(भाग 5 — तीसरे दरवाज़े के पीछे)
अमन और रवि उस लोहे के दरवाज़े के सामने खड़े थे।
दरवाज़े पर वही चेतावनी लिखी थी—
“जो इसे खोलेगा, उसकी आत्मा कभी वापस नहीं आएगी।”
चंद्रा कुछ दूरी पर खड़ी थी।
उसके चेहरे पर पहली बार डर साफ दिखाई दे रहा था।
अमन ने पूछा—
“अगर इसे खोलना इतना खतरनाक है, तो हमें यहाँ क्यों लाया गया?”
चंद्रा ने जवाब दिया—
“क्योंकि अब वह दरवाज़ा खुद खुलना चाहता है।”
जैसे ही उसने यह कहा—
ठक।
दरवाज़े के अंदर से किसी ने दस्तक दी।
रवि पीछे हट गया।
ठक… ठक… ठक…
तीन बार दस्तक।
फिर एक आवाज़ आई—
“अमन…”
अमन का चेहरा सफेद पड़ गया।
आवाज़ उसकी माँ जैसी थी।
उसकी माँ की मृत्यु कई साल पहले हो चुकी थी।
“बेटा… दरवाज़ा खोलो।”
अमन की आँखों में आँसू आ गए।
रवि ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“यह तुम्हारी माँ नहीं है।”
अंदर से फिर आवाज़ आई—
“अमन… मैं बहुत अकेली हूँ।”
अमन कुछ कदम आगे बढ़ा।
चंद्रा ने जोर से कहा—
“नहीं!”
अमन रुक गया।
चंद्रा की आवाज़ काँप रही थी।
“यह वही करती है।”
“कौन?”
“वह शक्ति लोगों की सबसे प्यारी आवाज़ बनकर उन्हें अपने पास बुलाती है।”
अचानक दरवाज़े के नीचे से काला धुआँ बाहर निकलने लगा।
रवि ने पूछा—
“इसे रोकेंगे कैसे?”
चंद्रा ने कहा—
“जिस चीज़ से यह शक्ति बनी है, उसे वापस वहीं रखना होगा।”
अमन ने पूछा—
“क्या?”
चंद्रा ने उसकी तरफ देखा।
“मेरा लॉकेट।”
अमन ने लॉकेट निकाला।
चंद्रा ने कहा—
“इसमें मेरी और गौरी की आखिरी याद बंद है। देवेंद्र ने इसी याद को इस्तेमाल करके उस शक्ति को जगाया था।”
अमन ने लॉकेट दरवाज़े के सामने रखा।
अचानक दरवाज़ा काँपने लगा।
अंदर से भयानक चीख सुनाई दी।
“नहीं!”
लोहे का दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
अंदर कोई कमरा नहीं था।
सिर्फ अंधेरा।
ऐसा अंधेरा जिसमें टॉर्च की रोशनी भी गायब हो रही थी।
फिर अंधेरे के बीच एक विशाल लाल आँख खुली।
रवि चीख पड़ा।
“भागो!”
लेकिन अमन वहीं खड़ा रहा।
उसे लगा जैसे कोई उसे अपनी ओर खींच रहा हो।
उसने देखा कि उसके सामने उसकी माँ खड़ी है।
“बेटा…”
अमन की आँखों से आँसू बह निकले।
“माँ?”
उसने हाथ आगे बढ़ाया।
लेकिन तभी उसे चंद्रा की बात याद आई।
यह असली नहीं था।
अमन ने आँखें बंद कर लीं।
“तुम मेरी माँ नहीं हो।”
उस आकृति का चेहरा अचानक बदल गया।
माँ का चेहरा पिघलकर एक भयानक लाल चेहरा बन गया।
उसने चीखते हुए अमन पर हमला किया।
अमन पीछे गिर पड़ा।
रवि ने लाल लॉकेट उठाकर उस शक्ति की ओर फेंक दिया।
लॉकेट हवा में चमकने लगा।
चंद्रा ने अपनी पूरी शक्ति से कहा—
“गौरी!”
अचानक छोटी बच्ची की आवाज़ गूँजी—
“माँ!”
एक सफेद रोशनी कमरे में फैल गई।
गौरी की आत्मा सामने दिखाई दी।
वह धीरे-धीरे उस लाल शक्ति की ओर बढ़ी।
लाल शक्ति पीछे हटने लगी।
“नहीं…”
गौरी ने कहा—
“तूने मेरी माँ को मुझसे छीना था।”
शक्ति गरजी—
“तुम दोनों मेरी वजह से पैदा नहीं हुईं! तुम्हारे डर से मैं बनी हूँ!”
चंद्रा ने कहा—
“और अब तुम्हारा डर खत्म हो गया।”
गौरी ने चंद्रा का हाथ पकड़ लिया।
दोनों की आत्माएँ रोशनी में बदलने लगीं।
लाल शक्ति चीखने लगी।
“नहीं!”
अमन ने देखा कि लॉकेट टूट गया।
उसमें से एक तेज़ रोशनी निकली।
पूरी सुरंग हिलने लगी।
दीवारें टूटने लगीं।
रवि ने अमन को खींचा।
“हमें निकलना होगा!”
दोनों भागते हुए सुरंग से बाहर निकले।
पीछे से एक भयानक विस्फोट हुआ।
लाल हवेली का एक बड़ा हिस्सा गिर गया।
सुबह तक वहाँ सिर्फ टूटी हुई दीवारें बची थीं।
गाँव वालों ने देखा कि बरगद के पेड़ के नीचे लाल साड़ी का एक टुकड़ा पड़ा था।
लेकिन चंद्रा कहीं नहीं थी।
उस दिन के बाद अमावस्या की रात पायल की आवाज़ कभी नहीं सुनाई दी।
लाल हवेली हमेशा के लिए खामोश हो गई।
अमन ने शहर लौटने से पहले बरगद के नीचे एक छोटा-सा दीपक जलाया।
रवि उसके पास खड़ा था।
“अब सब खत्म हो गया?”
अमन ने कहा—
“शायद।”
दोनों वापस जाने लगे।
लेकिन अमन ने अचानक पीछे मुड़कर देखा।
बरगद के पेड़ की एक शाखा पर कुछ लटक रहा था।
वही लाल चूड़ी।
अमन धीरे-धीरे उसके पास गया।
चूड़ी के अंदर एक छोटा कागज़ फँसा था।
उसने कागज़ खोला।
उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
“चंद्रा चली गई है… लेकिन लाल चुड़ैल कभी एक नहीं थी।”
अमन की साँस रुक गई।
उसी समय गाँव के दूसरे छोर से किसी औरत के चीखने की आवाज़ आई।
फिर पायल की आवाज़।
छन… छन… छन…
रवि ने डरते हुए पूछा—
“यह आवाज़ कहाँ से आ रही है?”
अमन ने दूर देखा।
गाँव की एक बंद पड़ी हवेली की खिड़की में एक औरत खड़ी थी।
लाल साड़ी में।
उसके पीछे…
एक नहीं…
तीन परछाइयाँ थीं।
अमन समझ गया।
लाल चुड़ैल की कहानी खत्म नहीं हुई थी।
शायद चंद्रा सिर्फ उस रहस्य का एक हिस्सा थी।
और अब गाँव में एक नई अमावस्या आने वाली थी।
खिड़की में खड़ी औरत ने धीरे-धीरे हाथ उठाया।
फिर उसने दूर खड़े अमन की तरफ इशारा किया।
उसके होंठ हिले—
“अगली बार… मैं तुम्हें लेने आऊँगी।”
अमन ने पलक झपकाई।
खिड़की खाली थी।
लेकिन उसके कानों में आखिरी आवाज़ अब भी गूँज रही थी—
छन… छन… छन…
समाप्त।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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