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लेखक: Alka Singh

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Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

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  • पापों का शहर (भाग 3 )

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    अर्जुन की हथेली में पड़ी चाबी लगातार काँप रही थी।

     

    उस पर जंग लगी थी और ऊपर सिर्फ दो शब्द खुदे थे—

     

    कमरा नंबर 13।

     

    अर्जुन ने चाबी को गौर से देखा।

     

    “यह चाबी कहाँ की है?”

     

    गोविंद ने जैसे ही उसे देखा, उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “इसे फेंक दो।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि इस होटल में कमरा नंबर 13 कभी था ही नहीं।”

     

    अर्जुन ने हैरानी से पूछा—

     

    “लेकिन चाबी…?”

     

    गोविंद ने उसकी बात काट दी।

     

    “मैंने कहा इसे फेंक दो।”

     

    अर्जुन ने चाबी मुट्ठी में कस ली।

     

    “नहीं।”

     

    गोविंद ने उसे घूरकर देखा।

     

    “तुम नहीं समझ रहे। इस चाबी के पीछे जितनी मौतें हैं, उतनी शायद पूरे शहर में भी नहीं।”

     

    “मुझे अपने पिता के बारे में जानना है।”

     

    गोविंद चुप हो गया।

     

    कुछ देर बाद उसने धीमी आवाज में कहा—

     

    “तो फिर तुम्हें होटल की पुरानी इमारत में जाना होगा।”

     

    “कहाँ?”

     

    गोविंद ने ऊपर की ओर देखा।

     

    “छत के नीचे एक मंजिल है, जो अब इस्तेमाल नहीं होती।”

     

    “क्या वहाँ कमरा 13 है?”

     

    गोविंद ने जवाब नहीं दिया।

     

    रात के करीब एक बजे दोनों सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।

     

    होटल की ऊपरी मंजिल पर पहुँचकर अर्जुन ने देखा कि वहाँ मोटी धूल जमा थी।

     

    दीवारों पर पुराने कमरों के नंबर लिखे थे—

     

    9…

     

    10…

     

    11…

     

    12…

     

    और फिर…

     

    दीवार खत्म हो गई।

     

    कमरा 13 कहीं नहीं था।

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “देखा? यहाँ कुछ नहीं है।”

     

    अर्जुन ने चाबी हाथ में ली।

     

    उसी क्षण दीवार के अंदर से हल्की-सी आवाज आई।

     

    खर्र… खर्र…

     

    जैसे कोई अंदर से नाखूनों से दीवार खुरच रहा हो।

     

    अर्जुन ने दीवार पर हाथ रखा।

     

    ठंडी थी।

     

    अचानक वहाँ एक दरवाजा उभर आया।

     

    गोविंद पीछे हट गया।

     

    “हे भगवान…”

     

    दरवाजे पर पीतल की पट्टी लगी थी—

     

    13

     

    अर्जुन ने चाबी ताले में लगाई।

     

    ताला अपने आप घूम गया।

     

    दरवाजा खुला।

     

    अंदर एक लंबा कमरा था।

     

    कमरे में पुराने अखबार, तस्वीरें और फाइलें बिखरी पड़ी थीं।

     

    दीवार पर एक बड़ा नक्शा लगा था।

     

    उसमें पूरे कालपुर के घरों पर लाल निशान बने थे।

     

    अर्जुन धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    एक मेज पर उसे पुरानी फाइल मिली।

     

    ऊपर लिखा था—

     

    “कालपुर अपराध अभिलेख — गोपनीय।”

     

    उसने फाइल खोली।

     

    पहला नाम था—

     

    रघुवीर चौहान।

     

    दूसरा—

     

    सावित्री देवी।

     

    तीसरा—

     

    इंस्पेक्टर नरेश।

     

    चौथा—

     

    गोविंद।

     

    अर्जुन की नजर ठहर गई।

     

    “आपका नाम भी है।”

     

    गोविंद ने सिर झुका लिया।

     

    “मैंने कहा था न, मैं निर्दोष नहीं हूँ।”

     

    “आपने क्या किया था?”

     

    गोविंद की आवाज भारी हो गई।

     

    “मैंने मीरा को देखा था।”

     

    अर्जुन ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

     

    “कब?”

     

    “उस रात।”

     

    “क्या हुआ था?”

     

    गोविंद कुछ बोल पाता, उससे पहले कमरे की बत्ती अपने आप जल गई।

     

    दीवार पर एक प्रोजेक्टर जैसा प्रकाश पड़ा।

     

    और एक पुराना दृश्य चलने लगा।

     

    एक लड़की भाग रही थी।

     

    वह मीरा थी।

     

    उसके हाथ में एक फाइल थी।

     

    पीछे तीन आदमी उसका पीछा कर रहे थे।

     

    मीरा चिल्लाई—

     

    “मुझे छोड़ दो!”

     

    उनमें से एक आदमी का चेहरा साफ दिखाई दिया।

     

    अर्जुन का दिल रुक गया।

     

    वह उसके पिता थे।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?”

     

    अर्जुन के पिता ने जवाब दिया—

     

    “क्योंकि तुम्हारे पास ऐसा सबूत है जो बहुत लोगों को बर्बाद कर देगा।”

     

    “तो सच सामने आने दीजिए।”

     

    “सच से ज्यादा जरूरी है परिवार।”

     

    मीरा रो पड़ी।

     

    “आप भी?”

     

    अचानक दृश्य खत्म हो गया।

     

    अर्जुन ने अपने सिर पर हाथ रख लिया।

     

    “मेरे पिता ने…?”

     

    गोविंद बोला—

     

    “उन्होंने मीरा को नहीं मारा था।”

     

    अर्जुन ने राहत की साँस ली।

     

    “फिर?”

     

    “उन्होंने उसे उस जगह पहुँचाया जहाँ से वह वापस नहीं आई।”

     

    “कहाँ?”

     

    गोविंद ने कमरे के फर्श की तरफ इशारा किया।

     

    फर्श के बीच एक लोहे का ढक्कन था।

     

    अर्जुन ने उसे उठाया।

     

    नीचे अँधेरी सीढ़ियाँ थीं।

     

    सीढ़ियाँ जमीन के बहुत नीचे जा रही थीं।

     

    नीचे से सड़ांध की गंध आ रही थी।

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “यही कालपुर का असली पेट है।”

     

    दोनों नीचे उतरने लगे।

     

    सीढ़ियाँ खत्म हुईं तो एक विशाल सुरंग सामने थी।

     

    दीवारों पर हजारों नाम लिखे थे।

     

    कुछ नामों पर काला रंग लगा था।

     

    कुछ पर लाल।

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “इनका मतलब?”

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “लाल मतलब पाप स्वीकार किया।”

     

    “और काला?”

     

    “पाप छिपाया।”

     

    अचानक सामने से बच्चे के रोने की आवाज आई।

     

    “माँ…”

     

    अर्जुन उस दिशा में बढ़ा।

     

    एक छोटे कमरे में उसे लकड़ी का पिंजरा मिला।

     

    अंदर कोई नहीं था।

     

    लेकिन पिंजरे की दीवार पर लिखा था—

     

    “जिसे समाज ने दोषी कहा, वह हमेशा दोषी नहीं होता।”

     

    अर्जुन को अपने पुराने केस याद आने लगे।

     

    उसने कितनी बार बिना पूरी सच्चाई जाने लोगों को दोषी ठहराया था।

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “तीसरा पाप।”

     

    अर्जुन पलटा।

     

    मीरा उसके पीछे खड़ी थी।

     

    उसकी आँखों में आँसू थे।

     

    “विश्वासघात।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “तुम्हारे साथ किसने विश्वासघात किया?”

     

    मीरा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पिता ने।”

     

    “लेकिन उन्होंने तुम्हें नहीं मारा।”

     

    “मुझे मौत ने नहीं मारा।”

     

    “फिर?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “मुझे उस आदमी की चुप्पी ने मारा, जिस पर मुझे सबसे ज्यादा भरोसा था।”

     

    अर्जुन की आँखें भर आईं।

     

    “मेरे पिता ने आखिर किया क्या?”

     

    मीरा ने एक पुराना लिफाफा उसकी तरफ बढ़ाया।

     

    “यह उन्होंने तुम्हारे लिए छोड़ा था।”

     

    अर्जुन ने लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक पत्र था।

     

    “अर्जुन,

     

    अगर तुम यह पत्र पढ़ रहे हो, तो शायद कालपुर ने तुम्हें भी बुला लिया है।

     

    मैंने जो किया, उसके लिए मेरे पास कोई बहाना नहीं।

     

    मैंने मीरा को बचाने के बजाय उसे उन लोगों के हवाले कर दिया जिनसे वह लड़ रही थी।

     

    लेकिन मैं उसे मरते हुए नहीं देख सका।

     

    मैंने उसे एक गुप्त सुरंग के रास्ते बाहर भेज दिया।

     

    अगर वह जीवित रही होगी, तो तुम्हें सच बताएगी।

     

    लेकिन अगर वह मर गई…

     

    तो समझना कि मैंने उसे नहीं, अपने डर को चुना था।

     

    — तुम्हारा पिता”

     

    अर्जुन ने पत्र नीचे कर लिया।

     

    “तो मीरा…”

     

    पीछे से आवाज आई—

     

    “मैं मरी नहीं थी।”

     

    अर्जुन ने पलटकर देखा।

     

    मीरा वहाँ खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं था।

     

    उसने कहा—

     

    “मुझे इस शहर ने छिपा दिया था।”

     

    “कहाँ?”

     

    “यहीं।”

     

    अचानक जमीन काँपने लगी।

     

    दीवारों पर लिखे हजारों नाम चमकने लगे।

     

    और एक विशाल काली आकृति सुरंग के आखिरी छोर से बाहर आने लगी।

     

    गोविंद चीख पड़ा—

     

    “यह आ गया!”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    गोविंद ने काँपते हुए कहा—

     

    “कालपुर का असली मालिक।”

     

    काली आकृति धीरे-धीरे आगे बढ़ी।

     

    उसका चेहरा नहीं था।

     

    बस दो लाल आँखें थीं।

     

    उसने अर्जुन की तरफ हाथ बढ़ाया।

     

    और उसकी आवाज पूरे तहखाने में गूँज उठी—

     

    “तुमने तीन पाप देख लिए हैं… अब चौथा तुम्हारा अपना है।”

     

    अर्जुन पीछे हट गया।

     

    अचानक उसके सामने एक दृश्य उभरा—

     

    एक सड़क…

     

    एक कार…

     

    एक दुर्घटना…

     

    और ड्राइविंग सीट पर बैठा था…

     

    खुद अर्जुन।

     

    उसकी साँस रुक गई।

     

    मीरा ने धीरे से कहा—

     

    “अब तुम्हें याद करना होगा… उस रात तुमने किसे मारा था।”

     

    अर्जुन ने सिर पकड़ लिया।

     

    उसे कुछ याद नहीं था।

     

    लेकिन अगले ही पल उसकी स्मृति में एक आवाज गूँजी—

     

    “अर्जुन, गाड़ी मत चलाओ…”

     

    और उसके बाद…

     

    एक जोरदार टक्कर।

     

    अँधेरा।

     

    और एक बच्चे की चीख।

     

    काली आकृति मुस्कुराई।

     

    “चौथा पाप…”

     

    उसने फुसफुसाकर कहा—

     

    “हत्या।”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • पापों का शहर ( भाग 2 )

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    अर्जुन देर तक सड़क के किनारे खड़ा उस काले निशान को देखता रहा।

     

    जिस आदमी की कुछ मिनट पहले मौत हुई थी, उसका शरीर पुलिस ले जा चुकी थी। लेकिन जमीन पर बची राख अभी भी धुआँ दे रही थी।

     

    अर्जुन ने झुककर राख को छूना चाहा।

     

    “मत छूना।”

     

    पीछे से गोविंद की आवाज आई।

     

    अर्जुन ने हाथ रोक लिया।

     

    “क्यों?”

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “क्योंकि कालपुर में जो राख छोड़कर मरता है, उसकी कहानी वहीं खत्म नहीं होती।”

     

    अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आप आखिर जानते कितना हैं?”

     

    गोविंद कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “जितना जानता हूँ, उतना किसी को नहीं जानना चाहिए।”

     

    “फिर मुझे बताइए।”

     

    “तुम यहाँ से चले जाओ।”

     

    “मैं नहीं जाऊँगा।”

     

    गोविंद ने गहरी साँस ली।

     

    “ठीक है। लेकिन जो देखोगे, उसके बाद शायद तुम खुद जाना चाहोगे।”

     

    दोनों होटल के अंदर लौट आए।

     

    गोविंद ने कमरे का दरवाजा बंद किया और एक पुराना लोहे का संदूक खोला।

     

    उसमें कई तस्वीरें थीं।

     

    हर तस्वीर में एक आदमी या औरत था।

     

    कुछ तस्वीरों पर लाल निशान लगा था।

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “ये लोग कौन हैं?”

     

    गोविंद बोला—

     

    “कालपुर के लोग।”

     

    “और ये लाल निशान?”

     

    “उनका पाप।”

     

    अर्जुन ने एक तस्वीर उठाई।

     

    एक आदमी बहुत सम्मानित नेता जैसा दिख रहा था।

     

    उसके नीचे लिखा था—

     

    “रघुवीर चौहान — झूठ।”

     

    दूसरी तस्वीर पर लिखा था—

     

    “सावित्री देवी — लालच।”

     

    तीसरी पर—

     

    “इंस्पेक्टर नरेश — रिश्वत।”

     

    अर्जुन की नजर चौथी तस्वीर पर जाकर रुक गई।

     

    उसमें एक लड़की थी।

     

    लगभग पच्चीस साल की।

     

    चेहरा बेहद शांत।

     

    नीचे नाम लिखा था—

     

    “मीरा — सच।”

     

    अर्जुन ने चौंककर पूछा—

     

    “यह लड़की कौन है?”

     

    गोविंद ने तुरंत तस्वीर उसके हाथ से ले ली।

     

    “इसके बारे में मत पूछो।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि कालपुर की कहानी की शुरुआत इसी से हुई थी।”

     

    अर्जुन ने जोर देकर पूछा—

     

    “क्या हुआ था इसके साथ?”

     

    गोविंद की आँखें भर आईं।

     

    “पंद्रह साल पहले मीरा इस शहर में आई थी। वह यहाँ के लोगों के पापों का रिकॉर्ड रखती थी।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उसका पिता इस शहर के बड़े लोगों के खिलाफ सबूत इकट्ठा कर रहा था।”

     

    “फिर?”

     

    “एक रात उसका पिता गायब हो गया।”

     

    “और मीरा?”

     

    “उसने खोज जारी रखी।”

     

    गोविंद कुछ पल रुका।

     

    “लेकिन एक रात वह भी गायब हो गई।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “क्या वह भी मर गई?”

     

    गोविंद ने सिर हिलाया।

     

    “लोग कहते हैं, हाँ।”

     

    “लेकिन?”

     

    “मैंने उसकी लाश कभी नहीं देखी।”

     

    कमरे में अचानक खामोशी छा गई।

     

    तभी होटल के बाहर घड़ी की आवाज आई।

     

    टन…

     

    अर्जुन ने घड़ी देखी।

     

    रात के बारह बजने वाले थे।

     

    गोविंद ने तुरंत खिड़की बंद कर दी।

     

    “आज बाहर मत जाना।”

     

    “क्यों?”

     

    “आज दूसरा पाप जागेगा।”

     

    घड़ी ने बारह बजाए।

     

    टन…

     

    पहली घंटी।

     

    टन…

     

    दूसरी।

     

    टन…

     

    अर्जुन गिनता रहा।

     

    बारहवीं घंटी के बाद सब शांत हो गया।

     

    फिर—

     

    टन…

     

    तेरहवीं घंटी।

     

    होटल की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    इस बार आवाज होटल के नीचे से आई।

     

    किसी महिला की चीख।

     

    “बचाओ!”

     

    अर्जुन ने दरवाजा खोला।

     

    गोविंद ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मत जाओ।”

     

    “वहाँ कोई है।”

     

    “वह कोई इंसान नहीं है।”

     

    लेकिन अर्जुन हाथ छुड़ाकर सीढ़ियों से नीचे उतर गया।

     

    होटल का तहखाना वर्षों से बंद था।

     

    फिर भी उसका दरवाजा खुला हुआ था।

     

    अंदर से ठंडी हवा आ रही थी।

     

    दीवारों पर काले हाथों के निशान बने थे।

     

    अर्जुन ने मोबाइल की रोशनी आगे की।

     

    एक कमरे के बीचोंबीच एक औरत बैठी थी।

     

    वह लगातार रो रही थी।

     

    “आप ठीक हैं?”

     

    औरत ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

     

    उसका चेहरा देखकर अर्जुन पीछे हट गया।

     

    उसकी आँखें पूरी तरह सफेद थीं।

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “तुम मुझे बचाने आए हो?”

     

    अर्जुन ने कुछ नहीं कहा।

     

    औरत ने पूछा—

     

    “क्या तुमने कभी किसी निर्दोष को दोषी बनाया है?”

     

    अर्जुन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उसके सामने दीवार पर दृश्य उभरने लगे।

     

    एक अदालत।

     

    एक निर्दोष आदमी।

     

    और अर्जुन की पुरानी रिपोर्ट।

     

    उसकी रिपोर्ट के कारण उस आदमी को जेल हुई थी।

     

    अर्जुन ने तब कभी यह जानने की कोशिश नहीं की थी कि वह वास्तव में दोषी था या नहीं।

     

    क्योंकि उसे खबर चाहिए थी।

     

    सच नहीं।

     

    उसने आँखें बंद कर लीं।

     

    “मैं गलत था।”

     

    औरत की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “सच बोलना आसान है।”

     

    “लेकिन क्या तुम उसका परिणाम सहोगे?”

     

    अचानक तहखाने की दीवार पर एक नाम उभरा—

     

    “अर्जुन मिश्रा।”

     

    और उसके नीचे—

     

    “पाप — सच बेचने का।”

     

    अर्जुन का शरीर काँपने लगा।

     

    तभी गोविंद नीचे पहुँचा।

     

    उसने अर्जुन को खींचकर पीछे किया।

     

    “इसे मत देखो!”

     

    लेकिन देर हो चुकी थी।

     

    औरत गायब हो चुकी थी।

     

    कमरे के बीच सिर्फ एक पुरानी कुर्सी थी।

     

    कुर्सी पर वही लाल डायरी रखी थी।

     

    अर्जुन ने डायरी खोली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “कालपुर में सात पाप हैं।”

     

    दूसरे पन्ने पर—

     

    “पहला पाप — लालच।”

     

    तीसरे पर—

     

    “दूसरा पाप — झूठ।”

     

    चौथे पन्ने पर—

     

    “तीसरा पाप — विश्वासघात।”

     

    और आखिरी पन्ने पर—

     

    “सातवाँ पाप तुम्हारा है।”

     

    अर्जुन ने घबराकर डायरी बंद कर दी।

     

    गोविंद का चेहरा सफेद पड़ चुका था।

     

    “क्या हुआ?”

     

    गोविंद ने जवाब नहीं दिया।

     

    “आप जानते हैं मेरा सातवाँ पाप क्या है?”

     

    बूढ़े ने धीरे से कहा—

     

    “हाँ।”

     

    “क्या?”

     

    गोविंद ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “तुम्हारा सातवाँ पाप वह है जिसकी वजह से मीरा गायब हुई थी।”

     

    अर्जुन के शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।

     

    “मैं मीरा को जानता तक नहीं था।”

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “तुम नहीं जानते।”

     

    “लेकिन तुम्हारा परिवार जानता था।”

     

    अर्जुन कुछ बोल नहीं पाया।

     

    गोविंद ने संदूक से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

     

    तस्वीर में मीरा खड़ी थी।

     

    उसके बगल में एक आदमी था।

     

    अर्जुन की साँस रुक गई।

     

    वह आदमी उसके पिता थे।

     

    और तस्वीर के पीछे लिखा था—

     

    “जिस सच को तुम्हारे पिता ने दफनाया था, वही अब तुम्हें खोज रहा है।”

     

    अचानक होटल के बाहर से जोरदार चीख सुनाई दी।

     

    फिर वही तेरहवीं घंटी।

     

    गोविंद ने काँपते हुए कहा—

     

    “अब तीसरा पाप जाग गया है।”

     

    अर्जुन ने खिड़की की तरफ देखा।

     

    पूरे शहर की सड़क पर लोग खड़े थे।

     

    लेकिन उनके चेहरे नहीं थे।

     

    सिर्फ काली, खाली जगह।

     

    और उन सबके पीछे एक लड़की खड़ी थी।

     

    मीरा।

     

    वह सीधे अर्जुन को देख रही थी।

     

    फिर उसने अपने होंठ हिलाए—

     

    “अपने पिता से पूछो… मैं मरी कैसे थी।”

     

    अचानक सारे चेहरे गायब हो गए।

     

    सड़क खाली थी।

     

    लेकिन अर्जुन के हाथ में अब एक पुरानी चाबी थी।

     

    चाबी पर लिखा था—

     

    “कमरा नंबर 13।”

     

    और होटल में कमरा नंबर 13 था ही नहीं।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • पापों का शहर (part -1)

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

     

    शहर का नाम था कालपुर।नक्शे पर वह एक छोटा-सा शहर था, लेकिन आसपास के गाँवों में उसके बारे में अजीब-अजीब बातें कही जाती थीं। लोग कहते थे कि कालपुर में रात होने के बाद कोई अकेला बाहर नहीं निकलता।

     

    क्योंकि वहाँ रात सिर्फ अँधेरा लेकर नहीं आती थी।

     

    वह इंसान के पापों को जगा देती थी।

     

    शहर के बीचोंबीच एक पुरानी घड़ी लगी थी। वह घड़ी दिन में ठीक चलती थी, लेकिन रात के बारह बजते ही उसकी सुइयाँ रुक जाती थीं।

     

    ठीक बारह बजे।

     

    और उसी समय पूरे शहर में एक घंटी बजती थी।

     

    टन… टन… टन…

     

    कहा जाता था कि घंटी की तेरहवीं आवाज सुनने वाला व्यक्ति अपने जीवन का सबसे बड़ा पाप देख लेता था।

     

    इसी शहर में एक रात अर्जुन पहुँचा।

     

    अर्जुन पेशे से पत्रकार था। उसे कालपुर में हो रही रहस्यमयी घटनाओं की खबर मिली थी। पिछले छह महीनों में शहर से सात लोग गायब हो चुके थे।

     

    अजीब बात यह थी कि उनके घरों के दरवाजे अंदर से बंद मिले थे।

     

    किसी घर में चोरी नहीं हुई।

     

    किसी घर में संघर्ष के निशान नहीं थे।

     

    बस एक चीज हर जगह मिली—

     

    काली राख।

     

    अर्जुन ने शहर के पुराने होटल में कमरा लिया।

     

    होटल का मालिक एक बूढ़ा आदमी था, जिसका नाम गोविंद था।

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “यहाँ लोग गायब क्यों हो रहे हैं?”

     

    गोविंद ने उसकी तरफ देखा और धीमे से बोला—

     

    “आप बाहर से आए हैं, इसलिए आपको अभी कुछ पता नहीं।”

     

    “क्या?”

     

    “कालपुर में लोग नहीं गायब होते।”

     

    “फिर?”

     

    “उनके पाप उन्हें ले जाते हैं।”

     

    अर्जुन हँस पड़ा।

     

    “मैं भूत-प्रेत की कहानियों पर विश्वास नहीं करता।”

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “कल रात बारह बजे तक कर लीजिएगा।”

     

    अर्जुन ने बात को मजाक समझकर छोड़ दिया।

     

    रात करीब ग्यारह बजे वह अपने कमरे में बैठकर पुराने दस्तावेज पढ़ रहा था।

     

    बाहर बिल्कुल सन्नाटा था।

     

    अचानक दूर से घड़ी की घंटी सुनाई दी।

     

    टन…

     

    अर्जुन ने घड़ी देखी।

     

    12:00 बजे थे।

     

    टन…

     

    दूसरी घंटी।

     

    टन…

     

    तीसरी।

     

    वह गिनने लगा।

     

    आठ…

     

    नौ…

     

    दस…

     

    ग्यारह…

     

    बारह…

     

    फिर कुछ सेकंड की खामोशी।

     

    अर्जुन ने सोचा कि अब सब खत्म।

     

    लेकिन तभी—

     

    टन…

     

    तेरहवीं घंटी।

     

    कमरे का तापमान अचानक गिर गया।

     

    अर्जुन की साँस से धुआँ निकलने लगा।

     

    उसके सामने रखा लैपटॉप अपने आप बंद हो गया।

     

    फिर कमरे के कोने में किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

     

    “मुझे बचाओ…”

     

    अर्जुन धीरे-धीरे उस दिशा में बढ़ा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    लेकिन दीवार पर एक काली परछाईं दिखाई दे रही थी।

     

    परछाईं धीरे-धीरे एक आदमी का आकार लेने लगी।

     

    अर्जुन पीछे हट गया।

     

    तभी परछाईं ने कहा—

     

    “तुम सच खोजने आए हो?”

     

    अर्जुन ने काँपते हुए पूछा—

     

    “कौन हो?”

     

    परछाईं ने जवाब दिया—

     

    “सच से ज्यादा डरावनी चीज यहाँ कुछ नहीं।”

     

    अचानक कमरे की दीवार पर कई दृश्य दिखाई देने लगे।

     

    एक आदमी पैसे चुरा रहा था।

     

    एक महिला किसी निर्दोष पर झूठा आरोप लगा रही थी।

     

    एक पुलिस वाला रिश्वत ले रहा था।

     

    एक डॉक्टर किसी गरीब मरीज को पैसे के लिए मना कर रहा था।

     

    और फिर…

     

    अर्जुन ने खुद को देखा।

     

    तीन साल पहले की एक घटना।

     

    उसके हाथ में एक फाइल थी।

     

    उसने एक अपराधी के खिलाफ सबूत छिपा दिए थे।

     

    क्योंकि उस अपराधी ने उसे पैसे दिए थे।

     

    अर्जुन का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    “नहीं…”

     

    परछाईं हँसी।

     

    “हर आदमी दूसरों के पाप गिनता है।”

     

    “लेकिन अपने?”

     

    अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

     

    जब उसने आँखें खोलीं, कमरा सामान्य था।

     

    सुबह होते ही वह होटल से बाहर निकला।

     

    लेकिन बाहर का दृश्य देखकर उसके कदम रुक गए।

     

    सड़क के बीचोंबीच एक आदमी खड़ा था।

     

    वही आदमी जिसे अर्जुन ने रात को दीवार पर देखा था।

     

    लेकिन अब वह आदमी असली था।

     

    लोग उसके चारों तरफ खड़े थे।

     

    अचानक वह आदमी चीखने लगा—

     

    “मैंने नहीं किया!”

     

    फिर उसके मुँह से खून निकलने लगा।

     

    वह जमीन पर गिर पड़ा।

     

    लोग पीछे हट गए।

     

    और जहाँ वह गिरा था, वहाँ राख का एक काला निशान रह गया।

     

    गोविंद अर्जुन के पास आया।

     

    “अब समझे?”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “यह कौन था?”

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “शहर का सबसे बड़ा साहूकार।”

     

    “उसने क्या किया?”

     

    गोविंद ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “गरीबों की जमीन हड़पता था।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “उसे किसने मारा?”

     

    गोविंद ने घड़ी की तरफ देखा।

     

    “किसी ने नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    बूढ़े ने धीमे से कहा—

     

    “कालपुर ने।”

     

    अर्जुन के हाथ में पकड़ी फाइल जमीन पर गिर गई।

     

    और उसी समय उसके पीछे किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “अभी छह पाप बाकी हैं।”

     

    अर्जुन ने पलटकर देखा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    लेकिन सड़क की दीवार पर काले अक्षरों में लिखा था—

     

    “पापों का शहर तुम्हारा इंतजार कर रहा है।”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • भूत बंगला — पार्ट 5

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    अमन अपनी परछाई को देखकर पत्थर की तरह खड़ा रह गया।

     

    उसकी परछाई जमीन पर थी, लेकिन वह अमन जैसी नहीं थी। उसके सिर पर दो लंबे सींग थे और उसकी गर्दन असामान्य रूप से लंबी दिखाई दे रही थी।

     

    अमन धीरे-धीरे पीछे हटने लगा।

     

    “ये… ये मेरी परछाई नहीं है।”

     

    समीर उसके सामने आकर खड़ा हो गया।

     

    उसके चेहरे पर अब वह डर नहीं था जो कुछ देर पहले दिखाई दे रहा था।

     

    वह बिल्कुल शांत था।

     

    “तुम्हें आखिरी कमरा खोलना होगा।”

     

    अमन ने पूछा, “अगर मैंने कमरा नहीं खोला तो?”

     

    समीर की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “तो तुम्हारे पिता हमेशा के लिए वहीं कैद रहेंगे।”

     

    अमन ने बंगले की तरफ देखा।

     

    उसके मन में हजारों सवाल घूम रहे थे।

     

    अगर उसके पिता सच में इस बंगले में थे, तो इतने सालों से कहाँ थे?

     

    और अगर वह जिंदा थे, तो उन्होंने कभी घर लौटने की कोशिश क्यों नहीं की?

     

    अचानक पीछे से बच्चे की आवाज आई—

     

    “क्योंकि वह जिंदा नहीं हैं।”

     

    अमन ने मुड़कर देखा।

     

    ठाकुर का बच्चा उसके पीछे खड़ा था।

     

    “तुम झूठ बोल रहे हो,” अमन ने कहा।

     

    बच्चे ने सिर हिलाया।

     

    “तुम्हारे पिता की आत्मा यहाँ है। उनका शरीर बहुत पहले खत्म हो चुका है।”

     

    अमन की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तो मुझे बंगले में क्यों जाना है?”

     

    बच्चे ने कहा—

     

    “क्योंकि उनकी आत्मा के पास तुम्हारी आखिरी परछाई है।”

     

    उसी समय जंगल में तेज हवा चलने लगी।

     

    पेड़ों की शाखाएँ एक-दूसरे से टकराने लगीं।

     

    दूर बंगले का दरवाजा अपने आप खुल गया।

     

    किर्रर्र…

     

    अंदर से पीली रोशनी बाहर आ रही थी।

     

    अमन ने फैसला कर लिया।

     

    “मैं जाऊँगा।”

     

    समीर ने कहा, “मैं भी।”

     

    दोनों बंगले की तरफ चल पड़े।

     

    बंगले के पास पहुँचते ही अमन ने महसूस किया कि हवा बिल्कुल शांत हो गई थी।

     

    इतनी शांति थी कि उनके कदमों की आवाज बहुत तेज सुनाई दे रही थी।

     

    वे अंदर गए।

     

    मुख्य हॉल पहले जैसा नहीं था।

     

    दीवारों पर लगी तस्वीरें गायब थीं।

     

    उनकी जगह काले पर्दे लगे थे।

     

    हॉल के बीचोंबीच एक पुरानी घड़ी थी।

     

    घड़ी की सुइयाँ उल्टी दिशा में घूम रही थीं।

     

    अचानक घड़ी ने बारह बार घंटी बजाई।

     

    टन… टन… टन…

     

    हर घंटी के साथ कमरे की एक-एक खिड़की बंद होती गई।

     

    बारहवीं घंटी के बाद अंधेरा छा गया।

     

    फिर सामने एक दरवाजा दिखाई दिया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “केवल वही अंदर आए, जिसने अपनी परछाई खोई हो।”

     

    अमन ने दरवाजा खोला।

     

    अंदर एक लंबा गलियारा था।

     

    गलियारे के अंत में एक लाल दरवाजा था।

     

    दरवाजे के पीछे से किसी आदमी के रोने की आवाज आ रही थी।

     

    “अमन…”

     

    अमन वहीं रुक गया।

     

    यह आवाज उसके पिता की थी।

     

    वही आवाज जो उसने बचपन में सुनी थी।

     

    “पापा?”

     

    अंदर से जवाब आया—

     

    “बेटा… मुझे यहाँ से निकालो।”

     

    अमन ने दरवाजा खोल दिया।

     

    कमरे के बीच में एक कुर्सी थी।

     

    कुर्सी पर एक आदमी बैठा था।

     

    उसका चेहरा झुका हुआ था।

     

    बाल सफेद हो चुके थे।

     

    अमन की सांस रुक गई।

     

    “पापा…”

     

    आदमी ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

     

    चेहरा बिल्कुल उसके पिता जैसा था।

     

    अमन उसके पास दौड़ा।

     

    लेकिन समीर ने उसे रोक लिया।

     

    “रुको!”

     

    अमन चिल्लाया—

     

    “ये मेरे पापा हैं!”

     

    समीर ने कहा—

     

    “पहले उनकी परछाई देखो।”

     

    अमन ने जमीन की तरफ देखा।

     

    कुर्सी पर बैठे आदमी की कोई परछाई नहीं थी।

     

    अचानक आदमी हँसने लगा।

     

    उसकी आवाज बदल गई।

     

    “तुम्हें अब भी विश्वास नहीं होता?”

     

    उसका चेहरा धीरे-धीरे विकृत होने लगा।

     

    त्वचा काली पड़ गई।

     

    आँखें लाल हो गईं।

     

    और उसके पीछे वही काली औरत दिखाई दी।

     

    वह औरत आगे बढ़ी।

     

    “तुम्हारे पिता ने अपनी परछाई देकर तुम्हें बचाया था।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “किससे?”

     

    औरत ने कहा—

     

    “मुझसे नहीं… उससे।”

     

    कमरे की दीवार अचानक फट गई।

     

    दीवार के पीछे एक विशाल काली आकृति दिखाई दी।

     

    उसका शरीर धुएँ से बना था।

     

    उसके चेहरे पर कोई आँखें नहीं थीं।

     

    फिर भी वह अमन को देख रही थी।

     

    अमन समझ गया।

     

    यही वह शक्ति थी जिसे पचास साल पहले ठाकुर ने बंद किया था।

     

    काली आकृति ने कहा—

     

    “पाँचवीं परछाई पूरी हो चुकी है।”

     

    अमन के पैरों के नीचे उसकी सींगों वाली परछाई फैलने लगी।

     

    कमरे में रखे सारे आईने टूटने लगे।

     

    समीर ने चिल्लाकर कहा—

     

    “अमन! अपनी परछाई से मत डरना!”

     

    “मैं क्या करूँ?”

     

    “उसे स्वीकार मत करना!”

     

    अमन ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उसे अपने पिता की बातें याद आने लगीं।

     

    बचपन में पिता अक्सर कहते थे—

     

    “डर हमेशा अंधेरे में नहीं होता, बेटा। कभी-कभी डर हमारे अंदर छिपा होता है।”

     

    अमन ने आँखें खोलीं।

     

    उसने अपनी परछाई की तरफ देखा।

     

    वह अब धीरे-धीरे उसके शरीर से अलग हो रही थी।

     

    अमन ने जमीन पर हाथ रख दिया।

     

    “तू मेरी नहीं है।”

     

    परछाई रुक गई।

     

    अमन ने जोर से कहा—

     

    “मेरी परछाई मेरे डर की नहीं, मेरी पहचान है।”

     

    अचानक कमरे में तेज रोशनी फैल गई।

     

    काली आकृति पीछे हटने लगी।

     

    औरत चीखने लगी।

     

    दीवारें कांपने लगीं।

     

    फिर एक जोरदार आवाज हुई।

     

    धड़ाम!

     

    पूरा कमरा सफेद रोशनी से भर गया।

     

    अमन ने देखा कि उसके पिता की आत्मा उसके सामने खड़ी थी।

     

    उन्होंने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मुझे तुम पर गर्व है।”

     

    अमन रो पड़ा।

     

    “पापा, मेरे साथ चलिए।”

     

    उसके पिता ने सिर हिलाया।

     

    “अब मेरा समय खत्म हो चुका है।”

     

    “नहीं!”

     

    “बेटा, घर जाना।”

     

    उन्होंने हाथ उठाया।

     

    अमन की सींगों वाली परछाई अचानक गायब हो गई।

     

    उसकी जगह उसकी सामान्य परछाई वापस आ गई।

     

    काली आकृति चीखते हुए दीवार के अंदर खिंच गई।

     

    बंगला जोर-जोर से हिलने लगा।

     

    समीर ने अमन का हाथ पकड़ा।

     

    “हमें अभी निकलना होगा!”

     

    दोनों बाहर की तरफ भागे।

     

    बाहर पहुंचते ही पूरा बंगला पीछे से धूल के बादल में बदलने लगा।

     

    ऊपरी मंजिल की खिड़की में वही औरत आखिरी बार दिखाई दी।

     

    उसने अमन की तरफ देखा।

     

    लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं था।

     

    उसने मुस्कुराकर हाथ जोड़ दिए।

     

    फिर बंगला धीरे-धीरे जमीन के अंदर धँस गया।

     

    सुबह जब गाँव वाले वहाँ पहुंचे तो जंगल के बीच सिर्फ एक खाली मैदान था।

     

    न बंगला।

     

    न खंडहर।

     

    न कुआँ।

     

    बस जमीन पर एक पुरानी तस्वीर पड़ी थी।

     

    अमन ने तस्वीर उठाई।

     

    तस्वीर में ठाकुर का परिवार खड़ा था।

     

    उनके पीछे अब कोई काली परछाई नहीं थी।

     

    लेकिन तस्वीर के एक कोने में अमन और उसके पिता खड़े थे।

     

    अमन ने हैरानी से तस्वीर देखी।

     

    “ये कैसे…?”

     

    समीर ने कुछ नहीं कहा।

     

    अमन ने तस्वीर पलट दी।

     

    पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “दरवाजा बंद हो गया है… लेकिन कहानी खत्म नहीं हुई।”

     

    अमन ने ऊपर आसमान की तरफ देखा।

     

    सूरज निकल चुका था।

     

    सब कुछ सामान्य लग रहा था।

     

    लेकिन तभी उसकी नजर जमीन पर पड़ी।

     

    उसकी परछाई बिल्कुल सामान्य थी।

     

    समीर की भी।

     

    फिर अमन ने धीरे से पूछा—

     

    “कबीर कहाँ है?”

     

    समीर का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    दोनों ने पीछे मुड़कर जंगल की तरफ देखा।

     

    दूर एक पेड़ के नीचे कबीर खड़ा था।

     

    वह मुस्कुरा रहा था।

     

    अमन ने राहत की सांस ली और उसकी तरफ बढ़ा।

     

    लेकिन जैसे ही कबीर ने अपना चेहरा ऊपर उठाया…

     

    उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    और उसके पीछे जमीन पर पाँच परछाइयाँ खड़ी थीं।

     

    तभी जंगल के अंदर से एक धीमी आवाज गूँजी—

     

    “एक बंगला खत्म हुआ है… दूसरा अभी बाकी है।”

     

    और उसी क्षण दूर किसी अनजान जगह पर…

     

    एक पुराने दरवाजे के खुलने की आवाज आई।

     

    किर्रर्र…

     

    समाप्त।

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    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • भूत बंगला — पार्ट 4

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    अमन की परछाई जमीन पर नहीं थी।

     

    वह घबराकर इधर-उधर देखने लगा। उसके सामने समीर और कबीर खड़े थे, लेकिन दोनों की परछाइयाँ जमीन पर साफ दिखाई दे रही थीं।

     

    “मेरी परछाई कहाँ गई?” अमन ने कांपती आवाज में पूछा।

     

    समीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “यहाँ से निकलो! अभी!”

     

    तीनों जंगल की तरफ दौड़ने लगे।

     

    पीछे बंगला अंधेरे में खड़ा था। उसकी ऊपरी खिड़की में अब कोई दिखाई नहीं दे रहा था। लेकिन अमन को ऐसा लग रहा था जैसे कोई लगातार उन्हें देख रहा हो।

     

    कुछ दूर जाने के बाद वे एक पुराने कुएँ के पास पहुंचे।

     

    कुआँ बहुत पुराना था। उसके चारों ओर टूटी हुई पत्थर की दीवार थी और पास ही एक सूखा पेड़ खड़ा था।

     

    कबीर वहीं बैठ गया।

     

    “अब हम यहाँ से गाँव तक पहुँच सकते हैं।”

     

    अमन ने पूछा, “तुम दोनों मुझे उस राघव के बारे में सच क्यों नहीं बता रहे?”

     

    समीर और कबीर एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    आखिर समीर ने कहा—

     

    “क्योंकि हमें खुद नहीं पता कि वह राघव था या नहीं।”

     

    “मतलब?”

     

    कबीर ने धीरे से कहा—

     

    “जब हम जंगल में भाग रहे थे, हमें एक आदमी मिला। उसने कहा कि वह राघव है। उसने हमें बताया कि बंगले से बाहर निकलने का रास्ता कुएँ के पीछे से जाता है।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    “हम उसके साथ यहाँ आए। लेकिन अचानक वह गायब हो गया।”

     

    अमन ने कुएँ की तरफ देखा।

     

    “और तुमने कहा था कि तुमने राघव को कुएँ के पास देखा था?”

     

    कबीर ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    तभी कुएँ के अंदर से हल्की-सी आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    तीनों चुप हो गए।

     

    आवाज फिर आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    जैसे कोई कुएँ की दीवार के अंदर से दरवाजा खटखटा रहा हो।

     

    समीर पीछे हट गया।

     

    “यहाँ से चलो।”

     

    लेकिन अमन कुएँ के पास चला गया।

     

    उसे नीचे से किसी के रोने की आवाज सुनाई दे रही थी।

     

    “बचाओ…”

     

    अमन ने झुककर कुएँ के अंदर देखा।

     

    नीचे बहुत गहरा अंधेरा था।

     

    फिर अचानक उसे नीचे एक चेहरा दिखाई दिया।

     

    राघव का चेहरा।

     

    “अमन!”

     

    अमन पीछे हट गया।

     

    राघव नीचे से चिल्ला रहा था—

     

    “मुझे बाहर निकाल!”

     

    कबीर ने कहा, “यह वही चाल है। हमें इसे नहीं सुनना चाहिए।”

     

    लेकिन अमन को यकीन था कि आवाज असली थी।

     

    “अगर वह सच में राघव हुआ तो?”

     

    समीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “हम रस्सी ढूँढते हैं।”

     

    पास ही एक पुरानी रस्सी पड़ी थी। उन्होंने उसे पेड़ से बांधा और अमन नीचे उतरने लगा।

     

    जैसे-जैसे वह नीचे जा रहा था, हवा ठंडी होती जा रही थी।

     

    कुछ ही देर में उसके पैर जमीन पर पहुंच गए।

     

    कुएँ के नीचे पानी नहीं था।

     

    बल्कि वहाँ एक संकरी सुरंग थी।

     

    सुरंग के अंदर दीवारों पर अजीब निशान बने थे।

     

    अमन ने टॉर्च आगे की।

     

    दीवार पर खून से लिखा था—

     

    “जो अपनी परछाई खो देता है, वह वापस इंसान नहीं बनता।”

     

    अमन का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    तभी सुरंग के अंदर से राघव की आवाज आई—

     

    “अमन… जल्दी आ।”

     

    अमन आवाज की दिशा में बढ़ गया।

     

    कुछ कदम बाद उसे एक छोटा कमरा दिखाई दिया।

     

    कमरे के बीच में राघव बैठा था।

     

    उसके हाथ-पैर बंधे हुए थे।

     

    अमन दौड़कर उसके पास पहुंचा।

     

    “राघव!”

     

    राघव ने सिर उठाया।

     

    “अमन… तुम आ गए।”

     

    अमन ने रस्सी खोलनी शुरू की।

     

    तभी राघव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “रुको।”

     

    “क्या हुआ?”

     

    राघव ने बहुत डरते हुए कहा—

     

    “पहले मेरी परछाई देखो।”

     

    अमन ने टॉर्च नीचे की।

     

    राघव की परछाई थी।

     

    लेकिन वह राघव की तरफ नहीं, बल्कि उल्टी दिशा में बनी हुई थी।

     

    अमन पीछे हट गया।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    राघव मुस्कुराया।

     

    “तुमने देर कर दी।”

     

    अचानक कमरे की दीवारें हिलने लगीं।

     

    राघव का चेहरा बदलने लगा।

     

    कुछ ही सेकंड में उसके चेहरे की जगह एक काली, धुंधली आकृति दिखाई देने लगी।

     

    अमन चीखकर पीछे भागा।

     

    उसी समय ऊपर से समीर की आवाज आई—

     

    “अमन! बाहर आओ!”

     

    अमन सुरंग की तरफ दौड़ा।

     

    लेकिन तभी उसके सामने वही छोटी उम्र का बच्चा खड़ा हो गया।

     

    ठाकुर का बेटा।

     

    उसने अमन की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “तुम्हें अपनी परछाई चाहिए?”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    बच्चे ने कहा—

     

    “तो मेरे साथ आओ।”

     

    “कहाँ?”

     

    “जहाँ तुम्हारी परछाई कैद है।”

     

    बच्चा सुरंग की दूसरी तरफ चल पड़ा।

     

    अमन कुछ पल रुका।

     

    फिर उसके पीछे चल दिया।

     

    सुरंग अचानक एक बड़े कमरे में खुली।

     

    कमरे की दीवारों पर दर्जनों पुराने आईने लगे थे।

     

    हर आईने में अलग-अलग लोग दिखाई दे रहे थे।

     

    कुछ रो रहे थे।

     

    कुछ चीख रहे थे।

     

    और कुछ बिल्कुल चुप थे।

     

    बच्चे ने एक आईने की तरफ इशारा किया।

     

    “वहाँ देखो।”

     

    अमन ने आईने में देखा।

     

    उसमें उसकी परछाई दिखाई दे रही थी।

     

    लेकिन वह अकेली नहीं थी।

     

    उसके पीछे एक काली औरत खड़ी थी।

     

    अमन ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    फिर आईने में मौजूद औरत ने अपना चेहरा अमन के बिल्कुल पास ला दिया।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम्हारी माँ ने मुझे बहुत पहले बुलाया था।”

     

    अमन की आँखें फैल गईं।

     

    “मेरी माँ?”

     

    औरत हँसी।

     

    “तुम्हें लगता है कि तुम्हारे पिता की मृत्यु दुर्घटना थी?”

     

    अमन कुछ बोल नहीं पाया।

     

    उसने बचपन से यही सुना था कि उसके पिता की मौत सड़क दुर्घटना में हुई थी।

     

    औरत ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता इसी बंगले में आए थे।”

     

    अमन ने आईने पर हाथ रख दिया।

     

    “झूठ!”

     

    औरत ने धीरे से कहा—

     

    “उन्होंने तुम्हें बचाने के लिए अपनी परछाई दे दी थी।”

     

    अचानक सारे आईने टूटने लगे।

     

    छन्न्न्न!

     

    बच्चे ने अमन का हाथ पकड़ लिया।

     

    “भागो!”

     

    दोनों सुरंग की ओर दौड़े।

     

    पीछे से सैकड़ों आवाजें आने लगीं—

     

    “अमन…”

     

    “अमन…”

     

    “अमन…”

     

    जैसे पूरा जंगल उसका नाम पुकार रहा हो।

     

    अमन कुएँ की तरफ भागा।

     

    ऊपर समीर और कबीर उसे खींचने के लिए तैयार थे।

     

    लेकिन जैसे ही अमन ऊपर पहुंचा, उसने देखा कि वहाँ केवल समीर खड़ा था।

     

    कबीर गायब था।

     

    “कबीर कहाँ है?”

     

    समीर ने घबराकर कहा—

     

    “वह… अभी यहीं था।”

     

    तभी कुएँ के अंदर से कबीर की चीख सुनाई दी—

     

    “अमन! मुझे बचाओ!”

     

    अमन नीचे देखने ही वाला था कि समीर ने उसे रोक लिया।

     

    “मत देखना!”

     

    “लेकिन वह नीचे है!”

     

    समीर ने कांपते हुए कहा—

     

    “नहीं… कबीर नीचे नहीं है।”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    समीर ने धीरे से अपनी गर्दन उठाई।

     

    उसकी आँखें लाल थीं।

     

    और उसके चेहरे पर एक अजीब मुस्कान थी।

     

    “क्योंकि कबीर तो…”

     

    वह कुछ कह पाता, उससे पहले जंगल में घंटी बजने लगी।

     

    टन… टन… टन…

     

    बंगले की दिशा से।

     

    अमन ने पीछे देखा।

     

    दूर अंधेरे में बंगला दिखाई दे रहा था।

     

    उसकी सारी खिड़कियों में अब रोशनी जल चुकी थी।

     

    और हर खिड़की में एक-एक इंसाàन खड़ा था।

     

    कुल मिलाकर पाँच लोग।

     

    तभी समीर ने अमन के कान में फुसफुसाया—

     

    “अब तुम्हें आखिरी कमरा खोलना होगा।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “कौन-सा कमरा?”

     

    समीर मुस्कुराया।

     

    “जिसमें तुम्हारे पिता अभी भी जिंदा हैं।”

     

    अमन के शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।

     

    और उसी पल उसके पीछे जमीन पर उसकी परछाई वापस दिखाई दी।

     

    लेकिन…

     

    उसकी परछाई के सिर पर दो सींग थे।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • भूत बंगला — पार्ट 3

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    कमरे का दरवाजा बंद होते ही अमन ने पूरी ताकत से उसे खींचा, लेकिन दरवाजा जैसे पत्थर का हो गया था।

     

    सामने कुर्सी पर बैठा असली राघव कांप रहा था। उसके हाथ रस्सी से बंधे थे और चेहरे पर चोट के निशान थे।

     

    अमन उसके पास पहुंचा।

     

    “राघव, ये सब क्या है?”

     

    राघव ने जवाब देने के बजाय अपनी उंगली होंठों पर रख दी।

     

    “धीरे बोल… वह सुन रही है।”

     

    अमन ने कमरे में चारों तरफ देखा।

     

    कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    तभी छत से पानी की एक बूंद उसके माथे पर गिरी।

     

    उसने हाथ लगाया।

     

    पानी नहीं था।

     

    खून था।

     

    अमन ने ऊपर देखा।

     

    छत खाली थी।

     

    लेकिन कुछ ही सेकंड बाद छत से एक लड़की के लंबे बाल नीचे लटकने लगे।

     

    अमन पीछे हट गया।

     

    राघव ने घबराकर कहा, “नीचे मत देखना!”

     

    अमन ने उसकी बात नहीं मानी।

     

    जैसे ही उसने नीचे देखा, कमरे के फर्श पर एक औरत खड़ी थी।

     

    उसका चेहरा बालों से ढका हुआ था।

     

    वह बिल्कुल अमन के पीछे खड़ी थी।

     

    अमन चीखते हुए पीछे मुड़ा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    राघव चिल्लाया—

     

    “उसकी तरफ मत देखना!”

     

    लेकिन देर हो चुकी थी।

     

    कमरे की सारी खिड़कियाँ अचानक खुल गईं।

     

    तेज हवा अंदर आने लगी।

     

    दीवारों पर लगी पुरानी तस्वीरें एक-एक करके जमीन पर गिरने लगीं।

     

    धड़ाम! धड़ाम! धड़ाम!

     

    अचानक एक तस्वीर अमन के पैरों के पास आकर गिरी।

     

    उसने तस्वीर उठाई।

     

    तस्वीर में ठाकुर रुद्रप्रताप, उसकी पत्नी, उनका बच्चा और नौकर खड़े थे।

     

    लेकिन अब तस्वीर में एक और चीज दिखाई दे रही थी।

     

    उन सबके पीछे एक काली परछाई खड़ी थी।

     

    उस परछाई का चेहरा नहीं था।

     

    अमन ने तस्वीर पलट दी।

     

    पीछे पुराने अक्षरों में लिखा था—

     

    “जिस दिन पाँचवीं परछाई जन्म लेगी, बंगला फिर से जाग जाएगा।”

     

    अमन ने राघव की ओर देखा।

     

    “पाँचवीं परछाई का मतलब क्या है?”

     

    राघव ने धीरे-धीरे कहा—

     

    “मैं नहीं जानता। लेकिन मुझे इतना पता है कि इस बंगले में जो भी मरता है, उसकी आत्मा यहाँ कैद हो जाती है।”

     

    “और वह औरत?”

     

    “वह आत्मा नहीं है।”

     

    अमन की धड़कन रुक-सी गई।

     

    “तो फिर क्या है?”

     

    राघव ने कहा—

     

    “वह इस बंगले की मालकिन नहीं… इस बंगले की रक्षक है।”

     

    अमन कुछ समझ नहीं पाया।

     

    राघव ने बताया कि उसके दादा ने मरने से पहले उसे इस बंगले के बारे में बताया था।

     

    पचास साल पहले ठाकुर रुद्रप्रताप ने जंगल में एक पुरानी सुरंग खोजी थी। उस सुरंग के अंदर उसे एक पत्थर की मूर्ति मिली थी।

     

    कहा जाता था कि वह मूर्ति किसी प्राचीन शक्ति की थी।

     

    ठाकुर ने उस मूर्ति को बंगले में ला दिया।

     

    उसके बाद घर में अजीब घटनाएँ शुरू हो गईं।

     

    रात में किसी के चलने की आवाज आती।

     

    बंद कमरों से रोने की आवाजें सुनाई देतीं।

     

    और सबसे डरावनी बात—

     

    घर में रहने वाले लोगों की परछाइयाँ कभी-कभी उनके शरीर से अलग होकर चलने लगती थीं।

     

    एक रात ठाकुर ने उस शक्ति को हमेशा के लिए रोकने की कोशिश की।

     

    लेकिन वह असफल रहा।

     

    उस रात ठाकुर की पत्नी ने अपने बच्चे को बचाने के लिए खुद को बलिदान कर दिया।

     

    मरने से पहले उसने उस शक्ति को बंगले के अंदर बंद कर दिया।

     

    लेकिन उसे रोकने के लिए एक शर्त थी।

     

    हर पचास साल में पाँच लोगों की परछाइयाँ उस शक्ति को फिर से जागने से रोकती थीं।

     

    “तो फिर हम यहाँ क्यों आए?” अमन ने पूछा।

     

    राघव ने डरते हुए कहा—

     

    “क्योंकि इस बार पाँचवीं परछाई के लिए हमें चुना गया है।”

     

    अमन ने पूछा, “कौन-से पाँच?”

     

    राघव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम… मैं… समीर… कबीर… और…”

     

    वह अचानक चुप हो गया।

     

    अमन ने पूछा, “और कौन?”

     

    राघव ने धीरे से कमरे के कोने की तरफ देखा।

     

    “वह।”

     

    कमरे का बल्ब अचानक जल उठा।

     

    कोने में एक छोटा बच्चा खड़ा था।

     

    करीब आठ साल का।

     

    उसने पुराने जमाने के कपड़े पहन रखे थे।

     

    उसका चेहरा बिल्कुल सफेद था।

     

    अमन ने धीरे से पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    बच्चे ने सिर उठाया।

     

    “मैं ठाकुर का बेटा हूँ।”

     

    अमन का शरीर सुन्न हो गया।

     

    “लेकिन तुम तो पचास साल पहले मर चुके हो।”

     

    बच्चे ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मैं मरा नहीं था।”

     

    राघव ने घबराकर कहा—

     

    “अमन, इसके पास मत जाना।”

     

    लेकिन बच्चा अचानक अमन के बिल्कुल पास आ गया।

     

    उसने अमन के कान में फुसफुसाकर कहा—

     

    “तुम्हारे दोस्तों में से एक पहले ही मर चुका है।”

     

    अमन ने डरते हुए पूछा—

     

    “कौन?”

     

    बच्चे ने जवाब नहीं दिया।

     

    वह बस पीछे हट गया।

     

    अचानक कमरे की दीवार पर पाँच परछाइयाँ दिखाई दीं।

     

    पहली अमन की थी।

     

    दूसरी राघव की।

     

    तीसरी किसी ऐसे व्यक्ति की थी जो कमरे में था ही नहीं।

     

    चौथी बहुत छोटी थी।

     

    और पाँचवीं…

     

    वह छत पर उल्टी लटकी हुई थी।

     

    अमन ने ऊपर देखा।

     

    वहाँ वही औरत थी।

     

    इस बार उसके बाल चेहरे से हटे हुए थे।

     

    अमन की चीख निकल गई।

     

    उसका चेहरा देखकर वह समझ गया कि वह औरत कौन थी।

     

    वह अमन की माँ जैसी दिख रही थी।

     

    और तभी उस औरत ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “बेटा… इतनी देर क्यों कर दी?”

     

    अमन के हाथ से टॉर्च गिर गई।

     

    राघव चीख पड़ा—

     

    “यह तुम्हारी माँ नहीं है!”

     

    औरत धीरे-धीरे छत से नीचे उतरने लगी।

     

    उसके पैर जमीन को छू ही नहीं रहे थे।

     

    अमन पीछे हटता गया।

     

    तभी बाहर से किसी के भागने की आवाज आई।

     

    समीर और कबीर की आवाज सुनाई दी—

     

    “अमन! जल्दी बाहर आ!”

     

    अमन ने दरवाजे की तरफ देखा।

     

    राघव ने कहा—

     

    “रुको!”

     

    लेकिन अमन ने दरवाजा खोल दिया।

     

    बाहर समीर और कबीर खड़े थे।

     

    दोनों बुरी तरह डरे हुए थे।

     

    समीर ने अमन का हाथ पकड़ा।

     

    “हमें अभी जंगल से बाहर निकलना होगा।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “तुम दोनों इतने समय कहाँ थे?”

     

    कबीर ने कहा—

     

    “हम भागकर पुराने कुएँ तक गए थे।”

     

    “फिर?”

     

    कबीर ने कांपते हुए कहा—

     

    “वहाँ हमें राघव मिला था।”

     

    अमन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उसने पीछे मुड़कर कमरे की तरफ देखा।

     

    अंदर राघव अभी भी कुर्सी से बंधा था।

     

    तो फिर…

     

    कुएँ के पास राघव कौन था?

     

    अमन कुछ समझ पाता, उससे पहले समीर ने उसका हाथ जोर से पकड़ लिया।

     

    “अमन, चल!”

     

    तीनों जंगल की तरफ भागने लगे।

     

    कुछ दूर जाने के बाद अमन ने पीछे मुड़कर बंगले की तरफ देखा।

     

    ऊपरी खिड़की में पाँच लोग खड़े थे।

     

    राघव।

     

    ठाकुर का बच्चा।

     

    वह रहस्यमयी औरत।

     

    एक काली परछाई।

     

    और…

     

    अमन खुद।

     

    अमन ने घबराकर अपनी छाती पर हाथ रखा।

     

    उसका दिल धड़क रहा था।

     

    लेकिन उसी क्षण उसके पैरों के नीचे जमीन पर उसकी परछाई नहीं थी।

     

    और पीछे बंगले की खिड़की में खड़ी उसकी परछाई धीरे-धीरे मुस्कुरा रही थी।

     

    फिर जंगल के अंधेरे से एक आवाज आई—

     

    “अब असली खेल शुरू होगा।”

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    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • भूत बंगला — पार्ट 2

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

     

    चारों दोस्तों की सांसें तेज हो चुकी थीं।

     

    फर्श पर बने गीले पैरों के निशान साफ दिखाई दे रहे थे। वे निशान दरवाजे से शुरू होकर उनके पीछे तक आए थे।

     

    लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि वे निशान अंदर की तरफ नहीं, बाहर की तरफ जा रहे थे।

     

    यानी कोई उनके पीछे खड़ा था और अभी-अभी वहाँ से चला गया था।

     

    कबीर ने कांपती आवाज में कहा, “चलो… अभी चलते हैं।”

     

    इस बार किसी ने उसका विरोध नहीं किया।

     

    चारों तेजी से सीढ़ियों की तरफ भागे।

     

    लेकिन नीचे पहुंचकर वे रुक गए।

     

    मुख्य दरवाजा बंद था।

     

    अमन ने पूरी ताकत से उसे खींचा।

     

    दरवाजा नहीं खुला।

     

    राघव ने कहा, “शायद अंदर से लॉक हो गया है।”

     

    “तो खोलो!”

     

    उन्होंने कई बार कोशिश की।

     

    दरवाजा बिल्कुल नहीं हिला।

     

    तभी ऊपर से किसी के धीरे-धीरे चलने की आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    चारों ने ऊपर देखा।

     

    सीढ़ियों के आखिरी छोर पर एक लड़की खड़ी थी।

     

    उसने सफेद रंग की पुरानी पोशाक पहन रखी थी। उसके बाल इतने लंबे थे कि चेहरा पूरी तरह छिपा हुआ था।

     

    वह बिल्कुल स्थिर खड़ी थी।

     

    समीर की आवाज गले में अटक गई।

     

    “क… कौन हो तुम?”

     

    लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसने बस अपना सिर थोड़ा ऊपर उठाया।

     

    बालों के बीच से दो चमकती हुई आँखें दिखाई दीं।

     

    अचानक सारी टॉर्च बंद हो गईं।

     

    चारों तरफ अंधेरा छा गया।

     

    फिर लड़की की आवाज आई—

     

    “तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था।”

     

    अमन ने कांपते हुए पूछा, “तुम कौन हो?”

     

    कुछ सेकंड तक कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “जिसे तुम्हारे आने का इंतजार था।”

     

    अचानक टॉर्च फिर जल उठीं।

     

    सीढ़ियों पर कोई नहीं था।

     

    चारों ने एक-दूसरे को देखा।

     

    “भागो!”

     

    इस बार मुख्य दरवाजा खुल गया।

     

    वे जंगल की तरफ भागे।

     

    लेकिन कुछ दूर जाने के बाद अमन रुक गया।

     

    “राघव कहाँ है?”

     

    समीर और कबीर ने पीछे देखा।

     

    राघव उनके साथ नहीं था।

     

    तीनों वापस बंगले की तरफ दौड़े।

     

    मुख्य दरवाजे के पास राघव खड़ा था।

     

    वह बिल्कुल शांत था।

     

    अमन ने उसे पकड़कर कहा, “तू यहाँ क्यों खड़ा है?”

     

    राघव ने धीरे से उसकी तरफ देखा।

     

    उसकी आँखें खाली थीं।

     

    “मैं यहाँ पहले भी आ चुका हूँ।”

     

    अमन का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “क्या?”

     

    राघव मुस्कुराया।

     

    “हाँ… बहुत साल पहले।”

     

    “तुझे कुछ याद नहीं है।”

     

    राघव ने सिर हिलाया।

     

    “याद है।”

     

    फिर उसने बंगले की तरफ देखा।

     

    “यहीं मेरी मौत हुई थी।”

     

    तीनों दोस्त पीछे हट गए।

     

    राघव अचानक जोर से हँसने लगा।

     

    उसकी हँसी इंसान जैसी नहीं थी।

     

    अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तू मजाक कर रहा है?”

     

    राघव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    तभी बंगले की ऊपरी खिड़की में वही लड़की दिखाई दी।

     

    इस बार उसके हाथ में एक पुरानी लालटेन थी।

     

    उसने लालटेन नीचे की ओर उठाई।

     

    और उसके पीछे दीवार पर एक तस्वीर चमकी।

     

    वही तस्वीर जो अंदर लगी थी।

     

    लेकिन अब तस्वीर में चार लोग नहीं थे।

     

    उसमें पाँच लोग खड़े थे।

     

    पाँचवाँ व्यक्ति राघव था।

     

    अमन ने डरते हुए कहा, “ये कैसे हो सकता है?”

     

    राघव ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “क्योंकि मैं राघव नहीं हूँ।”

     

    अगले ही पल राघव का चेहरा बदलने लगा।

     

    उसकी त्वचा काली पड़ गई।

     

    आँखें लाल हो गईं।

     

    और उसके मुँह से आवाज निकली—

     

    “वह हमें बुला रही है।”

     

    कबीर और समीर जंगल की तरफ भाग गए।

     

    अमन वहीं खड़ा रह गया।

     

    उसने राघव को देखा।

     

    या जो भी अब राघव के शरीर में था।

     

    उसने कहा—

     

    “अगर मैं यहाँ पहले मर चुका हूँ… तो फिर असली राघव कहाँ है?”

     

    राघव ने मुस्कुराकर बंगले की ओर इशारा किया।

     

    “अंदर।”

     

    अमन के कानों में अचानक किसी के रोने की आवाज आई।

     

    वह आवाज बिल्कुल राघव जैसी थी।

     

    “अमन… मुझे बचा ले…”

     

    आवाज बंगले के अंदर से आ रही थी।

     

    अमन ने देखा कि राघव उसके सामने खड़ा था।

     

    फिर अंदर कौन रो रहा था?

     

    वह धीरे-धीरे बंगले के अंदर चला गया।

     

    गलियारे के अंत में एक कमरा था।

     

    दरवाजा खुला था।

     

    अंदर एक कुर्सी पर कोई बैठा था।

     

    उसके हाथ बंधे हुए थे।

     

    चेहरा झुका हुआ था।

     

    अमन ने टॉर्च उसकी तरफ की।

     

    वह असली राघव था।

     

    राघव ने सिर उठाया।

     

    उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    “अमन… भाग जा।”

     

    अमन ने पूछा, “तू यहाँ कैसे?”

     

    राघव ने कांपते हुए कहा—

     

    “क्योंकि वह पिछले तीन दिनों से मेरा चेहरा पहनकर गाँव में घूम रही है।”

     

    अमन पीछे हट गया।

     

    “वह… कौन?”

     

    राघव ने कमरे के अंधेरे कोने की तरफ देखा।

     

    “ठाकुर की पत्नी।”

     

    उसी समय कमरे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    और अंधेरे में एक औरत की आवाज गूँजी—

     

    “अब पाँचवाँ पूरा हो गया।”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • भूत बंगला — पार्ट 1

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

     

    लखनऊ से लगभग तीन सौ किलोमीटर दूर पहाड़ों और घने जंगलों के बीच एक छोटा-सा गाँव था—भैरवपुर। गाँव इतना सुनसान था कि शाम होते ही वहाँ की गलियाँ अपने आप डरावनी लगने लगती थीं। गाँव के बाहर एक पुराना जंगल था, और उसी जंगल के बीच एक काला, जर्जर बंगला खड़ा था।

     

    गाँव वाले उसे “भूत बंगला” कहते थे।

     

    कहा जाता था कि करीब पचास साल पहले उस बंगले में ठाकुर रुद्रप्रताप नाम का एक आदमी रहता था। उसकी अचानक रहस्यमय मौत हो गई थी। उसके बाद उसकी पत्नी और नौकर भी एक-एक करके गायब हो गए। पुलिस ने कई दिनों तक खोजबीन की, लेकिन किसी का पता नहीं चला।

     

    तब से बंगला बंद पड़ा था।

     

    गाँव में एक अजीब नियम था—सूरज डूबने के बाद कोई भी उस जंगल की तरफ नहीं जाता था।

     

    लोग कहते थे कि रात में बंगले की ऊपरी खिड़की में एक औरत दिखाई देती है। उसके लंबे बाल चेहरे पर लटके होते हैं और वह बस जंगल की तरफ देखती रहती है।

     

    लेकिन गाँव का अमन इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।

     

    अमन शहर में पढ़ा-लिखा लड़का था और कुछ दिनों के लिए अपने नाना के गाँव आया था। उसके साथ उसके तीन दोस्त भी आए थे—राघव, समीर और कबीर।

     

    एक शाम चारों दोस्त चाय की दुकान पर बैठे थे। तभी दुकान पर बैठे बूढ़े हरिया ने उन्हें चेतावनी दी।

     

    “बच्चों, रात होने से पहले घर चले जाना। आज अमावस्या है।”

     

    राघव हँस पड़ा।

     

    “काका, क्या आज भूतों की मीटिंग होने वाली है?”

     

    दुकान पर बैठे बाकी लोग चुप हो गए।

     

    हरिया ने राघव को घूरते हुए कहा, “मजाक मत करो। अमावस्या की रात उस बंगले में कोई जाता है तो वापस नहीं आता।”

     

    अमन ने पूछा, “आप खुद गए हैं वहाँ?”

     

    बूढ़े ने कुछ पल चुप रहकर कहा, “मैं नहीं गया… लेकिन मेरा बड़ा भाई गया था।”

     

    “फिर?”

     

    हरिया की आँखों में डर उतर आया।

     

    “वह वापस आया था… मगर आदमी बनकर नहीं।”

     

    चारों दोस्त एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    “मतलब?” अमन ने पूछा।

     

    हरिया ने धीरे से कहा, “वह वापस तो आया था, लेकिन उसके बाद उसने कभी किसी से बात नहीं की। रात होते ही वह दीवार की तरफ देखकर किसी से बातें करता था। और एक महीने बाद उसने कुएँ में कूदकर जान दे दी।”

     

    कुछ पल तक सन्नाटा रहा।

     

    अमन ने माहौल हल्का करने के लिए कहा, “ये सब पुरानी कहानियाँ हैं।”

     

    लेकिन उसी रात चारों दोस्तों ने एक फैसला किया।

     

    वे बंगले में जाएंगे।

     

    रात करीब साढ़े दस बजे वे चारों टॉर्च लेकर जंगल की ओर निकल पड़े। जंगल में घुसते ही हवा अचानक ठंडी हो गई। पेड़ों की शाखाएँ हवा में ऐसे हिल रही थीं जैसे कोई उन्हें छू रहा हो।

     

    करीब आधे घंटे बाद उन्हें बंगला दिखाई दिया।

     

    वह वास्तव में बहुत डरावना था।

     

    दीवारों पर काई जमी थी। खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाजा आधा खुला था।

     

    समीर ने धीमे से कहा, “यार… मुझे लगता है हमें वापस जाना चाहिए।”

     

    राघव बोला, “अब डर लग रहा है?”

     

    वे अंदर चले गए।

     

    अंदर धूल की मोटी परत थी। दीवारों पर पुराने चित्र टंगे थे। एक तस्वीर में ठाकुर रुद्रप्रताप अपने परिवार के साथ खड़ा था।

     

    अमन ने टॉर्च तस्वीर पर डाली।

     

    उसे अचानक कुछ अजीब लगा।

     

    तस्वीर में परिवार के चार लोग थे—ठाकुर, उसकी पत्नी, एक छोटा बच्चा और एक नौकर।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे दीवार पर पाँच लोगों की परछाइयाँ दिखाई दे रही थीं।

     

    अमन ने दोबारा टॉर्च घुमाई।

     

    परछाइयाँ गायब थीं।

     

    “क्या हुआ?” कबीर ने पूछा।

     

    “कुछ नहीं,” अमन ने कहा।

     

    तभी ऊपर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    चारों चौंक गए।

     

    वे सीढ़ियों की तरफ बढ़े।

     

    ऊपर एक लंबा गलियारा था। गलियारे के आखिरी कमरे का दरवाजा बंद था।

     

    दरवाजे के नीचे से हल्की-सी लाल रोशनी बाहर आ रही थी।

     

    अमन आगे बढ़ा।

     

    जैसे ही उसने दरवाजे को छुआ, अंदर से किसी औरत की धीमी आवाज सुनाई दी—

     

    “तुम… इतनी देर से क्यों आए?”

     

    अमन का हाथ जम गया।

     

    राघव ने फुसफुसाकर पूछा, “किसकी आवाज थी?”

     

    अमन ने जवाब नहीं दिया।

     

    अंदर से फिर आवाज आई—

     

    “अमन…”

     

    इस बार अमन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उसने अपना नाम कैसे जाना?

     

    उसने धीरे-धीरे दरवाजा खोला।

     

    कमरा खाली था।

     

    लेकिन सामने की दीवार पर खून से एक वाक्य लिखा था—

     

    “तुम चार नहीं हो।”

     

    चारों दोस्तों ने एक साथ पीछे देखा।

     

    गलियारा खाली था।

     

    लेकिन फर्श पर उनके अलावा एक और व्यक्ति के पैरों के निशान थे।

     

    और वे निशान उनके पीछे से आ रहे थे।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • रात की आखिरी ट्रेन — पार्ट 5: आखिरी यात्री

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    आरव काफी देर तक रेलवे स्टेशन की पटरी के पास खड़ा रहा।

     

    उसके हाथ में वही पुराना टिकट था।

     

    मोबाइल जमीन पर पड़ा था और स्क्रीन पर अभी भी वही मैसेज चमक रहा था—

     

    “आपकी अगली यात्रा 14 अगस्त को है।”

     

    आरव ने मोबाइल उठाया।

     

    उसने मैसेज डिलीट कर दिया।

     

    फिर दोबारा स्क्रीन देखी।

     

    मैसेज गायब था।

     

    उसने राहत की सांस ली।

     

    “सब खत्म हो गया।”

     

    लेकिन उसे नहीं पता था कि असली कहानी अभी बाकी थी।

     

    आरव घर पहुंचा तो उसकी माँ दरवाजे पर खड़ी थीं।

     

    उन्हें देखते ही आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    वह दौड़कर माँ से लिपट गया।

     

    माँ ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव कुछ नहीं बोल पाया।

     

    उसने बस उन्हें कसकर पकड़ लिया।

     

    उस रात आरव ने अपनी माँ को ट्रेन के बारे में सब कुछ बताया।

     

    निशा।

     

    बूढ़ा यात्री।

     

    उसके पिता।

     

    और वह आखिरी यात्रा।

     

    माँ चुपचाप सुनती रहीं।

     

    कहानी खत्म होने के बाद उन्होंने एक सवाल पूछा—

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें कुछ दिया?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    उसने जेब से पुरानी चाबी निकाली।

     

    माँ ने चाबी देखते ही अपना चेहरा छिपा लिया।

     

    उनकी आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तुम्हें यह कहाँ मिली?”

     

    “पापा ने दी थी।”

     

    माँ ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    आरव चौंका।

     

    “क्या मतलब?”

     

    माँ ने धीरे से बताया—

     

    “यह चाबी तुम्हारे पिता की नहीं थी।”

     

    “तो किसकी थी?”

     

    माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उस रात आरव सो नहीं पाया।

     

    करीब दो बजे उसे ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

     

    फूँऽऽऽ…

     

    वह तुरंत खिड़की के पास गया।

     

    बाहर सड़क खाली थी।

     

    लेकिन दूर आसमान में काले धुएँ जैसी एक लकीर दिखाई दे रही थी।

     

    फिर उसकी खिड़की पर किसी ने दस्तक दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    फिर दस्तक हुई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    उसने पर्दा थोड़ा हटाया।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    लेकिन कांच पर भाप से एक शब्द लिखा हुआ था—

     

    “स्टेशन।”

     

    आरव ने खिड़की बंद कर दी।

     

    सुबह उसने माँ को यह बात बताई।

     

    माँ ने तुरंत कहा—

     

    “आज घर से बाहर मत जाना।”

     

    लेकिन उसी समय दरवाजे के नीचे से एक लिफाफा अंदर आया।

     

    लिफाफे पर आरव का नाम लिखा था।

     

    उसने खोला।

     

    अंदर एक रेलवे टिकट था।

     

    यात्री: आरव

     

    ट्रेन: निशा एक्सप्रेस

     

    समय: 11:55 PM

     

    प्लेटफॉर्म: 6

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    माँ ने टिकट देखते ही कहा—

     

    “तुम्हें वहाँ नहीं जाना चाहिए।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    माँ ने आखिरकार वह राज बताया जो उन्होंने दस साल से छिपाकर रखा था।

     

    आरव के पिता की मृत्यु के बाद उन्हें एक पत्र मिला था।

     

    उस पत्र में लिखा था—

     

    “अगर कभी आरव को 14 अगस्त की रात ट्रेन का टिकट मिले, तो उसे जाने देना। क्योंकि इस ट्रेन का आखिरी यात्री अभी बाकी है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “आखिरी यात्री कौन है?”

     

    माँ ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “तुम्हारे पिता नहीं।”

     

    “तो कौन?”

     

    माँ ने धीरे से कहा—

     

    “तुम।”

     

    आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    रात 11:30 बजे वह फिर उसी पुराने स्टेशन पर पहुंच गया।

     

    प्लेटफॉर्म नंबर 6 बिल्कुल खाली था।

     

    घड़ी में 11:55 बज रहे थे।

     

    ठीक उसी तरह जैसे पहली बार।

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    इस बार उसे डर नहीं लग रहा था।

     

    उसे पता था कि उसे क्या करना है।

     

    11:55 पर ट्रेन दिखाई दी।

     

    वही काली ट्रेन।

     

    वही खिड़कियाँ।

     

    वही दरवाजे।

     

    लेकिन इस बार ट्रेन में एक भी यात्री नहीं था।

     

    आरव अंदर चढ़ गया।

     

    दरवाजा बंद हुआ।

     

    ट्रेन चल पड़ी।

     

    कुछ देर बाद लाइटें बंद हो गईं।

     

    अंधेरे में एक आवाज आई—

     

    “तुम वापस क्यों आए?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “क्योंकि कहानी अधूरी थी।”

     

    अंधेरे में एक छोटी बच्ची दिखाई दी।

     

    वह नैना थी।

     

    लेकिन इस बार उसका चेहरा बिल्कुल शांत था।

     

    “भैया…”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “अब तुम असली हो?”

     

    नैना ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “तुम्हें किसने बुलाया?”

     

    नैना ने पीछे देखा।

     

    डिब्बे के आखिरी हिस्से में एक आदमी खड़ा था।

     

    रेलवे की वर्दी।

     

    आरव ने उसे देखते ही पहचान लिया।

     

    उसके पिता।

     

    लेकिन इस बार उनके चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “बेटा, तुम्हें वापस नहीं आना चाहिए था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “आखिरी यात्री कौन है?”

     

    पिता ने जवाब दिया—

     

    “मैं।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “लेकिन आप तो आजाद हो चुके हैं।”

     

    पिता ने सिर हिलाया।

     

    “मैं सिर्फ अपनी आत्मा का एक हिस्सा आजाद कर पाया था।”

     

    “बाकी?”

     

    “वह इस ट्रेन में है।”

     

    तभी ट्रेन के सभी दरवाजे अपने आप खुल गए।

     

    बाहर अनंत अंधेरा था।

     

    पिता ने कहा—

     

    “यह ट्रेन तब तक चलती रहेगी जब तक कोई इसे पूरी तरह खत्म नहीं करता।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कैसे?”

     

    पिता ने कहा—

     

    “जिसने इसे बनाया था, उसे ढूंढना होगा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “किसने?”

     

    पिता ने सामने देखा।

     

    एक बूढ़ा आदमी धीरे-धीरे डिब्बे में आ रहा था।

     

    आरव उसे देखते ही पहचान गया।

     

    वही बूढ़ा यात्री।

     

    लेकिन वह तो पहले ही आजाद हो चुका था।

     

    आरव ने कहा—

     

    “आप?”

     

    बूढ़ा मुस्कुराया।

     

    “मैंने कभी नहीं कहा था कि मैं इस ट्रेन का यात्री हूँ।”

     

    आरव का चेहरा बदल गया।

     

    “तो आप कौन हैं?”

     

    बूढ़े ने अपनी पुरानी टोपी उतारी।

     

    उसके नीचे कोई चेहरा नहीं था।

     

    सिर्फ काला अंधेरा।

     

    “मैं इस ट्रेन का पहला ड्राइवर हूँ।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता ने मुझे रोकने की कोशिश की थी।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “आप लोगों की आत्माएँ क्यों लेते हैं?”

     

    वह हँसा।

     

    “मैं आत्माएँ नहीं लेता। लोग खुद अपनी यादें मेरे पास छोड़ जाते हैं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि हर इंसान अपने किसी प्रिय व्यक्ति को खोने से डरता है।”

     

    बूढ़े ने आरव की तरफ हाथ बढ़ाया।

     

    “तुमने अपनी माँ की याद छोड़ दी थी।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “लेकिन मैंने उन्हें वापस पा लिया।”

     

    बूढ़ा हँसा।

     

    “तुमने चेहरा खो दिया है।”

     

    आरव के शरीर में ठंड दौड़ गई।

     

    उसे अचानक एहसास हुआ।

     

    उसे अपनी माँ का चेहरा याद नहीं था।

     

    वह माँ को पहचानता था।

     

    उनकी आवाज पहचानता था।

     

    लेकिन चेहरा…

     

    वह भूल चुका था।

     

    नैना ने कहा—

     

    “भैया, यही आखिरी जाल है।”

     

    आरव ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उसने माँ की आवाज याद की।

     

    फिर उनके हाथ।

     

    फिर उनका स्पर्श।

     

    धीरे-धीरे चेहरा उसकी याद में वापस आने लगा।

     

    बूढ़ा चीखा—

     

    “नहीं!”

     

    आरव ने आँखें खोलीं।

     

    “यादें किसी की संपत्ति नहीं होतीं।”

     

    उसने अपनी जेब से वह पुरानी चाबी निकाली।

     

    अचानक चाबी चमकने लगी।

     

    इंजन के पीछे एक दरवाजा दिखाई दिया।

     

    उसने चाबी उस दरवाजे में लगा दी।

     

    दरवाजा खुलते ही तेज सफेद रोशनी निकली।

     

    हजारों आत्माएँ ट्रेन से बाहर निकलने लगीं।

     

    बूढ़ा चीखने लगा।

     

    निशा की आत्मा भी दिखाई दी।

     

    उसने आरव को मुस्कुराकर देखा।

     

    उसके पीछे आरव के पिता खड़े थे।

     

    पिता ने कहा—

     

    “अब आखिरी दरवाजा बंद कर दो।”

     

    आरव ने दरवाजा बंद कर दिया।

     

    पूरी ट्रेन कांपने लगी।

     

    फिर एक जोरदार विस्फोट हुआ।

     

    धड़ाम!

     

    आरव ने आँखें बंद कर लीं।

     

    जब उसने आँखें खोलीं…

     

    वह उसी पुराने स्टेशन पर खड़ा था।

     

    सुबह हो चुकी थी।

     

    प्लेटफॉर्म नंबर 6 पर लोग आ-जा रहे थे।

     

    सब कुछ सामान्य था।

     

    उसकी माँ सामने खड़ी थीं।

     

    आरव दौड़कर उनके पास गया।

     

    इस बार उसने उनका चेहरा साफ देखा।

     

    वही चेहरा।

     

    वही आँखें।

     

    वही मुस्कान।

     

    माँ ने पूछा—

     

    “अब सब खत्म हो गया?”

     

    आरव ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हाँ।”

     

    उस रात के बाद कई साल बीत गए।

     

    आरव ने कभी वह ट्रेन नहीं देखी।

     

    प्लेटफॉर्म नंबर 6 पर अब नई लाइटें लग गईं।

     

    पुरानी रेल लाइन बंद कर दी गई।

     

    लोग उस घटना को भूल गए।

     

    लेकिन एक रात…

     

    रेलवे के एक नए कर्मचारी को पुराने रिकॉर्ड रूम में एक टिकट मिला।

     

    उस टिकट पर लिखा था—

     

    “निशा एक्सप्रेस — अंतिम यात्रा।”

     

    कर्मचारी ने टिकट पलटा।

     

    पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “जब कोई इंसान अपने सबसे प्यारे व्यक्ति को भूल जाता है, ट्रेन फिर लौट आती है।”

     

    और उसी समय स्टेशन के पुराने स्पीकर से एक आवाज आई—

     

    “यात्रियों से अनुरोध है…”

     

    कुछ सेकंड की खामोशी के बाद आवाज पूरी हुई—

     

    “प्लेटफॉर्म नंबर 6 पर आने वाली आखिरी ट्रेन के लिए तैयार रहें।”

     

    दूर अंधेरे में ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

     

    फूँऽऽऽ…

     

    और प्लेटफॉर्म की घड़ी…

     

    धीरे-धीरे पीछे घूमने लगी।

     

    11:55।

     

    समाप्त।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • रात की आखिरी ट्रेन — पार्ट 4: मृत्यु जंक्शन

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    आरव के कानों में बूढ़े की बात गूंजती रही—

     

    “इस ट्रेन को चलाने वाला कोई इंसान नहीं है… तुम्हारे पिता हैं।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा—

     

    “मेरे पिता तो दस साल पहले मर चुके हैं।”

     

    बूढ़े ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “तो फिर ट्रेन कौन चला रहा है?”

     

    बूढ़े ने सामने की ओर इशारा किया।

     

    “तुम्हारे पिता की आत्मा।”

     

    आरव कुछ बोल नहीं पाया।

     

    ट्रेन अब पहले से कहीं ज्यादा तेज दौड़ रही थी।

     

    खिड़की के बाहर कोई शहर नहीं था।

     

    सिर्फ काला धुआँ और हजारों सफेद चेहरे ट्रेन के साथ दौड़ रहे थे।

     

    लाउडस्पीकर से आवाज आई—

     

    “मृत्यु जंक्शन आने वाला है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “अगर हम वहाँ पहुंच गए तो?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “जो ट्रेन से उतर गया, वह वापस नहीं लौटता।”

     

    “और जो नहीं उतरा?”

     

    “वह हमेशा के लिए यात्री बन जाता है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो बचने का रास्ता क्या है?”

     

    बूढ़े ने अपनी जेब से एक पुरानी चाबी निकाली।

     

    “इंजन तक जाओ।”

     

    “इससे क्या होगा?”

     

    “तुम्हारे पिता ने इसे मेरे पास छोड़ा था।”

     

    आरव ने चाबी हाथ में ली।

     

    उस पर एक छोटा-सा अक्षर बना था—

     

    A

     

    आरव ने पूछा—

     

    “उन्होंने आपको यह कब दिया?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “जिस रात उनकी मृत्यु हुई।”

     

    आरव चौंका।

     

    “आप मेरे पिता को जानते थे?”

     

    “बहुत अच्छी तरह।”

     

    बूढ़े ने बताया कि आरव के पिता रेलवे में काम करते थे। दस साल पहले एक रात उनकी ड्यूटी इसी रेल लाइन पर थी।

     

    उस रात एक ट्रेन पटरी से उतर गई थी।

     

    कई यात्रियों की मौत हुई।

     

    आरव के पिता ने लोगों को बचाने के लिए अपनी जान दे दी।

     

    लेकिन मरने के बाद उनकी आत्मा उसी ट्रेन में फंस गई।

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता हर रात इस ट्रेन को चलाते हैं ताकि कोई और उसी हादसे में न मरे।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “फिर निशा?”

     

    “निशा इस ट्रेन को रोकना चाहती है।”

     

    अचानक ट्रेन इतनी जोर से हिली कि आरव गिरते-गिरते बचा।

     

    बूढ़ा चिल्लाया—

     

    “समय कम है!”

     

    दोनों आगे की ओर दौड़ने लगे।

     

    रास्ते में कई डिब्बे पार करने पड़े।

     

    पहले डिब्बे में सैकड़ों खाली सीटें थीं।

     

    दूसरे में सभी खिड़कियों पर खून से हाथों के निशान थे।

     

    तीसरे डिब्बे में बच्चों के खिलौने पड़े थे।

     

    चौथे में आरव ने अपने बचपन का घर देखा।

     

    वह कुछ पल के लिए रुक गया।

     

    खिड़की के अंदर उसकी माँ बैठी थीं।

     

    “आरव…”

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    वह आगे बढ़ना चाहता था।

     

    लेकिन बूढ़े ने कहा—

     

    “यह असली नहीं है।”

     

    आरव ने मुट्ठी बांध ली।

     

    “मुझे पता है।”

     

    वे आगे बढ़े।

     

    आखिरकार इंजन का दरवाजा दिखाई दिया।

     

    आरव ने चाबी लगाई।

     

    दरवाजा खुल गया।

     

    अंदर एक आदमी बैठा था।

     

    रेलवे की पुरानी वर्दी।

     

    सफेद बाल।

     

    कांपते हुए हाथ।

     

    आरव वहीं जम गया।

     

    “पापा…”

     

    आदमी ने धीरे-धीरे पीछे देखा।

     

    वह सच में आरव के पिता थे।

     

    उनकी आँखों में वही प्यार था जो आरव ने बचपन में देखा था।

     

    “बेटा…”

     

    आरव दौड़कर उनके पास जाना चाहता था।

     

    लेकिन उसके पिता ने हाथ उठाकर रोक दिया।

     

    “पास मत आना।”

     

    “पापा!”

     

    “यह जगह तुम्हारे लिए नहीं है।”

     

    आरव रोते हुए बोला—

     

    “आपने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?”

     

    पिता ने कहा—

     

    “क्योंकि मैं चाहता था कि तुम सामान्य जिंदगी जियो।”

     

    “माँ को पता था?”

     

    पिता ने चुपचाप सिर झुका लिया।

     

    आरव समझ गया।

     

    उसकी माँ को सब पता था।

     

    “माँ ने मुझे यहाँ क्यों भेजा?”

     

    पिता ने कहा—

     

    “क्योंकि अब मेरी ताकत खत्म हो रही है।”

     

    अचानक इंजन के पीछे से जोरदार चीख सुनाई दी।

     

    निशा सामने खड़ी थी।

     

    उसने कहा—

     

    “बहुत हो गया।”

     

    पिता ने तुरंत ट्रेन की गति बढ़ा दी।

     

    निशा चिल्लाई—

     

    “तुम मुझे हमेशा के लिए कैद नहीं रख सकते!”

     

    पिता ने जवाब दिया—

     

    “जब तक मैं जिंदा हूँ—”

     

    फिर वह रुक गए।

     

    आरव ने कहा—

     

    “आप तो जिंदा नहीं हैं।”

     

    पिता ने उसकी तरफ देखा।

     

    “यही समस्या है।”

     

    निशा धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ने लगी।

     

    “तुम्हारी आत्मा खत्म हो रही है।”

     

    पिता ने आरव से कहा—

     

    “बेटा, मुझे इंजन से निकालने का एक ही रास्ता है।”

     

    “क्या?”

     

    “ट्रेन रोक दो।”

     

    “कैसे?”

     

    पिता ने सामने लगे एक लाल लीवर की तरफ इशारा किया।

     

    “उसे खींचना होगा।”

     

    आरव ने लीवर पकड़ लिया।

     

    लेकिन निशा ने उसे रोक लिया।

     

    “अगर तुमने इसे खींचा… तो ट्रेन में मौजूद सभी आत्माएँ आजाद हो जाएँगी।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “यही तो चाहिए।”

     

    निशा मुस्कुराई।

     

    “लेकिन तुम्हारे पिता भी।”

     

    आरव की आँखें भर आईं।

     

    “मैं उन्हें जाने दूँगा।”

     

    उसने पूरी ताकत से लीवर खींच दिया।

     

    धड़ाम!

     

    ट्रेन की गति कम होने लगी।

     

    हजारों चीखें एक साथ सुनाई देने लगीं।

     

    सभी डिब्बों की खिड़कियाँ खुल गईं।

     

    सफेद धुएँ जैसी आत्माएँ बाहर निकलने लगीं।

     

    बूढ़ा आदमी मुस्कुराया।

     

    “आखिरकार…”

     

    उसका शरीर धीरे-धीरे रोशनी में बदलने लगा।

     

    आरव ने कहा—

     

    “आप कहाँ जा रहे हैं?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “घर।”

     

    और वह गायब हो गया।

     

    निशा चीखती हुई पीछे हटने लगी।

     

    उसका शरीर टूटने लगा।

     

    लेकिन जाने से पहले उसने आरव की तरफ देखा।

     

    “तुमने मेरी यादें लौटा दीं।”

     

    आरव चौंका।

     

    निशा की आँखों से आँसू निकल रहे थे।

     

    “मेरे भाई की याद… मुझे वापस मिल गई।”

     

    वह मुस्कुराई।

     

    फिर उसका शरीर भी रोशनी में बदल गया।

     

    इंजन में अब सिर्फ आरव और उसके पिता थे।

     

    पिता ने कहा—

     

    “अब तुम्हें उतरना होगा।”

     

    आरव रोते हुए बोला—

     

    “मैं आपको छोड़ना नहीं चाहता।”

     

    पिता ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “बेटा… कुछ सफर ऐसे होते हैं जिन्हें अकेले पूरा करना पड़ता है।”

     

    ट्रेन रुक गई।

     

    बाहर सुबह की हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी।

     

    पिता ने कहा—

     

    “जाओ।”

     

    आरव ट्रेन से उतर गया।

     

    जैसे ही उसने पीछे देखा…

     

    ट्रेन गायब हो चुकी थी।

     

    पटरी खाली थी।

     

    सिर्फ जमीन पर एक पुराना टिकट पड़ा था।

     

    आरव ने उसे उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “वापसी — सफल।”

     

    लेकिन नीचे छोटे अक्षरों में एक और लाइन थी—

     

    “यात्रा समाप्त नहीं हुई।”

     

    आरव ने वह लाइन पढ़ी ही थी कि दूर से ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

     

    फूँऽऽऽ…

     

    वह पलटकर देखने लगा।

     

    पटरी खाली थी।

     

    फिर उसके मोबाइल में एक मैसेज आया।

     

    “आपकी अगली यात्रा 14 अगस्त को है।”

     

    आरव के हाथ से मोबाइल गिर गया।

     

    क्योंकि आज भी तारीख थी—

     

    14 अगस्त।

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    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।