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😱जिस पेड़ को काटना मना था..!!😱

पढ़ने का समय : 5 मिनट

 

 

(भाग 3: आखिरी फैसला और सीख)

 

रघु का पूरा घर डर से काँप रहा था।

 

दीवार से निकलती काली शाखाएँ धीरे-धीरे कमरे में फैल रही थीं। बच्चों की चीखें सुनकर सीता उन्हें लेकर दूसरे कमरे में चली गई।

 

रघु को हरिया की बात याद आई—

 

“वह पेड़ नहीं है… वह एक दरवाजा है।”

 

उसे समझ आ गया कि अगर इस श्राप को खत्म करना है, तो उसे वापस उसी जंगल में जाना होगा।

 

लेकिन इस बार अकेले नहीं।

 

सुबह होते ही रघु हरिया के पास गया।

 

हरिया ने उसकी बात सुनी और बोला,

“इस श्राप को खत्म करने का एक ही रास्ता है।”

 

“क्या?”

 

“जिस कुल्हाड़ी से तुमने पेड़ पर पहला वार किया था, उसी से आखिरी वार करना होगा।”

 

रघु ने पूछा,

“लेकिन मैं उस पेड़ को काटूँगा तो श्राप खत्म कैसे होगा?”

 

हरिया बोला,

“पेड़ को काटना नहीं है। उसके तने में जहाँ से खून निकला था, वहाँ जमीन के अंदर एक पुराना पत्थर दबा है। वही इस श्राप की जड़ है।”

 

“उसे कैसे निकालेंगे?”

 

हरिया ने कहा,

“जिसने लालच में पहला वार किया था, वही अपनी गलती स्वीकार करके उस पत्थर को वापस जमीन में दबाएगा। तभी दरवाजा बंद होगा।”

 

रघु ने अपनी कुल्हाड़ी उठाई और हरिया के साथ जंगल की ओर चल पड़ा।

 

जैसे ही दोनों काले बरगद के पास पहुँचे, हवा तेज हो गई।

 

पेड़ की शाखाएँ हिलने लगीं।

 

लेकिन आसपास हवा नहीं चल रही थी।

 

अचानक पेड़ के तने से आवाज आई—

 

“रघु…”

 

रघु रुक गया।

 

आवाज फिर आई—

 

“तुम्हारे बच्चों को बचाना है?”

 

रघु ने आँखें बंद कर लीं।

 

“हाँ।”

 

पेड़ बोला—

 

“तो अपनी कुल्हाड़ी यहाँ छोड़ दो और चले जाओ।”

 

रघु कुछ पल चुप रहा।

 

फिर उसने कहा—

 

“मैं तुम्हारे सामने अपनी गलती मानता हूँ। मैंने लालच में आकर तुम्हें काटा। लेकिन अब मैं किसी और को नुकसान नहीं होने दूँगा।”

 

अचानक पेड़ जोर से हिलने लगा।

 

उसकी शाखाओं से काले धुएँ जैसी चीज निकलने लगी।

 

हरिया चिल्लाया—

 

“जल्दी! तने के नीचे!”

 

रघु ने जमीन खोदनी शुरू की।

 

कुछ ही देर में उसकी कुल्हाड़ी किसी कठोर चीज से टकराई।

 

टन!

 

मिट्टी हटाने पर एक काला पत्थर दिखाई दिया।

 

उस पत्थर पर कई पुराने नाम खुदे हुए थे।

 

हरिया ने उन नामों को देखा तो उसकी आँखों में आँसू आ गए।

 

“ये वही लोग हैं… जो इस जंगल में गायब हुए थे।”

 

रघु ने पत्थर उठाने की कोशिश की।

 

लेकिन पत्थर बहुत भारी था।

 

तभी उसके पीछे किसी ने कहा—

 

“रघु…”

 

उसने पीछे देखा।

 

वहाँ उसकी बेटी गुड़िया खड़ी थी।

 

रघु घबरा गया।

 

“तुम यहाँ कैसे आई?”

 

गुड़िया मुस्कुराई।

 

“बाबा, मेरे साथ घर चलो।”

 

हरिया चिल्लाया—

 

“उसके पास मत जाना!”

 

रघु ने ध्यान से देखा।

 

वह गुड़िया जैसी दिख रही थी, लेकिन उसके पैरों के नीचे परछाई नहीं थी।

 

रघु पीछे हट गया।

 

वह आकृति अचानक डरावनी आवाज में हँसने लगी।

 

उसका चेहरा बदल गया।

 

आँखें काली हो गईं और शरीर धुएँ में बदलने लगा।

 

पेड़ की शाखाएँ रघु की तरफ झपटने लगीं।

 

हरिया ने कुल्हाड़ी से एक शाखा काट दी।

 

उसी क्षण पेड़ से भयानक चीख निकली।

 

रघु ने पूरी ताकत लगाकर काला पत्थर बाहर खींच लिया।

 

जैसे ही पत्थर बाहर आया, जमीन के नीचे से तेज हवा निकलने लगी।

 

हरिया चिल्लाया—

 

“इसे वापस रख!”

 

रघु ने पत्थर को उसी गड्ढे में वापस रख दिया।

 

लेकिन इस बार उसने उसे मिट्टी से पूरी तरह ढक दिया।

 

अचानक सब शांत हो गया।

 

पेड़ की शाखाएँ रुक गईं।

 

हवा बंद हो गई।

 

और फिर काले बरगद की छाल पर बनी लाल धारियाँ धीरे-धीरे गायब होने लगीं।

 

रघु ने देखा कि पेड़ की एक शाखा टूटकर जमीन पर गिर गई।

 

उस शाखा के नीचे वही पुरानी कुल्हाड़ी पड़ी थी।

 

रघु ने उसे उठाया और पेड़ से कहा—

 

“मुझे माफ करना।”

 

कुछ पल तक कोई आवाज नहीं आई।

 

फिर पेड़ के अंदर से बहुत धीमी आवाज आई—

 

“लालच से लिया था… समझदारी से लौटाया।”

 

इसके बाद पेड़ बिल्कुल शांत हो गया।

 

रघु और हरिया गाँव वापस लौट आए।

 

घर पहुँचकर रघु ने देखा कि दीवार की सारी काली दरारें गायब हो चुकी थीं।

 

उसके बच्चे सुरक्षित थे।

 

गाँव वालों ने जब पूरी घटना सुनी तो उन्होंने जंगल के उस हिस्से के चारों ओर पत्थरों की सीमा बना दी।

 

काले बरगद को किसी ने फिर कभी नहीं छुआ।

 

कई साल बीत गए।

 

रघु ने भी लकड़ी काटने का काम छोड़ दिया और गाँव में छोटी-सी दुकान खोल ली।

 

उसने अपने बच्चों को हमेशा एक बात सिखाई—

 

“जरूरत इंसान को मेहनत करने के लिए मजबूर कर सकती है, लेकिन लालच उसे गलत रास्ते पर ले जाता है।”

 

कभी-कभी गाँव के लोग कहते थे कि अमावस्या की रात काले बरगद के पास से गुजरते समय अब भी किसी के कुल्हाड़ी रखने की आवाज सुनाई देती है।

 

ठक… ठक… ठक…

 

लेकिन कोई वहाँ जाने की हिम्मत नहीं करता।

 

और बरवा गाँव में आज भी बुजुर्ग बच्चों को एक बात बताते हैं—

 

सीख

 

प्रकृति हमारे जीवन का हिस्सा है। अपनी जरूरत पूरी करने और लालच में फर्क समझना जरूरी है। हमें पेड़-पौधों और जंगलों का सम्मान करना चाहिए। किसी चेतावनी को सिर्फ अंधविश्वास समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, खासकर जब उसके पीछे पुराने अनुभव और किसी की सुरक्षा जुड़ी हो।

 

क्योंकि कभी-कभी इंसान जिस चीज़ को अपना अधिकार समझकर छीन लेता है, वही चीज़ उसके लिए मुसीबत बन जाती है।

 

और अगर आप कभी किसी पुराने जंगल में जाएँ…

 

जहाँ सब लोग आपको किसी एक पेड़ से दूर रहने को कहें…

 

तो याद रखना—

 

हर पेड़ सिर्फ लकड़ी नहीं होता। कुछ पेड़ अपने अंदर पूरी कहानी छिपाए बैठे होते हैं। 🌳👻

 

 

End

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