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😱लाल चुड़ैल😱

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

 

😱(भाग 2 — हवेली का राज़ )😱

 

 

अगली सुबह अमन की आँख खुली तो उसके कमरे में धूप नहीं थी।

 

खिड़की बंद थी।

 

दरवाज़ा बंद था।

 

लेकिन कमरे में मिट्टी और गीली मिट्टी जैसी अजीब गंध फैली हुई थी।

 

उसने अपने हाथ की तरफ देखा।

 

कलाई पर तीन लाल निशान थे।

 

ऐसे निशान जैसे किसी ने नाखूनों से उसे पकड़कर खरोंचा हो।

 

अमन घबरा गया।

 

उसे पिछली रात की सारी बातें याद आने लगीं।

 

लाल हवेली।

 

वह औरत।

 

लाल लॉकेट।

 

और उसकी आवाज़—

 

“अब अगली रात तुम्हारी है…”

 

अमन ने तुरंत रवि को फोन किया।

 

फोन बंद था।

 

वह उसके घर पहुँचा तो रवि बिस्तर पर बैठा काँप रहा था।

 

“तुम ठीक हो?”

 

रवि ने धीरे से सिर हिलाया।

 

“कल रात मैंने एक सपना देखा।”

 

“क्या?”

 

“वही औरत… लाल चुड़ैल।”

 

रवि की आँखों में आँसू थे।

 

“उसने मुझे बताया कि चंद्रा ने किसी को नहीं मारा था।”

 

अमन चौंक गया।

 

“तो फिर?”

 

रवि बोला—

 

“उसे मारा गया था।”

 

कमरे में सन्नाटा छा गया।

 

उसी समय बाहर से हरिराम काका की आवाज़ आई।

 

“अगर सच जानना है तो मेरे पास आओ।”

 

दोनों उनके घर पहुँचे।

 

हरिराम काका ने दरवाज़ा बंद किया और एक पुराना लकड़ी का संदूक खोला।

 

उसमें पुराने कागज़, तस्वीरें और एक डायरी रखी थी।

 

काका ने डायरी अमन को दी।

 

“यह चंद्रा के पति देवेंद्र की डायरी है।”

 

अमन ने पहला पन्ना खोला।

 

लिखा था—

 

“चंद्रा को मैं कभी माफ़ नहीं कर पाऊँगा।”

 

अगले पन्ने पर लिखा था—

 

“वह मेरे राज़ जानती है।”

 

फिर एक पन्ना था जिस पर सिर्फ एक तारीख लिखी थी।

 

वही तारीख…

 

जिस रात हवेली में आग लगी थी।

 

अमन ने पूछा, “काका, उस रात क्या हुआ था?”

 

हरिराम काका ने लंबी साँस ली।

 

“देवेंद्र गाँव का सबसे ताकतवर आदमी था। उसने गाँव की जमीनों पर कब्ज़ा कर रखा था। चंद्रा को सब पता चल गया था। उसने गाँव वालों को सच बताने की धमकी दी।”

 

“फिर?”

 

“देवेंद्र ने उसे रोकने की कोशिश की।”

 

काका कुछ देर चुप रहे।

 

“उस रात हवेली में आग लगी। लोग बाहर खड़े रहे। किसी ने अंदर जाने की हिम्मत नहीं की।”

 

अमन ने पूछा, “और चंद्रा?”

 

“सबने माना कि वह जलकर मर गई।”

 

“लेकिन उसकी लाश नहीं मिली।”

 

काका ने सिर हिलाया।

 

“क्योंकि वह हवेली में थी ही नहीं।”

 

अमन और रवि एक-दूसरे को देखने लगे।

 

“तो फिर वह कहाँ गई?”

 

हरिराम काका की आवाज़ धीमी हो गई।

 

“हवेली के नीचे एक तहखाना है।”

 

अमन के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

 

“तहखाना?”

 

“हाँ। और वहाँ से गाँव के पुराने कुएँ तक एक सुरंग जाती थी।”

 

अमन को पिछली रात की लाल चुड़ैल की बात याद आई।

 

मेरा हार कहाँ है?

 

उसने तुरंत पूछा—

 

“उसका हार?”

 

काका की आँखें फैल गईं।

 

“तुम्हें उसका हार मिला?”

 

अमन ने जेब से लॉकेट निकाला।

 

काका ने उसे देखते ही पीछे कदम कर लिया।

 

“इसे यहाँ से बाहर ले जाओ!”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि यह वही लॉकेट है जो चंद्रा के गले में था।”

 

अमन ने लॉकेट खोला।

 

अंदर एक छोटी-सी तस्वीर थी।

 

तस्वीर में चंद्रा के साथ एक छोटी लड़की खड़ी थी।

 

रवि ने पूछा—

 

“यह लड़की कौन है?”

 

हरिराम काका का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

“चंद्रा की बेटी।”

 

अमन हैरान रह गया।

 

“लेकिन गाँव में तो कहा जाता था कि चंद्रा की कोई बेटी नहीं थी।”

 

काका ने जवाब नहीं दिया।

 

उन्होंने सिर्फ इतना कहा—

 

“क्योंकि वह बच्ची भी उस रात गायब हो गई थी।”

 

अचानक कमरे के बाहर पायल की आवाज़ सुनाई दी।

 

छन… छन… छन…

 

तीनों की साँसें रुक गईं।

 

काका ने तुरंत दरवाज़े की ओर देखा।

 

पायल की आवाज़ धीरे-धीरे करीब आती जा रही थी।

 

छन… छन… छन…

 

फिर आवाज़ दरवाज़े के ठीक बाहर रुक गई।

 

तीन सेकंड तक सन्नाटा रहा।

 

फिर दरवाज़े पर खरोंच की आवाज़ आई।

 

खर्रर्रर्र…

 

काका ने फुसफुसाकर कहा—

 

“किसी भी हालत में दरवाज़ा मत खोलना।”

 

खरोंच की आवाज़ बंद हो गई।

 

फिर एक औरत की आवाज़ आई—

 

“काका… दरवाज़ा खोलो…”

 

हरिराम काका काँपने लगे।

 

अमन ने धीरे से पूछा—

 

“काका, यह आपको जानती है?”

 

काका की आँखों में डर उतर आया।

 

“यह चंद्रा नहीं है।”

 

“तो कौन है?”

 

काका ने जवाब दिया—

 

“उसकी बेटी।”

 

अचानक दरवाज़ा ज़ोर से हिलने लगा।

 

धड़ाम!

 

धड़ाम!

 

रवि चीख पड़ा।

 

अमन ने डायरी कसकर पकड़ ली।

 

तभी काका ने दीवार के पीछे बने एक छोटे दरवाज़े की ओर इशारा किया।

 

“उस रास्ते से निकलो!”

 

तीनों पीछे के रास्ते से बाहर भागे।

 

कुछ देर बाद जब वे सुरक्षित जगह पहुँचे तो अमन ने डायरी फिर खोली।

 

एक आख़िरी पन्ने पर कुछ लिखा था।

 

स्याही धुंधली थी, लेकिन शब्द पढ़े जा सकते थे—

 

“चंद्रा मरी नहीं थी। उसे तहखाने में जिंदा बंद किया गया था।”

 

अमन के हाथ काँपने लगे।

 

“काका… किसने बंद किया था?”

 

काका ने जवाब नहीं दिया।

 

उन्होंने सिर झुका लिया।

 

अमन ने डायरी का अगला पन्ना पलटा।

 

वहाँ एक नाम लिखा था।

 

हरिराम।

 

अमन ने धीरे-धीरे काका की ओर देखा।

 

“यह क्या है?”

 

हरिराम काका की आँखों से आँसू निकल आए।

 

“मैंने दरवाज़ा बंद किया था।”

 

रवि पीछे हट गया।

 

“आपने?”

 

“मैं मजबूर था।”

 

“किसने मजबूर किया?”

 

काका कुछ बोलते, उससे पहले कमरे की सारी लाइटें बंद हो गईं।

 

अंधेरा।

 

फिर एक लाल रोशनी कमरे के कोने में दिखाई दी।

 

वही लाल साड़ी।

 

वही लंबे बाल।

 

लेकिन इस बार उसके साथ एक छोटी बच्ची भी खड़ी थी।

 

बच्ची का चेहरा नीचे झुका हुआ था।

 

चंद्रा की आवाज़ गूँजी—

 

“सच… अभी पूरा नहीं हुआ।”

 

अमन ने काँपते हुए पूछा—

 

“तुम चाहती क्या हो?”

 

औरत ने धीरे-धीरे अपना हाथ उठाया।

 

उसकी उंगली सीधे हरिराम काका की ओर थी।

 

“जिसने दरवाज़ा बंद किया था…”

 

हरिराम काका रो पड़े।

 

“मुझे माफ़ कर दो।”

 

चंद्रा की आवाज़ अचानक भयानक चीख में बदल गई—

 

“मुझे नहीं… मेरी बेटी से माफी माँगो!”

 

छोटी बच्ची ने अपना चेहरा ऊपर उठाया।

 

उसका चेहरा देखकर अमन की चीख निकल गई।

 

उसकी आँखें नहीं थीं।

 

सिर्फ दो गहरे काले गड्ढे थे।

 

अगले ही पल दोनों गायब हो गए।

 

कमरे की लाइट वापस आ गई।

 

लेकिन हरिराम काका भी गायब थे।

 

उनकी जगह फर्श पर सिर्फ एक लाल चूड़ी पड़ी थी।

 

और दीवार पर खून से लिखा था—

 

“आज रात तहखाना खुलेगा।”

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