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😱 छत पर कोई था..!!😱(part-1)

पढ़ने का समय : 6 मिनट

रात के करीब बारह बज रहे थे।लखनऊ की उस पुरानी कॉलोनी में दिन के समय सब कुछ सामान्य लगता था। बच्चे गलियों में खेलते, चाय की दुकानों पर लोग बातें करते और शाम होते ही हर घर की बालकनी में पीली रोशनी जल उठती। लेकिन रात के बाद वही कॉलोनी बिल्कुल बदल जाती थी।

 

खासकर शर्मा परिवार का घर।

 

तीन मंज़िला पुराना मकान था। सबसे ऊपर एक खुली छत, जिसके चारों तरफ करीब चार फीट ऊँची दीवार थी। छत के एक कोने में पानी की बड़ी काली टंकी थी और दूसरे कोने में एक पुराना स्टोर रूम, जिसका दरवाज़ा पिछले कई सालों से बंद पड़ा था।

 

घर में उस समय सिर्फ तीन लोग थे—राघव, उसकी छोटी बहन नंदिनी और उनकी माँ।

 

पिता की मृत्यु को दो साल हो चुके थे। पिता के जाने के बाद राघव ने ही घर की जिम्मेदारी संभाल ली थी।

 

उस रात राघव अपने कमरे में बैठकर लैपटॉप पर काम कर रहा था।

 

तभी…

 

ठक… ठक… ठक…

 

उसने स्क्रीन से नजर उठाई।

 

आवाज़ ऊपर से आई थी।

 

छत से।

 

राघव कुछ सेकंड तक चुप बैठा रहा।

 

फिर दोबारा आवाज आई।

 

ठक… ठक…

 

इस बार जैसे कोई छत की फर्श पर धीरे-धीरे चल रहा हो।

 

राघव ने घड़ी देखी।

 

12:07 AM.

 

उसने खुद को समझाया, “शायद बिल्ली होगी।”

 

वह वापस काम करने लगा।

 

लेकिन तभी उसके कमरे की खिड़की पर हल्की-सी परछाईं दिखाई दी।

 

राघव ने चौंककर खिड़की की तरफ देखा।

 

कुछ नहीं था।

 

उसने पर्दा हटाया।

 

नीचे पूरी गली खाली थी।

 

सड़क की लाइट के नीचे एक आवारा कुत्ता बैठा था, लेकिन वह भी ऊपर आसमान की तरफ देख रहा था।

 

राघव के शरीर में हल्की सिहरन दौड़ गई।

 

“अजीब है…”

 

उसी समय पीछे से नंदिनी की आवाज आई।

 

“भैया?”

 

राघव पलटा।

 

नंदिनी दरवाज़े पर खड़ी थी।

 

“क्या हुआ?”

 

“आपने भी आवाज सुनी?”

 

“कौन-सी आवाज?”

 

नंदिनी ने छत की तरफ इशारा किया।

 

“ऊपर कोई चल रहा है।”

 

राघव कुछ बोलता, उससे पहले फिर आवाज आई।

 

ठक… ठक… ठक…

 

इस बार आवाज बिल्कुल साफ थी।

 

जैसे किसी के नंगे पैर सीमेंट की फर्श पर पड़ रहे हों।

 

नंदिनी ने धीरे से पूछा, “क्या ऊपर कोई है?”

 

राघव ने कहा, “नहीं। माँ नीचे हैं और पड़ोसी अपने घर में। शायद बिल्ली होगी।”

 

नंदिनी ने सिर हिलाया, लेकिन उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

 

“भैया… मुझे बिल्ली के कदम इतने भारी नहीं लगते।”

 

राघव ने टॉर्च उठाई।

 

“चलो देखते हैं।”

 

दोनों सीढ़ियों से ऊपर जाने लगे।

 

जैसे-जैसे वे छत के करीब पहुँच रहे थे, आवाज बंद हो गई।

 

राघव ने दरवाज़े की कुंडी पकड़ी।

 

एक पल के लिए उसने सोचा कि वापस चला जाए।

 

फिर उसने दरवाज़ा खोल दिया।

 

छत खाली थी।

 

ठंडी हवा चल रही थी।

 

पानी की टंकी के पास कुछ सूखे पत्ते पड़े थे।

 

स्टोर रूम का दरवाज़ा बंद था।

 

राघव ने टॉर्च चारों तरफ घुमाई।

 

“देखा? कोई नहीं है।”

 

नंदिनी ने राहत की सांस ली।

 

तभी…

 

टंकी के पीछे से एक छोटी-सी आवाज आई।

 

छन्न…

 

जैसे किसी ने कांच की चीज़ गिरा दी हो।

 

दोनों वहीं रुक गए।

 

राघव धीरे-धीरे टंकी की तरफ बढ़ा।

 

पीछे जाकर देखा तो वहाँ कुछ नहीं था।

 

सिर्फ फर्श पर एक पुरानी चाँदी की पायल पड़ी थी।

 

नंदिनी ने उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाया।

 

राघव ने तुरंत उसका हाथ रोक दिया।

 

“मत छूना।”

 

“क्यों?”

 

राघव खुद नहीं जानता था।

 

उसने पायल को टॉर्च की रोशनी में देखा।

 

उस पर काले रंग की मिट्टी लगी हुई थी।

 

और सबसे अजीब बात…

 

पायल बिल्कुल गीली थी।

 

जबकि छत पूरी तरह सूखी थी।

 

“चलो नीचे,” राघव ने कहा।

 

दोनों वापस कमरे में आ गए।

 

लेकिन उस रात किसी को नींद नहीं आई।

 

सुबह राघव ने पायल माँ को दिखाई।

 

पायल देखते ही माँ का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

उन्होंने उसे हाथ में लेने से इनकार कर दिया।

 

“इसे घर से बाहर फेंक दो।”

 

राघव ने पूछा, “आप इसे पहचानती हैं?”

 

माँ कुछ देर चुप रहीं।

 

फिर बोलीं, “नहीं।”

 

“माँ, आप झूठ बोल रही हैं।”

 

माँ ने उसकी तरफ देखा।

 

उनकी आँखों में डर था।

 

“कुछ चीज़ों के बारे में जितना कम जानो, उतना अच्छा है।”

 

उस रात राघव ने पायल घर से बाहर फेंक दी।

 

लेकिन अगले दिन सुबह वही पायल फिर छत पर पड़ी मिली।

 

इस बार वह पानी की टंकी के ठीक सामने थी।

 

राघव ने उसे उठाया और गुस्से में नाली के बाहर फेंक दिया।

 

नंदिनी ने कहा, “भैया, इसे किसी नदी में फेंक दो।”

 

राघव ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

रात आई।

 

11:45 बजे तक सब सो चुके थे।

 

राघव भी बिस्तर पर लेट गया।

 

अचानक…

 

ठक…

 

उसकी आँख खुल गई।

 

ठक… ठक…

 

वही आवाज।

 

लेकिन इस बार आवाज छत से नहीं आ रही थी।

 

वह उसके कमरे की छत से आ रही थी।

 

राघव बिस्तर पर बैठ गया।

 

कुछ सेकंड बाद उसे ऐसा लगा जैसे कोई उसके कमरे की छत पर चल रहा हो।

 

धीरे…

 

बहुत धीरे…

 

ठक… ठक… ठक…

 

उसने मोबाइल उठाया और समय देखा।

 

12:13 AM.

 

तभी उसके मोबाइल पर एक अनजान नंबर से मैसेज आया।

 

मैसेज में सिर्फ चार शब्द थे—

 

“ऊपर मत आना। वो जाग गई है।”

 

राघव का दिल जोर से धड़कने लगा।

 

उसने तुरंत नंबर पर कॉल किया।

 

फोन बंद था।

 

तभी नंदिनी चीखती हुई उसके कमरे में आई।

 

“भैया!”

 

“क्या हुआ?”

 

“छत पर कोई है!”

 

राघव ने पूछा, “तुमने देखा?”

 

नंदिनी ने कांपते हुए सिर हिलाया।

 

“हाँ।”

 

“कौन था?”

 

नंदिनी की आँखों से आँसू निकलने लगे।

 

“एक औरत…”

 

“कैसी औरत?”

 

नंदिनी ने धीरे से कहा—

 

“उसका चेहरा नहीं था।”

 

उसी क्षण ऊपर से किसी चीज़ के घिसटने की आवाज आई।

 

घ्र्र्र्र…

 

फिर…

 

छत का दरवाज़ा अपने आप बंद होने की आवाज आई।

 

धड़ाम!

 

राघव और नंदिनी एक-दूसरे को देखने लगे।

 

और तभी…

 

ऊपर से किसी औरत की बहुत धीमी आवाज आई—

 

“राघव…”

 

राघव का खून जम गया।

 

क्योंकि वह आवाज…

 

उसके पिता की मृत्यु के बाद से उसकी माँ की नहीं, बल्कि उसकी मरी हुई बहन की आवाज़ जैसी थी।

 

उसकी बहन की मृत्यु दस साल पहले हो चुकी थी।

 

और उस रात पहली बार राघव को समझ आया—

 

छत पर कोई था।

 

और शायद…

 

वह कई सालों से वहीं था।

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