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लेखक: Alka Singh

Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

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  • 😱 जिस पेड़ को काटना मना था 😱(A COMPLETE Horror Story)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    (भाग 1: जंगल की मनाही)

     

    उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से गाँव बरवा के किनारे एक घना जंगल था। गाँव के लोग उस जंगल से लकड़ी, फल और सूखी टहनियाँ लाकर अपना गुजारा करते थे। लेकिन जंगल के बीचों-बीच एक ऐसा पेड़ था, जिसके पास जाने से भी लोग डरते थे।

     

    वह पेड़ बाकी पेड़ों से बिल्कुल अलग था।

     

    उसका तना इतना मोटा था कि उसे चार आदमी मिलकर भी घेर नहीं सकते थे। उसकी शाखाएँ ऊपर जाकर पूरे आसमान को ढक लेती थीं। दिन में भी उसके नीचे अजीब-सा अँधेरा रहता था। पेड़ की छाल काली थी और उस पर लाल रंग की नसों जैसी धारियाँ दिखाई देती थीं।

     

    गाँव के बुजुर्ग उसे “काला बरगद” कहते थे।

     

    कहा जाता था कि लगभग पचास साल पहले एक लकड़हारा उस पेड़ को काटने गया था। वह वापस तो आया, लेकिन उसके बाद उसने कभी किसी से बात नहीं की। कुछ दिनों बाद उसने अपना घर छोड़ दिया और जंगल में गायब हो गया।

     

    तब से गाँव में एक नियम था—

     

    “काले बरगद को कोई हाथ नहीं लगाएगा।”

     

    लेकिन गरीबी इंसान से कई बार वह काम करवा देती है, जिससे वह डरता है।

     

    गाँव में रहने वाला रघु एक गरीब लकड़हारा था। उसकी पत्नी और दो छोटे बच्चे थे। कई दिनों से उसे जंगल में सूखी लकड़ी कम मिल रही थी। घर में अनाज खत्म होने वाला था और उसकी पत्नी सीता बार-बार बच्चों की तरफ देखकर चिंतित हो जाती थी।

     

    एक शाम सीता ने धीरे से कहा,

    “रघु, कल बच्चों के लिए कुछ आटा ले आना। घर में बस आज रात का खाना बचा है।”

     

    रघु ने चुपचाप सिर हिला दिया।

     

    अगली सुबह वह अपनी पुरानी कुल्हाड़ी लेकर जंगल चला गया।

     

    काफी देर तक घूमने के बाद उसे एक भी अच्छी लकड़ी नहीं मिली। अचानक उसकी नजर काले बरगद पर पड़ी।

     

    वह कुछ देर तक उसे देखता रहा।

     

    उसके मन में विचार आया—

    “अगर इसकी एक बड़ी शाखा काट लूँ तो कई दिनों की लकड़ी मिल जाएगी।”

     

    उसे गाँव की मनाही याद थी।

     

    फिर बच्चों के भूखे चेहरे उसकी आँखों के सामने आ गए।

     

    रघु ने खुद से कहा,

    “मैं पूरा पेड़ थोड़े ही काट रहा हूँ। बस एक शाखा।”

     

    वह धीरे-धीरे पेड़ के पास पहुँचा।

     

    जैसे ही उसने पहला कदम उसकी छाया में रखा, जंगल की सारी आवाजें बंद हो गईं।

     

    न पक्षियों की आवाज।

     

    न हवा की सरसराहट।

     

    न पत्तों की आवाज।

     

    पूरा जंगल जैसे अचानक मर गया था।

     

    रघु के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    उसने ऊपर देखा।

     

    काले बरगद की एक मोटी शाखा उसके ठीक ऊपर थी।

     

    उसने कुल्हाड़ी उठाई।

     

    ठक!

     

    पहला वार हुआ।

     

    पेड़ से कोई आवाज नहीं आई।

     

    दूसरा वार—

     

    ठक!

     

    तीसरा वार—

     

    ठाऽऽक!

     

    अचानक पेड़ के अंदर से ऐसी आवाज आई जैसे किसी ने बहुत दूर से कराहते हुए कहा हो—

     

    “मत काटो…”

     

    रघु के हाथ से कुल्हाड़ी छूटते-छूटते बची।

     

    वह पीछे हट गया।

     

    उसने चारों तरफ देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    “शायद मेरा भ्रम है,” उसने खुद को समझाया।

     

    उसने कुल्हाड़ी फिर उठाई।

     

    तभी उसके पीछे सूखे पत्तों पर किसी के चलने की आवाज आई।

     

    चर्र… चर्र… चर्र…

     

    रघु ने पीछे देखा।

     

    कुछ नहीं।

     

    आवाज बंद।

     

    वह फिर पेड़ की तरफ मुड़ा।

     

    अब उसकी शाखा पर कुछ लाल दिखाई दे रहा था।

     

    पहले रघु को लगा कि वह पेड़ का रस है।

     

    लेकिन जब वह पास गया तो उसकी साँस अटक गई।

     

    वह लाल तरल खून जैसा था।

     

    और वह तने से धीरे-धीरे नीचे बह रहा था।

     

    रघु डर गया।

     

    उसने कुल्हाड़ी जमीन पर फेंकी और भागने लगा।

     

    लेकिन कुछ दूर जाकर उसे अपने पीछे वही आवाज सुनाई दी—

     

    “कुल्हाड़ी… छोड़कर कहाँ जा रहे हो?”

     

    रघु के पैरों की रफ्तार बढ़ गई।

     

    वह पीछे देखने की हिम्मत नहीं कर पाया।

     

    जंगल से बाहर निकलते ही उसे लगा कि अब वह सुरक्षित है।

     

    लेकिन घर पहुँचकर उसने देखा कि उसकी कुल्हाड़ी उसके हाथ में थी।

     

    वह घबरा गया।

     

    उसे याद था कि उसने कुल्हाड़ी पेड़ के पास ही छोड़ दी थी।

     

    उसने कुल्हाड़ी जमीन पर फेंक दी।

     

    रात को जब पूरा परिवार सो गया, रघु की आँख अचानक खुली।

     

    कमरे में अँधेरा था।

     

    उसे लगा जैसे कोई खिड़की के बाहर खड़ा है।

     

    उसने ध्यान से सुना।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    वही आवाज।

     

    जैसे कोई कुल्हाड़ी से पेड़ काट रहा हो।

     

    रघु ने खिड़की खोली।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    लेकिन मिट्टी पर गीले पैरों के निशान बने हुए थे।

     

    वे निशान दरवाजे से शुरू होकर सीधे उसके घर के अंदर जा रहे थे।

     

    रघु का गला सूख गया।

     

    उसने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।

     

    कमरे के कोने में उसकी कुल्हाड़ी पड़ी थी।

     

    उसकी धार पर ताजा लाल खून लगा था।

     

    और तभी अँधेरे में एक धीमी फुसफुसाहट सुनाई दी—

     

    “एक वार तुमने किया था… अब एक वार मेरी बारी है…”

     

    रघु चीखना चाहता था।

     

    लेकिन उसकी आवाज गले में ही अटक गई।

     

    उस रात के बाद बरवा गाँव में कुछ ऐसा होने वाला था, जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।

     

    क्योंकि रघु ने सिर्फ एक पेड़ को नहीं छेड़ा था।

     

    उसने जंगल के अंदर सोई हुई किसी चीज़ को जगा दिया था।

  • परछाई (भाग 3 — आख़िरी परछाई)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    कुएँ के सामने खड़ा विवेक काँप रहा था।

     

    उसके सामने सफेद चेहरे वाली औरत खड़ी थी।

     

    उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    उसके बाल हवा में नहीं, बल्कि पानी के अंदर की तरह धीरे-धीरे तैर रहे थे।

     

    विवेक ने पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    औरत ने जवाब दिया—

     

    “मेरा कोई नाम नहीं।”

     

    “फिर लोग तुम्हें क्या कहते हैं?”

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “परछाई।”

     

    कुएँ के अंदर से अचानक कई आवाज़ें आने लगीं।

     

    किसी बच्चे की रोने की आवाज़।

     

    किसी बूढ़े के कराहने की आवाज़।

     

    किसी औरत की चीख।

     

    विवेक पीछे हट गया।

     

    औरत ने कहा—

     

    “तीस साल पहले तुम्हारे दादा और गाँव के कुछ लोगों ने मुझे बुलाया था।”

     

    “क्यों?”

     

    “उन्हें लगा कि अगर वे अपनी परछाइयों को अलग कर लें, तो वे मौत से बच सकते हैं।”

     

    “फिर?”

     

    “उन्होंने गलती की।”

     

    औरत की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “परछाई शरीर से अलग होने के बाद आज़ाद हो सकती है। लेकिन उसे जीवित रहने के लिए किसी इंसान की आत्मा चाहिए।”

     

    विवेक को समझ आ गया।

     

    “इसलिए तुम लोगों की परछाइयाँ चुराती हो।”

     

    “हाँ।”

     

    तभी पीछे से शंकर चाचा की आवाज़ आई—

     

    “विवेक!”

     

    वह मुड़ा।

     

    शंकर चाचा हाथ में एक पुराना दीपक लिए खड़े थे।

     

    उनके साथ विवेक की दादा की परछाई भी थी।

     

    वह परछाई धीरे-धीरे आगे बढ़ी।

     

    सफेद चेहरे वाली औरत ने उसे देखते ही गुस्से में कहा—

     

    “तुम अब भी जीवित हो?”

     

    परछाई ने जवाब दिया—

     

    “शरीर नहीं… लेकिन वादा अभी बाकी है।”

     

    विवेक ने पूछा—

     

    “कौन सा वादा?”

     

    शंकर चाचा ने कहा—

     

    “तुम्हारे दादा ने मरने से पहले अपनी परछाई को आदेश दिया था कि जब तक इस शक्ति को खत्म न कर दे, वह आज़ाद नहीं होगी।”

     

    अचानक काली हवा चलने लगी।

     

    पेड़ों की शाखाएँ टूटने लगीं।

     

    कुएँ के अंदर से काली परछाइयाँ बाहर निकलने लगीं।

     

    एक।

     

    दो।

     

    दस।

     

    फिर दर्जनों।

     

    हर परछाई किसी इंसान का रूप ले रही थी।

     

    विवेक ने डरकर पूछा—

     

    “ये कौन हैं?”

     

    शंकर चाचा ने कहा—

     

    “जिनकी परछाइयाँ उसने चुराई थीं।”

     

    काली परछाइयाँ धीरे-धीरे गाँव की तरफ बढ़ने लगीं।

     

    विवेक ने पूछा—

     

    “इन्हें कैसे रोकेंगे?”

     

    शंकर चाचा ने दीपक उसकी तरफ बढ़ाया।

     

    “यह दीपक तुम्हारी दादी ने बनाया था।”

     

    “इससे क्या होगा?”

     

    “जिस इंसान की परछाई उसके शरीर से अलग हो चुकी है, उसके सामने यह दीपक जलाओ। अगर वह परछाई सच में उसकी है, तो वापस शरीर में चली जाएगी।”

     

    विवेक ने दीपक लिया।

     

    सबसे पहली परछाई उसके सामने आई।

     

    उसने दीपक जलाया।

     

    परछाई काँपने लगी।

     

    फिर वह जमीन पर गिरकर धीरे-धीरे गायब हो गई।

     

    अगले ही पल गाँव के एक घर से किसी आदमी के जागने की आवाज़ आई।

     

    शंकर चाचा ने कहा—

     

    “एक वापस आ गई।”

     

    विवेक ने दीपक लेकर दूसरी परछाई की तरफ बढ़ा।

     

    एक-एक करके परछाइयाँ अपने असली शरीरों में लौटने लगीं।

     

    लेकिन सफेद चेहरे वाली औरत अब भी कुएँ के पास खड़ी थी।

     

    उसने हाथ उठाया।

     

    अचानक दीपक बुझ गया।

     

    “बस!”

     

    उसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि पूरा गाँव काँप गया।

     

    “तुम मेरी बनाई दुनिया को खत्म नहीं कर सकते।”

     

    वह अचानक हवा में उठी।

     

    उसका शरीर फैलने लगा।

     

    उसके बाल पूरे कुएँ को ढकने लगे।

     

    अब वह इंसान नहीं थी।

     

    एक विशाल काली आकृति बन चुकी थी।

     

    विवेक पीछे गिर पड़ा।

     

    उसने देखा कि उसकी अपनी परछाई भी अब वापस जमीन पर आ गई थी।

     

    लेकिन वह विवेक की तरह नहीं दिख रही थी।

     

    उसके पीछे दो सिर थे।

     

    एक उसके दादा का।

     

    दूसरा…

     

    विवेक का।

     

    विवेक समझ गया कि अगर वह डर गया तो वह शक्ति उसके शरीर पर कब्ज़ा कर लेगी।

     

    उसने आँखें बंद कीं।

     

    और पहली बार उसने अपनी परछाई से कहा—

     

    “तुम मेरी दुश्मन नहीं हो।”

     

    परछाई शांत हो गई।

     

    “तुम मेरे अंदर का डर हो।”

     

    अंधेरा काँपने लगा।

     

    “और मैं अपने डर से भागूँगा नहीं।”

     

    विवेक ने दीपक फिर जलाया।

     

    इस बार लौ बुझी नहीं।

     

    बल्कि तेज़ होती गई।

     

    सफेद चेहरे वाली औरत चीखी।

     

    “नहीं!”

     

    विवेक ने दीपक कुएँ के अंदर फेंक दिया।

     

    एक तेज़ सफेद रोशनी पूरे गाँव में फैल गई।

     

    सभी परछाइयाँ एक साथ चीखने लगीं।

     

    फिर एक-एक करके वे कुएँ में खिंचने लगीं।

     

    सफेद चेहरे वाली औरत भी पीछे खिंचने लगी।

     

    उसने आखिरी बार विवेक की ओर देखा।

     

    “तुमने मुझे खत्म नहीं किया।”

     

    विवेक चुप रहा।

     

    वह हँसी।

     

    “क्योंकि परछाई को खत्म नहीं किया जा सकता।”

     

    और फिर वह कुएँ में गायब हो गई।

     

    सब कुछ शांत हो गया।

     

    सुबह हुई।

     

    गाँव वालों ने देखा कि पुराने कुएँ के चारों तरफ की जमीन काली पड़ चुकी थी।

     

    शंकर चाचा ने कहा—

     

    “अब यह कुआँ हमेशा के लिए बंद करना होगा।”

     

    गाँव वालों ने उसे पत्थरों से भर दिया।

     

    विवेक ने अपनी दादा-दादी की तस्वीर घर से निकालकर मंदिर में रख दी।

     

    वह गाँव छोड़ने ही वाला था कि उसकी नजर दीवार पर पड़ी।

     

    सुबह की तेज़ धूप में उसकी परछाई जमीन पर साफ दिखाई दे रही थी।

     

    विवेक मुस्कुराया।

     

    उसने हाथ उठाया।

     

    परछाई ने भी हाथ उठाया।

     

    सब सामान्य था।

     

    वह जाने लगा।

     

    लेकिन तभी…

     

    उसकी परछाई ने हाथ नीचे नहीं किया।

     

    विवेक रुक गया।

     

    उसने धीरे-धीरे पीछे देखा।

     

    परछाई अब भी हाथ उठाए खड़ी थी।

     

    विवेक ने अपना हाथ नीचे किया।

     

    परछाई ने नहीं किया।

     

    उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    फिर परछाई ने धीरे-धीरे अपना सिर घुमाया।

     

    वह विवेक की ओर नहीं…

     

    कुएँ की ओर देख रही थी।

     

    कुएँ के नीचे से हल्की लाल रोशनी दिखाई दे रही थी।

     

    और उसी समय विवेक के कान के पास किसी ने फुसफुसाया—

     

    “एक परछाई अभी बाकी है…”

     

    विवेक ने झटके से पीछे देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    उसने फिर जमीन की तरफ देखा।

     

    अब वहाँ उसकी परछाई अकेली नहीं थी।

     

    उसके बिल्कुल पीछे…

     

    एक दूसरी छोटी-सी परछाई खड़ी थी।

     

    विवेक का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    छोटी परछाई ने धीरे-धीरे अपना हाथ उठाया।

     

    और उसके हाथ में…

     

    एक पुरानी लाल चूड़ी थी।

     

    विवेक समझ गया—

     

    जिस शक्ति को उन्होंने कुएँ में बंद किया था…

     

    वह खत्म नहीं हुई थी।

     

    वह सिर्फ…

     

    एक नई परछाई की तलाश में थी।

     

    और इस बार…

     

    उसकी नजर विवेक पर नहीं थी।

     

    उसकी नजर थी—

     

    विवेक के आने वाले बच्चे पर।

     

    समाप्त।

  • परछाई (भाग 2 — तहखाने का रहस्य)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    विवेक घंटों तक अपनी परछाई को देखता रहा।

     

    सूरज ऊपर था।

     

    उसकी परछाई जमीन पर होनी चाहिए थी।

     

    लेकिन वह पाँच कदम दूर खड़ी थी।

     

    विवेक एक कदम आगे बढ़ा।

     

    परछाई वहीं रही।

     

    वह पीछे हटा।

     

    परछाई फिर भी नहीं हिली।

     

    विवेक का गला सूख गया।

     

    उसे शंकर चाचा की बात याद आई—

     

    “तुम्हारे दादा ने कहा था कि उनकी परछाई उनसे पहले घर पहुँच गई है।”

     

    विवेक ने तय किया कि अब वह घर में नहीं रहेगा।

     

    उसने अपना बैग उठाया और दरवाज़े की ओर बढ़ा।

     

    लेकिन जैसे ही उसने बाहर कदम रखा, उसकी परछाई अचानक उसके सामने आ गई।

     

    वह रास्ता रोककर खड़ी थी।

     

    विवेक पीछे हट गया।

     

    परछाई ने अपना हाथ उठाया और घर के तहखाने की तरफ इशारा किया।

     

    फिर जमीन पर एक शब्द उभरा—

     

    “सच।”

     

    विवेक समझ गया कि उसे तहखाने में जाना होगा।

     

    घर के पीछे पुराने स्टोर रूम में उसे एक लोहे का दरवाज़ा मिला।

     

    दरवाज़े पर मोटा ताला लगा था।

     

    उसे अपनी दादी की पुरानी चाबी याद आई।

     

    कुछ देर खोजने के बाद उसे एक लकड़ी के संदूक में चाबी मिल गई।

     

    ताला खुल गया।

     

    दरवाज़ा खोलते ही सड़ी हुई मिट्टी की गंध आई।

     

    सीढ़ियाँ नीचे जा रही थीं।

     

    विवेक मोबाइल की रोशनी जलाकर नीचे उतरने लगा।

     

    हर सीढ़ी के साथ ठंड बढ़ती जा रही थी।

     

    नीचे पहुँचकर उसे एक छोटा कमरा मिला।

     

    कमरे की दीवारों पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।

     

    विवेक ने पहली तस्वीर देखी।

     

    उसमें उसके दादा थे।

     

    दूसरी में उसकी दादी।

     

    तीसरी में…

     

    एक अजनबी आदमी।

     

    लेकिन हर तस्वीर में एक चीज़ समान थी।

     

    सबकी परछाई अलग थी।

     

    किसी की परछाई पीछे नहीं थी।

     

    किसी की बगल में थी।

     

    और एक तस्वीर में आदमी खड़ा था…

     

    लेकिन उसकी परछाई दीवार पर बैठी हुई थी।

     

    विवेक के हाथ काँपने लगे।

     

    तभी उसे एक पुरानी डायरी मिली।

     

    डायरी उसके दादा की थी।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “परछाई शरीर की नहीं, आत्मा की होती है।”

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “हर इंसान की परछाई उसके साथ जन्म लेती है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति अपनी परछाई से डरने लगे, तो वह परछाई धीरे-धीरे स्वतंत्र हो सकती है।”

     

    विवेक ने पन्ना पलटा।

     

    “मैंने उसे पहली बार कुएँ के पास देखा था।”

     

    अगले पन्ने पर—

     

    “वह मेरी नकल करती थी।”

     

    फिर—

     

    “कल रात उसने मुझसे पहले घर में प्रवेश किया।”

     

    विवेक की साँस रुक गई।

     

    फिर एक वाक्य था—

     

    “अगर मेरी परछाई अलग हो जाए तो मुझे मार देना, क्योंकि फिर मैं मैं नहीं रहूँगा।”

     

    डायरी उसके हाथ से गिर गई।

     

    अचानक तहखाने की लाइट जल गई।

     

    विवेक चौंक गया।

     

    सामने एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।

     

    “कौन?”

     

    आदमी धीरे-धीरे आगे आया।

     

    वह शंकर चाचा थे।

     

    विवेक ने राहत की साँस ली।

     

    “चाचा, आप यहाँ कैसे?”

     

    शंकर चाचा ने कहा—

     

    “क्योंकि अब समय आ गया है कि तुम्हें सब पता चले।”

     

    उन्होंने एक पुरानी तस्वीर दी।

     

    तस्वीर में पाँच लोग थे।

     

    विवेक के दादा, शंकर चाचा, गाँव का पुराना प्रधान और दो अजनबी लोग।

     

    पीछे एक पुराना कुआँ दिखाई दे रहा था।

     

    “ये कौन लोग हैं?”

     

    शंकर चाचा बोले—

     

    “तीस साल पहले गाँव में एक साधु आया था। उसने दावा किया था कि वह इंसान की परछाई को अलग करके उसे हमेशा के लिए नियंत्रित कर सकता है।”

     

    विवेक ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “धन और ताकत के लिए।”

     

    “क्या मेरे दादा ने उसकी मदद की?”

     

    “हाँ।”

     

    विवेक का चेहरा कठोर हो गया।

     

    “फिर?”

     

    शंकर चाचा ने कहा—

     

    “प्रयोग के दौरान कुछ गलत हो गया।”

     

    “क्या?”

     

    “साधु की अपनी परछाई उसके शरीर से अलग हो गई।”

     

    विवेक ने धीरे से पूछा—

     

    “और फिर?”

     

    “उसने बाकी लोगों की परछाइयाँ निगलना शुरू कर दिया।”

     

    तभी तहखाने में तेज़ हवा चली।

     

    दीवार पर लगी सभी तस्वीरें एक साथ हिलने लगीं।

     

    विवेक की अपनी परछाई दीवार पर दिखाई दी।

     

    लेकिन अब उसके पीछे एक दूसरी बड़ी परछाई खड़ी थी।

     

    शंकर चाचा ने घबराकर कहा—

     

    “वह आ गया।”

     

    अंधेरे में एक भारी आवाज़ गूँजी—

     

    “तुम्हारे दादा ने मुझे धोखा दिया था।”

     

    विवेक ने पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    दीवार पर एक विशाल काली आकृति बनी।

     

    “मैं वह हूँ जिसे तुम्हारे दादा ने जगाया था।”

     

    “तुमने उन्हें मारा?”

     

    “नहीं।”

     

    आवाज़ हँसी।

     

    “उन्होंने खुद अपनी परछाई मुझे दे दी थी।”

     

    विवेक पीछे हट गया।

     

    “मेरी परछाई तुमसे क्यों जुड़ी है?”

     

    “क्योंकि तुम उसी खून से हो।”

     

    अचानक विवेक की परछाई जमीन से उठकर दीवार पर चढ़ गई।

     

    वह धीरे-धीरे इंसान का आकार लेने लगी।

     

    फिर उसकी आवाज़ आई—

     

    “मुझे आज़ाद करो।”

     

    विवेक ने चौंककर कहा—

     

    “तुम बोल सकती हो?”

     

    परछाई ने सिर हिलाया।

     

    “मैं तुम्हारी परछाई नहीं हूँ।”

     

    “तो कौन हो?”

     

    उसने जवाब दिया—

     

    “मैं तुम्हारे दादा की परछाई हूँ।”

     

    विवेक स्तब्ध रह गया।

     

    “मेरे दादा की?”

     

    “उन्होंने अपनी आत्मा का एक हिस्सा मुझे देकर उस काली शक्ति को कैद किया था।”

     

    शंकर चाचा ने कहा—

     

    “लेकिन अब वह कैद टूट रही है।”

     

    तभी तहखाने का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    काली शक्ति की आवाज़ गूँजी—

     

    “आज तुम्हारे शरीर की बारी है।”

     

    अचानक विवेक की परछाई उसके शरीर से अलग होकर सामने आ गई।

     

    कमरे में दो परछाइयाँ थीं।

     

    एक विवेक की।

     

    दूसरी काली शक्ति की।

     

    दोनों एक-दूसरे पर टूट पड़ीं।

     

    दीवारें काँपने लगीं।

     

    शंकर चाचा चिल्लाए—

     

    “विवेक! कुएँ तक जाओ!”

     

    “क्यों?”

     

    “वहीं से इसे वापस भेजा जा सकता है!”

     

    विवेक दौड़कर सीढ़ियों की ओर गया।

     

    पीछे से काली परछाई उसका पीछा करने लगी।

     

    वह लगभग उसके पैरों तक पहुँच चुकी थी।

     

    विवेक बाहर निकला और पुराने कुएँ की तरफ भागा।

     

    लेकिन वहाँ पहुँचते ही उसने देखा—

     

    कुएँ के अंदर कोई खड़ा था।

     

    एक औरत।

     

    सफेद चेहरा।

     

    काले बाल।

     

    और उसकी परछाई…

     

    कुएँ की दीवार पर नहीं थी।

     

    वह सीधे विवेक की तरफ आ रही थी।

     

    औरत ने धीरे से कहा—

     

    “तुम्हारे दादा ने मुझे यहाँ बंद किया था।”

     

    विवेक ने काँपते हुए पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    औरत ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मैं वह परछाई हूँ… जिससे बाकी सारी परछाइयाँ पैदा हुई थीं।”

     

    कुएँ के अंदर से अचानक हजारों लोगों की फुसफुसाहट सुनाई देने लगी।

     

    और विवेक ने महसूस किया—

     

    उसकी अपनी परछाई अब पूरी तरह गायब हो चुकी थी।

  • परछाई (भाग 1 )

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

     

     

    शहर से लगभग चालीस किलोमीटर दूर एक छोटा-सा गाँव था—देवगढ़। गाँव देखने में बिल्कुल सामान्य था। चारों तरफ खेत, पुराने पेड़, मिट्टी के रास्ते और दूर तक फैले छोटे-छोटे घर। लेकिन गाँव की एक बात अजीब थी। यहाँ लोग सूर्यास्त के बाद अपने घरों के बाहर आईना नहीं रखते थे। और रात में अगर किसी की परछाई उसके शरीर से अलग दिशा में दिखाई दे… तो लोग उसे देखने की कोशिश भी नहीं करते थे। क्योंकि देवगढ़ में एक पुरानी मान्यता थी— “हर इंसान की एक परछाई होती है… लेकिन कभी-कभी किसी की परछाई इंसान की नहीं रहती।” इसी गाँव में कई साल बाद विवेक वापस आया था। वह शहर में नौकरी करता था और अपनी दादी की मृत्यु के बाद गाँव का पुराना घर बेचने आया था। घर लगभग बीस साल से बंद था। जैसे ही उसने मुख्य दरवाज़ा खोला, अंदर से धूल और सीलन की गंध आई। कमरे में पुराने फर्नीचर पड़े थे। दीवार पर उसके दादा-दादी की तस्वीर लगी थी। विवेक ने तस्वीर साफ की। तभी उसकी नजर तस्वीर के नीचे लगी एक छोटी-सी काली पट्टी पर पड़ी। उस पर लिखा था— “पीछे मत देखना।” विवेक हँस पड़ा। “दादी भी न…” उसे लगा शायद यह कोई पुरानी मज़ाकिया बात होगी। शाम तक उसने घर की सफाई कर ली। रात को बिजली चली गई। विवेक ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई और बरामदे में बैठ गया। आसमान में बादल थे। गाँव बिल्कुल शांत था। तभी उसे सामने की दीवार पर अपनी परछाई दिखाई दी। विवेक ने हाथ उठाया। परछाई ने भी हाथ उठाया। उसने सिर दाईं तरफ घुमाया। परछाई ने भी सिर घुमाया। विवेक मुस्कुराया। “सब ठीक है।” फिर उसने अपना हाथ नीचे कर लिया। परछाई ने भी हाथ नीचे कर लिया। कुछ सेकंड बाद… विवेक ने अचानक देखा कि परछाई ने अपना सिर ऊपर उठा लिया था। विवेक स्थिर खड़ा था। उसकी परछाई… उसे देख रही थी। विवेक की रीढ़ में ठंड उतर गई। उसने तुरंत मोबाइल की रोशनी बंद कर दी। अंधेरा छा गया। कुछ सेकंड बाद उसने फिर रोशनी जलाई। परछाई गायब थी। विवेक ने खुद को समझाया कि शायद रोशनी के कोण की वजह से ऐसा हुआ होगा। वह कमरे में जाकर सो गया। रात लगभग दो बजे उसकी आँख खुली। उसे लगा जैसे कोई उसके कमरे के बाहर चल रहा है। ठक… ठक… ठक… विवेक बिस्तर से उठा। दरवाज़े के नीचे से हल्की रोशनी आ रही थी। वह धीरे से दरवाज़े के पास गया। “कौन है?” कोई जवाब नहीं। उसने दरवाज़ा खोला। बाहर कोई नहीं था। लेकिन फर्श पर… एक लंबी काली परछाई दिखाई दे रही थी। विवेक ने ऊपर देखा। कोई इंसान वहाँ खड़ा नहीं था। परछाई अकेली थी। वह धीरे-धीरे दीवार पर चढ़ रही थी। विवेक पीछे हट गया। अचानक परछाई ने अपना सिर उसकी ओर घुमाया। विवेक ने डरकर दरवाज़ा बंद कर दिया। पूरी रात वह जागता रहा। सुबह उसने पड़ोसी शंकर चाचा से पूछा— “चाचा, इस घर में पहले कुछ हुआ था क्या?” शंकर चाचा कुछ देर उसे देखते रहे। “तुम्हारी दादी ने तुम्हें कुछ नहीं बताया?” “नहीं।” “तो अच्छा ही हुआ।” विवेक ने पूछा— “क्या हुआ था?” शंकर चाचा ने धीमी आवाज़ में कहा— “तुम्हारे दादा की मौत सामान्य नहीं थी।” विवेक चौंक गया। “क्या मतलब?” “जिस रात उनकी मौत हुई थी, उन्होंने पूरे गाँव में एक ही बात कही थी।” “क्या?” शंकर चाचा ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा— “मेरी परछाई मुझसे पहले घर पहुँच गई है।” विवेक के शरीर में सिहरन दौड़ गई। “फिर?” “सुबह तुम्हारे दादा मृत मिले।” “और उनकी परछाई?” शंकर चाचा ने कोई जवाब नहीं दिया। विवेक ने जोर देकर पूछा— “चाचा, बताइए।” शंकर चाचा ने कहा— “उनकी लाश के पास कोई परछाई नहीं थी।” विवेक के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसी रात उसने अपने कमरे में लगे पुराने आईने को देखा। आईने में उसका चेहरा दिखाई दे रहा था। लेकिन उसके पीछे… एक काली आकृति खड़ी थी। विवेक तुरंत पीछे मुड़ा। कमरा खाली था। उसने फिर आईने में देखा। आकृति अब भी वहीं थी। इस बार वह और करीब थी। विवेक ने डरते हुए आईने को कपड़े से ढक दिया। तभी पीछे से आवाज़ आई— “तुम्हें दादा ने चेतावनी दी थी।” विवेक का दिल रुकने जैसा हो गया। उसने धीरे-धीरे पीछे देखा। कमरे में कोई नहीं था। लेकिन दीवार पर उसकी परछाई दिखाई दे रही थी। विवेक स्थिर था। फिर भी परछाई… चल रही थी। उसने अपना हाथ उठाया। फिर दीवार पर लिखने लगी। धीरे-धीरे काली उँगली से दीवार पर एक शब्द उभरा— “भागो।” विवेक पीछे हट गया। तभी खिड़की अपने आप खुल गई। बाहर तेज़ हवा चलने लगी। और आँगन में उसे एक दूसरी परछाई दिखाई दी। वह किसी आदमी की थी। वह धीरे-धीरे घर की तरफ बढ़ रही थी। विवेक ने मोबाइल की रोशनी बाहर डाली। कोई इंसान नहीं था। सिर्फ परछाई। वह परछाई दरवाज़े तक आई। फिर दरवाज़े के नीचे से अंदर घुस गई। विवेक चीख पड़ा। परछाई फर्श पर रेंगती हुई उसके पैरों तक पहुँची। फिर अचानक उसके पैर की परछाई से जुड़ गई। विवेक ने महसूस किया कि उसका शरीर ठंडा पड़ रहा है। उसे लगा जैसे कोई उसके अंदर घुस रहा हो। तभी दीवार पर एक और शब्द उभरा— “दूसरी रात।” विवेक बेहोश होकर गिर पड़ा। सुबह जब उसकी आँख खुली तो वह फर्श पर पड़ा था। सब कुछ सामान्य था। लेकिन जब उसने सूरज की रोशनी में जमीन पर देखा… उसकी परछाई उसके पैरों के नीचे नहीं थी। वह उससे लगभग पाँच कदम दूर खड़ी थी। और… वह विवेक की तरफ नहीं देख रही थी। वह घर के बंद पड़े तहखाने की ओर देख रही थी। विवेक ने पहली बार महसूस किया— वह परछाई अब उसकी नहीं रही थी।

  • लाल चुड़ैल

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    (भाग 5 — तीसरे दरवाज़े के पीछे)

     

    अमन और रवि उस लोहे के दरवाज़े के सामने खड़े थे।

     

    दरवाज़े पर वही चेतावनी लिखी थी—

     

    “जो इसे खोलेगा, उसकी आत्मा कभी वापस नहीं आएगी।”

     

    चंद्रा कुछ दूरी पर खड़ी थी।

     

    उसके चेहरे पर पहली बार डर साफ दिखाई दे रहा था।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “अगर इसे खोलना इतना खतरनाक है, तो हमें यहाँ क्यों लाया गया?”

     

    चंद्रा ने जवाब दिया—

     

    “क्योंकि अब वह दरवाज़ा खुद खुलना चाहता है।”

     

    जैसे ही उसने यह कहा—

     

    ठक।

     

    दरवाज़े के अंदर से किसी ने दस्तक दी।

     

    रवि पीछे हट गया।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    तीन बार दस्तक।

     

    फिर एक आवाज़ आई—

     

    “अमन…”

     

    अमन का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    आवाज़ उसकी माँ जैसी थी।

     

    उसकी माँ की मृत्यु कई साल पहले हो चुकी थी।

     

    “बेटा… दरवाज़ा खोलो।”

     

    अमन की आँखों में आँसू आ गए।

     

    रवि ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “यह तुम्हारी माँ नहीं है।”

     

    अंदर से फिर आवाज़ आई—

     

    “अमन… मैं बहुत अकेली हूँ।”

     

    अमन कुछ कदम आगे बढ़ा।

     

    चंद्रा ने जोर से कहा—

     

    “नहीं!”

     

    अमन रुक गया।

     

    चंद्रा की आवाज़ काँप रही थी।

     

    “यह वही करती है।”

     

    “कौन?”

     

    “वह शक्ति लोगों की सबसे प्यारी आवाज़ बनकर उन्हें अपने पास बुलाती है।”

     

    अचानक दरवाज़े के नीचे से काला धुआँ बाहर निकलने लगा।

     

    रवि ने पूछा—

     

    “इसे रोकेंगे कैसे?”

     

    चंद्रा ने कहा—

     

    “जिस चीज़ से यह शक्ति बनी है, उसे वापस वहीं रखना होगा।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    चंद्रा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मेरा लॉकेट।”

     

    अमन ने लॉकेट निकाला।

     

    चंद्रा ने कहा—

     

    “इसमें मेरी और गौरी की आखिरी याद बंद है। देवेंद्र ने इसी याद को इस्तेमाल करके उस शक्ति को जगाया था।”

     

    अमन ने लॉकेट दरवाज़े के सामने रखा।

     

    अचानक दरवाज़ा काँपने लगा।

     

    अंदर से भयानक चीख सुनाई दी।

     

    “नहीं!”

     

    लोहे का दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

     

    अंदर कोई कमरा नहीं था।

     

    सिर्फ अंधेरा।

     

    ऐसा अंधेरा जिसमें टॉर्च की रोशनी भी गायब हो रही थी।

     

    फिर अंधेरे के बीच एक विशाल लाल आँख खुली।

     

    रवि चीख पड़ा।

     

    “भागो!”

     

    लेकिन अमन वहीं खड़ा रहा।

     

    उसे लगा जैसे कोई उसे अपनी ओर खींच रहा हो।

     

    उसने देखा कि उसके सामने उसकी माँ खड़ी है।

     

    “बेटा…”

     

    अमन की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    “माँ?”

     

    उसने हाथ आगे बढ़ाया।

     

    लेकिन तभी उसे चंद्रा की बात याद आई।

     

    यह असली नहीं था।

     

    अमन ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “तुम मेरी माँ नहीं हो।”

     

    उस आकृति का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    माँ का चेहरा पिघलकर एक भयानक लाल चेहरा बन गया।

     

    उसने चीखते हुए अमन पर हमला किया।

     

    अमन पीछे गिर पड़ा।

     

    रवि ने लाल लॉकेट उठाकर उस शक्ति की ओर फेंक दिया।

     

    लॉकेट हवा में चमकने लगा।

     

    चंद्रा ने अपनी पूरी शक्ति से कहा—

     

    “गौरी!”

     

    अचानक छोटी बच्ची की आवाज़ गूँजी—

     

    “माँ!”

     

    एक सफेद रोशनी कमरे में फैल गई।

     

    गौरी की आत्मा सामने दिखाई दी।

     

    वह धीरे-धीरे उस लाल शक्ति की ओर बढ़ी।

     

    लाल शक्ति पीछे हटने लगी।

     

    “नहीं…”

     

    गौरी ने कहा—

     

    “तूने मेरी माँ को मुझसे छीना था।”

     

    शक्ति गरजी—

     

    “तुम दोनों मेरी वजह से पैदा नहीं हुईं! तुम्हारे डर से मैं बनी हूँ!”

     

    चंद्रा ने कहा—

     

    “और अब तुम्हारा डर खत्म हो गया।”

     

    गौरी ने चंद्रा का हाथ पकड़ लिया।

     

    दोनों की आत्माएँ रोशनी में बदलने लगीं।

     

    लाल शक्ति चीखने लगी।

     

    “नहीं!”

     

    अमन ने देखा कि लॉकेट टूट गया।

     

    उसमें से एक तेज़ रोशनी निकली।

     

    पूरी सुरंग हिलने लगी।

     

    दीवारें टूटने लगीं।

     

    रवि ने अमन को खींचा।

     

    “हमें निकलना होगा!”

     

    दोनों भागते हुए सुरंग से बाहर निकले।

     

    पीछे से एक भयानक विस्फोट हुआ।

     

    लाल हवेली का एक बड़ा हिस्सा गिर गया।

     

    सुबह तक वहाँ सिर्फ टूटी हुई दीवारें बची थीं।

     

    गाँव वालों ने देखा कि बरगद के पेड़ के नीचे लाल साड़ी का एक टुकड़ा पड़ा था।

     

    लेकिन चंद्रा कहीं नहीं थी।

     

    उस दिन के बाद अमावस्या की रात पायल की आवाज़ कभी नहीं सुनाई दी।

     

    लाल हवेली हमेशा के लिए खामोश हो गई।

     

    अमन ने शहर लौटने से पहले बरगद के नीचे एक छोटा-सा दीपक जलाया।

     

    रवि उसके पास खड़ा था।

     

    “अब सब खत्म हो गया?”

     

    अमन ने कहा—

     

    “शायद।”

     

    दोनों वापस जाने लगे।

     

    लेकिन अमन ने अचानक पीछे मुड़कर देखा।

     

    बरगद के पेड़ की एक शाखा पर कुछ लटक रहा था।

     

    वही लाल चूड़ी।

     

    अमन धीरे-धीरे उसके पास गया।

     

    चूड़ी के अंदर एक छोटा कागज़ फँसा था।

     

    उसने कागज़ खोला।

     

    उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “चंद्रा चली गई है… लेकिन लाल चुड़ैल कभी एक नहीं थी।”

     

    अमन की साँस रुक गई।

     

    उसी समय गाँव के दूसरे छोर से किसी औरत के चीखने की आवाज़ आई।

     

    फिर पायल की आवाज़।

     

    छन… छन… छन…

     

    रवि ने डरते हुए पूछा—

     

    “यह आवाज़ कहाँ से आ रही है?”

     

    अमन ने दूर देखा।

     

    गाँव की एक बंद पड़ी हवेली की खिड़की में एक औरत खड़ी थी।

     

    लाल साड़ी में।

     

    उसके पीछे…

     

    एक नहीं…

     

    तीन परछाइयाँ थीं।

     

    अमन समझ गया।

     

    लाल चुड़ैल की कहानी खत्म नहीं हुई थी।

     

    शायद चंद्रा सिर्फ उस रहस्य का एक हिस्सा थी।

     

    और अब गाँव में एक नई अमावस्या आने वाली थी।

     

    खिड़की में खड़ी औरत ने धीरे-धीरे हाथ उठाया।

     

    फिर उसने दूर खड़े अमन की तरफ इशारा किया।

     

    उसके होंठ हिले—

     

    “अगली बार… मैं तुम्हें लेने आऊँगी।”

     

    अमन ने पलक झपकाई।

     

    खिड़की खाली थी।

     

    लेकिन उसके कानों में आखिरी आवाज़ अब भी गूँज रही थी—

     

    छन… छन… छन…

     

    समाप्त।

  • लाल चुड़ैल

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    लाल चुड़ैल

     

    (भाग 4 — देवेंद्र का साथी)

     

    गौरी की आवाज़ सुनने के बाद अमन कई मिनट तक अपने कमरे के बीचोंबीच खड़ा रहा।

     

    कमरे में अंधेरा था।

     

    खिड़की खुली थी।

     

    और फर्श पर वही लाल चूड़ी पड़ी थी।

     

    अमन ने काँपते हाथों से लाइट जलाई।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    उसने तुरंत रवि को फोन किया।

     

    फोन कई बार बजा, लेकिन किसी ने नहीं उठाया।

     

    कुछ देर बाद अचानक फोन बजा।

     

    स्क्रीन पर रवि का नाम था।

     

    अमन ने फोन उठाया।

     

    “रवि?”

     

    दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।

     

    फिर एक धीमी आवाज़ आई—

     

    “अमन… लाल हवेली मत जाना।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    रवि ने कहा—

     

    “वहाँ कोई वापस आ गया है।”

     

    “कौन?”

     

    फोन कट गया।

     

    अमन ने तुरंत रवि को दोबारा फोन किया।

     

    इस बार फोन बंद था।

     

    सुबह होते ही अमन गाँव के लिए निकल पड़ा।

     

    जब वह बरवा पहुँचा तो रवि उसे गाँव के बाहर पुराने मंदिर के पास मिला।

     

    रवि के चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “कल रात क्या हुआ?”

     

    रवि ने अपनी जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

     

    तस्वीर देखकर अमन के होश उड़ गए।

     

    उसमें देवेंद्र खड़ा था।

     

    उसके साथ एक दूसरा आदमी था।

     

    वही आदमी…

     

    जिसे अमन ने बचपन से गाँव के मंदिर का पुजारी समझा था।

     

    पंडित रघुनाथ।

     

    अमन ने कहा—

     

    “ये तो मंदिर के पंडित जी हैं।”

     

    रवि ने सिर हिलाया।

     

    “लेकिन यह तस्वीर तीस साल पुरानी है।”

     

    दोनों तुरंत पंडित रघुनाथ के पास पहुँचे।

     

    पंडित जी मंदिर में अकेले बैठे मंत्र पढ़ रहे थे।

     

    अमन ने तस्वीर उनके सामने रख दी।

     

    पंडित जी ने तस्वीर देखी तो उनका चेहरा बदल गया।

     

    “यह तुम्हें कहाँ मिली?”

     

    “हवेली में।”

     

    पंडित जी कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “तुम्हें वहाँ नहीं जाना चाहिए था।”

     

    अमन ने गुस्से में पूछा—

     

    “देवेंद्र के साथ आपका क्या संबंध था?”

     

    पंडित जी ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    रवि ने कहा—

     

    “हमें सब पता है।”

     

    पंडित जी ने धीरे से सिर उठाया।

     

    “नहीं। तुम्हें कुछ भी पता नहीं।”

     

    उन्होंने मंदिर का दरवाज़ा बंद कर दिया।

     

    “देवेंद्र सिर्फ एक लालची आदमी नहीं था। वह तांत्रिक साधना करता था।”

     

    अमन की रीढ़ में ठंड उतर गई।

     

    “किस चीज़ की साधना?”

     

    पंडित जी ने मंदिर के पीछे बने एक छोटे कमरे की ओर इशारा किया।

     

    “मृत आत्माओं को नियंत्रित करने की।”

     

    उन्होंने बताया कि देवेंद्र को विश्वास था कि अगर किसी शक्तिशाली आत्मा को अपने वश में कर लिया जाए तो इंसान अमर हो सकता है।

     

    उसने कई वर्षों तक पुराने श्मशान में साधना की।

     

    लेकिन एक रात उसे ऐसी आत्मा मिली जिसे वह नियंत्रित नहीं कर सका।

     

    वह आत्मा थी—

     

    लाल चुड़ैल।

     

    अमन ने धीरे से पूछा—

     

    “चंद्रा?”

     

    पंडित जी ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    “तो फिर चंद्रा कौन थी?”

     

    पंडित जी ने कहा—

     

    “चंद्रा उस आत्मा की शिकार थी।”

     

    अमन के हाथ से तस्वीर गिरते-गिरते बची।

     

    “क्या मतलब?”

     

    पंडित जी ने बताया—

     

    “जिस रात देवेंद्र ने चंद्रा और गौरी को तहखाने में बंद किया, उसी रात उसने अपनी तांत्रिक साधना पूरी करने की कोशिश की। चंद्रा की मौत के बाद उसकी आत्मा तो वहीं रह गई… लेकिन उसी समय तहखाने में एक दूसरी शक्ति जाग गई।”

     

    “वही लाल चुड़ैल?”

     

    “हाँ।”

     

    रवि ने पूछा—

     

    “लेकिन वह चंद्रा के रूप में क्यों दिखाई देती थी?”

     

    पंडित जी ने कहा—

     

    “क्योंकि वह लोगों को अपने पास बुलाने के लिए परिचित चेहरा पहनती थी।”

     

    अमन को पिछली रात गौरी की बात याद आई—

     

    “देवेंद्र अकेला नहीं था।”

     

    उसने पूछा—

     

    “तो देवेंद्र का साथी कौन था?”

     

    पंडित जी ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “मैं।”

     

    कमरे में जैसे समय रुक गया।

     

    रवि ने गुस्से में पंडित जी को पकड़ लिया।

     

    “तुमने चंद्रा को मरने दिया!”

     

    पंडित जी ने विरोध नहीं किया।

     

    “हाँ।”

     

    उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “मैंने देवेंद्र की मदद की थी। लेकिन मुझे नहीं पता था कि वह किस शक्ति को बुला रहा है।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “फिर आपने हमें यह सब पहले क्यों नहीं बताया?”

     

    पंडित जी ने जवाब दिया—

     

    “क्योंकि मुझे डर था कि अगर मैंने सच बताया तो वह शक्ति फिर जाग जाएगी।”

     

    अचानक मंदिर की घंटी अपने आप बजने लगी।

     

    टन… टन… टन…

     

    पंडित जी का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “वह जाग चुकी है।”

     

    मंदिर के बाहर हवा तेज़ हो गई।

     

    दीवारों पर लाल परछाइयाँ दिखाई देने लगीं।

     

    फिर एक आवाज़ आई—

     

    “रघुनाथ…”

     

    पंडित जी काँपने लगे।

     

    “नहीं…”

     

    आवाज़ फिर आई—

     

    “तुमने वादा किया था…”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “किससे?”

     

    पंडित जी ने मंदिर के फर्श की ओर देखा।

     

    “उससे।”

     

    अचानक फर्श पर लाल रंग की एक दरार दिखाई दी।

     

    दरार फैलती गई।

     

    और मंदिर के नीचे से एक सीढ़ी दिखाई देने लगी।

     

    पंडित जी पीछे हटे।

     

    “यह रास्ता… लाल हवेली तक जाता है।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “लेकिन हवेली तो गाँव के दूसरी तरफ है।”

     

    “जमीन के नीचे रास्ते हैं।”

     

    तीनों नीचे उतरने लगे।

     

    सुरंग बहुत पुरानी थी।

     

    दीवारों पर अजीब निशान बने थे।

     

    कुछ जगहों पर लाल मोमबत्तियाँ जल रही थीं।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “ये सब अभी भी जल रही हैं?”

     

    पंडित जी ने कहा—

     

    “इन्हें कोई जलाता नहीं।”

     

    अचानक पीछे से किसी के चलने की आवाज़ आई।

     

    छप… छप… छप…

     

    तीनों मुड़े।

     

    सुरंग खाली थी।

     

    फिर आवाज़ सामने से आई।

     

    एक लड़की दिखाई दी।

     

    गौरी।

     

    वह धीरे-धीरे उनकी तरफ चल रही थी।

     

    लेकिन इस बार उसकी आँखें फिर काली थीं।

     

    रवि ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “यह गौरी नहीं है।”

     

    गौरी अचानक मुस्कुराई।

     

    “बहुत देर कर दी तुम लोगों ने।”

     

    पंडित जी ने मंत्र पढ़ना शुरू किया।

     

    गौरी की हँसी तेज़ होती गई।

     

    फिर उसके पीछे एक विशाल लाल परछाई दिखाई दी।

     

    अमन ने पहली बार उस असली शक्ति को देखा।

     

    वह इंसान जैसी नहीं थी।

     

    उसके बाल जमीन तक फैले थे।

     

    चेहरा आधा इंसान का था और आधा राख जैसा।

     

    और उसकी आँखें पूरी तरह लाल थीं।

     

    उसने पंडित रघुनाथ की ओर देखा।

     

    “तीस साल पहले तुमने मुझे बुलाया था।”

     

    पंडित जी काँपने लगे।

     

    “मैंने गलती की थी।”

     

    वह शक्ति हँसी।

     

    “गलती की कीमत कोई और नहीं… तुम दोगे।”

     

    अचानक पंडित जी हवा में उठ गए।

     

    अमन और रवि चीख पड़े।

     

    पंडित जी ने आखिरी बार अमन की ओर देखा।

     

    “लाल हवेली के नीचे… तीसरा दरवाज़ा…”

     

    फिर उनकी गर्दन एक तरफ झुक गई।

     

    उनका शरीर जमीन पर गिर पड़ा।

     

    सुरंग में सन्नाटा छा गया।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “तीसरा दरवाज़ा क्या है?”

     

    पीछे से चंद्रा की आवाज़ आई—

     

    “वही दरवाज़ा… जिसे कभी खोलना नहीं चाहिए।”

     

    अमन ने पीछे देखा।

     

    चंद्रा खड़ी थी।

     

    लेकिन उसके चेहरे पर इस बार डर था।

     

    उसने कहा—

     

    “क्योंकि उसके पीछे मैं नहीं हूँ।”

     

    “तो कौन है?”

     

    चंद्रा ने धीरे से जवाब दिया—

     

    “जिसने मुझे लाल चुड़ैल बनाया…”

     

    और उसी क्षण सुरंग की दीवार पर एक तीसरा लोहे का दरवाज़ा दिखाई दिया।

     

    उस दरवाज़े पर खून से लिखा था—

     

    “जो इसे खोलेगा, उसकी आत्मा कभी वापस नहीं आएगी।”

  • लाल चुड़ैल

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    (भाग 3)

     

    रात के करीब ग्यारह बज रहे थे।

     

    अमन और रवि लाल हवेली के सामने खड़े थे।

     

    उनके पास हरिराम काका की पुरानी डायरी थी और वह लाल लॉकेट भी।

     

    लेकिन इस बार वे अकेले नहीं थे।

     

    गाँव के कुछ बुज़ुर्ग भी उनके साथ थे।

     

    क्योंकि अब सबको समझ आ चुका था कि लाल हवेली की कहानी सिर्फ अंधविश्वास नहीं थी।

     

    हरिराम काका गायब हो चुके थे।

     

    और अगर डायरी सच थी, तो तहखाने में कोई ऐसा राज़ छिपा था जिसने तीस साल से पूरे गाँव को डर में रखा था।

     

    हवेली का दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

     

    क्रीईईक…

     

    अंदर घना अंधेरा था।

     

    अमन ने टॉर्च जलाई।

     

    सीढ़ियों के नीचे एक पत्थर की दीवार दिखाई दी।

     

    डायरी में लिखे संकेत के अनुसार उन्होंने दीवार के एक पत्थर को दबाया।

     

    घर्रर्र…

     

    दीवार धीरे-धीरे पीछे हट गई।

     

    नीचे जाने वाली सीढ़ियाँ दिखाई दीं।

     

    सीढ़ियों से ठंडी हवा ऊपर आ रही थी।

     

    रवि ने कहा—

     

    “मुझे लगता है हमें वापस जाना चाहिए।”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    “अब नहीं।”

     

    दोनों नीचे उतरने लगे।

     

    हर सीढ़ी के साथ हवा और ठंडी होती जा रही थी।

     

    नीचे पहुँचकर उन्हें एक लंबा गलियारा मिला।

     

    दीवारों पर पुराने हाथों के निशान थे।

     

    कुछ छोटे।

     

    कुछ बड़े।

     

    और कई निशान लाल रंग के थे।

     

    गलियारे के अंत में लोहे का दरवाज़ा था।

     

    उस पर पुराने खून के निशान दिखाई दे रहे थे।

     

    अमन ने दरवाज़ा खोला।

     

    अंदर एक छोटा कमरा था।

     

    कमरे के बीच में लोहे की जंजीर पड़ी थी।

     

    और दीवार पर खरोंचों से कुछ लिखा हुआ था।

     

    “मैंने अपनी बेटी को नहीं मारा।”

     

    अमन की आँखें फैल गईं।

     

    तभी उसके पीछे से आवाज़ आई—

     

    “वह मेरी बेटी थी।”

     

    दोनों मुड़े।

     

    लाल साड़ी वाली औरत उनके सामने खड़ी थी।

     

    इस बार उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

     

    वह डरावनी नहीं लग रही थी।

     

    बल्कि बेहद दुखी थी।

     

    उसकी आँखों से खून के आँसू बह रहे थे।

     

    अमन ने धीरे से पूछा—

     

    “तुम चंद्रा हो?”

     

    औरत ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “तुमने गाँव वालों को क्यों डराया?”

     

    चंद्रा ने जवाब दिया—

     

    “मैंने किसी को नहीं डराया। मैंने सिर्फ उन्हें सच याद दिलाया।”

     

    “हरिराम काका कहाँ हैं?”

     

    चंद्रा ने गलियारे की तरफ इशारा किया।

     

    अमन और रवि वहाँ पहुँचे।

     

    हरिराम काका दीवार के पास बैठे थे।

     

    वह जीवित थे।

     

    लेकिन बहुत कमजोर।

     

    अमन ने उन्हें उठाया।

     

    “काका, यहाँ क्या हुआ था?”

     

    हरिराम काका रो पड़े।

     

    “देवेंद्र ने चंद्रा को इस तहखाने में बंद किया था। उसकी बेटी गौरी सब देख रही थी। उसने अपनी माँ को बचाने की कोशिश की।”

     

    “फिर?”

     

    “देवेंद्र ने गौरी को भी यहाँ बंद कर दिया।”

     

    रवि ने पूछा—

     

    “फिर आग किसने लगाई?”

     

    काका ने सिर झुका लिया।

     

    “देवेंद्र ने।”

     

    अमन ने गुस्से में कहा—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि चंद्रा के पास उसके सारे अपराधों के सबूत थे। उसे डर था कि चंद्रा गाँव वालों को सब बता देगी।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “लेकिन चंद्रा और गौरी बच कैसे गईं?”

     

    काका ने काँपती आवाज़ में कहा—

     

    “वे नहीं बचीं।”

     

    सन्नाटा छा गया।

     

    तभी पीछे से बच्ची की आवाज़ आई—

     

    “माँ… मुझे बहुत अंधेरा लगा था।”

     

    चंद्रा की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    गौरी उसके पास आकर खड़ी हो गई।

     

    अमन को समझ आया कि यह बदला नहीं था।

     

    यह अधूरी कहानी थी।

     

    चंद्रा ने अमन की ओर देखा।

     

    “मेरा लॉकेट खोलो।”

     

    अमन ने लॉकेट खोला।

     

    उसके अंदर की तस्वीर के पीछे एक छोटा कागज़ छिपा हुआ था।

     

    कागज़ पर देवेंद्र के अपराधों का पूरा विवरण लिखा था।

     

    गाँव की जमीनों पर कब्ज़ा।

     

    लोगों को धमकाना।

     

    और चंद्रा तथा गौरी को तहखाने में बंद करना।

     

    अमन ने कहा—

     

    “तुम चाहती हो कि यह सच गाँव वालों के सामने आए?”

     

    चंद्रा ने सिर हिला दिया।

     

    “बस इतना ही।”

     

    अचानक तहखाने की दीवारें हिलने लगीं।

     

    ऊपर से तेज़ आवाज़ आने लगी।

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    रवि चिल्लाया—

     

    “हमें यहाँ से निकलना होगा!”

     

    लेकिन चंद्रा वहीं खड़ी रही।

     

    अमन ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की।

     

    उसका हाथ बर्फ जैसा ठंडा था।

     

    “तुम भी हमारे साथ चलो।”

     

    चंद्रा हल्का-सा मुस्कुराई।

     

    “मेरा रास्ता यहाँ खत्म होता है।”

     

    गौरी ने पहली बार अमन की तरफ देखा।

     

    उसकी आँखें अब काली नहीं थीं।

     

    वे सामान्य थीं।

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “धन्यवाद।”

     

    अगले ही पल चंद्रा और गौरी धुएँ में बदलने लगीं।

     

    उनकी आकृतियाँ धीरे-धीरे गायब हो गईं।

     

    तहखाने में सिर्फ लाल चूड़ी बची।

     

    अमन ने चूड़ी उठाई।

     

    और तभी पीछे से एक भयानक आवाज़ आई—

     

    “नहीं!”

     

    चारों तरफ अचानक आग की लपटें उठने लगीं।

     

    हरिराम काका चिल्लाए—

     

    “देवेंद्र!”

     

    कमरे के बीचोंबीच एक काली आकृति दिखाई दी।

     

    वह देवेंद्र की आत्मा थी।

     

    उसका चेहरा जला हुआ था।

     

    वह अमन की ओर बढ़ा।

     

    “यह सच बाहर नहीं जाएगा!”

     

    अमन पीछे हट गया।

     

    देवेंद्र ने उसका गला पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया।

     

    लेकिन तभी लाल चूड़ी चमकने लगी।

     

    पूरे तहखाने में लाल रोशनी फैल गई।

     

    चंद्रा की आवाज़ गूँजी—

     

    “अब मेरा सच कोई नहीं रोक सकता।”

     

    देवेंद्र की आत्मा चीखने लगी।

     

    “नहीं!”

     

    एक तेज़ हवा चली।

     

    और वह काली आकृति धुएँ की तरह गायब हो गई।

     

    तहखाना टूटने लगा।

     

    अमन, रवि और हरिराम काका किसी तरह बाहर भागे।

     

    सुबह होते ही अमन ने गाँव वालों के सामने डायरी और वह कागज़ रख दिया।

     

    सालों से छिपा सच सबके सामने था।

     

    लाल हवेली को बाद में गिरा दिया गया।

     

    बरगद के पेड़ के नीचे चंद्रा और गौरी की याद में एक छोटा-सा दीपक जलाया जाने लगा।

     

    कहा जाता है कि उसके बाद अमावस्या की रात पगडंडी पर लाल साड़ी वाली औरत दिखाई देना बंद हो गई।

     

    गाँव में फिर से शांति लौट आई।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

     

    एक साल बाद अमन शहर लौट चुका था।

     

    एक रात उसके कमरे की खिड़की पर अचानक—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    उसकी आँख खुल गई।

     

    वह कुछ पल चुपचाप खिड़की को देखता रहा।

     

    फिर उसने खिड़की खोली।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    नीचे फर्श पर एक छोटी-सी लाल चूड़ी पड़ी थी।

     

    अमन ने काँपते हुए उसे उठाया।

     

    तभी उसके पीछे एक बच्ची की धीमी आवाज़ आई—

     

    “माँ को तो मुक्ति मिल गई…”

     

    अमन धीरे-धीरे पीछे मुड़ा।

     

    कमरे के कोने में एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    गौरी।

     

    उसने मुस्कुराते हुए कहा—

     

    “लेकिन क्या तुम्हें सच में लगता है कि देवेंद्र अकेला था?”

     

    अमन के हाथ से लाल चूड़ी गिर गई।

     

    कमरे की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    और अंधेरे में कई आवाज़ें एक साथ फुसफुसाईं—

     

    “अभी तो कहानी शुरू हुई !

  • 😱लाल चुड़ैल😱

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    😱(भाग 2 — हवेली का राज़ )😱

     

     

    अगली सुबह अमन की आँख खुली तो उसके कमरे में धूप नहीं थी।

     

    खिड़की बंद थी।

     

    दरवाज़ा बंद था।

     

    लेकिन कमरे में मिट्टी और गीली मिट्टी जैसी अजीब गंध फैली हुई थी।

     

    उसने अपने हाथ की तरफ देखा।

     

    कलाई पर तीन लाल निशान थे।

     

    ऐसे निशान जैसे किसी ने नाखूनों से उसे पकड़कर खरोंचा हो।

     

    अमन घबरा गया।

     

    उसे पिछली रात की सारी बातें याद आने लगीं।

     

    लाल हवेली।

     

    वह औरत।

     

    लाल लॉकेट।

     

    और उसकी आवाज़—

     

    “अब अगली रात तुम्हारी है…”

     

    अमन ने तुरंत रवि को फोन किया।

     

    फोन बंद था।

     

    वह उसके घर पहुँचा तो रवि बिस्तर पर बैठा काँप रहा था।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    रवि ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “कल रात मैंने एक सपना देखा।”

     

    “क्या?”

     

    “वही औरत… लाल चुड़ैल।”

     

    रवि की आँखों में आँसू थे।

     

    “उसने मुझे बताया कि चंद्रा ने किसी को नहीं मारा था।”

     

    अमन चौंक गया।

     

    “तो फिर?”

     

    रवि बोला—

     

    “उसे मारा गया था।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    उसी समय बाहर से हरिराम काका की आवाज़ आई।

     

    “अगर सच जानना है तो मेरे पास आओ।”

     

    दोनों उनके घर पहुँचे।

     

    हरिराम काका ने दरवाज़ा बंद किया और एक पुराना लकड़ी का संदूक खोला।

     

    उसमें पुराने कागज़, तस्वीरें और एक डायरी रखी थी।

     

    काका ने डायरी अमन को दी।

     

    “यह चंद्रा के पति देवेंद्र की डायरी है।”

     

    अमन ने पहला पन्ना खोला।

     

    लिखा था—

     

    “चंद्रा को मैं कभी माफ़ नहीं कर पाऊँगा।”

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “वह मेरे राज़ जानती है।”

     

    फिर एक पन्ना था जिस पर सिर्फ एक तारीख लिखी थी।

     

    वही तारीख…

     

    जिस रात हवेली में आग लगी थी।

     

    अमन ने पूछा, “काका, उस रात क्या हुआ था?”

     

    हरिराम काका ने लंबी साँस ली।

     

    “देवेंद्र गाँव का सबसे ताकतवर आदमी था। उसने गाँव की जमीनों पर कब्ज़ा कर रखा था। चंद्रा को सब पता चल गया था। उसने गाँव वालों को सच बताने की धमकी दी।”

     

    “फिर?”

     

    “देवेंद्र ने उसे रोकने की कोशिश की।”

     

    काका कुछ देर चुप रहे।

     

    “उस रात हवेली में आग लगी। लोग बाहर खड़े रहे। किसी ने अंदर जाने की हिम्मत नहीं की।”

     

    अमन ने पूछा, “और चंद्रा?”

     

    “सबने माना कि वह जलकर मर गई।”

     

    “लेकिन उसकी लाश नहीं मिली।”

     

    काका ने सिर हिलाया।

     

    “क्योंकि वह हवेली में थी ही नहीं।”

     

    अमन और रवि एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    “तो फिर वह कहाँ गई?”

     

    हरिराम काका की आवाज़ धीमी हो गई।

     

    “हवेली के नीचे एक तहखाना है।”

     

    अमन के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    “तहखाना?”

     

    “हाँ। और वहाँ से गाँव के पुराने कुएँ तक एक सुरंग जाती थी।”

     

    अमन को पिछली रात की लाल चुड़ैल की बात याद आई।

     

    मेरा हार कहाँ है?

     

    उसने तुरंत पूछा—

     

    “उसका हार?”

     

    काका की आँखें फैल गईं।

     

    “तुम्हें उसका हार मिला?”

     

    अमन ने जेब से लॉकेट निकाला।

     

    काका ने उसे देखते ही पीछे कदम कर लिया।

     

    “इसे यहाँ से बाहर ले जाओ!”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि यह वही लॉकेट है जो चंद्रा के गले में था।”

     

    अमन ने लॉकेट खोला।

     

    अंदर एक छोटी-सी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में चंद्रा के साथ एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    रवि ने पूछा—

     

    “यह लड़की कौन है?”

     

    हरिराम काका का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “चंद्रा की बेटी।”

     

    अमन हैरान रह गया।

     

    “लेकिन गाँव में तो कहा जाता था कि चंद्रा की कोई बेटी नहीं थी।”

     

    काका ने जवाब नहीं दिया।

     

    उन्होंने सिर्फ इतना कहा—

     

    “क्योंकि वह बच्ची भी उस रात गायब हो गई थी।”

     

    अचानक कमरे के बाहर पायल की आवाज़ सुनाई दी।

     

    छन… छन… छन…

     

    तीनों की साँसें रुक गईं।

     

    काका ने तुरंत दरवाज़े की ओर देखा।

     

    पायल की आवाज़ धीरे-धीरे करीब आती जा रही थी।

     

    छन… छन… छन…

     

    फिर आवाज़ दरवाज़े के ठीक बाहर रुक गई।

     

    तीन सेकंड तक सन्नाटा रहा।

     

    फिर दरवाज़े पर खरोंच की आवाज़ आई।

     

    खर्रर्रर्र…

     

    काका ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “किसी भी हालत में दरवाज़ा मत खोलना।”

     

    खरोंच की आवाज़ बंद हो गई।

     

    फिर एक औरत की आवाज़ आई—

     

    “काका… दरवाज़ा खोलो…”

     

    हरिराम काका काँपने लगे।

     

    अमन ने धीरे से पूछा—

     

    “काका, यह आपको जानती है?”

     

    काका की आँखों में डर उतर आया।

     

    “यह चंद्रा नहीं है।”

     

    “तो कौन है?”

     

    काका ने जवाब दिया—

     

    “उसकी बेटी।”

     

    अचानक दरवाज़ा ज़ोर से हिलने लगा।

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    रवि चीख पड़ा।

     

    अमन ने डायरी कसकर पकड़ ली।

     

    तभी काका ने दीवार के पीछे बने एक छोटे दरवाज़े की ओर इशारा किया।

     

    “उस रास्ते से निकलो!”

     

    तीनों पीछे के रास्ते से बाहर भागे।

     

    कुछ देर बाद जब वे सुरक्षित जगह पहुँचे तो अमन ने डायरी फिर खोली।

     

    एक आख़िरी पन्ने पर कुछ लिखा था।

     

    स्याही धुंधली थी, लेकिन शब्द पढ़े जा सकते थे—

     

    “चंद्रा मरी नहीं थी। उसे तहखाने में जिंदा बंद किया गया था।”

     

    अमन के हाथ काँपने लगे।

     

    “काका… किसने बंद किया था?”

     

    काका ने जवाब नहीं दिया।

     

    उन्होंने सिर झुका लिया।

     

    अमन ने डायरी का अगला पन्ना पलटा।

     

    वहाँ एक नाम लिखा था।

     

    हरिराम।

     

    अमन ने धीरे-धीरे काका की ओर देखा।

     

    “यह क्या है?”

     

    हरिराम काका की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “मैंने दरवाज़ा बंद किया था।”

     

    रवि पीछे हट गया।

     

    “आपने?”

     

    “मैं मजबूर था।”

     

    “किसने मजबूर किया?”

     

    काका कुछ बोलते, उससे पहले कमरे की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    अंधेरा।

     

    फिर एक लाल रोशनी कमरे के कोने में दिखाई दी।

     

    वही लाल साड़ी।

     

    वही लंबे बाल।

     

    लेकिन इस बार उसके साथ एक छोटी बच्ची भी खड़ी थी।

     

    बच्ची का चेहरा नीचे झुका हुआ था।

     

    चंद्रा की आवाज़ गूँजी—

     

    “सच… अभी पूरा नहीं हुआ।”

     

    अमन ने काँपते हुए पूछा—

     

    “तुम चाहती क्या हो?”

     

    औरत ने धीरे-धीरे अपना हाथ उठाया।

     

    उसकी उंगली सीधे हरिराम काका की ओर थी।

     

    “जिसने दरवाज़ा बंद किया था…”

     

    हरिराम काका रो पड़े।

     

    “मुझे माफ़ कर दो।”

     

    चंद्रा की आवाज़ अचानक भयानक चीख में बदल गई—

     

    “मुझे नहीं… मेरी बेटी से माफी माँगो!”

     

    छोटी बच्ची ने अपना चेहरा ऊपर उठाया।

     

    उसका चेहरा देखकर अमन की चीख निकल गई।

     

    उसकी आँखें नहीं थीं।

     

    सिर्फ दो गहरे काले गड्ढे थे।

     

    अगले ही पल दोनों गायब हो गए।

     

    कमरे की लाइट वापस आ गई।

     

    लेकिन हरिराम काका भी गायब थे।

     

    उनकी जगह फर्श पर सिर्फ एक लाल चूड़ी पड़ी थी।

     

    और दीवार पर खून से लिखा था—

     

    “आज रात तहखाना खुलेगा।”

  • 😱 लाल चुड़ैल 😱

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    😱(भाग 1 — लाल साड़ी वाली औरत)😱

     

     

    उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव बरवा में शाम के बाद लोग घरों से बाहर निकलना पसंद नहीं करते थे। गाँव के आख़िरी छोर पर एक पुराना बरगद का पेड़ था। उसके पास एक टूटी हुई हवेली खड़ी थी, जिसे लोग लाल हवेली कहते थे।

     

    कहते थे कि उस हवेली में लगभग तीस साल पहले एक औरत रहती थी—चंद्रा।

     

    चंद्रा की शादी गाँव के एक ज़मींदार परिवार में हुई थी। शादी के कुछ ही महीनों बाद उसके पति की रहस्यमय तरीके से मौत हो गई। गाँव वालों ने कहा कि वह कुएँ में गिर गया था, लेकिन कुछ लोगों का मानना था कि उसकी मौत के पीछे कोई और राज़ था।

     

    पति की मौत के बाद चंद्रा हमेशा लाल साड़ी पहनकर हवेली की छत पर बैठी रहती थी। एक रात अचानक हवेली में आग लग गई।

     

    सुबह तक सब कुछ राख हो चुका था।

     

    लेकिन चंद्रा की लाश कभी नहीं मिली।

     

    उस दिन के बाद से गाँव में एक अजीब बात शुरू हुई।

     

    हर अमावस्या की रात, गाँव की पगडंडी पर एक औरत दिखाई देती थी।

     

    लाल साड़ी में।

     

    लंबे खुले बाल।

     

    चेहरा घूँघट से ढका हुआ।

     

    और उसके पैरों के निशान…

     

    हमेशा उल्टे होते थे।

     

    गाँव के बुज़ुर्ग कहते थे—

     

    “वो चंद्रा नहीं है… वो अब लाल चुड़ैल बन चुकी है।”

     

    लोग उस रास्ते से रात में गुजरना तो दूर, दिन में भी अकेले नहीं जाते थे।

     

    लेकिन गाँव में रहने वाला अमन इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।

     

    अमन शहर में पढ़ाई करके कुछ दिनों के लिए गाँव आया था। वह इन भूत-प्रेत की कहानियों को गाँव वालों का अंधविश्वास समझता था।

     

    एक शाम वह अपने दोस्त रवि के साथ चाय की दुकान पर बैठा था।

     

    रवि ने अचानक कहा, “आज अमावस्या है। रात को बाहर मत निकलना।”

     

    अमन हँस पड़ा।

     

    “तुम भी इन बातों पर विश्वास करते हो?”

     

    रवि ने उसकी तरफ गंभीरता से देखा।

     

    “मैंने उसे देखा है।”

     

    अमन की हँसी रुक गई।

     

    “किसे?”

     

    “लाल चुड़ैल को।”

     

    रवि ने धीरे से बताया, “दो साल पहले मैं रात में खेत से लौट रहा था। लाल हवेली के पास मुझे किसी औरत के रोने की आवाज़ सुनाई दी। मैंने सोचा कोई मुसीबत में है। मैं उसके पास गया।”

     

    “फिर?”

     

    “उसने मुझसे पूछा—‘तुमने उसे कहाँ छिपाया है?’”

     

    अमन ने पूछा, “किसे?”

     

    रवि की आँखों में डर उतर आया।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    कुछ देर दोनों चुप रहे।

     

    तभी चाय की दुकान के पीछे बैठे बूढ़े हरिराम काका बोले—

     

    “अगर अपनी जान प्यारी है तो आज रात लाल हवेली के पास मत जाना।”

     

    अमन ने मुस्कुराते हुए पूछा, “काका, आपने भी उसे देखा है?”

     

    हरिराम काका ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “देखा नहीं बेटा… उसके हाथों से बचा हूँ।”

     

    अमन कुछ पूछ पाता, उससे पहले काका उठकर वहाँ से चले गए।

     

    रात लगभग साढ़े ग्यारह बजे अमन अपने कमरे में सोने की कोशिश कर रहा था।

     

    अचानक—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    खिड़की पर किसी ने दस्तक दी।

     

    अमन उठकर बैठ गया।

     

    उसने खिड़की खोली।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    हवा भी बिल्कुल बंद थी।

     

    वह वापस बिस्तर पर आया ही था कि फिर आवाज़ आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज़ कमरे के दरवाज़े से आई।

     

    अमन धीरे-धीरे दरवाज़े के पास गया।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    उसने दरवाज़ा खोला।

     

    बाहर अँधेरा था।

     

    लेकिन फर्श पर कुछ पड़ा था।

     

    एक लाल चूड़ी।

     

    अमन ने उसे उठाया।

     

    उसी पल उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “मुझे… मेरा सामान वापस चाहिए…”

     

    अमन झटके से पीछे मुड़ा।

     

    कोई नहीं था।

     

    उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    सुबह होते ही उसने रवि को सब बताया।

     

    रवि ने लाल चूड़ी देखते ही उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “इसे फेंक दो!”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि यह उसकी निशानी है।”

     

    अमन ने कहा, “मैं आज रात लाल हवेली जाऊँगा।”

     

    रवि ने उसे रोकने की कोशिश की।

     

    लेकिन अमन नहीं माना।

     

    रात के करीब बारह बजे दोनों टॉर्च लेकर हवेली की ओर निकल पड़े।

     

    आसमान में चाँद नहीं था।

     

    पेड़ों के बीच से गुजरती हवा किसी के रोने जैसी आवाज़ कर रही थी।

     

    जैसे ही वे हवेली के पास पहुँचे, अमन की टॉर्च अचानक बंद हो गई।

     

    “बैटरी खत्म?” रवि ने पूछा।

     

    “अभी तो नई डाली थी।”

     

    तभी हवेली के अंदर से एक धीमी आवाज़ आई—

     

    छन… छन… छन…

     

    पायल की आवाज़।

     

    रवि ने अमन का हाथ पकड़ लिया।

     

    “चल वापस।”

     

    लेकिन अमन आगे बढ़ता गया।

     

    हवेली का मुख्य दरवाज़ा आधा खुला था।

     

    उन्होंने उसे धक्का दिया।

     

    क्रीईईईक…

     

    अंदर धूल और मकड़ी के जालों से पूरा कमरा भरा हुआ था।

     

    दीवार पर पुराने चित्र लगे थे।

     

    एक तस्वीर के सामने अमन रुक गया।

     

    वह चंद्रा की तस्वीर थी।

     

    लाल साड़ी।

     

    लंबे बाल।

     

    और माथे पर बड़ी लाल बिंदी।

     

    अमन तस्वीर को ध्यान से देख ही रहा था कि उसे कुछ अजीब दिखाई दिया।

     

    तस्वीर की आँखों से…

     

    खून जैसे लाल आँसू बह रहे थे।

     

    अमन पीछे हट गया।

     

    रवि काँपते हुए बोला—

     

    “अमन… तस्वीर को मत देख।”

     

    तभी ऊपर की मंज़िल से किसी के चलने की आवाज़ आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    दोनों ने ऊपर देखा।

     

    सीढ़ियों के आख़िरी छोर पर एक औरत खड़ी थी।

     

    लाल साड़ी।

     

    लंबे बाल।

     

    चेहरा पूरी तरह बालों से ढका हुआ।

     

    अमन ने टॉर्च उसकी तरफ की।

     

    औरत ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।

     

    फिर उसने अपना चेहरा ऊपर किया।

     

    चेहरा नहीं था।

     

    सिर्फ काली, खाली आँखें थीं।

     

    रवि चीख पड़ा।

     

    दोनों पीछे भागे।

     

    लेकिन दरवाज़ा बंद हो चुका था।

     

    औरत की आवाज़ पूरे कमरे में गूँजी—

     

    “मेरा… हार… कहाँ है?”

     

    अमन ने काँपते हुए अपनी जेब टटोली।

     

    उसे याद आया कि लाल चूड़ी उठाते समय उसे फर्श पर एक छोटा-सा पुराना लॉकेट भी मिला था।

     

    वह लॉकेट उसने जेब में रख लिया था।

     

    अचानक उसकी जेब गर्म होने लगी।

     

    औरत ने चीखकर कहा—

     

    “तुमने उसे छुआ है…”

     

    दीवारें काँपने लगीं।

     

    खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं।

     

    रवि बेहोश होकर गिर पड़ा।

     

    अमन ने लॉकेट निकालकर जमीन पर फेंक दिया।

     

    औरत अचानक गायब हो गई।

     

    दरवाज़ा खुल गया।

     

    अमन ने रवि को उठाया और दोनों हवेली से बाहर भागे।

     

    लेकिन बाहर निकलते समय अमन ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    हवेली की ऊपरी खिड़की में वही लाल साड़ी वाली औरत खड़ी थी।

     

    उसने धीरे से अपना हाथ उठाया।

     

    और अपनी उंगली से अमन की ओर इशारा किया।

     

    फिर उसके होंठ हिले—

     

    “अब अगली रात तुम्हारी है…”

     

    अमन ने नीचे देखा।

     

    उसके पैरों के पास वही लाल लॉकेट पड़ा था।

     

    और उसके ऊपर ताज़ा खून से सिर्फ एक शब्द लिखा था—

     

    “वापस।”

  • 😱भूतिया पार्लर 👻💄(Last part-3)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    शीशा टूटते ही पूरे पार्लर में भयानक सन्नाटा छा गया।

     

    अमन, सोनू, दीपक और राकेश कुछ समझ नहीं पा रहे थे।

     

    जमुना दादी लगातार रो रही थीं।

     

    उन्होंने काँपते हुए कहा—

     

    “हमें पुलिस को सब बताना होगा।”

     

    लेकिन तभी टूटे हुए शीशे के एक टुकड़े में कुसुम का चेहरा दिखाई दिया।

     

    उसने कहा—

     

    “सच सामने आएगा… लेकिन एक आखिरी काम बाकी है।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    शीशे में दिखाई दे रही कुसुम ने पार्लर के एक कोने की तरफ इशारा किया।

     

    वहाँ एक पुराना लकड़ी का संदूक पड़ा था।

     

    अमन ने संदूक खोला।

     

    उसमें सजनी की डायरी थी।

     

    डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर मेरे साथ कुछ हो जाए तो मेरी मौत को हादसा मत समझना। मुझे पता है कि गाँव में कौन लड़कियों को डराता और उनके साथ धोखा करता है। अगर मैं नहीं रही तो मेरी डायरी सच बताएगी।”

     

    डायरी में उन लोगों के नाम लिखे थे।

     

    गाँव के तीन प्रभावशाली आदमी।

     

    उनमें से एक का नाम था बलदेव सिंह।

     

    बलदेव गाँव का बहुत रसूखदार आदमी था।

     

    लोग उससे डरते थे।

     

    अमन ने डायरी लेकर गाँव की पंचायत में सबके सामने सच बता दिया।

     

    पहले तो बलदेव ने सब कुछ झूठ कहा।

     

    लेकिन डायरी में लिखे पुराने सबूत और सजनी की हड्डियाँ देखकर गाँव वालों को सच्चाई समझ आ गई।

     

    पुलिस को बुलाया गया।

     

    जाँच शुरू हुई।

     

    कई साल पुराने राज खुलने लगे।

     

    बलदेव और उसके साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया।

     

    उस रात गाँव के लोगों ने सजनी और कुसुम के लिए प्रार्थना की।

     

    लेकिन अमन के मन में एक सवाल था—

     

    अगर अपराधियों को पकड़ लिया गया है, तो क्या भूतिया पार्लर का रहस्य खत्म हो गया?

     

    रात करीब बारह बजे वह अकेला पार्लर के सामने खड़ा था।

     

    अचानक अंदर से आवाज आई—

     

    “अमन…”

     

    उसने दरवाजा खोला।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    उसने टॉर्च जलाई।

     

    सामने टूटा हुआ शीशा था।

     

    लेकिन इस बार शीशे में उसका प्रतिबिंब नहीं था।

     

    उसकी जगह सजनी खड़ी थी।

     

    सजनी ने लाल साड़ी पहन रखी थी।

     

    चेहरे पर शांति थी।

     

    उसने कहा—

     

    “मेरा आखिरी काम बाकी है।”

     

    अमन ने डरते हुए पूछा—

     

    “क्या?”

     

    सजनी ने एक पुरानी कुर्सी की ओर इशारा किया।

     

    वहाँ कुसुम बैठी थी।

     

    उसकी आँखें बंद थीं।

     

    सजनी बोली—

     

    “उस रात मैं कुसुम को बचाना चाहती थी। लेकिन मैं उसे बचा नहीं सकी। अब उसकी आत्मा तब तक नहीं जाएगी, जब तक उसका अधूरा श्रृंगार पूरा नहीं होगा।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “लेकिन उसका श्रृंगार कौन करेगा?”

     

    सजनी मुस्कुराई।

     

    “तुम नहीं।”

     

    अचानक पार्लर के दरवाजे पर गाँव की कुछ महिलाएँ दिखाई दीं।

     

    उनमें कुसुम की माँ भी थी।

     

    वह रोते हुए आगे बढ़ी।

     

    कुसुम की आत्मा ने अपनी माँ को देखा।

     

    माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “बेटी… अब घर चल।”

     

    इतना सुनते ही कुसुम की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    उसके चेहरे पर पहली बार डर नहीं था।

     

    सजनी ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब यह दुल्हन पूरी हो गई।”

     

    धीरे-धीरे कुसुम की आत्मा धुएँ में बदलने लगी।

     

    फिर सजनी भी उसके साथ धुंधली होने लगी।

     

    अमन ने आखिरी बार पूछा—

     

    “क्या तुम दोनों अब मुक्त हो जाओगी?”

     

    सजनी ने कहा—

     

    “हाँ… क्योंकि अब सच छिपा नहीं है।”

     

    दोनों आकृतियाँ धीरे-धीरे गायब हो गईं।

     

    उसी क्षण पार्लर के अंदर रखा पुराना हेयर ड्रायर अपने आप बंद हो गया।

     

    घड़ी की सुई बारह बजकर एक मिनट पर रुक गई।

     

    और फिर…

     

    सब कुछ शांत हो गया।

     

    अगली सुबह गाँव वालों ने पार्लर को हमेशा के लिए बंद करने के बजाय उसे एक नई जगह में बदलने का फैसला किया।

     

    उस जगह पर गाँव की लड़कियों के लिए सिलाई और ब्यूटी का प्रशिक्षण केंद्र बनाया गया।

     

    दरवाजे पर एक बोर्ड लगाया गया—

     

    “सजनी महिला प्रशिक्षण केंद्र”

     

    नीचे एक छोटी-सी पंक्ति लिखी गई—

     

    “डर को छिपाने से वह बढ़ता है, लेकिन सच का सामना करने से डर खत्म हो जाता है।”

     

    कई साल बाद भी गाँव के बुजुर्ग उस घटना को याद करते हैं।

     

    लोग कहते हैं कि अमावस्या की रात कभी-कभी उस पुराने पार्लर की खिड़की में हल्की-सी रोशनी दिखाई देती है।

     

    कभी-कभी शीशे में लाल साड़ी पहने एक औरत भी दिखाई देती है।

     

    लेकिन अब वह किसी को डराती नहीं।

     

    वह सिर्फ कुछ पल के लिए दिखाई देती है…

     

    और फिर गायब हो जाती है।

     

    गाँव की बूढ़ी जमुना दादी कहती हैं—

     

    “वो भूत नहीं है… वो हमें याद दिलाने आती है कि किसी के साथ गलत होते देखकर चुप मत रहना।”

     

    कहानी की सीख

     

    इस कहानी की सबसे बड़ी सीख यही है कि हर डर के पीछे भूत नहीं होता और हर अफवाह सच नहीं होती। कई बार असली डर इंसानों के गलत कामों से पैदा होता है।

     

    अगर किसी के साथ अन्याय हो रहा हो, तो डरकर चुप नहीं रहना चाहिए। सच बोलने वाला इंसान अकेला जरूर पड़ सकता है, लेकिन उसका साहस किसी दूसरे की जिंदगी बचा सकता है।

     

    और सबसे जरूरी बात—

     

    अंधविश्वास से डरने के बजाय सच्चाई को समझना चाहिए, क्योंकि अंधेरा चाहे कितना भी गहरा हो, एक छोटी-सी रोशनी उसे खत्म कर सकती है।

     

     

    Story pasand aai ho to comment jarur  kare.

     

    End