🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

परछाई (भाग 1 )

पढ़ने का समय : 5 मिनट

 

 

 

 

शहर से लगभग चालीस किलोमीटर दूर एक छोटा-सा गाँव था—देवगढ़। गाँव देखने में बिल्कुल सामान्य था। चारों तरफ खेत, पुराने पेड़, मिट्टी के रास्ते और दूर तक फैले छोटे-छोटे घर। लेकिन गाँव की एक बात अजीब थी। यहाँ लोग सूर्यास्त के बाद अपने घरों के बाहर आईना नहीं रखते थे। और रात में अगर किसी की परछाई उसके शरीर से अलग दिशा में दिखाई दे… तो लोग उसे देखने की कोशिश भी नहीं करते थे। क्योंकि देवगढ़ में एक पुरानी मान्यता थी— “हर इंसान की एक परछाई होती है… लेकिन कभी-कभी किसी की परछाई इंसान की नहीं रहती।” इसी गाँव में कई साल बाद विवेक वापस आया था। वह शहर में नौकरी करता था और अपनी दादी की मृत्यु के बाद गाँव का पुराना घर बेचने आया था। घर लगभग बीस साल से बंद था। जैसे ही उसने मुख्य दरवाज़ा खोला, अंदर से धूल और सीलन की गंध आई। कमरे में पुराने फर्नीचर पड़े थे। दीवार पर उसके दादा-दादी की तस्वीर लगी थी। विवेक ने तस्वीर साफ की। तभी उसकी नजर तस्वीर के नीचे लगी एक छोटी-सी काली पट्टी पर पड़ी। उस पर लिखा था— “पीछे मत देखना।” विवेक हँस पड़ा। “दादी भी न…” उसे लगा शायद यह कोई पुरानी मज़ाकिया बात होगी। शाम तक उसने घर की सफाई कर ली। रात को बिजली चली गई। विवेक ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई और बरामदे में बैठ गया। आसमान में बादल थे। गाँव बिल्कुल शांत था। तभी उसे सामने की दीवार पर अपनी परछाई दिखाई दी। विवेक ने हाथ उठाया। परछाई ने भी हाथ उठाया। उसने सिर दाईं तरफ घुमाया। परछाई ने भी सिर घुमाया। विवेक मुस्कुराया। “सब ठीक है।” फिर उसने अपना हाथ नीचे कर लिया। परछाई ने भी हाथ नीचे कर लिया। कुछ सेकंड बाद… विवेक ने अचानक देखा कि परछाई ने अपना सिर ऊपर उठा लिया था। विवेक स्थिर खड़ा था। उसकी परछाई… उसे देख रही थी। विवेक की रीढ़ में ठंड उतर गई। उसने तुरंत मोबाइल की रोशनी बंद कर दी। अंधेरा छा गया। कुछ सेकंड बाद उसने फिर रोशनी जलाई। परछाई गायब थी। विवेक ने खुद को समझाया कि शायद रोशनी के कोण की वजह से ऐसा हुआ होगा। वह कमरे में जाकर सो गया। रात लगभग दो बजे उसकी आँख खुली। उसे लगा जैसे कोई उसके कमरे के बाहर चल रहा है। ठक… ठक… ठक… विवेक बिस्तर से उठा। दरवाज़े के नीचे से हल्की रोशनी आ रही थी। वह धीरे से दरवाज़े के पास गया। “कौन है?” कोई जवाब नहीं। उसने दरवाज़ा खोला। बाहर कोई नहीं था। लेकिन फर्श पर… एक लंबी काली परछाई दिखाई दे रही थी। विवेक ने ऊपर देखा। कोई इंसान वहाँ खड़ा नहीं था। परछाई अकेली थी। वह धीरे-धीरे दीवार पर चढ़ रही थी। विवेक पीछे हट गया। अचानक परछाई ने अपना सिर उसकी ओर घुमाया। विवेक ने डरकर दरवाज़ा बंद कर दिया। पूरी रात वह जागता रहा। सुबह उसने पड़ोसी शंकर चाचा से पूछा— “चाचा, इस घर में पहले कुछ हुआ था क्या?” शंकर चाचा कुछ देर उसे देखते रहे। “तुम्हारी दादी ने तुम्हें कुछ नहीं बताया?” “नहीं।” “तो अच्छा ही हुआ।” विवेक ने पूछा— “क्या हुआ था?” शंकर चाचा ने धीमी आवाज़ में कहा— “तुम्हारे दादा की मौत सामान्य नहीं थी।” विवेक चौंक गया। “क्या मतलब?” “जिस रात उनकी मौत हुई थी, उन्होंने पूरे गाँव में एक ही बात कही थी।” “क्या?” शंकर चाचा ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा— “मेरी परछाई मुझसे पहले घर पहुँच गई है।” विवेक के शरीर में सिहरन दौड़ गई। “फिर?” “सुबह तुम्हारे दादा मृत मिले।” “और उनकी परछाई?” शंकर चाचा ने कोई जवाब नहीं दिया। विवेक ने जोर देकर पूछा— “चाचा, बताइए।” शंकर चाचा ने कहा— “उनकी लाश के पास कोई परछाई नहीं थी।” विवेक के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसी रात उसने अपने कमरे में लगे पुराने आईने को देखा। आईने में उसका चेहरा दिखाई दे रहा था। लेकिन उसके पीछे… एक काली आकृति खड़ी थी। विवेक तुरंत पीछे मुड़ा। कमरा खाली था। उसने फिर आईने में देखा। आकृति अब भी वहीं थी। इस बार वह और करीब थी। विवेक ने डरते हुए आईने को कपड़े से ढक दिया। तभी पीछे से आवाज़ आई— “तुम्हें दादा ने चेतावनी दी थी।” विवेक का दिल रुकने जैसा हो गया। उसने धीरे-धीरे पीछे देखा। कमरे में कोई नहीं था। लेकिन दीवार पर उसकी परछाई दिखाई दे रही थी। विवेक स्थिर था। फिर भी परछाई… चल रही थी। उसने अपना हाथ उठाया। फिर दीवार पर लिखने लगी। धीरे-धीरे काली उँगली से दीवार पर एक शब्द उभरा— “भागो।” विवेक पीछे हट गया। तभी खिड़की अपने आप खुल गई। बाहर तेज़ हवा चलने लगी। और आँगन में उसे एक दूसरी परछाई दिखाई दी। वह किसी आदमी की थी। वह धीरे-धीरे घर की तरफ बढ़ रही थी। विवेक ने मोबाइल की रोशनी बाहर डाली। कोई इंसान नहीं था। सिर्फ परछाई। वह परछाई दरवाज़े तक आई। फिर दरवाज़े के नीचे से अंदर घुस गई। विवेक चीख पड़ा। परछाई फर्श पर रेंगती हुई उसके पैरों तक पहुँची। फिर अचानक उसके पैर की परछाई से जुड़ गई। विवेक ने महसूस किया कि उसका शरीर ठंडा पड़ रहा है। उसे लगा जैसे कोई उसके अंदर घुस रहा हो। तभी दीवार पर एक और शब्द उभरा— “दूसरी रात।” विवेक बेहोश होकर गिर पड़ा। सुबह जब उसकी आँख खुली तो वह फर्श पर पड़ा था। सब कुछ सामान्य था। लेकिन जब उसने सूरज की रोशनी में जमीन पर देखा… उसकी परछाई उसके पैरों के नीचे नहीं थी। वह उससे लगभग पाँच कदम दूर खड़ी थी। और… वह विवेक की तरफ नहीं देख रही थी। वह घर के बंद पड़े तहखाने की ओर देख रही थी। विवेक ने पहली बार महसूस किया— वह परछाई अब उसकी नहीं रही थी।

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *