल।
वही चेहरा।
सौरभ ने तस्वीर हाथ में लेते हुए पूछा—
“इसके साथ हुआ क्या था?”
बाबा ने कहा—
“राधिका चुड़ैल नहीं थी।”
सौरभ ने हैरानी से पूछा—
“तो फिर?”
बाबा की आँखें भर आईं।
“उसे चुड़ैल बनाया गया था।”
“किसने?”
बाबा ने जवाब नहीं दिया।
तभी बाहर किसी बच्चे के हँसने की आवाज आई।
दोनों ने दरवाजे की ओर देखा।
दरवाजे के नीचे से एक लाल फ्रॉक का टुकड़ा अंदर सरक आया।
और उसके साथ एक छोटी-सी आवाज आई—
“बाबा… झूठ मत बोलो।”
दीनानाथ बाबा का चेहरा सफेद पड़ गया।
उन्होंने सौरभ का हाथ पकड़ लिया।
“अब बहुत देर हो चुकी है।”
“क्यों?”
बाबा ने काँपते हुए कहा—
“क्योंकि राधिका को मारने वाला अभी भी जिंदा है।”
उसी क्षण घर के बाहर से जोरदार दस्तक हुई।
ठक… ठक… ठक…
बाबा ने फुसफुसाकर कहा—
“और वह आदमी… तुम्हारे परिवार को जानता है।”

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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