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😱जिस पेड़ को काटना मना था..!!😱

पढ़ने का समय : 5 मिनट

 

 

(भाग 2: जंगल की वापसी)

 

सुबह जब रघु की आँख खुली तो उसकी हालत देखकर सीता घबरा गई।

 

उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था और आँखों के नीचे काले घेरे पड़ गए थे।

 

सीता ने पूछा,

“क्या हुआ तुम्हें?”

 

रघु ने रात की पूरी घटना बता दी।

 

सीता कुछ देर चुप रही।

 

फिर उसने कहा,

“आज जंगल मत जाना।”

 

रघु ने हामी भर दी।

 

लेकिन उसी समय दरवाजे पर दस्तक हुई।

 

ठक… ठक… ठक…

 

दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।

 

रघु ने दरवाजा खोला तो सामने गाँव का बूढ़ा हरिया खड़ा था।

 

हरिया ने रघु को देखते ही पूछा,

“तू कल जंगल गया था?”

 

रघु चौंक गया।

 

“हाँ… लेकिन आपको कैसे पता?”

 

हरिया ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,

“तू काले बरगद के पास गया था।”

 

रघु के शरीर में ठंड दौड़ गई।

 

हरिया ने अंदर आकर दरवाजा बंद किया।

 

उसने धीमी आवाज में कहा,

“मैंने तुझे मना नहीं किया था, क्योंकि मुझे लगा था तू गाँव की बात मानेगा। लेकिन अब देर हो चुकी है।”

 

रघु ने पूछा,

“उस पेड़ में क्या है?”

 

हरिया ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

उसने सिर्फ इतना कहा,

“वह पेड़ नहीं है… वह एक दरवाजा है।”

 

रघु ने घबराकर पूछा,

“किसका दरवाजा?”

 

हरिया बोला,

“जिस चीज़ का नाम लेना भी गाँव में मना है।”

 

इतना कहकर वह चला गया।

 

उस दिन के बाद अजीब घटनाएँ शुरू हो गईं।

 

गाँव की गायें रात में अचानक जंगल की ओर देखकर रंभाने लगीं। कुएँ का पानी लाल रंग का दिखाई देने लगा। कई घरों के बाहर सुबह गीली मिट्टी में पैरों के निशान मिलते।

 

और सबसे डरावनी बात—

 

हर रात ठीक बारह बजे, पूरे गाँव में कुल्हाड़ी चलने की आवाज आती।

 

ठक… ठक… ठक…

 

लेकिन कोई लकड़ी नहीं काट रहा था।

 

तीसरी रात रघु की बेटी गुड़िया अचानक नींद में उठकर दरवाजे की ओर चलने लगी।

 

सीता ने उसे पकड़ लिया।

 

गुड़िया की आँखें बंद थीं।

 

वह नींद में बोल रही थी—

 

“माँ… जंगल में दादी बुला रही हैं।”

 

सीता का दिल बैठ गया।

 

उनकी बेटी की दादी को मरे हुए छह साल हो चुके थे।

 

सीता ने उसे जोर से हिलाया।

 

गुड़िया की आँखें खुलीं।

 

वह रोते हुए बोली,

“माँ, बाहर कोई मुझे बुला रहा था।”

 

रघु ने उसी समय तय कर लिया कि उसे हरिया से सच जानना होगा।

 

अगली सुबह वह हरिया के घर पहुँचा।

 

बहुत पूछने पर हरिया ने पुरानी लकड़ी की एक संदूकची निकाली।

 

उसमें एक पुरानी तस्वीर थी।

 

तस्वीर में करीब पचास साल पहले का वही काला बरगद दिखाई दे रहा था।

 

पेड़ के सामने तीन लकड़हारे खड़े थे।

 

हरिया ने तस्वीर में बीच वाले आदमी की तरफ इशारा किया।

 

“यह मेरा बड़ा भाई था।”

 

रघु चुप रहा।

 

हरिया बोला,

“उस समय गाँव में अकाल पड़ा था। मेरे भाई और दो दूसरे लकड़हारे उस पेड़ को काटने गए थे। उन्होंने पहला वार किया तो पेड़ से खून निकला। दूसरा वार किया तो मेरे भाई ने अपनी ही आवाज में किसी को चीखते सुना।”

 

“फिर?”

 

“उस रात तीनों घर लौट आए। लेकिन अगले दिन मेरे भाई की परछाई गायब थी।”

 

रघु की आँखें फैल गईं।

 

“परछाई?”

 

हरिया ने सिर हिलाया।

 

“हाँ। धूप में भी उसकी परछाई जमीन पर नहीं पड़ती थी।”

 

“फिर क्या हुआ?”

 

हरिया की आवाज काँपने लगी।

 

“सात दिन बाद वह जंगल में चला गया। जाते-जाते उसने कहा था—‘पेड़ भूखा है।’”

 

रघु ने पूछा,

“उसे रोक क्यों नहीं लिया?”

 

हरिया बोला,

“क्योंकि उस समय तक गाँव के चार लोग गायब हो चुके थे।”

 

अचानक बाहर से किसी बच्चे के चीखने की आवाज आई।

 

दोनों दौड़कर बाहर निकले।

 

रघु का बेटा मोहन सड़क के किनारे खड़ा था।

 

उसके सामने जंगल की दिशा में एक काली परछाई थी।

 

हरिया ने चिल्लाकर कहा,

“मोहन को पीछे खींच!”

 

रघु दौड़ा।

 

जैसे ही उसने मोहन का हाथ पकड़ा, वह काली परछाई गायब हो गई।

 

मोहन रोते हुए बोला,

“बाबा, वह आदमी मुझे जंगल ले जाने आया था।”

 

“कैसा आदमी?”

 

मोहन ने जवाब दिया—

 

“उसके चेहरे पर चेहरा नहीं था।”

 

रघु के पैरों तले जमीन खिसक गई।

 

उस रात रघु ने घर के सभी दरवाजे बंद कर दिए।

 

लेकिन ठीक बारह बजे खिड़की पर किसी ने दस्तक दी।

 

ठक… ठक… ठक…

 

सीता बच्चों को लेकर अंदर चली गई।

 

रघु ने खिड़की नहीं खोली।

 

तभी बाहर से उसकी अपनी आवाज आई—

 

“रघु… दरवाजा खोल।”

 

रघु जम गया।

 

वह आवाज बिल्कुल उसकी थी।

 

फिर आवाज आई—

 

“मैं जंगल से वापस आ गया हूँ।”

 

रघु ने काँपते हुए सीता का हाथ पकड़ लिया।

 

“दरवाजा मत खोलना।”

 

कुछ देर शांति रही।

 

फिर बाहर से किसी के हँसने की आवाज आई।

 

धीरे-धीरे वह हँसी तेज होती गई।

 

और अचानक दरवाजे पर कुल्हाड़ी का वार हुआ।

 

धड़ाम!

 

लकड़ी में गहरा निशान पड़ गया।

 

दूसरा वार।

 

धड़ाम!

 

तीसरा वार।

 

धड़ाम!

 

बच्चे चीखने लगे।

 

रघु ने खिड़की से बाहर देखने की कोशिश की।

 

दरवाजे के सामने कोई खड़ा था।

 

उसका शरीर इंसान जैसा था।

 

हाथ में कुल्हाड़ी थी।

 

लेकिन उसके चेहरे की जगह सिर्फ काली खाली जगह थी।

 

और सबसे डरावनी बात—

 

उसकी जमीन पर कोई परछाई नहीं थी।

 

अचानक वह आकृति खिड़की की तरफ मुड़ी।

 

रघु पीछे हट गया।

 

उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाकर कहा—

 

“पेड़ की एक शाखा काटी थी… अब पूरा घर देना होगा।”

 

रघु ने पीछे मुड़कर देखा।

 

कमरे में कोई नहीं था।

 

लेकिन दीवार पर एक काली दरार बन चुकी थी।

 

वह दरार धीरे-धीरे फैल रही थी।

 

और उसके अंदर से जंगल के पेड़ों जैसी शाखाएँ बाहर निकल रही थीं।

 

रघु समझ गया—

 

अब खतरा सिर्फ जंगल में नहीं था।

 

जंगल उसके घर तक आ चुका था।

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