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😱 जिस पेड़ को काटना मना था 😱(A COMPLETE Horror Story)

पढ़ने का समय : 5 मिनट

 

 

(भाग 1: जंगल की मनाही)

 

उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से गाँव बरवा के किनारे एक घना जंगल था। गाँव के लोग उस जंगल से लकड़ी, फल और सूखी टहनियाँ लाकर अपना गुजारा करते थे। लेकिन जंगल के बीचों-बीच एक ऐसा पेड़ था, जिसके पास जाने से भी लोग डरते थे।

 

वह पेड़ बाकी पेड़ों से बिल्कुल अलग था।

 

उसका तना इतना मोटा था कि उसे चार आदमी मिलकर भी घेर नहीं सकते थे। उसकी शाखाएँ ऊपर जाकर पूरे आसमान को ढक लेती थीं। दिन में भी उसके नीचे अजीब-सा अँधेरा रहता था। पेड़ की छाल काली थी और उस पर लाल रंग की नसों जैसी धारियाँ दिखाई देती थीं।

 

गाँव के बुजुर्ग उसे “काला बरगद” कहते थे।

 

कहा जाता था कि लगभग पचास साल पहले एक लकड़हारा उस पेड़ को काटने गया था। वह वापस तो आया, लेकिन उसके बाद उसने कभी किसी से बात नहीं की। कुछ दिनों बाद उसने अपना घर छोड़ दिया और जंगल में गायब हो गया।

 

तब से गाँव में एक नियम था—

 

“काले बरगद को कोई हाथ नहीं लगाएगा।”

 

लेकिन गरीबी इंसान से कई बार वह काम करवा देती है, जिससे वह डरता है।

 

गाँव में रहने वाला रघु एक गरीब लकड़हारा था। उसकी पत्नी और दो छोटे बच्चे थे। कई दिनों से उसे जंगल में सूखी लकड़ी कम मिल रही थी। घर में अनाज खत्म होने वाला था और उसकी पत्नी सीता बार-बार बच्चों की तरफ देखकर चिंतित हो जाती थी।

 

एक शाम सीता ने धीरे से कहा,

“रघु, कल बच्चों के लिए कुछ आटा ले आना। घर में बस आज रात का खाना बचा है।”

 

रघु ने चुपचाप सिर हिला दिया।

 

अगली सुबह वह अपनी पुरानी कुल्हाड़ी लेकर जंगल चला गया।

 

काफी देर तक घूमने के बाद उसे एक भी अच्छी लकड़ी नहीं मिली। अचानक उसकी नजर काले बरगद पर पड़ी।

 

वह कुछ देर तक उसे देखता रहा।

 

उसके मन में विचार आया—

“अगर इसकी एक बड़ी शाखा काट लूँ तो कई दिनों की लकड़ी मिल जाएगी।”

 

उसे गाँव की मनाही याद थी।

 

फिर बच्चों के भूखे चेहरे उसकी आँखों के सामने आ गए।

 

रघु ने खुद से कहा,

“मैं पूरा पेड़ थोड़े ही काट रहा हूँ। बस एक शाखा।”

 

वह धीरे-धीरे पेड़ के पास पहुँचा।

 

जैसे ही उसने पहला कदम उसकी छाया में रखा, जंगल की सारी आवाजें बंद हो गईं।

 

न पक्षियों की आवाज।

 

न हवा की सरसराहट।

 

न पत्तों की आवाज।

 

पूरा जंगल जैसे अचानक मर गया था।

 

रघु के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

 

उसने ऊपर देखा।

 

काले बरगद की एक मोटी शाखा उसके ठीक ऊपर थी।

 

उसने कुल्हाड़ी उठाई।

 

ठक!

 

पहला वार हुआ।

 

पेड़ से कोई आवाज नहीं आई।

 

दूसरा वार—

 

ठक!

 

तीसरा वार—

 

ठाऽऽक!

 

अचानक पेड़ के अंदर से ऐसी आवाज आई जैसे किसी ने बहुत दूर से कराहते हुए कहा हो—

 

“मत काटो…”

 

रघु के हाथ से कुल्हाड़ी छूटते-छूटते बची।

 

वह पीछे हट गया।

 

उसने चारों तरफ देखा।

 

कोई नहीं था।

 

“शायद मेरा भ्रम है,” उसने खुद को समझाया।

 

उसने कुल्हाड़ी फिर उठाई।

 

तभी उसके पीछे सूखे पत्तों पर किसी के चलने की आवाज आई।

 

चर्र… चर्र… चर्र…

 

रघु ने पीछे देखा।

 

कुछ नहीं।

 

आवाज बंद।

 

वह फिर पेड़ की तरफ मुड़ा।

 

अब उसकी शाखा पर कुछ लाल दिखाई दे रहा था।

 

पहले रघु को लगा कि वह पेड़ का रस है।

 

लेकिन जब वह पास गया तो उसकी साँस अटक गई।

 

वह लाल तरल खून जैसा था।

 

और वह तने से धीरे-धीरे नीचे बह रहा था।

 

रघु डर गया।

 

उसने कुल्हाड़ी जमीन पर फेंकी और भागने लगा।

 

लेकिन कुछ दूर जाकर उसे अपने पीछे वही आवाज सुनाई दी—

 

“कुल्हाड़ी… छोड़कर कहाँ जा रहे हो?”

 

रघु के पैरों की रफ्तार बढ़ गई।

 

वह पीछे देखने की हिम्मत नहीं कर पाया।

 

जंगल से बाहर निकलते ही उसे लगा कि अब वह सुरक्षित है।

 

लेकिन घर पहुँचकर उसने देखा कि उसकी कुल्हाड़ी उसके हाथ में थी।

 

वह घबरा गया।

 

उसे याद था कि उसने कुल्हाड़ी पेड़ के पास ही छोड़ दी थी।

 

उसने कुल्हाड़ी जमीन पर फेंक दी।

 

रात को जब पूरा परिवार सो गया, रघु की आँख अचानक खुली।

 

कमरे में अँधेरा था।

 

उसे लगा जैसे कोई खिड़की के बाहर खड़ा है।

 

उसने ध्यान से सुना।

 

ठक… ठक… ठक…

 

वही आवाज।

 

जैसे कोई कुल्हाड़ी से पेड़ काट रहा हो।

 

रघु ने खिड़की खोली।

 

बाहर कोई नहीं था।

 

लेकिन मिट्टी पर गीले पैरों के निशान बने हुए थे।

 

वे निशान दरवाजे से शुरू होकर सीधे उसके घर के अंदर जा रहे थे।

 

रघु का गला सूख गया।

 

उसने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।

 

कमरे के कोने में उसकी कुल्हाड़ी पड़ी थी।

 

उसकी धार पर ताजा लाल खून लगा था।

 

और तभी अँधेरे में एक धीमी फुसफुसाहट सुनाई दी—

 

“एक वार तुमने किया था… अब एक वार मेरी बारी है…”

 

रघु चीखना चाहता था।

 

लेकिन उसकी आवाज गले में ही अटक गई।

 

उस रात के बाद बरवा गाँव में कुछ ऐसा होने वाला था, जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।

 

क्योंकि रघु ने सिर्फ एक पेड़ को नहीं छेड़ा था।

 

उसने जंगल के अंदर सोई हुई किसी चीज़ को जगा दिया था।

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